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‘एक दाढ़ी-टोपी वाला जिहादी और दूसरा कोट-पेंट वाला, दोनों का एक ही सपना’, बांग्लादेश हिंसा पर बरसीं तसलीमा नसरीन
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कभी नाचते-कूदते तो कभी जिम करते-करते 16 से 45 साल के बीच के युवा अपनी जान गंवा रहे हैं. कई बार लगता है कि फलां शख्स तो पूरी तरह हेल्दी था, फिर अचानक सबकुछ खत्म कैसे हो गया? ऐसे मामलों को लेकर AIIMS नई दिल्ली ने एक स्टडी की, जिसमें बड़ा खुलासा हुआ है. आइए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं.
स्टडी में सामने आई यह बात
एम्स की स्टडी में सामने आया कि भारत में युवाओं में अचानक मौत का सबसे बड़ा कारण हार्ट डिजीज है. दरअसल, कोरोनरी आर्टरी डिजीज यानी धमनियों में ब्लॉकेज के कारण यूथ अचानक जान गंवा रहे हैं. बता दें कि यह रिसर्च मई 2023 से अप्रैल 2024 तक की गई. दरअसल, AIIMS के फॉरेंसिक मेडिसिन और पैथोलॉजी विभाग ने 2214 पोस्टमॉर्टम (शव परीक्षण) की जांच क. इनमें 180 मामलों (8.1%) को सडन डेथ माना गया. इनमें से 57.2% यानी 103 केसेज में जान गंवाने वालों की उम्र 18 से 45 साल के बीच थी, जो पूरी तरह स्वस्थ दिखते थे.
हार्ट डिजीज क्यों सबसे बड़ा कारण?
रिसर्च के अनुसार, युवाओं में हुई सडन डेथ में 42.6% मौतें हार्ट संबंधी कारणों से हुईं. इनमें सबसे ज्यादा केसेज कोरोनरी आर्टरी डिजीज (CAD) के मिले, जहां दिल की धमनियों में 70% या उससे ज्यादा ब्लॉकेज पाया गया. सबसे ज्यादा लेफ्ट एंटीरियर डिसेंडिंग (LAD) धमनी प्रभावित थी, जो दिल के लिए सबसे अहम है. AIIMS के पैथोलॉजी विभाग के प्रोफेसर और इस स्टडी के मुख्य लेखक डॉ. सुधीर अरावा के मुताबिक, ज्यादातर युवा कभी हार्ट चेकअप नहीं करवाते थे. वे कोई दवा भी नहीं लेते थे. बीमारी चुपके से बढ़ती रही और अचानक घातक हो गई.
ये कारण भी आए सामने
कब और कहां होती हैं ज्यादातर मौतें?
परिजनों के मुताबिक, मौत से पहले अचानक बेहोशी, सीने में दर्द, सांस फूलना या पेट दर्द जैसे लक्षण दिखे थे.
कोविड वैक्सीन या इंफेक्शन का कोई कनेक्शन नहीं
रिसर्च में साफ कहा गया है कि कोविड वैक्सीनेशन या कोविड इंफेक्शन से इन मौतों का कोई संबंध नहीं मिला. ज्यादातर लोगों ने वैक्सीन ली थी, लेकिन मौतें हार्ट की पुरानी बीमारी से हुईं. डॉ. सुधीर अरावा के मुताबिक, हमने एक साल में लगभग 100 युवा मौतों पर स्टडी की. वैक्सीन से जुड़ा कोई केस नहीं मिला. सिर्फ एक मामला मायोकार्डाइटिस का था, लेकिन वह भी वैक्सीन से जुड़ा नहीं पाया गया.
युवाओं में क्यों हो रहीं हार्ट प्रॉब्लम?
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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नारियल पानी पीना हमारी सेहत के लिए काफी असरदार माना जाता है. यह शरीर को ताकत देने और हाइड्रेट रखने में मदद करता है, जिससे शरीर स्वस्थ रहता है और बीमारियों से दूर रहता है. नारियल पानी से शरीर के जरूरी अंगों की कार्यक्षमता बढ़ती है और यह किडनी और हार्ट की सेहत के लिए भी फायदेमंद होता है. लेकिन सवाल यह उठता है कि सर्दियों के मौसम में नारियल पानी का सेवन करना चाहिए या नहीं. क्योंकि नारियल पानी को आमतौर पर गर्मियों का ड्रिंक माना जाता है और गर्मियों में लोग इसका भरपूर सेवन करते हैं. सर्दियों में लोग नारियल पानी पीने से हिचकते हैं. आइए इस लेख में इसे सही तरीके से समझते हैं.
