स्टेम सेल थेरेपी से होगा पार्किंसंस का इलाज, जापान ने पहली बार दी इस खास तरीके को मंजूरी

स्टेम सेल थेरेपी से होगा पार्किंसंस का इलाज, जापान ने पहली बार दी इस खास तरीके को मंजूरी


Japan Approves Stem Cell Therapy For Parkinson: जापान ने मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक बड़ा कदम उठाते हुए स्टेम सेल आधारित नई थेरेपी को मंजूरी दे दी है. यह थेरेपी पार्किंसंस रोग और गंभीर हार्ट फेलियर के इलाज के लिए विकसित की गई है. मीडिया रिपोर्ट्स और संबंधित कंपनियों के अनुसार, इन उपचारों को मंजूरी मिलने के बाद उम्मीद है कि आने वाले कुछ महीनों में मरीजों को इसका लाभ मिलना शुरू हो सकता है.

कैसे करेगा काम?

फार्मास्युटिकल कंपनी सुमितोमो फार्मा ने बताया कि उसे अपने पार्किंसंस रोग के इलाज Amchepry के निर्माण और बिक्री की अनुमति मिल गई है. इस उपचार में स्टेम सेल्स को मरीज के दिमाग में ट्रांसप्लांट किया जाता है, जिससे मस्तिष्क में उन सेल्स को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश की जाती है जो बीमारी के कारण नष्ट हो जाती हैं. इसके अलावा जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने रीहार्ट नाम की एक और तकनीक को भी मंजूरी दी है. यह इलाज मेडिकल स्टार्टअप Cuorips ने विकसित किया है, जिसमें हार्ट की मसल्स की विशेष शीट्स तैयार की जाती हैं. ये शीट्स शरीर में नए ब्लड वेसल्स बनने में मदद करती हैं और हार्ट के कामकाज को बेहतर बना सकती हैं.

कब तक आएगा मार्केट में?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये इलाज इस साल गर्मियों तक बाजार में उपलब्ध हो सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो यह दुनिया का पहला कॉमर्शियल चिकित्सा उत्पाद होगा जिसमें सेल्स का इस्तेमाल किया जाएगा. जापान के साइंटिस्ट शिन्या यामानाका को 2012 में इसी तकनीक पर रिसर्च के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था. IPS सेल्स की खासियत यह है कि इन्हें शरीर की किसी भी प्रकार की सेल्स में बदला जा सकता है, जिससे कई बीमारियों के इलाज की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. 

इसे भी पढ़ें- प्रेग्नेंसी में पहले महीने से डिलीवरी तक कैसी होनी चाहिए डाइट, एक्सपर्ट से जानें

मरीजों के लिए राहत

जापान के स्वास्थ्य मंत्री केनइचिरो उएनो ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि यह उपचार न सिर्फ जापान बल्कि दुनिया भर के मरीजों के लिए राहत लेकर आएगा. उन्होंने कहा कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि सभी जरूरी प्रक्रियाएं पूरी कर मरीजों तक यह इलाज जल्द पहुंचाया जाए. Sumitomo Pharma के अनुसार, Amchepry को फिलहाल कंडीशनल और समय-सीमित मंजूरी दी गई है. इसका मतलब है कि इसे एक तरह का अस्थायी लाइसेंस माना जाएगा, ताकि मरीजों तक नई तकनीक जल्दी पहुंच सके. इस मंजूरी के लिए पारंपरिक दवाओं की तरह बड़े क्लिनिकल ट्रायल के बजाय सीमित मरीजों के डेटा के आधार पर सुरक्षा और प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया गया है.

क्या सुरक्षित है यह? 

क्योटो यूनिवर्सिटी के रिसर्चर द्वारा की गई एक स्टडी में इस थेरेपी को सुरक्षित बताया गया. इस परीक्षण में 50 से 69 वर्ष की उम्र के सात पार्किंसंस मरीजों को शामिल किया गया था. मरीजों के ब्रेन में लगभग 5 से 10 मिलियन स्टेम सेल्स ट्रांसप्लांट किए गए. दो साल तक निगरानी के दौरान किसी गंभीर साइड इफेक्ट की जानकारी नहीं मिली और चार मरीजों में लक्षणों में सुधार देखा गया. पार्किंसंस रोग एक पुरानी न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो शरीर की गति को प्रभावित करती है और अक्सर कंपकंपी व चलने-फिरने में कठिनाई का कारण बनती है. दुनिया भर में करीब एक करोड़ लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं.

