क्या है एंडोमेट्रियोसिस, जानें महिलाओं की फर्टिलिटी को कैसे प्रभावित करती है यह बीमारी?

क्या है एंडोमेट्रियोसिस, जानें महिलाओं की फर्टिलिटी को कैसे प्रभावित करती है यह बीमारी?


Can Women With Endometriosis Get Pregnant: एंडोमेट्रियोसिस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत जैसी टिश्यू शरीर के अन्य हिस्सों में भी बढ़ने लगती है. यह बीमारी अक्सर चुपचाप महिलाओं की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है और कई बार माता-पिता बनने का सपना देखने वाले दंपतियों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है. एंडोमेट्रियोसिस के कारण गर्भधारण में दिक्कतें आ सकती हैं, फर्टिलिटी ट्रीटमेंट मुश्किल हो सकता है और कुछ मामलों में यह स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है. यही वजह है कि कई महिलाओं के लिए इन विट्रो फर्टिलाइजेशन ही गर्भधारण का सबसे रियल विकल्प बन जाता है.

क्या है मामला?

TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा ही एक मामला 28 साल की एक महिला का सामने आया, जिसे गंभीर एंडोमेट्रियोसिस की समस्या थी और पहले कोई सर्जरी नहीं हुई थी. डॉक्टरों ने बीमारी की गंभीरता को देखते हुए आईवीएफ कराने की सलाह दी, कई दंपतियों की तरह इस महिला और उसके पति ने भी उम्मीद की थी कि लंबे संघर्ष के बाद अब उन्हें खुशखबरी मिलेगी. महिला ने ओवम निकालने की प्रक्रिया ओसाइट पिक-अप कराई और शुरुआत में सब कुछ सामान्य लग रहा था.

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लेकिन प्रक्रिया के चार दिन बाद महिला को तेज बुखार आने लगा, जो एंटीबायोटिक दवाओं के बावजूद ठीक नहीं हो रहा था, जल्द ही उसे पेट में तेज दर्द, ठंड लगना और कमजोरी जैसे लक्षण महसूस होने लगे. जांच के बाद पता चला कि उसके ओवम में करीब 10 से 12 सेंटीमीटर का बड़ा एब्सेस यानी पस से भरी गांठ बन गई है. इतना ही नहीं, इंफेक्शन पेट के अंदर फैलकर लिवर तक पहुंच गया था. अब मामला फर्टिलिटी ट्रीटमेंट से आगे बढ़कर जान बचाने तक पहुंच चुका था और तुरंत सर्जरी करना जरूरी हो गया.

कैसे किया गया इलाज?

बेंगलुरु के मदरहुड हॉस्पिटल में डॉ. माधुरी विद्याशंकर की अगुवाई में सर्जरी की गई. ऑपरेशन के दौरान पाया गया कि पस कई अंगों तक फैल चुकी थी और इंफेक्शन के कारण आंतें ओवम से चिपक गई थीं. सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मरीज की जान बचाने के साथ-साथ उसकी प्रजनन क्षमता को भी सुरक्षित रखा जाए. डॉक्टरों ने सावधानीपूर्वक एब्सेस को निकालकर इंफेक्शन साफ किया और दोनों ओवम को सुरक्षित रखने में सफलता पाई.

हो सकता है बचाव?

कई महीनों बाद महिला फिर से स्वस्थ होकर आईवीएफ की प्रक्रिया के लिए तैयार हुई. इस बार इलाज सफल रहा, वह गर्भवती हुई और बाद में उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया.  एंडोमेट्रियोसिस जैसी बीमारी में फर्टिलिटी का सफर आसान नहीं होता, लेकिन सही समय पर इलाज और एक्सपर्ट की देखरेख में उम्मीद फिर से जिंदा हो सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दुबले दिखने पर भी हो सकता है हार्ट अटैक का खतरा, वजह जान उड़ जाएंगे आपके होश!

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Is Belly Fat Dangerous For Heart Health: हर साल वर्ल्ड ओबेसिटी डे पर एक सवाल फिर से उठता है क्या सिर्फ वजन ही असली समस्या है? लंबे समय तक लोगों की सेहत को मापने के लिए बॉडी वेट और बीएमआई को सबसे अहम माना गया. लेकिन अब कई रिसर्च यह बताती हैं कि शरीर में फैट की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह जमा कहां हो रहा है. वजन मापने वाली मशीन यह नहीं बता सकती कि शरीर में मसल्स ज्यादा हैं या फैट और यह भी नहीं दिखा सकती कि फैट अंदरूनी अंगों के आसपास जमा है या नहीं.

