डायबिटीज है तो सोच समझ कर खाएं फल, जानें क्या खा सकते हैं क्या नहीं?

डायबिटीज है तो सोच समझ कर खाएं फल, जानें क्या खा सकते हैं क्या नहीं?


डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर ब्लड शुगर को सही तरीके से कंट्रोल नहीं कर पाता है. वहीं भारत में भी बड़ी संख्या में लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं. गलत लाइफस्टाइल, खानपान, कम फिजिकल और स्ट्रेस इसके बड़े कारण माने जाते हैं. वहीं डायबिटीज को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन सही डाइट और लाइफस्टाइल अपनाकर इसे कंट्रोल में जरूर रखा जा सकता है. ऐसे में अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि डायबिटीज में फल खाना सही है या नहीं. चलिए तो आज हम आपको बताते हैं कि डायबिटीज है तो आपको फल सोच समझकर क्यों खाने चाहिए और डायबिटीज में आप क्या खा सकते हैं और क्या नहीं.

क्या डायबिटीज में फल खा सकते हैं?

आमतौर पर डायबिटीज के मरीज फल खा सकते हैं. दरअसल फलों में मौजूद नेचुरल शुगर के साथ-साथ फाइबर भी होता है, जो ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने से रोकता है. वहीं फाइबर पाचन को धीमा करता है, जिससे शुगर लेवल अचानक नहीं बढ़ता और पेट भी लंबे समय तक भरा रहता है. इसके अलावा फल विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं जो सेहत के लिए जरूरी हैं. डायबिटीज में फल खा तो सकते हैं लेकिन कई प्रकार के फलों को खाने से डायबिटीज के मरीजों को परेशानी भी हो सकती है. दरअसल फल खाने पर शरीर उसमें मौजूद फ्रुक्टोज को ग्लूकोज में बदलता है, जिससे ब्लड शुगर बढ़ सकता है. लेकिन फलों में मौजूद फाइबर इस प्रक्रिया को धीरे कर देता है. इसकी वजह से डायबिटीज के मरीजों के लिए फल मिठाइयों और मीठे ड्रिंक्स की तुलना में भी ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं, क्योंकि उनमें फाइबर नहीं होता.

डायबिटीज में कौन-से फल ज्यादा सही माने जाते हैं?

डायबिटीज के मरीजों के लिए लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल ज्यादा सही होते हैं, क्योंकि ये ब्लड शुगर को धीरे-धीरे बढ़ाते हैं. ऐसे फलों में सेब, नाशपाती, संतरा, अंगूर, अनार, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, चेरी, कीवी, आड़ू, अंजीर और एवाकाडो शामिल होते हैं. इन फलों को सीमित मात्रा में डायबिटीज के मरीज रोजाना की डाइट में शामिल कर सकते हैं.

डायबिटीज में किन फलों से बरतनी चाहिए सावधानी?

कुछ फल ऐसे होते हैं जिनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज्यादा होता है. ये फल शुगर लेवल को तेजी से बढ़ा सकते हैं, इसलिए इन्हें बहुत सीमित मात्रा में ही खाने की सलाह दी जाती है. इन फलों में केला, आम, अनानास, तरबूज और किशमिश शामिल है. इसके अलावा पैकेट वाले जूस, कैन्ड फल और मीठा सेब का सॉस डायबिटीज में खतरनाक हो सकते हैं क्योंकि इनमें फाइबर कम और शुगर ज्यादा होती है. वहीं आपको बता दे कि फ्रूट जूस में फाइबर नहीं होता और शुगर ज्यादा कंसंट्रेट होती है, जिससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकती है. इसलिए डायबिटीज के मरीजों को जूस की जगह पूरा फल खाने की सलाह दी जाती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मुर्गा, खासकर चिकन थाई और ड्रमस्टिक, फैट और कैलोरी में ज्यादा होता है. इससे कैलोरी सरप्लस बनाना आसान हो जाता है, जो वजन बढ़ाने के लिए जरूरी है. साथ ही इसमें आयरन, जिंक और सेलेनियम भी भरपूर होते हैं.



