डाइटिशियन का अलर्ट, रोज पीने वाले ये 7 ड्रिंक्स आपके पेट को कर रहे खराब

डाइटिशियन का अलर्ट, रोज पीने वाले ये 7 ड्रिंक्स आपके पेट को कर रहे खराब


कार्बोनेटेड ड्रिंक्स आपके पेट को खराब कर सकती है. दरअसल सोडा, स्पार्कलिंग वॉटर और एनर्जी फिज ड्रिंक्स में कार्बन डाइऑक्साइड गैस भरी होती है. यह गैस पेट में फंस जाती है और कई लोगों में ब्लोटिंग, डकार और पेट फूलने की समस्या बढ़ाती है. जीरो शुगर या हेल्दी सोडा भी इसी परेशानी का कारण बन सकते हैं क्योंकि समस्या गैस की होती है न कि सिर्फ सामग्री की.

प्रोटीन शेक्स भी पेट की समस्याओं को बढ़ा सकते हैं. प्रोटीन शेक खासकर डेयरी बेस्ड प्रोडक्ट में मौजूद लैक्टोज कई लोगों को सूट नहीं करता. इससे गैस पेट दर्द और ब्लोटिंग हो सकती है. वहीं प्लांट बेस्ड शेक्स में भी स्वीटनर और गम्स के कारण पाचन बिगाड़ सकता है. एक बार में ज्यादा प्रोटीन पीना भी पेट पर दबाव डालता है.

प्रोटीन शेक्स भी पेट की समस्याओं को बढ़ा सकते हैं. प्रोटीन शेक खासकर डेयरी बेस्ड प्रोडक्ट में मौजूद लैक्टोज कई लोगों को सूट नहीं करता. इससे गैस पेट दर्द और ब्लोटिंग हो सकती है. वहीं प्लांट बेस्ड शेक्स में भी स्वीटनर और गम्स के कारण पाचन बिगाड़ सकता है. एक बार में ज्यादा प्रोटीन पीना भी पेट पर दबाव डालता है.

वहीं बीयर में नेचुरल कार्बोनेशन और फर्मेंटेशन दोनों मौजूद होते हैं जो पेट में गैस बढ़ाते हैं. बीयर में मौजूद यीस्ट और कार्ब्स आंतों में फर्मेंट होकर गैस बनाते हैं. ऐसे में बीयर, वाइन या कोम्बुचा कुछ लोगों में ब्लोटिंग और भारीपन बढ़ा सकते हैं.

वहीं बीयर में नेचुरल कार्बोनेशन और फर्मेंटेशन दोनों मौजूद होते हैं जो पेट में गैस बढ़ाते हैं. बीयर में मौजूद यीस्ट और कार्ब्स आंतों में फर्मेंट होकर गैस बनाते हैं. ऐसे में बीयर, वाइन या कोम्बुचा कुछ लोगों में ब्लोटिंग और भारीपन बढ़ा सकते हैं.

इसके अलावा कॉफी पेट में एसिड बढ़ाती है. कैफीन संवेदनशील लोगों में गैस, एसिडिटी या दस्त जैसी समस्या दे सकती है. यह आंतों को स्टिमुलेट करते हैं. जिससे कुछ लोगों को राहत मिलती है लेकिन कई लोगों में गैस और चुभन जैसे समस्याएं बढ़ती है.

इसके अलावा कॉफी पेट में एसिड बढ़ाती है. कैफीन संवेदनशील लोगों में गैस, एसिडिटी या दस्त जैसी समस्या दे सकती है. यह आंतों को स्टिमुलेट करते हैं. जिससे कुछ लोगों को राहत मिलती है लेकिन कई लोगों में गैस और चुभन जैसे समस्याएं बढ़ती है.

वहीं दूध में मौजूद लैक्टोज बहुत लोगों को पचता नहीं है. चाय या कॉफी में थोड़ा सा दूध भी गैस, पेट दर्द और ब्लोटिंग का कारण बन सकता है. यही वजह है कि कई लोगों में डेयरी लेने के बाद पेट भारी महसूस होता है.

