सावधान! क्या आपको भी खाने के बाद महसूस होता है पेट में भारीपन? इस बीमारी के हो सकते हैं लक्षण

सावधान! क्या आपको भी खाने के बाद महसूस होता है पेट में भारीपन? इस बीमारी के हो सकते हैं लक्षण


Early Stomach Symptoms Of Fatty Liver Disease: फैटी लिवर डिजीज, जिसे अब MASLD कहा जाता है, अक्सर बहुत हल्के और नजरअंदाज़ होने वाले पेट से जुड़े लक्षणों के साथ सामने आती है. कई बार तो ब्लड टेस्ट या स्कैन में कोई गड़बड़ी दिखने से पहले ही शरीर संकेत देने लगता है. वर्ल्ड जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक, पेट फूलना, बेचैनी और ऊपरी पेट में भारीपन जैसे लक्षण इस बात का इशारा हो सकते हैं कि लिवर पर पहले से ही दबाव पड़ रहा है और उसका मेटाबॉलिज्म प्रभावित होने लगा है.

मेडिकल भाषा में फैटी लिवर को पहले नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज कहा जाता था, जिसे अब मेटाबॉलिक डिसफंक्शन एसोसिएटेड स्टीएटोटिक लिवर डिजीज  कहा जा रहा है. यह बीमारी काफी आम है, लेकिन अक्सर समय पर पहचान में नहीं आ पाती. शुरुआत में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं और ज्यादातर पेट या पाचन से जुड़े रहते हैं, इसलिए लोग इन्हें सामान्य गैस या अपच समझकर टाल देते हैं.

क्या निकला रिसर्च में?

रिसर्च बताती है कि फैटी लिवर के शुरुआती संकेत अक्सर पेट में ही दिखाई देते हैं. अध्ययन में पाया गया कि कई मरीजों को ब्लड रिपोर्ट या अल्ट्रासाउंड नॉर्मल होने के बावजूद पेट फूलना, मतली और दाईं ओर ऊपरी पेट में असहजता महसूस होती है। ये संकेत बताते हैं कि लिवर का पाचन और पोषक तत्वों को प्रोसेस करने वाला काम प्रभावित होने लगा है. फैटी लिवर तब होता है जब लिवर में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा होने लगती है, जो अक्सर शराब से जुड़ी नहीं होती. जैसे-जैसे यह चर्बी बढ़ती है, लिवर सूज सकता है या उसमें हल्की सूजन आ सकती है, जिससे पेट के ऊपरी हिस्से में परेशानी महसूस होने लगती है.

पेट की दिक्कत में छिपे होते हैं संकेत

अक्सर लोग सोचते हैं कि लिवर की बीमारी में सिर्फ पीलिया जैसे साफ लक्षण दिखते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि शुरुआती संकेत पेट में ही छिपे होते हैं, सबसे आम लक्षण है पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में हल्का लेकिन लगातार दर्द या दबाव महसूस होना, कई लोगों को ऐसा लगता है जैसे पेट के अंदर कुछ भारी-सा दब रहा हो, खासकर करवट लेने पर.फैटी लिवर वाले लोगों में पेट फूलने और जल्दी भरा-भरा महसूस होने की शिकायत भी आम है. हल्का सा खाने के बाद भी पेट भरा हुआ लग सकता है, गैस बन सकती है और कभी-कभी पेट हल्का फूला हुआ दिखने लगता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लिवर पाचन प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है और जब वह ठीक से काम नहीं करता, तो पाचन धीमा पड़ जाता है.

