रसगुल्ला खाने से हुई मौत, जानें सांस की नली में फंस जाए खाना तो तुरंत क्या करें?

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What To Do When Food Blocks The Airway: झारखंड के जमशेदपुर में एक शादी समारोह के दौरान दर्दनाक हादसा सामने आया. 41 वर्षीय ललित सिंह की मौत उस समय हो गई जब रसगुल्ला खाते वक्त वह उनकी सांस की नली में फंस गया. यह घटना सोमवार सुबह मालियंता गांव में एक शादी के दौरान हुई. बताया जा रहा है कि रसगुल्ला खाने के कुछ ही सेकंड बाद ललित सिंह को अचानक सांस लेने में दिक्कत होने लगी. वहां मौजूद लोगों ने उनके गले से रसगुल्ला निकालने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. 

परिवार के लोग उन्हें तुरंत एमजीएम अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. डॉक्टरों के अनुसार रसगुल्ला पूरी तरह से उनकी सांस की नली में फंस गया था, जिससे शरीर तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो गया और कुछ ही मिनटों में उनकी मौत हो गई. चलिए आपको बताते हैं कि सांस की नली में खाना फंसने के बाद क्या करना चाहिए. 

क्यों फंस जाता है खाना

दरअसल खाना निगलने की प्रक्रिया काफी जटिल होती है. जब हम भोजन करते हैं तो मुंह, गले और नसों की मदद से खाना पेट तक पहुंचता है. सामान्य स्थिति में जब हम खाना निगलते हैं, तो हमारी सांस की नली कुछ समय के लिए बंद हो जाती है ताकि भोजन गलत दिशा में न जाए. लेकिन कभी-कभी अगर खाना ठीक से चबाया न जाए या जल्दी-जल्दी खाया जाए, तो वह गले या सांस की नली में फंस सकता है.

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 हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की सांस की नली में खाना फंस जाए तो यह स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है. ऐसे समय में कुछ लक्षण तुरंत दिखाई देते हैं, जैसे व्यक्ति का बोलना बंद हो जाना, सांस लेने में परेशानी, तेज या अजीब आवाज के साथ सांस लेना, खांसी आना, चेहरा लाल या नीला पड़ना और गंभीर स्थिति में बेहोशी आ जाना. 

क्या करना चाहिए

ऐसी स्थिति में तुरंत मदद करना बहुत जरूरी होता है. सबसे पहले व्यक्ति को जोर से खांसने के लिए कहें, क्योंकि कई बार खांसी से ही फंसा हुआ खाना बाहर निकल सकता है. अगर इससे राहत न मिले तो व्यक्ति को थोड़ा आगे झुकाकर उसकी पीठ पर जोर से लगभग पांच बार थपथपाना चाहिए. इससे कई बार गले में फंसा खाना ढीला होकर बाहर निकल सकता है. अगर इसके बाद भी स्थिति नहीं सुधरती, तो हाइमलिक मैन्युवर नाम की तकनीक अपनाई जाती है. इसमें व्यक्ति के पीछे खड़े होकर उसके पेट के ऊपरी हिस्से पर झटके से दबाव डाला जाता है, जिससे फंसा हुआ खाना बाहर निकल सकता है.

इंसानों के लिए जानलेवा स्थिति

डॉक्टरों के अनुसार चोकिंग यानी सांस की नली में खाना फंसना जानलेवा आपात स्थिति होती है. इसलिए अगर किसी को सांस लेने में गंभीर परेशानी हो या वह बोल भी न पा रहा हो, तो तुरंत मेडिकल सहायता लेना और इमरजेंसी सेवाओं को बुलाना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर में विटामिन ‘डी’ की कमी कितनी खतरनाक, इससे किन बीमारियों का खतरा?

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What Happens When Your Body Lacks Vitamin D: विटामिन D को अक्सर सनशाइन विटामिन कहा जाता है, क्योंकि इसका सबसे बड़ा सोर्स सूरज की रोशनी है. हाल के वर्षों में यह सवाल काफी चर्चा में रहा है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विटामिन D की कितनी मात्रा जरूरी है और कैसे पता लगाया जाए कि शरीर में इसकी कमी तो नहीं है. हालांकि एक बात पर एक्सपर्ट की सहमति है वह है कि विटामिन D हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है. अगर शरीर को पर्याप्त धूप नहीं मिलती या भोजन के जरिए इसकी सही मात्रा नहीं मिलती, तो इसकी कमी कई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है. 

