कितनी खतरनाक बीमारी है सीवियर ऑर्टिक स्टेनोसिस, जिससे जूझ रहे प्रेम चोपड़ा?

कितनी खतरनाक बीमारी है सीवियर ऑर्टिक स्टेनोसिस, जिससे जूझ रहे प्रेम चोपड़ा?


अभिनेता प्रेम चोपड़ा को गंभीर कंजेशन के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था.  इलाज के बाद उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया और वह अब घर पर आराम कर रहे हैं. उ उनके दामाद और अभिनेता शरमन जोशी ने उनकी हेल्थ पर अपडेट साझा किया है. शरमन ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर बताया कि प्रेम चोपड़ा को गंभीर ऑर्टिक स्टेनोसिस की समस्या थी.  डॉक्टरों ने उनका टीएवीआई प्रोसीजर किया, जिसमें बिना ओपन-हार्ट सर्जरी के एऑर्टिक वाल्व को ठीक किया जाता है. यह प्रक्रिया सफल रही और अब प्रेम चोपड़ा धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि ऑर्टिक स्टेनोसिस की समस्या कितनी खतरनाक है?

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क्या ब्रा की टाइटनेस और कलर से भी होता है कैंसर का खतरा, इस बात में कितनी हकीकत?

क्या ब्रा की टाइटनेस और कलर से भी होता है कैंसर का खतरा, इस बात में कितनी हकीकत?


Misconceptions About Breast Cancer: कई बार महिलाएं यह सोचकर परेशान हो जाती हैं कि कहीं ब्रा पहनने का तरीका या ब्रा का रंग ब्रेस्ट कैंसर का खतरा तो नहीं बढ़ा देता. खासकर सोशल मीडिया पर ऐसे दावे खूब चलते हैं. लेकिन साइंटिफिक रिसर्च बताते हैं कि ब्रा की टाइटनेस हो या उसका रंग इनका ब्रेस्ट कैंसर से कोई संबंध नहीं है. चलिए आपको बताते हैं कि इस अफवाह में कितनी सच्चाई है और कितनी मिथक है यह. 

रिसर्च क्या कहती है?

Breastcancer ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, एक्सपर्ट का मानना है कि ब्रा और कैंसर के बीच कोई वैज्ञानिक कड़ी नहीं है, इसलिए इस पर ज्यादा शोध भी नहीं हुआ. फिर भी जितने अध्ययन उपलब्ध हैं, वे साफ बताते हैं कि ब्रा पहनने, ब्रा की टाइटनेस, ब्रा के रंग या अंडरवायर किसी भी चीज से कैंसर का खतरा नहीं बढ़ता. 2014 के एक बड़े स्टडी में 55 से 74 वर्ष की 1,513 महिलाओं की ब्रा पहनने की आदतों की जांच की गई. शोध में पाया गया कि कप साइज़, कितने घंटे ब्रा पहनी जाती है, ब्रा कितनी फिट है, ब्रा कब से पहनना शुरू किया इनमें से कोई भी फैक्टर ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ा नहीं था.

पुरानी स्टडी क्यों भ्रामक थी?

1991 की एक स्टडी में दावा किया गया था कि ब्रा न पहनने वाली महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर कम होता है. लेकिन डेटा इतना कमजोर था कि उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. यह फर्क ब्रा के कारण नहीं, बल्कि ब्रेस्ट साइज और वजन के कारण हो सकता है. ज्यादा वजन खुद कैंसर का बड़ा जोखिम है और बड़ी ब्रेस्ट वाली महिलाएं अक्सर सपोर्ट के लिए ब्रा पहनती हैं. इससे ऐसा लगता है कि “ब्रा” कारण है, जबकि असल कारण “वजन” है.

तो फिर मिथ कैसे फैला?

1995 में आई किताब “Dressed to Kill” ने यह दावा फैलाया कि ब्रा का दबाव लिंफैटिक सिस्टम को ब्लॉक करता है और इससे शरीर के टॉक्सिन बाहर नहीं निकलते, जो कैंसर का कारण बनते हैं. लेकिन इस दावे का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. लिंफैटिक सिस्टम को ब्रा जैसी कपड़े की चींजें ब्लॉक नहीं कर सकतीं.