मतली और अपच भी फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं. कई लोगों को तला-भुना या भारी खाना खाने के बाद उलझन, जी मिचलाना या पेट में जलन महसूस होती है, ये लक्षण अक्सर आते-जाते रहते हैं और खराब डाइट, ज्यादा खाने या फिजिकल एक्टिविटी की कमी से बढ़ सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर पेट से जुड़े इन शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो फैटी लिवर को गंभीर स्टेज जैसे फाइब्रोसिस या सिरोसिस तक बढ़ने से रोका जा सकता है. सही खानपान, नियमित एक्सरसाइज, प्रोसेस्ड फूड से दूरी और समय पर डॉक्टर से सलाह लेने से लिवर की सेहत को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या बार-बार ब्लड प्रेशर चेक करने से जल्दी बीमार पड़ते हैं आप, जान लें क्या कहते हैं डॉक्टर?

क्या बार-बार ब्लड प्रेशर चेक करने से जल्दी बीमार पड़ते हैं आप, जान लें क्या कहते हैं डॉक्टर?


Is It Bad To Check Blood Pressure Frequently: कई लोग बार-बार अपना ब्लड प्रेशर चेक करते रहते हैं, लेकिन सवाल यह है कि कितनी बार जांच करना ठीक है और कब यह आदत नुकसानदेह हो सकती है. यही सवाल हाल ही में क्वोरा पर भी सामने आया क्या बार-बार ब्लड प्रेशर चेक करना गलत है? इसको लेकर इंडियन एक्सप्रेस से जुबिटर हॉस्पिटल, ठाणे में इंटरनल मेडिसिन के डायरेक्टर डॉक्टर अमित सराफ ने बात की. उन्होंने बताया कि नियमित रूप से ब्लड प्रेशर मापना अपने आप में नुकसानदेह नहीं है, लेकिन इसे किस तरह और किस वजह से किया जा रहा है, यह ज्यादा मायने रखता है. कुछ लोगों के लिए बार-बार मापने से तसल्ली मिलती है और बीमारी को संभालने में मदद मिलती है, जबकि कुछ लोगों में यही आदत चिंता बढ़ा देती है, जिससे रीडिंग भी अस्थायी रूप से ज्यादा आ सकती है.

कब नहीं होता है यह फायदेमंद?

डॉक्टर के मुताबिक, समस्या तब शुरू होती है जब लोग बिना डॉक्टर की सलाह के दिन में कई बार ब्लड प्रेशर मापने लगते हैं. हर तनावपूर्ण स्थिति, हर खाने के बाद या हल्के-फुल्के लक्षणों पर तुरंत मशीन निकाल लेना फायदेमंद नहीं होता. ऐसा करने से मेजरमेंट एंग्जायटी हो सकती है, यानी रीडिंग को लेकर तनाव इतना बढ़ जाता है कि ब्लड प्रेशर अस्थायी रूप से बढ़ा हुआ दिखने लगता है. यह जरूरी नहीं कि व्यक्ति का असली ब्लड प्रेशर हाई हो, कई बार यह सिर्फ मानसिक तनाव का असर होता है.

होम ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग उन लोगों के लिए ज्यादा उपयोगी मानी जाती है, जिन्हें पहले से हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है, जो ब्लड प्रेशर की दवाइयां ले रहे हैं, खासतौर पर तब, जब हाल ही में दवा की डोज बदली गई हो या फिर जिन्हें डायबिटीज, किडनी की बीमारी या दिल से जुड़ी समस्याएं हों. वहीं, जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर नहीं है और जो सामान्य तौर पर स्वस्थ हैं, उनके लिए रोज़ाना ब्लड प्रेशर चेक करना जरूरी नहीं होता.

कब मापना चाहिए ब्लड प्रेशर?

अगर जांच की सही फ्रीक्वेंसी की बात करें, तो डॉक्टर बताते हैं कि ज्यादातर हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए कुछ दिनों तक सुबह और शाम एक-एक बार ब्लड प्रेशर मापना पर्याप्त होता है, वह भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार. लंबे समय में हफ्ते में कुछ बार या डॉक्टर से मिलने से पहले रीडिंग लेना काफी माना जाता है. इसके अलावा, अगर लगातार सिरदर्द, चक्कर, सीने में भारीपन, असामान्य थकान या दिल की धड़कन तेज महसूस हो, तो उस समय ब्लड प्रेशर जांचना मददगार हो सकता है. इससे डॉक्टर को यह समझने में आसानी होती है कि रीडिंग का मरीज की मौजूदा स्थिति से क्या संबंध है.

किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए?

घर पर ब्लड प्रेशर मापते समय सटीकता का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. मापने से पहले कम से कम पांच मिनट तक शांति से बैठना चाहिए. जांच से आधे घंटे पहले कैफीन, धूम्रपान या एक्सरसाइज से बचना बेहतर होता है. हाथ को दिल के स्तर पर सहारा देकर रखना चाहिए और भरोसेमंद डिजिटल ब्लड प्रेशर मशीन का इस्तेमाल करना चाहिए. बेहतर नतीजों के लिए दो रीडिंग लेकर उनका औसत नोट करना सही रहता है. डॉक्टर कहते हैं कि समझदारी से किया गया ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग डॉक्टरों को सही फैसले लेने में मदद करता है, लेकिन अगर यह आदत जरूरत से ज्यादा और बिना कारण की हो जाए, तो यह उलझन और तनाव ही बढ़ाती है. मकसद जागरूक रहना होना चाहिए, घबराना नहीं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ये 7 लक्षण नजर आएं तो समझ लें अनकंट्रोल हो रहा डायबिटीज, डॉक्टर को तुरंत करें कॉल

ये 7 लक्षण नजर आएं तो समझ लें अनकंट्रोल हो रहा डायबिटीज, डॉक्टर को तुरंत करें कॉल


Warning Signs Of High Blood Sugar On Skin: डायबिटीज दुनिया भर में सबसे आम क्रॉनिक मेटाबॉलिक बीमारियों में से एक है. यह न सिर्फ रोजमर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करती है, बल्कि लंबे समय में गंभीर परेशानियों का कारण भी बन सकती है. हाई ब्लड शुगर के संकेत कई बार त्वचा पर साफ दिखाई देने लगते हैं. इन लक्षणों को समय पर पहचान लेना जरूरी है, ताकि बीमारी के गंभीर रूप लेने से पहले इलाज शुरू किया जा सके. चलिए जानते हैं डायबिटीज से जुड़े ऐसे 7 स्किन संकेत, जो अनकंट्रोल्ड शुगर की ओर इशारा करते हैं.

शिन स्पॉट्स

शिन स्पॉट्स या डायबिटिक डर्मोपैथी, डायबिटीज से जुड़ी सबसे आम त्वचा समस्याओं में से एक है. इसे स्पॉटेड लेग सिंड्रोम भी कहा जाता है. ये गोल या अंडाकार धब्बे होते हैं, जिनका रंग भूरा या लाल-भूरा हो सकता है. आमतौर पर ये नुकसानदेह नहीं होते, लेकिन इनका दिखना ब्लड शुगर जांच की ज़रूरत का संकेत देता है. दर्द या खुजली न होने की वजह से कई लोग इन्हें उम्र के धब्बे समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.

 त्वचा का सख्त या मोटा होना

लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर रहने से त्वचा में कोलेजन का असामान्य जमाव हो सकता है, जिससे स्किन की इलास्टिसिटी कम हो जाती है और त्वचा मोटी लगने लगती है. इस स्थिति को मेडिकल भाषा में स्क्लेरिडेमा डायबिटिकोरम कहा जाता है. यह आमतौर पर गर्दन, कंधों या ऊपरी पीठ पर दिखती है. यह बिना दर्द के होती है और ज्यादातर कॉस्मेटिक समस्या मानी जाती है.

खुले घाव और जख्म

डायबिटीज शरीर की घाव भरने की क्षमता को प्रभावित करती है. लंबे समय तक हाई शुगर से ब्लड सर्कुलेशन खराब हो जाता है और नर्व डैमेज भी हो सकता है. इसकी वजह से खासकर पैरों में बने घाव जल्दी ठीक नहीं होते,  इन्हें डायबिटिक अल्सर कहा जाता है. समय पर इलाज न हो तो स्थिति गंभीर हो सकती है और अंग काटने तक की नौबत आ सकती है.