किन लोगों को होती है दिक्कत

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था yalemedicine के अनुसार,  विटामिन D की कमी किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकती है. छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक यह समस्या देखी जाती है. खासकर जो बच्चे केवल ब्रेस्टफीडिंग पर निर्भर होते हैं, उन्हें मां के दूध से पर्याप्त विटामिन D नहीं मिल पाता, इसलिए कई बार डॉक्टर उन्हें सप्लीमेंट लेने की सलाह देते हैं. वहीं बढ़ती उम्र के साथ त्वचा की क्षमता कम हो जाती है, जिससे शरीर में विटामिन D बनने की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है.

दरअसल, विटामिन D शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस को अब्जॉर्ब करने में अहम भूमिका निभाता है. ये दोनों तत्व हड्डियों को मजबूत रखने के लिए बेहद जरूरी होते हैं. जब शरीर में विटामिन D की कमी हो जाती है, तो कैल्शियम का सही तरीके से अब्जॉर्ब नहीं हो पाता. इससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और कई तरह की समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.

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इसकी कमी के क्या होते हैं लक्षण

विटामिन D की कमी होने पर शरीर में कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं. जैसे हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी, शरीर में थकान और मांसपेशियों में ऐंठन. कुछ लोगों को हाथ-पैरों में झुनझुनी जैसा महसूस हो सकता है. गंभीर मामलों में हड्डियां जल्दी टूटने का खतरा भी बढ़ जाता है. बुजुर्गों में इसकी गंभीर कमी गिरने और फ्रैक्चर का जोखिम बढ़ा सकती है.

कमी के क्या होते हैं कारण

इस कमी के पीछे कई कारण हो सकते हैं. धूप में कम समय बिताना, पोषण की कमी, गहरे रंग की त्वचा, कुछ दवाइयों का सेवन या किडनी और लिवर से जुड़ी बीमारियां भी शरीर में विटामिन D के स्तर को प्रभावित कर सकती हैं. कुछ मामलों में यह समस्या जेनेटिक कारणों से भी हो सकती है. एक्सपर्ट के अनुसार अगर शरीर में विटामिन D का स्तर बहुत कम हो जाए, तो हड्डियों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए संतुलित आहार, नियमित धूप और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट लेना शरीर में विटामिन D के स्तर को बनाए रखने में मदद कर सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सावधान! अगर बार-बार सूज जाते हैं आपके पैर, तो यह महज थकान नहीं, हो सकता है हार्ट फेल्योर का बड़

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Why Do Ankles Swell In Heart Failure: हार्ट फेल्योर एक ऐसी स्थिति है जब दिल की मांसपेशियां शरीर में खून को सही तरीके से पंप नहीं कर पातीं. जब ऐसा होता है तो ब्लड फ्लो का प्रवाह धीमा पड़ने लगता है और शरीर में तरल पदार्थ जमा होने लगते हैं. कई बार यह तरल लंग्स में भी जमा हो जाता है, जिससे सांस लेने में परेशानी होने लगती है. एक्सपर्ट के अनुसार शरीर में कुछ ऐसे संकेत दिखाई देते हैं, जिनसे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि दिल की सेहत ठीक नहीं है. इनमें से एक कम चर्चा में रहने वाला लेकिन अहम संकेत है टखनों और पैरों में सूजन. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं. 

क्या होते हैं हार्ट फेल्योर के संकेत

ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन अगर टखने या पैर बार-बार सूजने लगें तो यह हार्ट फेल्योर का संकेत हो सकता है. इस स्थिति को मेडिकल टर्म में एडीमा कहा जाता है. एडीमा तब होता है जब शरीर के टिश्यू में तरल पदार्थ जमा होने लगता है. यह सूजन शरीर के कई हिस्सों में हो सकती है, लेकिन सबसे ज्यादा पैरों और टखनों में दिखाई देती है. कई लोगों में यह सूजन सुबह थोड़ी कम होती है, लेकिन दिन बढ़ने के साथ-साथ ज्यादा नजर आने लगती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब दिल खून को प्रभावी ढंग से पंप नहीं कर पाता, तो ब्लड वेसल्स में दबाव बढ़ जाता है. इससे तरल पदार्थ नसों से बाहर निकलकर आसपास के टिश्यू में जमा होने लगता है, जिसके कारण सूजन दिखाई देती है.

