क्या डिब्बाबंद खाने को सेहत के लिए खराब मानते हैं आप? आपकी सोच बदल देगी यह नई रिपोर्ट

क्या डिब्बाबंद खाने को सेहत के लिए खराब मानते हैं आप? आपकी सोच बदल देगी यह नई रिपोर्ट


Which Canned Foods Are Healthiest To Eat: डिब्बाबंद यानी कैन में पैक फूड को अक्सर लोग ताजा खाने की तुलना में कम हेल्दी मानते हैं, लेकिन सच यह है कि कई कैन्ड फूड्स न्यूट्रिशन के मामले में काफी अच्छे होते हैं. इनकी खासियत यह है कि ये लंबे समय तक खराब नहीं होते, कीमत में सस्ते होते हैं और जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल किए जा सकते हैं. सही विकल्प चुनने पर ये आपके आहार में प्रोटीन, फाइबर और जरूरी विटामिन भी जोड़ सकते हैं.

कैन बीन्स 

कैन में मिलने वाली बीन्स जैसे राजमा, काले चने, किडनी बीन्स आदि सबसे अच्छे विकल्पों में से एक मानी जाती हैं. इनमें प्लांट बेस्ड प्रोटीन, आयरन, मैग्नीशियम, पोटैशियम और फोलेट जैसे न्यूट्रिशन तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं. साथ ही इनमें फाइबर ज्यादा और फैट बहुत कम होता है, जिससे पाचन बेहतर रहता है और कोलेस्ट्रॉल तथा ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में भी मदद मिलती है. अगर आप कैन्ड बीन्स इस्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें पानी से धो लेना बेहतर होता है, इससे सोडियम की मात्रा काफी हद तक कम हो जाती है.

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कैन लेंटिल्स

कैन में मिलने वाली मसूर दाल लेंटिल्स भी न्यूट्रिशन से भरपूर होती है. आधा कप कैन्ड लेंटिल्स में करीब 8 ग्राम प्रोटीन और 7 ग्राम फाइबर मिलता है. यह आयरन, जिंक और फोलेट का भी अच्छा सोर्स है. इसमें मौजूद फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है और भोजन के बाद ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने से भी रोकता है.

कैन सार्डिन मछली 

कैन में मिलने वाली सार्डिन मछली भी काफी हेल्दी मानी जाती है. लगभग 90 ग्राम सार्डिन में करीब 23 ग्राम प्रोटीन मिलता है. यह ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होती है, जो हार्ट, ब्रेन और आंखों की सेहत के लिए जरूरी है. इसके अलावा इसमें कैल्शियम, विटामिन D और आयरन भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है.

कैन पंपकिन

कैन में उपलब्ध कद्दू (पंपकिन) भी सेहत के लिए फायदेमंद होता है. एक कप कैन्ड पंपकिन में अच्छी मात्रा में फाइबर होता है और इसमें कैलोरी भी कम होती है. यह विटामिन-A का बेहतरीन सोर्स है, जो आंखों, त्वचा और इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी माना जाता है.

कैन अनानास

कैन में मिलने वाला अनानास विटामिन-C से भरपूर होता है, जो शरीर को इंफेक्शन से बचाने और घाव भरने में मदद करता है. हालांकि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज्यादा होता है, इसलिए इसे दही या दूध जैसे प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थों के साथ खाना बेहतर रहता है.

ये भी हैं विकल्प

आर्टिचोक हार्ट्स भी कैन्ड फूड के रूप में आसानी से मिल जाते हैं. इनमें फाइबर, पोटैशियम और फोलेट अच्छी मात्रा में होता है. इनमें मौजूद प्रीबायोटिक फाइबर आंतों के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद करता है और डाइजेशन सिस्टम को मजबूत बनाता है.

किन बातों का रखें ध्यान?

