स्टीकर लगे फल-सब्जियां खरीदने से पहले दो बार सोचना, बीमार हो सकते हैं आप; FSSAI ने दी चेतावनी

स्टीकर लगे फल-सब्जियां खरीदने से पहले दो बार सोचना, बीमार हो सकते हैं आप; FSSAI ने दी चेतावनी


Why You Should Remove Stickers From Fruits: खाने-पीने की चीजों को लेकर लापरवाही कभी-कभी भारी पड़ सकती है. हाल ही में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने फल और सब्जियों पर लगे स्टिकर को लेकर चेतावनी जारी की है. उनका कहना है कि इन स्टिकर के पीछे इस्तेमाल होने वाला चिपकने वाला पदार्थ खाने योग्य नहीं होता और यह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

अक्सर हम बाजार से फल या सब्जियां खरीदते समय उन पर लगे स्टिकर को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही छोटी सी गलती समस्या बन सकती है. एक्सपर्ट के मुताबिक, इन स्टिकर में इस्तेमाल होने वाली गोंद, स्याही और अन्य रसायन शरीर के लिए सुरक्षित नहीं होते. इसलिए इन्हें खाने से पहले हटाना बेहद जरूरी है.

क्या होती है दिक्कत?

Dr Brunda ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि अगर गलती से कोई छोटा टुकड़ा शरीर में चला भी जाए तो आमतौर पर बड़ा नुकसान नहीं होता, लेकिन यह पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं है. कुछ लोगों को इससे पेट में जलन, उलझन, हल्की मितली या पाचन से जुड़ी परेशानी हो सकती है. खासकर बच्चों और बुजुर्गों में कभी-कभी यह गले में अटकने का खतरा भी बढ़ा सकता है. एक्सपर्ट यह भी बताते हैं कि अगर लंबे समय तक ऐसे रसायनों का सेवन होता रहे, तो शरीर पर इसका असर धीरे-धीरे दिख सकता है. भले ही कुछ गोंद को फूड-ग्रेड कहा जाता हो, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उसे सीधे खाया जा सकता है. इसलिए सावधानी बरतना ही सबसे बेहतर उपाय है.

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आपको क्या करना चाहिए?

इस जोखिम से बचने के लिए सबसे आसान तरीका है कि फल और सब्जियों को खाने से पहले अच्छे से धोया जाए और उन पर लगे सभी स्टिकर हटा दिए जाएं. जरूरत हो तो इन्हें छीलकर भी खाया जा सकता है, ताकि किसी भी तरह का अब्जॉर्व शरीर में न जाए. इसके अलावा, फल और सब्जियों को साफ रखने के लिए कुछ और बातों का ध्यान रखना जरूरी है. इन्हें घर लाने के बाद अलग जगह पर रखें, फिर साफ पानी से अच्छी तरह धोएं. हल्के गुनगुने पानी में थोड़ी मात्रा में क्लोरीन मिलाकर भी इन्हें साफ किया जा सकता है, लेकिन साबुन या किसी केमिकल क्लीनर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

इस बात का रखें ध्यान

जिन फलों और सब्जियों को ठंडा रखने की जरूरत हो, उन्हें फ्रिज में रखें और बाकी को खुले टोकरे या रैक में रखें. खाने की चीजों को कार या बाहर खुले में रखने से बचें.जहां इन्हें धोया गया हो, उस जगह को भी साफ रखें. छोटी-छोटी सावधानियां ही आपको बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से बचा सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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वैज्ञानिकों ने लड़कों के लिए बनाई गर्भनिरोधक गोली, स्पर्म प्रोडक्शन पर ही लगा देती है ब्रेक

वैज्ञानिकों ने लड़कों के लिए बनाई गर्भनिरोधक गोली, स्पर्म प्रोडक्शन पर ही लगा देती है ब्रेक


How Male Birth Control Pill Works: दशकों से गर्भनिरोध की जिम्मेदारी ज्यादातर महिलाओं पर ही रही है, जबकि पुरुषों के पास सीमित विकल्प कंडोम या नसबंदी ही मौजूद थे. लेकिन अब विज्ञान की दुनिया से आई एक नई खोज इस सोच को बदल सकती है. हाल ही में पब्लिश एक स्टडी में साइंटिस्ट ने पुरुषों के लिए ऐसी गर्भनिरोधक दवा की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है, जो बिना हार्मोन के असर के काम कर सकती है और जिसका प्रभाव अस्थायी हो सकता है. 

