इडली से लेकर पोहे तक… सुबह का कौन सा नाश्ता गट हेल्थ के लिए सबसे अच्छा?

इडली से लेकर पोहे तक… सुबह का कौन सा नाश्ता गट हेल्थ के लिए सबसे अच्छा?


सुबह का नाश्ता यानी ब्रेकफास्ट पूरे दिन की भागदौड़, काम और मेहनत के लिए शरीर में ऊर्जा बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है. यह आंतों को तंदरुस्त और स्वस्थ रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. आंत (गट) सिर्फ पाचन का काम नहीं करती, बल्कि इंसान की इम्युनिटी, मूड, ऊर्जा और पूरे मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करती है. अगर सुबह का नाश्ता संतुलित और फाइबर-युक्त हो, तो यह गट माइक्रोबायोम को मजबूत बनाता है, पाचन को आसान करता है और पेट की समस्याओं जैसे गैस, कब्ज, एसिडिटी को कम करता है. डॉक्टरों के अनुसार सुबह का पहला भोजन हल्का, पोषक और गट को शांत रखने वाला होना चाहिए. नीचे दिए गए कुछ नाश्ते डॉक्टरों के अनुसार गट-फ्रेंडली माने जाते हैं. इन्हें खाने से फाइबर, विटामिन और जरूरी पोषक तत्वों की भरपाई हो जाती है.

इडली, सांभर और नारियल की चटनी – परफेक्ट गट-फ्रेंडली नाश्ता

इडली, सांभर और नारियल की चटनी आंतों को मजबूत और तंदुरुस्त रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. दक्षिण भारत का यह प्रमुख नाश्ता गट हेल्थ के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है क्योंकि इसका बैटर चावल और दाल को फर्मेंट (खमीर) करके बनाया जाता है. फर्मेंटेशन प्रोबायोटिक्स पैदा करता है, जो आंत में अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाकर पाचन को मजबूत करते हैं. सांभर में दाल, सब्जियाँ और मसाले होते हैं, जो फाइबर, पौधे आधारित प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट्स प्रदान करते हैं, जिससे पेट हल्का रहता है और ऊर्जा स्तर स्थिर रहता है.

होल-ग्रेन एवोकाडो टोस्ट – फाइबर और हेल्दी फैट का बेहतरीन कॉम्बो

होल-ग्रेन एवोकाडो टोस्ट आंत की सेहत के लिए एक बढ़िया नाश्ता माना जाता है क्योंकि इसमें फाइबर, हेल्दी फैट और एंटीऑक्सीडेंट्स का सही मिश्रण मिलता है. होल-ग्रेन ब्रेड पेट को लंबे समय तक भरा रखती है और पाचन को बेहतर बनाती है. यह ब्रेकफास्ट शरीर को जरूरी पोषक तत्व देने में मदद करता है.

मूंग दाल चीला – हल्का, प्रोटीन से भरपूर और जल्दी पचने वाला नाश्ता

मूंग दाल चीला ब्रेकफास्ट की उन डिशों में शामिल है जिसे बड़े और बच्चे दोनों पसंद करते हैं. यह आंत की सेहत के लिए बेहतरीन माना जाता है क्योंकि यह हल्का होने के साथ-साथ प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होता है. भिगोई हुई मूंग दाल को पीसकर बनने वाला यह चीला आसानी से पच जाता है और पेट पर भारीपन नहीं डालता. इसमें मौजूद प्रोटीन सुबह की ऊर्जा बढ़ाता है और लंबे समय तक भूख नहीं लगने देता, जबकि फाइबर आंत की गति सुधारता है और कब्ज में राहत देता है.

पोहा – गट हेल्थ के लिए एक आसान और हेल्दी विकल्प

पोहा उत्तर भारत में सुबह के नाश्ते के लिए प्रमुख और हेल्दी विकल्प है. अगर आप सुबह पोहा खाते हैं तो यह शरीर को जरूरी फाइबर देता है और पेट फूलना या अपच जैसी समस्याओं से राहत दिलाता है. अगर पोहे में मूंगफली मिलाकर खाया जाए, तो यह और भी फायदेमंद होता है क्योंकि मूंगफली आंत की सेहत को बेहतर बनाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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जोड़ों की उम्र कम कर देती है रोजाना की ये 8 गलतियां, डॉक्टर्स ने बताया किन आदतों को छोड़ना जरूरी

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एक्सपर्ट्स बताते हैं कि लगातार होने वाला घुटनों का दर्द शरीर का सिग्नल होता है. वहीं अक्सर लोग इसे नजरअंदाज करते हैं, जिससे मामूली समस्या आगे जाकर गंभीर चोट या सूजन का कारण बन सकती है.