कैन फूड खरीदते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है. कम सोडियम वाले विकल्प चुनें, लेबल जरूर पढ़ें और ऐसे प्रोडक्ट लें जिनमें अतिरिक्त चीनी या सिरप न हो. इसके साथ ही कोशिश करें कि BPA-फ्री पैकेजिंग वाले डिब्बे लें और कभी भी डेंटेड या फूले हुए कैन न खरीदें, क्योंकि इनमें खराब बैक्टीरिया हो सकते हैं. सही तरीके से चुने गए कैन्ड फूड्स आपके रोजमर्रा के आहार का हेल्दी हिस्सा बन सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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30 साल हो गई उम्र तो जरूर कराएं ये टेस्ट, विमेंस डे पर खुद को दें ये तोहफा

30 साल हो गई उम्र तो जरूर कराएं ये टेस्ट, विमेंस डे पर खुद को दें ये तोहफा


हर साल 8 मार्च को हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं. यह दिन महिलाओं के अधिकारों, समाज में उनके योगदान और उनके स्वास्थ्य की अहमियत को याद दिलाता है. समाज में महिलाएं परिवार और कामकाज की जिम्मेदारियों को संतुलित करने में जुटी रहती हैं. अक्सर इस भागदौड़ में वे अपनी सेहत पर ध्यान देना भूल जाती हैं. खासकर जब कोई महिला 30 साल की उम्र पार कर लेती है, तो उसके शरीर में हार्मोनल और मेटाबॉलिक बदलाव शुरू हो जाते हैं. इस उम्र में महिलाओं को अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना बेहद जरूरी हो जाता है. समय पर मेडिकल चेकअप कराने से गंभीर बीमारियों का शुरुआती चरण में पता चल जाता है और उनका इलाज आसान हो जाता है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि 30 साल की उम्र के बाद हर महिला को कौन-कौन से टेस्ट  जरूर कराने चाहिए. 

30 साल हो गई उम्र तो जरूर कराएं ये टेस्ट

1. सर्वाइकल कैंसर की जांच – सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे खतरनाक कैंसर में से एक है. WHO की रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में लगभग 6,60,000 नए मामले सामने आए और 3,50,000 महिलाओं की मौत इसी कारण हुई.  इसलिए 30 साल की उम्र के बाद हर महिला को तीन साल में एक बार पैप स्मीयर टेस्ट कराना चाहिए. इसके अलावा कई बार HPV टेस्ट की भी सलाह दी जाती है. इन टेस्ट्स से सर्विक्स की कोशिकाओं में बदलाव का पता चलता है और कैंसर का खतरा कम हो जाता है. 

2. ब्रेस्ट कैंसर की जांच – दुनियाभर में ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कैंसर है. WHO के अनुसार, 2022 में लगभग 6,70,000 महिलाओं की मौत ब्रेस्ट कैंसर के कारण हुई. ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती स्टेज में इलाज करना बहुत आसान होता है. इसलिए, 30 साल की उम्र से ही महिलाओं को खुद से ब्रेस्ट चेक करने की आदत डालनी चाहिए. किसी भी गांठ, सूजन या दर्द का तुरंत पता लग सके. 40 साल की उम्र के बाद नियमित मैमोग्राफी भी जरूरी है, खासकर अगर परिवार में ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास हो. 

3. ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल टेस्ट – आजकल की तेज-तर्रार जिंदगी में महिलाएं घर और काम दोनों संभाल रही हैं. खराब लाइफस्टाइल, तनाव और खानपान के कारण डायबिटीज और हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या जल्दी होने लगी है.  अगर परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, तो यह और भी जरूरी हो जाता है. इससे हार्ट डिजीज और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का समय पर पता चल जाता है. 

4. थायराइड टेस्ट – हार्मोनल बदलावों के कारण थायराइड की समस्या महिलाओं में आम है. यह पीरियड्स के चक्र को प्रभावित करता है और समय से पहले मेनोपॉज का खतरा बढ़ा सकता है. अगर वजन अचानक बढ़े या घटे, लगातार थकान महसूस हो, बाल झड़ने लगें या मूड स्विंग्स हों, तो थायराइड फंक्शन टेस्ट कराना बहुत जरूरी है. नियमित चेकअप में थायराइड की जांच से इन समस्याओं को समय रहते रोका जा सकता है.

5. हड्डियों की जांच – 35 साल की उम्र के बाद महिलाओं की हड्डियों की ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है. अगर शरीर में विटामिन D और कैल्शियम की कमी हो, तो हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. बोन मिनरल डेंसिटी टेस्ट से ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे का पता चलता है. जो महिलाएं लंबे समय तक एक ही पोस्चर में बैठती हैं या बार-बार फ्रैक्चर का सामना करती हैं, उन्हें यह टेस्ट 30 साल से पहले ही करवा लेना चाहिए. 

