कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी क्यों होते हैं पतले? जान लें कारण

कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी क्यों होते हैं पतले? जान लें कारण


अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग बिना खास डाइट फॉलो किए या जिम जाए बिना भी पतले बने रहते हैं. जबकि कई लोग डाइटिंग और एक्सरसाइज के बावजूद भी वजन कम करने में संघर्ष करते रहते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है. दरअसल इसका जवाब सिर्फ जीन में नहीं बल्कि रोजमर्रा की आदतों और शरीर के काम करने के तरीके में भी छुपा होता है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स बताते हैं कि जेनेटिक्स शरीर की नींव करती है, लेकिन लंबे समय तक पतला बने रहने में लाइफस्टाइल की भूमिका कहीं ज्यादा होती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि कुछ लोग बिना डाइट और जिम जाए भी पतले क्यों होते हैं. 

जेनेटिक्स नहीं, रोजाना की आदतें निभाती है बड़ी भूमिका 

एक्सपर्ट बताते हैं कि जो लोग के नेचुरल रूप से पतले होते हैं वह अक्सर सख्त डाइट या भारी वर्कआउट नहीं करते. उनकी खासियत होती है कि वह कम मात्रा में खाना खाते हैं, बार-बार ओवरराइटिंग नहीं करते और दिनभर हल्की-फुल्की एक्टिविटी में बने रहते हैं. यही आदतें धीरे-धीरे वजन बढ़ने से रोकती है और उन्हें खुद एहसास भी नहीं होता कि वे अपने शरीर को कैसे संतुलित रख रहे हैं. वहीं पतले लोग और जल्दी वजन बढ़ने वालों में एक बड़ा फर्क यह भी होता है कि उनका शरीर भूख और पेट भरने के संकेतों को कैसे समझता है. एक्सपर्ट्स के अनुसार कई पतले लोग जल्दी संतुष्ट हो जाते हैं और पेट बरते ही खाना रोक देते हैं, वहीं कुछ लोग इन संकेतों को नजर अंदाज कर देते हैं, जिससे जरूरत से ज्यादा खाना हो जाता है और वजन बढ़ने लगता है. 

छोटी-छोटी आदतें जो डालती है, बड़ा असर 

एक्सपर्ट का कहना है कि वजन कंट्रोल रखने के लिए हर बार डाइटिंग जरूरी नहीं होती है. धीरे-धीरे खाना, कम स्नैकिंग करना, ज्यादा चलना,  बैठे रहने की बजाई खड़े रहना या हल्की हलचल में रहना यह सब आदतें समय के साथ कैलोरी बर्न करती है. इस तरह के नॉन एक्सरसाइज मूवमेंट भी वजन बढ़ने से बचाने मैं मदद करती है. 

मेहनत के बाद भी क्यों नहीं घटता वजन?

कम पानी पीना और ज्यादा शुगर लेना

हार्ट अटैक, स्ट्रोक, डायबिटीज, फैटी लीवर और हाई बीपी जैसी गंभीर बीमारियों से बचने के लिए वजन कंट्रोल रखना जरूरी है. इसके बावजूद कई लोग डाइट और एक्सरसाइज करने के बाद भी वजन कम नहीं कर पाते हैं. इसके पीछे कुछ आम गलतियां जिम्मेदार होती है, जैसे कम पानी पीना और ज्यादा शुगर लेना. कम पानी पीने से मेटाबॉलिज्म धीमा हो सकता है और शरीर में वाटर रिटेंशन बढ़ सकता है. वहीं जरूरत से ज्यादा शुगर लेने पर इंसुलिन बढ़ता है, जिससे फैट बर्निंग पर असर पड़ता है. 

ज्यादा तेल और कम प्रोटीन 

डाइट में जरूरत से ज्यादा तेल लेना भले ही वह गुड फैट हो तो कैलोरी बढ़ा सकता है. दूसरी तरफ प्रोटीन की कमी से मेटाबॉलिज्म स्लो होता है और मसल्स लॉस का खतरा बढ़ जाता है. 