वहीं दूध में मौजूद लैक्टोज बहुत लोगों को पचता नहीं है. चाय या कॉफी में थोड़ा सा दूध भी गैस, पेट दर्द और ब्लोटिंग का कारण बन सकता है. यही वजह है कि कई लोगों में डेयरी लेने के बाद पेट भारी महसूस होता है.

पैकेज्ड जूस, सॉफ्ट ड्रिंक्स और स्पोर्ट्स ड्रिंक्स में ज्यादा शुगर होती है जो तेजी से पचकर आंतों में फर्मेंट होती है. इससे गैस बनती है, खासतौर पर हाई प्रोटीन वाले ड्रिंक पेट को और खराब कर देते हैं.

पैकेज्ड जूस, सॉफ्ट ड्रिंक्स और स्पोर्ट्स ड्रिंक्स में ज्यादा शुगर होती है जो तेजी से पचकर आंतों में फर्मेंट होती है. इससे गैस बनती है, खासतौर पर हाई प्रोटीन वाले ड्रिंक पेट को और खराब कर देते हैं.

संतरा, मौसंबी या नींबू का जूस भी ज्यादा एसिडिक होते हैं. खाली पेट इन्हें पीने से पेट की लाइनिंग में जलन होती है और गैस और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं बढ़ जाती है.

संतरा, मौसंबी या नींबू का जूस भी ज्यादा एसिडिक होते हैं. खाली पेट इन्हें पीने से पेट की लाइनिंग में जलन होती है और गैस और ब्लोटिंग जैसी समस्याएं बढ़ जाती है.

Published at : 04 Dec 2025 08:24 AM (IST)

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थकान से लेकर रात में पसीना आने तक ये 7 संकेत बताते हैं कि इंफेक्शन से लड़ रहा है आपका शरीर

थकान से लेकर रात में पसीना आने तक ये 7 संकेत बताते हैं कि इंफेक्शन से लड़ रहा है आपका शरीर


इंफेक्शन शुरुआत में इसलिए शांत रहते हैं क्योंकि इम्यून सिस्टम उन्हें दबाए रखता है और केवल हल्के लक्षण सामने आते हैं. अक्सर लोग हल्की परेशानी को थकान, तनाव या कोई पुरानी आदत मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. जिससे असली समस्या छुप जाती है.

वहीं पर्याप्त आराम के बावजूद दिनभर थकान, कमजोरी या ऊर्जा की कमी महसूस होना इस बात का संकेत हो सकता है कि इम्यून सिस्टम किसी इंफेक्शन से लड़ने में ऊर्जा खर्च कर रहा है. यह कंडीशन कई दिनों या हफ्तों तक भी रह सकती है.

वहीं पर्याप्त आराम के बावजूद दिनभर थकान, कमजोरी या ऊर्जा की कमी महसूस होना इस बात का संकेत हो सकता है कि इम्यून सिस्टम किसी इंफेक्शन से लड़ने में ऊर्जा खर्च कर रहा है. यह कंडीशन कई दिनों या हफ्तों तक भी रह सकती है.

हल्का, लगातार या बदलता हुआ बुखार शरीर में छुपे हुए कई इंफेक्शन का संकेत हो सकता है. इसके साथ ठंड लगना या नाइट स्वेट्स होने जैसी हल्की परेशानी भी दिखाई दे सकती है, जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.

हल्का, लगातार या बदलता हुआ बुखार शरीर में छुपे हुए कई इंफेक्शन का संकेत हो सकता है. इसके साथ ठंड लगना या नाइट स्वेट्स होने जैसी हल्की परेशानी भी दिखाई दे सकती है, जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं.

अगर बिना किसी मेहनत या थकावट के शरीर में दर्द, जकड़न या सुस्ती महसूस होती है तो यह इंफेक्शन के कारण बनने वाली सूजन का संकेत हो सकता है.

