लगातार बुखार, थकान और हड्डियों में दर्द… बच्चों में दिखें ये लक्षण तो न करें इग्नोर, वरना…

लगातार बुखार, थकान और हड्डियों में दर्द… बच्चों में दिखें ये लक्षण तो न करें इग्नोर, वरना…


What Are The First Signs Of Cancer In A Child: बचपन में होने वाला कैंसर बाकी कैंसर की तुलना में कम दिखता है, लेकिन यह उतना रेयर भी नहीं है जितना आमतौर पर समझ लिया जाता है. भारत में हर साल लगभग 50,000 से 75,000 नए बच्चों के कैंसर के मामले सामने आते हैं, जिनमें ल्यूकेमिया और लिंफोमा प्रमुख हैं. अच्छी बात यह है कि समय पर पहचान और इलाज से 80 प्रतिशत से अधिक बच्चों के ठीक होने की संभावना रहती है. असली चुनौती शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचानने की है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर डॉ. क्या कहते हैं. 

क्या करने की होती है जरूरत?

डॉ. श्रावण कुमार बोडेपुडी, मणिपाल हॉस्पिटल, विजयवाड़ा  बचपन के कई कैंसर बहुत हल्के और सामान्य से लगने वाले लक्षणों के साथ शुरू होते हैं. लंबे समय तक रहने वाला बुखार, लगातार थकान या शरीर पर छोटी-सी गांठ, ये सब अक्सर सामान्य बीमारी समझकर टाल दिए जाते हैं. कई बार सही जांच और इलाज में हफ्तों या महीनों की देरी हो जाती है, खासकर उन इलाकों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं. अगर माता-पिता सतर्क रहें और संकेतों को गंभीरता से लें, तो इलाज जल्दी शुरू किया जा सकता है.

किन लक्षणों पर ध्यान रखने की जरूरत होती है?

डॉ. श्रावण बताते हैं कि अगर कोई लक्षण दो हफ्तों से ज्यादा बना रहे या बार-बार लौटे, तो उसे नजरअंदाज न करें. बिना वजह गर्दन, बगल या पेट में गांठ या सूजन दिखाई देना, बार-बार नाक से खून आना, मसूड़ों से खून आना या त्वचा पर छोटे लाल धब्बे उभरना चेतावनी हो सकते हैं. लगातार बुखार, बार-बार इंफेक्शन, असामान्य थकान, बिना कारण वजन कम होना या भूख न लगना भी संकेत हैं. हड्डियों या जोड़ों में दर्द, जिससे बच्चा लंगड़ाकर चले या रात में दर्द की शिकायत करे, उसे भी गंभीरता से लें. सुबह के समय सिरदर्द के साथ उल्टी, दृष्टि या संतुलन में समस्या, पेट में सूजन या चेहरा पीला पड़ना, ये सब जांच की मांग करते हैं. तस्वीरों में आंखों में सफेद चमक दिखना दुर्लभ आंख के ट्यूमर का संकेत हो सकता है. जरूरी नहीं कि हर लक्षण कैंसर हो, लेकिन इनकी अनदेखी ठीक नहीं.

आपको क्या करना चाहिए?

ल्यूकेमिया में अक्सर बुखार, थकान, पीलापन और आसानी से चोट लगना दिखता है. लिंफोमा में गर्दन या बगल में सख्त और बढ़ती हुई गांठें नजर आती हैं. ब्रेन ट्यूमर सुबह के सिरदर्द और संतुलन की समस्या से जुड़ा हो सकता है, जबकि कुछ ठोस ट्यूमर पेट में सूजन या गांठ के रूप में दिखते हैं. अगर बच्चे के लक्षण बने रहें या बढ़ते जाएं, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें. सामान्य खून की जांच और इमेजिंग से शुरुआती संकेत मिल सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके

हर 8 मिनट में एक जान! साइलेंट किलर है सर्वाइकल कैंसर, जानें इसे रोकने के 5 कारगर तरीके


Why Cervical Cancer Is Common In India: भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं के बीच सबसे गंभीर हेल्थ समस्याओं में से एक है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, देश में हर 8 मिनट में एक महिला की मौत इस बीमारी से होती है. सबसे दुखद बात यह है कि यह उन कैंसरों में से है जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है. डॉ. विश्वनाथ, सीनियर कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट ने TOI को बताया कि सर्वाइकल कैंसर धीरे-धीरे विकसित होता है. कई वर्षों तक सेल्स में बदलाव चुपचाप होता रहता है, जो समय रहते पहचान लिया जाए तो पूरी तरह रोका जा सकता है.  यही इसकी चुनौती भी है और अवसर भी. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे इसको रोका जा सकता है,

