लिवर खराब होने से पहले शरीर के इस हिस्से में दिखते हैं 4 निशान, इन्हें कैसे पहचानें?
Early Signs Of Liver Damage: लिवर खराब होने से पहले शरीर के इस हिस्से में दिखते हैं 4 निशान, इन्हें कैसे पहचानें?
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Early Signs Of Liver Damage: लिवर खराब होने से पहले शरीर के इस हिस्से में दिखते हैं 4 निशान, इन्हें कैसे पहचानें?
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Signs Your Job May Be Harming Your Liver: इंसान दिन-रात ऑफिस में जी-तोड़ मेहनत करता है, ताकि वह एक अच्छी लाइफ मजे से जी सके. लेकिन क्या हो, अगर आपको पता चले कि आप जो नौकरी कर रहे हैं, उससे आपका लिवर खराब हो रहा है. दरअसल, ये नौकरियां सीधे तौर पर आपके लिवर को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं, लेकिन अगर आप इन्हें लगातार करते हैं, तो कुछ दिक्कत आपको नजर आने लगती है, जिनमें लिवर की दिक्कत भी शामिल हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि वे नौकरियां कौन-कौन सी हैं.
पूरे समय बैठकर की जाने वाली नौकरियां
इसमें पहले नम्बर पर वे नौकरियां आती हैं, जिनमें लोगों को पूरे दिन बैठकर काम करना होता है. जर्नल ऑफ हेपेटोलॉजी (2017) की एक बड़ी स्टडी बताती है कि जो लोग घंटों बैठे रहते हैं, उनमें फैटी लिवर का खतरा ढाई गुना बढ़ जाता है. अमेरिकन गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी जर्नल (2015) में भी पाया गया कि दफ्तर और कंप्यूटर से जुड़ी नौकरियों में लिवर के एंज़ाइम लगातार बढ़े हुए मिलते हैं. जब शरीर लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहता है, तो ब्लड फ्लो धीमा हो जाता है. धीरे-धीरे वसा जमा होने लगती है और लिवर दबाव में आने लगता है.
केमिकल वाली नौकरी
बैठकर काम करने के बाद दूसरे नम्बर पर अगर कोई नौकरी सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती है, तो वह है केमिकल्स के संपर्क वाली नौकरियां. फैक्ट्री, पेंट, प्लास्टिक, पेट्रोलियम, क्लीनिंग एजेंट या किसी भी तरह के रासायनिक पदार्थों के बीच काम करने वाले लोग लगातार खतरे में रहते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट कहती है कि कई केमिकल सीधे लिवर को नुकसान पहुंचाते हैं.
रात की शिफ्ट वाली नौकरियां
रात में काम करने से शरीर की नेचुरल सर्कैडियन रिदम बिगड़ जाती है. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल (2018) की रिसर्च कहती है कि रात की शिफ्ट में काम करने वालों में लिवर में चर्बी तेजी से बढ़ती है. रात में जागने से लिवर की नेचुरल मरम्मत रुक जाती है, जिससे वह समय से पहले कमजोर होने लगता है.
तनाव वाली नौकरियां
इंसान सुकून वाली नौकरी करना चाहता है, लेकिन उसको यह काफी कम नौकरियों में मिल पाती है. ड्राइवर, कॉल सेंटर, डिलीवरी, पुलिस, सुरक्षा गार्ड जैसे तमाम नौकरियों में रोज भारी तनाव रहता है. अमेरिकन लिवर फाउंडेशन की रिपोर्ट बताती है कि लगातार तनाव होने पर शरीर में कोर्टिसोल बढ़ता है, जो लिवर में सूजन और फैट जमा करने लगता है. इसलिए आपको कोशिश करनी चाहिए कि अगर कोई भी काम कर रहे हैं, तो कम से कम तनाव लें, नौकरी को नौकरी की तरह करें.