क्या होता है इसका लक्षण

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट मायो क्लिनिक के अनुसार,  एडीमा के लक्षणों में टखनों, पैरों या टांगों में सूजन, त्वचा का खिंचा हुआ या चमकदार दिखना, दबाने पर त्वचा में गड्ढा पड़ जाना, दर्द या जकड़न जैसी समस्याएं शामिल हो सकती हैं. हालांकि सूजन हमेशा हार्ट फेल्योर की वजह से ही नहीं होती. लंबे समय तक एक ही जगह बैठने या खड़े रहने, ज्यादा नमक खाने, मोटापा, गर्भावस्था, कुछ दवाओं का सेवन, चोट, कीड़े के काटने, किडनी या लिवर की समस्या, ब्लड क्लॉट या इंफेक्शन के कारण भी सूजन हो सकती है.

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अगर हार्ट फेल्योर की बात करें तो इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं. इनमें सांस फूलना, थोड़ी गतिविधि करने पर ही थकान महसूस होना, पैरों और टखनों में लगातार सूजन, दिल की धड़कन का तेज या अनियमित होना, एक्सरसाइज करने की क्षमता कम होना, घरघराहट, लंबे समय तक खांसी रहना, पेट में सूजन, अचानक वजन बढ़ना, मतली, भूख कम लगना और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी शामिल हैं. कई मामलों में सीने में दर्द भी हो सकता है, खासकर अगर हार्ट अटैक की स्थिति हो.

किन लोगों को ज्यादा होता है खतरा

हार्ट फेल्योर का खतरा कुछ लोगों में ज्यादा होता है. 65 वर्ष से अधिक उम्र, स्मोकिंग या शराब का सेवन, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, ज्यादा नमक और फैट वाले भोजन का सेवन, हाई ब्लड प्रेशर, कोरोनरी आर्टरी डिजीज या परिवार में हार्ट फेल्योर के मामले होने पर जोखिम बढ़ सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या आप सही तरह से सो रहे हैं, आपका स्लीप पैटर्न तय कर रहा है आपकी शुगर! जानिए कैसे?

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Can Diabetes Cause Sleep Problems: डायबिटीज एक पुरानी और आज के समय में बेहद आम बीमारी बन चुकी है.  वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार 1990 में जहां दुनियाभर में करीब 20 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित थे, वहीं 2022 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 83 करोड़ हो गई. चिंताजनक बात यह भी है कि डायबिटीज से पीड़ित आधे से ज्यादा लोगों को सही इलाज और दवाएं तक उपलब्ध नहीं हो पातीं.

हो सकती है दिक्कत

कई लोग इस बीमारी को गंभीरता से नहीं लेते, लेकिन अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो यह किडनी फेलियर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक और यहां तक कि अंग कटने जैसी गंभीर स्थितियों का कारण बन सकती है. आमतौर पर डायबिटीज के लक्षणों में ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, धुंधला दिखना और बिना कारण वजन कम होना शामिल हैं. लेकिन ब्रिटेन की डायबिटीज यूके संस्था के अनुसार एक और आम संकेत है जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, वह है नींद से जुड़ी समस्या.

डायबिटीज का नींद पर असर

डायबिटीज यूके के अनुसार, ब्लड शुगर लेवल में लगातार उतार-चढ़ाव नींद को काफी प्रभावित कर सकता है. जब शरीर में शुगर का स्तर बहुत ज्यादा या बहुत कम हो जाता है, तो इससे रात की नींद बाधित हो सकती है. इसके अलावा डायबिटीज से जुड़ी जटिलताएं जैसे नर्व डैमेज  या पैरों में दर्द भी नींद में खलल डाल सकते हैं. पर्याप्त और अच्छी नींद शरीर के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होती है, लेकिन डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए अच्छी नींद लेना कई बार मुश्किल हो जाता है.

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ब्लड शुगर का नींद पर प्रभाव

अगर ब्लड शुगर बहुत कम हो जाए, जिसे हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है, तो यह रात के समय भी हो सकता है और इससे नींद प्रभावित हो सकती है. खासकर टाइप-1 डायबिटीज वाले लोगों में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है. कुछ दवाएं भी रात में ब्लड शुगर के लेवल को ऊपर-नीचे कर सकती हैं. रात में बार-बार शुगर कम होने से दिन में ज्यादा नींद या थकान महसूस हो सकती है और धीरे-धीरे नींद का पैटर्न भी बिगड़ सकता है. वहीं अगर ब्लड शुगर बहुत ज्यादा हो जाए तो भी नींद प्रभावित होती है. हाई ब्लड शुगर के कारण बार-बार यूरिन आने की जरूरत पड़ सकती है, जिससे रात में नींद टूटती रहती है. इसके अलावा ज्यादा प्यास लगना और सिरदर्द भी नींद आने में परेशानी पैदा कर सकते हैं.