HPV वैक्सीन

अधिकांश सर्वाइकल कैंसर के पीछे हाई-रिस्क ह्यूमन पैपिलोमा वायरस जिम्मेदार होता है. एचपीवी वैक्सीन खतरनाक स्ट्रेन्स से बचाव करती है. यह 9 से 14 वर्ष की उम्र में सबसे प्रभावी मानी जाती है, लेकिन 26 वर्ष तक भी दी जा सकती है. जिन देशों ने बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन किया, वहां मामलों में काफी कमी देखी गई है. यह वैक्सीन लाइफस्टाइल नहीं, बल्कि कैंसर से सुरक्षा का कदम है.

रेगुलर स्क्रीनिंग

शुरुआती स्टेप में यह कैंसर कोई स्पष्ट संकेत नहीं देता. पैप स्मीयर, एचपीवी डीएनए टेस्ट या विजुअल इंस्पेक्शन जैसी जांचें सेल्स में होने वाले बदलाव को पहले ही पकड़ सकती हैं. 30 से 65 वर्ष की महिलाओं को डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच करानी चाहिए. सब ठीक लग रहा है सोचकर जांच टालना दिक्कतों को बढ़ा सकता है.

सुरक्षित फिजिकल रिलेशन

एचवीपी मुख्य रूप से यौन संपर्क से फैलता है. कंडोम का नियमित उपयोग इंफेक्शन के खतरे को कम करता है, हालांकि पूरी तरह खत्म नहीं करता. बहुत कम उम्र में यौन सक्रियता और कई पार्टनर्स भी जोखिम बढ़ाते हैं. जागरूकता और खुली बातचीत ही बचाव का रास्ता है.

स्मोकिंग से दूरी

तंबाकू इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है, जिससे शरीर एचपीवी इंफेक्शन को साफ नहीं कर पाता. सिगरेट के हानिकारक रसायन सर्वाइकल म्यूकस में भी पाए गए हैं. स्मोकिंग छोड़ना धीरे-धीरे खतरा कम कर सकता है.

इन संकेतों को नजरअंदाज न करें

पीरियड्स के बीच ब्लीडिंग, संबंध के बाद खून आना, मेनोपॉज के बाद ब्लीडिंग, बदबूभरे डिस्चार्ज या लगातार पेल्विक दर्द जैसे लक्षणों को हल्के में न लें. शुरुआती पहचान होने पर इलाज के परिणाम बेहद बेहतर होते हैं. सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम संभव है, बस जरूरत है जागरूकता, समय पर जांच और सामूहिक सहयोग की. सही जानकारी और समय पर कदम उठाने से इस बड़ी बीमारी से बचा जा सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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30 की उम्र में भूलने लगे हैं छोटी-छोटी बातें, कहीं आपके दिमाग पर ‘ब्रेन फॉग’ तो नहीं छा रहा?

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Why Do I Feel Mentally Slow In My 30s: तीस की उम्र में याददाश्त कम होना आम बात नहीं है.  लेकिन कई लोग एक अलग तरह की परेशानी महसूस कर रहे हैं जैसे कि दिमाग में धुंध-सा छाया रहना, सोचने की रफ्तार धीमी पड़ जाना, मीटिंग में ध्यान न टिक पाना, या बात करते-करते साधारण शब्द भूल जाना. जो काम पहले आसानी से हो जाते थे, अब बोझ जैसे लगते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि यह किन कारणों के चलते हो रहा है और इससे बचाव कैसे किया जा सकता है. 

क्यों होती है इस तरह की दिक्कत?

न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विवेक कुमार ने TOI को बताया कि यह डिमेंशिया नहीं, बल्कि ‘ब्रेन फॉग’ है. इसमें मेंटल थकान, उलझन और एकाग्रता में कमी की दिक्कत का सामना करना पड़ता है.  एक्सपर्ट के अनुसार,  लगातार तनाव, नींद की कमी, पोषण की कमी, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और कुछ मामलों में कोविड के बाद की रिकवरी इसकी बड़ी वजहें हैं. यानी दिमाग जवाब नहीं दे रहा, वह संकेत दे रहा है कि उसे संभालने की जरूरत है.

क्या यह कोई बीमारी है?