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भारत में डायबिटीज मरीजों के लिए नई उम्मीद, निक जोनस और प्रियंका लाए बियॉन्ड टाइप 1 कैंपेन

भारत में डायबिटीज मरीजों के लिए नई उम्मीद, निक जोनस और प्रियंका लाए बियॉन्ड टाइप 1 कैंपेन


Type 1 Diabetes Awareness India: निक जोनस और प्रियंका चोपड़ा अब भारत में डायबिटीज़ को लेकर एक नई पहल की शुरुआत कर रहे हैं. दुनिया भर में टाइप 1 डायबिटीज को लेकर काम करने वाला निक का गैर-लाभकारी संगठन बियॉन्ड टाइप 1 अब देश में भी जागरूकता बढ़ाने और इससे जुड़ी शर्म, हिचकिचाहट को खत्म करने के लिए अभियान चला रहा है. प्रियंका ने इंस्टाग्राम पर बताया कि वह अपने पति निक जोनस की इस मुहिम को भारत तक लाने पर खुश हैं. बियॉन्ड टाइप 1 का उद्देश्य दुनिया भर के टाइप 1 डायबिटीज मरीजों को एक प्लेटफॉर्म पर लाना है, जहां उन्हें सही जानकारी, संसाधन, समर्थन और बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा मिल सके. 

क्या कहा प्रियंका चोपड़ा ने?

प्रियंका ने लिखा कि उनकी टाइप 1 डायबिटीज़ की समझ निक की मेडिकल जर्नी से ही शुरू हुई। सिर्फ 13 साल की उम्र में निदान होने के बाद निक ने अपनी हालत को मैनेज करते हुए एक ऐसी जिंदगी बनाई जो लोगों को सीमाओं से आगे बढ़ने की ताकत देती है. प्रियंका ने कहा कि निक ने बियॉन्ड टाइप 1 की स्थापना इसलिए की ताकि डायबिटीज से जूझ रहे लोग सम्मान, जानकारी और सपोर्ट हासिल कर सकें.

 

भारत क्यों है इस पहल का बड़ा केंद्र?

दुनियाभर में डाटबिटीज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, भारत उनमें से एक है. WHO के अनुसार भारत में 18 वर्ष से ऊपर करीब 7.7 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं. दुनिया में सबसे ज़्यादा टाइप 1 डायबिटीज वाले युवाओं में भारत दूसरे नंबर पर है, कई मामलों में बीमारी देर से पकड़ में आती है और बच्चे वर्षों तक इसे अकेले झेलते रहते हैं.  इसी अंतर को भरने के लिए बियॉन्ड टाइप 1 भारत में एक  कैंपेन लॉन्च कर रहा है, जिसमें ऐसे लोगों की कहानियां शामिल होंगी जिन्होंने डायबिटीज से लड़ते हुए अपनी जिंदगी में बड़ा बदलाव लाया. इस कैंपेन में शामिल लोग हैं, लेफ्टिनेंट कर्नल कुमार गौरव, मेहरिन राणा, निशांत अमीन, श्रेया जैन, इंदु थंपी और हरिचंद्रन पोनुसामी.

निक जोनस की अपनी जर्नी

निक जोनस को 2002 में, जब वह सिर्फ 13 साल के थे, टाइप 1 डायबिटीज का इलाज हुआ था. शुरुआत में वह खुद को बिल्कुल अकेला महसूस करते थे. बाद में उन्होंने महसूस किया कि उनकी तरह कई लोग हैं जो निदान के बाद आइसोलेशन में चले जाते हैं, जिन्हें किसी सहारे और समझ की जरूरत होती है. इसी अनुभव ने उन्हें बियॉन्ड टाइप 1  शुरू किया. यह एक ऐसा संस्थान है, जिसका उद्देश्य ऐसा माहौल बनाना है, जहां लोग अपनी जर्नी साझा कर सकें, खुलकर बात कर सकें और एक-दूसरे को मजबूत बना सकें.