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सफेद ब्रेड देखने में भले ही खतरनाक न लगे, लेकिन यह स्किन के लिए सबसे बड़े दुश्मनों में से एक है. एक्सपर्ट्स के अनुसार व्हाइट ब्रेड का ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी ज्यादा होता है, जिससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है. इससे शरीर में इंसुलिन और सूजन बढ़ती है, जो पिंपल्स और समय से पहले झुर्रियों की वजह बन सकती है.

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Published at : 06 Jan 2026 10:01 AM (IST)

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Taking Medicines Without Prescription: बुखार या हल्का दर्द होते ही मेडिकल स्टोर से दवा ले लेना भारत में आम बात हो गई है. बिना डॉक्टर की सलाह के लोग पेनकिलर, बुखार की दवा और खांसी की सिरप का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा दर्द निवारक दवा निमेसुलाइड  के हाईडोज पर रोक लगाए जाने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में है कि यह लापरवाही कितनी खतरनाक साबित हो सकती है.

दरअसल, इसको लेकर हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि एंटीबायोटिक और एसिड की दवाओं के अलावा भारत में सबसे ज्यादा गलत तरीके से इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं में पेन किलर, खांसी की सिरप और नींद की गोलियां शामिल हैं. इन दवाओं का जरूरत से ज्यादा या गलत तरीके से सेवन शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है.

क्या होता है नुकसान?

दर्द, सूजन और बुखार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं को नॉनस्टेरॉइडल कहा जाता है. इनमें पैरासिटामोल, आइबुप्रोफेन, डाइक्लोफेनाक और नेप्रोक्सेन जैसी दवाएं शामिल हैं. पैरासिटामोल को आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा लीवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. खासतौर पर शराब पीने वालों या पहले से लीवर की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए यह जानलेवा भी हो सकती है. डॉक्टर पीएन वेंकटेश ने संडे गार्जियन में अपने एक लेख में बताया कि पेनकिलर जैसे डाइक्लोफेनाक और केटोरोलैक लंबे समय तक लेने पर पेट में अल्सर, आंतरिक ब्लीडिंग, किडनी खराब होने, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा देते हैं.  इसके बावजूद ये दवाएं कई जगह बिना पर्ची के आसानी से मिल जाती हैं.

लंबे समय से खुलकर हो रहा यूज

एक्सपर्ट बताते हैं कि सरकार द्वारा जिस निमेसुलाइड बैन पर रोक लगाई गई है, उसे लीवर के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है. यह दवा कई देशों में पहले ही प्रतिबंधित है और भारत में 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है. इसके बाद भी लंबे समय तक इसका खुलेआम इस्तेमाल होता रहा. एक्सपर्ट यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि हर बुखार को सामान्य फ्लू मानना भारी भूल हो सकती है. डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड, निमोनिया, टीबी, यूरिन इंफेक्शन और मेनिन्जाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों की शुरुआत भी बुखार से होती है. ऐसे में सिर्फ बुखार की दवा लेने से बीमारी दब जाती है और सही इलाज में देरी हो जाती है, जो जानलेवा साबित हो सकती है.

डॉक्टर से सलाह लेना क्यों जरूरी?

भारत में दवाओं को अलग-अलग शेड्यूल में रखा गया है. कई पेनकिलर शेड्यूल H के तहत आते हैं, यानी इन्हें केवल डॉक्टर की पर्ची पर बेचा जाना चाहिए. लेकिन ये दवाएं बिना पर्ची के भी मिल जाती हैं. इसके अलावा दवाओं के मिलते-जुलते ब्रांड नाम भी एक बड़ा खतरा हैं, जिससे गलत दवा मिलने का जोखिम बना रहता है. स्वास्थ्य जानकारों का कहना है कि खुद से दवा लेने की आदत से पेट में अल्सर, अंदरूनी ब्लीडिंग, लीवर फेलियर, किडनी डैमेज और हार्ट अटैक तक का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टरों सलाह देते हैं कि बुखार या दर्द होने पर खुद से दवा लेने के बजाय डॉक्टर से परामर्श लिया जाए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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