क्या रात में बार-बार खुलती है आपकी भी नींद, जानें किन बीमारियों से बढ़ रही परेशानी?

क्या रात में बार-बार खुलती है आपकी भी नींद, जानें किन बीमारियों से बढ़ रही परेशानी?


Why Do I Wake Up Frequently At Night: रात में बार-बार नींद खुलने की दिक्कत यानी इंसोम्निया एक आम लेकिन परेशान करने वाली नींद से जुड़ी समस्या है. इसमें व्यक्ति को रात में नींद आने में दिक्कत होती है या फिर बार-बार नींद खुल जाती है. कई बार ऐसा भी होता है कि सुबह बहुत जल्दी आंख खुल जाती है और दोबारा नींद नहीं आती. पूरी रात बिस्तर पर बिताने के बाद भी सुबह थकान महसूस होती है. धीरे-धीरे यह समस्या एनर्जी के स्तर को कम कर देती है, मूड पर असर डालती है और कामकाज की क्षमता के साथ-साथ लाइफ की क्वालिटी को भी प्रभावित करती है. चलिए आपको बताते हैं कि ऐसा क्यों होता है और कब डॉ. से मिलने की जरूरत होती है.

क्यों होती है दिक्कत?

हेल्थ के विषयों में जानकारी देने वाली Mayoclinic के अनुसार, हर व्यक्ति के लिए पर्याप्त नींद की मात्रा अलग हो सकती है, लेकिन ज्यादातर एडल्ट को रोजाना 7 से 9 घंटे की नींद की जरूरत होती है. जीवन में कभी-न-कभी अधिकतर लोगों को कम समय के लिए इंसोम्निया की शिकायत होती है, जो कुछ दिनों या हफ्तों तक रह सकती है. यह अक्सर तनाव, चिंता या किसी इमोशनल घटना के कारण होती है. हालांकि कुछ लोगों में यह समस्या लंबी अवधि तक बनी रहती है. यदि तीन महीने या उससे अधिक समय तक नींद की परेशानी जारी रहे, तो इसे क्रॉनिक इंसोम्निया कहा जाता है. कई बार यह अपने आप में एक बीमारी होती है, तो कभी यह किसी अन्य शारीरिक समस्या या दवाइयों के कारण भी हो सकती है.

इनसे बढ़ती है दिक्कत

मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं जैसे एंग्जायटी या डिप्रेशन अनिद्रा को बढ़ा सकती हैं. कुछ दवाइयां, लंबे समय तक रहने वाला दर्द, अस्थमा, थायरॉयड, एसिडिटी, स्लीप एपनिया या रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम जैसी स्थितियां भी कारण बनती हैं. उम्र बढ़ने के साथ नींद हल्की हो जाती है और दवाओं का सेवन बढ़ने से भी परेशानी बढ़ सकती है. बच्चों और किशोरों में अक्सर उनकी बदली हुई सर्कैडियन रिदम के कारण देर से नींद आने की समस्या देखी जाती है.

कब आपको डॉक्टर से मिलना चाहिए?

अनिद्रा के लक्षण सिर्फ रात तक सीमित नहीं रहते. दिन के समय थकान, चिड़चिड़ापन, उदासी या घबराहट महसूस होना आम है. ध्यान लगाने में कठिनाई, काम में गलती होना या छोटी-छोटी बातों पर ज्यादा चिंता करना भी इसके संकेत हो सकते हैं. अगर नींद की कमी आपकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. एक्सपर्ट कारण जानकर उचित इलाज की दिशा तय करते हैं और जरूरत पड़ने पर स्लीप टेस्ट की भी सलाह दे सकते हैं, ताकि समस्या की जड़ तक पहुंचा जा सके.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सीमा हैदर को 11 महीने में हुए 2 बच्चे, इतना कम गैप बच्चों के लिए कितना खतरनाक?

सीमा हैदर को 11 महीने में हुए 2 बच्चे, इतना कम गैप बच्चों के लिए कितना खतरनाक?


Is 2 Babies In 11 Months Dangerous: पाकिस्तान से भारत आई सीमा हैदर सुर्खियों में बनी रहती हैं. इस बार उनके छठे बच्चे के जन्म को लेकर चर्चा हो रही है. दरअसल सीमा ने ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में बेटे को जन्म दिया है. रिपोर्ट्स के अनुसार मां और बच्चा दोनों पूरी तरह सुरक्षित हैं. बेटे के जन्म के बाद परिवार में खुशियों की लहर है और बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है. आपको बता दें कि सीमा ने 11 महीने पहले एक बेटी को जन्म दिया था,जो सचिन मीणा से सीमा का पहला बच्चा था. चलिए आपको बताते हैं कि दोनों बच्चों के जन्म के बीच इतना कम गैप होने की वजह कितनी खतरनाक है.

