दिल्ली में पीने के पानी के 40% से ज्यादा सैंपल टेस्ट में फेल, जानें इससे कौन-कौन सी बीमारियां हो सकती हैं?

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दिल्ली में पीने के पानी के 40% से ज्यादा सैंपल टेस्ट में फेल, जानें इससे कौन-कौन सी बीमारियां हो सकती हैं?



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क्या ठीक से काम कर रही है आपकी किडनी, घर में ही ऐसे कर सकते हैं चेक?

क्या ठीक से काम कर रही है आपकी किडनी, घर में ही ऐसे कर सकते हैं चेक?


Early Warning Signs Of Kidney Disease You Should Not Ignore: आजकल किडनी से जुड़ी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. समस्या यह है कि अधिकतर लोगों को तब पता चलता है जब किडनी को काफी नुकसान हो चुका होता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि किडनी की बीमारी अक्सर धीरे-धीरे और बिना किसी क्लियर लक्षण के बढ़ती है. शुरुआती चरण में कई लोगों को बिल्कुल सामान्य महसूस होता है, इसलिए वे इसे पहचान नहीं पाते.

किडनी हमारे शरीर में कई महत्वपूर्ण काम करती ह.। यह खून से गंदगी और विषैले पदार्थों को फिल्टर करती है, शरीर में पानी और मिनरल्स का संतुलन बनाए रखती है, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद करती है और रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में भी भूमिका निभाती है. किडनी के बारे में जानकारी देने वाली संस्था नेशनल किडनी फाउंडेशन के अनुसार, इसके कुछ संकेत पहले से दिखने लगते हैं, जिससे आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं. 

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किडनी की समस्या के अहम संकेत

यूरिन में बदलाव

किडनी की बीमारी का सबसे शुरुआती संकेत यूरिन से जुड़ा बदलाव हो सकता है. पेशाब बार-बार आना, खासकर रात में, या फिर पहले से कम होना भी समस्या का संकेत हो सकता है. कई बार यूरिन का रंग गहरा, झागदार या धुंधला भी दिखाई देता है.

शरीर में सूजन

जब किडनी अतिरिक्त नमक और पानी को बाहर नहीं निकाल पाती, तो शरीर में तरल पदार्थ जमा होने लगता है. इससे पैरों, टखनों, हाथों या चेहरे पर सूजन दिखाई दे सकती है. सुबह-सुबह आंखों के आसपास सूजन भी इसी का संकेत हो सकती है.

लगातार थकान

किडनी ठीक से काम न करे तो खून में विषैले पदार्थ जमा होने लगते हैं, जिससे थकान और कमजोरी महसूस होती है. इसके अलावा किडनी रेड ब्लड सेल्स के निर्माण से जुड़े हार्मोन का उत्पादन भी कम कर देती है, जिससे एनीमिया हो सकता है.

झागदार यूरिन

अगर पेशाब में साबुन जैसे झाग दिखें और वे जल्दी खत्म न हों, तो यह पेशाब में प्रोटीन जाने का संकेत हो सकता है. इसे प्रोटीनयूरिया कहा जाता है और यह किडनी के शुरुआती नुकसान का संकेत हो सकता है.

ये भी होते हैं संकेत

पेशाब में गुलाबी, लाल या भूरे रंग का दिखाई देना गंभीर संकेत हो सकता है. यह किडनी इंफेक्शन, किडनी स्टोन या किडनी को हुए नुकसान की वजह से हो सकता है. इसके साथ ही जब शरीर में विषैले पदार्थ बढ़ने लगते हैं, तो डाइजेशन सिस्टम भी प्रभावित होता है. इससे भूख कम लग सकती है और मुंह में धातु जैसा स्वाद महसूस हो सकता है. खून में टॉक्सिन जमा होने से मतली और उल्टी जैसी परेशानी भी हो सकती है. किडनी शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखती है. जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो मांसपेशियों में बार-बार ऐंठन हो सकती है.