त्वचा पर छोटे-छोटे दाने

अगर अचानक त्वचा पर छोटे-छोटे दाने निकलने लगें, तो यह भी चेतावनी हो सकती है. अनकंट्रोल्ड डायबिटीज में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ सकता है. शुरुआत में ये दाने दिखाई देते हैं और बाद में हल्की त्वचा पर पीले रंग के हो सकते हैं. शुगर कंट्रोल में आते ही ये दाने आमतौर पर गायब हो जाते हैं.

कुछ हिस्सों में त्वचा का काला पड़ना

गर्दन, बगल या जांघों के पास त्वचा का काला और मोटा होना डायबिटीज या प्रीडायबिटीज का संकेत हो सकता है. इस स्थिति को एकैंथोसिस नाइग्रिकन्स कहा जाता है और यह इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ी होती है. ज्यादातर मामलों में यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती.

पलकों के आसपास पीले धब्बे

पलकों के आसपास पीले रंग के चिकने धब्बे या उभार दिखना खून में फैट का स्तर ज्यादा होने का संकेत हो सकता है. इन्हें जैंथेलाज़्मा कहा जाता है. ऐसे लोगों में कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स अक्सर ज्यादा पाए जाते हैं.

स्किन टैग्स

स्किन टैग्स आमतौर पर हानिरहित होते हैं, लेकिन अगर ये ज्यादा संख्या में हों, खासकर गर्दन, बगल, जांघों या पलकों के पास हो, तो यह टाइप-2 डायबिटीज से जुड़ा संकेत हो सकता है. मेडिकल भाषा में इन्हें एक्रोकोर्डन्स कहा जाता है. रिसर्च बताती है कि जिन लोगों में स्किन टैग्स ज्यादा होते हैं, उनमें डायबिटीज का खतरा भी ज्यादा होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अगर बार-बार आ रहा पेशाब तो हो सकता है इस कैंसर का खतरा, पुरुषों को रहना चाहिए सावधान

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प्रोस्टेट कैंसर की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि शुरुआती दौर में इसके लक्षण साफ नजर नहीं आते. कई मामलों में बीमारी बिना किसी तकलीफ के धीरे-धीरे बढ़ती रहती है. यही वजह है कि थोड़े से भी शक पर जांच कराना जरूरी माना जाता है.

बार-बार पेशाब आना, पेशाब की धार कमजोर होना, पेशाब शुरू या बंद करने में दिक्कत और यह महसूस होना कि ब्लैडर पूरी तरह खाली नहीं हुआ, इन लक्षणों को अक्सर लोग सामान्य बुढ़ापा मान लेते हैं. लेकिन हकीकत में ये प्रोस्टेट कैंसर की शुरुआती चेतावनी भी हो सकते हैं.

बार-बार पेशाब आना, पेशाब की धार कमजोर होना, पेशाब शुरू या बंद करने में दिक्कत और यह महसूस होना कि ब्लैडर पूरी तरह खाली नहीं हुआ, इन लक्षणों को अक्सर लोग सामान्य बुढ़ापा मान लेते हैं. लेकिन हकीकत में ये प्रोस्टेट कैंसर की शुरुआती चेतावनी भी हो सकते हैं.

