पैरों में मकड़ी के जाले जैसी नजर आ रही हैं नसें, समझिए इस चीज की हो गई दिक्कत

पैरों में मकड़ी के जाले जैसी नजर आ रही हैं नसें, समझिए इस चीज की हो गई दिक्कत



कई लोगों के पैरों पर अचानक नीली, लाल या बैंगनी रंग की पतली-पतली लकीरें दिखाई देने लगती है. पहली नजर में ये बिल्कुल मकड़ी के जाले जैसी लगती हैं. जैसे किसी ने स्किन के अंदर एक बारीक सा जाल बुन दिया हो. बहुत लोगों को लगता है यह सिर्फ स्किन का पैटर्न है, लेकिन असल में यह आपके पैरों की नसों का संकेत है कि ब्लड फलो ठीक से नहीं हो रहा है.

आजकल यह समस्या इतनी आम हो गई है कि 10 में से 4 लोग इसे महसूस करते हैं. लंबे समय तक खड़े रहना, वजन बढ़ना, या बस उम्र बढ़ने के साथ ये अचानक उभरकर दिखाई देने लगती हैं.कई महिलाओं को यह प्रेगनेंसी या हार्मोनल बदलावों के दौरान भी हो जाती है. अगर आप भी यही सोचकर परेशान हैं कि ये नसें अचानक क्यों दिखने लगीं  या क्या यह कोई गंभीर बीमारी है तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि पैरों में मकड़ी के जाले जैसी नजर आ रही नसें किस चीज की दिक्कत का कारण है. 

मकड़ी के जाले जैसी नसें क्या होती हैं?

ये नसें स्पाइडर वेन्स (Spider Veins) कहलाती हैं. यह स्किन के ठीक नीचे मौजूद छोटी खून की नसें होती हैं, जो किसी वजह से फैल जाती हैं और ऊपर से साफ दिखने लगती हैं. इनका रंग लाल, नीला या बैंगनी हो सकता है और ये बिल्कुल जाले या पेड़ की शाखाओं जैसी शेप बनाती हैं. यह आमतौर पर पैरों की स्किन, टांगों, टखनों, कभी-कभी चेहरे और गालों पर भी बन सकती हैं. 

ये नसें किस चीज की दिक्कत का कारण दिखाई देने लगती हैं? 

1. नसों के वाल्व कमजोर होना – हमारी नसों में छोटे-छोटे वाल्व होते हैं, जो ब्लड को ऊपर की ओर हार्ट की तरफ ढकेलते हैं.  जब ये वाल्व ढीले पड़ जाते हैं, तो ब्लड नीचे की तरफ जमा होने लगता है. यही दबाव नसों को फैलाकर जाल जैसा रूप दे देता है. 

2. लगातार खड़े या बैठे रहना –  जो लोग घंटों खड़े रहते हैं, जैसे टीचर, गार्ड, दुकान कर्मचारी उन्हें यह समस्या ज्यादा होती है. जो लोग लंबे समय तक बैठे भी रहते हैं जैसे कंप्यूटर जॉब, उनके पैरों में भी खून जमा होकर नसों पर प्रेशर डालता है. 

3. वजन बढ़ना – ज्यादा वजन पैरों पर एक्स्ट्रा दबाव डालता है. इससे खून को ऊपर पंप होने में मुश्किल होती है और नसें उभर कर दिखाई देने लगती हैं. 

4. प्रेगनेंसी और हार्मोनल बदलाव –   प्रेगनेंसी के समय महिलाओं में खून की मात्रा बढ़ जाती है और दबाव भी ज्यादा पड़ता है. हार्मोनल बदलाव भी नसों को कमजोर कर देते हैं. 

5. जेनेटिक कारण – अगर आपके माता-पिता को यह समस्या रही है, तो आपको भी होने की संभावना ज्यादा होती है. 