जरूरत से ज्यादा कार्डियो और हेल्दी फूड 

ज्यादा फायदेमंद चीजे भी कई बार नुकसान कर सकती है. ज्यादा कार्डियो करने से स्ट्रेस हार्मोन कार्टिसोल बढ़ सकता है, जिससे वजन घटने की बजाय रुक सकता है. वहीं हेल्दी फूड भी अगर ज्यादा मात्रा में खाया जाए तो कैलोरी बढ़ाकर वेट लॉस रोक सकता है. 
  
फाइबर की कमी 

वजन घटाने के लिए फाइबर बहुत जरूरी होता है. यह पेट को देर तक भरा रखता है और बार-बार भूख लगने से बचाता है. खाने में फाइबर वाली सब्जियों को धीरे-धीरे बढ़ाने से वजन कंट्रोल में मदद मिल सकती है. 

ये भी पढ़ें-Health Budget 2026: शुगर-कैंसर की सस्ती दवाओं से लेकर बायोफार्मा हब तक, जानें हेल्थ सेक्टर को बजट में क्या मिला?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें 

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सीने में दर्द ही नहीं, ये भी होते हैं हार्ट अटैक के लक्षण, जान लेंगे तो बच जाएगी जान

सीने में दर्द ही नहीं, ये भी होते हैं हार्ट अटैक के लक्षण, जान लेंगे तो बच जाएगी जान


आज हम अपने काम, मोबाइल, करियर और जिम्मेदारियों में इतने उलझ गए हैं कि अपनी सेहत पर ध्यान देना लगभग भूल ही गए हैं. खासकर दिल की सेहत को लेकर लापरवाही तेजी से बढ़ रही है. पहले जहां हार्ट अटैक को बुजुर्गों की बीमारी माना जाता था, वहीं अब यह समस्या युवाओं को भी तेजी से अपनी चपेट में ले रही है. गलत खानपान, फास्ट फूड की आदत, घंटों बैठकर काम करना, नींद की कमी और बढ़ता मानसिक तनाव, ये सब मिलकर हमारे दिल को धीरे-धीरे कमजोर बना रहे हैं.

ज्यादातर लोग हार्ट अटैक को सिर्फ सीने में तेज दर्द से जोड़कर देखते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हार्ट अटैक हमेशा एक जैसे लक्षणों के साथ नहीं आता है. कई बार हमारा शरीर पहले ही हमें चेतावनी देने लगता है, लेकिन जानकारी की कमी के कारण हम उन संकेतों को गैस, थकान या सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. यही छोटी-सी लापरवाही आगे चलकर जानलेवा साबित हो सकती है. 

हार्ट अटैक सिर्फ अचानक नहीं आता

कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के एक्सपर्ट्स और डॉक्टर्स बताते हैं कि हार्ट अटैक एकदम से नहीं होता है. कई मामलों में शरीर कुछ दिन या हफ्तों पहले ही संकेत देना शुरू कर देता है. अगर इन संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो बड़ी समस्या को रोका जा सकता है. 

सीने में दर्द ही नहीं, ये भी होते हैं हार्ट अटैक के लक्षण

1. सीने में हल्की बेचैनी या दबाव महसूस होना – हर बार हार्ट अटैक में तेज दर्द ही हो, ऐसा जरूरी नहीं, कई लोगों को सीने में भारीपन, जकड़न, जलन या दबाव जैसा एहसास होता है. यह तकलीफ कुछ मिनटों के लिए आती है और फिर चली जाती है, लेकिन बाद में दोबारा लौट सकती है.  कभी-कभी यह दर्द सीने से निकलकर बाएं हाथ, कंधे, गर्दन, जबड़े या पीठ तक फैल सकता है. अगर ऐसा बार-बार हो रहा है, तो इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है. 

2. बिना मेहनत के सांस फूलना – अगर आपको थोड़ा चलने, सीढ़ियां चढ़ने या हल्का काम करने पर भी सांस चढ़ने लगे, तो यह दिल की कमजोरी का संकेत हो सकता है. जब दिल शरीर को सही मात्रा में खून और ऑक्सीजन नहीं पहुंचा पाता, तब ऐसी परेशानी होती है. कई बार यह समस्या बिना सीने के दर्द के भी हो सकती है. 

