कगिसो रबाडा के नाम हुई पर्पल कैप, इतिहास रचने से चूके भुवनेश्वर कुमार; फाइनल में हुआ फैसला

कगिसो रबाडा के नाम हुई पर्पल कैप, इतिहास रचने से चूके भुवनेश्वर कुमार; फाइनल में हुआ फैसला


IPL 2026 Purple Cap Winner Kagiso Rabada: गुजरात टाइटंस के तेज गेंदबाज कगिसो रबाडा ने IPL 2026 में सबसे ज्यादा विकेट लेकर पर्पल कैप अपने नाम कर लिया है. सीजन का फाइनल मैच रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और गुजरात टाइटंस के बीच खेला जा रहा है. खिताबी मुकाबले में गुजरात के गेंदबाज ने कमाल कमाल किया. गुजरात के विरोध में खेल रही बेंगलुरु के तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार पर्पल कैप अपने नाम करने से चूक गए. अगर भुवी पर्पल कैप अपने नाम कर लेते, तो वह इतिहास रचते हुए एक बड़ा रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लेते. 

फाइनल में गुजरात पहले बैटिंग के लिए उतरी. इस दौरान भुवनेश्वर ने 2 विकेट लेकर 28 विकेट अपने नाम किए. रबाडा के नाम पर सीजन में पहले से ही 28 विकेट दर्ज थे. फिर दूसरी पारी के दौरान जब रबाडा गेंदबाजी करने के लिए आए, तो उन्होंने देवदत्त पडिक्कल का विकेट लेकर 29 विकेट पूरे किए और पर्पल कैप अपने नाम कर ली. इस तरह रबाडा ने फाइनल में पर्पल कैप की जंग जीती. 

इतिहास रचने से चूके भुवनेश्वर कुमार 

बता दें कि आईपीएल इतिहास में सबसे ज्यादा पर्पल कैप जीतने का रिकॉर्ड भुवनेश्वर कुमार, ड्वेन ब्रावो और हर्षल पटेल के नाम पर दर्ज है. तीनों ही खिलाड़ियों ने 2-2 बार पर्पल कैप अपने नाम किया है. लिहाजा अगर भुवनेश्वर इस सीजन पर्पल कैप जीत जाते, तो वह तीन बार पर्पल कैप जीतने वाले आईपीएल इतिहास के पहले गेंदबाज बन जाते. इस तरह भुवी इतिहास रचने से चूक गए. 

वैभव सूर्यवंशी के नाम हुआ ऑरेंज कैप 

15 साल के वैभव सूर्यवंशी ने सीजन में सबसे ज्यादा रन बनाकर ऑरेंज कैप अपने सिर पर सजाया है. राजस्थान रॉयल्स के लिए खेलने वाले वैभव ने 16 मैचों की 16 पारियों में 48.50 की औसत और 237.31 के ताबड़तोड़ स्ट्राइक रेट से 776 रन बनाए. इस दौरान उनके बल्ले से 1 शतक और 5 अर्धशतक निकले. वैभव ऑरेंज कैप जीतने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बन गए हैं. 

 

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शिव की जय जयकार से गूंजा नरेंद्र मोदी स्टेडियम, कैलाश खेर ने बांधा समां; दिखा अद्भुत नजारा

शिव की जय जयकार से गूंजा नरेंद्र मोदी स्टेडियम, कैलाश खेर ने बांधा समां; दिखा अद्भुत नजारा


IPL 2026 के फाइनल मैच में गुजरात टाइटंस ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 155 रन बनाए. पारी का ब्रेक होने पर आमतौर पर मैदान में शांति का माहौल होता है, लेकिन यह फाइनल का मौका है. पारी के ब्रेक में कैलाश खेर ने मैदान में जो समा बांधा, उसे देख हजारों की संख्या में फैंस जोर-जोर से भगवान शिव की जय जयकार करने लगे.

कैलाश खेर ने भगवान शिव के गीत गए और साथ में अन्य कलाकारों ने डांस के माध्यम से महफिल लूटी. इसी बीच आसमान में त्रिशूल की प्रतिमा बनाई गई और जिसे देख हर कोई भौंचक्का रह गया. कुछ देर बाद आईपीएल ट्रॉफी भी आसमान में दिखी.

कैलाश खेर ने भोला मेरे, ॐ नमः शिवाय और बम लहरी जैसे लोकप्रिय गीत भी आए. पूरा नरेंद्र मोदी स्टेडियम शिव के जय जयकार से गूंज उठा. लाइट शो के माध्यम से भगवान शिव की नृत्य करते हुए तस्वीर बनाई गई, जिनके हाथ में त्रिशूल और डमरू भी है. यह तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल भी होने लगी है. यह पूरा समापन समारोह का कार्यक्रम भगवान शिव पर आधारित रहा.

