बाहर से फिट, अंदर से अनफिट? दुबले लोगों में तेजी से बढ़ रहा ‘साइलेंट’ फैटी लिवर, जानें कारण

बाहर से फिट, अंदर से अनफिट? दुबले लोगों में तेजी से बढ़ रहा ‘साइलेंट’ फैटी लिवर, जानें कारण


Can Thin People Get Fatty Liver: अक्सर लोग मानते हैं कि अगर पेट सपाट है और वजन सामान्य है, तो शरीर पूरी तरह स्वस्थ है. लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि कई बार सामान्य दिखने वाले शरीर के भीतर एक खामोश समस्या पनप रही होती है वह है फैटी लिवर. यह तब होता है जब लिवर की सेल्स में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाती है. खास बात यह है कि यह समस्या सिर्फ मोटे लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि पतले दिखने वाले लोगों में भी तेजी से बढ़ रही है. इसे लीन फैटी लिवर या लीन NAFLD यानी नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज कहा जाता है.

कब माना जाता है कि फैटी लिवर की दिक्कत है?

फैटी लिवर तब माना जाता है जब लिवर की सेल्स में 5 प्रतिशत से ज्यादा फैट जमा हो जाए. इससे लिवर के जरूरी काम प्रभावित होने लगते हैं, जैसे शरीर से विषैले पदार्थों को फिल्टर करना और शुगर व फैट के स्तर को संतुलित रखना. शुरुआत में यह बीमारी कोई खास दर्द या लक्षण नहीं देती, इसलिए अक्सर लोगों को इसका पता सामान्य ब्लड टेस्ट या अल्ट्रासाउंड के दौरान ही चलता है.

पतले लोगों को क्यों होती है दिक्कत?

कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि अगर कोई पतला है तो उसके लिवर में फैट कैसे जमा हो सकता है. US National Institutes of Health की एक स्टडी के अनुसार, सिर्फ वजन से लिवर की सेहत तय नहीं होती. कई बार शरीर के अंदर, खासकर अंगों के आसपास जमा होने वाला विसरल फैट ज्यादा नुकसान करता है. व्यक्ति बाहर से पतला दिख सकता है, लेकिन अंदरूनी फैट लिवर को प्रभावित कर सकता है. एक्सपर्ट बताते हैं कि खराब खान-पान, लंबे समय तक बैठे रहना, तनाव और जेनेटिक कारण भी इस जोखिम को बढ़ा देते हैं.

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लाइफस्टाइल भी जिम्मेदार

आजकल कई लोग कम खाना तो खाते हैं, लेकिन सही खाना नहीं खाते. पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय, सफेद ब्रेड, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और ज्यादा चीनी वाली चीजें धीरे-धीरे लिवर पर दबाव डालती हैं. अतिरिक्त शुगर को लिवर फैट में बदल देता है और यही फैट समय के साथ जमा होता जाता है. दक्षिण एशियाई लोगों, खासकर भारतीयों में यह खतरा और ज्यादा देखा गया है. रिसर्च बताते हैं कि भारतीयों के शरीर में फैट अक्सर पेट और लिवर के आसपास जमा होती है. इसके अलावा खराब गट हेल्थ भी लिवर में सूजन और फैट बढ़ाने का कारण बन सकती है.

कैसे इसको ठीक किया जा सकता है?

अच्छी बात यह है कि शुरुआती चरण में फैटी लिवर को सुधारा जा सकता है. संतुलित आहार, रेगुलर एक्सरसाइज, पर्याप्त नींद और तनाव कंट्रोल से लिवर धीरे-धीरे ठीक होने लगता है. एक्सपर्ट के अनुसार भोजन के बाद थोड़ी देर टहलना भी लिवर के लिए फायदेमंद होता है. इसलिए सिर्फ शरीर के आकार से स्वास्थ्य का अंदाजा लगाना सही नहीं है. रेगुलर हेल्थ चेक-अप, ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड जैसे परीक्षण फैटी लिवर की समय रहते पहचान करने में मदद करते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आपके पैरों पर भी घंटों बने रहते हैं मोजों के निशान, जानें किस दिक्कत का हो सकता है संकेत?

क्या आपके पैरों पर भी घंटों बने रहते हैं मोजों के निशान, जानें किस दिक्कत का हो सकता है संकेत?


