सबकुछ परफेक्ट होने के बाद भी क्यों फेल हो जाता है IVF, जानें कहां आती है दिक्कत?

सबकुछ परफेक्ट होने के बाद भी क्यों फेल हो जाता है IVF, जानें कहां आती है दिक्कत?


आज के समय में IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) उन कपल्स के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी किरण बन चुका है, जो लंबे समय से माता-पिता बनने का सपना देख रहे हैं. जब सालों की कोशिशों, इलाज, दवाइयों और भावनात्मक उतार-चढ़ाव के बाद IVF का सहारा लिया जाता है, तो उम्मीदें बहुत बढ़ जाती हैं. डॉक्टर कहते हैं कि एग अच्छे हैं, स्पर्म ठीक हैं, एम्ब्रायो सुंदर है, बच्चेदानी भी तैयार है फिर भी जब रिपोर्ट नेगेटिव आती है, तो मन में सिर्फ एक ही सवाल गूंजता है जब सबकुछ परफेक्ट था, तो IVF फेल क्यों हो गया.

IVF कोई मशीन की तरह काम करने वाली प्रक्रिया नहीं है. यह शरीर, हार्मोन, जेनेटिक्स और मानसिक स्थिति सबका मिला-जुला है. कई बार बाहर से सबकुछ ठीक दिखता है, लेकिन अंदर कहीं न कहीं कोई छोटी-सी दिक्कत छिपी होती है, जो प्रेगनेंसी को आगे बढ़ने नहीं देती. ऐसे में आइए जानते हैं कि सबकुछ परफेक्ट होने के बाद भी IVF क्यों फेल हो जाता है.

IVF फेल होने के लक्षण कैसे पहचानें?

IVF में एम्ब्रायो ट्रांसफर के बाद के लगभग 14 दिन बहुत अहम होते हैं. इसे टू-वीक वेट कहा जाता है. इस दौरान महिलाएं प्रोजेस्टेरोन जैसी दवाइयां लेती हैं, जिनकी वजह से प्रेगनेंसी जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं, चाहे प्रेगनेंसी हो या न हो. लेकिन कुछ संकेत ऐसे होते हैं, जो IVF फेल होने की तरफ इशारा कर सकते हैं. जैसे अगर एम्ब्रायो ट्रांसफर के कुछ दिनों बाद आपको सामान्य पीरियड्स जैसा ब्लीडिंग शुरू हो जाए, तो इसका मतलब हो सकता है कि एम्ब्रायो बच्चेदानी की दीवार से चिपक नहीं पाया.

घर पर टेस्ट कुछ भी दिखाए, लेकिन IVF में सबसे भरोसेमंद टेस्ट बीटा-HCG ब्लड टेस्ट होता है. अगर इसमें हार्मोन का लेवल नहीं बढ़ा, तो IVF साइकिल को फेल माना जाता है. अगर आपको पहले स्तनों में भारीपन, हल्का पेट दर्द या थकान महसूस हो रही थी और अचानक ये सब खत्म हो जाए, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि प्रेगनेंसी हार्मोन बनना बंद हो गया. ऐसे में ध्यान रखें कि बिना डॉक्टर से पूछे दवाइयां बंद न करें, क्योंकि कुछ मामलों में ब्लीडिंग के बावजूद प्रेगनेंसी चल रही होती है. 

सबकुछ परफेक्ट होने के बाद भी IVF क्यों फेल हो जाता है

1. एम्ब्रायो की  – कई बार एम्ब्रायो देखने में बहुत सुंदर लगता है, लेकिन उसके अंदर जेनेटिक समस्या हो सकती है. ऐसे एम्ब्रायो या तो चिपकते नहीं हैं या जल्दी खराब हो जाते हैं. यह IVF फेल होने की सबसे आम वजह मानी जाती है.

2.  बच्चेदानी की परत – एंडोमेट्रियम यानी बच्चेदानी की अंदरूनी परत अगर बहुत पतली (7mm से कम), कमजोर या सही समय पर तैयार नहीं होती, तो एम्ब्रायो को पोषण नहीं मिल पाता और इम्प्लांटेशन फेल हो जाता है. 