6. उम्र बढ़ना – उम्र के साथ स्किन और नसें दोनों अपनी मजबूती खोने लगती हैं. इससे नसें पहले जितनी मजबूत नहीं रहतीं और ऊपर से दिखाई देने लगती हैं.

पैरों में मकड़ी जैसी नसें दिखती हैं तो क्या करें?

1. पैरों को दीवार पर रखकर एक्सरसाइज करें. जमीन पर पीठ के बल लेटें, पैरों को दीवार पर सीधा टिका दें, पंजों को अपनी तरफ और फिर ऊपर की ओर मोड़ें. इसे 10 मिनट करें. 

2. स्टैंडिंग लेग रेज करें. नंगे पैर खड़े हों, एड़ियों को ऊपर उठाएं, फिर नीचे रखें. यह 100 बार करें. इससे पिंडली की मांसपेशी मजबूत होती है, जो रक्त को ऊपर पंप करने में मुख्य भूमिका निभाती है. 

3. उल्टे पैर चलना शुरू करें. रोज 10 मिनट उल्टा चलना पैरों की नसों में खिंचाव कम करता है और ब्लड फ्लो सुधारता है. 

4. वजन कम करने की कोशिश करें. अगर वजन ज्यादा है, तो इसे थोड़ा-थोड़ा कम करने से नसों पर दबाव कम होगा और समस्या भी घटेगी. 

5. कम्प्रेशन स्टॉकिंग्स पहनें. घुटनों से ऊपर वाले कम्प्रेशन स्टॉकिंग्स खून को नीचे जमा होने से रोकते हैं.  ये स्पाइडर वेन्स के साथ-साथ वैरिकाज वेन्स में भी काफी मददगार होते हैं. 

6. एक बाल्टी गर्म पानी में थोड़ा एप्सम सॉल्ट डालकर 10–12 मिनट पैर डुबोएं. इससे मैग्नीशियम त्वचा की नसों को आराम देता है और सूजन कम होती है. 

इसे भी पढ़ें- Guava For Pregnant Women: क्या ठंड में प्रेग्नेंट महिलाओं को नहीं खाने चाहिए अमरूद, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्दी होते ही बच्चों को देने लग जाते हैं स्टीम, जानें एक दिन में कितनी बार भाप दे सकते हैं आप?

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भारत में सर्दियों ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं. इसके साथ ही लेकर सर्दियां कई बीमारियां भी लेकर आई हैं. सर्दी, जुखाम, खांसी, बदन दर्द जैसी बीमारियां ठंड के मौसम में सबसे आम समस्या है. बड़ी उम्र और व्यस्क लोग इन सभी बीमारियों का सामना कर लेते हैं लेकिन छोटे बच्चों को काफी तकलीफ का सामना करना पड़ता है. ठंड के मौसम में बच्चों को बुखार, खांसी, जुखाम की वजह से नाक बंद होना, गले में बलगम जमना इत्यादि समस्याएं होने का खतरा बढ़ जाता है जो माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बन जाता है.

जब घर में बच्चों को ठंड के मौसम में बीमारियां जकड़ लेती हैं तो माता-पिता तुरंत घरेलू या आयुर्वेदिक उपचार में लग जाते हैं, जिसमें सबसे प्रमुख है बच्चों को भाप देना. आयुर्वेद और मेडिकल साइंस दोनों का मानना है कि अगर छोटे बच्चे ठंड की वजह से बीमार हो जाते हैं तो भाप देना सबसे असरदार उपचार है क्योंकि भाप लेने से नाक और गले की सूजन कम होती है, बलगम पतला होकर आसानी से बाहर आता है और सांस लेने का मार्ग खुल जाता है. डॉक्टर भी बच्चों को गर्म पानी की भाप देने की सलाह देते हैं लेकिन पैरेंट्स को अपने बच्चों को भाप देने में कुछ सावधानियां जरूर रखनी चाहिए.

बच्चों को भाप क्यों देना चाहिए?

