महंगे ट्रीटमेंट के बाद भी नहीं रुक रहा गंजापन, डाइट में शामिल करें ये चीजें
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आमतौर पर आपने देखा होगा कि न्यू बोर्न बेबी का ज्यादातर समय सोने और दूध पीने में ही गुजरता है. ऐसे में नए पेरेंट्स के लिए यह समझना आसान नहीं होता कि उनके बच्चे आखिर कितनी देर सोएं तो उसे नॉर्मल माना जाए. खास बात यह है की जन्म के बाद शुरुआती महीनाें में बच्चों का कोई कोई तय स्लीप शेड्यूल नहीं होता है. कई बार वह दिन में ज्यादा सोते हैं और रात में जागते हैं.
इसे लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह पूरी तरह नॉर्मल प्रोसेस होता है. क्योंकि न्यू बॉर्न बेबी को दिन और रात का फर्क समझने में समय लगता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि न्यू बॉर्न बेबी के लिए कितने घंटे की नींद जरूरी है और इसे लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं.
दिन और रात में कितनी नींद लेते हैं न्यू बॉर्न बेबी?
एक्सपर्ट्स के अनुसार न्यू बॉर्न बेबी आमतौर पर दिन में लगभग 8 से 9 घंटे और रात में करीब 8 घंटे सो सकते हैं. यानी कुल मिलाकर वह 14 से 17 घंटे तक नींद ले सकते हैं. हालांकि यह नींद एक साथ नहीं होती, बल्कि छोटे-छोटे हिस्सों में बंटी होती है. शुरुआत की दो महीनाें में बच्चा 30 मिनट से 3 घंटे तक सोता है, फिर दूध के लिए जागता है. इस समय बच्चों का पेट छोटा होता है, इसलिए उन्हें दो हर दो से तीन घंटे में दूध की जरूरत पड़ती है. यही वजह है कि उसकी नींद बार-बार टूटती है. वहीं ज्यादातर बच्चे 3 महीने की उम्र से पहले लगातार 6 से 8 घंटे की नींद नहीं ले पाते हैं. कई बच्चों में यह आदत 6 महीने के बाद विकसित होती है.
इतना ज्यादा क्यों सोते हैं बच्चे?
डॉक्टर बताते हैं कि न्यू बॉर्न बेबी तेजी से बढ़ रहे होते हैं. उनके दिमाग और शरीर का विकास बहुत तेज गति से चलता है. इस विकास के लिए भरपूर नींद की जरूरत होती है. नींद के दौरान ही शरीर ग्रोथ और विकास से जुड़े जरूरी काम करता है. वहीं अगर किसी पेरेंट्स को लगे कि बच्चा बहुत ज्यादा सो रहा है या असामान्य रूप से सोता है तो एक्सपर्ट से सलाह लेना भी जरूरी होता है. कई बार बुखार, इन्फेक्शन या दूसरी समस्याओं की वजह से भी बच्चा ज्यादा सो सकता है.
न्यू बॉर्न बेबी की नींद के अलग-अलग स्टेज
बच्चों की नींद भी बड़ों की तरह अलग-अलग स्टेज में बंटी होती है. इसमें दो मुख्य अवस्थाएं होती है, जिसमें REM और Non-REM नींद होती है. REM स्टेज में बच्चे हल्की नींद में होते हैं, आंखें तेजी से हिलती हैं और कभी-कभी शरीर भी हल्का मूव करता है. वहीं नवजात अपनी कुल नींद का बड़ा हिस्सा इसी अवस्था में बिताता है. वही Non-REM नींद में गहरी नींद शामिल होती है, जिसमें बच्चा शांत रहता है और शरीर लगभग स्थिर रहता है. वहीं कई बार बच्चे गहरी नींद से हल्की नींद में आते हैं, समय थोड़ी देर के लिए जग भी सकते हैं.
Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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एक समय था जब इनफर्टिलिटी या कंसीव करने में दिक्कत को 30 या 35 की उम्र के बाद की समस्या माना जाता था. हालांकि, अब यह तस्वीर भी बदल रही है, डॉक्टरों के क्लीनिक में अब 23 से 29 साल के युवा कपल्स भी कंसीव न कर पाने की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं. यह बदलाव मेडिकल एक्सपर्ट्स के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है. क्योंकि 20 से 30 साल की उम्र को अब तक फर्टिलिटी के लिहाज से सबसे बेहतर माना जाता रहा है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में हर 6 में से एक व्यक्ति जीवन में कभी न कभी इनफर्टिलिटी का सामना करता है. यह आंकड़ा बताता है की समस्या अब सिर्फ बढ़ती उम्र तक सीमित नहीं रही है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि 20s में भी कपल्स को इनफर्टिलिटी की प्रॉब्लम क्यों हो रही है और एक्सपर्ट इसे लेकर क्या कहते हैं.
लाइफस्टाइल बन रहा बड़ा कारण
फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि बढ़ती बदलती लाइफस्टाइल इनफर्टिलिटी का सबसे बड़ा कारण है. देर रात तक जागना, नींद पूरी न होना, जंक फूड का ज्यादा सेवन, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और बढ़ता मोटापा हार्मोनल संतुलन बिगड़ रहे हैं. इसे लेकर एक्सपर्ट कहते हैं कि पहले फर्टिलिटी की समस्या ज्यादातर उम्र से जुड़ी होती थी, लेकिन अब 20s की महिलाएं भी कंसीव करने में दिक्कत महसूस कर रही है. वहीं कई युवा यह मानकर चलते हैं कि वह बहुत छोटे हैं, इसलिए समय पर जांच नहीं कराते हैं. इसके अलावा एक्सपर्ट्स बताते हैं कि लगातार अनहेल्दी रूटीन से महिलाओं में ओवुलेशन अनियमित हो जाता है और पुरुषों में स्पर्म काउंट और क्वालिटी पर भी असर पड़ता है.
पुरुष भी हो रहे प्रभावित
इनफर्टिलिटी सिर्फ महिलाओं की समस्या नहीं रही है. डॉक्टर के अनुसार पुरुषों में लो स्पर्म काउंट, स्पर्म की कम मूवमेंट और हार्मोनल असंतुलन तेजी से बढ़ रहे हैं. वहीं स्मोकिंग, शराब पीना, मोटापा और लंबे समय तक लैपटॉप गोद में रखकर काम करना स्पर्म हेल्थ को प्रभावित कर सकता है कुछ रिसर्च में यह भी सामने आया है कि लंबे समय तक डिवाइस के इस्तेमाल और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन से स्पर्म क्वालिटी पर असर पड़ सकता है.
महिलाओं में बढ़ रही नॉर्मल हार्मोनल दिक्कतें
कम उम्र में पीसीओएस, थायराइड, एंडोमेट्रियोसिस और पेल्विक इन्फेक्शन जैसी समस्याएं सामने आ रही है. कहीं महिलाओं में एग क्वालिटी भी उम्मीद से कमजोर पाई जा रही है. वहीं बायोलॉजिकली हर महिला सीमित संख्या में ओवेरियन रिजर्व के साथ पैदा होती है, जो समय के साथ घटते जाते हैं. लेकिन खराब लाइफस्टाइल और एनवायरमेंट इस गिरावट को तेज कर रहे हैं. इसका असर यह होता है कि फर्टिलिटी की समस्या 30 से पहले ही दिखने लगती है. इसके अलावा एक्सपर्ट्स बताते हैं कि इनफर्टिलिटी में स्ट्रेस भी बड़ा फैक्टर माना जाता है. दरअसल करियर का दबाव, आर्थिक चिंता और सोशल लाइफ से जुड़ा स्ट्रेस शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ा सकता है. इससे प्रजनन हार्मोन प्रभावित होते हैं. महिलाओं में पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं और पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का लेवल गिर सकता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि फर्टिलिटी ओवर ऑल हेल्थ का आईना होती है, ऐसे में आप क्या खाते हैं, कितनी नींद लेते हैं और कितना तनाव जलते हैं यह सीधे प्रजनन क्षमता से जुड़ा है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.
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वहीं 18 से 34 वर्ष की आयु वर्ग का MHQ स्कोर 33 रहा, जबकि 55 साल के आयु के लोगों का स्कोर 96 दर्ज किया. यह अंतर बताता है कि नई पीढ़ी की मानसिक सेहत में कई सालों से गिरावट आ रही है.
