क्या ज्यादा देर टॉयलेट में बैठने से निकल जाता है मलाशय? इस देश में सामने आ चुका केस

क्या ज्यादा देर टॉयलेट में बैठने से निकल जाता है मलाशय? इस देश में सामने आ चुका केस


Health Risks Of Using Phone On Toilet: मोबाइल फोन लेकर टॉयलेट जाना आज एक आम आदत बन चुकी है. कई लोग सोचते हैं कि थोड़ी देर बैठकर सोशल मीडिया स्क्रॉल कर लिया जाए या गेम खेल लिया जाए, लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि टॉयलेट में ज्यादा देर बैठना सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. यह आदत न सिर्फ बवासीर का कारण बनती है, बल्कि गंभीर मामलों में मलाशय बाहर निकलने जैसी स्थिति भी पैदा कर सकती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

CNN की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर, डलास के कोलोरेक्टल सर्जन डॉ. लाई शुए ने बताया कि जब मरीज पेट या मल त्याग से जुड़ी शिकायत लेकर आते हैं, तो जांच के दौरान टॉयलेट में ज्यादा समय बिताने की आदत एक बड़ा कारण सामने आती है. वहीं स्टोनी ब्रुक मेडिसिन, न्यूयॉर्क की गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. फराह मोंजूर बताती हैं कि आमतौर पर टॉयलेट में बैठने का सुरक्षित समय 5 से 10 मिनट से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

डॉक्टर्स समझाते हैं कि टॉयलेट सीट की बनावट और ग्रेविटी बल के कारण लंबे समय तक बैठने पर शरीर का निचला हिस्सा नीचे की ओर दबाव में रहता है. इससे गुदा और मलाशय के आसपास की नसों में खून भरने लगता है, लेकिन सही तरीके से वापस नहीं जा पाता. नतीजा यह होता है कि नसें सूज जाती हैं और हेमोरॉयड्स का खतरा बढ़ जाता है. लगातार जोर लगाने और देर तक बैठे रहने से पेल्विक फ्लोर मसल्स भी कमजोर हो जाती हैं. ये मांसपेशियां मल त्याग की प्रक्रिया को नियंत्रित करती हैं. इनके कमजोर होने से कब्ज, पेशाब या मल रोकने में दिक्कत और दर्द जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

चीन में मिल चुका है मामला

 चीन में इसको लेकर एक मामला आ चुका था. जिसमें एक व्यक्ति रोज़ करीब 30 मिनट तक टॉयलेट में बैठकर मोबाइल पर वीडियो गेम खेलता था. एक दिन मल त्याग के दौरान उसका मलाशय लगभग छह इंच तक शरीर से बाहर निकल आया. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने रेक्टल प्रोलैप्स की पुष्टि की. डॉक्टरों के अनुसार, लंबे समय तक टॉयलेट में बैठने की आदत और पहले से मौजूद कमजोरी ने इस गंभीर स्थिति को जन्म दिया.

जबरदस्ती जोर लगाने के बजाय उठकर थोड़ी देर टहलें

डॉक्टर्स सलाह देते हैं कि टॉयलेट में मोबाइल, किताब या मैगजीन लेकर न जाएं. अगर 10 मिनट में मल त्याग न हो, तो जबरदस्ती जोर लगाने के बजाय उठकर थोड़ी देर टहलें. साथ ही पर्याप्त पानी पीना और फाइबर युक्त आहार जैसे दालें, ओट्स और सब्जियां लेना जरूरी है. अगर लंबे समय से कब्ज, खून आना या टॉयलेट में असामान्य रूप से ज्यादा समय लग रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें. समय रहते डॉक्टर से सलाह लेना गंभीर समस्याओं से बचा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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न्यूबॉर्न बेबी में भी होती है कब्ज की शिकायत, जानें इन्हें पहचानने के तरीके