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महिला दिवस पर खुद को दें यह तोहफा

महिला दिवस सिर्फ सम्मान का दिन नहीं है, बल्कि यह दिन खुद के स्वास्थ्य और खुशहाली पर ध्यान देने का भी है. 30 साल के बाद महिलाओं के शरीर में बदलाव शुरू होते हैं और समय पर चेकअप कराना उनके जीवन को सुरक्षित बनाता है. ऐसे में पैप स्मीयर और HPV टेस्ट , ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग और ब्लड शुगर व कोलेस्ट्रॉल टेस्ट जो हर महिला को 30 साल के बाद जरूर कराना चाहिए. नियमित चेकअप और सावधानी से महिलाएं न सिर्फ अपनी सेहत बेहतर रख सकती हैं, बल्कि अपने परिवार के लिए भी मजबूत और खुशहाल आधार बन सकती हैं. इसलिए इस महिला दिवस पर खुद को स्वास्थ्य का तोहफा दें और अपनी जिंदगी में स्वास्थ्य को प्राथमिकता बनाएं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्यों समय से पहले सख्त हो रहीं युवाओं की आर्टरीज, क्या यह हार्ट अटैक का साइलेंट सिग्नल?

क्यों समय से पहले सख्त हो रहीं युवाओं की आर्टरीज, क्या यह हार्ट अटैक का साइलेंट सिग्नल?


Why Are Young People Getting Heart Attacks: भारत के कार्डियोलॉजिस्ट इन दिनों एक चिंताजनक ट्रेंड देख रहे हैं कि कम उम्र के युवाओं की आर्टरीज समय से पहले बूढ़ी हो रही हैं. जन्म प्रमाणपत्र भले 35 साल दिखाए, लेकिन जांच में आर्टरीज 50-55 साल जैसी नजर आ रही हैं. यही अंतर डॉक्टर “अर्ली वैस्कुलर एजिंग” यानी समय से पहले आर्टरीज की उम्र बढ़ना कहते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है. 

क्रोनोलॉजिकल बनाम बायोलॉजिकल एज

डॉ. विवेक कुमार ने TOI को बताया कि उम्र को अब दो नजरियों से देखा जाता है. एक है क्रोनोलॉजिकल एज, यानी आप कितने साल जिए और दूसरी है बायोलॉजिकल एज, यानी शरीर के अंग कितने स्वस्थ हैं. कई बार 35 साल का व्यक्ति अंदर से 50 साल जैसा हो सकता है, खासकर हार्ट और आर्टरीज के मामले में. हेल्दी आर्टरीज लचीली होती हैं. वे हर धड़कन के साथ फैलती-सिकुड़ती हैं और ब्लड फ्लो सहज बनाए रखती हैं. लेकिन जब वे सख्त और मोटी होने लगती हैं, तो सूक्ष्म स्तर पर नुकसान जमा होने लगता है. यह प्रक्रिया बिना लक्षणों के शुरू हो सकती है.

युवा आर्टरीज क्यों हो रहीं बूढ़ी?

डॉ. मुकेश गोयल के मुताबिक आधुनिक जीवनशैली इसका बड़ा कारण है. लंबी देर तक बैठना, हाई-स्टेस जॉब, प्रोसेस्ड फूड, नींद की कमी, धूम्रपान, अनकंट्रोल ब्लड प्रेशर और शुगर, ये सब मिलकर आर्टरीज को तेजी से नुकसान पहुंचाते हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के ICMR-INDIAB स्टडी  में कम उम्र में डायबिटीज और प्रीडायबिटीज के बढ़ते मामलों को बताया  है. वहीं वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने भी मानता है कि हार्ट रोग आज भी दुनिया में मौत का प्रमुख कारण है और अब यह खतरा सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा

इसको कैसे रोका जा सकता है?

सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग खुद को स्वस्थ मान लेते हैं क्योंकि उन्हें कोई लक्षण महसूस नहीं होता. लेकिन आर्टरीज में जमी सख्ती और प्लाक सालों तक चुपचाप बढ़ती रहती है. कई बार पहला संकेत सीधे हार्ट अटैक या स्ट्रोक के रूप में सामने आता है. अच्छी खबर यह है कि बायोलॉजिकल एज बदली जा सकती है. रेगुलर एरोबिक एक्सरसाइज, संतुलित आहार जिसमें फल, सब्जियां, साबुत अनाज, नट्स शामिल हैं, हेल्दी नींद और डिप्रेशन को सही तरीके से मैनेज करने से आर्टरीज की लचक सुधारी जा सकती है. स्मोकिंग छोड़ने से भी कुछ महीनों में सुधार दिख सकता है. असल सवाल यह नहीं कि आपकी उम्र कितनी है, बल्कि यह है कि आपकी आर्टरीज कितनी स्वस्थ हैं. अगर इस सोच में बदलाव आ जाए, तो दिल की बीमारियों से जुड़ी कई दिक्कतों को टाला जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या रात में सोने से ठीक पहले हल्दी वाला दूध पीना सही? जानें एक्सपर्ट्स की राय