Fatty Liver: फैटी लिवर पेट में क्यों देता है तकलीफ? जानें शुरुआती संकेत और बचाव के तरीके
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Liver Health Warning Signs: फैटी लिवर, जिसे पहले NAFLD कहा जाता था और अब MASLD के रूप में भी जाना जाता है, आज दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती बीमारियों में से एक है. इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआती स्टेज में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं या फिर दिखते ही नहीं. लेकिन हाल की रिसर्च बता रही है कि इसके शुरुआती संकेत अक्सर पेट और एब्डॉमिनल एरिया में नजर आने लगते हैं, वो भी धीरे-धीरे और बिना शोर किए.
World Journal of Hepatology में छपी एक स्टडी में पाया गया कि फैटी लिवर वाले कई मरीज शुरू में ही पेट से जुड़े लक्षण बताते हैं, जैसे हल्का दर्द, पेट फूलना, मतली या दाईं तरफ भारीपन. कई बार ये लक्षण तब भी महसूस होते हैं जब ब्लड टेस्ट और स्कैन बिल्कुल सामान्य दिखते हैं. यानी शरीर अंदर से मदद के लिए इशारा कर रहा होता है.
फैटी लिवर होता क्या है?
जब लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है और उसका शराब से कोई संबंध नहीं होता, तो इसे फैटी लिवर कहा जाता है. जैसे-जैसे फैट बढ़ता है, लिवर बड़ा और सूजन वाला हो सकता है. इसी वजह से शुरुआती परेशानी अक्सर पेट के आसपास महसूस होती है न कि बाहर से दिखने वाले लक्षणों में.
पेट में दिखने वाले फैटी लिवर के आम संकेत
दाईं तरफ पेट में दर्द या भारीपन
लिवर आपके दाईं पसलियों के नीचे होता है. जब उसमें फैट बढ़ता है, तो अक्सर हल्का लेकिन लगातार दर्द उस तरफ लेटने में असहजता या अंदर कुछ दबाव जैसा महसूस होता है. अक्सर लोग इसे गैस या बदहजमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.
पेट फूलना और जल्दी फुल जाने का अहसास
कई मरीज बताते हैं कि थोड़ा-सा खाने पर भी पेट भारी लगने लगता है. जिसमें पेट में सूजन, गैस और डकारें शामिल होती है. ये सब इस वजह से होता है कि लिवर की धीमी होती क्षमता पाचन को प्रभावित करने लगती है.
मतली और अपच
फैटी लिवर की वजह से बार-बार मतली, खाना भारी लगना और हल्की अपच जैसी समस्याएं आम हैं. खासतौर पर तले-भुने या ज्यादा मसालेदार भोजन के बाद परेशानी बढ़ जाती है.
भूख कम लगना
कई लोग देखते हैं कि धीरे-धीरे भूख कम हो रही है. भोजन छोड़ देना, ज्यादा न खा पाना या बिना कोशिश के वजन कम होना, ये संकेत बताते हैं कि लिवर और डाइजेशन सिस्टम दबाव में हैं.
फैटी लिवर पेट को ही क्यों प्रभावित करता है?
लिवर पाचन की पूरी प्रक्रिया का लगभग आधा काम अकेले संभालता है. यह भोजन से निकलने वाले पोषक तत्वों को प्रोसेस करता है, फैट को तोड़ता है और शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालता है. इसलिए जब लिवर में चर्बी जमा होने लगती है और उसका काम रुकने लगता है, तो इसका सीधा असर पेट और पाचन पर दिखना शुरू हो जाता है. फैटी लिवर की शुरुआत में ही लिवर हल्का सूजने लगता है. इससे पाचन धीरे होने लगता है, बाइल कम बनने लगती है और गैस, भारीपन, पेट फूलना और असहजता बढ़ जाती है. यही वजह है कि फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण अधिकतर पेट के आसपास महसूस होते हैं. एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर पेट से जुड़े ये संकेत समय रहते पहचान लिए जाएं, तो फैटी लिवर को गंभीर स्टेज पर जाने से रोका जा सकता है.