इसे भी पढ़ें- छोटे बच्चों को काजल लगाना चाहिए या नहीं, क्या कहते हैं डॉक्टर्स

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

क्या 150 साल तक जिंदा रह सकता है इंसान? इस रिसर्च के बाद शुरू हुई बहस

क्या 150 साल तक जिंदा रह सकता है इंसान? इस रिसर्च के बाद शुरू हुई बहस


New Research On Human Lifespan Extension: मानव जीवन को लंबा करने का विचार लंबे समय से साइंटिस्ट को आकर्षित करता रहा है. आधुनिक मेडिकल ने इसमें काफी तरक्की की है, लेकिन साइंटिस्ट अब भी ऐसे तरीकों की तलाश में हैं जिनसे बढ़ती उम्र की प्रक्रिया को धीमा किया जा सके और उम्र से जुड़ी बीमारियों को रोका जा सके. हाल ही में चीन की एक बायोटेक कंपनी ने इस विषय पर नई बहस छेड़ दी है.

 शेन्जेन स्थित स्टार्टअप Lonvi Biosciences का दावा है कि उसने एक ऐसी एक्सपेरिमेंटल गोली विकसित की है, जिसकी मदद से इंसान की उम्र भविष्य में 150 साल तक पहुंच सकती है. कंपनी के अनुसार उनकी रिसर्च शरीर में मौजूद उन हानिकारक सेल्स को हटाने पर केंद्रित है, जो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज करती हैं. सोशल मीडिया और वैज्ञानिक मंचों पर सामने आई रिपोर्ट्स के मुताबिक यह दवा अंगूर के बीज से प्राप्त तत्वों का इस्तेमाल करती है, जो शरीर में मौजूद खास प्रकार की सेल्स को निशाना बनाती हैं. इन कोशिकाओं को आम भाषा में “जॉम्बी सेल्स” कहा जाता है.

जॉम्बी सेल्स किसे कहा जाता है?

साइंस के टर्म  में इन्हें senescent cells कहा जाता है. ये ऐसी सेल्स होती हैं जो क्षतिग्रस्त या बूढ़ी हो चुकी होती हैं और सेल्स विभाजित होना बंद कर देती हैं, लेकिन मरती नहीं हैं. इसके बजाय ये शरीर में बनी रहती हैं और आसपास के  में सूजन पैदा करने वाले रसायन छोड़ती रहती हैं. समय के साथ इन सेल्स का जमाव शरीर में कई समस्याओं को जन्म दे सकता है. साइंटिस्ट का मानना है कि यही सेल्स बढ़ती उम्र के साथ होने वाली बीमारियों जैसे दिल की बीमारी, गठिया और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं में भूमिका निभा सकती हैं.

इसे भी पढ़ें- नाखून बता सकते हैं सेहत का राज, आयरन की कमी से लेकर फेफड़ों की बीमारी तक देते हैं ये संकेत

कैसे काम कर सकती है दवा?

कंपनी का दावा है कि यह गोली अंगूर के बीज से बने यौगिकों की मदद से शरीर में मौजूद इन खराब सेल्स को खत्म करने में मदद कर सकती है. अगर इन सेल्स को कम किया जा सके तो शरीर में होने वाली सूजन और टिश्यू को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है. लंबी उम्र से जुड़ी रिसर्च में साइंटिस्ट पहले से ही senolytics नाम की दवाओं पर काम कर रहे हैं, जिनका उद्देश्य इन बूढ़ी सेल्स को खत्म करना है. शुरुआती प्रयोगों में जानवरों पर इसके कुछ पॉजिटिव परिणाम भी देखने को मिले हैं, जैसे बेहतर शारीरिक क्षमता और उम्र से जुड़ी गिरावट में देरी.

 

दवा आने में लगेगा वक्त

हालांकि साइंटिस्ट का कहना है कि ऐसी किसी भी दवा को इंसानों के लिए सुरक्षित और प्रभावी साबित करने में अभी लंबा समय लग सकता है. किसी भी नई थेरेपी को आम लोगों तक पहुंचने से पहले कई चरणों के क्लिनिकल ट्रायल से गुजरना पड़ता है.