क्या रात में सोने से ठीक पहले हल्दी वाला दूध पीना सही? जानें एक्सपर्ट्स की राय


Is It Good To Drink Turmeric Milk Before Bed: हल्दी दूध भारतीय घरों में सर्दियों का अहम हिस्सा रहा है. हमारे यहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी को रात में सोने से पहले हल्दी वाला दूध पीने की सलाह दी जाती है. दूध, हल्दी, काली मिर्च, अदरक और दालचीनी से बना यह पेय न सिर्फ स्वादिष्ट होता है बल्कि सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि यह आपके लिए कितना फायदेमंद है.
 
हल्दी वाला दूध कितना फायदेमंद?

हल्दी दूध में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीमाइक्रोबियल गुण शरीर की इम्यून क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं. सर्दियों में यह सर्दी-खांसी और फ्लू से बचाने में सहायक माना जाता है. खासतौर पर बुजुर्गों के लिए यह जोड़ों के दर्द, गठिया और मांसपेशियों में दर्द जैसी समस्याओं में राहत देने में मदद कर सकता है. इसके अलावा यह गले की खराश को शांत करने और बेहतर नींद लाने में भी सहायक माना जाता है.

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कब पीना चाहिए हल्दी दूध?

हालांकि हल्दी दूध पीते समय कई लोग एक आम गलती कर बैठते हैं कि इसे सोने से ठीक पहले पी लेना. हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक रात के खाने और सोने के बीच कम से कम एक से दो घंटे का अंतर होना चाहिए. हल्दी दूध कैलोरी से भरपूर होता है और इसे तुरंत पीकर सो जाने से डाइजेशन सिस्टम पर असर पड़ सकता है. डायटीशियन चारू सदाना के अनुसार हल्दी में मौजूद करक्यूमिन एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होता है और यह पाचन में भी मदद करता है।. लेकिन अगर इसे भारी भोजन के तुरंत बाद या सोने से ठीक पहले पिया जाए, तो यह कुछ लोगों में पित्त के उत्पादन को बढ़ा सकता है, जिससे एसिडिटी या एसिड रिफ्लक्स की समस्या हो सकती है.

इन लोगों को हो सकती है दिक्कत

Medanta की एक रिपोर्ट के अनुसार, हल्दी दूध भले ही सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता हो, लेकिन कुछ लोगों को इसे पीते समय खास सावधानी बरतनी चाहिए. जिन लोगों को गॉलब्लैडर से जुड़ी समस्या है, उन्हें हल्दी दूध से बचना चाहिए, क्योंकि हल्दी पित्त के स्राव को बढ़ा सकती है और इससे परेशानी बढ़ सकती है. अगर आप ब्लड थिनर दवाइयां लेते हैं, तो भी हल्दी का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए. हल्दी खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती है, जिससे दवाओं के साथ मिलकर ब्लीडिंग का खतरा बढ़ सकता है. जिन लोगों को आयरन की कमी की समस्या है, उन्हें भी हल्दी दूध का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि हल्दी शरीर में आयरन के ऑब्जर्वेशन को प्रभावित कर सकती है. 

इसके अलावा अगर आप गर्भवती हैं, लिवर से जुड़ी बीमारी से पीड़ित हैं या किसी सर्जरी की योजना बना रहे हैं, तो हल्दी दूध को नियमित रूप से लेने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें, सही मात्रा और सही स्थिति में ही इसका सेवन करना सुरक्षित और फायदेमंद माना जाता है.

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जिम में मेहनत के बाद भी नहीं घट रहा वजन, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये बड़ी गलतियां?

जिम में मेहनत के बाद भी नहीं घट रहा वजन, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये बड़ी गलतियां?