कम अंतर पर क्या होता है दिक्कत?

लगातार कम अंतर में दो बच्चों का जन्म होने पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या मां और बच्चे की सेहत पर इसका असर पड़ता है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट mayoclinic के अनुसार, मेडिकल रिसर्च बताती है कि अगर पहली डिलीवरी के छह महीने के भीतर दोबारा गर्भ ठहर जाए, तो कुछ स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं. रिपोर्ट  के अनुसार, बहुत कम गैप होने पर समय से पहले डिलीवरी जैसे 37 हफ्तों से पहले जन्म, बच्चे का कम वजन और जन्म से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं की आशंका बढ़ जाती है. मां के लिए एनीमिया यानी खून की कमी का खतरा भी ज्यादा हो सकता है. दरअसल, गर्भावस्था और ब्रेस्टफीडिंग के दौरान शरीर में आयरन और फोलेट जैसे जरूरी पोषक तत्व कम हो जाते हैं. अगर शरीर को रिकवरी का पर्याप्त समय न मिले, तो अगली प्रेग्नेंसी में मुश्किल बढ़ सकती हैं.

बहुत कम गैप और बहुत ज्यादा गैप दोनों से दिक्कत

 Mayoclinic की रिपोर्ट में बताया गया है कि सिर्फ कम गैप ही नहीं, बहुत ज्यादा अंतर भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जाता. लंबे समय बाद गर्भधारण करने पर गर्भावस्था में हाई बीपी से जुड़ी गंभीर स्थिति या कठिन प्रसव का जोखिम बढ़ सकता है. यही वजह है कि अधिकतर एक्सपर्ट एक जीवित जन्म के बाद अगली प्रेग्नेंसी के लिए 18 से 24 महीने का अंतर रखने की सलाह देते हैं, जबकि पांच साल से ज्यादा का गैप भी उचित नहीं माना जाता.

हालांकि हर महिला की शारीरिक स्थिति अलग होती है. 35 साल से अधिक उम्र, पहले प्रीमैच्योर डिलीवरी, सी-सेक्शन या अन्य मुश्किलें टाइमिंग को प्रभावित कर सकती हैं.  इसलिए कम अंतर में दो बच्चों की योजना बनाते समय डॉक्टर से सलाह लेना बेहद जरूरी है, ताकि मां और बच्चे दोनों की सेहत सुरक्षित रह सके.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

 

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बार-बार आता है गुस्सा तो हो जाइए सावधान, हो सकती है दिल की बीमारी

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Can Anger Cause Heart Attack: अगर आपको बात-बात पर गुस्सा आता है और हर बात पर गुस्सा आता है, तो आपको सावधान होने की जरूरत है.  एक हालिया स्टडी ने गुस्से और दिल की सेहत के बीच संबंध को लेकर नई चिंता पैदा की है. रिसर्च में पाया गया कि सिर्फ आठ मिनट का तीव्र गुस्सा भी शरीर की ब्लड वेसल्स पर असर डाल सकता है. साइंटिस्ट के अनुसार, इतने कम समय की नाराजगी के बाद रब्लड वेसल्स के फैलने की क्षमता लगभग आधी रह गई और यह असर करीब 40 मिनट तक बना रहा. यानी गुस्सा केवल इमोशनल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि दिल के लिए शारीरिक खतरा भी बन सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे यह आपके शरीर पर असर करता है.

अमेरिका में हुआ रिसर्च

अमेरिका के कई संस्थानों के शोधकर्ताओं ने 280 स्वस्थ एडल्ट पर यह स्टडी किया. इन प्रतिभागियों को चार समूहों में बांटा गया. कुछ लोगों से कहा गया कि वे आठ मिनट तक किसी ऐसी घटना को याद करें जिससे उन्हें गुस्सा, उदासी या चिंता हुई हो, जबकि एक समूह को तटस्थ रहने के लिए केवल गिनती बोलने को कहा गया. इसके बाद वैज्ञानिकों ने उनकी ब्लड वेसल्स की कार्यक्षमता जांची, खासकर यह कि वे कितनी अच्छी तरह फैल सकती हैं.