क्या है यह नई खोज?

अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में बताया कि शरीर में एक खास प्रक्रिया को रोककर स्पर्म बनने की प्रक्रिया को अस्थायी रूप से बंद किया जा सकता है. सबसे खास बात यह है कि इससे शरीर को कोई स्थायी नुकसान नहीं होता और दवा बंद करने पर फिर से सामान्य स्थिति लौट सकती है.

इस रिसर्च में साइंटिस्ट ने मियोसिस नाम की एक अहम जैविक प्रक्रिया पर ध्यान दिया, जो स्पर्म बनने के लिए जरूरी होती है. प्रयोग के दौरान एक खास कंपाउंड का इस्तेमाल कर इस प्रक्रिया को चूहों में अस्थायी रूप से रोक दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि स्पर्म बनना बंद हो गया, लेकिन जब दवा बंद की गई, तो उनकी प्रजनन क्षमता वापस लौट आई और वे स्वस्थ संतानों को जन्म देने में सक्षम रहे. 

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क्यों अहम है यह खोज?

यह खोज इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि अब तक पुरुष गर्भनिरोधक तरीकों में कई दिक्कतें सामने आती रही हैं. हार्मोन आधारित तरीकों से मूड में बदलाव और यौन इच्छा में कमी जैसी समस्याएं होती हैं, जबकि नसबंदी स्थायी समाधान है और इसे आसानी से वापस नहीं किया जा सकता. ऐसे में बिना हार्मोन वाला और अस्थायी तरीका एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आया है.

कैसे काम करती है यह तकनीक?

यह नई तकनीक स्पर्म के विकास के एक खास चरण को रोककर काम करती है. जब यह प्रक्रिया बाधित होती है, तो स्पर्म सही तरीके से विकसित नहीं हो पाते और प्रजनन क्षमता कुछ समय के लिए रुक जाती है. हालांकि, जैसे ही दवा का असर खत्म होता है, शरीर दोबारा सामान्य रूप से काम करने लगता है. हालांकि साइंटिस्ट ने यह भी साफ किया है कि अभी इस्तेमाल किया गया कंपाउंड इंसानों के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता. इसमें कुछ संभावित दुष्प्रभाव हो सकते हैं, इसलिए फिलहाल इसे एक शुरुआती कदम के तौर पर देखा जा रहा है.  इसका मकसद ऐसे सुरक्षित विकल्प विकसित करना है, जो इसी प्रक्रिया को निशाना बनाकर काम कर सकें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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थकान और जोड़ों के दर्द को न लें हल्के में, आंतों से शुरू हो सकती है ये बीमारी

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Can Fatigue And Bloating Be Signs Of Autoimmune Disease: अक्सर हम अपने शरीर के छोटे-छोटे संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. थकान को तनाव समझ लेते हैं, पेट फूलने को खाने की गड़बड़ी मान लेते हैं और जोड़ों के दर्द को उम्र या काम का असर कहकर टाल देते हैं. लेकिन कई बार ये अलग-अलग समस्याएं नहीं होतीं, बल्कि एक बड़े कारण की ओर इशारा करती हैं कि इम्यून सिस्टम का असंतुलन, जिसकी शुरुआत गट से हो सकती है. 

कैसे होते हैं इसके संकेत?

दरअसल, ऑटोइम्यून बीमारियां शुरुआत में जोर से नहीं, बल्कि धीरे-धीरे संकेत देती हैं. शरीर इनको लेकर शोर नहीं मचाता, बल्कि हल्के-हल्के संकेत देता है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. कई मामलों में इसकी शुरुआत गट से होती है, जहां से इम्यून सिस्टम का बड़ा हिस्सा नियंत्रित होता है. गट सिर्फ पाचन का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह शरीर का एक बड़ा इम्यून सेंटर भी है. लगभग 70 प्रतिशत इम्यून गतिविधियां गट की परत में होती हैं. यहां मौजूद माइक्रोबायोम यानि बैक्टीरिया, वायरस और फंगस का एक संतुलित समूह इम्यून सिस्टम को सही तरीके से काम करने में मदद करता है. लेकिन जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो शरीर की इम्यून सिस्टम खुद ही भ्रमित होने लगती है.

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जब गट की परत कमजोर हो जाती है, जिसे आमतौर पर लीकी गट कहा जाता है, तो हानिकारक तत्व खून में पहुंच सकते हैं. इससे इम्यून सिस्टम बार-बार सक्रिय होता है और सूजन बढ़ने लगती है. समय के साथ यही स्थिति ऑटोइम्यून समस्याओं का कारण बन सकती है.

