सर्दियों में शकरकंद बना सुपरफूड, जानिए दिल से लेकर इम्युनिटी तक शकरकंद के 6 बड़े फायदे
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नाखून की लेयर पर दिखने वाली काली या भूरी सीधी लाइन को मेडिकल भाषा में मेलानोनि किया कहा जाता है. यह लाइन हल्की से लेकर गहरी रंग की हो सकती है और हाथ या पैर के किसी भी नाखून में दिख सकती है. कई बार यह जन्म से होती है और कई बार उम्र के साथ दिखाई देती है.

अक्सर नाखूनों में काली लाइन किसी गंभीर बीमारी की वजह से नहीं होती, इसके पीछे कई सामान्य कारण हो सकते हैं, जैसे नाखून पर चोट लगना, शरीर में पोषण की कमी, कुछ दवाओं का असर, हार्मोनल बदलाव गहरी त्वचा वाले लोगों में यह ज्यादा आम है. इसी वजह से कई लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं.
Published at : 14 Jan 2026 08:10 AM (IST)
भारत में पानी की समस्या हर साल लाखों लोगों की जिंदगी पर असर डालती है. शहरों और गांवों में कई लोग साफ पानी नहीं पी पाते हैं और मजबूरी में गंदा पानी पीना पड़ता है. यही गंदा पानी कई तरह की बीमारियों का मुख्य कारण बनता है. गंदा पानी पीने से पेट, लिवर, किडनी और स्किन जैसी समस्याएं होती हैं. गंभीर मामलों में यह मौत का कारण भी बन सकता है. हमारे देश में पानी जीवन के लिए सबसे जरूरी चीज है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर साल लाखों लोग गंदा या दूषित पानी पीने की वजह से गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं.
भारत में कई जगहों पर लोग आज भी साफ पानी तक नहीं पहुंच पा रहे हैं. यह सिर्फ गांवों की समस्या नहीं है, बल्कि शहरों और मेट्रो शहरों में भी लोग गंदे पानी के कारण बीमार हो रहे हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि गंदा पानी पीने से देश में हर साल कितने लोग बीमार पड़ते हैं और कितनों की मौत होती है.
गंदे पानी से होने वाली आम बीमारियां
गंदा पानी सिर्फ अस्वस्थ महसूस कराने वाला नहीं है. यह गंभीर बीमारियों का भी कारण बन सकता है. इसमें मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और विषैले तत्व हमारे शरीर में प्रवेश करके कई तरह की समस्याएं पैदा करते हैं. जैसे –
1. पेट संबंधी समस्याएं – उल्टी, दस्त, डायरिया, पेट दर्द, हैजा, टाइफाइड जैसी गंभीर बीमारियां.
2. जिगर और लीवर की बीमारियां – हेपेटाइटिस-ए और ई (पीलिया) जैसी समस्याएं.
3. किडनी और गुर्दे की समस्या – गंदे पानी में मौजूद भारी धातुएं जैसे आर्सेनिक, लेड और कैडमियम धीरे-धीरे किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं.
4. स्किन संबंधी समस्या – रैशेज, एलर्जी, सोरायसिस और एक्जिमा जैसी समस्याएं.
5. कैंसर और अन्य गंभीर रोग – दूषित पानी में मौजूद कार्सिनोजेनिक तत्व और टॉक्सिन्स लंबे समय में कैंसर जैसी घातक बीमारियों का कारण बन सकते हैं.
6. न्यूरोलॉजिकल समस्याएं – मेमोरी लॉस, मूड स्विंग्स और अन्य मानसिक परेशानियां भी हो सकती हैं.