3. प्रेगनेंसी की अंदरूनी समस्याएं – फाइब्रॉएड, पॉलीप्स, सिस्ट या पुरानी सर्जरी की वजह से बनी चिपकन (Adhesions) भी एम्ब्रायो के चिपकने में रुकावट बन सकती हैं. 

4. ब्लड फ्लो की कमी – अगर बच्चेदानी तक खून का बहाव सही नहीं है, तो एम्ब्रायो को जरूरी ऑक्सीजन और पोषण नहीं मिल पाता. 

5. इंफेक्शन या टीबी – गर्भाशय या ट्यूब्स में पुराना इंफेक्शन (जैसे टीबी) होने पर ट्यूब्स में गंदा तरल जमा हो जाता है, जो एम्ब्रायो के लिए जहरीला साबित हो सकता है. 

 6. उम्र का बढ़ना – 35 साल के बाद अंडों की संख्या और क्वालिटी दोनों कम होने लगती हैं. इससे जेनेटिक खराबियों का खतरा बढ़ जाता है. 

7. लाइफस्टाइल और तनाव – मोटापा, धूम्रपान, खराब खान-पान और ज्यादा तनाव IVF की सफलता को काफी हद तक कम कर देते हैं. 

8. इम्यून सिस्टम की समस्या – कुछ महिलाओं में शरीर का इम्यून सिस्टम एम्ब्रायो को बाहरी चीज समझकर उस पर हमला कर देती है, जिससे इम्प्लांटेशन फेल हो जाता है. 

9. दवाइयों में लापरवाही – दवाइयां समय पर न लेना या डॉक्टर की सलाह को ठीक से फॉलो न करना भी IVF फेल होने की एक बड़ी वजह हो सकती है. 

यह भी पढ़ें: Heart Attack After Stent: स्टेंट डलवाने के बाद भी क्यों ब्लॉक हो जाती हैं दिल की नसें? डॉक्टर से समझें

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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डाइट में ये चीजें कर ली शामिल तो कभी नहीं होगी फर्टिलिटी की समस्या, बढ़ जाएगा स्पर्म काउंट

डाइट में ये चीजें कर ली शामिल तो कभी नहीं होगी फर्टिलिटी की समस्या, बढ़ जाएगा स्पर्म काउंट


आज की बिजी लाइफस्टाइल और भागदौड़ भरी जिंदगी में इनफर्टिलिटी की समस्या तेजी से बढ़ रही है. यह समस्या अब सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रही है, बल्कि बड़ी संख्या में पुरुष भी कम स्पर्म काउंट और खराब स्पर्म क्वालिटी की समस्या से जूझ रहे हैं. बदलती लाइफस्टाइल, तनाव, गलत खानपान और नींद की कमी इसके बड़े कारण माने जा रहे हैं. ऐसे में कई लोग स्पर्म काउंट के कई तरीके अपनाते हैं लेकिन वह काम नहीं आते हैं.

एक्सपर्ट्स भी बताते हैं कि कई मामलों में दवाइयों से पहले अगर खानपान और दिनचर्या को ठीक कर लिया जाए, तो फर्टिलिटी में काफी सुधार देखा जा सकता है. सही डाइट न सिर्फ हार्मोन बैलेंस करती है, बल्कि स्पर्म की संख्या और क्वालिटी दोनों को बेहतर बनाने में मदद करती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि कौन सी चीजें डाइट में शामिल करने से कभी फर्टिलिटी की समस्या नहीं होगी और स्पर्म काउंट बढ़ेगा. 

क्यों घटता है स्पर्म काउंट?