यह भी पढ़ें- पैरों में दिखें ये 7 लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना डैमेज हो जाएगा लिवर

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator





Source link

गर्मी में भारी क्यों लगती है हाई-प्रोटीन डाइट? जानिए हल्के और बेस्ट प्लांट-बेस्ड प्रोटीन ऑप्शन

गर्मी में भारी क्यों लगती है हाई-प्रोटीन डाइट? जानिए हल्के और बेस्ट प्लांट-बेस्ड प्रोटीन ऑप्शन


जैसे-जैसे गर्मी का मौसम करीब आता है, लोगों की खाने की आदतों में अपने-आप बदलाव आने लगता है. सर्दियों में जहां भूख ज्यादा लगती है और लोग भारी खाना भी आसानी से खा लेते हैं, वहीं गर्मियों में पेट जल्दी भर जाता है. बहुत से लोग हल्का खाने लगते हैं, कुछ लोग मील स्किप करने लगते हैं, तो कई लोग सिर्फ सलाद या फल पर निर्भर हो जाते हैं. लेकिन यहां एक बड़ी समस्या प्रोटीन की कमी पैदा हो जाती है. जब लोग खाने की मात्रा कम कर देते हैं, तो अक्सर प्रोटीन भी कम हो जाता है. शुरुआत में शायद इसका असर ज्यादा महसूस न हो, लेकिन कुछ दिनों बाद शरीर संकेत देने लगता है. ऐसे समय में प्लांट-बेस्ड प्रोटीन (पौधों से मिलने वाला प्रोटीन) बहुत उपयोगी साबित हो सकता है. खासकर तब, जब उसे सही तरीके से तैयार करके खाया जाए. तो आइए जानते हैं कि गर्मी में हाई-प्रोटीन डाइट भारी क्यों लगता है. साथ वही हल्के और बेस्ट प्लांट-बेस्ड प्रोटीन ऑप्शन क्या है. 

गर्मी में हाई-प्रोटीन डाइट भारी क्यों लगता है?

गर्मी का असर सिर्फ बाहर के तापमान पर ही नहीं पड़ता, बल्कि शरीर के अंदर की प्रक्रियाओं पर भी पड़ता है. ज्यादा तापमान के कारण कई बार भूख कम हो जाती है, पेट का एसिड थोड़ा कम बनता है, भारी खाना जल्दी असहज लगने लगता है. यही कारण है कि जो खाना सर्दियों में बिल्कुल ठीक लगता था, वही गर्मियों में पेट में भारीपन, गैस या सुस्ती पैदा कर सकता है. प्रोटीन ऐसा पोषक तत्व है जिसे पचाने के लिए शरीर को थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.अगर यह प्रोटीन भारी दालों या ठीक से तैयार न किए गए पौधों के स्रोतों से लिया जाए, तो आंतों पर और ज्यादा दबाव पड़ सकता है. इसका मतलब यह नहीं है कि प्लांट प्रोटीन खराब है. असल बात यह है कि मौसम और खाने के तरीके के बीच संतुलन जरूरी होता है. 

यह भी पढ़ें- प्रेग्नेंसी में पहले महीने से डिलीवरी तक कैसी होनी चाहिए डाइट, एक्सपर्ट से जानें

हल्के और बेस्ट प्लांट-बेस्ड प्रोटीन ऑप्शन क्या है?

1. किण्वित दाल का घोल (Fermented batters) –  डोसा, इडली या दाल के चीले के लिए इस्तेमाल होने वाला फर्मेंटेड बेटर गर्मियों में बहुत अच्छा ऑप्शन है. ये पचाने में आसान, पोषक तत्वों का बेहतर अवशोषण, पेट पर हल्का रखता है. फर्मेंटेशन की प्रक्रिया दालों में मौजूद कुछ ऐसे तत्वों को कम कर देती है जो पाचन में बाधा डालते हैं.

2. टोफू – टोफू सोयाबीन से बना एक हल्का और हाई क्वालिटी वाला प्रोटीन स्रोत है. इसे आप कई तरह से खा सकते हैं. जैसे हल्का सा भूनकर, सब्जी में डालकर, सलाद में मिलाकर. यह पेट को ज्यादा भारी महसूस कराए बिना अच्छा प्रोटीन प्रदान करता है. 