क्या ब्रा की टाइटनेस से लिंफ फ्लो रुकता है?

इसका जवाब है नहीं. लिंफैटिक सिस्टम शरीर की गहराई में होता है. ब्रा स्किन के ऊपर रहती है और उसका दबाव उस स्तर तक नहीं पहुंच सकता जहां लिंफ फ्लो को रोक सके. टाइट ब्रा सिर्फ असहजता या दर्द पैदा कर सकती है कैंसर नहीं.

क्या ब्रा का रंग कैंसर की वजह हो सकता है?

इसका बिल्कुल नहीं. काली ब्रा हो, लाल हो या कोई भी डार्क शेड रंग का कैंसर से कोई संबंध नहीं है. फैब्रिक डाई त्वचा के अंदर इस तरह प्रवेश नहीं करती कि उससे कैंसर पैदा हो जाए.

इसे भी पढ़ें- Benefits of Boredom: कभी-कभी बोर होना क्यों जरूरी, जानें एक्सपर्ट इसे क्यों कहते हैं ब्रेन का फ्रेश स्टार्ट?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सच में एग योक से होता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट्स ने बताया इस मिथक के पीछे का बड़ा सच

क्या सच में एग योक से होता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट्स ने बताया इस मिथक के पीछे का बड़ा सच


पिछले कुछ सालों में हेल्थ और फिटनेस को लेकर लोगों में जागरूकता बड़ी है, लेकिन इसके साथ ही कई मिथक भी तेजी से फैलने लगे हैं. इनमें से एक बड़ा दावा यह है कि अंडे की जर्दी यानी एक योक दिल के लिए खतरनाक होती है और इससे हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है. कई लोग वजन और कोलेस्ट्रॉल के डर से केवल एग व्हाइट खाना पसंद करते हैं और योक को हटा देते हैं. लेकिन क्या यह डर वाकई सही है. इसे लेकर कुछ एक्सपर्ट्स इस मिथक के पीछे का सच बताते हैं. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या सच में एग योक से हार्ट अटैक होता है और इसे लेकर एक्सपर्ट्स क्या बड़ा सच बताते हैं.

एग योक से नहीं बढ़ता हार्ट अटैक का खतरा, एक्सपर्ट्स

एक्सपर्ट्स के अनुसार हमारे शरीर में 80 प्रतिशत कोलेस्ट्रॉल लिवर खुद बनाता है. यानी खाने से मिलने वाला कोलेस्ट्रॉल खून में कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने में बहुत अहम भूमिका निभाते हैं. एक्सपर्ट बताते हैं कि एग योक खाने से हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा नहीं बढ़ता, बल्कि यह शरीर को कई जरूरी पोषक तत्व देता है. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि 1.5 लाख लोगों पर हुई एक स्टडी में सामने आया कि रोज एक अंडा खाने से दिल की बीमारियों का खतरा नहीं बढ़ता है.

एग योक के फायदे भी ज्यादा

एक्सपर्ट्स के अनुसार अंडे की जर्दी में मौजूद पोषक तत्व शरीर के लिए बहुत जरूरी होते हैं. एग योक हमारे शरीर में एचडीएल यानी गुड कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है. ल्यूटिन, काॅलीन और कई आवश्यक विटामिन दिल, लिवर और दिमाग को हेल्दी रखता है. एक्सपर्ट्स इसे लेकर वजन बढ़ाने या कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने की गलतफहमी को भी पूरी तरह मिथक बताते हैं. वह बताते हैं कि एक हेल्दी नॉन- डायबेटिक और नॉन हाइपरटेंसिव व्यक्ति रोजाना तीन पूरे अंडे खा सकता है.