नींद की कमी से बढ़ सकता है डायबिटीज का खतरा

शोध बताते हैं कि नींद से जुड़ी समस्याएं डायबिटीज के खतरे को भी बढ़ा सकती हैं. 2022 में यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों को सोने या सोए रहने में परेशानी होती है, उनमें ब्लड शुगर का स्तर ज्यादा पाया गया. डायबिटीज यूके के अनुसार अच्छी नींद के लिए कुछ आदतें मददगार हो सकती हैं. दिन में शारीरिक रूप से सक्रिय रहें, सोने से पहले कम से कम एक घंटे तक आराम करें, बिस्तर आरामदायक रखें और सोने से पहले शराब या ज्यादा स्क्रीन टाइम से बचें. कमरे का तापमान थोड़ा ठंडा रखना भी अच्छी नींद में मदद कर सकता है.

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बदलते मौसम में आपको भी तो नहीं हो रहा लूज मोशन, जानें कैसे रख सकते हैं पेट को ठीक

बदलते मौसम में आपको भी तो नहीं हो रहा लूज मोशन, जानें कैसे रख सकते हैं पेट को ठीक


Loose Motions In Changing Weather: मौसम बदलते ही कई लोगों को पेट से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं. खासकर लूज मोशन यानी दस्त की शिकायत इस समय काफी आम हो जाती है. इसका कारण अक्सर डाइजेशन सिस्टम पर पड़ने वाला असर होता है. दरअसल हमारा डाइजेस्टिव सिस्टम पूरे शरीर की सेहत से गहराई से जुड़ा होता है. जब मौसम बदलता है तो खान-पान, पानी और वातावरण में बदलाव के कारण पेट की सेहत भी प्रभावित हो सकती है.

हमारी आंतों में करोड़ों सूक्ष्म जीव मौजूद होते हैं, जिन्हें गट माइक्रोबायोम कहा जाता है. ये शरीर में भोजन को पचाने, जरूरी विटामिन बनाने और हानिकारक बैक्टीरिया से बचाने में मदद करते हैं. अगर इन अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाए तो पाचन से जुड़ी दिक्कतें शुरू हो सकती हैं. इसी वजह से मौसम बदलने के दौरान पेट का खास ख्याल रखना जरूरी हो जाता है. 

किन लोगों को होती है दिक्कत

लूज मोशन लगभग हर उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है। इसमें बार-बार पतला या पानी जैसा मल आने लगता है. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे फूड पॉइजनिंग, एलर्जी, बैक्टीरियल या वायरल इंफेक्शन, तनाव या खान-पान में अचानक बदलाव. कई बार एंटीबायोटिक दवाओं के कारण भी आंतों के अच्छे बैक्टीरिया कम हो जाते हैं, जिससे दस्त की समस्या हो सकती है. 

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क्या है इसका इलाज

maxhealthcare की रिपोर्ट के अनुसार, आमतौर पर लूज मोशन एक-दो दिन में ठीक हो जाते हैं, लेकिन इस दौरान शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो सकती है. इसलिए शरीर को हाइड्रेट रखना बहुत जरूरी होता है. अगर समस्या लंबे समय तक बनी रहे या कमजोरी, चक्कर या डिहाइड्रेशन जैसे लक्षण दिखें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

कुछ घरेलू उपाय भी पेट को राहत देने में मदद कर सकते हैं. जैसे कि केला पाचन के लिए अच्छा माना जाता है. केले को मैश करके उसमें थोड़ा घी, जायफल और इलायची मिलाकर खाने से दस्त में आराम मिल सकता है. इसी तरह दही और चावल का हल्का भोजन भी पेट को शांत करने में मदद करता है. दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करते हैं. दही में थोड़ा अदरक मिलाकर लेने से भी पाचन बेहतर हो सकता है, इसके अलावा अदरक, सौंफ और गुनगुने पानी का मिक्स भी पेट को राहत देने में सहायक माना जाता है. इसके साथ-साथ एक कप काली चाय में नींबू का रस और थोड़ा जायफल या इलायची मिलाकर पीने से भी दस्त की समस्या में आराम मिल सकता है. वहीं घी में हल्का पकाया हुआ सेब भी पाचन को सुधारने में मदद करता है. 

