ठंड में क्यों सूज जाती हैं अंगुलियां, क्या है इनका सटीक इलाज?

ठंड में क्यों सूज जाती हैं अंगुलियां, क्या है इनका सटीक इलाज?


जब ठंडी और नम हवा त्वचा पर असर करती है, तो हाथ-पैर की सतह के पास मौजूद छोटी ब्लड वेसल्स सिकुड़ जाती हैं. शरीर गर्मी बचाने के लिए खून को अंदरूनी अंगों की ओर भेज देता है, जिससे बाहरी हिस्सों में दिक्कत शुरू हो जाती है.

समस्या तब बढ़ती है जब ठंड से अचानक गर्म माहौल में आते हैं. तेज गर्मी या गरम पानी के संपर्क में आते ही ब्लड वेसल्स तेजी से फैलती हैं, जिससे तरल पदार्थ आसपास के टिश्यू में जमा होकर सूजन, जलन और खुजली पैदा करता है.

समस्या तब बढ़ती है जब ठंड से अचानक गर्म माहौल में आते हैं. तेज गर्मी या गरम पानी के संपर्क में आते ही ब्लड वेसल्स तेजी से फैलती हैं, जिससे तरल पदार्थ आसपास के टिश्यू में जमा होकर सूजन, जलन और खुजली पैदा करता है.

Published at : 16 Jan 2026 07:13 PM (IST)

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दिल्ली में प्रदूषण छीन रहा सांसें, तीन साल में हुईं मौतों का आंकड़ा देख बैठ जाएगा आपका दिल!

दिल्ली में प्रदूषण छीन रहा सांसें, तीन साल में हुईं मौतों का आंकड़ा देख बैठ जाएगा आपका दिल!


दिल्ली की हवा में घुलते जहर का असर अब आंकड़ों में साफ-साफ नजर आने लगा है. साल-दर-साल सांस की बीमारियों से मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.  ये कोई अफवाह नहीं, बल्कि दिल्ली सरकार के आधिकारिक दस्तावेज से निकला कड़वा सच है. अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय की दिल्ली सांख्यिकीय हैंडबुक 2025 में दर्ज वाइटल स्टैटिस्टिक्स के चैप्टर IV में यह डेटा बिल्कुल साफ दिया है कि मेडिकली सर्टिफाइड मौत के ब्रेकडाउन में रेस्पिरेटरी डिजीजेज को अलग कैटेगरी में रखा गया है और पिछले चार साल का ट्रेंड देखकर किसी का भी दिल सहम सकता है.

जानें कब कितनी हुईं मौतें?

2024 में सांस की बीमारियों जैसे अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस, निमोनिया या फेफड़ों से जुड़ी अन्य समस्याएं से 9,211 मौतें दर्ज हुईं. ये 2023 के 8,801 से करीब 4.7% ज्यादा है, और 2022 के 7,432 से तो 24% ऊपर है. वहीं, सबसे चौंकाने वाला फिगर 2021 का है, उस साल कोविड-19 की दूसरी लहर ने देश में कोहराम मचा दिया था और रेस्पिरेटरी डेथ्स 14,442 तक पहुंच गई थीं. हालांकि, महामारी के बाद थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन अब यह आंकड़ा दोबारा बढ़ रहा है, जो साफ बताता है कि दिल्ली की एयर क्वालिटी और हेल्थ सिस्टम में अब भी बड़ी कमियां हैं.

क्या बता रहा सरकारी आंकड़ा?

office of the Chief Registrar (Births & Deaths) की ओर से जारी डेटा MCD, NDMC और अन्य बॉडीज से कलेक्ट किए गए रजिस्ट्रेशन पर आधारित है. कुल मेडिकली सर्टिफाइड डेथ्स में रेस्पिरेटरी का शेयर देखें तो 2024 में ये कुल 90,883 certified deaths का करीब 10% है, जबकि 2021 में ये 14.6% था. हालांकि, कुल मौतों (certified + non-certified) की बात करें तो 2024 में दिल्ली में कुल 1,39,480 मौतें दर्ज हुईं, जिनमें से 85,391 पुरुष, 54,051 महिलाएं और 38 अन्य थे.