इसे भी पढ़ें: Preterm Birth Causes: भारत में क्यों बढ़ रहे समय से पहले जन्म के केस? जानें प्रीमैच्योर डिलीवरी की असली वजह

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भारत में क्यों बढ़ रहे समय से पहले जन्म के केस? जानें प्रीमैच्योर डिलीवरी की असली वजह

भारत में क्यों बढ़ रहे समय से पहले जन्म के केस? जानें प्रीमैच्योर डिलीवरी की असली वजह


Why Preterm Births Are Rising: भारत में समय से पहले होने वाली डिलीवरी यानी 37 हफ्तों से पहले बच्चा जन्म लेना एक बड़ी स्वास्थ्य चिंता बन गई है. मेडिकल सुविधाओं में सुधार हुए हैं, लेकिन प्रीमैच्योर बर्थ की संख्या लगातार बढ़ रही है. दुनिया में प्रीटर्म बर्थ की दर 4 प्रतिशत से 15 प्रतिशत के बीच रहती है, जबकि भारत में यह अक्सर 10 प्रतिशत से 15 प्रतिशत तक होती है. बड़ी जनसंख्या और सभी जगह बराबर स्वास्थ्य सुविधाएं न मिलने की वजह से हर साल देश में लगभग 25 से 30 लाख बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है.

क्यों बढ़ रहे प्रीमैच्योर बर्थ?

डॉक्टर बताते हैं कि प्रीमैच्योर बर्थ की एक ही वजह नहीं होती. कई कारक मिलकर जोखिम बढ़ाते हैं, जैसे मां की उम्र, न्यूट्रिशन, बीमारियां, तनाव और गर्भावस्था के बीच का अंतर. रायपुर के जननी केयर अस्पताल की डॉ. दीपा सिंह बताती हैं कि जोखिम गर्भ ठहरने से पहले ही शुरू हो सकता है. भारत में दो ट्रेंड बढ़ रहे हैं. बहुत कम उम्र में गर्भधारण और 35 साल के बाद गर्भधारण. दोनों ही स्थितियों में परेशानी ज्यादा होती है. इसके अलावा, गर्भों के बीच कम अंतर भी शरीर पर अतिरिक्त बोझ डाल देता है और समय से पहले लेबर शुरू हो सकती है.

मां का न्यूट्रिशन प्रीमैच्योर डिलीवरी का सबसे बड़ा कारण है. जिन महिलाओं में एनीमिया, कम बीएमआई या विटामिन की कमी होती है, या जो नियमित प्रेग्नेंसी चेक-अप नहीं करवातीं, उनमें जोखिम काफी बढ़ जाता है. जांचें न करवाने पर कई समस्याएं समय रहते पकड़ में नहीं आतीं, जैसे इंफेक्शन, हाई बीपी, शुगर, थायरॉयड या अचानक बढ़ा वजन. बहुत बार इंफेक्शन समय से पहले लेबर शुरू कर देता है, लेकिन शर्म या जानकारी की कमी के कारण महिलाएं इसे अनदेखा कर देती हैं. इसके अलावा, डायबिटीज, मोटापा, थायरॉयड और हाई बीपी जैसी बीमारियां भी अब युवा महिलाओं में बढ़ रही हैं और जोखिम को और बढ़ाती हैं.

रोकने के लिए जरूरी कदम

प्रीमैच्योर जन्म हर बार रोका नहीं जा सकता, लेकिन समय पर देखभाल से इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है. इसकी शुरुआत लड़की के किशोरावस्था से होती है. सही पोषण, टीकाकरण और प्रजनन स्वास्थ्य की जानकारी बहुत जरूरी है. गर्भधारण से पहले जांच करवाना भी लाभदायक है, एनीमिया ठीक करना, थायरॉयड नियंत्रित करना और इंफेक्शन का इलाज. गर्भावस्था के दौरान नियमित जांचें जरूरी हैं ताकि बीपी, शुगर, बच्चे की ग्रोथ और प्लेसेंटा की स्थिति पर नजर रखी जा सके. आहार में आयरन, फोलिक एसिड, कैल्शियम, प्रोटीन और ओमेगा-3 शामिल करना बेहद जरूरी है. हल्की एक्सरसाइज, प्रीनेटल योग, सही नींद और पर्याप्त पानी शरीर की सेहत और तनाव दोनों को संभालते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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डायबिटीज का इलाज अब सिर्फ 2 घंटे में, AIIMS की नई सर्जरी ने दिखाया कमाल