इन चीजों का ध्यान रखना चाहिए

मौसम बदलते समय साफ-सफाई का ध्यान रखना, हल्का और ताजा भोजन करना, पर्याप्त पानी पीना और पेट के लिए फायदेमंद चीजें खाने से   को स्वस्थ रखा जा सकता है। सही खान-पान और थोड़ी सावधानी से लूज मोशन जैसी समस्याओं से काफी हद तक बचा जा सकता है.

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खाना खाने के तुरंत बाद बन जाता है प्रेशर, जानें शरीर में कहां है दिक्कत?

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Why Do I Need To Poop Right After Eating: अगर आपको अक्सर खाना खाने के तुरंत बाद टॉयलेट जाने की इच्छा होती है, तो कई बार लगता है कि जैसे खाना सीधे पेट से बाहर निकल रहा है. लेकिन असल में ऐसा नहीं होता. इसके पीछे शरीर की एक नेचुरल प्रक्रिया काम करती है, जिसे गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स कहा जाता है. यह डाइजेशन सिस्टम का एक स्वाभाविक संकेत होता है, जो आंतों को बताता है कि नया भोजन पेट में पहुंच गया है, इसलिए पुराने वेस्ट को बाहर निकालने की तैयारी कर ली जाए. यह प्रक्रिया सामान्य होती है, लेकिन हर व्यक्ति में इसका असर अलग-अलग हो सकता है

क्या होता है गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार,  गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स पेट और बड़ी आंत के बीच होने वाला एक ऑटोमैटिक कम्युनिकेशन है. जब भोजन पेट में पहुंचता है, तो नसें बड़ी आंत की मांसपेशियों को संकेत भेजती हैं. इसके बाद आंतों में हलचल शुरू हो जाती है और मल त्याग की इच्छा महसूस हो सकती है. इसका मकसद यह होता है कि नया भोजन पचने के लिए जगह बन सके और पुराना अपशिष्ट शरीर से बाहर निकल जाए.

शरीर में कौन-कौन से हिस्से होते हैं शामिल?

इस प्रक्रिया में डाइजेशन सिस्टम के कई अंग मिलकर काम करते हैं. पेट भोजन को तोड़ने की प्रक्रिया शुरू करता है. इसके बाद बड़ी आंत धीरे-धीरे भोजन से पानी सोखते हुए उसे ठोस अपशिष्ट में बदलती है. इस पूरी प्रक्रिया को कंट्रोल करने में एंटेरिक नर्वस सिस्टम यानी आंतों का नर्वस सिस्टम अहम भूमिका निभाता है, जिसे अक्सर गट ब्रेन भी कहा जाता है. इसके अलावा डाइजेशन सिस्टम की चिकनी मांसपेशियां, गैस्ट्रिन और कोलेसिस्टोकिनिन जैसे हार्मोन भी इस प्रक्रिया को सक्रिय करते हैं.

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कब ज्यादा तेज हो जाता है यह रिफ्लेक्स?

कुछ लोगों में यह रिफ्लेक्स ज्यादा सक्रिय हो सकता है. ऐसे में खाना खाते ही तुरंत टॉयलेट जाने की जरूरत महसूस होती है. कई बार कुछ खास तरह के भोजन, दवाएं, इंफेक्शन या मानसिक तनाव भी इसका कारण बन सकते हैं. ज्यादा कैलोरी वाला खाना, तला-भुना या मसालेदार भोजन, शराब और कैफीन जैसे पेय पदार्थ भी आंतों की गतिविधि को तेज कर सकते हैं. अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह कुछ डाइजेशन संबंधी बीमारियों से भी जुड़ी हो सकती है. इनमें इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, डंपिंग सिंड्रोम, गैस्ट्रोपेरेसिस और इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज जैसी स्थितियां शामिल हैं. इन बीमारियों में आंतें सामान्य से ज्यादा संसेटिव हो जाती हैं और जल्दी प्रतिक्रिया देने लगती हैं.

क्या करें?

अगर यह समस्या कभी-कभार होती है, तो खान-पान में बदलाव काफी मददगार हो सकता है. बहुत ज्यादा मसालेदार, तैलीय या कैफीन वाले खाद्य पदार्थों से बचना फायदेमंद हो सकता है. लेकिन अगर बार-बार दस्त, पेट में ऐंठन या वजन कम होने जैसे लक्षण भी दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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