समस्या एग योक में नहीं कुकिंग स्टाइल में

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ज्यादातर परेशानी एक योक में नहीं बल्कि उसे पकाने के तरीके में होती है. बटर, क्रीम या ज्यादा तेल में बनी एग डिशेज पाचन में दिक्कत और फैट बढ़ा सकती है. ऐसे में एग को हेल्दी तरीके से पकाना जरूरी है. वहीं एक्सपर्ट्स बताते हैं कि एक उबले अंडे में 77 कैलोरीज, 3.5 ग्राम टोटल फैट, 1.6 ग्राम सैचुरेटेड फैट, 186 एमजी कोलेस्ट्रॉल, 62 एमजी सोडियम, 0.56 ग्राम कार्ब्स, 0.56 ग्राम शुगर और 6.3 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है. इसके अलावा एग में विटामिन ए, डी, ई, के और कई तरह के विटामिन बी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सफदरजंग में एडवांस्ड न्यूरोमॉड्यूलेशन ट्रीटमेंट शुरू, डिप्रेशन–OCD मरीजों का फ्री होगा इलाज

सफदरजंग में एडवांस्ड न्यूरोमॉड्यूलेशन ट्रीटमेंट शुरू, डिप्रेशन–OCD मरीजों का फ्री होगा इलाज



राजधानी दिल्ली स्थित वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (VMMC) और सफदरजंग अस्पताल ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में एक बड़ी पहल करते हुए मुफ्त न्यूरोमॉड्यूलेशन उपचार की शुरुआत कर दी है. यह कदम ऐसे मरीजों के लिए उम्मीद लेकर आया है, जिन्हें पारंपरिक दवाओं या काउंसलिंग से पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता.

कई गंभीर मानसिक रोगों में मिलेगा लाभ

सफदरजंग अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग ने 6 दिसंबर 2025 को रैपिटिटिव ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिम्युलेशन (rTMS), मॉडिफाइड इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी (mECT) और ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिम्युलेशन (tDCS) जैसी आधुनिक तकनीकों से लैस मुफ्त सेवाएं शुरू कीं. ये उपचार उन मरीजों के लिए खास तौर पर प्रभावी माने जाते हैं, जिन्हें दवाओं के बावजूद सुधार नहीं दिखता.

इन रोगियों के लिए नई उम्मीद

विशेषज्ञों के अनुसार, नई सेवाएं गंभीर अवसाद, ऑब्सेसिव–कंपल्सिव डिसऑर्डर (OCD), स्किज़ोफ्रेनिया सहित कई मानसिक बीमारियों में अत्यंत प्रभावी हो सकती हैं. अक्सर ऐसे मरीजों को दवा और काउंसलिंग के साथ वैकल्पिक तकनीकों की जरूरत होती है, जिसे अब सफदरजंग अस्पताल मुफ्त उपलब्ध कराएगा.

सरकार के मानसिक स्वास्थ्य मिशन को भी मिलेगी मजबूती

अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि यह पहल न सिर्फ सेवा विस्तार है, बल्कि संवेदनशील और समान अवसर आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक ठोस कदम है. यह पहल केंद्र सरकार के उन प्रयासों को भी मजबूती देती है, जिनका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को देशभर में सुलभ बनाना है.

आर्थिक स्थिति अब उपचार में बाधा नहीं बनेगी

VMMC और सफदरजंग अस्पताल लंबे समय से इस मिशन पर काम कर रहे हैं कि कोई भी मरीज आर्थिक कारणों से इलाज से वंचित न रह जाए. न्यूरोमॉड्यूलेशन सेवाओं की शुरुआत इसी प्रतिबद्धता को और मजबूत करती है, खासकर उन मरीजों के लिए जो महंगे उपचार वहन नहीं कर पाते.

ये अधिकारी रहे मौजूद

उद्घाटन समारोह में निदेशक डॉ. संदीप बंसल, मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. चारु बाम्बा और मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ. पंकज वर्मा मौजूद रहे. अधिकारियों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे मरीजों के लिए बड़ा राहत कदम बताया. उनका कहना था कि आधुनिक, साक्ष्य-आधारित थेरेपी को जनता तक बिना किसी शुल्क के पहुंचाना मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में अहम बदलाव है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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