क्या होता है बेली फैट?

पेट के आसपास जमा होने वाला फैट, जिसे आमतौर पर बेली फैट कहा जाता है, हार्ट की बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकता है. यह उन लोगों में भी होता है जिनका वजन सामान्य दिखाई देता है. दरअसल शरीर में हर तरह का फैट एक जैसा व्यवहार नहीं करता. कूल्हों और जांघों के आसपास जमा फैट तुलना कम नुकसानदायक माना जाता है, लेकिन पेट के अंदरूनी हिस्से में, लिवर, पैंक्रियास और आंतों के आसपास जमा होने वाला फैट शरीर के लिए ज्यादा खतरनाक हो सकता है.

क्या होती है दिक्कत?

यह अंदरूनी फैट शरीर में सूजन बढ़ाने वाले केमिकल्स छोड़ता है, इंसुलिन के काम करने के तरीके को प्रभावित करता है, ब्लड प्रेशर बढ़ाता है और कोलेस्ट्रॉल का संतुलन बिगाड़ सकता है.  डॉ. वरुण बंसल ने TOI को बताया कि जब दिल की सेहत की बात आती है तो सिर्फ वजन नहीं, बल्कि शरीर में फैट का वितरण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. खासकर पेट के आसपास बढ़ती चर्बी दिल के दौरे और कोरोनरी आर्टरी डिजीज के जोखिम को बढ़ा सकती है.

भारत में क्या है समस्या?

भारत में यह समस्या और ज्यादा गंभीर मानी जाती है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की INDIAB स्टडी के मुताबिक, कई भारतीयों में वजन सामान्य होने के बावजूद कमर का घेरा बढ़ा हुआ पाया गया, साथ ही ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर भी ज्यादा था. इस स्थिति को नॉर्मल वेट ओबेसिटी या मेटाबॉलिक ओबेसिटी कहा जाता है. यानी व्यक्ति देखने में दुबला लग सकता है, लेकिन पेट के अंदर जमा फैट दिल के लिए खतरा बन सकता है.

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एक्सपर्ट के अनुसार भारतीयों के लिए कमर का घेरा एक अहम संकेतक माना जाता है. पुरुषों में कमर 90 सेंटीमीटर से कम और महिलाओं में 80 सेंटीमीटर से कम रहनी चाहिए. इसे मापना भी बहुत आसान है कि नाभि के आसपास टेप लगाकर सीधा खड़े होकर सामान्य सांस छोड़ते हुए माप लिया जा सकता है.

कैसे कर सकते हैं इसको कम?

पेट की चर्बी कम करने के लिए क्रैश डाइट हमेशा सही समाधान नहीं होती, क्योंकि इससे मसल्स भी कम हो सकते हैं. इसके बजाय नियमित एक्सरसाइज, खासकर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, पर्याप्त प्रोटीन वाला भोजन, कम प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट, पर्याप्त नींद और तनाव को कंट्रोल करना ज्यादा प्रभावी तरीका माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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युवाओं में तेजी से बढ़ रहा आर्टरीज के सख्त होने का खतरा, ये लक्षण न करें नजरअंदाज

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Why Arteries Age Faster In Your 30s: पहले हार्ट से जुड़ी बीमारियों को आमतौर पर बढ़ती उम्र की समस्या माना जाता था. माना जाता था कि 50 या 60 की उम्र के बाद ही आर्टरीज में ब्लॉकेज या हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है. लेकिन अब यह तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है. डॉक्टरों के अनुसार आजकल कई लोगों में 30 की उम्र के आसपास ही धमनियों में उम्र बढ़ने के संकेत दिखाई देने लगे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है. 