शुरुआती लक्षण क्या होते हैं?

इसके शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य लगते हैं, जैसे लगातार थकान, बार-बार पेट फूलना, दिमाग में धुंधलापन, हल्का लेकिन बार-बार होने वाला जोड़ों का दर्द या त्वचा से जुड़ी समस्याएं. ये संकेत अकेले देखने पर गंभीर नहीं लगते, लेकिन अगर ये लंबे समय तक बने रहें या एक साथ दिखें, तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी का एक कारण मॉलिक्यूलर मिमिक्री भी हो सकता है. इसमें कुछ बैक्टीरिया शरीर के अपने टिश्यू जैसे दिखते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम भ्रमित होकर शरीर के ही हिस्सों पर हमला करने लगता है. यही प्रक्रिया धीरे-धीरे ऑटोइम्यून बीमारियों को जन्म देती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. अनिरुद्ध मसलेकर ने TOI को बताया कि ऑटोइम्यून बीमारियां हमेशा वहीं से शुरू नहीं होतीं जहां लक्षण दिखते हैं. कई मामलों में इसकी शुरुआत गट से जुड़े इम्यून असंतुलन से हो सकती हैं.  वे बताते हैं कि शुरुआती संकेत बहुत हल्के होते हैं, इसलिए लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे जांच में देरी हो जाती है.  डॉक्टरों का मानना है कि अगर थकान, पेट की समस्या और सूजन जैसे लक्षण एक साथ और लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. समय रहते पहचान हो जाए, तो इन बीमारियों को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है.

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कमर दर्द के साथ दिखें ये बदलाव तो तुरंत कराएं जांच, हो सकती है किडनी फेल

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How Back Pain Can Indicate Kidney Disease: पीठ दर्द आमतौर पर एक सामान्य समस्या माना जाता है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, गलत पोश्चर या ज्यादा एक्सरसाइज, इन वजहों को अक्सर इसका कारण मान लिया जाता है. ज्यादातर मामलों में यह सही भी होता है. लेकिन कई बार शरीर ऐसे संकेत देता है, जो सिर्फ मांसपेशियों तक सीमित नहीं होते. लगातार बना रहने वाला, अलग तरह का महसूस होने वाला दर्द किडनी से जुड़ी समस्या की ओर इशारा कर सकता है. 

मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, हर तरह का बैक पेन एक जैसा नहीं होता. मांसपेशियों से जुड़ा दर्द आमतौर पर मूवमेंट से बढ़ता है, आराम करने पर कम होता है और गर्म सिकाई या स्ट्रेचिंग से राहत मिलती है. लेकिन किडनी से जुड़ा दर्द अलग तरह का होता है कि यह गहराई में महसूस होता है, मूवमेंट से ज्यादा प्रभावित नहीं होता और आराम करने पर भी आसानी से नहीं जाता. यही फर्क इसे पहचानने में अहम बनाता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. रतन झा ने TOI को बताया कि अक्सर बैक पेन को मसल्स की समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, खासकर जब यह धीरे-धीरे शुरू होता है. लेकिन किडनी से जुड़ा दर्द अलग व्यवहार करता है, जिसे समझना जरूरी है. 

क्या होते हैं किडनी दिक्कतें?

किडनी से जुड़ी समस्याएं शुरुआत में तेज लक्षणों के साथ नहीं आतीं। यह धीरे-धीरे बढ़ती हैं और सामान्य परेशानियों के पीछे छिप जाती हैं. पेशाब के पैटर्न में बदलाव, जलन, पेशाब का रंग गहरा होना या आंखों और पैरों के आसपास हल्की सूजन, ये सभी संकेत हो सकते हैं कि समस्या सिर्फ पीठ दर्द तक सीमित नहीं है. इसके अलावा लगातार थकान या शरीर में भारीपन महसूस होना भी एक संकेत हो सकता है.

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डॉ. हिमा दीप्ति अल्ला बताती हैं कि किडनी से जुड़ा दर्द हमेशा तेज नहीं होता. यह अक्सर कमर या साइड में हल्का लेकिन लगातार रहने वाला दर्द होता है, जिसे लोग पोश्चर या लंबे समय तक बैठने का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. 