Why Do Socks Leave Marks On Your Ankles: दिनभर मोजे पहनने के बाद जब हम उन्हें उतारते हैं तो अक्सर टखनों के आसपास हल्के निशान दिखाई देते हैं. ज्यादातर मामलों में यह बिल्कुल सामान्य होता है. मोजों के इलास्टिक की हल्की दबाव की वजह से त्वचा पर कुछ देर के लिए निशान बन जाते हैं और कुछ मिनटों में अपने-आप गायब भी हो जाते हैं. लेकिन अगर ये निशान ज्यादा गहरे हों, देर तक बने रहें या पैरों में सूजन के साथ दिखाई दें, तो डॉक्टर इसे शरीर के एक संकेत के रूप में देखने की सलाह देते हैं.

कई बार यह शरीर में ब्लड सर्कुलेशन या फ्लूड बैलेंस से जुड़ी किसी समस्या की ओर इशारा कर सकता है. हालांकि सिर्फ मोजों के निशान किसी बीमारी का पक्का संकेत नहीं होते. असली बात यह है कि ये निशान कितनी बार दिखते हैं, कितने गहरे होते हैं और उनके साथ अन्य लक्षण मौजूद हैं या नहीं.

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क्यों होती है दिक्कत?

दरअसल, निचले पैरों की त्वचा नरम होती है और दबाव पड़ने पर जल्दी दब जाती है. जब मोजे कई घंटों तक पैरों पर दबाव डालते हैं तो त्वचा पर हल्की गहराई बन जाती है. आमतौर पर मोजे हटाने के बाद यह निशान जल्दी ही खत्म हो जाता है. लेकिन अगर पैरों में हल्की सूजन हो तो वही दबाव त्वचा के नीचे जमा तरल को दबा देता है, जिससे निशान ज्यादा गहरे और लंबे समय तक दिखाई दे सकते हैं, डॉक्टर इस स्थिति को पेरिफेरल एडिमा कहते हैं, जिसमें पैरों और टखनों के आसपास टिश्यू में तरल जमा होने लगता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

वस्कुलर सर्जन डॉ. वरुण बंसल के अनुसार, कई बार मरीज सबसे पहले मोजों के गहरे निशान ही नोटिस करते हैं और बाद में उन्हें पता चलता है कि पैरों में ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी समस्या मौजूद है. उनके मुताबिक अगर मोजों के निशान बार-बार गहरे दिखते हैं, तो यह खराब ब्लड फ्लो, फ्लूड रिटेंशन या वीनस इंसफिशिएंसी जैसी स्थितियों का संकेत हो सकता है. वीनस इंसफिशिएंसी में पैरों की नसें खून को ठीक तरह से हार्ट तक वापस नहीं भेज पातीं, जिससे निचले हिस्से में सूजन आने लगती है.

कुछ लोगों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. जैसे जो लोग लंबे समय तक बैठकर या खड़े होकर काम करते हैं, जिनकी लाइफस्टाइल बहुत कम एक्टिव है, या जिन्हें हार्ट, किडनी या डायबिटीज से जुड़ी समस्याएं हैं.लंबे समय तक पैरों को स्थिर रखने से ब्लड फ्लो धीमा हो जाता है और पैरों में तरल जमा होने लगता है.

इन तरीकों से बच सकते हैं आप

डॉक्टर कहते हैं कि अगर मोजों के निशान के साथ पैरों में भारीपन, सूजन, त्वचा का रंग बदलना या दर्द जैसी समस्या हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. हालांकि अच्छी बात यह है कि कुछ आसान आदतें ब्लड सर्कुलेशन बेहतर रखने में मदद कर सकती हैं। नियमित चलना-फिरना, पैरों को थोड़ा ऊंचा रखकर आराम करना, स्वस्थ वजन बनाए रखना और बहुत टाइट मोजे न पहनना इसमें मददगार हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अब छोटी उम्र से ही कोलेस्ट्रॉल का खतरा, हार्ट अटैक से बचना है तो… जरूर देखें ये गाइडलाइन

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Why High Cholesterol Is Increasing In Young People: दिल की बीमारियों के बढ़ते खतरे को देखते हुए अब एक्सपर्ट ने साफ कहा है कि कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने की शुरुआत कम उम्र से ही कर देनी चाहिए. नई गाइडलाइन के मुताबिक, 30 साल की उम्र से ही लोगों को अपने LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए और इसे उम्रभर कंट्रोल रखना जरूरी है. अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन, अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी और नौ अन्य संस्थानों ने मिलकर ये दिशा-निर्देश जारी किए हैं. इसका मकसद दिल की बीमारियों से होने वाली मौतों को कम करना है, जो आज भी कुल मौतों का एक बड़ा कारण हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि दिल की 80 प्रतिशत तक बीमारियों को सही समय पर रोकथाम से टाला जा सकता है.