ब्रेन फॉग कोई आधिकारिक बीमारी नहीं, बल्कि लक्षणों का मेल है जिसमें मानसिक सुस्ती, छोटी-छोटी बातें भूलना, मल्टीटास्किंग में दिक्कत और दोपहर तक थकावट शामिल होती है. दिमाग शरीर की लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा इस्तेमाल करता है. जब नींद अधूरी हो, तनाव ज्यादा हो या पोषण कम मिले, तो सबसे पहले सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है. ब्रेन बंद नहीं होता, बस लो पावर मोड में चला जाता है.

क्यों होती है इस तरह की दिक्कत?

तीस की उम्र बॉयोलॉजिकल रूप से मेंटल क्षमता का अच्छा दौर माना जाता है, लेकिन लाइफस्टाइल बदल चुकी है. काम का दबाव, आर्थिक जिम्मेदारियां, बच्चों की परवरिश, सोशल मीडिया की तुलना और लगातार डिजिटल एक्सपोजर तनाव बढ़ाते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन बताते हैं कि लंबी कार्य अवधि और कम नींद ध्यान और वर्किंग मेमोरी को कमजोर करती है. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, एक तिहाई एडल्ट पर्याप्त नींद नहीं ले पाते, जबकि नींद के दौरान ही दिमाग खुद को रिपेयर करता है.

आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

पोषक तत्वों की कमी भी अहम कारण हो सकती है. विटामिन B12, विटामिन D3 और आयरन की कमी से एकाग्रता और एनर्जी घटती है. इसके साथ में थकान, झुनझुनी, बाल झड़ना या पीली त्वचा जैसे संकेत मिलें तो ब्लड टेस्ट कराना जरूरी है. नींद, नियमित व्यायाम और पानी की पर्याप्त मात्रा, ये तीन चीजें अक्सर नजरअंदाज होती हैं. रोज 30 मिनट हल्का-फुल्का एक्सराइज ब्लड फ्लो बढ़ाता है और ध्यान सुधारता है. हल्का डिहाइड्रेशन भी फोकस बिगाड़ सकता है. संतुलित आहार और स्क्रीन से दूरी भी मददगार है. अगर भूलने की समस्या रोजमर्रा के काम या नौकरी को प्रभावित करे, या अचानक भ्रम, तेज सिरदर्द, बोलने में दिक्कत जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आपकी भी पेशाब की धार हो गई है कमजोर, जानें ये किस बीमारी के संकेत?

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What Causes Weak Urine Flow In Men: यूरिन करने में देरी होना, धार का कमजोर पड़ जाना या बूंद-बूंद करके पेशाब आना एक सामान्य समस्या नहीं मानी जाती. मेडिकल भाषा में इस स्थिति को यूरिनरी हेजिटेंसी कहा जाता है. इसमें व्यक्ति को पेशाब शुरू करने में समय लगता है और कई बार यूरिन का फ्लो भी बहुत धीमा हो जाता है. यह परेशानी किसी भी उम्र के लोगों में हो सकती है, लेकिन बढ़ती उम्र के पुरुषों में इसके मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं. 

हो सकती है दिक्कत

अक्सर यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ती है. शुरुआत में लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन समय के साथ स्थिति गंभीर हो सकती है. अगर इसका इलाज न कराया जाए तो कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि व्यक्ति यूरिन ही न कर पाए. इस स्थिति को यूरिन रिटेंशन कहा जाता है और इसमें तुरंत इलाज की जरूरत पड़ सकती है. कई लोग कमजोर पेशाब की धार को केवल प्रोस्टेट से जुड़ी समस्या मानते हैं. दरअसल, उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों में प्रोस्टेट का आकार बढ़ सकता है, जिससे पेशाब की धार कमजोर हो जाती है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था Advancedurologyinstitute के अनुसार इसके पीछे और भी कई कारण हो सकते हैं, इसलिए सही वजह जानना जरूरी होता है.

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बढ़ा हुआ प्रोस्टेट

पुरुषों में कमजोर पेशाब की धार का सबसे आम कारण बेनाइन प्रोस्टेट हाइपरप्लासिया  होता है. इसमें प्रोस्टेट ग्लैंड सामान्य से बड़ी हो जाती है. चूंकि यह ग्लैंड यूरीथ्रा के पास होती है, इसलिए इसके बढ़ने पर यूरिन का रास्ता दब सकता है. इससे पेशाब धीरे-धीरे आता है या फ्लो कमजोर हो जाता है. 45 साल से अधिक उम्र के पुरुषों में यह समस्या अधिक देखी जाती है.

