कैसे काम करती है डायलिसिस मशीन, यह कैसे करती है किडनी की मदद?

कैसे काम करती है डायलिसिस मशीन, यह कैसे करती है किडनी की मदद?


How Does a Dialysis Machine Help Kidneys: डायलिसिस कराने वाले मरीज इस प्रक्रिया की रूटीन से अच्छी तरह परिचित होते हैं. क्लिनिक पहुंचना, वजन मापना, तापमान और ब्लड प्रेशर चेक कराना, सुई लगना यदि कैथेटर न हो, फिर ट्यूबों को डायलाइजर से जोड़ना और कुछ घंटों तक कुर्सी पर बैठना,, यह सब उनकी नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है. लेकिन इंतज़ार के उन घंटों में क्या कभी आपने सोचा है कि आखिर यह डायलिसिस मशीन काम कैसे करती है और किडनी की मदद कैसे करती है?. चलिए आपको बताते हैं विस्तार से. 

कैसे काम करती है मशीन

सबसे पहले समझते हैं कि मशीन करती क्या है. किडनी हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली davita के अनुसार, डायलिसिस मशीन एक लिक्विड तरल तैयार करती है जिसे डायलिसेट कहा जाता है. यही तरल आपके खून से गंदगी और अतिरिक्त अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है. यह शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स और मिनरल्स का संतुलन भी बनाए रखने में सहायक होता है. इलाज के दौरान मशीन लगातार आपके शरीर से बाहर बह रहे खून के फ्लो पर नजर रखती है. कभी-कभी जो अलार्म बजता है, वह इसी निगरानी प्रणाली का हिस्सा है,ताकि स्टाफ को पता चल सके कि कुछ जांचने की जरूरत है.

मशीन के पास रखे प्लास्टिक के कनस्तर दरअसल डायलिसेट बनाने के लिए जरूरी घोल रखते हैं. इनमें एक एसिडिक घोल जिसमें इलेक्ट्रोलाइट्स और मिनरल्स होते हैं, बाइकार्बोनेट जो बेकिंग सोडा जैसा होता है और शुद्ध पानी शामिल होते हैं. मशीन इन सभी को मिलाकर सही अनुपात में डायलिसेट तैयार करती है. इलाज के दौरान आपका खून और डायलिसेट डायलाइजर के अंदर एक साथ बहते हैं, लेकिन वे सीधे संपर्क में नहीं आते. खून से गंदगी छनकर डायलिसेट में चली जाती है और बाद में वह तरल नाली में बहा दिया जाता है.

खून शरीर से बाहर और वापस अंदर कैसे जाता है?

 इसके लिए विशेष ब्लड ट्यूबिंग होती है, जो आपके एक्सेस से खून को डायलाइजर तक ले जाती है. यह ट्यूब एक ब्लड पंप से होकर गुजरती है, जो गोल घुमाव में चलता है. यही पंप खून को आगे बढ़ाता है और फिल्टर होने के बाद वापस शरीर में भेज देता है. इलाज के दौरान खून के थक्के न बनें, इसके लिए हेपेरिन नामक दवा दी जाती है. डॉक्टर हर मरीज के लिए इसकी मात्रा तय करते हैं. यह दवा सिरिंज के जरिए मशीन में लगे हेपेरिन पंप से धीरे-धीरे खून की ट्यूब में जाती रहती है, ताकि खून जमने न पाए.

सुरक्षा के लिए होते हैं एयर ट्रैप 

सुरक्षा के लिए मशीन में एयर ट्रैप लगे होते हैं, जो खून की ट्यूब में हवा जाने से रोकते हैं. अगर हवा का बुलबुला अंदर चला भी जाए, तो सेंसर तुरंत पंप बंद कर देता है और अलार्म बज उठता है. तब तक ब्लड फ्लो को रोका जाता है जब तक समस्या दूर न हो जाए. मशीन लगातार ब्लड के दबाव, प्रवाह, तापमान और डायलिसेट के मिश्रण की जांच करती रहती है. किसी भी गड़बड़ी पर अलार्म बजता है और जरूरत पड़ने पर ब्लड या लिक्किड का प्रवाह रोक दिया जाता है. यही वजह है कि इलाज के दौरान कई बार अलग-अलग अलार्म सुनाई देते हैं, ये आपकी सुरक्षा के लिए होते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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यूरिन की समस्या को न करें इग्नोर! किडनी से लेकर हार्ट तक की गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत

यूरिन की समस्या को न करें इग्नोर! किडनी से लेकर हार्ट तक की गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत


Is Frequent Urination a Sign of Diabetes: यूरिन संबंधी सेहत को अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. बार-बार यूरिन आना, जलन होना या यूरिन की धार कमजोर होना जैसी समस्याओं को कई लोग मामूली मान लेते हैं या उम्र बढ़ने का हिस्सा समझते हैं. लेकिन ये लक्षण शरीर के भीतर चल रही किसी बड़ी समस्या का संकेत भी हो सकते हैं. समय रहते ध्यान न दिया जाए तो छोटी परेशानी गंभीर बीमारी में बदल सकती है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. माधव सान्जगिरी ने मनीकंट्रोल से बात करते हुए कहा कि शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर इलाज बेहद जरूरी है. आज जांच और इलाज के आधुनिक तरीकों की वजह से कई यूरोलॉजिकल बीमारियों को शुरुआती चरण में ही कंट्रोल किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, एक साधारण-सी लगने वाली यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन अगर समय पर ठीक न की जाए तो इंफेक्शन यूरिनरी ब्लैडर से किडनी तक फैल सकता है. इससे किडनी में गंभीर इंफेक्शन, यहां तक कि सेप्सिस जैसी जानलेवा स्थिति भी पैदा हो सकती है.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

कभी-कभी किडनी की बीमारी लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के बढ़ती रहती है. यूरिन कम आना या यूरिन में खून आना शुरुआती संकेत हो सकते हैं. क्रॉनिक किडनी डिजीज कई बार तब पकड़ में आती है, जब काफी नुकसान हो चुका होता है. पुरुषों में यूरिन शुरू करने में दिक्कत, बूंद-बूंद टपकना या रात में बार-बार यूरिन के लिए उठना प्रोस्टेट से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है. अक्सर इसे सामान्य बढ़ती उम्र का असर समझ लिया जाता है, लेकिन कभी-कभी यह इंफेक्शन या कैंसर का भी संकेत हो सकता है.

महिलाओं में क्या दिखते हैं संकेत?

महिलाओं में पेशाब रोक न पाना या अचानक तेज पेशाब लगना आमतौर पर उम्र से जोड़ा जाता है, लेकिन यह ब्लैडर की काम करने की क्षमता या नसों से जुड़ी समस्या का परिणाम भी हो सकता है. अगर अनदेखा किया जाए तो यह डेली लाइफ, नींद और मेंटल हेल्थ पर असर डाल सकता है. यूरिन में दर्द या खून आने जैसे लक्षण पथरी की ओर इशारा कर सकते हैं. किडनी या ब्लैडर स्टोन बड़े होकर रुकावट, इंफेक्शन और तेज दर्द का कारण बन सकते हैं.

हार्ट की हो सकती है समस्या

रात में बार-बार पेशाब आना डायबिटीज या हार्ट संबंधी समस्या का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. खून में शुगर बढ़ने पर किडनी को ज्यादा काम करना पड़ता है, जिससे यूरिन की मात्रा बढ़ जाती है. एक्सपर्ट का मानना है कि यूरिन संबंधी लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए. समय पर जांच से इलाज आसान, सस्ता और कम दिक्कत हो सकता है. शरीर के संकेतों को समझकर डॉक्टर से सलाह लेना न सिर्फ ब्लैडर की सेहत बल्कि पूरे शरीर की भलाई के लिए जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गुड़-शहद सुरक्षित और जामुन-मेथी से बीमारी छूमंतर? जानें डायबिटीज से जुड़े इन दावों का असली सच