ग्राफिक्स के माध्यम से मैदान पर डमरू भी दिखाया गया. नरेंद्र मोदी स्टेडियम में अद्भुत नजारा देखने को मिला, जिसकी फैंस सोशल मीडिया पर जमकर तारीफ कर रहे हैं.

मैच की बात करें तो गुजरात के लिए वाशिंगटन सुंदर ने 50 रनों की जुझारू अर्धशतकीय पारी खेली. बाकी  कोई भी बल्लेबाज ज्यादा देर तक क्रीज पर नहीं टिक सका. 





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मास्टरशेफ विनर पंकज भदौरिया को ब्रेस्ट कैंसर, 50 के पार महिलाओं में क्यों बढ़ जाता है खतरा?

मास्टरशेफ विनर पंकज भदौरिया को ब्रेस्ट कैंसर, 50 के पार महिलाओं में क्यों बढ़ जाता है खतरा?


MasterChef Winner Pankaj Bhadouria Breast Cancer: मास्टरशेफ इंडिया सीजन 1 की विजेता और मशहूर सेलिब्रिटी शेफ पंकज भदौरिया ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक इमोशनल पोस्ट शेयर कर बताया कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर का पता चला है. इस पोस्ट के सामने आने के बाद उनके फैंस में चिंता बढ़ गई है. पंकज भदौरिया ने लोगों से अपनी सेहत के लिए स्पोर्ट की अपील भी की है. 

ब्रेस्ट कैंसर दुनिया भर में महिलाओं में पाए जाने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है. हर साल लाखों महिलाएं इस बीमारी की चपेट में आती हैं, हालांकि यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन 50 साल की उम्र के बाद इसका खतरा काफी बढ़ जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ शरीर में होने वाले हार्मोनल और जैविक बदलाव इसकी बड़ी वजह बनते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर ब्रेस्ट कैंसर क्या है, 50 साल के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है और इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं. 

क्या होता है ब्रेस्ट कैंसर?

ब्रेस्ट कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसमें ब्रेस्ट की कुछ कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. समय के साथ ये कोशिकाएं एक गांठ या ट्यूमर का रूप ले सकती हैं. अगर समय रहते इसका इलाज न कराया जाए तो कैंसर कोशिकाएं शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकती हैं. यही वजह है कि डॉक्टर शुरुआती पहचान और समय पर इलाज को बेहद जरूरी मानते हैं. 

50  के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है?

1. विशेषज्ञों के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम भी बढ़ता जाता है. खासतौर पर 50 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं के शरीर में कई ऐसे बदलाव होते हैं जो कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं. 

2.महिलाओं में एक उम्र के बाद पीरियड्स बंद हो जाते हैं, जिसे मेनोपॉज कहा जाता है. इस दौरान शरीर में हार्मोन का संतुलन बदलने लगता है. हार्मोन में होने वाले अंतर ब्रेस्ट के टिशू को प्रभावित कर सकते हैं और असामान्य कोशिकाओं के विकसित होने का खतरा बढ़ा सकते हैं. यही कारण है कि मेनोपॉज के बाद ब्रेस्ट कैंसर के मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं.

3. हमारे शरीर की कोशिकाएं लगातार काम करती रहती हैं.बढ़ती उम्र के साथ डीएनए में छोटी-छोटी परेशानियां जमा होने लगती हैं.सामान्य परिस्थितियों में शरीर इनकी मरम्मत कर लेता है, लेकिन उम्र बढ़ने पर यह क्षमता कमजोर होने लगती है. इससे खराब कोशिकाओं के तेजी से बढ़ने और कैंसर में बदलने का खतरा बढ़ जाता है. 

4. 50 वर्ष के बाद महिलाओं में वजन बढ़ने की समस्या आम हो जाती है.विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में अतिरिक्त चर्बी एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर को बढ़ा सकती है. जब शरीर में फैट ज्यादा होता है तो सूजन की स्थिति भी बनी रहती है, जो कैंसर कोशिकाओं के बढ़ने के लिए तैयार कर सकती है. 

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किन महिलाओं को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?

कुछ महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा सामान्य से ज्यादा हो सकता है. जैसे परिवार में किसी को पहले ब्रेस्ट कैंसर रहा हो,  ज्यादा वजन या मोटापे की समस्या, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, देर से मेनोपॉज होना, अस्वस्थ खानपान और लाइफस्टाइल, धूम्रपान और शराब का सेवन इन स्थितियों में नियमित जांच कराना और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना जरूरी हो जाता है. 

ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या हैं?

ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर दर्द नहीं होता, इसलिए कई महिलाएं इसके संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं. हालांकि कुछ लक्षण ऐसे हैं जिन्हें बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए.  जैसे स्तन या बगल में गांठ, स्तन के आकार में बदलाव, स्किन में बदलाव, निप्पल में बदलाव, निप्पल से असामान्य डिसचार्ज. डॉक्टरों का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर का जितना जल्दी पता चल जाता है, उसका इलाज उतना ही आसान और सफल होता है. शुरुआती अवस्था में कैंसर आमतौर पर ब्रेस्ट तक ही सीमित रहता है. ऐसे में सर्जरी, दवाओं और अन्य ट्रीटमेंट से बचाव किया जा सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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The Art of Letting Go – at every stage, not just when we retire

The Art of Letting Go – at every stage, not just when we retire


I marvel at the way some people seamlessly navigate post-retirement life and despair at the way others struggle to come to terms with the closure of their professional career.

The interesting thing is that whether a person embraces or struggles with post-retirement, is not dependent on how that person’s career unfolded. Be it a sterling career to reach a position of great responsibility or an average run of decades of sincere service that does not seem to determine the attitude and approach to letting go. Is it therefore inherent wisdom and a blessed detachment that helps one say goodbye and walk off to the next phase in life? Is it extreme attachment to an organisation, to a role, or even an egoistic expression of ‘I am still needed’ that prevents a healthy acceptance that one’s tenure is done? Is it the price one pays because they made their office and their role so central to their existence?

I cast my mind and find friends who, after great careers, never visited the office again. Instead with alert and open minds, they chose to jazz up their life with new interests and experiences and fresh purpose. These people provide pro-bono service in the social sector, do some people coaching, take responsibility for their Resident Welfare Association, all with the enthusiasm of a first job. I have a college batchmate, who post-retirement conceptualised and executed the largest residential solar power project in Bengaluru.

But my examples are not only about people who found new avenues. There are also friends who have brilliantly navigated this phase by rewarding themselves for a lifetime of hard work and accomplishment by immersing themselves in music, travel, photography or simply enjoying time with their grandchildren. These are wise people who let go the achievements and accomplishments of their past, thus freeing themselves to explore the new.

But the art of ‘letting go’ is not something one develops at 60. It is a mindset and wisdom that is developed in a variety of situations and circumstances right through one’s career. I witnessed this within a year of joining my first job. My supervisor, a dynamic sales manager with fantastic customer contacts, was asked to pass on the verdant Pune industrial business to me. The chief wanted me to grow into that role, while planning a new progression path for my supervisor. Sadly, my supervisor could not digest letting go of the Pune business he had developed over years. Not insecurity, not resentment, but the classic trap of – this is what I do best and I do it better than anyone else. Months later, when I won a huge order from one of those accounts, I announced in every company forum that I had merely collected the order and the credit must go to the person who had nurtured the account so well. That announcement by me was balm to the man, but I felt sad that a seasoned professional needed this kind of cushioning to make peace with changed circumstances. I vowed I will manage these things better.

Years later, when I had to move on from leading an extremely successful division with a close-knit team, I felt the pangs of what I would be missing. But I told myself, no sentiments – this will be a clean, happy break. I wrote a cheery farewell note recalling the best memories of my tenure with them. Some years later I moved on from that organization. I lost touch with many of them, though a few picked up the threads once WhatsApp came into our lives. We reminisce but I have a self-imposed rule: the minute someone talks of how I was a prime reason for the good times we had, I brusquely change the topic and discourage that thread of chatter.

Later, I also learnt the hard way, that there is no fixed rule of how you let go. In my next organisation, where again I had to move on from one leadership role to another, I did a ‘rinse and repeat’ process of doing a clean break with my division colleagues before moving on. Imagine my surprise when I realised that the clean break was something they could not come to terms with.What I felt was a neat farewell was an abrupt goodbye for them. They felt let down that I did not connect regularly with them or call to ask how they were doing. They felt that all the camaraderie I had built was only related to our work.How could I explain to them that if I continued my interactions, it might hamper their new leader who needed space to establish his relationships and work expectations. A chilled-out incumbent might be welcoming of the predecessor keeping contacts, hoping that it would help the team transition but an insecure leader or a ‘control-freak’ leader could misinterpret even harmless interactions as interference. I realised that while letting go is a necessary mantra of our career, one must be wise enough to assess and calibrate the process.