अंडरएक्टिव ब्लैडर

कुछ लोगों में मूत्राशय यानी ब्लैडर ठीक तरह से काम नहीं कर पाता. इस स्थिति को अंडरएक्टिव ब्लैडर कहा जाता है. इसमें ब्लैडर पूरी तरह सिकुड़ नहीं पाता, जिससे यूरिन पूरी तरह बाहर नहीं निकलता. मरीज को कई बार यह महसूस ही नहीं होता कि ब्लैडर पूरी तरह भर चुका है. यह समस्या नसों से जुड़ी दिक्कत, डायबिटीज, न्यूरोलॉजिकल बीमारी या रीढ़ की हड्डी से जुड़ी चोट के कारण भी हो सकती है.

ब्लैडर आउटलेट में रुकावट

कभी-कभी यूरीथ्रा के मुहाने या नीचे के हिस्से में किसी तरह की रुकावट बन जाती है. इस स्थिति को ब्लैडर आउटलेट ऑब्स्ट्रक्शन कहा जाता है. इसके कारण यूरिन का रास्ता आंशिक या पूरी तरह से बाधित हो सकता है. यह समस्या ब्लैडर स्टोन, यूरीथ्रा में दाग या ब्लैडर कैंसर जैसी स्थितियों के कारण भी हो सकती है.

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गर्मी शुरू होते ही खाना शुरू कर दीजिए कच्चा प्याज, मिलते हैं गजब के फायदे

गर्मी शुरू होते ही खाना शुरू कर दीजिए कच्चा प्याज, मिलते हैं गजब के फायदे


Benefits Of Eating Raw Onion In Summer: गर्मी का मौसम आते ही तेज धूप और बढ़ता तापमान सेहत पर असर डालने लगता है. ऐसे में लोग ऐसी चीजों की तलाश करते हैं जो शरीर को ठंडा रखने में मदद करें. आमतौर पर माना जाता है कि कच्चा प्याज गर्मियों में लू से बचाव करने और शरीर को ठंडक देने में मदद कर सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि अगर आप गर्मी के मौसम में इसका सेवन करते हैं, तो आपको इससे क्या- क्या फायदा मिलता है.. 

कच्चा प्याज क्यों फायदेमंद माना जाता है

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली  metropolisindia की रिपोर्ट के अनुसार,  कच्चा प्याज कई जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें विटामिन C पाया जाता है, जो शरीर की इम्यूनिटी को मजबूत करने के साथ-साथ त्वचा के लिए भी फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि यह कोलेजन बनने की प्रक्रिया में मदद करता है. इसके अलावा इसमें फोलेट मौजूद होता है, जो सेल्स के निर्माण और डीएनए के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. प्याज में पोटैशियम भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो नसों के काम और ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करता है. साथ ही इसमें मौजूद फाइबर डाइजेशन सिस्टम को बेहतर बनाने में सहायक होता है. प्याज में क्वेरसेटिन जैसे एंटीऑक्सीडेंट भी पाए जाते हैं, जो सूजन को कम करने और हार्ट की सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं.

क्यों खाना चाहिए कच्चा प्याज?

कच्चे प्याज में पानी की मात्रा अच्छी होती है, जिससे गर्म मौसम में शरीर को हाइड्रेट रहने में मदद मिलती है. यह शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है और डिहाइड्रेशन की समस्या से बचाव कर सकता है. इसके साथ ही इसमें कच्चा प्याज अपने कूलिंग प्रभाव के लिए जाना जाता है. इसे खाने से शरीर के तापमान को संतुलित रखने में मदद मिलती है. यह पसीना आने की प्रक्रिया को भी बढ़ावा देता है, जिससे शरीर स्वाभाविक रूप से ठंडा रहता है. इसलिए गर्मियों में इसे सलाद या खाने के साथ साइड डिश के रूप में खाना फायदेमंद माना जाता है.

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इम्यूनिटी और डाइजेशन को बनाता है मजबूत

कच्चे प्याज में मौजूद विटामिन C और क्वेरसेटिन जैसे एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं. ये शरीर की सेल्स को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं और इंफेक्शन के खतरे को कम करने में सहायक हो सकते हैं. कच्चे प्याज में मौजूद फाइबर पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में मदद करता है. इससे कब्ज जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है और आंतों की काम करने का तरीका बेहतर बनी रहती है. इसके अलावा प्याज में पाए जाने वाले कुछ एंजाइम वसा को तोड़ने में भी मदद करते हैं, जिससे खाना आसानी से पच जाता है.