स्पर्म काउंट कम होने के पीछे कई वजहें हो सकती है. लगातार स्ट्रेस और मेंटल प्रेशर हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ देता है. ज्यादा गर्मी, टाइट कपड़े, स्मोकिंग, शराब और पोषक तत्वों की कमी भी स्पर्म पर सीधा असर डालती है. इसके अलावा मोटापा, हॉर्मोन से जुड़ी समस्याएं और कुछ दवाइयां भी स्पर्म प्रोडक्शन को प्रभावित कर सकती है. वहीं डॉक्टरों के अनुसार अगर रोजाना की डाइट में कुछ खास चीजें शामिल कर ली जाएं, तो स्पर्म काउंट बढ़ाने में मदद मिल सकती है. इसके अलावा सही पोषण शरीर में टेस्टोस्टेरोन लेवल को संतुलित करता है, जिससे फर्टिलिटी बेहतर होती है.

स्पर्म काउंट बढ़ाने वाले फूड्स

हरी पत्तेदार सब्जियां और बीज

पालक, मेथी और दूसरी हरी सब्जियों में भरपूर फॉलिक एसिड होता है. वहीं अलसी, सूरजमुखी और कद्दू के बीज जिंक से भरपूर होते हैं, जिन्हे डाइट में शामिल करने से स्पर्म की क्वालिटी सुधारने में मदद मिलती है. 

मेवे और ड्राई फ्रूट्स

बादाम, अखरोट, किशमिश और अंजीर जैसे ड्राई फ्रूट्स में हेल्दी फैट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं. यह हार्मोन बैलेंस बनाए रखने के साथ-साथ स्पर्म काउंट बढ़ाने में भी मददगार माने जाते हैं. 

प्रोटीन से भरपूर चीजें

अंडा, दूध, दालें और पनीर जैसी प्रोटीन से भरपूर चीजें स्पर्म की क्वालिटी के लिए जरूरी मानी जाती है. इससे स्पर्म काउंट और एक्टिविटी दोनों में सुधार हो सकता है.

फल और सब्जियां

अनार, केला, गाजर और सिट्रस फल जैसे संतरा और नींबू विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं. ये स्पर्म को नुकसान से बचाते हैं और उनकी मोबिलिटी बढ़ाने में मदद करते हैं.

इन चीजों से बनाएं दूरी

एक्सपर्ट्स के अनुसार बहुत ज्यादा कैफीन, शराब, जंक फूड, प्रोसेस्ड शुगर और स्मोकिंग फर्टिलिटी पर नेगेटिव असर डालते हैं. ये आदतें शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ाती है और हार्मोनल असंतुलन पैदा करती है, जिससे स्पर्म काउंट और क्वालिटी दोनों प्रभावित होती है.

ये भी पढ़ें-Bluetooth Earphones Cancer Risk: क्या कान में लगाने वाले ब्लूटूथ से भी हो जाता है कैंसर, जानें कितना रहता है रिस्क?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हाइजीन के लिए प्यूबिक हेयर हटाना जरूरी या नहीं? डॉक्टर्स से समझें काम की बात

हाइजीन के लिए प्यूबिक हेयर हटाना जरूरी या नहीं? डॉक्टर्स से समझें काम की बात


आज के समय में लोग अपनी पर्सनल हाइजीन को लेकर पहले से कहीं ज्यादा अलर्ट हो गए हैं. नहाना, साफ कपड़े पहनना, स्किन केयर करना, ये सब अब हमारी रोजमर्रा की आदत बन चुके हैं. लेकिन जब बात प्राइवेट पार्ट्स की साफ-सफाई की आती है, तो यहां जानकारी से ज्यादा भ्रम देखने को मिलता है.

सोशल मीडिया, विज्ञापनों और ब्यूटी प्रोडक्ट्स के कारण लोगों के मन में यह धारणा बन गई है कि प्यूबिक हेयर यानी गुप्तांग के बाल गंदे होते हैं और इन्हें हटाना ही क्लीन और हाइजीनिक माना जाता है. कई कंपनियां तो सीधे-सीधे यह दावा करती हैं कि अगर आपने प्यूबिक हेयर नहीं हटाए, तो इंफेक्शन हो सकता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई प्यूबिक हेयर गंदे होते हैं, क्या इन्हें हटाने से इंफेक्शन कम होता है या बढ़ता है. तो आइए जानते हैं कि हाइजीन के लिए प्यूबिक हेयर हटाना जरूरी या नहीं. 