इनको भी न करें इग्नोर

किडनी के खराब होने से शरीर में मिनरल्स का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे त्वचा सूखी और खुजलीदार हो सकती है. इसके साथ ही किडनी की समस्या में लंग्स में अतिरिक्त तरल जमा हो सकता है या एनीमिया के कारण शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती, जिससे सांस लेने में परेशानी हो सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर में आयरन की कमी कैसे दूर करें? डाइट में शामिल करें ये ‘सुपरफूड्स’

शरीर में आयरन की कमी कैसे दूर करें? डाइट में शामिल करें ये ‘सुपरफूड्स’


Best Foods To Increase Haemoglobin Naturally: भारत में कम हीमोग्लोबिन की समस्या काफी आम है और इसकी सबसे बड़ी वजह आयरन की कमी मानी जाती है. अक्सर लोग थकान, हल्की सांस फूलना, चक्कर आना या चेहरे का पीला पड़ना जैसे लक्षणों को सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन ये संकेत शरीर में हीमोग्लोबिन कम होने की ओर इशारा कर सकते हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत में प्रजनन आयु की आधे से अधिक महिलाएं एनीमिया से प्रभावित हैं.

हीमोग्लोबिन रेड ब्लड सेल्स में पाया जाने वाला प्रोटीन है, जो शरीर के हर हिस्से तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है. जब इसकी मात्रा कम हो जाती है तो शरीर के अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती. इससे थकान, सांस फूलना, सिरदर्द, चक्कर और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसी समस्याएं होने लगती हैं. डाइटिशियन वीना वी ने TOI को बताया कि सही खानपान के जरिए शरीर में आयरन की कमी को काफी हद तक सुधारा जा सकता है.

आयरन की कमी क्यों होती है?

आयरन की कमी अचानक नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होती है. अनियमित भोजन, साबुत अनाज की जगह ज्यादा प्रोसेस्ड अनाज खाना, हरी सब्जियों का कम सेवन और आयरन के सही एब्जॉर्ब की कमी इसके मुख्य कारण हैं. पौधों से मिलने वाला आयरन शरीर में आसानी से अब्सॉर्प्शन नहीं हो पाता, इसलिए भोजन के सही संयोजन का ध्यान रखना जरूरी होता है.

आयरन बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ

हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक और चौलाई आयरन, फोलेट और फाइबर से भरपूर होती हैं. इनका सेवन टमाटर या नींबू जैसे विटामिन-C वाले खाद्य पदार्थों के साथ करने से आयरन का अब्सॉर्प्शन बेहतर होता है. दाल और चना भी आयरन और प्रोटीन के अच्छे सोर्स हैं. दाल में टमाटर डालकर पकाना या चने के साथ कच्चा प्याज और नींबू लेना आयरन के अब्सॉर्प्शन को बढ़ा सकता है.

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गुड़ और खजूर भी शरीर को आयरन देने में मदद करते हैं. भोजन के बाद थोड़ा सा गुड़ या सुबह भीगे हुए खजूर खाना फायदेमंद हो सकता है, हालांकि मधुमेह के मरीजों को इसे सीमित मात्रा में लेना चाहिए, इसके अलावा कद्दू के बीज और रागी भी आयरन से भरपूर होते हैं. इन्हें सलाद, दही या रोजमर्रा के भोजन में शामिल किया जा सकता है.

आयरन के अब्सॉर्प्शन का महत्व

आयरन लेना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसका सही तरीके से अब्सॉर्प्शन होना भी है. नींबू, संतरा, अमरूद और टमाटर जैसे विटामिन-C वाले खाद्य पदार्थ आयरन के अब्सॉर्प्शन को बढ़ाते हैं. वहीं भोजन के तुरंत बाद चाय या कॉफी पीने से आयरन का अब्सॉर्प्शन कम हो सकता है, इसलिए कम से कम एक घंटे का अंतर रखना बेहतर माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या नींद में सपना देखकर आप भी चलाते हैं हाथ-पैर? इसे ‘नॉर्मल’ समझकर न करें नजरअंदाज!

क्या नींद में सपना देखकर आप भी चलाते हैं हाथ-पैर? इसे ‘नॉर्मल’ समझकर न करें नजरअंदाज!