न्यूबॉर्न बेबी में भी होती है कब्ज की शिकायत, जानें इन्हें पहचानने के तरीके


How To Identify Constipation In Newborn Babies: न्यूबॉर्न बेबी और छोटे बच्चों में कब्ज की समस्या होना कई माता-पिता के लिए चिंता का कारण बन जाता है. अक्सर यह समझ पाना मुश्किल होता है कि बच्चा सच में कब्ज से परेशान है या यह उसकी उम्र के हिसाब से सामान्य स्थिति है. इसलिए जरूरी है कि पहले इसके संकेतों और कारणों को सही तरीके से समझा जाए. शिशुओं और बच्चों में कब्ज का मतलब होता है कि उनका मल बहुत सख्त हो गया है या उन्हें मल त्याग करने में परेशानी हो रही है. कई बार बच्चे को जोर लगाने पर दर्द होता है या कोशिश के बावजूद मल नहीं निकल पाता. हालांकि हर बच्चे का बॉवेल पैटर्न अलग होता है, इसलिए रोज मल न होना हमेशा कब्ज की निशानी नहीं है.

कैसे पहचानें बच्चों को कब्ज है या नहीं?

हेल्थ को लेकर ऑनलाइन जानकारी देने वाली वेबसाइट  MedlinePlus के मुताबिक, अगर बच्चा बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगे, बार-बार उल्टी जैसा महसूस करे, मल बहुत सख्त और सूखा हो, मल त्याग करते समय दर्द हो या पेट फूला हुआ लगे, तो यह कब्ज के संकेत हो सकते हैं. बड़े बच्चों में हफ्ते में तीन बार से कम मल जाना, अंडरवियर में मल के निशान दिखना या मल में खून आना भी चेतावनी के संकेत हैं.

कब बनता है कब्ज?

 MedlinePlus की रिपोर्ट में बताया गया है कि कब्ज तब होती है जब मल लंबे समय तक आंतों में रुका रहता है और वहां से ज्यादा पानी सोख लिया जाता है. इससे मल सख्त हो जाता है. शिशुओं में ठोस आहार की शुरुआत, ब्रेस्ट मिल्क से फॉर्मूला पर शिफ्ट होना, पर्याप्त तरल न मिलना या माहौल में बदलाव भी इसकी वजह बन सकता है. कई बार बच्चे जानबूझकर टॉयलेट जाने की इच्छा को रोकते हैं. इसकी वजह टॉयलेट ट्रेनिंग का डर, पहले दर्दनाक अनुभव या स्कूल और पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल न करना हो सकता है. कुछ मामलों में आंतों से जुड़ी बीमारियां या कुछ दवाएं भी कब्ज का कारण बनती हैं.

घर पर किन बातों का रखा जा सकता है ध्यान?

न्यूबॉर्न और छोटे बच्चों में कब्ज से बचाव के लिए घर पर कुछ बातों का ध्यान रखा जा सकता है. दो महीने से बड़े शिशुओं को डॉक्टर की सलाह से थोड़ा पानी या फलों का जूस दिया जा सकता है. चार महीने के बाद अगर बच्चा ठोस आहार लेने लगे, तो फाइबर से भरपूर बेबी फूड फायदेमंद होते हैं. बड़े बच्चों को पर्याप्त पानी पिलाना, फल-सब्जियां और साबुत अनाज देना मददगार होता है. अगर बच्चा कब्ज के कारण टॉयलेट ट्रेनिंग में परेशानी महसूस करे, तो कुछ समय के लिए उसे रोक देना बेहतर रहता है.

कब डॉक्टर से मिलना होता है जरूरी?

अगर दो महीने से कम उम्र के शिशु को कब्ज हो, तीन दिन तक मल न आए और साथ में उल्टी या ज्यादा चिड़चिड़ापन हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. सही समय पर पहचान और देखभाल से न्यूबॉर्न में कब्ज की समस्या को आसानी से संभाला जा सकता है.