गुड़-शहद सुरक्षित और जामुन-मेथी से बीमारी छूमंतर? जानें डायबिटीज से जुड़े इन दावों का असली सच


Can You Cure Diabetes with Herbs: आज के दौर में सुपरफूड और चमत्कारी डाइट्स सोशल मीडिया पर तेजी से ट्रेंड करती हैं. ऐसे में सच और भ्रम के बीच फर्क समझना बेहद जरूरी हो गया है, खासकर तब जब भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज के साथ जी रहे हैं. कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल की कंसल्टेंट डाइटीशियन ऐश्वर्या ए. कुम्भाकोणी ने HT को  डायबिटीज का इलाज किसी एक मसाले या घरेलू नुस्खे से नहीं होता, बल्कि इसके लिए एक व्यवस्थित और व्यक्तिगत योजना की जरूरत होती है.

भारतीय घरों में अक्सर यह माना जाता है कि मेथी दाना, जामुन या दालचीनी डायबिटीज को “ठीक” कर सकते हैं. ऐश्वर्या साफ कहती हैं कि अब तक किसी एक खाद्य पदार्थ को डायबिटीज का इलाज साबित नहीं किया गया है। कुछ चीजें संतुलित आहार का हिस्सा बन सकती हैं, लेकिन ब्लड शुगर कंट्रोल के लिए दवा, नियमित व्यायाम और लगातार मॉनिटरिंग जरूरी है.

क्या हैं इसको लेकर मिथक?

एक आम मिथक यह है कि ज्यादा चीनी खाने से सीधे डायबिटीज हो जाती है. असल में, रिफाइंड शुगर और हाई-कैलोरी खाद्य पदार्थों का बार-बार सेवन वजन बढ़ाता है, खासकर पेट के आसपास की चर्बी, जिससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है. पैकेज्ड जूस, कोल्ड ड्रिंक और एनर्जी ड्रिंक जैसी मीठी चीजें टाइप 2 डायबिटीज के जोखिम से जुड़ी हैं. वहीं टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून स्थिति है. फल को लेकर भी भ्रम है कि डायबिटीज में इन्हें पूरी तरह छोड़ देना चाहिए. एक्सपर्ट के अनुसार, फल में प्राकृतिक शुगर होती है, लेकिन साथ में फाइबर, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं. सही मात्रा में और जूस की बजाय साबुत फल लेना बेहतर विकल्प है.

क्या शुगर फ्री सही है?

गुड़ और शहद को चीनी से ज्यादा सुरक्षित मानना भी सही नहीं. तीनों ही साधारण कार्बोहाइड्रेट हैं और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ा सकते हैं. इसी तरह, चावल को पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है. मात्रा नियंत्रित रखें और उसे दाल, सब्जी और प्रोटीन के साथ संतुलित करें. “शुगर-फ्री” मिठाइयों को भी खुलकर खाना सुरक्षित नहीं है. इनमें फैट और कैलोरी अधिक हो सकती है. वहीं यह भी सच है कि डायबिटीज सिर्फ मोटे लोगों को नहीं होती. दुबले दिखने वाले लोगों में भी अंदरूनी चर्बी इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ा सकती है. ऐश्वर्या के अनुसार, डायबिटीज का कोई चमत्कारी इलाज नहीं है. मेडिकल न्यूट्रिशन थेरेपी, संतुलित भोजन, फाइबर और प्रोटीन का सही अनुपात, और नियमित लाइफस्टाइल ही लंबी अवधि में बेहतर परिणाम देती है. सही जानकारी के साथ लिया गया पोषण ही सेहत की असली ताकत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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रमजान में रोजा कैसे रखें डायबिटीज के मरीज, डॉक्टर से जानें फास्टिंग विंडो मैनेज करने का तरीका