Why Am I Not Losing Weight Despite Working Out: कई लोग जिम या योगा क्लास में पूरी मेहनत और अनुशासन के साथ जाते हैं. वर्कआउट खत्म होने के बाद उन्हें लगता है कि उन्होंने अपनी फिटनेस के लिए सब कुछ सही किया है. लेकिन जैसे ही वे वजन मशीन पर खड़े होते हैं और वही पुराना नंबर दिखाई देता है, तो निराशा होने लगती है. ऐसे में अक्सर सवाल उठता है कि जब हम नियमित एक्सरसाइज कर रहे हैं, तो वजन कम क्यों नहीं हो रहा?.

क्यों नहीं हो रहा है वजन कम?

दरअसल वजन कम होना सिर्फ जिम में पसीना बहाने से तय नहीं होता. हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं. दिनभर हम क्या खाते हैं, कितनी एक्टिविटी करते हैं, कितनी नींद लेते हैं और तनाव को कैसे संभालते हैं, ये सभी चीजें वजन पर असर डालती हैं. कई बार हम मान लेते हैं कि ज्यादा वर्कआउट करने से बहुत ज्यादा कैलोरी बर्न हो जाती है, जबकि असलियत यह है कि एक्सरसाइज से उतनी कैलोरी खर्च नहीं होती जितनी हम सोचते हैं.

इस पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

फिटनेस एक्सपर्ट डॉ. विपुल लुनावत ने India Today को बताया कि फिजिकल एक्टिविटी के दौरान खर्च हुई ऊर्जा की भरपाई दूसरे तरीकों से कर लेता है. इसका मतलब यह नहीं कि वर्कआउट छोड़ देना चाहिए, बल्कि इसे सही तरीके से करना जरूरी है. उदाहरण के लिए, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग मसल्स बनाने में मदद करती है और मसल्स बढ़ने से शरीर का मेटाबॉलिज्म तेज होता है, जिससे आराम की स्थिति में भी ज्यादा कैलोरी बर्न होती है.

खानपान और लाइफस्टाइल की अहम भूमिका

वजन कम करने में खानपान भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कई लोग हेल्दी फूड तो खाते हैं, लेकिन उसकी मात्रा पर ध्यान नहीं देते. न्यूट्रिशन एक्सपर्ट एडविना राज के अनुसार, नट्स, घी, एवोकाडो, स्मूदी और सूखे मेवे जैसे कई हेल्दी फूड्स में कैलोरी ज्यादा होती है. अगर इन्हें अधिक मात्रा में खाया जाए तो वजन कम होने की गति धीमी हो सकती है. इसलिए संतुलित आहार और सही पोर्शन साइज पर ध्यान देना जरूरी है.

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इसके अलावा बार-बार स्नैकिंग करना और मीठे या कैलोरी वाले ड्रिंक्स लेना भी वजन घटाने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है. प्रोटीन की कमी भी एक आम समस्या है. पर्याप्त प्रोटीन न मिलने पर शरीर मसल्स को बनाए नहीं रख पाता और मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है. इसलिए हर भोजन में प्रोटीन के सोर्स जैसे अंडे, दालें, पनीर, टोफू या मछली शामिल करना फायदेमंद होता है. 

दिनभर की एक्टिविटी का भी अहम रोल 

दिनभर की गतिविधि भी बहुत मायने रखती है. सिर्फ एक घंटे जिम करने से पूरे दिन बैठकर बिताने की भरपाई नहीं हो सकती. ज्यादा चलना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और बीच-बीच में शरीर को एक्टिव रखना वजन घटाने में मदद करता है. इसके साथ ही पर्याप्त नींद और तनाव को कंट्रोल रखना भी जरूरी है, क्योंकि कम नींद और ज्यादा तनाव हार्मोनल असंतुलन पैदा कर सकते हैं और वजन कम करना मुश्किल बना सकते हैं.

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लगातार बढ़ रहे फैटी लिवर के मामले, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये 8 गलतियां?

लगातार बढ़ रहे फैटी लिवर के मामले, कहीं आप भी तो नहीं कर रहे ये 8 गलतियां?


Can You Get Fatty Liver Without Drinking Alcohol: फैटी लिवर एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में लोग अक्सर गंभीरता से नहीं सोचते. नाम सुनने में यह बहुत हल्का लगता है, इसलिए कई लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं. शुरुआत में इसमें कोई खास दर्द या स्पष्ट लक्षण भी दिखाई नहीं देते, जिससे यह समस्या सालों तक छिपी रह सकती है. कई बार जब तक इसके संकेत साफ तौर पर सामने आते हैं, तब तक लिवर को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है. ऐसे में जरूरी है कि फैटी लिवर से जुड़े कुछ आम मिथकों और सच्चाई को समझा जाए. चलिए आ पको बताते हैं इससे जुड़े कुछ मिथक.