अगर बिना किसी मेहनत या थकावट के शरीर में दर्द, जकड़न या सुस्ती महसूस होती है तो यह इंफेक्शन के कारण बनने वाली सूजन का संकेत हो सकता है.

इंफेक्शन कई बार पाचन तंत्र को भी प्रभावित करता है. पेट में असहजता, ऐंठन, दस्त या अचानक भूख कम लगना इस बात की ओर इशारा कर सकता है कि शरीर किसी आंतरिक समस्या से लड़ रहा है.

इंफेक्शन कई बार पाचन तंत्र को भी प्रभावित करता है. पेट में असहजता, ऐंठन, दस्त या अचानक भूख कम लगना इस बात की ओर इशारा कर सकता है कि शरीर किसी आंतरिक समस्या से लड़ रहा है.

वहीं सूखी खांसी, गले में दर्द, बलगम बढ़ना या नाक बंद रहना जैसी समस्याएं लंबे समय तक बनी रहे तो यह भी एक छुपे हुए इंफेक्शन का शुरुआती संकेत हो सकता है.

वहीं सूखी खांसी, गले में दर्द, बलगम बढ़ना या नाक बंद रहना जैसी समस्याएं लंबे समय तक बनी रहे तो यह भी एक छुपे हुए इंफेक्शन का शुरुआती संकेत हो सकता है.

गर्दन, बगल या जांघ के पास लिंफ नोड्स का सूजना भी बताता है कि शरीर इम्यून सेल्स बना रहा है. इसके अलावा किसी हिस्से में लाली, गर्माहट या सूजन भी छुपे इन्फेक्शन का संकेत हो सकते हैं.

गर्दन, बगल या जांघ के पास लिंफ नोड्स का सूजना भी बताता है कि शरीर इम्यून सेल्स बना रहा है. इसके अलावा किसी हिस्से में लाली, गर्माहट या सूजन भी छुपे इन्फेक्शन का संकेत हो सकते हैं.

वहीं इन्फेक्शन शरीर के साथ दिमाग को भी प्रभावित करता है. लगातार चिड़चिड़ापन, दिमाग का सुस्त होना, ध्यान न लगना या मेंटल थकान महसूस होना इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर अंदर से इंफेक्शन से लड़ रहा है.

वहीं इन्फेक्शन शरीर के साथ दिमाग को भी प्रभावित करता है. लगातार चिड़चिड़ापन, दिमाग का सुस्त होना, ध्यान न लगना या मेंटल थकान महसूस होना इस बात का संकेत हो सकता है कि शरीर अंदर से इंफेक्शन से लड़ रहा है.

Published at : 04 Dec 2025 08:22 AM (IST)

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इंसान के शरीर में कैसे बनता है खून, इसमें हड्डियां कैसे करती हैं मदद?

इंसान के शरीर में कैसे बनता है खून, इसमें हड्डियां कैसे करती हैं मदद?



How Blood Is Formed In The Body: हमारे शरीर में ब्लड होता है, यह सबको पता है. लेकिन ये ब्लड हमारे शरीर में कहां बनते हैं या कहां से आते हैं, इसको लेकर काफी लोगों को जानकारी नहीं होती है. हमारे शरीर में खून बनने की शुरुआत हड्डियों के भीतर मौजूद बोन मैरो से होती है. यह बोन मैरो एक तरह का नरम, स्पंजी पदार्थ होता है, जो हड्डियों के बीचों–बीच भरा रहता है. यही वह जगह है जहां शरीर के लगभग 95 प्रतिशत ब्लड के सेल तैयार होते हैं.  बड़े होने के बाद अधिकतर बोन मैरो हमारी कूल्हे की हड्डियों, सीने की हड्डी और रीढ़ की हड्डियों में पाया जाता है.  शरीर के कुछ और अंग भी खून के सेल को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाते हैंय  इनमें लिंफ नोड्स, प्लीहा (स्प्लीन) और लीवर शामिल हैं.  ये अंग मिलकर तय करते हैं कि किस समय खून के सेल कितने बनेंगे, कब टूटेंगे और कब किसी खास प्रकार के सेल में बदलेंगे. 