क्या कहती है नई गाइडलाइन?

नई गाइडलाइन के अनुसार, कोलेस्ट्रॉल की जांच बचपन से ही शुरू हो जानी चाहिए. करीब 10 साल की उम्र में पहली बार टेस्ट कराने की सलाह दी गई है, ताकि उन लोगों की पहचान हो सके जिनमें जेनेटिक कारणों से कोलेस्ट्रॉल बहुत ज्यादा होता है. ऐसे मामलों में तुरंत इलाज शुरू करना जरूरी होता है. इसके बाद 18-20 साल की उम्र में फिर से जांच और कम से कम हर पांच साल में नियमित स्क्रीनिंग की सलाह दी गई है. जिन लोगों में डायबिटीज या हाई LDL जैसी समस्या है, उन्हें और ज्यादा बार टेस्ट कराने की जरूरत पड़ सकती है.

बैड कोलेस्ट्रॉल कितना होना चाहिए?

ट्रीटमेंट का लक्ष्य व्यक्ति के जोखिम पर निर्भर करता है. सामान्य तौर पर सभी को अपना LDL 100 से नीचे रखने की कोशिश करनी चाहिए. जिन लोगों में अगले 10 साल में हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा ज्यादा है, उन्हें इसे 70 से नीचे लाना होगा। वहीं, जिन लोगों को पहले से दिल का दौरा या स्ट्रोक हो चुका है, उनके लिए यह स्तर 55 से भी कम रखने की सलाह दी गई है. The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट का मानना है कि जितना ज्यादा समय तक शरीर में LDL का स्तर ऊंचा रहता है, उतना ही दिल की बीमारी का खतरा बढ़ता है. इसलिए जितना कम, उतना बेहतर और जितने लंबे समय तक कम, उतना सुरक्षित का सिद्धांत अपनाने पर जोर दिया गया है.

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कैसे कर सकते हैं सुधार?

कोलेस्ट्रॉल कम करने का पहला कदम लाइफस्टाइल सुधार है. इसमें संतुलित आहार और रेगुलर एक्सरसाइज शामिल है.  हालांकि, जरूरत पड़ने पर स्टैटिन जैसी दवाइयां और अन्य आधुनिक दवाएं भी दी जा सकती हैं. गाइडलाइन यह भी कहती है कि सप्लीमेंट्स पर भरोसा करना सही नहीं है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में उनका असर साबित नहीं हुआ है. इसेक साथ ही, सिर्फ LDL की जांच ही काफी नहीं, बल्कि Lp(a) नाम के एक खास प्रोटीन की जांच भी जरूरी बताई गई है, जो दिल की बीमारी का खतरा बढ़ा सकता है.

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क्या प्रेग्नेंसी रोकने वाली दवाइयों से हो जाता है कैंसर, जानें कितनी सच है यह बात?

क्या प्रेग्नेंसी रोकने वाली दवाइयों से हो जाता है कैंसर, जानें कितनी सच है यह बात?


Do Birth Control Pills Increase Cancer Risk: क्या प्रेग्नेंसी रोकने वाली गोलियां लेने से कैंसर हो जाता है? यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है. सच यह है कि गर्भनिरोधक गोलियां यानी कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स लंबे समय से इस्तेमाल हो रही हैं और इनका असर शरीर के हार्मोन पर पड़ता है, जिससे प्रेग्नेंसी को रोका जाता है. लेकिन क्या ये वाकई कैंसर का खतरा बढ़ाती हैं. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं. 

क्या होती हैं गर्भनिरोध गोलियां?

कैंसर के बारे में जानकारी देने वाली संस्था Cancerresearchuk की रिपोर्ट के अनुसार, गर्भनिरोधक गोलियां मुख्य रूप से दो तरह की होती हैं, एक कंबाइंड पिल, जिसमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टोजन दोनों हार्मोन होते हैं और दूसरी मिनी पिल, जिसमें सिर्फ प्रोजेस्टोजन होता है. ये गोलियां शरीर के हार्मोनल बैलेंस को बदलकर काम करती हैं. अब बात करते हैं कैंसर के खतरे की. रिसर्च बताती है कि कंबाइंड पिल लेने से ब्रेस्ट कैंसर का खतरा थोड़ा बढ़ सकता है, लेकिन यह जोखिम स्थायी नहीं होता. जैसे ही कोई व्यक्ति पिल लेना बंद करता है, करीब 10 साल बाद यह खतरा सामान्य हो जाता है,.जैसे कभी पिल ली ही न हो.