नारियल पानी हमारी सेहत के लिए फायदेमंद है और यह किडनी, हार्ट और पाचन के लिए असरदार माना जाता है. डॉक्टर्स के अनुसार, सर्दियों में भी नारियल पानी का सेवन किया जा सकता है. यह सर्दियों में होने वाली बीमारियों से बचाव में मदद कर सकता है. ठंड के मौसम में बीमारियां शरीर पर ज्यादा हावी हो जाती हैं, लेकिन नारियल पानी के सेवन से कई फायदे मिल सकते हैं. हालांकि, सर्दियों में इसका सेवन करते समय कुछ सावधानियां जरूरी हैं.
सर्दियों के मौसम में नारियल पानी का सेवन किया जा सकता है, लेकिन गर्मियों की तरह इसे सुबह नहीं पीना चाहिए दोपहर के समय नारियल पानी पीना ज्यादा सही माना जाता है, जब धूप निकल चुकी हो. क्योंकि नारियल पानी की तासीर ठंडी होती है.
गर्मियों में लोग नारियल पानी को ठंडा करने के लिए फ्रिज में रख देते हैं, लेकिन सर्दियों में ऐसा करने से बचना चाहिए. सर्दियों में नारियल पानी को नॉर्मल टेम्परेचर पर ही पीना चाहिए. इससे खांसी, जुकाम और सर्दी जैसी बीमारियों का खतरा कम रहता है.
सर्दियों के मौसम में प्यास कम लगती है और लोग पानी का सेवन भी कम कर देते हैं, जो सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है. नारियल पानी पोषक तत्वों और इलेक्ट्रोलाइट्स से भरपूर होता है. इसका सेवन करने से शरीर हाइड्रेट रहता है और जरूरी पोषक तत्व भी शरीर तक पहुंचते हैं.
डॉक्टर्स के अनुसार, नारियल पानी शरीर को फ्रेश बनाए रखने में मदद करता है और पाचन को भी बेहतर करता है. अगर सर्दियों में नॉर्मल टेम्परेचर पर नारियल पानी का सेवन किया जाए, तो सर्दी, खांसी और पेट से जुड़ी समस्याओं से राहत मिल सकती है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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ओमान में 1 जनवरी 2026 से शादी करने वाले सभी कपल्स के लिए मेडिकल टेस्ट (प्रीमैरिटल मेडिकल एग्जामिनेशन) अनिवार्य कर दिया गया है. यह फैसला सुल्तान हैथम बिन तारिक की ओर से जारी रॉयल डिक्री नंबर 111/2025 के तहत लागू हुआ है. अब शादी का कॉन्ट्रैक्ट फाइनल करने से पहले दोनों पार्टनर को यह टेस्ट पास करना जरूरी है, चाहे शादी ओमान के अंदर हो या बाहर. अगर एक पार्टनर गैर-ओमानी भी है तो भी यह नियम लागू होगा. अब सवाल उठता है कि इस टेस्ट में किन बीमारियों की जांच की जाएगी?
क्यों लिया गया यह फैसला?
ओमान की हेल्थ मिनिस्ट्री ने यह नियम परिवारों की सेहत को बेहतर बनाने और आने वाली पीढ़ियों को जेनेटिक बीमारियों से बचाने के लिए बनाया है. पहले यह टेस्ट ऑप्शनल था, जो 1999 से चल रहा था. वहीं, 2025 में सिर्फ 42-43 पर्सेंट लोग ही इसे करवा रहे थे, जिसके चलते यह टेस्ट अनिवार्य कर दिया गया. माना जा रहा है कि अब ज्यादा से ज्यादा कपल्स यह जांच करवाएंगे.
किन बीमारियों की होती है जांच?
ओमान के इस नए नियम के तहत मुख्य रूप से दो तरह की जांच की जाती है.
1. खून की जेनेटिक बीमारियां (Hereditary Blood Disorders):
इन बीमारियों के कैरियर (वाहक) होने का पता लगाया जाता है. अगर दोनों पार्टनर कैरियर निकले तो बच्चे में यह बीमारी गंभीर रूप से आ सकती है. ओमान में ये बीमारियां बेहद कॉमन हैं और आंकड़ों के मुताबिक जनसंख्या का 9.5 पर्सेंट हिस्सा इनसे प्रभावित है.