Parkinson’s Disease And Sleep Disorder: नींद का समय शरीर के आराम करने और दिमाग के पूरे दिन की जानकारी को व्यवस्थित करने का समय माना जाता है, इस दौरान सपने आना सामान्य बात है. कई बार ये सपने साफ-साफ याद रहते हैं, तो कभी अजीब और धुंधले लगते हैं. लेकिन आमतौर पर सपने सिर्फ दिमाग तक ही सीमित रहते हैं. हालांकि कुछ लोगों के साथ ऐसा नहीं होता. उनके सपनों के साथ-साथ शरीर भी हरकत करने लगता है. कई बार व्यक्ति सोते-सोते चिल्लाने लगता है, हाथ-पैर चलाने लगता है या अचानक बिस्तर से उठ बैठता है. पास में सो रहे लोग रात में अचानक होने वाली इन हरकतों से चौंक सकते हैं. सुबह उठने पर अक्सर ऐसे लोग बताते हैं कि उन्होंने कोई बहुत जीवंत या डरावना सपना देखा था.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉक्टर इस स्थिति को रैपिड स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर कहते हैं. यह एक दुर्लभ लेकिन महत्वपूर्ण नींद से जुड़ी समस्या है, क्योंकि इसमें सोते समय व्यक्ति खुद को या अपने साथी को चोट पहुंचा सकता है. कुछ मामलों में यह दिमाग से जुड़ी अन्य बीमारियों का शुरुआती संकेत भी हो सकता है.  न्यूरोलॉजी के सीनियर कंसल्टेंट और हेड ऑफ एपिलेप्सी सर्विस डॉ. केनी रविश राजीव ने TOI को बताया कि “रैपिड स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर में व्यक्ति सोते समय अपने सपनों को वास्तविक हरकतों में बदल देता है. सामान्य तौर पर REM स्लीप के दौरान ब्रेन शरीर की मांसपेशियों को अस्थायी रूप से निष्क्रिय कर देता है, ताकि हम सपनों के अनुसार हरकत न करें. लेकिन RBD में यह प्रक्रिया सही तरह से काम नहीं करती.”

इसी समय आते हैं सबसे ज्यादा सपने

नींद के कई चरण होते हैं, जिनमें से एक महत्वपूर्ण चरण REM स्लीप होता है. इसी समय दिमाग सबसे ज्यादा सक्रिय होता है और अधिकतर सपने आते हैं. सामान्य स्थिति में इस दौरान शरीर की मांसपेशियां कुछ समय के लिए निष्क्रिय हो जाती हैं. लेकिन RBD में यह सिक्योरिटी पैटर्न काम नहीं करता और व्यक्ति सपने के अनुसार हाथ-पैर चलाने लगता है. ऐसे लोगों में रात के दौरान जोर से बोलना, चिल्लाना, हाथ-पैर मारना या अचानक उठ बैठना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. कई बार वे सपने में खुद को किसी से बचाते या भागते हुए महसूस करते हैं.

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किस उम्र के लोगों को होती है ज्यादा दिक्कत?

रिसर्च के अनुसार यह समस्या खासतौर पर 50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों में ज्यादा देखी जाती है, हालांकि यह किसी भी उम्र में हो सकती है. कुछ मामलों में यह पार्किंसंस जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से भी जुड़ी हो सकती है. इसकी पहचान के लिए डॉक्टर आमतौर पर पॉलिसोमनोग्राफी नाम का स्लीप टेस्ट करते हैं, जिसमें रात भर दिमाग की गतिविधि, मांसपेशियों की हलचल और सांस लेने के पैटर्न को रिकॉर्ड किया जाता है. इलाज में आमतौर पर मेलाटोनिन या क्लोनाजेपाम जैसी दवाओं के साथ-साथ सोने की जगह को सुरक्षित बनाना भी शामिल होता है.