क्या निकला रिजल्ट?

परिणाम चौंकाने वाले थे. जिन लोगों ने गुस्से वाली घटना को याद किया, उनमें ब्लड वेसल्स के फैलने की क्षमता में स्पष्ट गिरावट देखी गई. जबकि उदासी या चिंता महसूस करने वाले समूह में ऐसा असर नहीं पाया गया. इसका मतलब है कि गुस्सा अन्य नकारात्मक भावनाओं से अलग और अधिक प्रभावी ढंग से दिल पर दबाव डालता है. जब हम गुस्सा होते हैं, तो शरीर में स्ट्रेस हार्मोन जैसे कोर्टिसोल और एड्रेनालिन तेजी से बढ़ जाते हैं. ये हार्मोन धमनियों की भीतरी परत को संकुचित कर देते हैं, जिससे रक्त प्रवाह प्रभावित होता है और रक्तचाप बढ़ सकता है। एक बार का गुस्सा स्थायी नुकसान नहीं करता, लेकिन अगर ऐसा बार-बार हो, तो ब्लड वेसल्स को सामान्य होने का पर्याप्त समय नहीं मिलता. लंबे समय में यह स्थिति प्लाक जमने, हार्ट अटैक या स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा सकती है.

क्या हो सकती है दिक्कत?

एक्सपर्ट का मानना है कि गुस्से को हल्के में लेना सही नहीं है. अगर कोई व्यक्ति अक्सर चिड़चिड़ा रहता है या छोटी-छोटी बातों पर भड़क जाता है, तो उसे तनाव को मैनेज करने के तरीके अपनाने चाहिए, गहरी सांस लेना, नियमित एक्सरसाइज, योग या ध्यान जैसी तकनीकें दिल को सुरक्षित रखने में मदद कर सकती हैं. जरूरत पड़े तो काउंसलर या थेरेपिस्ट से बात करना भी फायदेमंद हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिर्फ जिम जाने से नहीं बनेगी बात, दिमाग को भी चाहिए ‘कसरत’; न्यूरोलॉजिस्ट से जानें 3 आसान तरीके

सिर्फ जिम जाने से नहीं बनेगी बात, दिमाग को भी चाहिए ‘कसरत’; न्यूरोलॉजिस्ट से जानें 3 आसान तरीके


How To Improve Brain Health Naturally: हम सभी जानते हैं कि शरीर को फिट रखने के लिए एक्सरसाइज जरूरी है, जैसे कि चलना, वेट उठाना, स्ट्रेचिंग करना आदि.  लेकिन अक्सर हम एक अहम चीज भूल जाते हैं. दिमाग को भी कसरत की जरूरत होती है और वह सिर्फ कभी-कभार क्रॉसवर्ड हल करने से पूरी नहीं होती. दिमाग भी शरीर के अन्य अंगों की तरह है. अगर उसे चुनौती नहीं दी जाए, तो वह सुस्त पड़ने लगता है. नई चीजें सीखना, जैसे कोई भाषा, वाद्ययंत्र, नई हॉबी, गहराई से पढ़ना या सार्थक बातचीत करना ये ब्रेन में नए न्यूरल कनेक्शन बनाता है। यही कनेक्शन याददाश्त और सोचने की क्षमता को मजबूत बनाए रखते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

आज के समय में ब्रेन एक्सरसाइज और भी जरूरी हो गई है. हम रास्ते याद रखने के बजाय जीपीएस पर निर्भर हैं, ध्यान लगाने की बजाय लगातार स्क्रॉल करते रहते हैं और एक साथ कई काम करने की कोशिश करते हैं. धीरे-धीरे इससे ध्यान की क्षमता और मेंटल सहनशक्ति प्रभावित हो सकती है. न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विवेक कुमार ने TOI को बताया कि, मेंटल एक्सरसाइज स्वास्थ्य बनाए रखने, उम्र से जुड़ी गिरावट कम करने और मानसिक लचीलापन बढ़ाने में मदद करते हैं. पहेलियां सुलझाना, सुडोकू खेलना, नई स्किल सीखना या माइंडफुलनेस का अभ्यास करना, ये सब याददाश्त, ध्यान और इमोशनल संतुलन बेहतर करने में सहायक हैं.

मल्टीटास्किंग कैसे प्रभावित करती है?