शरीर देता है चेतावनी

कई बार शरीर छोटे-छोटे बदलावों के जरिए चेतावनी देता है.जैसे झागदार पेशाब, ऐसा महसूस होना कि ब्लैडर पूरी तरह खाली नहीं हुआ या ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव. ये लक्षण आमतौर पर लोग रोजमर्रा में नोटिस नहीं करते, लेकिन यही शुरुआती संकेत हो सकते हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के आंकड़ों के मुताबिक, क्रॉनिक किडनी डिजीज अक्सर शुरुआती स्टेज में इसलिए पकड़ में नहीं आती क्योंकि इसके लक्षण बहुत हल्के या अस्पष्ट होते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि हमारी रोज की आदतें भी किडनी हेल्थ पर बड़ा असर डालती हैं.

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क्या आप भी रहते हैं हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट को लेकर कन्फ्यूज, जानें दोनों में क्या अंतर?

क्या आप भी रहते हैं हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट को लेकर कन्फ्यूज, जानें दोनों में क्या अंतर?


Difference Between Heart Attack And Cardiac Arrest: कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिसको लेकर लोग कन्फ्यूज हो जाते हैं. उन्हीं में से एक है हार्ट से जुड़ी दो गंभीर स्थितियां, हार्ट अटैक और सडन कार्डियक अरेस्ट, यह अक्सर लोगों को एक जैसी लगती हैं, लेकिन असल में दोनों बिल्कुल अलग होती हैं. आसान भाषा में समझें तो हार्ट अटैक ब्लड के फ्लो  से जुड़ी समस्या है, जबकि कार्डियक अरेस्ट दिल की इलेक्ट्रिकल सिस्टम में गड़बड़ी का नतीजा होता है. 

क्या होता है हार्ट अटैक?

हार्ट के बारे में जानकारी देने वाली संस्था अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, हार्ट अटैक तब होता है जब दिल तक खून पहुंचाने वाली किसी आर्टरीज में ब्लॉकेज हो जाता है. इस वजह से दिल के एक हिस्से तक खून और ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती. अगर समय रहते ब्लॉकेज नहीं हटाया गया, तो उस हिस्से की मांसपेशियां धीरे-धीरे डैमेज होने लगती हैंय
हार्ट अटैक के लक्षण कई बार अचानक और तेज हो सकते हैं, लेकिन कई मामलों में यह धीरे-धीरे भी शुरू होता है, जैसे सीने में हल्का दर्द, दबाव, सांस लेने में तकलीफ या थकान. खास बात यह है कि हार्ट अटैक के दौरान दिल धड़कना बंद नहीं करता. महिलाओं में इसके लक्षण पुरुषों से अलग भी हो सकते हैं, इसलिए अक्सर इसे पहचानना मुश्किल हो जाता है.

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क्या होता है सडन कार्डियक अरेस्ट?

सडन कार्डियक अरेस्ट अचानक होता है और कई बार बिना किसी चेतावनी के सामने आता है. इसमें दिल की धड़कन को नियंत्रित करने वाला इलेक्ट्रिकल सिस्टम फेल हो जाता है, जिससे दिल अनियमित तरीके से धड़कने लगता है या पूरी तरह रुक जाता है. ऐसी स्थिति में दिल शरीर के जरूरी अंगों जैसे दिमाग और फेफड़ों तक खून नहीं पहुंचा पाता. इसमें व्यक्ति तुरंत बेहोश हो जाता है, पल्स नहीं मिलती और अगर कुछ ही मिनटों में मदद न मिले, तो जान जाने का खतरा होता है.

दोनों के बीच क्या कनेक्शन है?

हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट आपस में जुड़े हो सकते हैं. कई बार हार्ट अटैक के दौरान या उसके बाद कार्डियक अरेस्ट हो सकता है. हालांकि, हर हार्ट अटैक कार्डियक अरेस्ट में नहीं बदलता.लेकिन यह जरूर है कि हार्ट अटैक से कार्डियक अरेस्ट का जोखिम बढ़ जाता है. इसके अलावा, दिल से जुड़ी अन्य समस्याएं भी हार्ट रिद्म को बिगाड़कर कार्डियक अरेस्ट का कारण बन सकती हैं.

हार्ट अटैक की स्थिति में क्या करें?

अगर हार्ट अटैक का शक हो, तो बिना समय गंवाए तुरंत इमरजेंसी नंबर पर कॉल करें. हर मिनट कीमती होता है। एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचना बेहतर होता है, क्योंकि मेडिकल टीम रास्ते में ही इलाज शुरू कर सकती है और अस्पताल में भी जल्दी उपचार मिल पाता है.

कार्डियक अरेस्ट में क्या करें?

सडन कार्डियक अरेस्ट जानलेवा स्थिति है और तुरंत कार्रवाई जरूरी होती है. ऐसे में कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन यानी सीपीआर देना जीवन बचा सकता है. समय पर सीपीआर मिलने से व्यक्ति के बचने की संभावना दोगुनी या तिगुनी तक हो सकती है. हार्ट से जुड़ी इन दोनों स्थितियों का फर्क समझना बेहद जरूरी है. सही समय पर पहचान और तुरंत मदद ही जान बचाने में सबसे अहम भूमिका निभाती है.

इसे भी पढ़ेंः सारी मेडिकल रिपोर्ट नॉर्मल फिर भी बना रहता है सिरदर्द, जानें कहां है दिक्कत?

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सीने में इंफेक्शन से कब हो जाती है इंसान की मौत, आशा भोसले का इसी बीमारी से हुआ निधन?

सीने में इंफेक्शन से कब हो जाती है इंसान की मौत, आशा भोसले का इसी बीमारी से हुआ निधन?


Asha Bhosle Death Reason: भारतीय संगीत की सबसे महान गायिकाओं में से एक आशा भोसले का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है. उन्हें शनिवार को  ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जब उन्हें दिल और सांस से जुड़ी दिक्कतें हुईं. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत ठीक नहीं चल रही थी. हालत बिगड़ने पर उन्हें गंभीर अवस्था में अस्पताल लाया गया, जहां शनिवार रात उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया था. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे सीने में इंफेक्शन से इंसान की मौत हो जाती है. 

सीने का इंफेक्शन कई बार मामूली सर्दी-खांसी जैसा लगता है, लेकिन कुछ मामलों में यही समस्या तेजी से गंभीर रूप ले सकती है. प्न्यूमोनिया एक ऐसी ही स्थिति है, जिसमें फेफड़ों में इंफेक्शन हो जाता है. यह बैक्टीरिया, वायरस या फंगस के कारण होता है और फेफड़ों के टिश्यू में सूजन के साथ उनमें पानी या पस भर सकता है. यही वजह है कि सांस लेना मुश्किल होने लगता है और ऑक्सीजन का स्तर गिर सकता है. 

लंग्स होते हैं प्रभावित

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार,  प्न्यूमोनिया एक या दोनों फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है। जब दोनों फेफड़े इंफेक्टेड होते हैं, तो इसे डबल या बाइलेटरल प्न्यूमोनिया कहा जाता है, जो ज्यादा खतरनाक हो सकता है. खासकर बैक्टीरियल प्न्यूमोनिया वायरल की तुलना में ज्यादा गंभीर माना जाता है और कई बार अस्पताल में भर्ती की जरूरत पड़ सकती है.  रिपोर्ट में बताया गया है कि सीने का इंफेक्शन तब जानलेवा बनता है, जब यह तेजी से बढ़कर शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई को प्रभावित करने लगता है. अगर समय पर इलाज न मिले, तो फेफड़ों में सूजन बढ़ती जाती है और सांस लेने में दिक्कत गंभीर रूप ले लेती है. ऐसी स्थिति में मरीज को वेंटिलेटर सपोर्ट तक की जरूरत पड़ सकती है.

अलग- अलग तरह के इंफेक्शन

प्न्यूमोनिया के अलग-अलग प्रकार भी होते हैं, जो इसकी गंभीरता तय करते हैं. कम्युनिटी-एक्वायर्ड प्न्यूमोनिया आमतौर पर बाहर से होने वाला इंफेक्शन है, जबकि हॉस्पिटल-एक्वायर्ड प्न्यूमोनिया ज्यादा खतरनाक होता है क्योंकि यह एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से होता है और इलाज मुश्किल हो सकता है। इसी तरह वेंटिलेटर पर रहने वाले मरीजों में होने वाला इंफेक्शन भी जानलेवा साबित हो सकता है.

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65 साल से ऊपर के लोगों को ज्यादा खतरा

सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जिनकी इम्यूनिटी कमजोर होती है. 65 साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्ग, छोटे बच्चे, पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे लोग, स्मोकिंग करने वाले या कीमोथेरेपी जैसी ट्रीटमेंट ले रहे मरीज इस जोखिम में ज्यादा आते हैं. ऐसे लोगों में इंफेक्शन तेजी से बढ़ सकता है और हालत जल्दी बिगड़ सकती है.

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