2. संक्रामक रोग (Infectious Diseases)
ये बीमारियां एक पार्टनर से दूसरे में या मां से बच्चे में फैल सकते हैं. जांच से शुरुआत में ही इन बीमारियों का पता चल जाता है, जिससे इलाज आसान हो जाता है. ये टेस्ट प्राइमरी हेल्थकेयर सेंटर्स में किए जाते हैं. जांच पूरी होने पर कपल्स को फिटनेस सर्टिफिकेट मिलता है, जो शादी के कॉन्ट्रैक्ट के लिए जरूरी होता है. कपल्स की रिपोर्ट्स किसी तीसरे व्यक्ति के साथ शेयर नहीं की जाती हैं. इसका मतलब है कि प्राइवेसी का पूरा ध्यान रखा जाता है.
क्या कहते हैं डॉक्टर्स और एक्सपर्ट्स?
ओमान की हेल्थ मिनिस्ट्री में अंडरसेक्रेटरी डॉ. सईद बिन हारिब अल लामकी के मुताबिक, यह डिक्री पब्लिक हेल्थ को मजबूत करने और परिवारों की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी कदम है. इससे आनुवंशिक और संक्रामक बीमारियां आने वाली पीढ़ियों तक नहीं पहुंचेंगी. वहीं, ओमान में नेशनल सेंटर फॉर वुमेंस एंड चिल्ड्रेंस हेल्थ की हेड डॉ. राया बिंत सईद अल कम्मियानी के मुताबिक, प्रीमैरिटल स्क्रीनिंग से संक्रामक रोगों का फैलाव रुकता है और मां से बच्चे में बीमारी पहुंचने का खतरा कम होता है. शुरुआती पता चलने से समय पर इलाज और काउंसलिंग हो सकती है.
यह नियम क्यों बेहद जरूरी?
ओमान जैसी गल्फ कंट्रीज में कजिन मैरिज (चचेरे भाई-बहन की शादी) काफी कॉमन है. इससे आनुवंशिक बीमारियां ज्यादा फैलती हैं. सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे अन्य मुस्लिम देशों में भी ऐसे टेस्ट पहले से अनिवार्य हैं. सऊदी अरब में 2004 से यह नियम है, जहां सिकल सेल और थैलेसीमिया की जांच मुख्य है. यूएई में 2025 से जेनेटिक टेस्टिंग को और विस्तार दिया गया है, जहां 570 जीन की जांच होती है, जिनका कनेक्शन 840 से ज्यादा बीमारियों से होता है.
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सर्दियों के मौसम में मूंगफली खाना सभी को अच्छा लगता है. गर्म-गर्म मूंगफली सर्दियों में खाने से अलग ही स्वाद मिलता है. जैसे ही ठंड दस्तक देती है, सड़कों और मार्केटों में मूंगफली, गजक और रेवड़ी बिकनी शुरू हो जाती है और लोग बड़ी मात्रा में इसका सेवन करने लगते हैं. मूंगफली हमारे शरीर के लिए फायदेमंद होती है. यह शरीर को कई बीमारियों से बचाने में मदद करती है, जैसे हार्ट की बीमारियां, हड्डियों की मजबूती और पाचन से जुड़ी दिक्कतें. लेकिन ठंड के मौसम में जरूरत से ज्यादा मूंगफली का सेवन स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है और शरीर पर हानिकारक असर डालता है.
मूंगफली का सेवन करने से शरीर पर कई सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलते हैं. यह हड्डियों की मजबूती से लेकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव में भी मददगार मानी जाती है. हालांकि, ज्यादा मात्रा में मूंगफली खाने से कई तरह की बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है. डॉक्टर्स के अनुसार, हर व्यक्ति को अपने डेली रूटीन और डाइट में सिर्फ एक मुट्ठी मूंगफली ही खानी चाहिए. यानी एक दिन में लगभग 30 से 50 ग्राम मूंगफली का सेवन करना सही माना जाता है. आप चाहें तो इससे भी कम मात्रा, यानी 25 से 30 ग्राम मूंगफली का सेवन कर सकते हैं. इतनी मात्रा में मूंगफली खाने से वजन बढ़ने जैसी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता.
अगर कोई व्यक्ति जरूरत से ज्यादा मूंगफली का सेवन करता है, तो उसे वजन बढ़ने जैसी समस्या हो सकती है. मूंगफली में कैलोरी और फैट की मात्रा ज्यादा होती है. अगर आप रोज जरूरत से ज्यादा मूंगफली खाते हैं, तो धीरे-धीरे आपके वजन में बढ़ोतरी हो सकती है.
अगर किसी व्यक्ति को जोड़ों का दर्द या हड्डियों से जुड़ी बीमारियां हैं, जैसे आर्थराइटिस या गठिया, तो ऐसे लोगों को मूंगफली का सेवन बहुत कम या बिल्कुल नहीं करना चाहिए. मूंगफली में मौजूद प्रोटीन और यूरिक एसिड जोड़ों के दर्द को बढ़ा सकते हैं.