मल्टीटास्किंग को अक्सर प्रोडक्ट का प्रतीक माना जाता है, लेकिन डॉक्टर बताते हैं कि लगातार काम बदलने से दिमाग पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है. इससे कार्यक्षमता कम हो सकती है, ध्यान अवधि घटती है और मानसिक थकान बढ़ती है. लंबे समय तक ऐसा करने से तनाव और बर्नआउट का खतरा भी बढ़ सकता है. ध्यान और माइंडफुलनेस के लाभ भी अब रिसर्च से साबित हो रहे हैं. रेगुलर ध्यान से तनाव हार्मोन कोर्टिसोल कम हो सकता है, ब्लड प्रेशर कंट्रोल रहता है और मानसिक स्पष्टता बढ़ती है. सांसों पर ध्यान केंद्रित करना या शांत बैठकर मन को स्थिर करना इमोशनल संतुलन मजबूत करता है.

क्या करना चाहिए आपको?

कुछ शुरुआती संकेत भी हैं जिन पर ध्यान देना चाहिए, डेली कामों में बाधा डालने वाली भूलने की आदत, निर्णय क्षमता में कमी, तारीख या स्थान भूल जाना, बार-बार वही सवाल दोहराना, या मूड में अचानक बदलाव. ये संकेत बताते हैं कि कॉग्निटिव स्वास्थ्य को गंभीरता से लेने का समय आ गया है. डॉ. कुमार तीन सरल आदतें सुझाते हैं कि रोज कोई दिमागी खेल या पहेली हल करें, नई स्किल या शौक अपनाएं और सामाजिक मेलजोल बढ़ाएं. छोटे लेकिन नियमित प्रयास दिमाग को सक्रिय, तेज और संतुलित बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं.

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हेडफोन लगाते हैं तो हो जाइए सावधान, जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से हो सकती है ये बीमारी

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Can Headphones Cause Permanent Hearing Loss: आज के दौर में टेक्नोलॉजी हमारी जरूरत भी है और मजबूरी भी. ईयरफोन या हेडफोन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. सुबह की वॉक हो, मेट्रो का सफर, बस में यात्रा, कैफे में बैठना या ऑफिस में कॉल, हर जगह लोग कानों में ईयरफोन लगाए नजर आते हैं. इससे आसपास के लोगों को भले परेशानी न हो, लेकिन लगातार और लापरवाही से इस्तेमाल आपकी सुनने की क्षमता पर गंभीर असर डाल सकता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन का अनुमान है कि अनसेफ सुनने की आदतों के कारण दुनिया भर में करीब एक अरब युवा सुनने की क्षमता खोने के जोखिम में हैं.

सबसे बड़ी चिंता आवाज की तीव्रता और इस्तेमाल की अवधि को लेकर है. ईयरफोन बहुत कम दूरी से तेज आवाज सीधे कानों तक पहुंचाते हैं. लगातार ऊंची आवाज़ में संगीत सुनना या लंबे समय तक ईयरफोन लगाए रखना, दोनों ही खतरनाक हैं. इसके अलावा, ईयरफोन अलग-अलग जगहों पर रखे जाते हैं, जिससे उन पर बैक्टीरिया जमा हो जाते हैं. इन्हें शेयर करने से इंफेक्शन का खतरा और बढ़ जाता है.

क्या होती है दिक्कत?

Manipalhospitals की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब हम तेज़ आवाज में कुछ सुनते हैं तो ध्वनि तरंगें कान के पर्दे को कंपन करती हैं. यह कंपन अंदरूनी कान के कोक्लिया तक पहुंचता है, जहां हजारों सूक्ष्म हेयर सेल्स होती हैं. तेज आवाज इन कोशिकाओं पर ज्यादा दबाव डालती है. लगातार ऐसा होने पर ये सेल्स अपनी संवेदनशीलता खो सकती हैं या स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती हैं. यही स्थिति शोर से होने वाली सुनने की कमी का कारण बनती है.

कई लोगों को कानों में घंटी बजने जैसी आवाज़ सुनाई देने लगती है, जिसे टिनिटस कहा जाता है. कुछ मामलों में सामान्य आवाजें भी असहनीय लगने लगती हैं, जिसे हाइपरएक्यूसिस कहते हैं. लंबे समय तक तेज शोर के संपर्क में रहने से चक्कर आना, कान दर्द, अत्यधिक ईयरवैक्स जमा होना और बार-बार इंफेक्शन की समस्या भी हो सकती है.

इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए?

हेल्थ एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि आवाज़ हमेशा मध्यम रखें और लगातार लंबे समय तक न सुनें. नॉइज-कैंसिलिंग या ओवर-द-ईयर हेडफोन बेहतर विकल्प हो सकते हैं क्योंकि ये बाहरी शोर कम कर देते हैं, जिससे वॉल्यूम बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती. ईयरफोन को रेगुलर रूप से साफ करना भी जरूरी है. सफर के दौरान पहले से शोर भरे माहौल में ईयरफोन लगाने से बचें, क्योंकि इससे कुल डेसिबल स्तर और बढ़ जाता है. छोटी-सी सावधानी आपके कानों को स्थायी नुकसान से बचा सकती है.

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क्या सिर में भी चढ़ जाती है गैस, जानें कितनी खतरनाक होती है यह बीमारी?

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Can Gas Cause Headache: आपके साथ कितनी बार ऐसा हुआ है कि सिर में धड़कता दर्द हुआ और आपने उसे बस तनाव समझकर नजरअंदाज कर दिया? ऑफिस का दबाव, अनरेगुलर दिनचर्या और जल्दबाजी में खाया गया खाना, इन सबके बीच सिरदर्द आम बात लगने लगता है. लेकिन हर सिरदर्द का कारण तनाव नहीं होता. कई बार इसकी जड़ पेट में छिपी होती है. इसे ही आम भाषा में गैस से होने वाला सिरदर्द या गैस्ट्रिक हेडेक कहा जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि गैस सर पर कब चढ़ जाती है. 

गैस्ट्रिक सिरदर्द कोई सामान्य टेंशन या साइनस हेडेक नहीं है. यह तब होता है जब डाइजेशन सिस्टम  में गड़बड़ी, जैसे अपच, एसिडिटी या गैस होती है. पेट और दिमाग के बीच गहरा संबंध है. जब पेट में असंतुलन होता है तो शरीर रिएक्शन देता है, और कई लोगों में यह दर्द सिर तक पहुंच जाता है. मसालेदार खाना, अनियमित भोजन, ज्यादा चाय-कॉफी और लगातार तनाव इस समस्या को बढ़ा सकते हैं.

कब होती है दिक्कत?

Bangaloregastrocentre की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य गैस्ट्रिक सिरदर्द और गैस्ट्रिक माइग्रेन में फर्क समझना भी जरूरी है. गैस्ट्रिक सिरदर्द हल्का या लगातार रहने वाला दर्द हो सकता है, जबकि गैस्ट्रिक माइग्रेन ज्यादा तीव्र, धड़कन जैसा दर्द देता है. इसमें रोशनी और आवाज से परेशानी, मितली या उल्टी भी हो सकती है. दोनों ही स्थितियों में मूल कारण डाइजेशन की गड़बड़ी ही होती है. अगर यह समस्या कभी-कभार हो तो चिंता की बात नहीं, लेकिन बार-बार होने लगे तो इसे नजरअंदाज न करें. लगातार गैस्ट्रिक सिरदर्द क्रॉनिक गैस्ट्राइटिस, पेप्टिक अल्सर, गालब्लैडर की बीमारी, इर्रिटेबल बॉवेल सिंड्रोम या गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज जैसी गंभीर स्थितियों का संकेत हो सकता है.

डॉक्टर से कब मिलें? 

अगर सिरदर्द हफ्ते में दो बार से ज्यादा हो रहा है, वजन बिना कारण कम हो रहा है, लगातार उल्टी या तेज पेट दर्द हो रहा है या घरेलू उपायों से आराम नहीं मिल रहा, तो गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह लें. जरूरत पड़ने पर एंडोस्कोपी जैसी जांच से डाइजेशन सिस्टम की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है. इलाज का आधार केवल दर्दनिवारक दवा नहीं, बल्कि पाचन सुधारना है. समय पर खाना, हल्का और संतुलित आहार, पर्याप्त पानी और डिप्रेशन कंट्रोल से काफी राहत मिल सकती है. आप इसको सिर्फ यह कहकर नहीं टाल सकते कि सिर में गैस चढ़ गई है और खासकर तब जब आपको यह समस्या बार-बार हो रही हो. अगर आप समय पर इसपर ध्यान नहीं देते हैं, तो आगे चलकर यह आपके लिए काफी दिक्कत का कारण बन सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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