3. जरूरत से ज्यादा थकान महसूस होना – अगर आप रोजमर्रा के छोटे कामों से ही बहुत ज्यादा थकने लगे हैं. जैसे घर के काम, थोड़ी देर चलना, हल्का काम करना और आराम करने के बाद भी थकान दूर न हो, तो यह दिल से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है. यह लक्षण खासतौर पर महिलाओं में हार्ट अटैक से पहले देखा जाता है. 

4. अचानक ठंडा पसीना आना – बिना किसी वजह के अचानक ठंडा पसीना आना या बहुत ज्यादा पसीना आना भी हार्ट अटैक का शुरुआती संकेत हो सकता है. अक्सर लोग इसे गर्मी या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. अगर यह लक्षण सीने की तकलीफ, थकान या सांस फूलने के साथ हो, तो तुरंत जांच करानी चाहिए. 

5. चक्कर आना या बेहोशी जैसा लगना – अगर अचानक चक्कर आने लगे या ऐसा लगे कि आप गिर जाएंगे, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि दिल और दिमाग तक सही मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुंच रही. यह स्थिति बहुत गंभीर हो सकती है और इसमें देरी जानलेवा साबित हो सकती है. 

6. गैस, अपच या पेट में जलन – कई बार हार्ट अटैक से पहले पेट से जुड़ी समस्याएं होती हैं, जैसे गैस, अपच, पेट में भारीपन, जलन ये लक्षण आम लगते हैं, लेकिन अगर बार-बार हों और दवाओं से भी आराम न मिले, तो यह दिल की समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं. महिलाओं में यह लक्षण पुरुषों की तुलना में ज्यादा देखे जाते हैं. 

7. नींद में परेशानी और बेचैनी – अगर आपकी नींद बार-बार टूट रही है, रात को घबराहट महसूस होती है या सांस फूलने के कारण नींद खुल जाती है, तो यह भी दिल से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है. 

हार्ट अटैक से बचाव के आसान उपाय

1. संतुलित और हेल्दी खाना खाएं. 

2. रोजाना हल्की एक्सरसाइज या वॉक करें. 

3. धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं. 

4. तनाव कम करने की कोशिश करें. 

5. ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच कराएं, पूरी नींद लें. 

6. अगर लक्षण 5 मिनट से ज्यादा समय तक बने रहें, आराम करने पर भी ठीक न हों, बार-बार लौटकर आएं, दवा लेने से आराम न मिले तो देर न करें और तुरंत अस्पताल जाएं. 

ये भी पढ़ें: Secondary Hypertension: क्या होता है सेकेंडरी हाइपरटेंशन, भारत में युवाओं में तेजी से क्यों बढ़ रही यह बीमारी?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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देश में बनाई जाएंगी 1000 से ज्यादा इंडियन क्लिनिकल ट्रायल साइट्स, दवाओं के विकास में आएगी तेजी

देश में बनाई जाएंगी 1000 से ज्यादा इंडियन क्लिनिकल ट्रायल साइट्स, दवाओं के विकास में आएगी तेजी


Budget 2026: भारत के हेल्थ केयर और फार्मास्यूटिकल इकोसिस्टम को बदलने के लिए एक बड़े कदम के तहत केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश करते हुए यह घोषणा की है कि सरकार 1000 से ज्यादा मान्यता प्राप्त क्लिनिकल ट्रायल साइट्स का एक बड़ा नेटवर्क स्थापित करेगी. यह कदम भारत को एक ग्लोबल बायोफार्मास्युटिकल हब के रूप में स्थापित करने की रणनीति का हिस्सा है.

देशभर में रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर 

फिलहाल भारत में ज्यादातर क्लिनिकल ट्रायल मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहरों में है. इस नई पहल का मकसद देशभर में रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर को फैलाना है. इससे दवा विकास तेज और विश्व स्तर पर कॉम्पिटेटिव बन पाएगा. 

