गर्म या ठंडा पानी, जानें सर्दियों में कैसे पानी से धोना चाहिए चेहरा?

गर्म या ठंडा पानी, जानें सर्दियों में कैसे पानी से धोना चाहिए चेहरा?


सर्दियों में लोगों के मन में अक्सर यह सवाल जरूर होता है कि अपने चेहरे को गर्म पानी से धोएं या फिर ठंडे पानी से. दरअसल, सुबह का वक्त हमारी स्किन के लिए बेहद अहम होता है. नींद के दौरान स्किन खुद को रिचार्ज करती है और दिन की शुरुआत सही तरीके से करने से स्किन काफी समय तक हेल्दी और चमकदार बनी रहती है. आयुर्वेद और विज्ञान दोनों मानते हैं कि पानी का तापमान हमारी स्किन के पोर्स, तेल और नमी पर सीधा असर डालता है, इसलिए सर्दियों में चेहरे को धोने का सही तरीका जानना बेहद जरूरी है.

गर्म पानी अच्छा या खराब?

सबसे पहले बात करते हैं गर्म पानी की. शुरुआत में यह ताजगी और आराम देने वाला लगता है, लेकिन अगर बहुत गर्म पानी का इस्तेमाल चेहरा धोने के लिए करते हैं तो यह स्किन के लिए नुकसानदायक हो सकता है. आयुर्वेद में बताया गया है कि बहुत गर्म पानी स्किन की नैचुरल ऑयली लेयर को हटा देता है, जिससे स्किन रूखी और लाल होने लगती है. विज्ञान के अनुसार, गर्म पानी स्किन के ऊपर मौजूद नेचुरल बैरियर सेबम को खत्म कर देता है, जो स्किन को नमी और इंफेक्शन से बचाता है. लगातार गर्म पानी का इस्तेमाल करने से चेहरे पर खुजली, रूखापन और कभी-कभी मुंहासे जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं. ऐसे में मौसम ठंडा हो या गर्म, ज्यादा गर्म पानी से चेहरे को धोना ठीक नहीं है.

ठंडा पानी फायदेमंद या नुकसानदायक?

अब बात करें ठंडे पानी की तो ठंडा पानी चेहरे को तरोताजा महसूस कराता है. आयुर्वेद के अनुसार, ठंडा पानी वात दोष को संतुलित करता है और स्किन में ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाकर ताजगी देता है. यह सूजन और लालिमा को कम करने में मदद करता है और चेहरे की पोर्स को अस्थायी रूप से सिकोड़ देता है. हालांकि, साइंस कहता है कि सिर्फ ठंडे पानी से स्किन की गहराई से सफाई पूरी तरह नहीं होती, क्योंकि ठंडा पानी ऑयल और गंदगी को पूरी तरह हटाने में कम असरदार होता है. लगातार ठंडे पानी का इस्तेमाल करने से स्किन रूखी हो सकती है. ऐसे में मुख्य सफाई के लिए ठंडा पानी इस्तेमाल करने से बचना चाहिए.

सर्दियों में क्या ऑप्शन ज्यादा बेस्ट?

सर्दियों में चेहरा धोने के लिए गुनगुने पानी का इस्तेमाल सबसे अच्छा तरीका है. आयुर्वेद इसे संतुलित और सौम्य पानी मानता है, जो स्किन को नुकसान पहुंचाए बिना सफाई करता है. गुनगुना पानी चेहरे की गंदगी, तेल और पसीने को धीरे-धीरे हटा देता है और स्किन के नेचुरल ऑयल को बरकरार रखता है. विज्ञान के अनुसार, गुनगुना पानी पोर्स को खोलकर गंदगी और डेड स्किन को बाहर निकालता है, जिससे स्किन नरम, ताजा और चमकदार बनती है. साथ ही, यह स्किन को ड्राई या इरिटेट होने से बचाता है.

