तंबाकू जैसी खतरनाक है चिप्स और कोल्ड ड्रिंक की लत, रिसर्च में खुलासा

तंबाकू जैसी खतरनाक है चिप्स और कोल्ड ड्रिंक की लत, रिसर्च में खुलासा


Are Ultra Processed Foods as Addictive as Tobacco: कोल्ड ड्रिंक, चिप्स और कुकीज आज कई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. लेकिन क्या ये चीजें उतनी ही साधारण हैं, जितनी दिखती हैं? अमेरिका में हुई एक नई स्टडी ने चौंकाने वाली तुलना की है. रिसर्चर का कहना है कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स ताजे फल और सब्जियों से ज्यादा सिगरेट और तंबाकू जैसी इंडस्ट्री से मिलते-जुलते हैं, चाहे बात इनके असर की हो या इन्हें बनाने के तरीके की. उनका दावा है कि इन उत्पादों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि लोग इन्हें ज्यादा से ज्यादा खाएं.

यह स्टडी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन और ड्यूक यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने मिलकर किया है. इसे हेल्थ पॉलिसी पर केंद्रित जर्नल Milbank Quarterly में प्रकाशित किया गया. रिपोर्ट के अनुसार, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बनाने वाली कंपनियां,जैसे सॉफ्ट ड्रिंक, फ्रोजन पिज्जा और पैकेट वाले सीरियल्स,ऐसी इंजीनियरिंग स्ट्रैटेजी अपनाती हैं, जिनकी जड़ें कभी तंबाकू उद्योग में देखी गई थीं. मकसद साफ है कि उपभोक्ताओं को बार-बार और ज्यादा खाने के लिए प्रेरित करना.

इनमें क्या मिलाया जाता है?

इन फूड प्रोडक्ट्स में चीनी, नमक, फैट और एडिटिव्स की सटीक मात्रा मिलाई जाती है, ताकि दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को सक्रिय किया जा सके. रिसर्चर ने इन्हें सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि जानबूझकर तैयार किए गए, अत्यधिक इंजीनियर और स्वाद के लिहाज से अनुकूलित उत्पाद बताया है. स्वास्थ्य जोखिमों को देखते हुए एक्सपर्ट ने सुझाव दिया है कि इन पर तंबाकू की तरह सख्त नियम लागू किए जाएं, जैसे कि स्पष्ट चेतावनी लेबल, ज्यादा टैक्स, स्कूलों और अस्पतालों में बिक्री पर रोक और बच्चों को लक्षित विज्ञापनों पर नियंत्रण. हालांकि एक बड़ा फर्क यह है कि भोजन जीवन की बुनियादी जरूरत है, इसलिए इसे पूरी तरह टाला नहीं जा सकता. यही वजह है कि रेगुलेशन को और जरूरी माना जा रहा है.

पहले भी आ चुकी है चेतावनी

इस स्टडी के पहले The Lancet में प्रकाशित यूनिसेफ की रिपोर्ट में भी बताया गया था कि सर्वे किए गए 11 देशों में 5 साल से कम उम्र के 10 से 35 प्रतिशत बच्चे नियमित रूप से मीठी सॉफ्ट ड्रिंक पीते हैं. करीब 60 प्रतिशत युवाओं ने माना कि उन्होंने एक दिन पहले कम से कम एक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड प्रोडक्ट खाया था. अमीर देशों में अब ये उत्पाद रोज की कुल कैलोरी का आधे से ज्यादा हिस्सा बन चुके हैं, जबकि कम आय वाले देशों में भी इनकी खपत तेजी से बढ़ रही है. हालांकि साइंटिस्ट के बीच इस बात पर बहस जारी है कि क्या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को सचमुच तंबाकू के बराबर माना जा सकता है. लेकिन बच्चों और किशोरों की डाइट में इनकी बढ़ती हिस्सेदारी ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि आधुनिक फूड इंडस्ट्री की भूमिका और इसके नियमन को नए सिरे से देखने की जरूरत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिगरेट पीने वालों के वक्त से पहले आ जाता है गंजापन, हो जाइए सावधान

सिगरेट पीने वालों के वक्त से पहले आ जाता है गंजापन, हो जाइए सावधान


Does Smoking Cause Hair Loss: बाल झड़ने की समस्या से आज आज बड़ी संख्या में लोग परेशान हैं. कई पुरुष इसे बढ़ती उम्र का एक सामान्य हिस्सा समझकर स्वीकार कर लेते हैं. लेकिन अब सामने आ रही नई जानकारी बताती है कि इंग्लैंड में एक आम लाइफस्टाइल की आदत बालों के झड़ने की रफ्तार तेज कर सकती है और समय से पहले बाल सफेद भी कर सकती है. हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि धूम्रपान सिर्फ लंग्स और दिल के लिए ही नुकसानदायक नहीं है, बल्कि यह बालों की जड़ों को भी नुकसान पहुंचा सकता है.

