दिल की नस ब्लॉक होने से पहले दिखते हैं ये लक्षण, पहचान लेंगे तो बच जाएगी जान

दिल की नस ब्लॉक होने से पहले दिखते हैं ये लक्षण, पहचान लेंगे तो बच जाएगी जान


Early Symptoms Of Blocked Heart Arteries: आपका दिल कई बार बिना शोर किए संकेत देता है और अगर इन्हें समय रहते पहचान लिया जाए, तो जान बचाई जा सकती है. दुनियाभर में दिल की सबसे आम बीमारी कोरोनरी आर्टरी डिजीज है, जिसमें दिल तक ऑक्सीजन और पोषण पहुंचाने वाली नसें ठीक से काम नहीं कर पातीं.  हार्ट की नसें अचानक ब्लॉक नहीं होतीं. यह प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है, जिसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है, इसमें नसों के अंदर फैट जमा होने लगता है.

शुरुआत में कोई खास लक्षण नहीं दिखते, लेकिन समय के साथ नसें संकरी और सख्त हो जाती हैं. अक्सर पहला संकेत सीने में दबाव या दर्द के रूप में सामने आता है. रोजमर्रा के काम करते समय सांस फूलना या पैरों में सूजन भी दिल से जुड़ी परेशानी का संकेत हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह किस वजह से होता है और इसके बचाव के लिए आप क्या कर सकते हैं. 

क्यों होती है ब्लॉकेज?

Medanta की एक रिपोर्ट के अनुसार, ब्लॉकेज का कारण प्लाक होता है. यह कोलेस्ट्रॉल, फैट, कैल्शियम और अन्य तत्वों का मिक्स होता है, जो नसों की दीवारों पर जमा हो जाता है. इससे ब्लड का फ्लो प्रभावित होता है और शरीर के अंगों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती. इसके पीछे कई वजहें होती हैं, जिसमें खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) का बढ़ना, अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) का कम होना, हाई ब्लड प्रेशर, धूम्रपान और डायबिटीज जैसी समस्याएं. ये सभी नसों को नुकसान पहुंचाकर प्लाक बनने की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं.

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जब प्लाक बढ़ता है, तो ब्लड का फ्लो कम हो जाता है और दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. कई बार प्लाक फटने पर खून का थक्का बन जाता है, जो हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण बन सकता है. 

कैसे होते हैं इसके लक्षण?

शुरुआती लक्षणों में सीने में जकड़न या दर्द, हल्के काम में सांस फूलना, बिना वजह थकान, कंधे-हाथ या जबड़े तक फैलता दर्द, चक्कर आना और दिल की धड़कन का अनियमित होना शामिल हैं. ब्लॉकेज शरीर के अलग-अलग हिस्सों में अलग असर दिखा सकता है. हार्ट में दर्द और पसीना, दिमाग में सुन्नपन या बोलने में दिक्कत, पैरों में चलने पर दर्द और गर्दन में कमजोरी जैसे संकेत नजर आ सकते हैं.

कैसे कर सकते हैं इसको ठीक?

अगर दिक्कत की बात करें तो हाई बीपी, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, खराब लाइफस्टाइल, उम्र और पारिवारिक हिस्ट्री इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं. हालांकि, सही खानपान, रेगलुर व्यायाम और समय पर जांच से इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है. डॉक्टर जांच के लिए ब्लड टेस्ट, ईसीजी, स्ट्रेस टेस्ट, इकोकार्डियोग्राम, एंजियोग्राफी और सीटी स्कैन जैसी जांचें करते हैं, जिससे नसों की स्थिति का सही पता चल सके.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आपके कान आपको दे रहे हैं चेतावनी? इन संकेतों को पहचानें, वरना हो सकती है गंभीर समस्या

क्या आपके कान आपको दे रहे हैं चेतावनी? इन संकेतों को पहचानें, वरना हो सकती है गंभीर समस्या


When To See A Doctor For Ear Pain: अक्सर देखा जाता है कि लोग कान से जुड़े शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर देते हैं. कई मरीज तब डॉक्टर के पास पहुंचते हैं जब समस्या काफी बढ़ चुकी होती है और इलाज भी जटिल हो जाता है. दरअसल, कान सिर्फ सुनने का काम नहीं करते, बल्कि शरीर के संतुलन, ब्रेन की काम करने की क्षमता और ओवरऑल हेल्थ से भी जुड़े होते हैं. इसलिए समय रहते लक्षणों को पहचानना और सही इलाज करवाना बहुत जरूरी है.

क्यों नहीं करना चाहिए इग्नोर?