All said and done, letting go must become a conscious part of a professional’s attitude and approach to a career. The more lightly we hold on, the easier we will travel; the tighter we hold on, the more the emotional burden.

Among my college batchmates – we are all 70 – many have happily embraced retirement. We share old stories from our workplace. Now and then, some will announce, “I am going on a 2000 km bike ride’ or ‘I am going to do a podcast series’ or as in my case, announce ‘I am going to start sketching and painting’. My batchmates know I could not draw a proper perpendicular even with the help of the T-Square but believe I will do some art. That is a sign of stout friendship but it also signals their attitude to retirement. Only when we let go will we be able to reach out for something new.

(S Giridhar is one of the earliest members of Azim Premji Foundation.)

Published on May 31, 2026



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कुरकुरे के टुकड़े ने ली युवक की जान! Food Choking कितना खतरनाक, कैसे बचाई जा सकती है जान?

कुरकुरे के टुकड़े ने ली युवक की जान! Food Choking कितना खतरनाक, कैसे बचाई जा सकती है जान?


Food Choking: हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने सभी को झकझोर कर रख दिया है. यहां 28 वर्षीय युवक की मौत सिर्फ इसलिए हो गई, क्योंकि कुरकुरे का एक टुकड़ा उसकी सांस की नली में फंस गया था. इस हादसे के बाद न सिर्फ परिवार बल्कि पूरा गांव सदमे में है. एक्सपर्ट का कहना है कि खाने के दौरान की गई छोटी सी लापरवाही भी कई बार जानलेवा साबित हो सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि फूड चोकिंग कितना खतरनाक है और इससे कैसे जान बचाई जा सकती है. 

कुरकुरा खाते ही बिगड़ी थी तबीयत 

जानकारी के अनुसार, अर्की उपमंडल की घनागुघाट पंचायत के ताल गांव निवासी हेमंत शर्मा कसौली के एक निजी होटल में काम करते थे. परिजनों के अनुसार, वह घर पर कुरकुरे खा रहे थे, तभी उनका एक टुकड़ा गले में फंस गया. कुछ ही देर में उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगी और हालत गंभीर होती चली गई. परिवार के लोग तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए पीजीआई चंडीगढ़ रेफर कर दिया. पीजीआई में डॉक्टरों ने इलाज किया लेकिन तमाम कोशिशें के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी. युवक की मौत की खबर मिलते ही गांव और आसपास के इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई. 

क्या होता है फूड चोकिंग? 

एक्सपर्ट्स के अनुसार, जब कोई खाने का पदार्थ सांस की नली में फंस जाता है और फेफड़ों तक हवा पहुंचने का रास्ता बाधित कर देता है तो इस स्थिति को फूड चोकिंग कहा जाता है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी हो सकती है, क्योंकि शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलने पर कुछ ही मिनट में गंभीर नुकसान हो सकता है. 

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गले में क्यों फंस जाता है खाना? 

डॉक्टर बताते हैं कि हमारे गले में एपिग्लॉटिस नाम का एक हिस्सा होता है, जो खाने और सांस की नली के बीच संतुलन बनाए रखना है. जब कोई व्यक्ति खाना खाते समय बात करता है, हंसता है या बहुत तेजी से निगलता है तो खाने का टुकड़ा गलत रास्ते में जाकर श्वास नली में फंस सकता है. ऐसी स्थिति में सांस लेने में कठिनाई शुरू हो जाती है. 

किसी के गले में खाना फंस जाए तो क्या करें?

एक्सपर्ट के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति के गले में खाना फंस जाए और वह खांस पा रहा है तो उसे लगातार खांसने के लिए कहना चाहिए. क्योंकि कई बार इससे फंसी हुई वस्तु बाहर निकल आ जाती है. अगर स्थिति गंभीर हो तो व्यक्ति को आगे की ओर झुकाकर पीठ के ऊपरी हिस्से पर जोरदार थपकी दी जा सकती है. इसके अलावा एक्सपर्ट व्यक्ति हेमलिच मैनूवर का इस्तेमाल भी कर सकता है. इस प्रक्रिया में पीड़ित के पीछे खड़े होकर पेट के ऊपरी हिस्से पर दबाव डाला जाता है, जिससे फेफड़ों में मौजूद हवा के दबाव से फंसी हुई वस्तु बाहर निकल सकती है.

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