गंदा पानी पीने से देश में हर साल कितने लोग पड़ते हैं बीमार
भारत में गंदे पानी की समस्या बहुत बड़ी है. जुलाई 2022 की एक स्टडी के अनुसार, भारत में लगभग 1.95 लाख बस्तियों में लोग दूषित पानी पी रहे हैं. इससे न सिर्फ आम बीमारियां फैलती हैं, बल्कि 2019 में लगभग 23 लाख लोगों की मौत भी इसी वजह से हुई. कम्पोजिट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स (CWMI) की रिपोर्ट बताती है कि हर साल भारत में दूषित पानी पीने से लगभग 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है.अगर इस समस्या को समय पर हल नहीं किया गया, तो 2030 तक लगभग 60 करोड़ लोग पानी की कमी और दूषित पानी की समस्या से जूझ सकते हैं.
गंदा पानी कहां ज्यादा है?
विशेषज्ञों के अनुसार, शहरों के स्लम और कंजेस्टेड इलाके गंदे पानी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. एनसीआर क्षेत्र और दिल्ली-एनसीआर में पानी की सप्लाई खराब होने की वजह से लोग बार-बार बीमार पड़ते हैं.छोटे-छोटे सेक्टरों, कॉलोनियों और अपार्टमेंट में गंदा पानी सप्लाई होने के कारण हर महीने कई सौ लोग अस्पताल जाते हैं.
विशेषज्ञों की चेतावनी
डॉक्टरों का कहना है कि दूषित पानी पीने से बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर भी असर पड़ता है. समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर संक्रमण किडनी और लीवर तक फैल सकता है.विशेषज्ञों ने अधिकारियों से अपील की है कि खराब पाइप लाइन बदल कर और पानी की नियमित जांच कर लोगों को साफ पानी उपलब्ध कराया जाए. ॉ
घर पर सावधानी और ट्रीटमेंट
1. पीने का पानी – हमेशा उबला हुआ या फिल्टर किया हुआ पानी ही पिएं.
2. इलेक्ट्रोलाइट्स – डिहाइड्रेशन से बचने के लिए नींबू पानी, नारियल पानी और ओआरएस का यूज करें.
3. हल्का खाना– उल्टी या दस्त होने पर खिचड़ी, दही-चावल, केला जैसे हल्का खाना लें.
4. अलर्ट रहें – लगातार दस्त, उल्टी, तेज बुखार, पेशाब कम होना या शरीर/आंखों में पीलापन दिखाई दे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.
5.हाइजीन – ताजा और ढका हुआ खाना खाएं, हाथों को अच्छे से धोएं और समय पर टीकाकरण करवाएं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Effects Of Body Shaming On Mental Health: किसी के रंग को लेकर, किसी के शरीर की बनावट को लेकर. यहां तक कि कौन क्या खाता है, कैसे रहता है, क्या बोलता है जैसे तमाम मुद्दे हैं, जिनको लेकर इंसान को ट्रोल होना पड़ता है. यह दिक्कत सालों से चली आ रही है. इसको लेकर आई एक स्टडी में बताया गया है कि युवाओं में बॉडी इमेज को लेकर बढ़ती चिंता मेंटल हेल्थ समस्या बनती जा रही है. यह परेशानी सिर्फ मोटापे से जूझ रहे युवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि कम वजन वाले युवा भी उतनी ही गंभीर मानसिक परेशानी का सामना कर रहे हैं. स्टडी में सामने आया है कि शरीर के वजन के दोनों छोरों पर मौजूद करीब हर दूसरा युवा बॉडी इमेज से जुड़ी मीडियम से गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहा है.
क्या निकला है रिसर्च में?
Journal of Education and Health Promotion में प्रकाशित यह अध्ययन, एम्स–आईसीएमआर के युवा एडल्ट में वजन कंट्रोल पर चल रहे रिसर्च प्रोग्राम का हिस्सा है. इसमें 18 से 30 साल के 1,071 युवाओं को शामिल किया गया, जो एम्स की ओपीडी में इलाज के लिए पहुंचे थे. स्टडी के मुताबिक, 49 प्रतिशत मोटे और 47 प्रतिशत कम वजन वाले युवाओं ने गंभीर बॉडी इमेज चिंता की शिकायत की, जबकि सामान्य या थोड़ा ज्यादा वजन वाले युवाओं में यह आंकड़ा करीब 36 प्रतिशत रहा.