इस वजह से होती हैं सबसे ज्यादा मौतें

अब जरा दूसरे कारणों से तुलना करें तो तस्वीर और साफ हो जाती है. सर्कुलेटरी डिजीज (जैसे हार्ट अटैक, स्ट्रोक) अब भी सबसे बड़ी किलर हैं. 2024 में 21,262 मौतें सर्कुलेटरी डिजीज से हुईं, जो 2023 के 15714 से 35 पर्सेंट ज्यादा थीं. वहीं इंफेक्शन और पैरासाइटिक डिजीज में गिरावट आई है. 2024 में 16,060 मौतों की वजह यही बीमारियां थीं, जबकि 2023 में 20,781 लोगों ने इन बीमारियों के कारण जान गंवाई थी. कैंसर जैसी neoplasms बीमारियों की वजह से 5,960 लोगों की मौत हुई तो डाइजेस्टिव डिजीज के कारण 5,200 और अन्य कारणों से 33,190 लोगों की मौत हुई. कुल मिलाकर, सर्टिफाइड डेथ्स 2024 में 90,883 पहुंच गईं, जो 2023 के 88,628 से ज्यादा हैं. यह ट्रेंड बताता है कि जहां इंफेक्शंस डिजीज पर काबू पाया जा रहा है. वहीं, रेस्पिरेटरी और सर्कुलेटरी प्रॉब्लम्स बढ़ रहे हैं और इसके पीछे पॉल्यूशन, लाइफस्टाइल और एजिंग पॉपुलेशन जैसे फैक्टर भी हो सकते हैं.

दिल्ली में कैसे हैं हालात?

दिल्ली में हर साल नवंबर-दिसंबर के दौरान AQI 400-500 पार कर जाता है और PM2.5 जैसे पार्टिकल्स फेफड़ों को चीरते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स काफी समय से इस बारे में चेता रहे हैं कि दिल्ली में क्रॉनिक रेस्पिरेटरी समस्या बढ़ रही हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में. रेस्पिरेटरी मौत पर ये आंकड़े पॉलिसी मेकर्स के लिए wake-up call हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार, सरकार को चाहिए कि प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड को और मजबूत करें, ग्रीन कॉरिडोर्स बढ़ाए और अस्पताल में रेस्पिरेटरी यूनिट्स को भी अपग्रेड करें. वरना, ये संख्या और ऊपर चढ़ती रहेगी और दिल्लीवासियों की सांसें और छोटी होती जाएंगी.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में कितना फर्क, कौन-सा आपकी सेहत के लिए ज्यादा खतरनाक?

प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में कितना फर्क, कौन-सा आपकी सेहत के लिए ज्यादा खतरनाक?


Is Ultra-Processed Food Bad for Health: अक्सर लोग प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को एक ही मान लेते हैं, लेकिन सेहत के लिहाज से दोनों में बड़ा अंतर है. सच यह है कि कुछ प्रोसेस्ड फूड नुकसानदेह नहीं होते, जबकि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि दोनों में क्या अंतर होता है और आप इसको कैसे पता कर सकत हैं. 

प्रोसेस्ड फूड क्या होता है?

यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के मुताबिक, किसी प्राकृतिक खाने वाली चीजों में थोड़ा-बहुत बदलाव, जैसे कि पकाना, फ्रीज करना, काटना या जूस निकालना,उसे प्रोसेस्ड बना देता है. इस कैटेगरी में कई हेल्दी चीजें भी आती हैं, जैसे कटे हुए बेबी कैरट, फ्रोजन सब्ज़ियां या फ्लोरेट्स में कटी ब्रोकली. यानी हर प्रोसेस्ड फूड खराब नहीं होता.

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड क्या है?

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड एक कदम आगे होता है. इसमें ऐसे प्रोडक्ट शामिल हैं जो ज्यादातर फूड से निकले तत्वों या रसायनों से बनाए जाते हैं और जिनमें असली, साबुत भोजन बहुत कम या न के बराबर होता है. उदाहरण के तौर पर पैकेट वाले चिप्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स, कैंडी, इंस्टेंट नूडल्स, रेडी-टू-ईट राइस या पास्ता. इन्हें बस गरम करना या पानी डालना होता है काम लगभग खत्म.

ये क्यों हो सकते हैं खतरनाक?

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड सस्ते, स्वादिष्ट और सुविधाजनक ज़रूर होते हैं, लेकिन इनमें अक्सर-

  • रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट
  • ज्यादा नमक
  • सैचुरेटेड फैट
  •  बहुत ज्यादा कैलोरी

ऐसी चीजें जल्दी पेट नहीं भरतीं, जिससे इंसान जरूरत से ज्यादा खा लेता है, जो बाद में सेहत को नुकसान करती है. 

फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक फूड में इस्तेमाल होने वाले एडिटिव्स सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन कई एक्सपर्ट का कहना है कि इनके लंबे समय के असर अभी पूरी तरह समझे नहीं गए हैं. ज्यादा प्रोसेसिंग से फाइबर भी निकल जाता है, जिससे पाचन और आंतों के अच्छे बैक्टीरिया पर असर पड़ सकता है।

रिसर्च में क्या निकला

रिसर्च बताते हैं कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, कैंसर और समय से पहले मौत के खतरे से जुड़े हो सकते हैं. एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि जो लोग अल्ट्रा-प्रोसेस्ड डाइट लेते हैं, वे ज्यादा खाते हैं और तेजी से वजन बढ़ाते हैं.

क्या हर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बुरा है?

अमेरिकन हार्ट एसोसिएसन से जुड़े एक्सपर्ट मानते हैं कि आज के दौर में प्रोसेस्ड और कुछ हद तक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से पूरी तरह बचना मुश्किल है. समस्या यह है कि ज्यादातर ऐसे प्रोडक्ट सेहत को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि स्वाद, कीमत और शेल्फ-लाइफ को प्राथमिकता देकर बनाए जाते हैं.एक्सपर्ट का कहना है कि जरूरत इस बात की है कि कंपनियां ज्यादा हेल्दी प्रोसेस्ड फूड बनाएं, और लोग समझदारी से चुनाव करें. एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि पूरी तरह प्रोसेस्ड या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड छोड़ना हर किसी के लिए आसान नहीं है, लेकिन जानकारी और समझदारी से चुनाव करके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या किसी के जन्म से हो सकते हैं दो यूट्रस और दो प्राइवेट पार्ट, लखनऊ में सामने आया अनोखा मामला

क्या किसी के जन्म से हो सकते हैं दो यूट्रस और दो प्राइवेट पार्ट, लखनऊ में सामने आया अनोखा मामला


Congenital Reproductive System Disorder: लखनऊ में सामने आए एक बेहद रेयर मेडिकल केस ने सभी को हैरान कर दिया है. डॉक्टरों ने एक ऐसी युवती का सफल इलाज किया है, जो जन्म से ही दो यूट्रस और दो वेजाइना  के साथ पैदा हुई थी. यह जन्मजात समस्या बचपन से ही उसकी जिंदगी को मुश्किल बना रही थी. बलिया जिले की रहने वाली इस युवती को बचपन से यूरिन पर कोई नियंत्रण नहीं था. वह सालों तक डायपर पर निर्भर रही। उम्र बढ़ने के साथ स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. इसके साथ ही उसे शौच से जुड़ी गंभीर दिक्कतों का भी सामना करना पड़ता था, जिससे उसका रोजमर्रा का जीवन और सामाजिक जीवन दोनों प्रभावित हो रहे थे.

कई अस्पतालों में इलाज, लेकिन समाधान नहीं

परिवार ने वर्षों तक स्थानीय अस्पतालों में इलाज कराया, लेकिन कहीं से स्थायी राहत नहीं मिली. आखिरकार, उसे लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान लाया गया, जहां डॉक्टरों ने विस्तार से जांच शुरू की. मेडिकल जांच में सामने आया कि युवती के शरीर में तीन गंभीर जन्मजात दिक्कतें थीं. डॉक्टरों ने पाया कि उसके दो पूरी तरह विकसित यूट्रस और दो वेजाइना थीं. इसके अलावा, यूरिन की नलियां गलत जगह खुल रही थीं, जिससे लगातार यूरिन रिसता रहता था. वहीं, एनल ओपनिंग भी असामान्य रूप से विकसित थी और वेजाइना के बहुत पास स्थित थी.

डॉक्टरों की टीम ने बनाई तीन चरणों की सर्जरी योजना

यूरोलॉजी एक्सपर्ट प्रोफेसर ईश्वर राम धायल की अगुवाई में डॉक्टरों की टीम ने केस संभाला. स्थिति की जटिलता को देखते हुए तीन चरणों में सर्जरी करने का फैसला लिया गया. पहले चरण में शौच मार्ग को सही किया गया, ताकि मल त्याग की समस्या दूर हो सके. इसके बाद दो अलग-अलग सर्जरी के जरिए यूरिन की नलियों की गलत पोजीशन को ठीक किया गया. ये सर्जरी बेहद चुनौतीपूर्ण थीं, लेकिन डॉक्टरों की सावधानी और अनुभव से सभी चरण सफल रहे.

क्या पहले भी ऐसे मामले आ चुके हैं?