डॉ. दीप्ति सिन्हा ने TOI में अपने लेख में बताया कि कान में लगातार दर्द या असहजता को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर कान में भारीपन, बंद होने जैसा एहसास या हल्का लेकिन लगातार दर्द महसूस हो रहा है, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं. जैसे कान में मैल जमना, फंगल या बैक्टीरियल संक्रमण, मिडिल ईयर इंफेक्शन या यूस्टेशियन ट्यूब से जुड़ी समस्या. खासतौर पर जिन लोगों को डायबिटीज है, उनके लिए कान का इंफेक्शन ज्यादा खतरनाक हो सकता है. ऐसे मामलों में मैलिग्नेंट ओटिटिस एक्सटर्ना नाम की गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, जो आगे चलकर हड्डियों तक फैल सकती है.

सुनने की क्षमता भी हो सकती है प्रभावित

सुनने की क्षमता में कमी भी एक अहम चेतावनी संकेत हो सकता है. अगर आपको बार-बार लोगों से बात दोहराने के लिए कहना पड़ता है, टीवी की आवाज ज्यादा करनी पड़ती है या शोर वाली जगह पर बातचीत समझने में दिक्कत होती है, तो तुरंत हियरिंग टेस्ट कराना चाहिए. खासकर बुजुर्गों को हर साल सुनने की जांच करानी चाहिए, क्योंकि हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और किडनी की बीमारी सुनने की क्षमता को तेजी से प्रभावित कर सकती है. कई बार यह समस्या मिडिल ईयर में पानी भरने, कान के पर्दे में छेद या अन्य समस्याओं के कारण भी होती है, जिनका इलाज सर्जरी से संभव है.

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किस तरह की हो सकती है दिक्कत?

कानों में घंटी बजने, भनभनाहट या अजीब आवाज सुनाई देना, जिसे टिनिटस कहा जाता है, भी एक सामान्य लेकिन गंभीर संकेत हो सकता है. यह समस्या इनर ईयर की गड़बड़ी, नसों को नुकसान, ज्यादा शोर के संपर्क या ब्लड सर्कुलेशन से जुड़ी समस्या के कारण हो सकती है. यदि यह समस्या लगातार बनी रहती है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है. इसके अलावा चक्कर आना, सिर घूमना या संतुलन बिगड़ना भी अक्सर इनर ईयर की समस्या से जुड़ा होता है. कुछ स्थितियों जैसे वेस्टिब्युलर न्यूराइटिस, पोजिशनल वर्टिगो या लैबिरिन्थाइटिस में मरीज को अचानक तेज चक्कर और मतली की शिकायत हो सकती है.

कान से पानी या पस आना, खुजली, बदबू या गंदगी दिखना भी इंफेक्शन या कान के पर्दे में छेद का संकेत हो सकता है. बच्चों में कई बार छोटे-छोटे खिलौने या अन्य वस्तुएं भी कान में फंस जाती हैं, जिन्हें घर पर निकालने की कोशिश करना खतरनाक हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या है एंडोमेट्रियोसिस, जानें महिलाओं की फर्टिलिटी को कैसे प्रभावित करती है यह बीमारी?

क्या है एंडोमेट्रियोसिस, जानें महिलाओं की फर्टिलिटी को कैसे प्रभावित करती है यह बीमारी?


Can Women With Endometriosis Get Pregnant: एंडोमेट्रियोसिस एक ऐसी स्थिति है, जिसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत जैसी टिश्यू शरीर के अन्य हिस्सों में भी बढ़ने लगती है. यह बीमारी अक्सर चुपचाप महिलाओं की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करती है और कई बार माता-पिता बनने का सपना देखने वाले दंपतियों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है. एंडोमेट्रियोसिस के कारण गर्भधारण में दिक्कतें आ सकती हैं, फर्टिलिटी ट्रीटमेंट मुश्किल हो सकता है और कुछ मामलों में यह स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है. यही वजह है कि कई महिलाओं के लिए इन विट्रो फर्टिलाइजेशन ही गर्भधारण का सबसे रियल विकल्प बन जाता है.

क्या है मामला?

TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा ही एक मामला 28 साल की एक महिला का सामने आया, जिसे गंभीर एंडोमेट्रियोसिस की समस्या थी और पहले कोई सर्जरी नहीं हुई थी. डॉक्टरों ने बीमारी की गंभीरता को देखते हुए आईवीएफ कराने की सलाह दी, कई दंपतियों की तरह इस महिला और उसके पति ने भी उम्मीद की थी कि लंबे संघर्ष के बाद अब उन्हें खुशखबरी मिलेगी. महिला ने ओवम निकालने की प्रक्रिया ओसाइट पिक-अप कराई और शुरुआत में सब कुछ सामान्य लग रहा था.