बायोफार्मा शक्ति मिशन 

इस बदलाव के केंद्र में बायोफार्मा शक्ति मिशन की शुरुआत है. इसके लिए अगले 5 सालों में कुल ₹10,000 करोड़ का बजट रखा गया है. यह मिशन बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर में घरेलू क्षमताओं को मजबूत करने के लिए डिजाइन किया गया है. इस मिशन के तहत कैंसर, ऑटोइम्यून बीमारियों पर पुरानी बीमारियों के इलाज के लिए तेजी से एडवांस्ड दवाओं को बनाया जाएगा. इस मिशन के तहत सरकार रिसर्च, क्लिनिकल ट्रायल, मैन्युफैक्चरिंग का रेगुलेशन को कवर करने वाला एक इंटीग्रेटेड इकोसिस्टम बनाने की योजना बना रही है. 

एक क्लिनिकल ट्रायल नेटवर्क 

बायोफार्मा शक्ति के तहत सबसे बड़ी घोषणाओं में से एक है 1000 से ज्यादा मान्यता प्राप्त भारतीय क्लिनिकल ट्रायल साइट्स का निर्माण. यह साइट्स सिर्फ मेट्रो शहरों तक ही सीमित नहीं रहेंगी बल्कि राज्यों और क्षेत्रों में भी इनका विस्तार किया जाएगा. इससे दवा और वैक्सीन का विकास तेज होगा, क्लिनिकल ट्रायल की लागत कम होगी और साथ ही वैश्विक फार्मास्युटिकल कंपनियों को भारत में ट्रायल करने के लिए आकर्षित किया जा सकेगा.

फार्मास्युटिकल शिक्षा और अनुसंधान का विस्तार 

बजट में लंबी अवधि की क्षमता निर्माण पर भी ध्यान दिया गया है. सरकार 3 नए नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च स्थापित करेगी और साथ मौजूद संस्थानों को अपग्रेड करेगी.

हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर और मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा 

रिसर्च के अलावा बजट में हेल्थ केयर डिलीवरी और ग्लोबल पहुंच पर भी काफी ज्यादा जोर दिया गया है. सरकार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत राज्यों के साथ मिलकर पांच रीजनल मेडिकल सेंटर स्थापित करने की योजना बना रही है. इसके अलावा भारत की किफायती और उच्च गुणवत्ता वाली हेल्थ केयर सीमाओं का लाभ उठाते हुए देश को एक ग्लोबल मेडिकल टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में भी बढ़ावा देने के लिए हील इन इंडिया पहल की शुरुआत की गई है.

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शुगर-कैंसर की सस्ती दवाओं से लेकर बायोफार्मा हब तक, जानें हेल्थ सेक्टर को बजट में क्या मिला?

शुगर-कैंसर की सस्ती दवाओं से लेकर बायोफार्मा हब तक, जानें हेल्थ सेक्टर को बजट में क्या मिला?


Health Budget 2026: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज केंद्रीय बजट 2026-27 पेश कर रही हैं. यह उनका लगातार नौंवा बजट है और इतिहास में यह सिर्फ दूसरी बार है जब बजट रविवार को पेश किया जा रहा है. सभी सेक्टरों में स्वास्थ्य सेक्टर पर काफी ज्यादा फोकस किया गया है. आइए जानते हैं कि इस बजट में हेल्थ सेक्टर को क्या-क्या मिलेगा.

भारत बनेगा बायोफॉर्मा हब

इस साल स्वास्थ्य क्षेत्र पर काफी ज्यादा जोर दिया जा रहा है. क्योंकि इसके पीछे एक बड़ा विजन है, भारत को एक वैश्विक बायोफार्मा हब बनाना. स्वास्थ्य सेक्टर के लिए सबसे बड़ी घोषणा बायोफार्मा शक्ति पहल की शुरुआत है. इसे अगले 5 सालों में ₹10,000 करोड़ के आवंटन का समर्थन दिया गया है. इसका लक्ष्य बायोलॉजिक्स और बायोसिमिलर के लिए एक मजबूत घरेलू इकोसिस्टम को बनाना है, आयात पर निर्भरता को कम करना है और साथ ही भारत को दवाओं के ग्लोबल सप्लायर के रूप में स्थापित करना है.