क्यों होती है ऐसी दिक्कत

 आर्टरीज शरीर में खून को दिल से बाकी अंगों तक पहुंचाने का काम करती हैं. सामान्य तौर पर ये लचीली और मुलायम होती हैं, जिससे खून आसानी से बहता रहता है. लेकिन जब ये धीरे-धीरे सख्त होने लगती हैं तो ब्लड का फ्लो प्रभावित होने लगता है. इससे हार्ट को खून पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जो आगे चलकर हार्ट रोग, स्ट्रोक और अन्य कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है,

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जरी एक्सपर्ट डॉ. मुकेश गोयल के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कम उम्र में ही आर्टरीज के सख्त होने के मामले बढ़ते देखे जा रहे हैं. उनका कहना है कि पहले इस तरह की समस्याएं आमतौर पर 50 या 60 की उम्र में देखी जाती थीं, लेकिन अब बदलती लाइफस्टाइल के कारण 30 की उम्र में भी इसके संकेत सामने आने लगे हैं.

बदलती लाइफस्टाइल बड़ी वजह

एक्सपर्ट मानते हैं कि इसके पीछे आधुनिक लाइफस्टाइल बड़ी वजह है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, तनाव भरा कामकाजी माहौल, अनियमित नींद और प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन धीरे-धीरे ब्लड वेसल्स पर असर डाल सकता है. इसके अलावा धूम्रपान, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और खराब खान-पान भी आर्टरीज के जल्दी बूढ़ा होने के जोखिम को बढ़ाते हैं. कई बार यह समस्या शुरू में किसी बड़े लक्षण के रूप में सामने नहीं आती. फिर भी कुछ संकेत ऐसे हो सकते हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है. जैसे लगातार बढ़ता कोलेस्ट्रॉल, हल्का-सा भी बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, जल्दी थकान महसूस होना या थोड़ी मेहनत में सांस फूलना. अगर परिवार में दिल की बीमारी का हिस्ट्री रहा हो तो जोखिम और बढ़ सकता है.

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कैसे कर सकते हैं बचाव

इसी वजह से डॉक्टर अब कम उम्र में ही दिल की सेहत की जांच कराने की सलाह देते हैं. कोलेस्ट्रॉल जांच, ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग, ब्लड शुगर टेस्ट और जरूरत पड़ने पर अन्य जांचों के जरिए आर्टरीज में शुरुआती बदलावों का पता लगाया जा सकता है. अच्छी बात यह है कि शुरुआती चरण में लाइफ में बदलाव करके इस प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है. रोजाना कुछ समय टहलना या व्यायाम करना, फल-सब्जियों और साबुत अनाज से भरपूर आहार लेना, नमक और प्रोसेस्ड फूड कम करना, धूम्रपान से दूरी बनाना और पर्याप्त नींद लेना दिल और आर्टरीज की सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सांस फूलना सिर्फ थकान नहीं, हार्ट की सेहत का भी संकेत; सीढ़ियां चढ़ते समय इन बातों पर दें ध्यान

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Why Do I Feel Breathless After Climbing Stairs: सीढ़ियां चढ़ना रोजमर्रा की जिंदगी का एक सामान्य हिस्सा लगता है, लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक यह छोटी-सी गतिविधि दिल की सेहत के बारे में काफी कुछ बता सकती है. जब हम सीढ़ियां चढ़ते हैं तो शरीर को ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होती है. ऐसे में दिल तेजी से धड़कने लगता है और मसल्स तक खून पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत करता है. यह प्रक्रिया सामान्य है, लेकिन असली संकेत इस बात से मिलता है कि सीढ़ियां चढ़ने के बाद शरीर कितनी जल्दी सामान्य स्थिति में लौटता है.

इससे क्या पहचान सकते हैं आप?

कार्डियोलॉजिस्ट इसे हार्ट रेट रिकवरी यानी दिल की धड़कन के सामान्य होने की गति कहते हैं. अगर सीढ़ियां चढ़ने के बाद सांस और दिल की धड़कन जल्दी सामान्य हो जाए, तो यह अच्छे कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस का संकेत माना जाता है. लेकिन अगर सांस लंबे समय तक फूलती रहे या दिल की धड़कन सामान्य होने में ज्यादा समय लगे, तो यह दिल और ब्लड वेसल्स पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. आशीष अग्रवाल ने TOI को बताया कि  कई लोग यह समझ नहीं पाते कि सीढ़ियां चढ़ने जैसी साधारण गतिविधि भी हार्ट की सेहत के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकती है. उनका कहना है कि जब हम सीढ़ियां चढ़ते हैं तो शरीर को अधिक ऑक्सीजन की जरूरत होती है, इसलिए दिल की धड़कन बढ़ना स्वाभाविक है. लेकिन अगर शरीर को सामान्य होने में जरूरत से ज्यादा समय लगता है, तो यह दिल और व्लड बेसल्स के सही तरीके से काम न करने का संकेत हो सकता है.