इसे भी पढ़ें- Energy Drinks Side Effects: क्या आप भी पीते हैं एनर्जी ड्रिंक, जानें कैसे कैफीन-शुगर का कॉम्बिनेशन किडनी कर रहा डैमेज?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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प्रदूषण बढ़ा रहा डिप्रेशन-एंग्जायटी का खतरा, हवा में मौजूद PM2.5 का मेंटल हेल्थ से सीधा कनेक्शन

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Long Term Exposure To PM2.5 And Mental Health: केंद्र सरकार के बजट में भले ही मानसिक स्वास्थ्य ढांचे को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया गया हो, लेकिन एक नई नेशनल स्टडी ने चिंता बढ़ाने वाली तस्वीर पेश की है. रिसर्च के मुताबिक, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में मौजूद बेहद सूक्ष्म कणों (PM2.5) के संपर्क में रहने से डिप्रेशन और एंग्जायटी का खतरा बढ़ रहा है. ससे साफ है कि पर्यावरण से जुड़े जोखिम भारत में मेंटल की समस्या को और गहरा कर रहे हैं.

यह अध्ययन IIT दिल्ली के शोधकर्ताओं ने AIIMS नई दिल्ली, NIMHANS और सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज के साथ मिलकर किया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल iScience में पब्लिश किया गया है. रिसर्च में देश के 12 राज्यों, जिसमें जैसे पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और असम के 34,802 एडल्ट के डेटा का एनालिसिस किया गया.

क्या निकला रिसर्च में?

रिसर्च में पाया गया कि लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क में रहने वालों में डिप्रेशन का खतरा 8 प्रतिशत तक अधिक और एंग्जायटी का जोखिम करीब 2 प्रतिशत ज्यादा था. यह विश्लेषण नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे 2015 से 16 के क्लिनिकली डायग्नोज़्ड मामलों पर आधारित है. चूंकि यह एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी है, इसलिए यह कारण नहीं बल्कि आपसी संबंध को दर्शाती है.

एक्सपर्ट का क्या कहना है?

AIIMS के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग से जुड़े स्टडी के लेखक डॉ. आनंद कृष्णा के मुताबिक, यह फर्क समझना जरूरी है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जब बड़ी आबादी प्रदूषित हवा के संपर्क में हो, तो ऐसे “छोटे दिखने वाले” संबंध भी गंभीर मायने रखते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इसका असर सबसे ज्यादा शहरी महानगरों में रहने वालों, 40 से 49 साल की उम्र के लोगों और कम आय वर्ग में देखा गया. क्षेत्रीय स्तर पर भी फर्क सामने आया. पूर्वी भारत में प्रदूषण से जुड़ा डिप्रेशन ज्यादा क्लियर दिखा, जबकि पश्चिमी भारत में एंग्जायटी के मामले अधिक जुड़े पाए गए.

किन चीजों की हुई जांच?

स्टडी सिर्फ PM2.5 के कुल स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि हवा में मौजूद उसके अलग-अलग केमिकल तत्वों की भी जांच की गई. इसमें सामने आया कि ट्रैफिक, उद्योग और कृषि गतिविधियों से निकलने वाले सल्फेट, नाइट्रेट और अमोनियम जैसे तत्वों का डिप्रेशन से गहरा संबंध है. वहीं एलिमेंटल कार्बन, जो डीजल और फॉसिल फ्यूल के दहन का संकेतक माना जाता है, का संबंध एंग्जायटी से सबसे मजबूत पाया गया.

रिसर्चर का कहना है कि प्रदूषण के इन घटकों की पहचान से यह तय करने में मदद मिलती है कि किन उत्सर्जन सोर्स पर प्राथमिकता से कार्रवाई होनी चाहिए. ऐसे समय में, जब देश के कई हिस्सों में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब होती जा रही है, इस स्टडी में एनालिसिस में गुजरात, मणिपुर, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तमिलनाडु और केरल के प्रतिभागियों को भी शामिल किया गया.

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क्या आप भी पीते हैं एनर्जी ड्रिंक, जानें कैसे कैफीन-शुगर का कॉम्बिनेशन किडनी कर रहा डैमेज?

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 Are Energy Drinks Harmful For Kidneys: आज के समय में लोग हर चीज तुरंत असर वाली चाहते हैं. इसी सोच का नतीजा हैं मार्केट में मिलने वाले एनर्जी ड्रिंक्स, जिन्हें इंस्टेंट एनर्जी के नाम पर बेचा जाता है. इन ड्रिंक्स में आमतौर पर बहुत ज्यादा शुगर और कैफीन होता है, जिसकी वजह से पीते ही शरीर में फुर्ती महसूस होती है. लेकिन यह फुर्ती असली एनर्जी नहीं, बल्कि शरीर पर पड़ने वाला एक तरह का दबाव होती है.

क्या निकला रिसर्च में?

एनर्जी ड्रिंक्स में मौजूद कैफीन, शुगर और प्रिजर्वेटिव्स मिलकर किडनी में सूजन बढ़ाते हैं और खून से जहरीले तत्वों को छानने की उनकी क्षमता को नुकसान पहुंचाते हैं. साउथ डकोटा स्टेट यूनिवर्सिटी ने 2008 से 2020 के बीच दुनिया भर में हुई स्टडीज की रिव्यू की. 15 से ज्यादा वैज्ञानिक रिसर्च के आधार पर सामने आया कि एनर्जी ड्रिंक्स किडनी पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं और लंबे समय में किडनी, लिवर और दिल तीनों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई मामलों में ये ड्रिंक्स शराब और सोडा से भी ज्यादा खतरनाक साबित होते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

पटना स्थित एक निजी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के डॉक्टर विमल कुमार राय के मुताबिक, शराब जहां शरीर को डिहाइड्रेट करती है और सोडा शुगर लोड बढ़ाता है, वहीं एनर्जी ड्रिंक्स दोनों का कॉम्बिनेशन हैं. इससे एक साथ डिहाइड्रेशन और ब्लड शुगर बढ़ता है. किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे फिल्टर यूनिट्स थकने लगती हैं, सूजन बढ़ती है और डैमेज का खतरा बढ़ जाता है.

एनर्जी ड्रिंक्स में हाई-फ्रक्टोज कॉर्न सिरप, कैफीन, टॉरिन, आर्टिफिशियल स्वीटनर और सोडियम बेंजोएट जैसे केमिकल्स होते हैं. ये तत्व किडनी सेल्स में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाते हैं. बार-बार इन केमिकल्स को फिल्टर करने से माइक्रो-इंजरी होती है, जो धीरे-धीरे क्रॉनिक किडनी डिजीज में बदल सकती है.

यूरिक एसिड तेजी से बढ़ाती है

हाई-फ्रक्टोज शुगर शरीर में यूरिक एसिड तेजी से बढ़ाती है, जो सीधे किडनी फिल्टर पर हमला करता है. इससे किडनी में सूजन, हाई ब्लड प्रेशर और स्टोन का खतरा बढ़ जाता है. वहीं सिंथेटिक शुगर मेटाबॉलिज़्म को गुमराह करती है, असली एनर्जी नहीं देती और मोटापा, फैटी लिवर व इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाती है. इसका सारा बोझ आखिरकार किडनी को उठाना पड़ता है. डेली एनर्जी ड्रिंक लेने से शरीर में क्रॉनिक इंफ्लेमेशन शुरू हो सकता है. शुरुआत में लक्षण नजर नहीं आते, लेकिन अंदर ही अंदर किडनी डैमेज होती रहती है. कैफीन ब्लड प्रेशर बढ़ाता है, खून को गाढ़ा करता है और लंबे समय में किडनी की फिल्टरिंग क्षमता घटा देता है.

क्या होती है दिक्कत?

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि एनर्जी ड्रिंक्स पीने से जो एनर्जी महसूस होती है, वह असल में दिमाग में थकान के सिग्नल को दबाने का नतीजा होती है. शरीर थका रहता है, लेकिन ब्रेन उसे महसूस नहीं करता. इससे हार्मोनल असंतुलन, हाई बीपी और इम्युनिटी कमजोर होने लगती है.

अगर कोई रोज एनर्जी ड्रिंक्स लेता है, तो उसे तुरंत इन्हें बंद करना चाहिए. दिन में 2.5–3 लीटर पानी पिएं, नमक और प्रोसेस्ड फूड कम करें, ब्लड प्रेशर और किडनी टेस्ट कराएं, कैफीन सीमित रखें और रोज़ाना हल्की वॉक करें. नेचुरल एनर्जी के लिए नींबू पानी, नारियल पानी, छाछ, फल, स्प्राउट्स और ड्राई फ्रूट्स बेहतर विकल्प हैं.

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अब सस्ता होगा कैंसर का इलाज, GST कटौती से दवाएं सस्ती, जानें कैसे मिलेगा मरीजों को राहत

अब सस्ता होगा कैंसर का इलाज, GST कटौती से दवाएं सस्ती, जानें कैसे मिलेगा मरीजों को राहत


How GST Reduction Can Lower Cancer Treatment Costs: कैंसर को रोकने के लिए क्या कदम उठाया जा सकता है, इसपर चर्चा होती है. हालांकि, भारत में कैंसर का इलाज लंबे समय से एक बड़ी हेल्थ चैलेंज रहा है.  महंगी दवाएं, सीमित बीमा कवरेज और इलाज तक मुश्किल पहुंच की वजह से लाखों मरीज और उनके परिवार आर्थिक दबाव में आ जाते हैं. ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा GST सिस्टम में किए गए हालिया बदलावों को कैंसर के इलाज और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से अहम कदम माना जा रहा है.

दवाओं को टैक्स फ्री करने की सिफारिश

GST काउंसिल की 56वीं बैठक में कैंसर और रेयर बीमारियों की 33 जीवनरक्षक दवाओं को पूरी तरह टैक्स फ्री करने की सिफारिश की गई थी. इन दवाओं पर पहले 5 प्रतिशत से 12 प्रतिशत तक जीएसटी लगता था. लेकिन अब टैक्स हटने से इलाज की कुल लागत कम होने की उम्मीद है, खासकर उन मरीजों के लिए जो लंबे समय तक महंगी दवाओं पर निर्भर रहते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एम्स दिल्ली के रेडियोलॉजी डिपार्टमेंट में एमडी डॉ. अभिषेक शंकर का मानना है कि कई पेटेंटेड कैंसर दवाएं इतनी महंगी होती हैं कि मरीज इलाज बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं. जीएसटी हटने से दवाओं की कीमत घटेगी, जिससे इलाज की निरंतरता और सर्वाइवल रेट बेहतर हो सकता है. इसके अलावा, व्यक्तिगत हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियों को जीएसटी से बाहर रखने की सिफारिश भी की गई है, जिससे बीमा लेना आम लोगों के लिए सस्ता हो सकता है.

तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ाने से उम्मीद

स्वास्थ्य के नजरिए से एक और अहम फैसला तंबाकू उत्पादों पर टैक्स बढ़ाने का है. तंबाकू को कैंसर का सबसे बड़ा कारण माना जाता है. टैक्स बढ़ने से इसकी खपत कम होने की संभावना है, जिससे भविष्य में कैंसर, हार्ट डिजीज और सांस की बीमारियों के मामलों में कमी आ सकती है. रिसर्च बताती है कि तंबाकू पर ज्यादा टैक्स खासकर गरीब और मध्यम वर्ग में सेवन घटाने में ज्यादा असरदार होता है.

शुरुआती जांच और इलाज का खर्च होने की संभावना

जीएसटी में कटौती का फायदा सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं है. डायग्नोस्टिक टेस्ट, सर्जिकल उपकरण और मेडिकल सप्लाई पर टैक्स घटने से शुरुआती जांच और इलाज का खर्च भी कम हो सकता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जब जांच सस्ती होती है, तो लोग समय पर टेस्ट कराते हैं, जिससे बीमारी जल्दी पकड़ में आती है. हालांकि एक्सपर्ट यह भी चेतावनी देते हैं कि इन नीतियों का असली असर तभी दिखेगा, जब टैक्स में मिली राहत पूरी तरह मरीजों तक पहुंचे. अगर कंपनियां कीमतें कम नहीं करतीं, तो फायदा सीमित रह सकता है. सरकार ने इंडस्ट्री से यह आग्रह किया है कि वे टैक्स में कटौती का पूरा फायदा ग्राहकों तक पहुंचाएं.

इसे भी पढ़ें- Ghaziabad Suicide Case: गेम की लत ने ली 3 सगी बहनों की जान, एक्सपर्ट से जानें- बच्चों के दिमाग को कैसे काबू करते हैं ये गेम्स?

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शरीर में होने वाले इन छोटे बदलावों को न करें इग्नोर, एक्सपर्ट ने बताए कैंसर के शुरुआती संकेत

शरीर में होने वाले इन छोटे बदलावों को न करें इग्नोर, एक्सपर्ट ने बताए कैंसर के शुरुआती संकेत


Signs Of Cancer You Should Not Ignore: कैंसर अक्सर बिना शोर किए शुरू होता है, कुछ ऐसे हल्के संकेतों के साथ, जिन्हें लोग आम तौर पर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन इन्हीं शुरुआती लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो जिंदगी बचाई जा सकती है. रायपुर स्थित आईटीएसए हॉस्पिटल्स के कंसल्टेंट सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. जयेश शर्मा ने 1 नवंबर इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए भारत में पाए जाने वाले आम कैंसर और उनके शुरुआती चेतावनी संकेतों पर ध्यान दिलाया है.

कहते हैं एक्सपर्ट

डॉ. शर्मा के मुताबिक, मुंह के भीतर कोई सूजन, छाला या घाव अगर कई हफ्तों तक ठीक न हो, तो इसे सामान्य समझकर टालना बड़ी भूल हो सकती है. वह बताते हैं कि ऐसा लक्षण ओरल कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है. अक्सर लोग इसे मामूली इन्फेक्शन मानकर छोड़ देते हैं, जिससे बीमारी की पहचान देर से होती है और इलाज भी टल जाता है.

 

एक और अहम चेतावनी संकेत है असामान्य ब्लीडिंग. डॉ. शर्मा उदाहरण देते हुए कहते हैं कि पुरानी फिल्मों में दिखाया जाता था कि कोई खांसते हुए रूमाल पर खून थूक देता है असल जिंदगी में यह लंग कैंसर का रेड फ्लैग हो सकता है. ऐसे छोटे लेकिन गंभीर संकेतों को अगर समय पर पहचाना जाए, तो बीमारी को शुरुआती स्टेज में पकड़ा जा सकता है.

महिलाओं में कैंसर

महिलाओं के संदर्भ में डॉ. शर्मा बताते हैं कि सर्वाइकल कैंसर भारत में महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर है. इसका एक शुरुआती संकेत असामान्य या लगातार होने वाली वजाइना से ब्लीडिंग है. वह कहते हैं कि इसका मकसद डर पैदा करना नहीं, बल्कि जागरूकता बढ़ाना है. अगर ब्लीडिंग आपके सामान्य चक्र से मेल नहीं खाती या मेनोपॉज के बाद हो रही है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

हालांकि, डॉ. शर्मा यह भी साफ करते हैं कि हर बार घबराने की जरूरत नहीं होती. कभी-कभी मसूड़ों से खून आना या पीरियड्स का अनियमित होना सामान्य भी हो सकता है. फर्क लगातार और बार-बार होने में है. अगर कोई लक्षण बार-बार लौट रहा है, तो यह शरीर का संकेत हो सकता है कि कुछ ठीक नहीं है. ऐसे में समय पर जांच और इलाज ज़िंदगी बचा सकता है.

रेगुलर चेकअप कराने की जरूरत

अंत में डॉ. शर्मा लोगों से अपने शरीर की बात सुनने और नियमित हेल्थ चेक-अप कराने की अपील करते हैं. उनका कहना है कि कैंसर अक्सर दर्द से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे बदलावों से शुरू होता है. इन संकेतों को जल्दी पहचान लिया जाए, तो इलाज के नतीजे बेहतर होते हैं और जान बचने की संभावना बढ़ जाती है.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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