3. टेम्पेह – टेम्पेह भी सोयाबीन से बना होता है, लेकिन यह फर्मेंटेड होता है. इसी वजह से इसे पचाना सामान्य सोयाबीन की तुलना में आसान होता है. भारत में अभी यह बहुत आम नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे इसका उपयोग बढ़ रहा है. 

4. सत्तू ड्रिंक – सत्तू गर्मियों का पारंपरिक सुपरफूड माना जाता है. सत्तू ठंडक देता है, प्रोटीन से भरपूर होता है और जल्दी पच जाता है. नमकीन या मीठा सत्तू का ड्रिंक गर्मियों में एक शानदार प्रोटीन ऑप्शन हो सकता है. 
 
5. मूंग दाल के विकल्प – मूंग दाल गर्मियों में सबसे हल्की दालों में से एक मानी जाती है.  इसे कई तरह से लिया जा सकता है. जैसे मूंग दाल का चीला, मूंग दाल का सूप, अंकुरित मूंग. ये सभी पेट के लिए हल्के और पोषण से भरपूर होते हैं. 

गर्मियों में प्लांट प्रोटीन लेने के आसान तरीके

भारतीय रसोई में कुछ साधारण तकनीकें हैं जो प्रोटीन को ज्यादा पचाने वाला बना सकती हैं. जिसमें दालों और बीजों को कुछ घंटों तक भिगोने से पाचन आसान हो जाता है. डोसा या इडली का घोल फॉर्मेट करने से पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर होता है. अच्छी तरह पकाई गई दालें पेट के लिए हल्की होती हैं. जीरा, हींग, अदरक और सौंफ जैसे मसाले पाचन में मदद करते हैं, एक ही समय में ज्यादा प्रोटीन लेने के बजाय इसे अलग-अलग मील में लेना ज्यादा फायदेमंद होता है. 

यह भी पढ़ें- छोटे बच्चों को काजल लगाना चाहिए या नहीं, क्या कहते हैं डॉक्टर्स

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

डिमेंशिया से जूझते पेरेंट्स के लिए जरूरी तैयारी, जानें परिवारों के लिए सही गाइड क्या है?

डिमेंशिया से जूझते पेरेंट्स के लिए जरूरी तैयारी, जानें परिवारों के लिए सही गाइड क्या है?


जब कोई परिवार का सदस्य डिमेंशिया जैसी बीमारी से जूझता है, तो यह सिर्फ मरीज के लिए ही चुनौती नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार के लिए इमोशनल और फिजिकल रूप से थकाने वाला एक्सपीरियंस बन जाता है. परिवार के सदस्य अक्सर केयर टेकर की भूमिका निभाते हैं और यह जिम्मेदारी समय के साथ बढ़ती जाती है. डिमेंशिया कोई एक बीमारी नहीं है. यह दिमाग में तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली कई स्थितियों का समूह है. इसका असर स्मृति, सोचने समझने की क्षमता, बातचीत और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता पर पड़ता है. यह धीरे-धीरे बढ़ती है और इसके अलग-अलग चरण होते हैं जो परिवार समय से इस बीमारी को समझते हैं और तैयारी करते हैं. तो आइए जानते हैं कि डिमेंशिया से जूझते पेरेंट्स के लिए जरूरी तैयारी कैसे करें और परिवारों के लिए सही गाइड क्या है. 

डिमेंशिया के स्टेज

1. प्रारंभिक स्टेज – शुरुआत में लक्षण हल्के होते हैं. मरीज हाल ही की बातें भूल सकते हैं, चीजें रख-रखाव में गड़बड़ी कर सकते हैं या योजनाएं बनाने में मुश्किल महसूस कर सकते हैं.इस समय उन्हें थोड़ी मदद या याद दिलाने की जरूरत होती है.

2. मध्यम स्टेज – जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, स्मृति हानि साफ दिखने लगती है. मरीज समय, दिन या स्थान को लेकर भ्रमित हो सकते हैं, परिचित लोगों को पहचानने में कठिनाई हो सकती है और रोजमर्रा के कामों में सहायता की जरूरत होती है.

3. अंतिम स्टेज – इस स्टेज में मरीज को लगभग हर समय देखभाल की जरूरत होती है. उन्हें बातचीत करने, बुनियादी काम करने या अपने परिवार वालों को पहचानने में कठिनाई हो सकती है. 
 