यह ऑप्शन भी बेहद कारगर

स्किन को साफ करने का एक और तरीका है बर्फ या आइस वॉटर का. यह स्किन को तुरंत ताजगी देने वाला लगता है और खून की धमनियों को सिकोड़कर सूजन और लालिमा कम करता है. आयुर्वेद के हिसाब से यह वात को शांत करता है और चेहरे को ठंडक पहुंचाता है. हालांकि, लंबे समय तक आइस वॉटर का इस्तेमाल करने से त्वचा की नमी कम हो सकती है और यह रूखी बन सकती है. ऐसे में बर्फ के पानी का इस्तेमाल हमेशा सावधानी के साथ करना चाहिए. वहीं, चेहरा धोने के बाद मॉइस्चराइजर लगाना चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आप भी यूटीआई से बार-बार रहती हैं परेशान? आयुर्वेद के ये तरीके तुरंत देते हैं राहत

क्या आप भी यूटीआई से बार-बार रहती हैं परेशान? आयुर्वेद के ये तरीके तुरंत देते हैं राहत


महिलाओं में बार-बार होने वाला यूटीआई (Urinary Tract Infection) कोई आम समस्या नहीं है. चिकित्सा जगत में इसे एक ‘साइलेंट एपिडेमिक’ भी कहा जाता है. आंकड़ों के मुताबिक, हर दो में से एक महिला अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार इस इंफेक्शन का शिकार होती है और लगभग 25 प्रतिशत महिलाओं को यह इंफेक्शन बार-बार भी होता है. आइए आपको इससे बचने आयुर्वेदिक तरीके बताते हैं.

क्यों होता है यूटीआई?

महिलाओं में यूटीआई होने की वजह सिर्फ बैक्टीरिया नहीं हैं, बल्कि महिलाओं के शरीर की बनावट और लाइफस्टाइल भी इसमें अहम भूमिका निभाती है. महिलाओं में मूत्रमार्ग पुरुषों की तुलना में छोटा होता है, इसलिए बैक्टीरिया को पेशाब की थैली (ब्लैडर) तक पहुंचने में ज्यादा दूरी तय नहीं करनी पड़ती.

यह वजह भी जिम्मेदार

इसके अलावा मूत्रमार्ग का गुदा के पास होना भी इंफेक्शन को आसान बना देता है. मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन हार्मोन कम होने से वजाइना के सुरक्षात्मक बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं, जिससे इंफेक्शन का खतरा और बढ़ जाता है. साथ ही, पानी कम पीना, पेशाब देर तक रोकना, सार्वजनिक टॉयलेट का इस्तेमाल और माहवारी के दौरान स्वच्छता का ध्यान न रखना भी इस समस्या को आम बनाते हैं.

आयुर्वेद में क्या है यूटीआई का मतलब?

आयुर्वेद में यूटीआई को केवल बैक्टीरिया का हमला नहीं माना जाता, बल्कि इसे मूत्रकृच्छ्र या मूत्राघात कहा गया है और इसे शरीर के पित्त दोष के असंतुलन से जोड़ा गया है. ज्यादा गर्म, तीखा, नमकीन या खट्टा भोजन और अपच या अजीर्ण की स्थिति पित्त को बढ़ा देती है, जिससे मूत्राशय में जलन, बार-बार पेशाब, पेट या कमर में दर्द जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं.

आयुर्वेद में बताया गया यह इलाज

आयुर्वेद में इसका स्थायी और सुरक्षित समाधान बताया गया है. चंद्रप्रभा वटी मूत्राशय की मांसपेशियों को मजबूत करती है और जलन को कम करती है. गोक्षुरादि गुग्गुल पेशाब की मात्रा बढ़ाकर बैक्टीरिया को बाहर निकालता है. नीरी तुरंत राहत देती है और इंफेक्शन को किडनी तक पहुंचने से रोकती है. इसके अलावा चन्दनासय शरीर की गर्मी शांत करता है और पेशाब में जलन को जड़ से खत्म करता है. जड़ी-बूटियां जैसे पुनर्नवा, वरुण और गिलोय भी शरीर की सुरक्षा बढ़ाती हैं. साथ ही, आयुर्वेद में तुरंत राहत के लिए सुबह धनिया और मिश्री का पानी पीने की सलाह दी जाती है. पर्याप्त पानी पीना, स्वच्छता का ध्यान रखना और तीखे या भारी भोजन से परहेज करना भी यूटीआई से बचाव में मदद करता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इन बीमारियों से जूझ रहे हैं तो जरूर खाएं करेला, 7 दिन में दिखने लगता है असर

इन बीमारियों से जूझ रहे हैं तो जरूर खाएं करेला, 7 दिन में दिखने लगता है असर


करेला का नाम सुनकर ही मुंह भी कड़वा हो जाता है, लेकिन ये औषधीय गुणों से भरपूर होता है. सिर्फ करेला खाने के ही फायदे नहीं हैं, बल्कि इसे लगाने के भी अलग फायदे हैं. आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं. 