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एक्सपर्ट बताते हैं कि दिल की रिकवरी स्पीड इस बात पर निर्भर करती है कि दिल खून को कितनी कुशलता से पंप कर रहा है, धमनियां ऑक्सीजन को कितनी आसानी से शरीर तक पहुंचा रही हैं और मांसपेशियां उस ऑक्सीजन का कितना सही उपयोग कर पा रही हैं. अगर इस प्रक्रिया का कोई भी हिस्सा प्रभावित होता है, तो शरीर को सामान्य स्थिति में लौटने में ज्यादा समय लग सकता है. 

क्यों हो रही है दिक्कत?

आधुनिक लाइफस्टाइल भी इस समस्या की बड़ी वजह बन रही है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, असंतुलित खान-पान, धूम्रपान, तनाव और कम फिजिकल एक्टिविटी धीरे-धीरे दिल और व्लड बेसल्स को कमजोर कर सकते हैं. इससे आर्टरीज सख्त होने लगती हैं और खून का फ्लो प्रभावित होता है. हालांकि हर बार सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलना गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता, थकान, डिहाइड्रेशन या कम फिटनेस के कारण भी ऐसा हो सकता है. लेकिन अगर सीढ़ियां चढ़ने के बाद लंबे समय तक सांस फूलना, सीने में दबाव, चक्कर आना या अत्यधिक थकान महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

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रसगुल्ला खाने से हुई मौत, जानें सांस की नली में फंस जाए खाना तो तुरंत क्या करें?

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What To Do When Food Blocks The Airway: झारखंड के जमशेदपुर में एक शादी समारोह के दौरान दर्दनाक हादसा सामने आया. 41 वर्षीय ललित सिंह की मौत उस समय हो गई जब रसगुल्ला खाते वक्त वह उनकी सांस की नली में फंस गया. यह घटना सोमवार सुबह मालियंता गांव में एक शादी के दौरान हुई. बताया जा रहा है कि रसगुल्ला खाने के कुछ ही सेकंड बाद ललित सिंह को अचानक सांस लेने में दिक्कत होने लगी. वहां मौजूद लोगों ने उनके गले से रसगुल्ला निकालने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. 

परिवार के लोग उन्हें तुरंत एमजीएम अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. डॉक्टरों के अनुसार रसगुल्ला पूरी तरह से उनकी सांस की नली में फंस गया था, जिससे शरीर तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गया और कुछ ही मिनटों में उनकी मौत हो गई. चलिए आपको बताते हैं कि सांस की नली में खाना फंसने के बाद क्या करना चाहिए. 

क्यों फंस जाता है खाना

दरअसल खाना निगलने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है. जब हम भोजन करते हैं तो मुंह, गले और नसों की मदद से खाना पेट तक पहुंचता है. सामान्य स्थिति में जब हम खाना निगलते हैं, तो हमारी सांस की नली कुछ समय के लिए बंद हो जाती है ताकि भोजन गलत दिशा में न जाए. लेकिन कभी-कभी अगर खाना ठीक से चबाया न जाए या जल्दी-जल्दी खाया जाए, तो वह गले या सांस की नली में फंस सकता है.

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 हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की सांस की नली में खाना फंस जाए तो यह स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है. ऐसे समय में कुछ लक्षण तुरंत दिखाई देते हैं, जैसे व्यक्ति का बोलना बंद हो जाना, सांस लेने में परेशानी, तेज या अजीब आवाज के साथ सांस लेना, खांसी आना, चेहरा लाल या नीला पड़ना और गंभीर स्थिति में बेहोशी आ जाना. 