बोन मैरो में बनने वाले सभी  ब्लड सेल्स शुरुआत में एक स्टेम सेल के रूप में होती हैं. यही स्टेम सेल धीरे-धीरे बदलकर अलग-अलग तरह के सेल में विकसित होती हैं.  इनमें रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स शामिल हैं.  जब ये अधूरे रूप में होते हैं, तो इन्हें ‘ब्लास्ट’ कहा जाता है. कुछ ब्लास्ट बोन मैरो में ही रहकर आगे विकसित होते हैं, जबकि कुछ शरीर के अलग-अलग हिस्सों में जाकर पूरे विकसित सेल बन जाते हैं.

खून की हर सेल्स का क्या काम होता है?

रेड ब्लड सेल्स : इनका मुख्य काम है फेफड़ों से ऑक्सीजन पूरे शरीर तक पहुंचाना और शरीर में बनने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को वापस फेफड़ों तक लाना. इन सेल्स में मौजूद हीमोग्लोबिन नाम का प्रोटीन इसी प्रक्रिया को आसान बनाता है. 

व्हाइट ब्लड सेल्स: इनका काम है शरीर को इंफेक्शन से बचाना. इनमें कई तरह की सेल्स शामिल होती हैं, जैसे न्यूट्रोफिल्स, ईओसिनोफिल्स, लिम्फोसाइट्स, मोनोसाइट्स और बेसोफिल्स.  हर एक प्रकार की कोशिका किसी न किसी खास तरह के इंफेक्शन से लड़ने में माहिर होती है.

इसके अलावा प्लेटलेट्स शरीर में खून जमाने का काम करती हैं, ताकि चोट लगने पर खून बहना रुक सके. शरीर में इन तीनों में से अगर किसी की भी कमी हो जाती है, तो शरीर में इसके लक्षण दिखने लगते हैं. 

ब्लड क्या है?
खून वह जीवन को बनाए रखने वाला तरल है जो पूरे शरीर की ब्लड- वेसल्स में लगातार बहता रहता है. ये वेसल्स तीन तरह की होती हैं आर्टरी वेनिस और  लिरिक्स खून इन्हीं रास्तों से पूरे शरीर में घूमकर ऑक्सीजन, पोषक तत्व और जरूरी तत्व पहुंचाता है और बेकार पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है.

इसे भी पढ़ें- Xeroderma Pigmentosum:किस बीमारी की वजह से सिर्फ सूरज की रोशनी में चलता है शरीर, क्या है इस दिक्कत का कारण?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्दियों में नमकीन और तला-भुना खाने से हो सकती हैं ये दिक्कतें, जानें ज्यादा नमक खाने के नुकसान

सर्दियों में नमकीन और तला-भुना खाने से हो सकती हैं ये दिक्कतें, जानें ज्यादा नमक खाने के नुकसान



सर्दियों के शुरू होते ही लोगों को अक्सर बाहर का खाना खाने का मन करने लगता है, जिसमें नमकीन पकवान जैसे मठरी, चिप्स, समोसे, गर्म गर्म पकोड़े आदि तला-भुना और नमकीन चीजें शामिल हैं. अगर आप भी ज्यादातर दुकानों और होटलों का खाना खाते हैं तो यह आपकी सेहत के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है, जिससे आपको कई बीमारियां होने का खतरा रहता है.

आज के समय में लोग स्ट्रीट फूड की तरह-तरह के खाने के बहुत शौकीन हो रहे हैं, जिसमें अक्सर नमकीन और तला हुआ खाना होता है जो आपकी हार्ट हेल्थ और किडनी पर गंभीर असर डाल सकता है. क्योंकि सर्दियों के समय हम शारीरिक काम थोड़ा कम कर देते हैं, जिससे हमारा मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है. आयुर्वेद और विज्ञान दोनों ही मानते हैं कि ज्यादा नमकीन खाना खाने से हमारी सेहत पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है.