आयुर्वेद में भी करेले का जिक्र

करेला ब्लड को शुद्ध करने से लेकर विटामिन ए, बी और सी की पूर्ति शरीर में करता है. आयुर्वेद में करेले को ‘करवेल्लक’ कहा जाता है, जो दूषित रक्त, बढ़ी हुई ब्लड शुगर और कीड़ों तक को साफ करने की क्षमता रखता है. करेला पैनक्रियाज तक पहुंचने वाली शुद्धिकरण औषधि है, जो गहराई से ब्लड को पोषण देकर आंतों के कीड़े, घाव को भरने और स्किन की दिक्कतों को दूर करता है. साथ ही, शरीर को कई बीमारियों से राहत दिलाने की ताकत भी रखता है.

ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली महिलाओं के भी बेस्ट

करेला ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली महिलाओं के लिए भी दवा की तरह काम करता है, क्योंकि यह माताओं में दूध बनाने वाले हार्मोन का प्रॉडक्शन तेजी से करता है. हालांकि, इसका सेवन डॉक्टरों की सलाह के बाद ही करें. अगर शरीर पर किसी तरह के घाव हो गए हैं तो करेले का लेप दवा की तरह काम करता है. यह घाव को भरने में मदद करता है, घाव के इंफेक्शन को रोकता है और सूजन को कम करने में मदद करता है.

आंतों के लिए भी बेहद जरूरी

आंतों का डिटॉक्स होना बहुत जरूरी है. अगर आंतों में कई दिनों तक मल साफ नहीं होता है तो आंतों में कीड़े और बुरे बैक्टीरिया पनपने लगते हैं. ऐसे में भूख कम लगती है, खाना खाते ही टॉयलेट जाना पड़ जाता है और खाया-पीया शरीर को लगता नहीं है. ऐसे में जूस या सलाद के रूप में करेले का सेवन कर सकते हैं. करेले के कड़वेपन को कम करने के लिए नमक लगाकर इसे कुछ घंटों के लिए रख दें. इससे करेला पानी छोड़ देगा और उसका कड़वापन भी कम हो जाएगा.

स्किन के लिए एकदम बेस्ट

अगर चेहरे पर एक्ने और मुंहासे बहुत होते हैं तो यह खून में गंदगी बढ़ने का संकेत है. ब्लड को साफ करने के लिए करेले के जूस का रोजाना सेवन करना लाभकारी होता है. यह ब्लड को साफ करके चेहरे पर निखार लाता है. साथ ही,  खुजली और रूखेपन से भी राहत देता है. करेला इन सभी मूल कारणों को संतुलित करता है. यह शरीर को खुद ठीक होने की शक्ति को लौटाता है.

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सर्दियों में कब और किस वक्त खानी चाहिए मूली, जानें डाइजेशन सिस्टम को कैसे करती है मजबूत?

सर्दियों में कब और किस वक्त खानी चाहिए मूली, जानें डाइजेशन सिस्टम को कैसे करती है मजबूत?


सर्दियों में मूली को नैचुरल सुपरफूड कहा गया है. मूली में मौजूद पोषक तत्व शरीर को एनर्जी और पावर देने का काम करते हैं. यह पाचन, इम्युनिटी और त्वचा की सेहत के लिए भी वरदान है. बहुत से लोग सलाद या सूप के रूप में इसका सेवन करते हैं, लेकिन इसके सही तरीके, समय और मात्रा को जानना भी जरूरी है, ताकि इसका पूरा फायदा मिल सके. आइए इसके बारे में जानते हैं.