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लेकिन प्रक्रिया के चार दिन बाद महिला को तेज बुखार आने लगा, जो एंटीबायोटिक दवाओं के बावजूद ठीक नहीं हो रहा था, जल्द ही उसे पेट में तेज दर्द, ठंड लगना और कमजोरी जैसे लक्षण महसूस होने लगे. जांच के बाद पता चला कि उसके ओवम में करीब 10 से 12 सेंटीमीटर का बड़ा एब्सेस यानी पस से भरी गांठ बन गई है. इतना ही नहीं, इंफेक्शन पेट के अंदर फैलकर लिवर तक पहुंच गया था. अब मामला फर्टिलिटी ट्रीटमेंट से आगे बढ़कर जान बचाने तक पहुंच चुका था और तुरंत सर्जरी करना जरूरी हो गया.

कैसे किया गया इलाज?

बेंगलुरु के मदरहुड हॉस्पिटल में डॉ. माधुरी विद्याशंकर की अगुवाई में सर्जरी की गई. ऑपरेशन के दौरान पाया गया कि पस कई अंगों तक फैल चुकी थी और इंफेक्शन के कारण आंतें ओवम से चिपक गई थीं. सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मरीज की जान बचाने के साथ-साथ उसकी प्रजनन क्षमता को भी सुरक्षित रखा जाए. डॉक्टरों ने सावधानीपूर्वक एब्सेस को निकालकर इंफेक्शन साफ किया और दोनों ओवम को सुरक्षित रखने में सफलता पाई.

हो सकता है बचाव?

कई महीनों बाद महिला फिर से स्वस्थ होकर आईवीएफ की प्रक्रिया के लिए तैयार हुई. इस बार इलाज सफल रहा, वह गर्भवती हुई और बाद में उसने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया.  एंडोमेट्रियोसिस जैसी बीमारी में फर्टिलिटी का सफर आसान नहीं होता, लेकिन सही समय पर इलाज और एक्सपर्ट की देखरेख में उम्मीद फिर से जिंदा हो सकती है.

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दुबले दिखने पर भी हो सकता है हार्ट अटैक का खतरा, वजह जान उड़ जाएंगे आपके होश!

दुबले दिखने पर भी हो सकता है हार्ट अटैक का खतरा, वजह जान उड़ जाएंगे आपके होश!


Is Belly Fat Dangerous For Heart Health: हर साल वर्ल्ड ओबेसिटी डे पर एक सवाल फिर से उठता है क्या सिर्फ वजन ही असली समस्या है? लंबे समय तक लोगों की सेहत को मापने के लिए बॉडी वेट और बीएमआई को सबसे अहम माना गया. लेकिन अब कई रिसर्च यह बताती हैं कि शरीर में फैट की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह जमा कहां हो रहा है. वजन मापने वाली मशीन यह नहीं बता सकती कि शरीर में मसल्स ज्यादा हैं या फैट और यह भी नहीं दिखा सकती कि फैट अंदरूनी अंगों के आसपास जमा है या नहीं.

क्या होता है बेली फैट?

पेट के आसपास जमा होने वाला फैट, जिसे आमतौर पर बेली फैट कहा जाता है, हार्ट की बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकता है. यह उन लोगों में भी होता है जिनका वजन सामान्य दिखाई देता है. दरअसल शरीर में हर तरह का फैट एक जैसा व्यवहार नहीं करता. कूल्हों और जांघों के आसपास जमा फैट तुलना कम नुकसानदायक माना जाता है, लेकिन पेट के अंदरूनी हिस्से में, लिवर, पैंक्रियास और आंतों के आसपास जमा होने वाला फैट शरीर के लिए ज्यादा खतरनाक हो सकता है.

क्या होती है दिक्कत?

यह अंदरूनी फैट शरीर में सूजन बढ़ाने वाले केमिकल्स छोड़ता है, इंसुलिन के काम करने के तरीके को प्रभावित करता है, ब्लड प्रेशर बढ़ाता है और कोलेस्ट्रॉल का संतुलन बिगाड़ सकता है.  डॉ. वरुण बंसल ने TOI को बताया कि जब दिल की सेहत की बात आती है तो सिर्फ वजन नहीं, बल्कि शरीर में फैट का वितरण ज्यादा महत्वपूर्ण होता है. खासकर पेट के आसपास बढ़ती चर्बी दिल के दौरे और कोरोनरी आर्टरी डिजीज के जोखिम को बढ़ा सकती है.

भारत में क्या है समस्या?