ज्यादा नमक खाने के नुकसान

हड्डियों की कमजोरी

नमक भारतीय किचन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसे हम रोज खाते हैं, लेकिन आपको पता है ज्यादा नमक खाने से हमारी हड्डियां कमजोर होती हैं क्योंकि ज्यादा नमक की मात्रा से शरीर में कैल्शियम की कमी होती है, जो हड्डियों की मजबूती के लिए सही नहीं है.

किडनी खराब

खाने में ज्यादा नमक की मात्रा होने से हमारी किडनी पर गंभीर असर देखने को मिलता है, जिससे किडनी के काम करने की क्षमता धीमी हो जाती है. क्योंकि इंसानी किडनी को सोडियम को फिल्टर करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इसलिए अगर आप रोज अपने खाने में ज्यादा नमक डालते हैं, तो ये आपकी किडनी हेल्थ के लिए हानिकारक है.

यह भी पढ़ें: इन 7 देशों में पानी की तरह बरसता है पैसा, लेकिन पीने के पानी के लिए तरसते हैं यहां के लोग

त्वचा खराब होना

सर्दियों में हमारी त्वचा सूखी और बेजान रहती है. ज्यादा नमक खाने से शरीर में पानी का संतुलन बिगड़ता है और स्किन और ज्यादा ड्राई हो सकती है. इससे चेहरा बेजान लगता है और चेहरे पर झुर्रियां जल्दी दिखने लगती हैं.

ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा

नमक ज्यादा लेने से आपके हार्ट पर असर पड़ता है, जिससे हाई बीपी की समस्या हो सकती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सोडियम खून में पानी की मात्रा बढ़ा देता है, जिससे कोशिकाओं पर दबाव बढ़ता है.

वजन बढ़ना

ठंड में बाहर का तला-भुना खाना जैसे पकोड़े, समोसे, चाट ज्यादा खाया जाता है. इनमें नमक भी अधिक होता है और सर्दियों में शारीरिक मेहनत कम होने के कारण वजन बढ़ सकता है.

पानी रुकने की समस्या

सर्दी के मौसम में प्यास कम लगती है. ऐसे में ज्यादा नमक खाने से शरीर में पानी रुकने लगता है, जिससे चेहरे, हाथों और पैरों पर सूजन दिखाई देने लगती है.

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स्किन पर दिखने वाले ये संकेत हो सकते हैं कोलन कैंसर के इशारे, नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

स्किन पर दिखने वाले ये संकेत हो सकते हैं कोलन कैंसर के इशारे, नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी



कोलन कैंसर यानी कोलोरेक्टल कैंसर दुनिया में तेजी से बढ़ने वाले कैंसरों में से एक है. आमतौर पर लोग इसके लक्षणों को पेट के दर्द, मल त्याग की आदतों में बदलाव और खून आने जैसे पाचन संबंधी संकेतों से जोड़ते हैं. हालांकि, एक्सपर्ट्स कहते हैं कि कई बार यह बीमारी शरीर के सबसे बड़े अंग यानी स्किन पर भी अपने शुरुआती संकेत दिखा सकती है.

अगर स्किन पर रैशेज, गांठ, रंग बदलना या घाव जैसे बदलाव दिखाई दे तो इन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि स्किन पर दिखने वाले कौन से संकेत कोलन कैंसर की तरफ इशारा करते हैं और इन्हें नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है.

स्किन पर कैसे असर डालता है कोलन कैंसर

स्किन अक्सर शरीर के अंदर चल रही कई समस्याओं को बाहर से दिखा देती है. कोलन कैंसर में स्किन पर बदलाव कई कारणों से हो सकते हैं, जिनमें कैंसर कोशिकाओं का फैलाव, शरीर की प्रतिरोधक क्रिया या कैंसर के उपचारों के असर शामिल होते हैं. यह बदलाव शरीर के धड़, हाथ या पैरों पर दिखाई दे सकते हैं और कभी हल्की लाली तो कभी-कड़ी गांठ है या खुले घाव की तरह दिख सकते हैं. एक्सपर्ट मानते हैं कि परिवार में कोलन कैंसर की हिस्ट्री होने पर या लाइफस्टाइल से जुड़े खतरों में आने पर लोगों को इन संकेतों पर और ध्यान देना चाहिए. वहीं समय रहते हैं लक्षणों को पहचान लेना इलाज को आसान बनाता है.