डिमेंशिया से जूझते पेरेंट्स के लिए जरूरी तैयारी कैसे करें

डिमेंशिया के मरीजों के लिए घर का वातावरण बहुत मायने रखता है. कुछ छोटे बदलाव उन्हें सुरक्षित और आरामदायक महसूस करा सकते हैं. जैसे  रोजाना का एक समान कार्यक्रम भ्रम और चिंता को कम करता है. शांति से बात करना, छोटे वाक्य प्रयोग करें और जवाब देने के लिए पर्याप्त समय दें. मरीज कभी-कभी कुछ करना चाहते हैं जो संभव नहीं है. बहस करने की बजाय ध्यान दूसरी ओर मोड़ें.  कोई यात्रा करने की जिद करता है, सीधे नहीं कहने की बजाय उन्हें किसी और एक्टिविटी में लगाएं. मरीजों के साथ बहस करना, चिल्लाना या उन्हें समझाने की कोशिश करना स्थिति को और खराब कर सकता है. 

यह भी पढ़ें – प्रेग्नेंसी में पहले महीने से डिलीवरी तक कैसी होनी चाहिए डाइट, एक्सपर्ट से जानें

परिवारों के लिए सही गाइड क्या है?

डिमेंशिया से पीड़ित माता-पिता की देखभाल अक्सर लंबी जिम्मेदारी बन जाती है.  परिवारों को इस यात्रा के लिए इमोशनल  और व्यावहारिक रूप से तैयार रहना चाहिए.  जिसमें वित्तीय तैयारी देखभाल की लागत का आकलन करें. बीमारी के बढ़ने के पैटर्न को समझें. घर आधारित मदद, डे-केयर और मेमोरी केयर सुविधाओं को जानें. प्रशिक्षित केयर टेकर की मदद लें और शिक्षा कार्यक्रमों में भाग लें. 

यह भी पढ़ें – हैवी मील के तुरंत बाद फ्रूट्स खाने चाहिए या नहीं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
 
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

नाखून बता सकते हैं सेहत का राज, आयरन की कमी से लेकर फेफड़ों की बीमारी तक देते हैं ये संकेत

नाखून बता सकते हैं सेहत का राज, आयरन की कमी से लेकर फेफड़ों की बीमारी तक देते हैं ये संकेत


हाथ और नाखून न सिर्फ हमारी पर्सनैलिटी और मैनर्स  का प्रतीक हैं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य के बारे में भी कई अहम बातें बताते हैं.अक्सर लोग नाखूनों को सिर्फ सुंदरता के लिए देखते हैं, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि नाखून शरीर की अंदरूनी स्थिति के संकेत देने वाले छोटे मेसेंजर होते हैं. नाखून लगभग 3 मिलीमीटर प्रति माह की धीमी दर से बढ़ते हैं. इस धीमी वृद्धि के कारण, नाखून समय के साथ शरीर में हो रहे सूक्ष्म बदलावों को रिकॉर्ड करते हैं. अगर नाखूनों का रंग, आकार, मोटाई या बनावट बदलती है, तो यह कभी-कभी किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है.

नाखूनों पर ध्यान क्यों जरूरी है?

स्किन विशेषज्ञ बताते हैं कि नाखूनों में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज करना सही नहीं है. उनके अनुसार, नाखूनों का रंग, बनावट और आकार कई बार शरीर की गंभीर बीमारियों के संकेत दे सकते हैं. जैसे पीले या चम्मच जैसे नाखून आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया का संकेत हो सकते हैं, पीले और मोटे नाखून  फंगल संक्रमण या फेफड़ों से जुड़ी समस्याओं की ओर इशारा कर सकते हैं. नाखूनों पर गहरे धब्बे या रंग बदलना  कुछ मामलों में यह स्किन कैंसर जैसे गंभीर रोग का संकेत भी हो सकता है. अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (NIH) के अनुसार, नाखूनों में बदलाव पोषण की कमी,  हार्ट डिजीज, फेफड़ों की बीमारियां और मेटाबॉलिक से जुड़ी स्थितियों को दर्शा सकते हैं. 