कैसे स्मोकिंग से बालों को नुकसान होता है?

स्मोकिंग तंबाकू आपके बालों की जड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है और बाल झड़ने का खतरा बढ़ा सकता है. Wiley में पब्लिश साल 2020 में 20 से 35 साल के पुरुषों पर किए गए एक स्टडी में स्मोकर्स और नॉन-स्मोकर्स के बीच कम उम्र में होने वाले एंड्रोजेनेटिक एलोपेशिया यानी मेल पैटर्न गंजेपन की तुलना की गई. इसमें पाया गया कि 500 धूम्रपान करने वालों में से 425 लोगों में किसी न किसी स्तर पर बाल झड़ने की समस्या थी, जबकि 500 नॉन-स्मोकर्स करने वालों में यह संख्या सिर्फ 200 थी. हैमिल्टन-नॉरवुड स्केल के अनुसार ग्रेड 3 में हेयरलाइन काफी पीछे चली जाती है और ग्रेड 4 में सिर के ऊपरी हिस्से पर साफ गंजापन दिखने लगता है. शोध में सामने आया कि 47 प्रतिशत स्मोकर्स ग्रेड 3 और 24 प्रतिशत ग्रेड 4 तक पहुंच चुके थे, जबकि नॉन-स्मोकर्स में केवल 10 प्रतिशत लोग ही इन स्तरों तक पहुंचे. शोधकर्ताओं का मानना है कि निकोटिन और तंबाकू में मौजूद अन्य रसायन बाल झड़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं, हालांकि इस पर और अध्ययन की जरूरत है.

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ावा

धूम्रपान शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाता है, यानी फ्री रेडिकल्स की मात्रा ज्यादा हो जाती है. ये हानिकारक कण शरीर के सेल्स के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं. तंबाकू का धुआं, प्रदूषण और तेज धूप भी इसी तरह का असर डालते हैं. अगर बालों की जड़ों की सेल्स क्षतिग्रस्त हो जाएं तो बालों की ग्रोथ प्रभावित होती है. इसके साथ ही सिगरेट पीने से ब्लड फ्लो भी कमजोर होता है. ब्लड वेसल्स में प्लाक जमने लगता है, जिससे ऑक्सीजन और पोषक तत्व सिर की त्वचा तक सही मात्रा में नहीं पहुंच पाते. इससे बाल कमजोर होकर टूटने और झड़ने लगते हैं. इसके अलावा धूम्रपान शरीर में सूजन बढ़ाने वाले प्रोटीन को सक्रिय कर सकता है, हार्मोन के संतुलन को प्रभावित कर सकता है और बालों के ग्रोथ साइकल को कंट्रोल करने वाले एंजाइम्स में बदलाव ला सकता है. ये सभी कारण मिलकर समय से पहले बालों के पतले होने और गं जेपन की समस्या को बढ़ा सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आलू खाएं या शकरकंद… ब्लड शुगर में कौन सी चीज है बेहतर?

आलू खाएं या शकरकंद… ब्लड शुगर में कौन सी चीज है बेहतर?


Potato or Sweet Potato for Diabetic Patients: भारत में करीब 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज या अनकंट्रोल ब्लड शुगर की समस्या से जूझ रहे हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 20 से 79 साल की उम्र के लोगों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि भारत को दुनिया की ‘डायबिटीज कैपिटल’ कहा जाने लगा है. ऐसे में रोजाना की थाली में क्या रखा जाए और क्या नहीं, यह सवाल बेहद अहम हो जाता है. खासकर आलू और शकरकंद जैसी आम चीजों को लेकर लोगों के मन में अक्सर दुविधा रहती है कि ब्लड शुगर के मरीज के लिए कौन बेहतर है. चलिए आपको बताते हैं कौन सा सही है. 

भारत में कई किस्म के आलू

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि हर आलू एक जैसा नहीं होता. भारत में कई किस्में मिलती हैं और हर किस्म में स्टार्च और पोषक तत्वों की मात्रा अलग हो सकती है. इंडियन जर्नल ऑफ हॉर्टिकल्चर में प्रकाशित एक अध्ययन में सेंट्रल पोटैटो रिसर्च इंस्टीट्यूट, शिमला ने 46 भारतीय किस्मों का स्टडी किया. इसमें पाया गया कि कुछ किस्में जैसे कुफरी आनंद, कुफरी अरुण और कुफरी नीला में ऐसे गुण पाए गए जो कार्बोहाइड्रेट के टूटने की प्रक्रिया को धीमा कर सकते हैं, जिससे ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता. यानी यह मान लेना कि हर आलू डायबिटीज मरीज के लिए नुकसानदायक है, पूरी तरह सही नहीं है.