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क्या इससे कैंसर होता है?

Cancerresearchuk की रिपोर्ट में बताया गया है कि इसी कंबाइंड पिल का सर्वाइकल कैंसर से भी थोड़ा संबंध देखा गया है, खासकर अगर लंबे समय तक इसका इस्तेमाल किया जा.  हालांकि इस पर अभी और शोध की जरूरत है, इसलिए इसे पूरी तरह साबित नहीं माना जाता. दिलचस्प बात यह है कि यही पिल कुछ कैंसर से बचाव भी करती है. जैसे ओवेरियन और एंडोमेट्रियल कैंसर का खतरा कम हो सकता है, और यह फायदा पिल बंद करने के बाद भी बना रहता है.

मिनी पिल को लेकर क्या है स्थिति?

मिनी पिल के मामले में जानकारी थोड़ी सीमित है, क्योंकि इस पर कम रिसर्च हुई है. फिर भी अब तक के डेटा के अनुसार, इससे भी ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है, लेकिन पिल बंद करने पर यह धीरे-धीरे कम होने लगता है. सर्वाइकल और अन्य कैंसर पर इसके असर को लेकर अभी स्पष्ट निष्कर्ष नहीं है. 

क्या आपको पिल लेनी चाहिए?

अब सवाल यह आता है कि तो क्या आपको ये गोलियां लेनी चाहिए? इसका जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है. डॉक्टर आपकी हेल्थ, जरूरत और रिस्क को देखते हुए सही सलाह दे सकते हैं. यह भी समझना जरूरी है कि कैंसर का खतरा सिर्फ पिल से नहीं, बल्कि कई अन्य चीजों से ज्यादा प्रभावित होता है जैसे धूम्रपान, मोटापा और शराब का सेवन.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दिल की नस ब्लॉक होने से पहले दिखते हैं ये लक्षण, पहचान लेंगे तो बच जाएगी जान

दिल की नस ब्लॉक होने से पहले दिखते हैं ये लक्षण, पहचान लेंगे तो बच जाएगी जान


Early Symptoms Of Blocked Heart Arteries: आपका दिल कई बार बिना शोर किए संकेत देता है और अगर इन्हें समय रहते पहचान लिया जाए, तो जान बचाई जा सकती है. दुनियाभर में दिल की सबसे आम बीमारी कोरोनरी आर्टरी डिजीज है, जिसमें दिल तक ऑक्सीजन और पोषण पहुंचाने वाली नसें ठीक से काम नहीं कर पातीं.  हार्ट की नसें अचानक ब्लॉक नहीं होतीं. यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है, जिसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है, इसमें नसों के अंदर फैट जमा होने लगता है.

शुरुआत में कोई खास लक्षण नहीं दिखते, लेकिन समय के साथ नसें संकरी और सख्त हो जाती हैं. अक्सर पहला संकेत सीने में दबाव या दर्द के रूप में सामने आता है. रोजमर्रा के काम करते समय सांस फूलना या पैरों में सूजन भी दिल से जुड़ी परेशानी का संकेत हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह किस वजह से होता है और इसके बचाव के लिए आप क्या कर सकते हैं. 

क्यों होती है ब्लॉकेज?

Medanta की एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्लॉकेज का कारण प्लाक होता है. यह कोलेस्ट्रॉल, फैट, कैल्शियम और अन्य तत्वों का मिक्स होता है, जो नसों की दीवारों पर जमा हो जाता है. इससे ब्लड का फ्लो प्रभावित होता है और शरीर के अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती. इसके पीछे कई वजहें होती हैं, जिसमें खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) का बढ़ना, अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) का कम होना, हाई ब्लड प्रेशर, धूम्रपान और डायबिटीज जैसी समस्याएं. ये सभी नसों को नुकसान पहुंचाकर प्लाक बनने की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं.

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जब प्लाक बढ़ता है, तो ब्लड का फ्लो कम हो जाता है और दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. कई बार प्लाक फटने पर खून का थक्का बन जाता है, जो हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण बन सकता है. 

कैसे होते हैं इसके लक्षण?

शुरुआती लक्षणों में सीने में जकड़न या दर्द, हल्के काम में सांस फूलना, बिना वजह थकान, कंधे-हाथ या जबड़े तक फैलता दर्द, चक्कर आना और दिल की धड़कन का अनियमित होना शामिल हैं. ब्लॉकेज शरीर के अलग-अलग हिस्सों में अलग असर दिखा सकता है. हार्ट में दर्द और पसीना, दिमाग में सुन्नपन या बोलने में दिक्कत, पैरों में चलने पर दर्द और गर्दन में कमजोरी जैसे संकेत नजर आ सकते हैं.