मधुमेह और कैंसर के लिए सस्ती दवाएं

बायोफॉर्मा पर जोर देने का एक बड़ा परिणाम मधुमेह और कैंसर के लिए कम लागत वाली दवाएं भी होंगी. यह भारत की सबसे तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य चुनौतियों में से दो हैं. बायोलॉजिक दवाओं के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करके सरकार का लक्ष्य विनिर्माण लागत को कम करना है. इससे सीधे तौर पर मरीजों के लिए कीमतें कम होंगी और सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च पर भी दबाव कम होगा.

इसी के साथ इस इकोसिस्टम का समर्थन करने के लिए बजट में तीन नए राष्ट्रीय फार्मास्युटिकल शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों की स्थापना के साथ-साथ सात मौजूदा संस्थानों को अपग्रेड करने का भी प्रस्ताव है. यह संस्थान एडवांस्ड फार्मास्युटिकल शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करेंगे. 

क्लिनिकल ट्रायल साइट्स का नेटवर्क 

एक और बड़ा कदम पूरे भारत में 1000 मान्यता प्राप्त क्लिनिकल ट्रायल साइट्स का नेटवर्क बनाना है. इससे दवा परीक्षण, क्लीनिकल अनुसंधान और नई थेरेपी के तेजी से अनुमोदन के लिए भारत की मजबूती में काफी वृद्धि होगी.  सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि जिला अस्पतालों को भी अपडेट किया जाएगा. वहां इमरजेंसी वार्ड बढ़ाए जाएंगे ताकि लोगों को फायदा पहुंच पाए.

क्षेत्रीय मेडिकल हब का होगा निर्माण 

इसी के साथ बजट में यह ऐलान किया गया है कि पांच क्षेत्रीय मेडिकल हब का निर्माण किया जाएगा. यहां मेडिकल और ट्रेनिंग के साथ-साथ रिसर्च पर काम किया जाएगा. इतना ही नहीं बल्कि देश में तीन नए ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज को भी बनाने का ऐलान किया गया है. इसी के साथ मेंटल हेल्थ का ध्यान रखते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है की मेंटल इंस्टिट्यूट को भी मजबूत किया जाएगा.

देश में तीन नए आयुर्वेद संस्थान 

आपको बता दें कि एलाइड हेल्थ प्रोफेशनल्स के लिए मौजूदा संस्थाओं को अपग्रेड किया जाएगा. इसी के साथ दोनों सेक्टर में एएचपीआई  संस्थान स्थापित किए जाएंगे. साथ ही देश में तीन नए आयुर्वेद संस्थान बनाए जाएंगे.

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क्या होता है सेकेंडरी हाइपरटेंशन, भारत में युवाओं में तेजी से क्यों बढ़ रही यह बीमारी?

क्या होता है सेकेंडरी हाइपरटेंशन, भारत में युवाओं में तेजी से क्यों बढ़ रही यह बीमारी?


Secondary Hypertension In India: भारत में हाई ब्लड प्रेशर एक आम समस्या बन चुकी है, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग अब भी इससे अनजान हैं. समय-समय पर जांच, सही लाइफस्टाइल और जागरूकता से स्ट्रोक, हार्ट अटैक और किडनी फेल होने जैसे गंभीर खतरे टाले जा सकते हैं. लेकिन चिंता सिर्फ सामान्य हाईपरटेंशन की नहीं है, बल्कि इसके एक ज्यादा खतरनाक रूप सेकेंडरी हाइपरटेंशन की है, जिसमें हार्ट और दूसरे अंगों को नुकसान पहुंचने का खतरा कहीं ज्यादा होता है. डॉक्टर और कार्डियोलॉजिस्ट लंबे समय से इस बदलाव को महसूस कर रहे थे और अब नए रिसर्च ने इसकी पुष्टि भी कर दी है.

क्या निकला रिसर्च में?

स्टडी के मुताबिक, 18 से 40 साल की उम्र के जिन भारतीय युवाओं में हाई ब्लड प्रेशर पाया गया, उनमें से 22 प्रतिशत से ज्यादा लोग सेकेंडरी हाइपरटेंशन से पीड़ित थे. यह आंकड़ा वैश्विक अनुमानों से बिल्कुल उलट है, जहां माना जाता है कि करीब 90 प्रतिशत मामलों में हाईपरटेंशन प्राइमरी होता है. यानी भारत में युवाओं के बीच हाई ब्लड प्रेशर का सेकेंडरी रूप अब दुर्लभ नहीं रहा और तेजी से बढ़ रहा है.