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Can People with Type 2 Diabetes Fast During Ramadan: रमजान का रोजा बेहद अहम होता है, लेकिन डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए इसे सोच-समझकर रखने की जरूरत होती है. सही तैयारी, संतुलित भोजन, पर्याप्त पानी और डॉक्टर की सलाह के साथ कई लोग सुरक्षित तरीके से रोजा रख सकते हैं. बिना प्लानिंग के लंबे समय तक भूखे-प्यासे रहने से ब्लड शुगर अचानक गिर या बढ़ सकती है, डिहाइड्रेशन हो सकता है और मुश्किलें पैदा हो सकती हैं.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

डॉ. अंशुल सिंह ने TOI को बताया कि रोजा शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. ब्लड शुगर की नियमित जांच करना भी उतना ही अहम है और इससे रोजा नहीं टूटता. शुगर लेवल अचानक गिरने या बढ़ने का समय रहते पता चल जाता है. डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. राजीव कोविल के अनुसार सबसे पहले “रिस्क स्ट्रैटिफिकेशन” जरूरी है. जिन लोगों की टाइप 2 डायबिटीज कंट्रोल में है, वे मेडिकल निगरानी में रोजा रख सकते हैं. लेकिन जिन मरीजों को किडनी रोग, हार्ट डिजीज, हार्ट फेल्योर, गर्भावस्था या हालिया इंफेक्शन है, उन्हें रोजा रखने से बचना चाहिए. दवाओं में बदलाव भी जरूरी हो सकता है, खासकर अगर मरीज इंसुलिन या सल्फोनाइलयूरिया ले रहा हो. सुबह की डोज़ कम या शाम में शिफ्ट की जा सकती है ताकि शुगर बहुत नीचे न गिरे.

आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

सहरी का खाना संतुलित होना चाहिए, धीरे पचने वाले कार्बोहाइड्रेट, पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर शामिल हों. जैसे ओट्स उपमा के साथ उबला अंडा, बेसन चीला के साथ दही, ग्रिल्ड चिकन और मिलेट रोटी, या सब्ज़ी ऑमलेट. नमकीन और ज्यादा मीठे भोजन से बचें क्योंकि ये प्यास बढ़ाते हैं और शुगर तेजी से बढ़ा सकते हैं. इफ्तार में रोजा धीरे-धीरे खोलें. खजूर परंपरा का हिस्सा है, लेकिन उसकी मात्रा कार्बोहाइड्रेट गिनती में शामिल करें. एक खजूर और पानी से शुरुआत करें, फिर कुछ देर बाद हल्का सूप लें. प्लेट में आधी मात्रा बिना स्टार्च वाली सब्जियों की, चौथाई भाग प्रोटीन जैसे कि चिकन, मछली, दाल और चौथाई भाग साबुत अनाज रखें. तले हुए पकवान और अत्यधिक मिठाई से बचें, क्योंकि रात में शुगर तेजी से बढ़ सकती है.

ब्लड ग्लूकोज चेक कराना जरूरी

डॉ. डेविड चैंडी बताते हैं कि दिन में कई बार ब्लड ग्लूकोज चेक करना जरूरी है, जिसमें सहरी से पहले, दोपहर में, शाम को और इफ्तार के दो घंटे बाद. यदि शुगर 70 mg/dL से कम या 300 mg/dL से ज्यादा हो जाए या चक्कर, पसीना, कमजोरी या डिहाइड्रेशन के लक्षण हों, तो तुरंत रोजा तोड़ देना चाहिए. हाइड्रेशन भी बेहद जरूरी है. इफ्तार और सहरी के बीच 8 से 10 गिलास तरल लें, जिसमें नींबू पानी, इन्फ्यूज़्ड वाटर, छाछ, सूप या हर्बल चाय बेहतर विकल्प हैं. कैफीन सीमित रखें. एक्सपर्ट का कहना है कि रमजान और डायबिटीज साथ-साथ चल सकते हैं, लेकिन शर्त है कि तैयारी, संतुलन और मेडिकल निगरानी सही से होना चाहिए. 

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लॉन्ग वर्किंग आवर्स और देर तक जागने की मजबूरी, जानें दिल के लिए यह कितना खतरनाक?