भारत में यह समस्या और ज्यादा गंभीर मानी जाती है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की INDIAB स्टडी के मुताबिक, कई भारतीयों में वजन सामान्य होने के बावजूद कमर का घेरा बढ़ा हुआ पाया गया, साथ ही ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर भी ज्यादा था. इस स्थिति को नॉर्मल वेट ओबेसिटी या मेटाबॉलिक ओबेसिटी कहा जाता है. यानी व्यक्ति देखने में दुबला लग सकता है, लेकिन पेट के अंदर जमा फैट दिल के लिए खतरा बन सकता है.

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एक्सपर्ट के अनुसार भारतीयों के लिए कमर का घेरा एक अहम संकेतक माना जाता है. पुरुषों में कमर 90 सेंटीमीटर से कम और महिलाओं में 80 सेंटीमीटर से कम रहनी चाहिए. इसे मापना भी बहुत आसान है कि नाभि के आसपास टेप लगाकर सीधा खड़े होकर सामान्य सांस छोड़ते हुए माप लिया जा सकता है.

कैसे कर सकते हैं इसको कम?

पेट की चर्बी कम करने के लिए क्रैश डाइट हमेशा सही समाधान नहीं होती, क्योंकि इससे मसल्स भी कम हो सकते हैं. इसके बजाय नियमित एक्सरसाइज, खासकर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, पर्याप्त प्रोटीन वाला भोजन, कम प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट, पर्याप्त नींद और तनाव को कंट्रोल करना ज्यादा प्रभावी तरीका माना जाता है.

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युवाओं में तेजी से बढ़ रहा आर्टरीज के सख्त होने का खतरा, ये लक्षण न करें नजरअंदाज

युवाओं में तेजी से बढ़ रहा आर्टरीज के सख्त होने का खतरा, ये लक्षण न करें नजरअंदाज


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Why Arteries Age Faster In Your 30s: पहले हार्ट से जुड़ी बीमारियों को आमतौर पर बढ़ती उम्र की समस्या माना जाता था. माना जाता था कि 50 या 60 की उम्र के बाद ही आर्टरीज में ब्लॉकेज या हार्ट अटैक का खतरा बढ़ता है. लेकिन अब यह तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है. डॉक्टरों के अनुसार आजकल कई लोगों में 30 की उम्र के आसपास ही धमनियों में उम्र बढ़ने के संकेत दिखाई देने लगे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है. 

क्यों होती है ऐसी दिक्कत

 आर्टरीज शरीर में खून को दिल से बाकी अंगों तक पहुंचाने का काम करती हैं. सामान्य तौर पर ये लचीली और मुलायम होती हैं, जिससे खून आसानी से बहता रहता है. लेकिन जब ये धीरे-धीरे सख्त होने लगती हैं तो ब्लड का फ्लो प्रभावित होने लगता है. इससे हार्ट को खून पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जो आगे चलकर हार्ट रोग, स्ट्रोक और अन्य कार्डियोवैस्कुलर समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है,

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जरी एक्सपर्ट डॉ. मुकेश गोयल के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कम उम्र में ही आर्टरीज के सख्त होने के मामले बढ़ते देखे जा रहे हैं. उनका कहना है कि पहले इस तरह की समस्याएं आमतौर पर 50 या 60 की उम्र में देखी जाती थीं, लेकिन अब बदलती लाइफस्टाइल के कारण 30 की उम्र में भी इसके संकेत सामने आने लगे हैं.

बदलती लाइफस्टाइल बड़ी वजह

एक्सपर्ट मानते हैं कि इसके पीछे आधुनिक लाइफस्टाइल बड़ी वजह है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, तनाव भरा कामकाजी माहौल, अनियमित नींद और प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन धीरे-धीरे ब्लड वेसल्स पर असर डाल सकता है. इसके अलावा धूम्रपान, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और खराब खान-पान भी आर्टरीज के जल्दी बूढ़ा होने के जोखिम को बढ़ाते हैं. कई बार यह समस्या शुरू में किसी बड़े लक्षण के रूप में सामने नहीं आती. फिर भी कुछ संकेत ऐसे हो सकते हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है. जैसे लगातार बढ़ता कोलेस्ट्रॉल, हल्का-सा भी बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, जल्दी थकान महसूस होना या थोड़ी मेहनत में सांस फूलना. अगर परिवार में दिल की बीमारी का हिस्ट्री रहा हो तो जोखिम और बढ़ सकता है.