प्यूबिक हेयर क्यों होते हैं? 

डॉक्टरों के अनुसार, प्यूबिक हेयर भी शरीर की एक नेचुरल सुरक्षा प्रणाली का हिस्सा हैं. ये बैक्टीरिया, धूल और गंदगी को अंदर जाने से रोकते हैं. वेजाइना और प्राइवेट पार्ट्स को इंफेक्शन से बचाते हैं. स्किन को आपसी घर्षण (friction) से बचाते हैं. टाइट कपड़े पहनने या फिजिकल इंटिमेसी के दौरान स्किन को सुरक्षा देते हैं. प्राइवेट एरिया का तापमान संतुलित बनाए रखते हैं यानी प्यूबिक हेयर हमारी बॉडी की पहली सुरक्षा ढाल (First Line of Defense) होते हैं. 

हाइजीन के लिए प्यूबिक हेयर हटाना जरूरी या नहीं

डॉक्टरों की साफ राय है कि प्यूबिक हेयर को पूरी तरह हटाना जरूरी नहीं है. हाइजीन का मतलब सिर्फ बाल हटाना नहीं होता, बल्कि उस एरिया को साफ और सूखा रखना ज्यादा जरूरी होता है. अगर प्यूबिक हेयर बहुत ज्यादा लंबे हो गए हों, पसीना ज्यादा जमा हो रहा हो, खुजली या बदबू महसूस हो रही हो तो ऐसे में हल्का ट्रिम करना बेहतर ऑप्शन है. 

पूरी तरह बाल हटाने से क्या नुकसान हो सकता है?

कई लोग रेजर, वैक्स, हेयर रिमूवल क्रीम या केमिकल प्रोडक्ट्स का यूज करते हैं, जो इस सेंसिटिव एरिया के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं. इससे स्किन कट या छोटे घाव, खुजली और जलन, रैशेज और एलर्जी, फंगल या बैक्टीरियल इंफेक्शन, वेजाइनल इंफेक्शन का खतरा, छोटे-छोटे कट्स के जरिए बैक्टीरिया आसानी से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे इंफेक्शन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. 

अगर बाल हटाने हों तो सुरक्षित तरीका क्या है?

अगर आप प्यूबिक हेयर हटाना चाहते हैं, तो डॉक्टर सलाह देते हैं कि पहले बालों को हल्का ट्रिम करें, सेफ्टी ट्रिमर या क्लिपर का यूज करें, रेजर और केमिकल क्रीम से बचें, शेविंग से पहले गुनगुने पानी से नहाएं, बाद में हल्का मॉइस्चराइजर लगाएं, जिन लोगों की स्किन ज्यादा सेंसिटिव है, उन्हें किसी भी तरीके से बाल हटाने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए. 

यह भी पढ़ें: Bluetooth Earphones Cancer Risk: क्या कान में लगाने वाले ब्लूटूथ से भी हो जाता है कैंसर, जानें कितना रहता है रिस्क?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या कान में लगाने वाले ब्लूटूथ से भी हो जाता है कैंसर, जानें कितना रहता है रिस्क?

क्या कान में लगाने वाले ब्लूटूथ से भी हो जाता है कैंसर, जानें कितना रहता है रिस्क?


Can Bluetooth Earphones Increase Cancer Risk: आज के समय में वायरलेस ईयरफोन लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. ऑफिस कॉल से लेकर म्यूज़िक और सोशल मीडिया तक, घंटों कान में लगे रहने वाले इन डिवाइस को लेकर एक सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या ब्लूटूथ ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन सेहत के लिए खतरनाक है और क्या इससे कैंसर का खतरा हो सकता है? इंटरनेट पर वायरल दावों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि इन्हें पहनना सिर के पास माइक्रोवेव रखने जैसा है. चलिए आपको बताते हैं कि इन दावों में कितनी सच्चाई है और कितनी मिथक. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इसी भ्रम को दूर करने के लिए अमेरिका के मिशिगन न्यूरोसर्जरी इंस्टीट्यूट में न्यूरोसर्जन डॉ. जय जगन्नाथन ने हाल ही में एक वीडियो के जरिए वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की. 13 अक्टूबर2025 को इंस्टाग्राम पर साझा किए गए इस वीडियो में उन्होंने वायरल क्लिप का जवाब दिया, जिसमें एयरपॉड्स पहनने को माइक्रोवेव के संपर्क में आने जैसा बताया गया था.