ज्यादा मात्रा में मूंगफली खाने से पाचन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. अगर आप जरूरत से ज्यादा मूंगफली का सेवन करते हैं, तो गैस, कब्ज और एसिडिटी जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.
ज्यादा मात्रा में मूंगफली के सेवन से हमारे लीवर पर हानिकारक असर हो सकता है. इससे लीवर में फैट जमा होने लगता है, जो फैटी लीवर जैसी समस्या का कारण बन सकता है और लीवर की कार्यक्षमता भी कम हो सकती है. इसलिए मूंगफली का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए.
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Most Unusual Diseases In The World: पिछले कुछ साल में तरह-तरह की बीमारी निकलने लगी हैं. जब बीमारियों की बात होती है तो सबसे पहले हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, माइग्रेन जैसी लाइफस्टाइल बीमारियां या फिर कैंसर और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियां दिमाग में आती हैं. लेकिन इनके अलावा दुनिया में कुछ ऐसी बेहद दुर्लभ बीमारियां भी हैं, जो कई साल से लोगों की जान ले रही हैं या गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर रही हैं. आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ अजीब और रेयर बीमारियों के बारे में, जिनके बारे में ज्यादातर लोग शायद जानते भी नहीं होंगे.
रेयर बीमारी क्या होती है?
रेयर बीमारियां वे होती हैं, जो सामान्य आबादी के बहुत ही कम लोगों को प्रभावित करती हैं. इनमें से कई बीमारियों का आज तक कोई पक्का इलाज नहीं मिल पाया है. जहां आम बीमारियों का इलाज बड़े अस्पतालों में संभव होता है, वहीं इन रेयर बीमारियों की पहचान और इलाज बेहद मुश्किल होता है. कई मामलों में ये बीमारियां जानलेवा भी साबित हो सकती हैं.
RPI डेफिशिएंसी
इसे दुनिया की सबसे दुर्लभ बीमारी माना जाता है. यह बीमारी शरीर में मौजूद एक अहम एंजाइम की कमी के कारण होती है, जिससे मांसपेशियों में अकड़न, दौरे और दिमाग के सफेद हिस्से को नुकसान पहुंच सकता है. अब तक इस बीमारी का सिर्फ एक ही मामला सामने आया है, जिसकी पहचान साल 1984 में हुई थी.
फील्ड्स डिजीज
यह एक न्यूरोमस्कुलर बीमारी है, जिसके अब तक सिर्फ दो ही मामले सामने आए हैं, वह भी जुड़वा बहनों में. इस बीमारी में मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं. मेडिकल एक्सपर्ट्स अभी भी इस पर रिसर्च कर रहे हैं.
हचिंसन-गिलफोर्ड प्रोजेरिया सिंड्रोम
इस बीमारी में बच्चों में समय से पहले बुढ़ापा आ जाता है. महज 2 साल के बच्चे भी बुजुर्ग जैसे दिखने लगते हैं। झुर्रीदार त्वचा, आंखों का उभरा होना और बालों का झड़ना इसके प्रमुख लक्षण हैं. यह बीमारी बेहद दुर्लभ है और इसका अब तक कोई इलाज नहीं है.
मेथेमोग्लोबिनेमिया
इस बीमारी में खून का रंग नीला दिखाई देता है. शरीर में एक खास तरह के हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ जाने से त्वचा, होंठ और नाखून नीले पड़ जाते हैं.
एक्वाजेनिक अर्टिकेरिया
खाने की चीजों से एलर्जी आम बात है, लेकिन पानी से एलर्जी होना बेहद रेयर है. इस बीमारी में पानी के संपर्क में आते ही त्वचा पर खुजली और लाल चकत्ते पड़ जाते हैं. ऐसे लोग पसीने, बारिश और बर्फ से भी एलर्जिक हो सकते हैं.
फॉरेन एक्सेंट सिंड्रोम
इस बीमारी में व्यक्ति अचानक अपनी सामान्य भाषा को अलग लहजे में बोलने लगता है. यह समस्या अक्सर दिमाग में चोट लगने के बाद होती है, जिससे बोलने की प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है.
स्टोन मैन डिजीज
इस बेहद दुर्लभ बीमारी में मांसपेशियां धीरे-धीरे हड्डियों में बदलने लगती हैं. समय के साथ व्यक्ति का शरीर जकड़ जाता है. हालांकि दिल, जीभ और आंखों की मांसपेशियां इससे प्रभावित नहीं होतीं.
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