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कैसे कर सकते हैं बचाव

इसी वजह से डॉक्टर अब कम उम्र में ही दिल की सेहत की जांच कराने की सलाह देते हैं. कोलेस्ट्रॉल जांच, ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग, ब्लड शुगर टेस्ट और जरूरत पड़ने पर अन्य जांचों के जरिए आर्टरीज में शुरुआती बदलावों का पता लगाया जा सकता है. अच्छी बात यह है कि शुरुआती चरण में लाइफ में बदलाव करके इस प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है. रोजाना कुछ समय टहलना या व्यायाम करना, फल-सब्जियों और साबुत अनाज से भरपूर आहार लेना, नमक और प्रोसेस्ड फूड कम करना, धूम्रपान से दूरी बनाना और पर्याप्त नींद लेना दिल और आर्टरीज की सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है.

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सांस फूलना सिर्फ थकान नहीं, हार्ट की सेहत का भी संकेत; सीढ़ियां चढ़ते समय इन बातों पर दें ध्यान

सांस फूलना सिर्फ थकान नहीं, हार्ट की सेहत का भी संकेत; सीढ़ियां चढ़ते समय इन बातों पर दें ध्यान


Why Do I Feel Breathless After Climbing Stairs: सीढ़ियां चढ़ना रोजमर्रा की जिंदगी का एक सामान्य हिस्सा लगता है, लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक यह छोटी-सी गतिविधि दिल की सेहत के बारे में काफी कुछ बता सकती है. जब हम सीढ़ियां चढ़ते हैं तो शरीर को ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होती है. ऐसे में दिल तेजी से धड़कने लगता है और मसल्स तक खून पहुंचाने के लिए ज्यादा मेहनत करता है. यह प्रक्रिया सामान्य है, लेकिन असली संकेत इस बात से मिलता है कि सीढ़ियां चढ़ने के बाद शरीर कितनी जल्दी सामान्य स्थिति में लौटता है.

इससे क्या पहचान सकते हैं आप?

कार्डियोलॉजिस्ट इसे हार्ट रेट रिकवरी यानी दिल की धड़कन के सामान्य होने की गति कहते हैं. अगर सीढ़ियां चढ़ने के बाद सांस और दिल की धड़कन जल्दी सामान्य हो जाए, तो यह अच्छे कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस का संकेत माना जाता है. लेकिन अगर सांस लंबे समय तक फूलती रहे या दिल की धड़कन सामान्य होने में ज्यादा समय लगे, तो यह दिल और ब्लड वेसल्स पर बढ़ते दबाव का संकेत हो सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. आशीष अग्रवाल ने TOI को बताया कि  कई लोग यह समझ नहीं पाते कि सीढ़ियां चढ़ने जैसी साधारण गतिविधि भी हार्ट की सेहत के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकती है. उनका कहना है कि जब हम सीढ़ियां चढ़ते हैं तो शरीर को अधिक ऑक्सीजन की जरूरत होती है, इसलिए दिल की धड़कन बढ़ना स्वाभाविक है. लेकिन अगर शरीर को सामान्य होने में जरूरत से ज्यादा समय लगता है, तो यह दिल और व्लड बेसल्स के सही तरीके से काम न करने का संकेत हो सकता है.

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एक्सपर्ट बताते हैं कि दिल की रिकवरी स्पीड इस बात पर निर्भर करती है कि दिल खून को कितनी कुशलता से पंप कर रहा है, धमनियां ऑक्सीजन को कितनी आसानी से शरीर तक पहुंचा रही हैं और मांसपेशियां उस ऑक्सीजन का कितना सही उपयोग कर पा रही हैं. अगर इस प्रक्रिया का कोई भी हिस्सा प्रभावित होता है, तो शरीर को सामान्य स्थिति में लौटने में ज्यादा समय लग सकता है. 

क्यों हो रही है दिक्कत?

आधुनिक लाइफस्टाइल भी इस समस्या की बड़ी वजह बन रही है. लंबे समय तक बैठकर काम करना, असंतुलित खान-पान, धूम्रपान, तनाव और कम फिजिकल एक्टिविटी धीरे-धीरे दिल और व्लड बेसल्स को कमजोर कर सकते हैं. इससे आर्टरीज सख्त होने लगती हैं और खून का फ्लो प्रभावित होता है. हालांकि हर बार सीढ़ियां चढ़ने पर सांस फूलना गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता, थकान, डिहाइड्रेशन या कम फिटनेस के कारण भी ऐसा हो सकता है. लेकिन अगर सीढ़ियां चढ़ने के बाद लंबे समय तक सांस फूलना, सीने में दबाव, चक्कर आना या अत्यधिक थकान महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

यह भी पढ़ें: क्या खाली पेट काम करता है दिमाग ज्यादा बेहतर? जानिए फास्टिंग का मेंटल हेल्थ पर असर और फायदे

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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