ध्यान देने वाली जरूरी बातें
फैटी लिवर से बचाव के लिए रोजमर्रा की कुछ आदतें बड़ा फर्क डालती हैं. प्रोसेस्ड और तैल वाले भोजन कम करना, नियमित व्यायाम करना, वजन कंट्रोल में रखना और शुगर व फ्राइड फूड सीमित करना सबसे अहम कदम हैं. अगर पेट में गैस, भारीपन या बार-बार असहजता लंबे समय तक बनी रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. समय पर जांच और लाइफस्टाइल में छोटे-छोटे बदलाव फैटी लिवर को शुरुआती स्टेज में ही रोक सकते हैं और लिवर की सेहत लंबे समय तक सुरक्षित रख सकते हैं.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Foot Itching Liver Symptoms: हाथों और पैरों में होने वाली खुजली को ज्यादातर लोग सूखी त्वचा, एलर्जी या मामूली जलन समझकर नज़रअंदाज कर देते हैं. लेकिन अगर खुजली लगातार बनी रहे, कोई स्पष्ट वजह न दिखे, और त्वचा पर रैश भी न हों, तो यह शरीर के अंदर छिपी किसी बड़ी समस्या का संकेत हो सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक हथेलियों और तलवों पर होने वाली ऐसी खुजली लिवर की बीमारी का शुरुआती लक्षण हो सकती है. लिवर की काम करने की क्षमता कम होने पर शरीर में बाइल एसिड जमा होने लगते हैं, जो त्वचा की नसों को चिढ़ा देते हैं और तेज खुजली की वजह बनते हैं. अगर यह खुजली रात में बढ़ जाए, मॉइस्चराइजर से शांत न हो या साथ में थकान और पीलिया जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है.
पैरों में खुजली क्यों?
लिवर ठीक से काम न करे तो टॉक्सिन्स और बाइल एसिड खून में बढ़ने लगते हैं. ये पदार्थ त्वचा की नसों को प्रभावित करते हैं, जिससे हथेलियों और पैरों के तलवों में तेज और लगातार खुजली होती है. इस तरह की खुजली को “कोलेस्टैटिक प्र्यूरिटस” कहा जाता है और कई बार बिना रैश के भी होती है. यह स्थिति अक्सर कई बीमारियों में देखी जाती है, जिसमें प्राइमरी बिलियरी कोलैंजाइटिस, प्राइमरी स्क्लेरोजिंग कोलैंजाइटिस, और प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाला इंट्राहेपैटिक कोलेस्टेसिस. लिवर की बीमारी में खुजली क्यों होती है? वैज्ञानिकों ने बताई ये छुपी हुई वजहें
लिवर से जुड़ी बीमारियों में होने वाली खुजली को लेकर अभी तक साइंटिस्ट कोई एक कारण तय नहीं कर पाए हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि इसके पीछे कई अलग-अलग कारण एक साथ काम करते हैं.
बाइल सॉल्ट का जमा होना
जब लिवर कमजोर पड़ता है, तो बाइल सॉल्ट शरीर में ठीक से फिल्टर नहीं हो पाते और त्वचा के नीचे जमा होने लगते हैं. इससे नसों पर असर पड़ता है और तेज खुजली शुरू हो सकती है. हालांकि यह भी सच है कि कई लोगों में बाइल सॉल्ट बढ़ने के बावजूद खुजली नहीं होती और कुछ लोग सामान्य स्तर होने पर भी खुजली महसूस करते हैं.
हिस्टामीन का बढ़ जाना
लिवर से जुड़ी खुजली वाले कई मरीजों में हिस्टामीन का स्तर बढ़ा हुआ पाया जाता है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि एंटीहिस्टामीन दवाएं अक्सर इससे राहत नहीं दे पातीं.