यह भी पढ़ें- Microplastics And Cancer: युवाओं में अचानक क्यों बढ़ रहे कोलन कैंसर के मामले? इस स्टडी में सामने आए खतरनाक कारण

आयरन की कमी से लेकर फेफड़ों की बीमारी तक देते हैं ये संकेत

1. आयरन की कमी का संकेत – आयरन शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने में मदद करता है. जब आयरन की कमी होती है, तो शरीर एनर्जी बचाने लगता है. नाखून जो केराटिन से बने होते हैं और अच्छे ब्लड फ्लो पर निर्भर करते हैं, वे सबसे पहले इस कमी का संकेत दिखाते हैं. आयरन की कमी के कारण नाखून पीले रंग के हो सकते हैं, पतले या कमजोर हो सकते हैं, कभी-कभी अंदर की ओर मुड़कर चम्मच जैसा आकार ले सकते हैं. आयरन की कमी पूरी करने से नाखून धीरे-धीरे सामान्य आकार और मजबूती में लौट आते हैं. 

2. फेफड़ों और संक्रमण से जुड़े संकेत – नाखून का पीला और मोटा होना अक्सर फंगल संक्रमण की ओर इशारा करता है. अगर पीले नाखून लंबे समय तक रहते हैं और सांस लेने में समस्या या सूजन भी हो, तो यह येलो नेल सिंड्रोम जैसी दुर्लभ स्थिति की ओर संकेत कर सकता है.  येलो नेल सिंड्रोम फेफड़ों की पुरानी समस्याओं जैसे ब्रोंकिएक्टेसिस या प्लूरल रोग से जुड़ा हो सकता है. इसका मतलब यह नहीं कि हर पीला नाखून फेफड़ों की बीमारी का संकेत है, लेकिन लगातार बदलाव होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. 

3.  नाखून पर गहरे धब्बे या रंग बदलना – कभी-कभी नाखून पर दिखाई देने वाली पतली या गहरी रेखाएं हानिरहित होती हैं, लेकिन कुछ रेखाएं मेलानोन किया या नाखून के नीचे के कैंसर (subungual melanoma) का संकेत भी हो सकती हैं.

4. नाखून का आकार बदलना – नाखूनों का गोल या गुंबद जैसा आकार लेना (क्लबिंग) अक्सर लंबे समय तक रक्त में ऑक्सीजन की कमी का संकेत देता है. यह जन्मजात हार्ट डिजीज, क्रॉनिक फेफड़ों की बीमारियों या सूजन आंत्र रोग से जुड़ा हो सकता है. 

5. कमजोर या धारीदार नाखून – नाखूनों पर खड़ी धारियां, कमजोरी या आसानी से टूटना अक्सर पोषण की कमी, थायराइड विकार या लंबे समय के तनाव का संकेत दे सकते हैं. बायोटिन, जिंक, आयरन और प्रोटीन की कमी से नाखून कमजोर हो सकते हैं. 

यह भी पढ़ें- पैरों में दिखें ये 7 लक्षण तो तुरंत भागें डॉक्टर के पास, वरना डैमेज हो जाएगा लिवर

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

हैवी मील के तुरंत बाद फ्रूट्स खाने चाहिए या नहीं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

हैवी मील के तुरंत बाद फ्रूट्स खाने चाहिए या नहीं, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?


हालांकि कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि क्या खाना खाने के तुरंत बाद फल खाना सही है या नहीं. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं की हैवी मिल के तुरंत बाद फ्रूट्स खाने चाहिए या नहीं और इसे लेकर एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं.

कई लोग भारी खाना खाने के बाद फल को मिठाई की तरह खा लेते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसा करना हर किसी के लिए सही नहीं होता है. फल में मौजूद नेचुरल शुगर और फाइबर जल्दी पर पच जाते हैं, जबकि भारी भोजन में मौजूद प्रोटीन और वसा को पचाने में ज्यादा समय लगता है.

कई लोग भारी खाना खाने के बाद फल को मिठाई की तरह खा लेते हैं. लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसा करना हर किसी के लिए सही नहीं होता है. फल में मौजूद नेचुरल शुगर और फाइबर जल्दी पर पच जाते हैं, जबकि भारी भोजन में मौजूद प्रोटीन और वसा को पचाने में ज्यादा समय लगता है.

Published at : 07 Mar 2026 06:16 PM (IST)

हेल्थ फोटो गैलरी



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp