सुबह के नाश्ते में शामिल करें ये 10 देसी चीजें, कंट्रोल में रहेगा ब्लड प्रेशर और हार्ट भी रहेगा हेल्दी

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क्या बीपी नॉर्मल होते ही आपने भी बंद कर दी है दवा? जान लें अचानक ऐसा करने के 5 बड़े नुकसान

क्या बीपी नॉर्मल होते ही आपने भी बंद कर दी है दवा? जान लें अचानक ऐसा करने के 5 बड़े नुकसान


Effects Of Skipping Blood Pressure Medication: हाई ब्लड प्रेशर एक गंभीर बीमारी है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआत में इसके लक्षण साफ दिखाई नहीं देते. जब तक शरीर को नुकसान होने लगता है, तब तक कई लोगों को अहसास ही नहीं होता. इसी वजह से बहुत-से मरीज अपनी दवाएं नियमित रूप से नहीं ले पाते. जब एक-दो गोली छोड़ने पर तुरंत कोई फर्क महसूस नहीं होता, तो दवा भूलना या बंद कर देना आसान लगने लगता है.

अक्सर लोग सोचते हैं कि कभी-कभार दवा न लेने से कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा. लेकिन सच्चाई यह है कि ब्लड प्रेशर की दवाएं आमतौर पर लंबे समय तक, कई बार पूरी जिंदगी के लिए दी जाती हैं. हां, कुछ खास स्थितियों जैसे प्रेग्नेंसी में दवा बदली या रोकी जा सकती है. वहीं कुछ मामलों में अगर लाइफस्टाइल में बड़े और स्थायी बदलावों से बीपी लगातार कंट्रोल में आ जाए, तो डॉक्टर की निगरानी में दवाएं धीरे-धीरे कम या बंद भी की जा सकती हैं.

क्या होता है दवाओं का रोल?

Medline Plus के अनुसार, ब्लड प्रेशर की दवाएं, जिन्हें एंटी-हाइपरटेंसिव कहा जाता है, शरीर में अलग-अलग तरीकों से काम करती हैं. ये नसों को रिलैक्स करती हैं, दिल पर पड़ने वाला दबाव कम करती हैं या शरीर से अतिरिक्त नमक और पानी बाहर निकालने में मदद करती हैं. इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं का खतरा कम होता है.

दवा लेने के लिए समय तय करें

अगर कभी एक डोज छूट जाए, तो जैसे ही याद आए दवा ले लेनी चाहिए, जब तक अगली डोज का समय बहुत करीब न हो. एक डोज छोड़ना आमतौर पर ज्यादा दवा लेने से कम खतरनाक होता है. दवा भूलने से बचने के लिए इसे रोज एक तय समय पर लेना और किसी डेली की आदत से जोड़ना मददगार होता है, जैसे सुबह नाश्ते के साथ या रात को ब्रश के पास रखकर.

डॉक्टर से बात करके दवा बंद करने का डिसीजन लें

Health Central के अनुसार, अगर ब्लड प्रेशर के नंबर सुधर जाएं, तो दवा बंद करने का ख्याल आना स्वाभाविक है. लेकिन डॉक्टर से बात किए बिना दवा अचानक बंद करना खतरनाक हो सकता है. इससे सिरदर्द, चक्कर, सीने में दर्द, धड़कन तेज होना, सांस फूलना या अचानक बीपी का बहुत ज्यादा बढ़ जाना जैसी समस्याएं हो सकती हैं. बीपी 180/120 से ऊपर पहुंच जाए तो इसे हाइपरटेंसिव क्राइसिस माना जाता है, जो इमरजेंसी स्थिति है और इससे स्ट्रोक, हार्ट अटैक, किडनी डैमेज या अंधेपन तक का खतरा हो सकता है.

अगर डॉक्टर को लगता है कि दवा कम करने की संभावना है, तो सबसे सुरक्षित तरीका धीरे-धीरे डोज़ घटाना होता है. इसके लिए घर पर नियमित बीपी मॉनिटरिंग जरूरी होती है. अगर दवा लेते हुए भी बीपी लंबे समय तक नॉर्मल रेंज, जैसे 115/80 के आसपास बना रहे, तभी डॉक्टर दवा कम करने पर विचार करते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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‘हेल्दी’ समझकर खाई जाने वाली ये 6 चीजें बढ़ा सकती हैं दिल का खतरा; कार्डियोलॉजिस्ट ने दी चेतावनी

‘हेल्दी’ समझकर खाई जाने वाली ये 6 चीजें बढ़ा सकती हैं दिल का खतरा; कार्डियोलॉजिस्ट ने दी चेतावनी


Healthy Foods That Harm The Heart: आज के समय में हेल्दी खाना चुनना भी किसी बड़े लक्ष्य को अचीव कर लेने से कम नहीं लगता. पैकेट पर लिखे नेचुरल, हार्ट-फ्रेंडली या होलसम जैसे दावे धीरे-धीरे हमारी आदतें बना देते हैं और हमें भरोसा दिलाते हैं कि हम सही खा रहे हैं. लेकिन चमकदार लेबल और न्यूट्रिशन के बड़े शब्दों के पीछे कुछ ऐसे फूड्स भी हैं, जिन्हें आमतौर पर सेहतमंद माना जाता है, पर वे चुपचाप दिल को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

हार्ट फेल्योर और हार्ट ट्रांसप्लांट में विशेषज्ञ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. दिमित्री यारानोव ने 22 नवंबर को इंस्टाग्राम पोस्ट में ऐसे ही 6 “हेल्दी” माने जाने वाले फूड्स के बारे में बताया, जो कुछ लोगों के लिए दिल के लिए जोखिम भरे हो सकते हैं. डॉ. यारानोव ने अपने कैप्शन में लिखा कि “जिन चीजों को लोग हेल्दी मानते हैं, वही आपके दिल को नुकसान पहुंचा सकती हैं. बात यह नहीं कि ये फूड्स बुरे हैं, बल्कि यह कि आपका दिल, किडनी और दवाइयां यह तय करती हैं कि शरीर नमक, पोटैशियम और मेटाबॉलिज्म को कैसे संभालेगा.”

 

केला
केला पोटैशियम से भरपूर होता है. लेकिन अगर आपकी किडनी ठीक से काम नहीं कर रही या आप स्पिरोनोलैक्टोन या एआरएनआई जैसी दवाएं ले रहे हैं, तो शरीर में पोटैशियम खतरनाक स्तर तक बढ़ सकता है, जो दिल की धड़कन पर असर डाल सकता है.

ग्रेपफ्रूट
ग्रेपफ्रूट कुछ दवाओं को तोड़ने के लिवर के प्रोसेस में दखल देता है. ट्रांसप्लांट मरीजों या खास दवाएं लेने वालों में इससे दवाओं का स्तर सुरक्षित सीमा से बहुत ऊपर जा सकता है.

 पालक
पालक भी पोटैशियम से भरपूर होता है और यह वॉरफरिन जैसी ब्लड थिनर दवा के असर को प्रभावित कर सकता है. डॉ. यारानोव कहते हैं, पालक हेल्दी है, लेकिन यहां ‘ज्यादा खाना” नहीं, बल्कि नियमित और संतुलित मात्रा मायने रखती है.

सोया सॉस
सोया सॉस में सोडियम बहुत ज्यादा होता है. इससे शरीर में पानी रुक सकता है. डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि “सिर्फ एक सुशी नाइट के बाद अगला दिन सांस फूलने और वजन बढ़ने के साथ शुरू हो सकता है.”

 लिकोरिस 
असली काली लिकोरिस ब्लड प्रेशर बढ़ा सकती है और पोटैशियम कम कर सकती है. यह अक्सर चाय, सप्लीमेंट या फ्लेवर वाले प्रोडक्ट्स में छुपी रहती है, बिना लोगों को पता चले.

शराब
शराब सीधे तौर पर दिल के लिए ज़हर की तरह काम करती है. कई मरीजों में दिल की सेहत बिगड़ने की एक बड़ी वजह शराब भी रही है.

डॉ. यारानोव बताते हैं कि खाना सिर्फ “अच्छा” या “बुरा” नहीं होता. वह आपकी दवाओं, टेस्ट रिपोर्ट और हार्ट की हालत के साथ मिलकर असर करता है. इसलिए जरूरी है कि पने शरीर को समझें, अपने नंबर जानें और अपनी सेहत से एक कदम आगे रहें.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बजट का बड़ा हिस्सा हेल्थ सेक्टर पर नहीं हो रहा खर्च, सरकार की स्वास्थ्य नीतियों पर उठे सवाल

बजट का बड़ा हिस्सा हेल्थ सेक्टर पर नहीं हो रहा खर्च, सरकार की स्वास्थ्य नीतियों पर उठे सवाल


स्वास्थ्य हर देश की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होता है. एक मजबूत और स्वस्थ समाज के बिना देश की प्रगति संभव नहीं है.  भारत में पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं, लेकिन सरकारी बजट की असल तस्वीर कुछ और ही कहती है. भारत सरकार ने 2018 में स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए एक विशेष सेस (कर) लागू किया था. इसे स्वास्थ्य खर्च बढ़ाने और देश की जनता, खासकर बीपीएल (गरीब) और ग्रामीण परिवारों की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पेश किया गया. आम धारणा यह थी कि इस सेस से स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च बढ़ेगा और सरकार की मौजूदा स्वास्थ्य बजट का समर्थन होगा. लेकिन आंकड़े और बजट के विवरण बताते हैं कि असलियत इसके बिल्कुल उलट है. 

स्वास्थ्य पर खर्च घटा, जबकि सेस वसूला जा रहा

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए सरकार का कुल बजट खर्च अब पहले की तुलना में कम है. 2017-18 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर खर्च कुल सरकारी खर्च का 2.4 प्रतिशत था. लेकिन 2026-27 के बजट अनुमान में यह घटकर सिर्फ 1.9 प्रतिशत रह गया है. अगर इसे जीडीपी के अनुपात में देखें, तो यह 0.28 प्रतिशत से गिरकर 0.26 प्रतिशत हो गया है.  ध्यान देने वाली बात यह है कि 2026-27 में स्वास्थ्य सेस से जो पैसा इकट्ठा  किया गया है,

वह स्वास्थ्य बजट के कुल खर्च का लगभग 30 प्रतिशत है यानी अगर इस सेस को निकाल दें, तो स्वास्थ्य पर खर्च कुल बजट का सिर्फ 1.3 प्रतिशत होगा, जो 2017-18 की तुलना में आधा भी नहीं है. इसका मतलब यह है कि सेस सिर्फ खर्च बढ़ाने का दिखावा कर रहा है, लेकिन असल में स्वास्थ्य पर खर्च घट रहा है. अगर सेस नहीं होता, तो स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट जीडीपी का सिर्फ 0.18 प्रतिशत होता है. 

बजट के आंकड़े क्या बताते हैं?
 
आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि भारत सरकार का स्वास्थ्य पर वास्तविक खर्च लगातार घट रहा है, भले ही बजट में सेस के कारण थोड़ी बढ़ोतरी दिखती हो. कुल सरकारी खर्च में स्वास्थ्य का हिस्सा 2017-18 में 2.4 प्रतिशत था, जो 2026-27 में घटकर 1.9 प्रतिशत रह गया है. अगर सेस को हटाकर देखा जाए, तो यह हिस्सा और भी कम, सिर्फ 1.3 प्रतिशत है. जीडीपी के अनुपात में भी यही गिरावट नजर आती है. 0.28 प्रतिशत से घट कर 0.26 प्रतिशत हो गया है, और सेस को हटाने पर यह केवल 0.18 प्रतिशत रह जाता है. इसका मतलब है कि सेस के बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र को मिलने वाला वास्तविक बजट लगातार कम हो रहा है और यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्यों से बहुत पीछे है. 
 
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार, 2025 तक स्वास्थ्य पर खर्च को जीडीपी का 2.5 प्रतिशत करना था. इसमें केंद्रीय सरकार का हिस्सा लगभग 0.9 प्रतिशत जीडीपी होना चाहिए था. लेकिन वर्तमान में स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का सिर्फ 0.26 प्रतिशत है, यानी लक्ष्य से लगभग तीन गुना कम, अगर 2017 के समान कुल बजट का 2.4 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता, तो 2026-27 में बिना सेस के बजट लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए था. लेकिन वास्तविक खर्च सेस सहित भी केवल 1 लाख करोड़ रुपये है. 

सेस का असली मकसद और कमी

विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा सेस सिर्फ खर्च बढ़ाने का भ्रम पैदा करता है. सेस का पैसा मुख्य बजट के बाहर एक रिजर्व फंड में जाता है और इस पर कोई पारदर्शिता या परिणाम मापने की जरूरत नहीं होती है. 2018-19 और 2019-20 में स्वास्थ्य के लिए जो सेस वसूला गया, वह सामान्य राजस्व में चला गया. लगभग 20,600 करोड़ रुपये जो स्वास्थ्य के लिए इकट्ठा किए गए थे, उनका कोई खास इस्तेमाल नहीं हुआ. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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खड़े होकर पानी पीना कितना खतरनाक, क्या इससे सेहत को वाकई होता है नुकसान?

खड़े होकर पानी पीना कितना खतरनाक, क्या इससे सेहत को वाकई होता है नुकसान?


आयुर्वेद के अनुसार, खड़े होकर पानी पीने से शरीर में पानी का संतुलन बिगड़ सकता है. इससे पानी सही जगह यूज होने के बजाय जोड़ों और घुटनों के आसपास जमा होने लगता है, जिससे कम उम्र में ही घुटनों का दर्द, अकड़न और जोड़ों की परेशानी शुरू हो सकती है.



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मुंह के छोटे घाव बन सकते हैं कैंसर की चेतावनी, 2 हफ्ते में न भरें तो न करें नजरअंदाज

मुंह के छोटे घाव बन सकते हैं कैंसर की चेतावनी, 2 हफ्ते में न भरें तो न करें नजरअंदाज


मुंह में होने वाले छोटे-छोटे छाले, सफेद या लाल पैच और हल्के दर्द को अक्सर लोग मामूली समझ कर टाल देते हैं. ज्यादातर मामलों में इन्हें तनाव, दांत की परेशानी या नॉर्मल इंफेक्शन मान लिया जाता है. लेकिन डॉक्टरों के अनुसार अगर ऐसे घाव या पैच दो हफ्ते में ठीक न हों, तो यह ओरल कैंसर की शुरुआती चेतावनी भी हो सकते हैं. वहीं जागरूकता की कमी और आदतों से जुड़ी चीजें इस बीमारी को अक्सर नजरों से छिपाए रखती है, जिससे इलाज में देरी हो जाती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि मुंह के छोटे घाव कैंसर की चेतावनी कैसे बन सकते हैं. 

क्यों नजरअंदाज हो जाता है ओरल कैंसर?

ओरल कैंसर की शुरुआती अवस्था में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं. दरअसल मुंह का ऐसा छाला जो ठीक न हो, सफेद या लाल धब्बे, हल्का दर्द या जलन जैसे लक्षणों को लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं. वहीं तंबाकू चबाना, धूम्रपान और शराब जैसी आदतें इससे जुड़ी होने के कारण कई लोग डॉक्टर से खुलकर बात भी नहीं करते हैं. यही वजह है कि बीमारी अक्सर आगे बढ़ने के बाद सामने आती है.

किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत?

डॉक्टरों के अनुसार हमारे देश में ओरल हेल्थ को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है. तंबाकू चबाने वालों, धूम्रपान और शराब का सेवन करने वालों, टूटे दांत होने वालों और जिनकी ओरल हाइजीन खराब है, उन्हें खास तौर पर सतर्क रहना चाहिए. वहीं अगर मुंह में कोई घाव या पैच दो हफ्ते में ठीक न हो या बढ़ने लगे तो तुरंत जांच करानी चाहिए. इसके अलावा डॉक्टरों के अनुसार मुंह में पैच और घाव कई तरह के हो सकते हैं. इसमें छोट, दर्दनाक छाले जो आमतौर पर 1 से 2 हफ्ते ठीक हो जाते हैं. वहीं मुंह, मसूड़ों या जीभ पर सफेद पैच जो रगड़ने से हटते नहीं है. सफेद जालीदार पैच या घाव, जिनमें जलन हो सकती है. लाल रंग के पैच, जिनसे खून भी आ सकता है और इन्हें ज्यादा खतरनाक माना जाता है. 

कब हो सकता है खतरा?

ज्यादातर मुंह के छाले चोट, तनाव, विटामिन की कमी या इंफेक्शन से होते हैं और नॉर्मल इलाज से ठीक हो जाते हैं. लेकिन कुछ मामलों में ये गंभीर बीमारियों का संकेत भी हो सकते हैं. दो हफ्ते से ज्यादा समय तक न भरने वाले छाले ओरल कैंसर का संकेत हो सकते हैं. इसके अलावा ल्यूकोप्लाकिया और एरिथ्रोप्लाकिया को कई मामलों में प्री कैंसर माना जाता है. वहीं कुछ घाव डायबिटीज, एचआईवी या ऑटोइम्यून बीमारियों से भी जुड़े हो सकते हैं.

डॉक्टर से कब करें संपर्क?

अगर मुंह के छाले या पैच बार-बार हो रहे हो,छाले  दर्दनाक हो या लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.वहीं  खासकर तब, जब घाव दो हफ्ते से ज्यादा समय तक ठीक न हो, मुंह में गांठ, खून या लगातार दर्द हो, निगलने, चबाने या बोलने में दिक्कत हो और गर्दन की लिम्फ नोड्स में सूजन आ जाए तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए. 

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