सेरोटोनिन की भूमिका
सेरोटोनिन दिमाग में खुजली का अहसास बढ़ा सकता है. कुछ रिसर्च बताते हैं कि यह नर्वस सिस्टम के खास रिसेप्टर्स पर असर डालकर खुजली की अनुभूति को तेज कर देता है. यही वजह है कि कई बार लिवर की बीमारी में खुजली का इलाज मुश्किल हो जाता है.
प्रेग्नेंसी या हार्मोन थेरेपी
गर्भावस्था के दौरान या हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के समय हार्मोनल बदलाव खुजली को बढ़ा सकते हैं. यह भी लिवर के बाइल फ्लो में बदलाव से जुड़ा पाया गया है.
लिवर से जुड़ी खुजली कैसे पहचाने?
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, अगर खुजली छह हफ्ते से ज्यादा बनी रहे तो यह क्रॉनिक प्र्यूरिटस की श्रेणी में आती है. आम खुजली और लिवर की वजह से होने वाली खुजली में कुछ फर्क होते हैं, जैसे कि
खुजली कम करने के तरीके
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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30 Minute Walk for Heart Health: हम अक्सर सुनते आ रहे हैं कि सैर करना हमारे लिए फायदेमंद होता है, शरीर फिट रहता है. एक जाने-माने कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि रोज़आधा से एक घंटे की साधारण वॉक दिल के लिए उतनी ही फायदेमंद है जितनी कई दवाइयां भी नहीं होतीं. यह आसान-सा कदम शरीर में कई पॉजिटिव बदलाव लाता है मूड बेहतर होता है, तनाव कम होता है, ब्लड शुगर संतुलित रहता है और मानसिक शांति भी बढ़ती है. एक्सपर्ट के मुताबिक लगातार चलना दिल की बीमारियों का खतरा घटाता है और हार्ट रिदम से जुड़ी दिक्कतों को भी कम कर सकता है.
आज हार्ट डिजीज कितनी तेजी से बढ़ रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका में हर 5 में से 1 मौत का कारण दिल की बीमारी है. कई कारणों से हार्ट प्रॉब्लम्स बढ़ती हैं, लेकिन जिस चीज को हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, वह है, शारीरिक सक्रियता. डॉक्टरों का कहना है कि दिल के लिए सबसे बेहतर “प्रेस्क्रिप्शन” दवाएं नहीं, बल्कि नियमित गतिविधि है.
क्यों फायदेमंद है वॉकिंग?
एक इंस्टाग्राम वीडियो में मशहूर हार्ट ट्रांसप्लांट एक्सपर्ट डॉ. दिमित्री यारानोव ने बताया कि वे दवाओं से ज्यादा वॉक को प्रिस्क्राइब करते हैं. उनके शब्दों में “मैं इसे दवाइयों से ज्यादा लिखता हूं, रोज 30 से 60 मिनट की वॉक आपकी सोच, दिल और पूरी जिंदगी बदल सकती है.” वॉकिंग की खासियत उसकी सादगी में नहीं, बल्कि उन तेज बदलावों में है जो शरीर में कुछ ही मिनटों में शुरू हो जाते हैं. डॉक्टर बताते हैं कि उन्होंने कई मरीजों को सिर्फ चलते रहने से थकान से उमंग तक और चिंता से संतुलन तक पहुंचते देखा है कि बिना किसी नई दवा के.
इसको लेकर क्या कहता है रिसर्च
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की एक स्टडी के मुताबिक रोज के स्टेप्स बढ़ाने और मीडियम-इंटेंसिटी गतिविधि करने से महिलाओं में दिल की बीमारी से मौत का खतरा काफी कम हो जाता है. ‘Heart’ जर्नल में प्रकाशित एक और रिसर्च के मुताबिक तेज चाल से चलना और इस गति को थोड़ी देर बनाए रखना हार्ट रिदम की दिक्कतों जैसे एट्रियल फिब्रिलेशन, तेज धड़कन या बहुत धीमी धड़कन के खतरे को कम करता है.
30–60 मिनट की वॉक आपके शरीर में क्या-क्या बदलती है?
डॉ. यारानोव इसे “सबसे कम आंकी गई थेरेपी” बताते हैं. उनके अनुसार, मिनट-दर-मिनट शरीर में यह बदलाव होते हैं, जैसे कि
1 मिनट पर
ब्लड फ्लो तेज हो जाता है और शरीर एक्टिव मोड में आ जाता है.
5 मिनट पर
मूड बेहतर होता है, चिंता कम होने लगती है.
10 मिनट पर
शरीर का तनाव हार्मोन, कोर्टिसोल कम होने लगता है. मन हल्का महसूस करता है.
15 मिनट पर
ब्लड शुगर स्थिर होने लगती है, खासकर उन लोगों के लिए जिनका शुगर उतार-चढ़ाव वाला हो.
30 मिनट पर
शरीर फैट-बर्निंग मोड में चला जाता है. वजन घटाने वालों के लिए यह बेहद फायदेमंद समय है.
45 मिनट पर
मेंटल थकान, ओवरथिंकिंग और उलझन कम होने लगती है. दिमाग साफ महसूस होता है.
60 मिनट पर
डोपामाइन बढ़ता है यानी हैप्पीनेस हार्मोन. वॉक खत्म होते ही मन शांत और खुश महसूस करता है.
एक हालिया स्टडी के मुताबिक, सिर्फ 30 मिनट बैठने की बजाय हल्की गतिविधि जैसे वॉकिंग करने से ऊर्जा और मूड में बड़ा सुधार होता है. इसका असर अगले दिन तक रहता है.
किसी महंगे जिम की जरूरत नहीं
डॉ. यारानोव कहते हैं कि “आपको दिल को अच्छा रखने के लिए महंगे जिम या सप्लीमेंट की जरूरत नहीं है. बस आप, आपका दिल और हर दिन के कुछ आसान कदम.” उनका संदेश साफ है कि छोटा शुरू करें, लेकिन नियमित रहें. शरीर हर कदम को याद रखता है और उसका फायदा देता है.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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Early Detection of Prostate Cancer: दुनियाभर की तरह ब्रिटेन में भी प्रोस्टेट कैंसर तेजी से बढ़ रहा है. यह अब ब्रिटिश पुरुषों में सबसे आम कैंसर बन चुका है और हर साल 12,000 से अधिक जानें ले रहा है. इसकी सबसे खतरनाक बात यह है कि शुरुआती स्टेज में बीमारी लगभग बिना किसी लक्षण के बढ़ती है. ज्यादातर पुरुष तब तक नहीं जानते कि उन्हें कैंसर है, जब तक यह शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल नहीं जाता.
ज्यादा मामलों का देर से पकड़ में आना डॉक्टरों और कैंसर संस्थाओं के लिए चिंता का बड़ा कारण बन गया है. इसी बीच, ब्रिटेन की नेशनल स्क्रीनिंग कमेटी ने बड़े पैमाने पर प्रोस्टेट कैंसर स्क्रीनिंग शुरू करने के प्रस्ताव को फिर ठुकरा दिया. इस फैसले ने रिषि सुनक, पियर्स मॉर्गन, सर क्रिस होय और कई कैंसर संगठनों ने इसको लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है.
क्यों जताई नाराजगी?
रिषि सुनक, जो प्रोस्टेस्ट कैंसर से जुड़े हैं, इस फैसले के सबसे सख्त आलोचना की है. एक लेख में उन्होंने इसे “जीवन बचाने का खोया हुआ मौका” बताया. उनका कहना है कि कमेटी ने आधुनिक स्क्रीनिंग तकनीकों और MRI आधारित डायग्नॉस्टिक में हुई प्रगति को नजरअंदाज कर दिया. सुनक का तर्क है कि क्योंकि शुरुआती स्टेज में प्रोस्टेट कैंसर बिना लक्षण के बढ़ता है, इसलिए पुरुष सिर्फ लक्षणों के आधार पर बीमारी पकड़ ही नहीं सकते, उन्हें स्क्रीनिंग की जरूरत होती है. पियर्स मॉर्गन और ओलंपिक चैंपियन सर क्रिस होय ने भी स्क्रीनिंग न बढ़ाने के फैसले को खतरनाक चूक बताया. क्रिस होय के पिता की मौत प्रोस्टेट कैंसर से हुई थी, इसलिए उनका विरोध और भी स्पष्ट है.
फर्स्ट स्क्रीनिंग मॉडल क्यों बढ़ा रहा उम्मीदें?
कई एक्सपर्ट का कहना है कि NSC की दलीलें अब पुराने डाटा पर आधारित हैं. इंपीरियल कॉलेज लंदन के प्रोफेसर हसीम अहमद और UCL के प्रोफेसर मार्क एम्बरटन ने लंबे समय से यह दिखाया है कि PSA टेस्ट और MRI स्कैन सबसे तेज कैंसर को शुरुआती स्टेज में पकड़ते हैं. अनावश्यक बायोप्सी की संख्या 25 से 40 प्रतिशत तक कम करते हैं और ओवरडायग्नोसिस का खतरा घटाते हैं. PROMIS ट्रायल जैसे बड़े अध्ययनों और कई अस्पतालों में MRI फर्स्ट मॉडल ने इन नतीजों को लगातार मजबूत किया है. 2025 में शुरू हुआ यूरो 42 मिलियन का ट्रांसफॉर्म ट्रायल, जिसमें 3 लाख तक पुरुष शामिल होंगे, आने वाले वर्षों में इस बहस को निर्णायक मोड़ देने वाला साबित हो सकता है.
प्रोस्टेट कैंसर से बचाव कैसे संभव है?
किसी भी कैंसर को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन एक्सपर्ट के अनुसार कई कदम जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं, खासकर तेजी से फैलने वाले और देर से पकड़े जाने वाले कैंसर के मामले में. एक्सपर्ट बताते हैं कि ब्लैक पुरुषों में जोखिम औसतन दोगुना है. अगर पिता या भाई को 60 से पहले प्रोस्टेट कैंसर हुआ हो, तो जोखिम 3 से 4 गुना बढ़ जाता है. ऐसे पुरुषों में 45 से 50 की उम्र से PSA मॉनिटरिंग शुरू करने की सलाह दी जाती है.
क्या कहते हैं रिसर्च
दुनियाभर के शोध दिखाते हैं कि अधिक फैट से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ता है, नियमित व्यायाम सूजन को कम करता है और हार्मोन संतुलित रखता है और प्रोसेस्ड और जली हुई मीट का सेवन घातक प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ाता है. एक्सपर्ट टमाटर, हरी सब्जियां, हेल्दी फैट्स (जैसे नट्स, ऑलिव ऑयल, फैटी फिश) लेने की सलाह देते हैं।
विटामिन D का लेवल सही रखना
कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड की रिसर्च बताती है कि बहुत कम विटामिन D वाले पुरुषों में तेजी से फैलने वाले प्रोस्टेट कैंसर का खतरा अधिक पाया गया।
धूम्रपान और शराब सीमित करें
यूरोपीय शोध के अनुसार, धूम्रपान से प्रोस्टेट कैंसर से मौत का जोखिम बढ़ जाता है. ज्यादा शराब पीना ट्यूमर की संभावना बढ़ाता है.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं
एक्सपर्ट एक बात पर एकमत हैं: “जब तक प्रोस्टेट कैंसर लक्षण दिखाता है, अक्सर बहुत देर हो चुकी होती है.” इसलिए बचाव का रास्ता है कि अपनी जोखिम प्रोफाइल जानना, 45 से 50 के बाद नियमित PSA चेक जरूरत पड़े तो MRI, वजन, डाइट और विटामिन D का ध्यान, धूम्रपान या अल्कोहल से दूरी और परिवार में इतिहास हो तो जीन टेस्टिंग.
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