कोलन कैंसर से जुड़े सबसे आम स्किन लक्षण

  • कटेनियस नोड्यूल्स- कई बार कोलन कैंसर की कोशिकाएं स्किन पर फैलकर सख्त गांठें बना देती है. यह आकार में अलग-अलग हो सकती है और कभी-कभी दर्द भी कर सकती है. यह संकेत बताता है कि कैंसर अपनी मूल जगह से आगे फेल रहा है.

  • एरिथेमा और इन्फ्लेमेटरी रैशेज- एरिथेमा यानी स्किन पर लालिमा और सूजन कोलन कैंसर में शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया के कारण दिख सकता है. यह पैच थोड़ा उभरे हुए, गर्माहट वाले या खुजली जैसे लग सकते हैं और आम रैश की तरह दिखने पर भी लंबे समय तक बने रहते हैं.

  • स्किन अल्सर- कुछ लोगों में स्किन पर ऐसे घाव दिख सकते हैं जो आसानी से नहीं भरते हैं. यह शरीर में चल रही कैंसर संबंधी प्रक्रियाओं का परिणाम हो सकता है. वहीं इनका धीरे-धीरे बढ़ना या लगातार बना रहना चेतावनी भी हो सकती है.

  • हाइपरपिगमेंटेशन और डिस्कलरेशन- कुछ मामलों में स्किन का रंग गहरा हो सकता है. यह शरीर में मेटाबॉलिक बदलाव या कैंसर उपचारों का असर हो सकता है. यह बदलाव धीरे-धीरे धड़, हाथों या चेहरे पर दिखने लगते हैं.

  • एक्ने जैसे दाने या लगातार रहने वाले रैश- कुछ लोगों में मुंहासे जैसे दाने या फैलाव वाले रैश दिख सकते हैं जो सामान्य स्किनकेयर से ठीक नहीं होते हैं. यह भी कैंसर की बीमारी की ओर इशारा कर सकते हैं.

कोलन कैंसर के संभावित कारण जो स्किन पर डालते असर

  • कैंसर कोशिकाओं का स्किन तक फैलना- कई बार कैंसर ब्लड या लिंफ सिस्टम के जरिए स्किन तक पहुंचता है और वहां गांठें बना देता है. यह स्थिति कम होती है लेकिन गंभीर होती है.

  • कैंसर ट्रीटमेंट के साइडइफेक्ट- कीमोथेरेपी या टारगेटेड थेरेपी स्किन में सूखापन, लालिमा, दाने या एक्ने जैसे लक्षण पैदा कर सकते हैं.

  • इम्यून रिएक्शन और पैरानेओप्लास्टिक सिंड्रोम- कैंसर शरीर की प्रतिरोधक क्रिया को बदल देता है, जिससे स्किन पर मोटापा, लाल पैच या असामान्य रैश दिखाई दे सकते हैं. यह लक्षण कई बार पाचन संबंधी लक्षणों से पहले भी दिख जाते हैं.

  • मेटाबॉलिज्म और हार्मोनल बदलाव- कैंसर शरीर के रासायनिक संतुलन को प्रभावित करता है, जिससे स्किन का रंग और टेक्सचर बदल सकता है.

इसे भी पढ़ें- Xeroderma Pigmentosum:किस बीमारी की वजह से सिर्फ सूरज की रोशनी में चलता है शरीर, क्या है इस दिक्कत का कारण?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लंबे समय से बना हुआ है पीठ दर्द तो न मान बैठना थकान, हो सकता इस खतरनाक कैंसर का इशारा

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