शोधकर्ताओं ने डॉक्टरों की मदद से 60 अलग-अलग मेडिकल केस तैयार किए. इनमें दिल की बीमारी, सांस की दिक्कत, मानसिक स्वास्थ्य संकट और मेटाबॉलिक रोग जैसी 21 तरह की बीमारियां शामिल थीं. हर केस को 16 अलग-अलग परिस्थितियों में जांचा गया. कुल मिलाकर AI से 960 जवाब लिए गए. मकसद यह देखना था कि क्या ChatGPT सही तरीके से बता सकता है कि मरीज को तुरंत इमरजेंसी में जाना चाहिए या कुछ समय बाद डॉक्टर को दिखाना ठीक रहेगा.

रिसर्च में पता चला कि AI ने आधे से ज्यादा गंभीर इमरजेंसी मामलों को कम खतरनाक बताया. करीब 52 प्रतिशत मामलों में जहां तुरंत अस्पताल जाना जरूरी था, वहां AI ने कम जरूरी इलाज की सलाह दी. डायबिटीज की जानलेवा स्थिति (कीटोएसिडोसिस), सांस रुकने का खतरा और अन्य गंभीर आपात स्थितियां. ऐसे मामलों में देरी मरीज के लिए जानलेवा हो सकती है.
Published at : 28 Feb 2026 07:04 AM (IST)
भारत में प्रोटीन की कमी एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है. इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए पतंजलि फूड्स लिमिटेड के प्रमुख ब्रांड ‘न्यूट्रेला’ ने राष्ट्रीय प्रोटीन दिवस के अवसर पर अपने सामाजिक उत्तरदायित्व अभियान ‘#NutrelaGivesBack’ के तहत दिल्ली-एनसीआर की 52 झुग्गी बस्तियों में एक विशाल भोजन वितरण अभियान चलाया. इस पहल के माध्यम से करीब 1 लाख बच्चों को उच्च प्रोटीन युक्त भोजन परोसा गया.
गुणवत्ता और पोषण पर विशेष ध्यान
वितरित किए गए प्रत्येक भोजन में पोषण की गुणवत्ता का खास ख्याल रखा गया. यह भोजन न्यूट्रेला चंक्स (Nutrela Chunks) से तैयार किया गया था, जिसमें 52% प्राकृतिक और प्लांट-बेस्ड प्रोटीन होता है. इसके अतिरिक्त, भोजन पकाने के लिए न्यूट्रेला सोयाबीन तेल का उपयोग किया गया, जो विटामिन A और D से फोर्टिफाइड होने के साथ-साथ ओमेगा 3 और 6 जैसे आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर है.
राष्ट्र निर्माण की सोच
इस अवसर पर पतंजलि फूड्स लिमिटेड के सीईओ, श्री संजीव अस्थाना ने कहा कि न्यूट्रेला केवल एक ब्रांड नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के विजन का एक हिस्सा है. उन्होंने जोर देते हुए कहा, “पतंजलि का मानना है कि एक मजबूत राष्ट्र की नींव शिक्षा और स्वास्थ्य पर टिकी होती है. भारत में प्रोटीन की कमी को दूर करना अत्यंत आवश्यक है और हम ‘India ko strong banate hai, Nutrela khate hai’ के संकल्प के साथ इस अंतराल को भरने का प्रयास कर रहे हैं.”
साझेदारी से मिली सफलता
इस बड़े स्तर के अभियान को सुचारू बनाने के लिए न्यूट्रेला ने रोबिन हुड आर्मी, ट्रूली हेल्प और हेल्पिन ह्यूमैनिटी जैसे प्रतिष्ठित स्वयंसेवी संगठनों के साथ साझेदारी की. इन संगठनों के सहयोग से बस्तियों के आखिरी बच्चे तक पोषण पहुँचाना संभव हो सका.
यह अभियान केवल भोजन वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के उज्ज्वल और स्वस्थ भविष्य की ओर एक सकारात्मक कदम है, जो भारत के बच्चों को बेहतर पोषण देने की न्यूट्रेला की प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
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