 

डॉ. जगन्नाथन के अनुसार, यह तुलना पूरी तरह भ्रामक है. उन्होंने बताया कि वायरलेस ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन “नॉन-आयोनाइजिंग” होता है, जो डीएनए को नुकसान पहुंचाने में सक्षम नहीं माना जाता. यही वजह है कि इसे कैंसर से सीधे तौर पर जोड़ने के पुख्ता सबूत अब तक नहीं मिले हैं.

रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में बेहद कम

उनका कहना है कि ब्लूटूथ ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में बेहद कम होता है. आंकड़ों के मुताबिक, एयरपॉड्स जैसे डिवाइस से मिलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन से करीब 10 से 400 गुना तक कम हो सकता है. ऐसे में अगर मोबाइल फोन के इस्तेमाल से कैंसर का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है, तो ईयरफोन के मामले में जोखिम और भी कम माना जाता है.

किस चीज का दिया जाता है उदाहरण?

कैंसर से जुड़े दावों को लेकर अक्सर जिस रिसर्च का हवाला दिया जाता है, वह नेशनल टॉक्सिकोलॉजी प्रोग्राम (NTP) की स्टडी है. इस अध्ययन में चूहों को लंबे समय तक रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन के संपर्क में रखा गया था. इसमें नर चूहों में कुछ खास तरह के हृदय कैंसर के मामलों में हल्की बढ़ोतरी देखी गई थी, जबकि मादा चूहों में ऐसा कोई स्पष्ट असर नहीं दिखा.

डॉ. जगन्नाथन बताते हैं कि इस स्टडी की बाद में अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने समीक्षा की थी. एफडीए ने साफ कहा कि इस रिसर्च के आधार पर इंसानों में कैंसर और रेडिएशन के बीच सीधा संबंध साबित नहीं किया जा सकत. इसके साथ ही यह भी अहम है कि स्टडी में चूहों को दी गई रेडिएशन की मात्रा वास्तविक जीवन में मोबाइल या ईयरफोन से मिलने वाले रेडिएशन से अलग परिस्थितियों में थी. एक्सपर्ट के मुताबिक, मौजूदा साइंटफिक प्रमाणों के आधार पर यह कहना गलत होगा कि वायरलेस ईयरफोन कैंसर का कारण बनते हैं.

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स्टेंट डलवाने के बाद भी क्यों ब्लॉक हो जाती हैं दिल की नसें? डॉक्टर से समझें

स्टेंट डलवाने के बाद भी क्यों ब्लॉक हो जाती हैं दिल की नसें? डॉक्टर से समझें


Causes Of Recurrent Heart Attack After Stenting: आज के दौर में इंटरनेट पर हार्ट की बीमारी और उसके इलाज को लेकर इतनी जानकारी मौजूद है कि मरीज और उनके परिवार अक्सर भ्रम में पड़ जाते हैं. खासतौर पर कार्डियक स्टेंट को लेकर लोगों के मन में यह सवाल बार-बार उठता है कि अगर स्टेंट लग चुका है तो क्या फिर भी हार्ट अटैक आ सकता है. डॉक्टरों का साफ कहना है कि स्टेंट लगने के बाद भी दिल का दौरा पड़ने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती.

कब लगाया जाता है स्टेंट?