स्टडी में शामिल युवाओं में करीब 25 प्रतिशत मोटापे से पीड़ित और 11 प्रतिशत कम वजन वाले थे. इनमें से ज्यादातर छात्र थे और मध्यम इनकम फैमिली से आते थे. आंकड़ों से पता चला कि कम वजन वाले युवा सामान्य वजन वालों की तुलना में करीब दोगुना, जबकि मोटापे से जूझ रहे युवा लगभग तीन गुना ज्यादा बॉडी इमेज तनाव झेल रहे थे.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
रिसर्च से जुड़े एक्सपर्ट का कहना है कि वजन से जुड़ी समस्याओं का इलाज मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करके संभव नहीं है. मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर और रिसर्च प्रमुख डॉ पियूष रंजन के मुताबिक, “वजन कंट्रोल सिर्फ वजन घटाने तक सीमित नहीं है. अगर इमोशनल समस्याओं पर ध्यान न दिया जाए, तो युवा लाइफस्टाइल प्रोग्राम बीच में ही छोड़ देते हैं. इसलिए पोषण देखभाल के साथ मानसिक जांच को जोड़ना बेहद जरूरी है.” उन्होंने आगे बताया कि सामान्य वजन के लोग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं.
लोग वजन कम करने से पीछे हट जाते हैं
इस स्टडी का नेतृत्व न्यूट्रिशनिस्ट और पीएचडी स्कॉलर वारिशा अनवर ने किया. उन्होंने पाया कि कई युवा वजन घटाने की शुरुआत पूरे जोश के साथ करते हैं, लेकिन समय के साथ मानसिक थकान, बॉडी इमेज की चिंता, पढ़ाई का दबाव और जीवन में बदलाव उन्हें पीछे खींच लेते हैं. इससे भारत में वजन कंट्रोल को लेकर अपनाए जा रहे सिर्फ कैलोरी के नजरिए की कमी साफ झलकती है.
सामाजिक दबाव
रिसर्चर का मानना है कि समाज में मौजूद सुंदर बनने की होड़ मानसिक तनाव को और बढ़ाती है, जिससे युवाओं की प्रेरणा, इलाज से जुड़े रहने की क्षमता और लंबे समय की सेहत प्रभावित होती है. हमारे समाज में लोग लुक और बॉडी टेक्सचर से लोगों को जज करते हैं. यह सिर्फ समाज में ही नहीं, परिवार के अंदर भी इंसान को देखने को मिलता है
क्या होता है बॉडी शेमिंग?
बॉडी शेमिंग का सीधा मतलब है किसी के शरीर को लेकर कोई भी निगेटिव बात कहना. यह आप खुद के लिए भी कर सकते हैं और दूसरों के लिए भी. इसमें किसी के वजन, उम्र, बाल, कपड़े, खाने की पसंद या वो कैसा दिखता है, इन सबका मजाक उड़ाना शामिल है.
आजकल बॉडी शेमिंग हर जगह है. चाहे वह किसी के मोटापे पर मारा गया कोई कमेंट हो या सोशल मीडिया पर दिखने वाली वो “परफेक्ट बॉडी” वाली फोटो, जो असलियत में मुमकिन नहीं होती. ये सब चीजें हमें अपने शरीर को लेकर शर्मिंदा महसूस कराती हैं. चाहे कोई हमें सीधे बोले या किसी और को, यह हमारे मेंटल हेल्थ के लिए बहुत नुकसानदायक है. इससे मन में हीन भावना आती है और हमें लगता है कि हमारी वैल्यू सिर्फ हमारे लुक से है.
बॉडी शेमिंग से जुड़ी परेशानियां
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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SleepFM Health Risk Prediction: पहले आपको किसी भी बीमारी का पता तब चलता था, जब तक आपकी हालत काफी खराब हो चुकी होती थी. लेकिन साइंस के तरक्की के साथ ही अब आपको कौन सी बीमारी कितनी है और फ्यूचर में कौन सी बीमारी हो सकती है, इसका भी पता चल जाता है. ऐसे ही रिसर्चर ने एक ऐसा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल तैयार किया है, जो नींद के डेटा के आधार पर किसी व्यक्ति में भविष्य में होने वाली 130 बीमारियों का खतरा बता सकता है. इस मॉडल का नाम स्लीप एफएम रखा गया है.