बड़े काम का मूली का फाइबर

मूली में सबसे पहले फाइबर की भरपूर मात्रा देखने को मिलती है. यह शरीर में जाकर भोजन को पचाने में मदद करता है और कब्ज जैसी समस्याओं को दूर करता है. इसके अलावा इसमें विटामिन-सी मौजूद होता है, जो इम्युनिटी बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है. सर्दियों में वायरस और सर्दी-जुकाम से बचने के लिए विटामिन सी की जरूरत ज्यादा होती है और मूली इसे नैचुरली उपलब्ध कराती है.

पोटैशियम भी बेहद फायदेमंद

मूली में पोटैशियम भी होता है, जो हार्ट हेल्थ को बनाए रखने, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने और मांसपेशियों की चुस्ती बनाए रखने में मदद करता है. इसके साथ ही मूली में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर से हानिकारक टॉक्सिन्स को बाहर निकालते हैं और शरीर को अंदर से डिटॉक्स करते हैं.

कैसे खानी चाहिए कच्ची मूली?

कच्ची मूली खाने के तरीके भी अलग-अलग हैं. इसे कद्दूकस करके दही के साथ रायता बनाया जा सकता है, नींबू और काला नमक डालकर सलाद की तरह खाया जा सकता है, या पतले स्लाइस काटकर स्नैक्स की तरह लिया जा सकता है. आयुर्वेद के अनुसार, कच्ची मूली शरीर में गर्मी और ताकत पैदा करती है, इसलिए इसे ठंड के मौसम में खाने से शरीर को एनर्जी मिलती है और पाचन सिस्टम मजबूत होता है.

मूली खाने के कितने फायदे?

मूली का छिलका भी बेहद उपयोगी होता है. इसके छिलके में फाइबर और कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं, इसलिए छिलके सहित खाने से पाचन और एंटीऑक्सीडेंट्स के लाभ दोगुने हो जाते हैं. मूली केवल पाचन के लिए ही नहीं, बल्कि बीमारी में राहत देने में भी मददगार है. इसमें मौजूद प्राकृतिक एंजाइम और फाइबर शरीर के पाचन तंत्र को सक्रिय करते हैं, जिससे खाना जल्दी पचता है और गैस, एसिडिटी या भारीपन जैसी समस्याओं से राहत मिलती है.

सर्दी-जुकाम में भी फायदेमंद

इसके अलावा मूली में सूजन-रोधी गुण होते हैं, जो शरीर में जमा विषैले पदार्थों और फ्लूइड को बाहर निकालकर सूजन कम करने में मदद करते हैं. आयुर्वेद में इसे जुकाम, कफ और बलगम कम करने वाली सब्जी माना गया है. यह शरीर में जमा अतिरिक्त गर्मी और टॉक्सिन्स को बाहर निकालकर इम्युनिटी को मजबूत करती है और इंफेक्शन से बचाव करती है. मूली लो-कैलोरी और पौष्टिक स्नैक्स है, जो वजन घटाने वालों के लिए भी बेहतरीन है. हालांकि, दिन में ज्यादा मात्रा में मूली खाने से गैस या पेट दर्द हो सकता है. ऐसे में एक दिन में लगभग 100–150 ग्राम मूली ही पर्याप्त मानी जाती है.

रात में मूली खाएं या नहीं?

रात में मूली खाने से बचना चाहिए. खासकर अगर किसी को थायरॉइड की समस्या या एसिडिटी की शिकायत है तो वह मूली का सेवन न करें. इसके अलावा मूली खाने से शरीर को अंदर से डिटॉक्स करने में मदद मिलती है. यह स्किन की सेहत को भी सुधारती है. नियमित रूप से मूली खाने से चेहरे पर झुर्रियां कम होती हैं और स्किन में निखार आता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किस उम्र तक एग फ्रीजिंग करवा सकती हैं महिलाएं, इसमें कितना खर्चा आता है?

किस उम्र तक एग फ्रीजिंग करवा सकती हैं महिलाएं, इसमें कितना खर्चा आता है?