लॉन्ग वर्किंग आवर्स और देर तक जागने की मजबूरी, जानें दिल के लिए यह कितना खतरनाक?


Can Long Working Hours Cause Heart Attack: आज की हमेशा काम में व्यस्त का कल्चर में देर रात तक जागना और लंबे घंटे काम करना कई लोगों के लिए उपलब्धि का प्रतीक बन गया है. लेकिन इस भागदौड़ के पीछे एक खामोश खतरा पनप रहा है. हालिया रिसर्च बताते हैं कि अनियमित नींद और 55 घंटे या उससे ज्यादा काम करना सिर्फ थकान ही नहीं बढ़ाता, बल्कि हार्ट पर गंभीर दबाव भी डालता है.

अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, लंबे समय तक काम करना, नाइट शिफ्ट और अनरेगुलर शेड्यूल हार्ट रोग के बड़े जोखिम कारणों में से हैं. डब्लूएचओ और आईएलओ के संयुक्त एनालिसिस में पाया गया कि 2016 में लंबे कार्य घंटों से जुड़े कारणों से लाखों लोगों की मौत हार्ट रोग और स्ट्रोक से हुई. जो लोग सप्ताह में 55 घंटे या उससे अधिक काम करते हैं, उनमें 35 से 40 घंटे काम करने वालों की तुलना में जोखिम काफी ज्यादा पाया गया.

एक्सपर्ट बताते हैं कि नींद सिर्फ आराम नहीं, बल्कि वह समय है जब हार्ट और ब्लड वेसल्स खुद को दुरुस्त करती हैं. लगातार कम नींद लेने से सूजन बढ़ती है, आर्टरीज में प्लाक जमने का खतरा बढ़ता है और ब्लड शुगर व मेटाबॉलिज्म गड़बड़ा सकते हैं. इससे मोटापा और डायबिटीज का जोखिम भी बढ़ता है, जो हार्ट की बीमारी के बड़े कारण है.

नाइट शिफ्ट से क्या होती है दिक्कत?

हमारा शरीर 24 घंटे की सर्कैडियन रिद्म, पर चलता है, नाइट शिफ्ट या अनरेगुलर सोने-जागने का समय इस तालमेल को बिगाड़ देता है. नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के सपोर्ट में हुए रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों की नींद का समय बेहद अनियमित होता है, उनमें हार्ट रोग का खतरा लगभग दोगुना हो सकता है. नींद बिगड़ने पर ब्लड प्रेशर बढ़ता है, कॉर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन बढ़ते हैं, सूजन बढ़ती है और कोलेस्ट्रॉल व शुगर नियंत्रण बिगड़ता है, ये सब हार्ट पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं.

क्या होते हैं लक्षण?

एक्सपर्ट के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति लगातार 6 से 7 घंटे से कम सोता है, तो शरीर तनाव की स्थिति में रहता है. इससे हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर बढ़ते हैं और लंबे समय में दिल का दौरा या स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है. कुछ शुरुआती संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है, जिसमें आराम की स्थिति में भी हाई ब्लड प्रेशर, सीने में असहजता या धड़कन का तेज होना, हल्की मेहनत में सांस फूलना, लगातार थकान या दिनभर सुस्ती. ऐसे लक्षण बार-बार दिखें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

आापको क्या करना चाहिए?

हार्ट को सुरक्षित रखने के लिए रोज 7 से 9 घंटे की क्वालिटी वाली नींद लेने की कोशिश करें. रेगुलर सोने-जागने का समय रखें, रात में भारी भोजन और स्क्रीन टाइम कम करें. नाइट शिफ्ट हो तो भी भोजन, व्यायाम और आराम का समय तय रखें. दिन में हल्की-फुल्की गतिविधि या टहलना व्लड फ्लो को बेहतर बनाता है. शराब और ज्यादा कैफीन से बचें, योग या ध्यान से तनाव कम करें. साथ ही ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और शुगर की नियमित जांच करवाते रहें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या वाकई फायदेमंद होती है हाई-प्रोटीन डाइट या ओवरहाइप्ड, जानें क्या है सच?