यह मॉडल अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी समेत कई संस्थानों के रिसर्चर ने मिलकर बनाया है. इसे करीब 6 लाख घंटे की नींद के डेटा से ट्रेन किया गया, जो 65,000 लोगों से जुटाया गया था. इस रिसर्च के नतीजे मेडिकल जर्नल नेचर मेडिसिन में पब्लिश हुए हैं. चलिए आपको बताते हैं कि यह डिबाइस कैसे काम करती है और कैसे पता चल सकता है कि आपको कौन सी बीमारी भविष्य में होने वाली है.
कैसे काम करता है स्लीप एफएम?
शुरुआत में इस AI सिस्टम को नींद से जुड़ी आम चीजों की पहचान के लिए परखा गया,जैसे नींद के अलग-अलग स्टेज को ट्रैक करना या स्लीप एपनिया की गंभीरता बताना. इसके बाद, नींद के डेटा को मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड से जोड़कर यह देखा गया कि भविष्य में किन बीमारियों का खतरा हो सकता है. रिसर्चर ने बताया कि हेल्थ रिकॉर्ड में मौजूद 1,000 से ज्यादा बीमारियों में से 130 बीमारियों का अनुमान यह मॉडल काफी सटीकता के साथ लगा सका.
नींद में छिपे होते हैं सेहत के अहम संकेत
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्लीप मेडिसिन के प्रोफेसर Emmanuel Mignot के मुताबिक “नींद के दौरान शरीर से बहुत सारे संकेत रिकॉर्ड होते हैं। आठ घंटे तक शरीर की सामान्य गतिविधियों का इतना गहराई से अध्ययन होता है कि डेटा बेहद समृद्ध हो जाता है.”
किस तरह का डेटा लिया जाता है?
नींद की जांच के लिए पॉलीसोम्नोग्राफी का इस्तेमाल किया गया, जिसे स्लीप स्टडी का सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता है. इसमें सेंसर के जरिए-
जैसे कई संकेत रिकॉर्ड किए जाते हैं. स्लीपएफएम इन सभी डेटा स्ट्रीम्स को एक साथ समझकर उनके आपसी संबंधों का एनालिसिस करता है.
AI को ट्रेन करने का नया तरीका
टीम ने AI को ट्रेन करने के लिए ‘leave-one-out’ कंट्रास्टिव लर्निंग नाम की तकनीक अपनाई. इसमें जानबूझकर एक तरह का डेटा छिपा दिया जाता है और AI को बाकी संकेतों के आधार पर उस गायब जानकारी का अंदाजा लगाने की चुनौती दी जाती है. इससे मॉडल की समझ और सटीकता बेहतर होती है.
किन बीमारियों की पहचान में सबसे बेहतर?
रिसर्च में पाया गया कि यह AI खासतौर पर
जैसी तमाम भविष्यवाणी में काफी मजबूत है. कई मामलों में इसका सी- इंडेस्क स्कोर 0.8 से ज्यादा रहा, जो अच्छी भविष्यवाणी को दर्शाता है. रिसर्चर के अनुसार, सिर्फ एक रात की नींद के डेटा से स्लीप एफएम जिन बीमारियों का खतरा बता सका, उनमें शामिल हैं-
इसके अलावा,पार्किंसंस जैसी बीमारियों और बच्चों में विकास से जुड़ी दिक्कतों के जोखिम का अनुमान लगाने में भी यह मॉडल कारगर साबित हुआ. कुल मिलाकर, यह रिसर्च बताती है कि आपकी नींद सिर्फ थकान दूर करने का जरिया नहीं, बल्कि भविष्य की सेहत का आईना भी हो सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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दिल्ली-एनसीआर समेत कई शहरों में बढ़ते प्रदूषण और ठंड के असर ने लोगों की सेहत पर गहरी चोट की है. हालात ऐसे हैं कि अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और सीओपीडी जैसी बीमारियों के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं और इसका सीधा असर दवाइयों की बिक्री पर दिख रहा है. हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2025 में रेस्पिरेटरी दवाइयों की बिक्री 1950 करोड़ रुपये के पार पहुंच गई, जो पिछले तीन वर्षों में सबसे अधिक है.