क्या यह सिर्फ शराब पीने की वजह से होता है?

सबसे बड़ा भ्रम यह है कि फैटी लिवर सिर्फ शराब पीने वालों को ही होता है. जबकि सच्चाई यह है कि आज ज्यादातर मामलों में यह नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज के रूप में सामने आता है. इसका मतलब यह है कि जो लोग शराब नहीं पीते, उन्हें भी यह बीमारी हो सकती है.

इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा, खराब खानपान और जेनेटिक कारण इसके पीछे अहम भूमिका निभाते हैं. गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. भास्कर नंदी ने TOI को बताया कि भारत में लगभग 30 से 40 प्रतिशत लोगों में NAFLD पाया जाता है और इनमें से अधिकतर मरीज डायबिटीज, मोटापे या हाई कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं. 

वजन कंट्रोल रहने पर फैटी लिवर नहीं होता

एक और आम धारणा यह है कि अगर व्यक्ति का वजन सामान्य है तो उसे फैटी लिवर नहीं हो सकता. लेकिन डॉक्टर बताते हैं कि कई दुबले दिखने वाले लोगों में भी यह समस्या पाई जाती है, जिसे लीन NAFLD कहा जाता है. असल में शरीर में जमा होने वाला विसरल फैट, जो आंतरिक अंगों के आसपास जमा होता है, बाहर से हमेशा दिखाई नहीं देता.

सबकुछ ठीक मान लेना

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अगर ब्लड टेस्ट में लिवर एंजाइम सामान्य आए हैं तो सब ठीक है. लेकिन एक्सपर्ट के अनुसार शुरुआती चरण में फैटी लिवर के बावजूद ALT और AST जैसे एंजाइम सामान्य रह सकते हैं. इसलिए सिर्फ एक टेस्ट के आधार पर पूरी तरह निश्चिंत होना सही नहीं है.

क्या फैटी लिवर मामूली समस्या है और कभी भी ठीक हो सकता है?

कई लोग सोचते हैं कि फैटी लिवर एक मामूली समस्या है और इसे कभी भी ठीक किया जा सकता है. हालांकि शुरुआती चरण में इसे कंट्रोल किया जा सकता है, लेकिन अगर लंबे समय तक अनदेखा किया जाए तो यह नॉन-अल्कोहोलिक स्टीटोहेपेटाइटिस , फाइब्रोसिस और आगे चलकर सिरोसिस जैसी गंभीर स्थिति में बदल सकता है. यह लिवर फेलियर और लिवर कैंसर का कारण भी बन सकता है.

इनको कर देते हैं नजरअंदाज और चीनी जिम्मेदार

फैटी लिवर अक्सर तेज दर्द की बजाय हल्के संकेत देता है, जिन्हें लोग नजरअंदाज कर देते हैं. जैसे लगातार थकान, पेट के दाहिने हिस्से में भारीपन, गर्दन के आसपास त्वचा का काला पड़ना या पेट के आसपास अचानक चर्बी बढ़ना, इस समस्या के पीछे सिर्फ ज्यादा चीनी खाना ही जिम्मेदार नहीं होता. रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, शारीरिक गतिविधि की कमी, तनाव, खराब नींद और अनियमित खानपान भी इसके जोखिम को बढ़ाते हैं.

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ये भी हैं मिथक

फैटी लिवर के इलाज में केवल दवाइयों पर निर्भर रहना भी सही नहीं है. एक्सपर्ट का कहना है कि सबसे प्रभावी उपाय लाइफस्टाइल में बदलाव है. वजन को 7 से 10 प्रतिशत तक कम करना, रेगुलर करना, संतुलित आहार लेना और पर्याप्त नींद लेना लिवर को स्वस्थ बनाने में मदद करता है.

डॉक्टरों के अनुसार कमर का बढ़ता घेरा, प्रीडायबिटीज, हाई ट्राइग्लिसराइड, कम HDL कोलेस्ट्रॉल और लगातार थकान जैसे संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए. समय-समय पर जांच करवाना, प्रोसेस्ड फूड कम करना, रोजाना पैदल चलना और स्वस्थ आदतें अपनाना फैटी लिवर से बचाव में बेहद मददगार हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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