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क्या बढ़ती गर्मी कम कर रही है लड़कों का जन्म? जानें नई स्टडी में हुआ बड़ा दावा

क्या बढ़ती गर्मी कम कर रही है लड़कों का जन्म? जानें नई स्टडी में हुआ बड़ा दावा



How Heat During Pregnancy Affects Baby Gender: प्रेग्नेंसी के दौरान अत्यधिक गर्मी का असर केवल मां की सेहत पर ही नहीं, बल्कि जन्म लेने वाले बच्चों के लिंग अनुपात पर भी पड़ सकता है. हाल ही में हुई एक स्टडी में पाया गया है कि जब गर्भवती महिलाएं गर्भकाल के दौरान अधिक तापमान के संपर्क में रहती हैं, तो लड़कों के जन्म की संभावना कम हो सकती है. यह रिसर्च भारत और सब-सहारा अफ्रीका के डेमोग्राफिक एंड हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के आधार पर किया गया है.

क्या निकला रिसर्च में?

Demography जर्नल में प्रकाशित “Temperature and Sex Ratios at Birth” स्टडी में रिसर्च ने 90 से अधिक सर्वेक्षणों से जुड़े करीब 50 लाख जन्म के आंकड़ों का एनालिसिस किया. इस दौरान स्थानीय तापमान और गर्भावस्था के विभिन्न स्टेप में गर्मी के प्रभाव को समझने की कोशिश की गई. रिसर्च के अनुसार, जिन दिनों अधिकतम तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहता है, उन परिस्थितियों में लड़कों के जन्म की संख्या कम देखी गई. सब-सहारा अफ्रीका में यह प्रभाव प्रेग्नेंसी के पहले ट्राइमेस्टर में ज्यादा दिखाई दिया, जबकि भारत में दूसरे ट्राइमेस्टर के दौरान तापमान बढ़ने से लड़कों के जन्म की संभावना कम पाई गई. खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली अधिक उम्र की महिलाओं में यह प्रभाव अधिक देखा गया.

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लड़कों के जन्म में कब आती है कमी?

स्टडी में यह भी पाया गया कि जब तापमान 25 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है, तो लड़कों के जन्म की संभावना में लगभग 0.014 प्रतिशत अंक की कमी आ सकती है. रिसर्चर का मानना है कि अधिक गर्मी के कारण गर्भावस्था के दौरान होने वाले कुछ प्राकृतिक गर्भपात लड़कों में अधिक हो सकते हैं. चेन्नई स्थित श्री रामचंद्रा इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च की पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. विद्या वेणुगोपाल का कहना है कि यह परिणाम चौंकाने वाले नहीं हैं. उनके अनुसार जब शरीर का तापमान सामान्य से एक या दो डिग्री अधिक बढ़ जाता है, तो यह बुखार जैसी स्थिति बन जाती है. गर्भवती महिलाओं का शरीर पहले से ही अधिक संवेदनशील होता है, इसलिए अत्यधिक गर्मी कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है.

इन चीजों का बढ़ सकता है खतरा

एक्सपर्ट के मुताबिक, ज्यादा गर्मी के कारण गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर, गर्भकालीन मधुमेह, समय से पहले प्रसव और कम वजन वाले बच्चों के जन्म का खतरा बढ़ सकता है. इसी वजह से रिसर्चर ने अपील की है कि हीट वेव से प्रभावित क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं को विशेष रूप से सुरक्षित रखने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं.

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किडनी को रखना है हेल्दी तो आज ही अपना लें ये 8 गोल्डन रूल्स, डॉक्टर की भी नहीं पड़ेगी जरूरत

किडनी को रखना है हेल्दी तो आज ही अपना लें ये 8 गोल्डन रूल्स, डॉक्टर की भी नहीं पड़ेगी जरूरत



How To Protect Your Kidneys From Damage: अक्सर देखा जाता है कि क्रॉनिक बीमारियों के इलाज को कुछ सामान्य टिप्स तक सीमित कर दिया जाता है, जो हर व्यक्ति के लिए कारगर नहीं होते. असल में बीमारी से ज्यादा मरीज का उसके प्रति रवैया और समझ उसके परिणाम को तय करती है. अपोलो हॉस्पिटल, बैनरघट्टा रोड, बेंगलुरु के सीनियर कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. प्रशांत सी. धीरेंद्र के अनुसार किडनी से जुड़ी बीमारियों को समझने और बेहतर तरीके से मैनेज करने के लिए कुछ जरूरी नियमों का पालन करना चाहिए.