डॉक्टरों के मुताबिक, अब युवती को पेशाब पर नियंत्रण मिल गया है और शौच से जुड़ी समस्याएं भी काफी हद तक ठीक हो चुकी हैं. यह प्रदेश का पहला मामला था. Mayo Clinic और अन्य मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, यह काफी रेयर होता है और यह स्थिति जन्म से ही होती है,कई महिलाएं इसके साथ सामान्य जीवन भी जीती हैं. साल 2022 में स्टेफनी हैक्सटन नाम की महिला का मामला सामने आया था, जो स्टेफनी अलास्का की रहने वाली हैं. 

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अकेलेपन से शरीर में हो जाती हैं इतनी बीमारियां, जानें कैसे नजर आते हैं इसके लक्षण?

अकेलेपन से शरीर में हो जाती हैं इतनी बीमारियां, जानें कैसे नजर आते हैं इसके लक्षण?


Is Social Isolation Dangerous For Health: हाल के हफ्तों में चीन में एक मोबाइल ऐप तेजी से लोकप्रिय हुआ है. यह ऐप देश में बढ़ते अकेलेपन और युवाओं की निराशा को सीधे छूता है, खासकर उस समाज में जहां दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है. “Are You Dead” नाम का यह ऐप खासतौर पर अकेले रहने वाले लोगों के लिए बनाया गया है. इसका कॉन्सेप्ट बेहद सरल है, यूजर को हर दिन ऐप पर चेक-इन करना होता है. अगर लगातार कुछ दिनों तक चेक-इन नहीं होता, तो ऐप अपने-आप यूजर के इमरजेंसी कॉन्टैक्ट को अलर्ट भेज देता है. आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में अकेलापन और सामाजिक दूरी तेजी से बढ़ रही है. अक्सर लोग इसे सिर्फ इमोशनल परेशानी मानते हैं, लेकिन रिसर्च बताती है कि इसका असर शरीर पर भी पड़ता है खासतौर पर दिल पर.

सोशल आइसोलेशन क्या है?

डॉ. प्रमोद कुमार, हृदय रोग विशेषज्ञ, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल, नई दिल्ली बताते हैं कि  सोशल आइसोलेशन का मतलब है परिवार, दोस्तों या समाज से बहुत कम या बिल्कुल भी जुड़ाव न होना. यह अकेले समय बिताने से अलग है. असली खतरा तब होता है, जब इंसान लंबे समय तक इमोशनल और सामाजिक सहारे से दूर रहता है. जब कोई व्यक्ति खुद को अकेला महसूस करता है, तो शरीर उसे तनाव की स्थिति मान लेता है. इससे कोर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे स्ट्रेस हार्मोन बढ़ जाते हैं, जो ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट बढ़ा सकते हैं. धीरे-धीरे यह सूजन और दिल की बीमारियों का कारण बन सकता है.

क्यों खतरनाक है अकेलापन?

अकेले रहने वाले लोग अक्सर एक्सरसाइज नहीं करते, सही खानपान नहीं अपनाते और दवाइयों में भी लापरवाही कर सकते हैं. इसके साथ ही, अकेलापन डिप्रेशन और एंग्जायटी को बढ़ाता है, जो दिल की सेहत को और नुकसान पहुंचाता है. बीमारी या कमजोरी के वक्त किसी अपने का साथ बहुत मायने रखता है. अकेलेपन में यह सहारा नहीं मिल पाता, जिससे रिकवरी भी धीमी हो सकती है.

कौन लोग ज्यादा जोखिम में हैं?

अकेले रहने वाले बुजुर्ग या जिन्होंने अपने करीबी लोगों को खो दिया है, उन्हें ज्यादा खतरा रहता है. लेकिन युवा भी इससे अछूते नहीं हैं. काम का दबाव, जगह बदलना और डिजिटल कम्युनिकेशन पर ज्यादा निर्भरता आमने-सामने मिलने को कम कर रही है. अच्छी बात यह है कि रिश्ते दिल के लिए दवा की तरह काम करते हैं. इसके लिए नियमित रूप से अपनों से बात करें, किसी सामाजिक या कम्युनिटी ग्रुप से जुड़ें, वॉलंटियर काम करें या ग्रुप में योग और वॉक जैसी एक्टिविटी अपनाएं. जरूरत महसूस हो तो प्रोफेशनल मदद लेने में भी हिचकिचाएं नहीं. अकेलापन सिर्फ मन की हालत नहीं, बल्कि दिल की सेहत से जुड़ा एक गंभीर खतरा है. जैसे हम खानपान, नींद और एक्सरसाइज पर ध्यान देते हैं, वैसे ही रिश्तों को भी समय देना जरूरी है. एक अच्छी बातचीत, साथ बैठकर खाना या समाज से जुड़ाव न सिर्फ मन को खुश रखता है, बल्कि दिल को भी लंबे समय तक स्वस्थ बनाए रखता है.

इसे भी पढ़ें: Nipah Virus: निपाह वायरस कितना खतरनाक, क्या है इससे बचने का तरीका?

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गर्म पानी पीने के बाद ‘डकार टेस्ट’ वायरल, क्या इससे सच में पता चलती है आंतों की सेहत?

गर्म पानी पीने के बाद ‘डकार टेस्ट’ वायरल, क्या इससे सच में पता चलती है आंतों की सेहत?


Warm Water Burp Test Truth: सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक इंस्टाग्राम वीडियो ने लोगों को उलझन में डाल दिया है. वीडियो में दावा किया गया है कि गर्म पानी पीने के बाद अगर डकार आती है, तो इसका मतलब शरीर में टॉक्सिन्स फंसे हुए हैं. वहीं अगर डकार न आए, तो कहा जा रहा है कि शरीर के सभी अंग बिल्कुल ठीक काम कर रहे हैं. लेकिन डॉक्टर इस दावे को पूरी तरह गलत और मेडिकल साइंस के खिलाफ बता रहे हैं. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

डकार आने का असली मतलब क्या है?

डकार आना, जिसे मेडिकल भाषा में बेल्चिंग कहा जाता है, शरीर की एक सामान्य प्रक्रिया है. यह तब होती है जब पाचन तंत्र में जमा अतिरिक्त हवा या गैस बाहर निकलती है. ज्यादातर मामलों में इसकी वजह अनजाने में हवा निगल लेना होता है. जल्दी-जल्दी खाना, कोल्ड ड्रिंक या सोडा पीना, च्युइंग गम चबाना, स्मोकिंग करना या खाते वक्त बात करना, इन सभी से हवा निगली जाती है, जिसे एयरोफेजिया कहा जाता है. कई बार चिंता या तनाव की वजह से भी व्यक्ति बार-बार हवा निगल लेता है. यह हवा पेट या फूड पाइप में जमा होकर डकार के रूप में बाहर निकलती है.

पेट से बनने वाली गैस का रोल

कुछ मामलों में पेट के अंदर पाचन के दौरान गैस बनती है, जिसे गैस्ट्रिक बेल्चिंग कहा जाता है. यह तब हो सकता है जब बिना पचे कार्बोहाइड्रेट आंतों में बैक्टीरिया के जरिए फर्मेंट होते हैं या फिर एसिड रिफ्लक्स  और एच पाइलोरी जैसे इंफेक्शन की स्थिति में. डॉक्टर साफ तौर पर कहते हैं कि डकार का शरीर से टॉक्सिन्स निकलने, लिवर या किडनी फेल होने से कोई सीधा संबंध नहीं है.

साइंस क्या कहती है?

Neurogastroenterology & Motility जैसी मेडिकल जर्नल्स में प्रकाशित रिसर्च बताती है कि जरूरत से ज्यादा डकार आने के ज्यादातर मामले सुप्रागैस्ट्रिक बेल्चिंग से जुड़े होते हैं. इसमें हवा पेट से नहीं, बल्कि फूड पाइप से ऊपर की ओर आती है. यह आदतों और व्यवहार से जुड़ा होता है, न कि अंगों की खराबी से.अमेरिकन कॉलेज ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के मुताबिक, डकार आना सामान्य और नुकसानदेह नहीं है, जब तक कि इसके साथ पेट दर्द, अचानक वजन कम होना, उल्टी या निगलने में परेशानी जैसे लक्षण न दिखें.

एक्सपर्ट ने क्या कहा?

दिलशाद गार्डन स्थित करुणा हॉस्पिटल में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. आशीष सचान बताते हैं कि “ये टेस्ट गर्म पानी पीकर डकार आने या न आने से नहीं किए जाते और न ही इससे लिवर या किडनी की सेहत का आकलन होता है. सोशल मीडिया पर जिसे ‘डकार टेस्ट’ कहा जा रहा है, वह असल में मेडिकल ब्रीथ टेस्ट की गलत समझ है. उनके मुताबिक, ये टेस्ट डॉक्टर की सलाह पर किए जाते हैं.”

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