क्या वाकई फायदेमंद होती है हाई-प्रोटीन डाइट या ओवरहाइप्ड, जानें क्या है सच?


Is High Protein Diet Safe: प्रोटीन अब सिर्फ जिम तक सीमित नहीं रहा, यह रोजमर्रा की रसोई का हिस्सा बन चुका है. सोशल मीडिया खोलिए, सुपरमार्केट जाइए या किसी कैफे का मेन्यू देखिए, आपको हर जगह “हाई-प्रोटीन” लिखा नजर आता है. शेक, स्नैक बार, आटा, सीरियल… सब कुछ अतिरिक्त प्रोटीन का वादा कर रहा है. इसका मैसेज साफ है कि ज्यादा प्रोटीन खाइए, वजन घटाइए, मसल्स बनाइए और लंबे समय तक पेट भरा रखिए. लेकिन न्यूट्रिशन साइंस इतनी आसान लाइन में नहीं सिमटता.

प्रोटीन शरीर के लिए जरूरी है. यह टिश्यू की मरम्मत करता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, हार्मोन और एंजाइम बनाने में मदद करता है और इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करता है. शरीर इसे अमीनो एसिड में तोड़ता है, जो कई अहम प्रक्रियाओं में काम आते हैं. सवाल यह है कि क्या हर थाली में दोगुना प्रोटीन जोड़ना सच में जरूरी है या यह ट्रेंड जरूरत से ज्यादा बड़ा हो गया है?. चलिए जानते हैं कि एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

एचओडी कल्पना गुप्ता ने TOI को बताया कि प्रोटीन की जरूरत उम्र, जेंडर, फिजिकल एक्टिविटी और मेटाबॉलिक स्थिति पर निर्भर करती है. ICMR की गाइडलाइन बताती है कि भारतीयों के आहार में प्रोटीन अक्सर कम और अनाज ज्यादा होते हैं, इसलिए संतुलित मात्रा में प्रोटीन बढ़ाना जरूरी है. दूध, दही, पनीर, अंडा, दाल, चिकन जैसे सोर्स अच्छे विकल्प हैं. कुछ रिसर्च बताती हैं कि व्यायाम के साथ ज्यादा प्रोटीन लेने से वजन घटाने और ब्लड शुगर कंट्रोल में मदद मिल सकती है, खासकर टाइप 2 डायबिटीज वाले लोगों में. वहीं दाल, बीन्स और सोया जैसे पौध-आधारित प्रोटीन हार्ट स्वास्थ्य के लिए बेहतर माने गए हैं. हालांकि, अत्यधिक प्रोटीन सेवन से चमत्कारी फायदे होने के ठोस प्रमाण सीमित हैं.

किडनी पर डाल सकता है दबाव

बहुत ज्यादा प्रोटीन किडनी पर दबाव डाल सकता है, खासकर उन लोगों में जिन्हें पहले से किडनी की समस्या हो. ज्यादा प्रोटीन लेने से फाइबर और अन्य पोषक तत्वों की कमी भी हो सकती है, जिससे पाचन संबंधी दिक्कतें बढ़ सकती हैं. बिना सलाह के सप्लीमेंट या प्रोटीन पाउडर लेना भी सही नहीं. ज्यादा प्रोटीन की जरूरत उन लोगों को हो सकती है जो नियमित रूप से तेज गति से व्यायाम करते हैं या उम्रदराज हैं. आम तौर पर 0.8 से 1.2 ग्राम प्रति किलो वजन पर्याप्त माना जाता है. कल्पना गुप्ता का सुझाव है कि हर खाने में एक प्रोटीन सोर्स जोड़ें, जैसे कि नाश्ते में दूध या अंडा, दोपहर या रात के खाने में दाल, दही या चिकन. इसके अलावा बिस्किट की जगह मेवे या भुना चना लें.

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