अपनी किडनी को समझें

ज्यादातर लोग किडनी के काम और उसके महत्व को सही तरह से नहीं समझते. किडनी शरीर के सबसे कम समझे जाने वाले अंगों में से एक है, जबकि यह शरीर को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाती है. इसलिए हर व्यक्ति को किडनी के कार्य और उसकी देखभाल के बारे में जानकारी रखनी चाहिए.

जानकारी के सही सोर्स पर भरोसा करें

आज इंटरनेट पर स्वास्थ्य से जुड़ी बहुत सारी जानकारी उपलब्ध है, लेकिन हर जानकारी सही हो यह जरूरी नहीं. कई बार पड़ोसी, दोस्त या रिश्तेदार भी बिना एक्सपर्ट के सलाह देने लगते हैं, जो नुकसानदेह हो सकती है. इसलिए किडनी से जुड़ी समस्या होने पर केवल योग्य नेफ्रोलॉजिस्ट की सलाह ही माननी चाहिए.

किडनी फेल होने के प्रमुख कारण जानें

भारत में किडनी फेल होने के दो बड़े कारण डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर हैं. करीब 75 प्रतिशत मरीजों में इन दोनों में से एक या दोनों बीमारियां मौजूद होती हैं. इसलिए जिन लोगों को डायबिटीज या हाई बीपी है, उन्हें साल में कम से कम एक बार किडनी की जांच जरूर करानी चाहिए.

किडनी को शरीर का संतुलन बनाए रखने वाला अंग समझें

किडनी शरीर में केमिकल संतुलन बनाए रखने का काम करती है, जिससे ब्रेन, हार्ट, लंग्स और लिवर जैसे महत्वपूर्ण अंग सही तरह से काम कर पाते हैं. अगर किडनी ठीक से काम न करे तो शरीर में पानी जमा होने लगता है, जो फेफड़ों तक पहुंचकर जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है.

क्रॉनिक किडनी डिजीज का पता चले तो घबराएं नहीं

क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD का मतलब है कि किडनी तीन महीने से अधिक समय तक सामान्य से कम काम कर रही है. यह बीमारी आमतौर पर धीरे-धीरे बढ़ती है, इसलिए समय रहते इलाज और सावधानी से इसे कंट्रोल किया जा सकता है.

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रिपोर्ट्स को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंतित न हों

आजकल कई तरह की मेडिकल जांच उपलब्ध हैं, जिससे लोग अक्सर अपनी रिपोर्ट्स को लेकर परेशान रहने लगते हैं. जांच डॉक्टरों के लिए स्थिति समझने का एक साधन है, लेकिन मरीज के लाइफ की क्वालिटी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है.

इलाज करने वाले डॉक्टर पर भरोसा रखें

कई लोग जल्दी इलाज की उम्मीद में बार-बार डॉक्टर बदलते रहते हैं. लेकिन CKD एक लंबी अवधि की बीमारी है, जिसे सालों तक सही तरीके से मैनेज करना पड़ता है. इसलिए एक भरोसेमंद एक्सपर्ट की सलाह पर टिके रहना जरूरी है.

लाइफ क्वालिटी पर ध्यान रखें

किडनी से जुड़ी बीमारी में सबसे अहम लक्ष्य मरीज की अच्छी लाइफ की क्वालिटी बनाए रखना है. शुरुआती चरण में ब्लड शुगर और बीपी को नियंत्रित रखना, सही खानपान और नियमित जांच काफी मददगार होती है. वहीं गंभीर स्थिति में डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट जैसे उपचार की जरूरत पड़ सकती है. सही जानकारी, समय पर जांच और एक्सपर्ट की सलाह से किडनी से जुड़ी समस्याओं को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है और मरीज लंबे समय तक सामान्य जीवन जी सकता है.

इसे भी पढ़ें- हैवी मील के तुरंत बाद फ्रूट्स खाने चाहिए या नहीं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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