प्रदूषण और ठंड ने बढ़ाया दवाइयों का कारोबार
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिसंबर 2025 में सांस से जुड़ी दवाइयों की बिक्री दिसंबर 2024 के मुकाबले 10 प्रतिशत और दिसंबर 2023 के मुकाबले 18 प्रतिशत अधिक रही. अक्टूबर से दिसंबर के बीच जब प्रदूषण अपने चरम पर रहता है, उस दौरान बिक्री में 2024 के मुकाबले 14 प्रतिशत और 2023 के मुकाबले 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. एंटी-अस्थमा और सीओपीडी की दवाइयां इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा रहीं.
उम्र बढ़ने के साथ बढ़ता खतरा
एबीपी लाइव की टीम से बात करते हुए आर्टेमिस हॉस्पिटल्स में सांस के रोगों के वरिष्ठ सलाहकार डॉ. अरुण बताते हैं कि अस्थमा जैसी बीमारी आमतौर पर 50 साल से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा देखी जाती है. बचपन में मसल स्ट्रेंथ अधिक होने के कारण स्थिति संभल जाती है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ मसल स्ट्रेंथ घटती है और दिक्कतें बढ़ने लगती हैं. इम्युनिटी कमजोर होने से मौसम बदलने, ठंड और प्रदूषण के कारण समस्या और गंभीर हो जाती है.
युवा पीढ़ी भी चपेट में
डॉ. अरुण के मुताबिक, जो परेशानी पहले बुजुर्गों तक सीमित थी, वह अब युवा पीढ़ी में भी दिखने लगी है. स्मोकिंग की आदतें मेल और फीमेल दोनों में बढ़ रही हैं. इस साल प्रदूषण का स्तर अधिक है और ठंड भी ज्यादा है, जिसकी वजह से सांस से जुड़ी बीमारियों में करीब 10 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है.
दिल्ली की हवा और सिगरेट का खतरनाक मेल
कई रिसर्च और आर्टिकल्स में बताया गया है कि अगर कोई व्यक्ति दिन में एक पैकेट सिगरेट पीता है तो दिल्ली की हवा में सांस लेना 7 से 8 सिगरेट पीने के बराबर है. यानी एक पैकेट सिगरेट पीने के बाद अगर वही व्यक्ति प्रदूषित हवा में सांस लेता है तो असर 17 नहीं बल्कि करीब 70 सिगरेट जितना होता है. 50 की उम्र के बाद लंग फंक्शन वैसे ही कम होता है और स्मोकिंग इसे दोगुनी रफ्तार से नुकसान पहुंचाती है.
बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
हर साल की तरह इस बार भी बच्चे, प्रेग्नेंट महिलाएं और वरिष्ठ नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. इस साल एक नई बात यह सामने आई है कि युवाओं की संख्या भी तेजी से बढ़ी है, जो सांस की समस्या लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं.
अस्थमा मरीजों के लिए डॉक्टरों की सलाह
डॉक्टरों के मुताबिक, जिन लोगों को अस्थमा है, उन्हें सर्दियों में 3 से 4 महीने के लिए ठंडे और प्रदूषित इलाकों से दूर चले जाना चाहिए. गोआ, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे अपेक्षाकृत साफ और गर्म इलाकों में जाना फायदेमंद है. जो लोग लंबे समय तक बाहर नहीं जा सकते, उन्हें नियमित रूप से मास्क पहनने, घर में एक्सरसाइज करने और शाम के समय 4 से 5 बजे के बीच पार्क में हल्की शारीरिक गतिविधि करने की सलाह दी जाती है.