भारत में ठंड से होने वाली बीमारियों को कम करने या उनसे बचाव के लिए डॉक्टर एक ही सलाह देते हैं कि नियमित तौर पर भाप लेते रहें. भाप लेना (स्टीम इनहेलेशन) सर्दी-जुखाम, गले की खराश और बंद नाक में बहुत फायदेमंद है क्योंकि गर्म, नम हवा नाक और गले की सूजन को कम करती है, बलगम को पतला करके उसे बाहर निकालने में मदद करती है और सांस लेने के रास्ते को खोल देती है जिससे तुरंत आराम मिलता है. सर्दियों में होने वाले सिर दर्द में भी काफी आराम मिलता है. डॉक्टरों के अनुसार, भाप देना बच्चों के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि बच्चे अपनी तकलीफ को सही से बता नहीं पाते जिसकी वजह से आम बीमारी बड़ा रूप ले सकती है इसलिए बच्चों को हल्की भाप देना जरूरी है जिससे बच्चे तंदुरुस्त रहें और उनको नींद भी अच्छे से आए.

बच्चों को दिन में कितनी बार भाप देना चाहिए?

कई पैरेंट्स एक सामान्य गलती करते हैं कि वे दिन में कई बार अपने बच्चों को भाप देते हैं जो बिल्कुल गलत है. एक दिन में कई बार भाप लेने की वजह से छोटे बच्चों को दिक्कतें हो सकती हैं जैसे बार-बार भाप देने से गले की नमी खत्म हो जाती है जिससे खराश और जलन जैसी समस्या हो सकती है. आपको यह ध्यान रखना होगा कि बच्चे को दिन में सिर्फ 2–3 बार ही 5 से 6 मिनट तक भाप देना चाहिए उससे ज्यादा नहीं. भाप का तापमान सामान्य या मध्यम होना चाहिए, जिससे बच्चा आसानी से इसे ले सके. यदि 2–3 दिनों तक भाप देने के बाद भी आराम न मिले, बच्चे को तेज बुखार, सीने में घरघराहट, बहुत तेज खांसी या सांस फूलने जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना जरूरी है.

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संतरे से भी ज्यादा फायदेमंद हैं छिलके, जरूर जानें इसके सुपरहेल्दी फायदे

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संतरे के छिलकों में विटामिन C की मात्रा गूदे से भी ज्यादा होती है. यह शरीर को वायरस और बैक्टीरिया से बचाने की क्षमता बढ़ाता है. ठंड के मौसम में बार-बार होने वाली सर्दी–जुकाम, संक्रमण और थकान से बचने के लिए ऑरेंज पील टी बेहद फायदेमंद मानी जाती है.

ऑरेंज पील्स पेट के लिए किसी नैचुरल मेडिसिन से कम नहीं हैं. इसका फाइबर गैस, एसिडिटी, अपच और ब्लोटिंग जैसी आम दिक्कतों को दूर करता है. नियमित सेवन आंतों की सफाई रखता है और कब्ज की समस्या कम होती है, जिससे digestion स्मूथ रहता है.

ऑरेंज पील्स पेट के लिए किसी नैचुरल मेडिसिन से कम नहीं हैं. इसका फाइबर गैस, एसिडिटी, अपच और ब्लोटिंग जैसी आम दिक्कतों को दूर करता है. नियमित सेवन आंतों की सफाई रखता है और कब्ज की समस्या कम होती है, जिससे digestion स्मूथ रहता है.

अगर आप वेट लॉस की कोशिश कर रहे हैं, तो संतरे का छिलका आपकी मदद कर सकता है. इसमें मौजूद फाइबर मेटाबॉलिज्म को तेज करता है, पेट को देर तक भरा रखता है और ज्यादा भूख को कम करता है. सूखे छिलकों की चाय या पाउडर शरीर में फैट-बर्निंग प्रोसेस को एक्टिव करता है, जिससे वजन घटाने में आसानी होती है.