रिसर्चर का कहना है कि भारत में युवा एड में हाईपरटेंशन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और इस आयु वर्ग में सेकेंडरी कारणों की भूमिका अहम होती जा रही है। यह ट्रेंड भविष्य के लिए गंभीर संकेत देता है.

दुनिया में सबसे ज्यादा मौत के कारणों में से एक 

हाईपरटेंशन दुनिया भर में हार्ट रोगों की सबसे बड़ी वजहों में से एक है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार, हर साल करीब 1.79 करोड़ मौतें हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी बीमारियों के कारण होती हैं, जो वैश्विक मौतों का लगभग 31 प्रतिशत है. जब ब्लड प्रेशर लगातार 140/90 mm Hg या उससे ज्यादा बना रहता है, तो उसे हाईपरटेंशन कहा जाता है. सिस्टोलिक प्रेशर वह दबाव होता है, जब हार्ट ब्लड को पंप करता है, जबकि डायस्टोलिक प्रेशर हार्ट के आराम की स्थिति में मापा जाता है.सामान्य ब्लड प्रेशर 120/80 mm Hg से कम माना जाता है.

लोगों के लिए साइलेंट किलर

हालिया वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि भारत में हाईपरटेंशन की कुल दर 30 से 35.5 प्रतिशत के बीच है, जिससे अनुमानित 31.4 करोड़ लोग प्रभावित हैं. हालात को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि हाईपरटेंशन से जूझ रहे करीब आधे पुरुष और एक-तिहाई से ज्यादा महिलाएं दवाएं लेने के बावजूद अपना ब्लड प्रेशर नियंत्रण में नहीं रख पा रहे हैं, इसी वजह से इसे अक्सर साइलेंट किलर कहा जाता है.

क्या होता है सेकेंडरी हाइपरटेंशन?

Mayoclinic की रिपोर्ट के अनुसार, सेकेंडरी हाई ब्लड प्रेशर, जिसे सेकेंडरी हाइपरटेंशन कहा जाता है, वह स्थिति है जिसमें ब्लड प्रेशर किसी दूसरी बीमारी की वजह से बढ़ता है. यह समस्या किडनी, आर्टरीज, हार्ट या हार्मोन से जुड़े सिस्टम में गड़बड़ी के कारण हो सकती है और कई बार गर्भावस्था के दौरान भी देखी जाती है. यह आम हाई ब्लड प्रेशर प्राइमरी हाइपरटेंशन से अलग होता है, जिसमें कोई साफ वजह सामने नहीं आती. सेकेंडरी हाइपरटेंशन की पहचान समय पर हो जाए तो मूल बीमारी और ब्लड प्रेशर, दोनों को कंट्रोल किया जा सकता है, जिससे हार्ट डिजीज, किडनी फेलियर और स्ट्रोक जैसे गंभीर खतरों का जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है.

कैसे होते हैं इसके लक्षण?

प्राइमरी हाईपरटेंशन की तरह ही सेकेंडरी हाईपरटेंशन में भी अक्सर कोई खास लक्षण नजर नहीं आते, यहां तक कि तब भी जब ब्लड प्रेशर खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका हो. हालांकि, अगर किसी व्यक्ति में हाई ब्लड प्रेशर के साथ कुछ खास संकेत दिखाई दें, तो यह सेकेंडरी हाइपरटेंशन की ओर इशारा कर सकता है. जैसे कि दवाएं लेने के बावजूद ब्लड प्रेशर का कंट्रोल में न आना, अचानक बहुत ज्यादा ब्लड प्रेशर होना (सिस्टोलिक 180 mm Hg से ऊपर या डायस्टोलिक 120 mm Hg से ज्यादा), पहले जिन दवाओं से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता था उनका असर खत्म हो जाना, 30 साल से पहले या 55 साल के बाद अचानक हाई ब्लड प्रेशर शुरू होना, परिवार में हाई ब्लड प्रेशर का कोई हिस्ट्री  न  होना और व्यक्ति का मोटापे से ग्रस्त न होना.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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