परहेज और दवा में लापरवाही पड़ सकती है भारी
डॉक्टरों के मुताबिक, एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे ड्राई फ्रूट्स, सलाद खाना और पर्याप्त पानी पीना बेहद जरूरी है. दवाइयों में गैप नहीं करना चाहिए, क्योंकि सर्दियों में मेडिकल स्टोर जल्दी बंद हो जाते हैं और रात या सुबह अचानक तबीयत बिगड़ने पर इमरजेंसी की स्थिति बन सकती है.
ब्रोंकाइटिस, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का भी खतरा
प्रदूषण और ठंड की वजह से ब्रोंकाइटिस के मामले तेजी से बढ़े हैं, जिसमें सांस की नली में सूजन आ जाती है और ज्यादा बलगम बनने लगता है. हवा में नमी बढ़ने से वायरस जल्दी फैलता है और एक व्यक्ति से पूरे परिवार में संक्रमण का खतरा रहता है. इस मौसम में स्किन की समस्याएं, स्ट्रोक और हार्ट अटैक के केस भी बढ़ते हैं, क्योंकि शारीरिक गतिविधियां कम हो जाती हैं और क्लॉट बनने की संभावना बढ़ जाती है.
क्या कहते हैं केमिस्ट?
द्वारका के बहुचर्चित एम्पायर केमिस्ट शॉप के ऑनर रोबिन शर्मा बताते हैं कि उनकी 25 साल पुरानी दुकान पर पिछले दो सालों के मुकाबले 2025 में करीब 30 प्रतिशत तक बिक्री बढ़ी है. छोटे बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इसमें शामिल हैं। इस बार सांस की तकलीफ के साथ बुखार के मामले भी ज्यादा आए हैं और कई मरीजों को 15 से 20 दिन तक दवा लेनी पड़ रही है.
इन दवाइयों की सबसे ज्यादा मांग
रोबिन शर्मा के अनुसार ऐक्टोलिन, सेरोफ्लो और एरोकॉट इनहेलर की बिक्री सबसे ज्यादा हुई है. बुडेकॉर्ट और दुएलिन रेसप्यूल्स, मोंटेक एलसी और एसिब्रोहिलाइन की मांग भी तेजी से बढ़ी है. केवल रेस्पिरेटरी दवाइयां ही नहीं, बल्कि एंटीबायोटिक्स और बच्चों के सिरप की खपत में भी भारी इजाफा हुआ है.
खुद से दवा लेना खतरनाक
केमिस्ट और डॉक्टर दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि दवाइयां टॉफी या चॉकलेट नहीं हैं. बिना डॉक्टर की सलाह के दवा लेना नुकसानदेह हो सकता है. एक ही बीमारी होने पर भी परिवार के हर सदस्य को अलग-अलग जांच और दवा की जरूरत होती है. लंबे समय तक दवा लेने से साइड इफेक्ट्स का खतरा रहता है, इसलिए डॉक्टर द्वारा बताए गए समय और मात्रा का ही पालन करना चाहिए.
सरकार और नागरिक, दोनों की जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण को नियंत्रित करना केवल सरकार की नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है. घर में पौधे लगाना, कारपूल करना, गैर-जरूरी इलेक्ट्रिक उपकरणों का कम इस्तेमाल और बच्चों को पेड़ लगाने की आदत डालना छोटे लेकिन प्रभावी कदम हो सकते हैं. स्कूलों और अस्पतालों के आसपास नो-कंबस्शन जोन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना समय की जरूरत है.
सेहत नहीं संभली तो कमाई बेकार
डॉक्टरों की चेतावनी साफ है कि अगर अभी एक्शन नहीं लिया गया तो हम जो पैसा कमाने के लिए भाग रहे हैं, वही पैसा इलाज में खर्च होगा. सर्दियों में हाइड्रेशन बनाए रखना, सही समय पर पार्क जाना और मास्क का नियमित इस्तेमाल ही सबसे बड़ा बचाव है. आखिर में, दवाइयों से ज्यादा आपका परहेज और सतर्कता ही आपको सुरक्षित रख सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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