डायबिटीज का इलाज अब सिर्फ 2 घंटे में, AIIMS की नई सर्जरी ने दिखाया कमाल


अब आप अपनी डायबिटीज (Diabetes) यानी मधुमेह की बीमारी को मात्र दो घंटे की सर्जरी करवाकर ठीक कर सकते हैं. यह दावा है AIIMS के सर्जरी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉक्टर मंजूनाथ का. उन्होंने बताया कि बीते एक साल में 35 मरीजों ने यह सर्जरी करवाई और सभी मरीजों को डायबिटीज (Diabetes) की बीमारी से छुटकारा मिला. सर्जरी कराकर ठीक होने वाले मरीजों में एक सांसद भी शामिल हैं.

मरीजों पर किए गए इस प्रयोग के नतीजे अब चर्चा का विषय बन गए हैं, क्योंकि रिकवरी तेज है और मरीज 24 घंटे के अंदर घर लौट पा रहे हैं. यह तकनीक ऐसे समय में उम्मीद बनकर सामने आई है जब देश में डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है. भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी डायबिटीज आबादी वाले देशों में शामिल है जहां करीब 10 करोड़ लोग शुगर से पीड़ित हैं. गलत खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, तनाव, नींद की कमी, मोटापा और परिवार में बीमारी का इतिहास इसके तेजी से बढ़ने की बड़ी वजहें हैं.

AIIMS की नई सर्जरी में अब तक क्या नतीजे मिले?

  • एम्स (AIIMS) के सर्जन डॉक्टर मंजूनाथ और हॉस्पिटल विभाग का कहना है कि उन्होंने 35 डायबिटीज मरीजों पर एक खास तरह की सर्जरी की जिसके नतीजे बेहद प्रभावी रहे.
  • यह पूरी सर्जरी सिर्फ 2 घंटे में हो जाती है.
  • मरीजों को लंबे समय तक अस्पताल में एडमिट होने की जरूरत नहीं होती. मरीज सिर्फ 24 घंटे के अंदर घर लौट सकते हैं.

यह सर्जरी किन मरीजों के लिए है और किनके लिए नहीं?

डॉक्टरों के अनुसार, यह सर्जरी मोटापे के इलाज के लिए थी लेकिन अब इस सर्जरी से डायबिटीज की बीमारी को भी ठीक किया जा सकता है. एम्स ने स्पष्ट किया है कि यह खास सर्जरी हर डायबिटीज मरीज के लिए नहीं है.

इसे खास तौर पर उन लोगों के लिए डिजाइन किया गया है 

  • बीमारी लंबे समय से है
  • HbA1C लगातार 7.5 से ज्यादा हो
  • तीन दवाओं के बाद भी शुगर कंट्रोल न होता हो

यह सर्जरी उन मरीजों को नहीं करवानी चाहिए

  • जिन्हें डायबिटीज को 15 साल से ज्यादा हो चुके हों
  • जिन्हें 100 यूनिट तक इंसुलिन लेनी पड़ती हो

कैसे होती है सर्जरी?

डॉक्टरों के मुताबिक यह सर्जरी पैनक्रियाज पर नहीं बल्कि पेट और छोटी आंत पर की जाती है. मेटाबोलिक सर्जरी में सबसे पहले पेट का साइज कम करके उसे ट्यूब जैसी शेप दी जाती है. इसकी वजह से शरीर के जिस हिस्से में अलग तरह के हार्मोन बन रहे हैं उसे फूड पाइप में जाने से रोका जाता है. इसके बाद छोटी आंत को इस बदले हुए पेट से इस तरह जोड़ दिया जाता है कि खाना पेट में जाने के बाद डुओडेनम को पार करता हुआ सीधे आगे की आंत में पहुँच जाता है.

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