क्या करना चाहिए

ऐसी स्थिति में तुरंत मदद करना बहुत जरूरी होता है. सबसे पहले व्यक्ति को जोर से खांसने के लिए कहें, क्योंकि कई बार खांसी से ही फंसा हुआ खाना बाहर निकल सकता है. अगर इससे राहत न मिले तो व्यक्ति को थोड़ा आगे झुकाकर उसकी पीठ पर जोर से लगभग पांच बार थपथपाना चाहिए. इससे कई बार गले में फंसा खाना ढीला होकर बाहर निकल सकता है. अगर इसके बाद भी स्थिति नहीं सुधरती, तो हाइमलिक मैन्युवर नाम की तकनीक अपनाई जाती है. इसमें व्यक्ति के पीछे खड़े होकर उसके पेट के ऊपरी हिस्से पर झटके से दबाव डाला जाता है, जिससे फंसा हुआ खाना बाहर निकल सकता है.

इंसानों के लिए जानलेवा स्थिति

डॉक्टरों के अनुसार चोकिंग यानी सांस की नली में खाना फंसना जानलेवा आपात स्थिति होती है. इसलिए अगर किसी को सांस लेने में गंभीर परेशानी हो या वह बोल भी न पा रहा हो, तो तुरंत मेडिकल सहायता लेना और इमरजेंसी सेवाओं को बुलाना जरूरी है.

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शरीर में विटामिन ‘डी’ की कमी कितनी खतरनाक, इससे किन बीमारियों का खतरा?

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What Happens When Your Body Lacks Vitamin D: विटामिन D को अक्सर सनशाइन विटामिन कहा जाता है, क्योंकि इसका सबसे बड़ा सोर्स सूरज की रोशनी है. हाल के वर्षों में यह सवाल काफी चर्चा में रहा है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन D की कितनी मात्रा जरूरी है और कैसे पता लगाया जाए कि शरीर में इसकी कमी तो नहीं है. हालांकि एक बात पर एक्सपर्ट की सहमति है वह है कि विटामिन D हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है. अगर शरीर को पर्याप्त धूप नहीं मिलती या भोजन के जरिए इसकी सही मात्रा नहीं मिलती, तो इसकी कमी कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है. 

किन लोगों को होती है दिक्कत

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था yalemedicine के अनुसार,  विटामिन D की कमी किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है. छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक यह समस्या देखी जाती है. खासकर जो बच्चे केवल ब्रेस्टफीडिंग पर निर्भर होते हैं, उन्हें मां के दूध से पर्याप्त विटामिन D नहीं मिल पाता, इसलिए कई बार डॉक्टर उन्हें सप्लीमेंट लेने की सलाह देते हैं. वहीं बढ़ती उम्र के साथ त्वचा की क्षमता कम हो जाती है, जिससे शरीर में विटामिन D बनने की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है.

दरअसल, विटामिन D शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस को अब्जॉर्ब करने में अहम भूमिका निभाता है. ये दोनों तत्व हड्डियों को मजबूत रखने के लिए बेहद जरूरी होते हैं. जब शरीर में विटामिन D की कमी हो जाती है, तो कैल्शियम का सही तरीके से अब्जॉर्ब नहीं हो पाता. इससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और कई तरह की समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.

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इसकी कमी के क्या होते हैं लक्षण

विटामिन D की कमी होने पर शरीर में कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं. जैसे हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी, शरीर में थकान और मांसपेशियों में ऐंठन. कुछ लोगों को हाथ-पैरों में झुनझुनी जैसा महसूस हो सकता है. गंभीर मामलों में हड्डियां जल्दी टूटने का खतरा भी बढ़ जाता है. बुजुर्गों में इसकी गंभीर कमी गिरने और फ्रैक्चर का जोखिम बढ़ा सकती है.

कमी के क्या होते हैं कारण

इस कमी के पीछे कई कारण हो सकते हैं. धूप में कम समय बिताना, पोषण की कमी, गहरे रंग की त्वचा, कुछ दवाइयों का सेवन या किडनी और लिवर से जुड़ी बीमारियां भी शरीर में विटामिन D के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं. कुछ मामलों में यह समस्या जेनेटिक कारणों से भी हो सकती है. एक्सपर्ट के अनुसार अगर शरीर में विटामिन D का स्तर बहुत कम हो जाए, तो हड्डियों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए संतुलित आहार, नियमित धूप और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेना शरीर में विटामिन D के स्तर को बनाए रखने में मदद कर सकता है.

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