ब्लड शुगर को करता है कंट्रोल

कच्चे प्याज में प्राकृतिक मिठास होती है, लेकिन इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है. इसमें मौजूद कुछ तत्व ब्लड शुगर लेवल को संतुलित रखने में मदद कर सकते हैं. इसलिए डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए भी इसे सीमित मात्रा में डाइट में शामिल करना फायदेमंद माना जाता है.

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क्या मोमोज-चाप खाने से हो जाती है मौत, एक्सपर्ट्स से जानें ये कितने खतरनाक?

क्या मोमोज-चाप खाने से हो जाती है मौत, एक्सपर्ट्स से जानें ये कितने खतरनाक?


Can Eating Momos Cause Choking Death: पंजाब के तरनतारन शहर में एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां संदिग्ध परिस्थितियों में दो सगे भाई-बहनों की मौत हो गई. बताया जा रहा है कि शनिवार शाम सड़क किनारे एक रेहड़ी से खाना खाने के बाद रात में उनकी तबीयत बिगड़ गई थी. रविवार सुबह जब माता-पिता उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे तो डॉक्टरों ने दोनों बच्चों को मृत घोषित कर दिया.

परिवार के अनुसार बच्चों ने शनिवार शाम को एक रेहड़ी वाले से मोमोज और चैंप खाए थे. खाना खाने के कुछ ही समय बाद दोनों को उल्टियां होने लगीं. शुरुआत में घर पर ही उल्टी रोकने की दवा दी गई, जिसके बाद वे सो गए. लेकिन रविवार सुबह जब काफी देर तक बच्चे नहीं जागे तो परिजन घबरा गए और उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. चलिए आपको बताते हैं कि क्या मोमोज खाने से मौत भी हो सकती है.

क्या इससे मौत भी हो सकती है?

Dr. Chandril Chugh, US Trained Adult & Pediatric Neurologist ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करके बताया कि जो लोग मोमोज खाना खूब पसंद करते हैं, उन्हें इससे होने वाली 4 बीमारियों के बारे में पता होना चाहिए. उनके अनुसार इससे फैटी लिवर की दिक्कत होती है, क्योंकि सारा मैदा लिवर में जाता है और बाद में इस तरह की दिक्कत पैदा करता है. दूसरा यह ब्लड प्रेशर और हार्ट डिजीज का भी कारण बनता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जो स्पाइसी चटनी हम इसके साथ खाते हैं, उसमें सोडियम पाई जाती है. वे आगे बताते हैं कि इसके चलते कैंसर की भी दिक्कत हो सकती है. चौथा सबसे बड़ा कारण हार्ट अटैक से होने वाली मौत का है. डॉ. चंद्रिल बताते हैं कि तेल के चलते हार्ट में ब्लॉकेज की समस्या होती है, जिसके चलते आज यंग लोगों में भी हार्ट अटैक से मौत की समस्या बढ़ रही है.

 

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मोमोज खाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

एम्स नई दिल्ली के एक्सपर्ट के अनुसार मोमोज खाते समय सावधानी बेहद जरूरी है. दरअसल, मोमोज की बनावट काफी मुलायम और फिसलन भरी होती है. अगर इन्हें ठीक से चबाए बिना ही निगल लिया जाए तो इनके गले में फंसने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे चोकिंग यानी सांस रुकने की स्थिति बन सकती है और गंभीर मामलों में जान का खतरा भी हो सकता है. यह चेतावनी उस घटना के बाद सामने आई थी, जब एक व्यक्ति मोमोज खाते समय अचानक दुकान पर ही गिर पड़ा था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया कि उसके विंडपाइप के मुहाने पर एक डंपलिंग यानी मोमो फंसा हुआ था. मेडिकल एक्सपर्ट ने माना कि उसकी मौत मोमो के कारण गला घुटने से हुई थी.

हो सकता है नुकसानदायक

एक और अहम बात यह है कि ज्यादातर मोमोज मैदा से बनाए जाते हैं. मैदा दरअसल अनाज का वह हिस्सा होता है जिसमें फाइबर नहीं के बराबर होता है. इसे मुलायम और सफेद बनाने के लिए कई बार रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है. कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसे रसायन लंबे समय तक अधिक मात्रा में सेवन करने पर शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं. यह पैंक्रियास पर असर डाल सकते हैं और शरीर में इंसुलिन बनने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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