Published at : 12 Jan 2026 12:01 PM (IST)

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सर्दियों में किन लोगों को जल्दी आता है हार्ट अटैक? गलती से भी इग्नोर न करें ये 5 लक्षण

सर्दियों में किन लोगों को जल्दी आता है हार्ट अटैक? गलती से भी इग्नोर न करें ये 5 लक्षण


Who Is At Risk Of Heart Attack In Winter: सर्दियों में हार्ट अटैक के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं और इसकी बड़ी वजह शरीर में होने वाले मौसमी बदलाव हैं. WHO के अनुसार, दुनियाभर में हार्ट से जुड़ी बीमारियां मौत की सबसे बड़ी वजह हैं. हार्ट अटैक तब होता है जब दिल की मांसपेशियों तक पर्याप्त मात्रा में खून नहीं पहुंच पाता. ज्यादातर मामलों में यह समस्या दिल की आर्टरीज में ब्लॉकेज के कारण होती है, जिससे दिल की मांसपेशियां धीरे-धीरे डैमेज होने लगती हैं.

ऐसा क्यों होता है

डॉक्टरों का कहना है कि हार्ट अटैक सालभर हो सकता है, लेकिन सर्दियों में इसका खतरा कई गुना बढ़ जाता है. एक्सपर्ट के अनुसार, ठंड के मौसम में हार्ट से जुड़े इमरजेंसी मामलों में साफ तौर पर बढ़ोतरी देखी जाती है. तापमान गिरने के साथ शरीर में फिजियोलॉजिकल बदलाव होते हैं और लाइफस्टाइल भी बदल जाती है, जो दिल पर अतिरिक्त दबाव डालती है.

सर्दियों में हार्ट अटैक का एक बड़ा कारण वेसोकंस्ट्रिक्शन है. ठंड में शरीर गर्मी बनाए रखने के लिए ब्लड बेसल्स को सिकोड़ लेता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है. इससे हार्ट को ज्यादा ताकत लगाकर खून पंप करना पड़ता है. जिन लोगों की आर्टरीज में पहले से ब्लॉकेज है या दिल कमजोर है, उनके लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक साबित हो सकती है. इसके अलावा ठंड में खून गाढ़ा भी हो जाता है, जिससे थक्का बनने का खतरा बढ़ जाता है. ठंड के मौसम में लोग शारीरिक गतिविधियां भी कम कर देते हैं. एक्सरसाइज न करने से वजन बढ़ता है, ब्लड सर्कुलेशन कमजोर होता है और कोलेस्ट्रॉल लेवल बिगड़ सकता है. इसके साथ ही सर्दियों में तला-भुना और ज्यादा कैलोरी वाला खाना भी दिल की सेहत को नुकसान पहुंचाता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

इस बीच सांस से जुड़ी बीमारियां, जैसे फ्लू या वायरल इंफेक्शन, भी दिल के लिए खतरा बन सकती हैं. इनसे शरीर में सूजन बढ़ती है, जो धमनियों में जमी प्लाक को अस्थिर कर देती है और हार्ट अटैक का जोखिम बढ़ जाता है. सीनियर डॉ. श्राद्धेय कटियार ने इसको लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, उनके अनुसार “सर्दियों में हार्ट अटैक बढ़ने की वजह महज संयोग नहीं है. ठंड पड़ते ही शरीर हीट को बचाने के लिए सर्वाइवल मोड में चला जाता है. इससे ब्लड वेसल्स सिकुड़ती हैं, ब्लड प्रेशर तेजी से बढ़ता है और दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. ठंड में प्लेटलेट्स भी जल्दी चिपकने लगती हैं, जिससे थक्का बनने का खतरा और बढ़ जाता है.”

 

किन लक्षणों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज

कुछ लोग सर्दियों में सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं. इनमें पहले से दिल की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, स्मोकिंग की आदत वाले लोग और बुजुर्ग शामिल हैं. अगर इस मौसम में सीने में दर्द, सांस फूलना, अचानक कमजोरी, ज्यादा पसीना या चक्कर जैसे लक्षण दिखें, तो इन्हें गलती से भी नजरअंदाज न करें. समय पर जांच और इलाज ही हार्ट अटैक से बचाव का सबसे मजबूत तरीका है.

Winter Heart Attack: हार्ट अटैक से प्रशांत तमांग का निधन, जानें सर्दियों में क्यों ज्यादा पड़ता है दिल का दौरा और कैसे करें बचाव?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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