वहीं शकरकंद को लेकर इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित रिसर्च बताता है कि इसमें कैरोटेनॉइड्स, एंथोसायनिन्स और फेनोलिक एसिड जैसे बायोएक्टिव कंपाउंड होते हैं. ये तत्व इंसुलिन रेजिस्टेंस कम करने और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं. पोषण की बात करें तो सामान्य आलू में लगभग 17 ग्राम कार्बोहाइड्रेट प्रति 100 ग्राम होता है और इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स अधिक होता है, खासकर उबले या तले हुए रूप में. उबले आलू का जीआई 78 से 82 तक जा सकता है, जबकि तला हुआ आलू इससे भी ज्यादा असर डाल सकता है. हालांकि उबालकर ठंडा करने पर इसका जीआई थोड़ा कम हो जाता है.

शकरकंद में क्या खास?

दूसरी तरफ शकरकंद में लगभग 20 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, लेकिन इसका जीआई आमतौर पर 44 से 61 के बीच रहता है, जो तुलनात्मक कम है. इसमें फाइबर ज्यादा होता है, जो शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. साथ ही यह विटामिन ए, सी और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है.

कौन-सा होता है फायदेमंद?

आखिरकार सवाल यही है कि थाली में क्या रखें. एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर ब्लड शुगर कंट्रोल प्राथमिकता है तो शकरकंद बेहतर विकल्प हो सकता है. फिर भी आलू पूरी तरह से छोड़ना जरूरी नहीं है. मात्रा सीमित रखें, तले हुए रूप से बचें और दाल-सब्जी के साथ संतुलित आहार का हिस्सा बनाएं. सही मात्रा और सही तरीके से पकाने पर दोनों ही चीजें संतुलित डाइट का हिस्सा बन सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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एसिडिटी में कोल्ड ड्रिंक पीनी चाहिए या नहीं, क्या सच में इससे मिलता है आराम?

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Should You Drink Soda for Acidity: खाना खाने के बाद कई लोगों को एसिडिटी और गैस की समस्या हो जाती है. ऐसे में अक्सर लोग तुरंत राहत पाने के लिए कोल्ड ड्रिंक या सोडा पी लेते हैं. ठंडा और गैस वाला पेय कुछ मिनटों के लिए हल्का महसूस करा सकता है, लेकिन क्या यह सच में एसिडिटी ठीक करता है या यह सिर्फ एक भ्रम है?. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और ये कैसे काम करता है.

नुकसान हो सकता है

एक्सपर्ट बताते हैं कि कोल्ड ड्रिंक्स में बहुत ज्यादा मात्रा में शुगर और कार्बन डाइऑक्साइड होती है. इसके अलावा इनमें एसिड, आर्टिफिशियल फ्लेवर और कई तरह के केमिकल्स मिलाए जाते हैं. ये सभी चीजें पेट और लिवर के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं. लोगों को लगता है कि गैस वाली ड्रिंक पीने से डकार आ जाती है और पेट हल्का हो जाता है, लेकिन यह असली इलाज नहीं है.

डॉक्टरों के मुताबिक कोल्ड ड्रिंक एसिडिटी या गैस को खत्म नहीं करती. उल्टा, इनमें मौजूद ज्यादा चीनी और एसिड पाचन तंत्र को और ज्यादा उत्तेजित कर सकते हैं, जिससे पेट में एसिड का बाहर निकलना बढ़ सकता है. अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक नियमित रूप से ऐसी ड्रिंक पीता है तो पेट की समस्या और बढ़ सकती है. इससे फैटी लिवर का खतरा भी बढ़ता है और डायबिटीज के मरीजों के लिए तो यह और ज्यादा हानिकारक साबित हो सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इसको लेकर Dr.Jaison P Sharma ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें उन्होंने कहा कि “आजकल एक कॉमन सी चीज देखने को मिलती है कि खाने के बाद एसिडिटी होने पर लोग कोल्ड ड्रिंक पी लेते हैं. उनको लगता है कि इससे एसिडिटी ठीक हो जाएगी. लेकिन इसमें कार्बन डाइऑक्साइड होती है, जब हम इसको पीते हैं, तो एक डकार सी आती है और हमें लगता है कि एसिडिटी ठीक हो गई. उन्होंने आगे कहा कि ऐसा कुछ नहीं होता, कोल्ड ड्रिंक एसिडिटी का इलाज नहीं, बल्कि वजह है. 

 

एसिडिटी से राहत पाने के लिए क्या किया जाए? 