अगर आप वेट लॉस की कोशिश कर रहे हैं, तो संतरे का छिलका आपकी मदद कर सकता है. इसमें मौजूद फाइबर मेटाबॉलिज्म को तेज करता है, पेट को देर तक भरा रखता है और ज्यादा भूख को कम करता है. सूखे छिलकों की चाय या पाउडर शरीर में फैट-बर्निंग प्रोसेस को एक्टिव करता है, जिससे वजन घटाने में आसानी होती है.

संतरे के छिलकों में पाए जाने वाले फ्लेवोनॉयड्स शरीर में बुरे कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को बढ़ाने में मदद करते हैं. इसी वजह से यह दिल को स्वस्थ रखने, ब्लड सर्कुलेशन सुधारने और हृदय रोगों के खतरे को कम करने में सहायक माना जाता है.

संतरे के छिलकों में पाए जाने वाले फ्लेवोनॉयड्स शरीर में बुरे कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को बढ़ाने में मदद करते हैं. इसी वजह से यह दिल को स्वस्थ रखने, ब्लड सर्कुलेशन सुधारने और हृदय रोगों के खतरे को कम करने में सहायक माना जाता है.

संतरे के छिलकों में मौजूद विशेष तत्व ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करने में मदद करते हैं. डायबिटीज के मरीजों के लिए इसकी हल्की-सी चाय लाभदायक मानी जाती है, क्योंकि यह शुगर स्पाइक्स को कम कर सकती है और एनर्जी का लेवल संतुलित रखती है.

संतरे के छिलकों में मौजूद विशेष तत्व ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करने में मदद करते हैं. डायबिटीज के मरीजों के लिए इसकी हल्की-सी चाय लाभदायक मानी जाती है, क्योंकि यह शुगर स्पाइक्स को कम कर सकती है और एनर्जी का लेवल संतुलित रखती है.

ऑरेंज पील में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण भरपूर होते हैं. अगर इसे घर पर सुखाकर पाउडर बना लिया जाए और फेस पैक के रूप में यूज किया जाए, तो यह चेहरे से अतिरिक्त तेल हटाता है, पिंपल्स और दाग-धब्बे कम करता है, स्किन को नेचुरली ग्लोइंग बनाता है, इससे स्किन साफ, फ्रेश और चमकदार दिखती है.

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संतरे के छिलके शरीर को नैचुरली डिटॉक्स करते हैं. यह पाचन तंत्र को साफ रखते हैं, जिससे न सिर्फ पेट बेहतर रहता है बल्कि त्वचा और बाल भी हेल्दी दिखाई देते हैं. नियमित रूप से इसका पानी या चाय शरीर से गंदगी निकालकर freshness और हल्कापन देता है.

संतरे के छिलके शरीर को नैचुरली डिटॉक्स करते हैं. यह पाचन तंत्र को साफ रखते हैं, जिससे न सिर्फ पेट बेहतर रहता है बल्कि त्वचा और बाल भी हेल्दी दिखाई देते हैं. नियमित रूप से इसका पानी या चाय शरीर से गंदगी निकालकर freshness और हल्कापन देता है.

Published at : 06 Dec 2025 11:54 AM (IST)

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क्या ठंड में प्रेग्नेंट महिलाओं को नहीं खाने चाहिए अमरूद, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?

क्या ठंड में प्रेग्नेंट महिलाओं को नहीं खाने चाहिए अमरूद, क्या कहते हैं डॉक्टर्स?



Immunity Boosting Foods In Pregnancy: अमरूद दुनियाभर  में एक बेहद लोकप्रिय फल है. इसका मीठा–खट्टा स्वाद न सिर्फ टेस्ट बढ़ाता है बल्कि कई प्रेग्नेंट महिलाओं को भी खूब पसंद आता है. इसमें विटामिन C और कई जरूरी मिनरल भरपूर मात्रा में मिलते हैं. लेकिन कई लोगों को यह चिंता रहती है कि अमरूद शरीर में गर्मी बढ़ाता है  तो क्या गर्भावस्था में इसे खाना सुरक्षित है?. चलिए आपको बताते हैं कि क्या महिलाओं को ठंड में अमरूद खाना चाहिए या नहीं और इसको लेकर डॉक्टर क्या कहते हैं. 