स्टेंट तब लगाया जाता है जब दिल तक खून पहुंचाने वाली आर्टरीज में कोलेस्ट्रॉल जमा होकर रास्ता संकरा कर देता है. यह एक धातु की जाली होती है, जिसे ब्लॉकेज वाली नस में डालकर खून के बहाव को सामान्य किया जाता है. आमतौर पर हार्ट अटैक के बाद या गंभीर ब्लॉकेज की स्थिति में स्टेंट डाला जाता है ताकि नस खुली रहे और दिल तक पर्याप्त खून पहुंचता रहे.

हालांकि स्टेंट उस खास नस को खोल देता है, लेकिन यह दिल की सभी धमनियों को सुरक्षित नहीं करता. अगर मरीज स्टेंट लगने के बाद भी अस्वस्थ लाइफस्टाइल अपनाता है, तला-भुना और ज्यादा फैट वाला खाना खाता है, धूम्रपान करता है या शारीरिक गतिविधि से दूर रहता है, तो दिल की दूसरी नसों में ब्लॉकेज बन सकता है. यही वजह है कि स्टेंट लगने के बावजूद दोबारा हार्ट अटैक हो सकता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. संतोष कुमार, हृदय रोग एक्सपर्ट, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल, नई दिल्ली बताते हैं कि “स्टेंट किसी प्राकृतिक नस का विकल्प नहीं है. यह सिर्फ एक अस्थायी सहारा है, जो उस समय जान बचाने में मदद करता है. शरीर में बार-बार स्टेंट डालना न तो सुरक्षित माना जाता है और न ही यह स्थायी समाधान है. अगर दोबारा हार्ट अटैक होता है, तो मरीज की हालत पहले से ज्यादा गंभीर हो सकती है और इलाज भी मुश्किल हो जाता है.”

स्टेंट लगाने के बाद क्या होता है?

स्टेंट लगने के बाद मरीज पहले से ज्यादा संवेदनशील हो जाता है दोबारा दिल का दौरा पड़ने पर जान का खतरा भी बढ़ जाता है और कई मामलों में फिर से एंजियोप्लास्टी या स्टेंट डालने की जरूरत पड़ सकती है. कुछ मामलों में अगर शरीर स्टेंट को स्वीकार नहीं करता या प्रक्रिया में दिक्कत आती है, तो स्थिति जानलेवा भी हो सकती है. इसीलिए डॉक्टर बार-बार सलाह देते हैं कि स्टेंट लगने के बाद लापरवाह नहीं होना चाहिए. संतुलित डाइट, नियमित एक्सरसाइज, डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का सही समय पर सेवन, धूम्रपान से दूरी और तनाव नियंत्रण ही स्टेंट के बाद दिल को सुरक्षित रखने का सबसे कारगर तरीका है. स्टेंट इलाज का एक हिस्सा है, पूरा इलाज नहीं, असल इलाज लाइफस्टाइल में सुधार से ही होता है.

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लोगों पर नहीं हो रहा एंटीबायोटिक दवाओं का असर, स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली वजह?

लोगों पर नहीं हो रहा एंटीबायोटिक दवाओं का असर, स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली वजह?


स्टडी में इन इंफेक्शन के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली 15 एंटीबायोटिक दवाओं की जांच की गई. चौंकाने वाली बात यह रही कि इनमें से 13 दवाओं पर बैक्टीरिया ने 40 प्रतिशत से ज्यादा रेजिस्टेंस दिखाया. एक दवा पर तो यह आंकड़ा 78 प्रतिशत तक पहुंच गया.

एसएमएस अस्पताल में इंफेक्शन रोगों के नोडल अधिकारी डॉ. सुनील माहावर ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया. उनके मुताबिक, एसिनेटोबैक्टर इंफेक्शन आमतौर पर गंभीर बीमारियों से जुड़ा होता है.

एसएमएस अस्पताल में इंफेक्शन रोगों के नोडल अधिकारी डॉ. सुनील माहावर ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया. उनके मुताबिक, एसिनेटोबैक्टर इंफेक्शन आमतौर पर गंभीर बीमारियों से जुड़ा होता है.

Published at : 16 Jan 2026 08:24 PM (IST)

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