एक्सपर्ट नेचुरल और हल्के विकल्प अपनाने की सलाह देते हैं. नारियल पानी पेट को ठंडक देता है और एसिडिटी कम करने में मदद कर सकता है. छाछ पाचन को बेहतर बनाती है और गैस की समस्या घटाती है. सौंफ या जीरे का पानी भी पारंपरिक रूप से पेट के लिए फायदेमंद माना जाता है. पुदीना या तुलसी की चाय पेट को आराम पहुंचा सकती है. कुछ लोगों को दूध से भी राहत मिलती है, हालांकि यह हर व्यक्ति पर अलग तरह से असर कर सकता है, सिर्फ पेय बदलना ही काफी नहीं है, खानपान की आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है. बहुत ज्यादा मसालेदार और तला-भुना खाना एसिडिटी बढ़ा सकता है. जल्दी-जल्दी खाने के बजाय आराम से और अच्छे से चबाकर खाना पाचन में मदद करता है. छोटे-छोटे अंतराल पर हल्का भोजन करना भी फायदेमंद हो सकता है.

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शराब पीने वाले विदेशी का लिवर हेल्दी, न पीने वाले भारतीय को ‘फैटी लिवर’! क्या है इसकी वजह?

शराब पीने वाले विदेशी का लिवर हेल्दी, न पीने वाले भारतीय को ‘फैटी लिवर’! क्या है इसकी वजह?


Why Europeans Tolerate Alcohol Better Than Indians: इंसानों और शराब के बीच का रिश्ता हमेशा सीधा-सादा नहीं रहा है. इसमें संस्कृति, सामाजिक आदतें और शरीर की बनावट, तीनों की भूमिका होती है. हम में से कई लोग सीमित मात्रा में शराब का सेवन करते हैं, लेकिन देश में बड़ी आबादी फैटी लिवर की समस्या से जूझ रही है. अक्सर यह सवाल उठता है कि यूरोपीय लोग हमसे ज्यादा शराब पीते हैं, फिर भी उन्हें इससे उनको दिक्कत कम क्यों होती है? इसी विषय पर डॉक्टर हर्ष व्यास ने एक दिलचस्प जानकारी शेयर की है.

सोशल मीडिया पर शेयर किया जानकारी 

इंस्टाग्राम पर शेय एक वीडियो में उन्होंने 37 साल के एक इटालियन और 37 साल के एक भारतीय व्यक्ति की लिवर अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट की तुलना दिखाई, हैरानी की बात यह थी कि जो यूरोपीय व्यक्ति हफ्ते में दो-तीन बार शराब पीता था, उसका लिवर ज्यादा स्वस्थ दिखा, जबकि भारतीय व्यक्ति शराब नहीं पीता था, फिर भी उसके लिवर में फैटी बदलाव नजर आए, डॉ. व्यास के अनुसार इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. सबसे पहला कारण जेनेटिक्स है, उन्होंने बताया कि यूरोपीय लोगों में शराब को तोड़ने वाले एंजाइम, अल्कोहल डिहाइड्रोजनेज और एल्डिहाइड डिहाइड्रोजनेज की सक्रियता बेहतर होती है. इसका मतलब यह है कि शराब से बनने वाले जहरीले तत्व उनके शरीर से जल्दी बाहर निकल जाते हैं. जबकि एशियाई आबादी में ये एंजाइम उतने प्रभावी नहीं होते, जिससे ये हानिकारक तत्व शरीर में ज्यादा समय तक बने रह सकते हैं और धीरे-धीरे बाहर निकलते हैं.

 

लाइफस्टाइल का भी अहम रोल

दूसरा बड़ा कारण खानपान है. यूरोपियन डाइट में कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, मछली और सी-फूड के रूप में हेल्दी फैट, ऑलिव ऑयल और पर्याप्त प्रोटीन शामिल होता है. यानी उनका भोजन संतुलित और पोषण से भरपूर होता है. इसके मुकाबले भारतीय आहार में अक्सर रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की मात्रा ज्यादा होती है, जबकि हेल्दी फैट और प्रोटीन अपेक्षाकृत कम होते हैं. यह अंतर लिवर की सेहत पर असर डाल सकता है. तीसरा अहम पहलू है फिजिकल एक्टिविटी. डॉक्टर ने बताया कि उनके इटालियन मरीज रोज 5 से 6 किलोमीटर पैदल चलता था और इसके अलावा 30 से 40 मिनट एक्सरसाइज भी करता था. वहीं भारत में बड़ी संख्या में लोग रेगुलर एक्सरसाइज नहीं कर पाते और रोज 5 किलोमीटर चलना भी मुश्किल हो जाता है.

डॉ. व्यास का कहना है कि भले ही यूरोपीय लोग शराब पीते हों, लेकिन उनकी लाइफस्टाइल संतुलित और सक्रिय होती है. बेहतर डाइट, नियमित व्यायाम और अनुकूल जेनेटिक कारक मिलकर शरीर को हुए नुकसान की भरपाई करने में मदद करते हैं. जबकि यदि लाइफस्टाइल असंतुलित हो, तो बिना शराब के भी लिवर से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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