कैसे कर सकते हैं इसको ठीक?

अगर दिक्कत की बात करें तो हाई बीपी, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, खराब लाइफस्टाइल, उम्र और पारिवारिक हिस्ट्री इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं. हालांकि, सही खानपान, रेगलुर व्यायाम और समय पर जांच से इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है. डॉक्टर जांच के लिए ब्लड टेस्ट, ईसीजी, स्ट्रेस टेस्ट, इकोकार्डियोग्राम, एंजियोग्राफी और सीटी स्कैन जैसी जांचें करते हैं, जिससे नसों की स्थिति का सही पता चल सके.

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क्या आपके कान आपको दे रहे हैं चेतावनी? इन संकेतों को पहचानें, वरना हो सकती है गंभीर समस्या

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When To See A Doctor For Ear Pain: अक्सर देखा जाता है कि लोग कान से जुड़े शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. कई मरीज तब डॉक्टर के पास पहुंचते हैं जब समस्या काफी बढ़ चुकी होती है और इलाज भी जटिल हो जाता है. दरअसल, कान सिर्फ सुनने का काम नहीं करते, बल्कि शरीर के संतुलन, ब्रेन की काम करने की क्षमता और ओवरऑल हेल्थ से भी जुड़े होते हैं. इसलिए समय रहते लक्षणों को पहचानना और सही इलाज करवाना बहुत जरूरी है.

क्यों नहीं करना चाहिए इग्नोर?

डॉ. दीप्ति सिन्हा ने TOI में अपने लेख में बताया कि कान में लगातार दर्द या असहजता को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर कान में भारीपन, बंद होने जैसा एहसास या हल्का लेकिन लगातार दर्द महसूस हो रहा है, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. जैसे कान में मैल जमना, फंगल या बैक्टीरियल संक्रमण, मिडिल ईयर इंफेक्शन या यूस्टेशियन ट्यूब से जुड़ी समस्या. खासतौर पर जिन लोगों को डायबिटीज है, उनके लिए कान का इंफेक्शन ज्यादा खतरनाक हो सकता है. ऐसे मामलों में मैलिग्नेंट ओटिटिस एक्सटर्ना नाम की गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, जो आगे चलकर हड्डियों तक फैल सकती है.

सुनने की क्षमता भी हो सकती है प्रभावित

सुनने की क्षमता में कमी भी एक अहम चेतावनी संकेत हो सकता है. अगर आपको बार-बार लोगों से बात दोहराने के लिए कहना पड़ता है, टीवी की आवाज ज्यादा करनी पड़ती है या शोर वाली जगह पर बातचीत समझने में दिक्कत होती है, तो तुरंत हियरिंग टेस्ट कराना चाहिए. खासकर बुजुर्गों को हर साल सुनने की जांच करानी चाहिए, क्योंकि हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और किडनी की बीमारी सुनने की क्षमता को तेजी से प्रभावित कर सकती है. कई बार यह समस्या मिडिल ईयर में पानी भरने, कान के पर्दे में छेद या अन्य समस्याओं के कारण भी होती है, जिनका इलाज सर्जरी से संभव है.

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किस तरह की हो सकती है दिक्कत?

कानों में घंटी बजने, भनभनाहट या अजीब आवाज सुनाई देना, जिसे टिनिटस कहा जाता है, भी एक सामान्य लेकिन गंभीर संकेत हो सकता है. यह समस्या इनर ईयर की गड़बड़ी, नसों को नुकसान, ज्यादा शोर के संपर्क या ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी समस्या के कारण हो सकती है. यदि यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है. इसके अलावा चक्कर आना, सिर घूमना या संतुलन बिगड़ना भी अक्सर इनर ईयर की समस्या से जुड़ा होता है. कुछ स्थितियों जैसे वेस्टिब्युलर न्यूराइटिस, पोजिशनल वर्टिगो या लैबिरिन्थाइटिस में मरीज को अचानक तेज चक्कर और मतली की शिकायत हो सकती है.

कान से पानी या पस आना, खुजली, बदबू या गंदगी दिखना भी इंफेक्शन या कान के पर्दे में छेद का संकेत हो सकता है. बच्चों में कई बार छोटे-छोटे खिलौने या अन्य वस्तुएं भी कान में फंस जाती हैं, जिन्हें घर पर निकालने की कोशिश करना खतरनाक हो सकता है.

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