आजकल की लाइफस्टाइल में महिलाएं अपने करियर, पढ़ाई या पर्सनल कारणों से मां बनने का समय थोड़ा आगे बढ़ाना चाहती हैं. इसी वजह से एग फ्रीजिंग (Egg Freezing) का चलन तेजी से बढ़ रहा है. यह एक ऐसा ऑप्शन है जो आपको अपने भविष्य की फर्टिलिटी सुरक्षित रखने में मदद करता ह यानी, अगर आप अभी बच्चे की प्लानिंग नहीं करना चाहती हैं, तो भी बाद में आप अपनी खुशियों की राह आसान बना सकती हैं. तो ऐसे में आइए जानते हैं कि एग फ्रीजिंग करवाने की सही उम्र क्या है, कितना खर्चा आएगा और इसके फायदे क्या हैं. 

एग फ्रीजिंग क्यों जरूरी हो सकती है?

एग फ्रीजिंग का मुख्य उद्देश्य  भविष्य में बच्चे की प्लानिंग को आसान बनाना है. अगर आप अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हैं या करियर में आगे बढ़ना चाहती हैं, तो अंडे फ्रीज करवा लेना फायदेमंद होता है. कुछ बीमारियों या ट्रीटमेंट, जैसे कैंसर के इलाज से पहले, महिलाएं अपने अंडों को सुरक्षित करवा सकती हैं. अगर आपको भविष्य में IVF (In-Vitro Fertilization) करना पड़े, तो फ्रीज किए हुए अंडे मददगार होते हैं.  एग फ्रीजिंग आपको अपने फर्टिलिटी विकल्पों की सुरक्षा देती है. 

एग फ्रीजिंग के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?

आम तौर पर 25 से 35 साल की उम्र को एग फ्रीजिंग के लिए बेस्ट माना जाता है. इस उम्र में अंडों की संख्या और क्वालिटी सबसे अच्छी होती है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, अंडों की संख्या और उनकी क्वालिटी कम होने लगती है.  30-35 की उम्र में फ्रीज किए अंडों से मां बनने के चांस ज्यादा होते हैं. 35 की उम्र के बाद अंडों में जेनेटिक प्रॉब्लम्स होने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए जितनी जल्दी संभव हो, अंडे फ्रीज करवा लेना बेहतर रहता है. 

किस उम्र तक एग फ्रीजिंग करवा सकती हैं महिलाएं

आमतौर पर 38 साल से पहले एग फ्रीज करना सबसे सही माना जाता है. 40 साल के बाद भी एग फ्रीज करना संभव है, लेकिन इसमें कुछ मुश्किलें हैं. जैसे सक्सेस रेट कम हो जाता है. कई साइकल्स की जरूरत पड़ सकती है, जिससे खर्चा बढ़ता है. प्रेग्नेंसी से जुड़े हेल्थ रिस्क बढ़ जाते हैं. इसलिए 40 के बाद फ्रीज करवाने से पहले डॉक्टर से अच्छे से सलाह लेना जरूरी है. 

एग फ्रीजिंग का प्रोसेस

एग फ्रीजिंग का प्रोसेस लगभग 10-14 दिनों में पूरा होता है और इसमें मुख्य रूप से चार स्टेप्स होते हैं. जिसमें सबसे पहले  कंसल्टेशन, फर्टिलिटी एक्सपर्ट से मिलकर आपकी हेल्थ और विकल्पों पर चर्चा होती है. इसके बाद ओवेरियन स्टिमुलेशन यानी हार्मोन इंजेक्शन देकर अंडों की संख्या बढ़ाई जाती है. अब एग रिट्रीवल, एक छोटा ऑपरेशन करके अंडों को निकाला जाता है.  लास्ट में फ्रीजिंग अंडों को बहुत तेजी से फ्रीज किया जाता है ताकि उनकी क्वालिटी सुरक्षित रहे. 

एग फ्रीजिंग का खर्चा

एग फ्रीजिंग का खर्चा कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है, जैसे कि क्लिनिक, स्थान और कितने साइकल्स की जरूरत है. आम तौर पर भारत में यह खर्चा लगभग 1.5 लाख से 3 लाख प्रति साइकल होता है. 1 साइकल में आमतौर पर 8-15 अंडे फ्रीज किए जा सकते हैं. उम्र जितनी ज्यादा होगी, उतनी ज्यादा साइकल्स की जरूरत पड़ सकती है, जिससे खर्चा बढ़ जाता है.इसमें डॉक्टर की फीस, लैब टेस्ट, दवाइयां और हॉस्पिटल खर्च शामिल होते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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