क्या कहते हैं डॉक्टर?

एक इंस्टाग्राम वीडियो में गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. मनीषा मीना गुप्ता बताती हैं कि सर्दियों के दौरान गर्भवती महिलाओं को अमरूद जरूर शामिल करना चाहिए. उनके अनुसार, ठंड के मौसम में अमरूद सबसे फायदेमंद फलों में से एक है. अमरूद में विटामिन C अच्छी मात्रा में होता है, जो शरीर में आयरन के ऑब्जर्व को बेहतर बनाता है और इम्युनिटी को मजबूत करता है. इससे प्रेग्नेंट महिलाओं को सर्दी-जुकाम जैसी समस्याओं से बचाव मिलता है. इसके साथ ही, अमरूद में पानी की मात्रा भी काफी होती है, जिससे शरीर हाइड्रेट रहता है और डिहाइड्रेशन की दिक्कत नहीं होती

 


क्या गर्भवती महिलाओं के लिए अमरूद खाना फायदेमंद?

अमरूद में विटामिन C, A, E और B2 भरपूर मिलते हैं. विटामिन C की मात्रा तो इसमें इतने अधिक होती है कि यह संतरे और ग्रेपफ्रूट तक से आगे है. इसमें कॉपर, कैल्शियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, मैंगनीज और थायमिन जैसे पोषक तत्व भी पाए जाते हैं. अमरूद में मौजूद आयरन गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का खतरा कम करता है और शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर संतुलित रखने में मदद करता है.

अमरूद में मौजूद एस्कॉर्बिक एसिड (विटामिन C) महिलाओं की इम्युनिटी और  स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है. अमरूद में विटामिन B9 और फोलिक एसिड जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी होते हैं, जो गर्भ में पल रहे शिशु के नर्वस सिस्टम के विकास और हार्ट–संबंधी बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं. इसमें मौजूद नेचुरल कैल्शियम गर्भवती महिलाओं और शिशु दोनों के लिए जरूरी है. इन सभी लाभों के बावजूद, महिलाओं को इसे खाते समय कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए, ताकि कोई असहजता न हो.

गर्भवती महिलाओं के लिए अमरूद खाने के फायदे

ब्लड प्रेशर को स्थिर रखने में मदद

अमरूद ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करता है और ब्लड क्लॉट बनने की संभावना भी कम करता है. गर्भावस्था में ब्लड प्रेशर का ध्यान रखना ज़रूरी होता है, ताकि प्रीमेच्योर डिलीवरी या मिसकैरेज का खतरा कम रहे.

 ब्लड कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करने में सहायक

अमरूद में मौजूद फाइबर खून में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है. हाई कोलेस्ट्रॉल गर्भवती महिलाओं और भ्रूण दोनों के लिए जोखिम बढ़ाता है, खासकर हार्ट रोगों का.

कब्ज और बवासीर में आराम

अमरूद का फाइबर कब्ज जैसी आम समस्या को कम करता है और बवासीर की परेशानी से भी बचाता है. लेकिन गर्भवती महिलाओं के लिए एक सलाह अमरूद खाते समय बीज निकालकर केवल गूदा खाना बेहतर माना जाता है.

मांसपेशियों और नसों को आराम देता है

अमरूद में मैग्नीशियम मौजूद होता है, जो मांसपेशियों और नर्वस सिस्टम को रिलैक्स करने में मदद करता है. इस वजह से प्रेग्नेंट महिलाओं में अचानक होने वाले क्रैम्प्स की समस्या कम हो सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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