अचानक नहीं होतीं दिल की बीमारियां! इन छोटी और नियमित आदतों से रखें अपने हार्ट का ख्याल

अचानक नहीं होतीं दिल की बीमारियां! इन छोटी और नियमित आदतों से रखें अपने हार्ट का ख्याल


Dr Niranjan Hiremath ने TOI को बताया कि हार्ट को परफेक्शन नहीं, निरंतर देखभाल चाहिए. इसका मतलब है कि अत्यधिक जिम या कठोर डाइट नहीं, बल्कि नियमितता ज्यादा मायने रखती है.



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अदरक-लहसुन का मिलावटी पेस्ट सेहत के लिए कितना खतरनाक, किन अंगों को सड़ा देता है यह?

अदरक-लहसुन का मिलावटी पेस्ट सेहत के लिए कितना खतरनाक, किन अंगों को सड़ा देता है यह?


Can Adulterated Ginger Garlic Paste Damage Liver: हैदराबाद से 4 हजार किलो मिलावटी अदरक और लहसुन का पेस्ट जब्त किया गया है. रिपोर्ट के अनुसार, हैदराबाद पुलिस ने एमएस मक्था रेलवे गेट के पास अचानक छापा मारा, जहां उनको एक कंटेनर में अनहाइजीनिक तरीके से रखा हुआ लहसुन- अदरक का पेस्ट मिला. इस मामले में एक 21 साल के युवक की गिरफ्तारी भी की गई है. चलिए आपको बताते हैं कि अदरक और लहसुन का मिलावटी पेस्ट आपकी सेहत पर कितना असर करता है और इससे आपके किन अंगों को ज्यादा नुकसान होता है. 

क्या होती है दिक्कत?

रसोई में रोज इस्तेमाल होने वाला अदरक-लहसुन पेस्ट अगर मिलावटी हो, तो यह सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. चेन्नई स्थित श्री बालाजी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल की रजिस्टर्ड डाइटीशियन दीपलक्ष्मी के मुताबिक, कई बार इस पेस्ट में मात्रा बढ़ाने के लिए मैदा या कॉर्नफ्लोर मिलाया जाता है. इसे ताजा दिखाने और ज्यादा दिन तक सुरक्षित रखने के लिए कृत्रिम रंग और प्रिजर्वेटिव भी डाले जाते हैं. कुछ मामलों में पुराना या खराब अदरक-लहसुन दोबारा इस्तेमाल कर लिया जाता है.

ऐसा पेस्ट खाने से गैस, एसिडिटी और दस्त जैसी डाइजेशन संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं. लंबे समय तक सेवन करने पर इसका असर लिवर और किडनी पर भी पड़ सकता है. केमिकल मिलावट की वजह से कुछ लोगों में एलर्जी, त्वचा संबंधी समस्याएं या सांस की तकलीफ भी देखी जा सकती है. सबसे बड़ी बात, मिलावट के कारण अदरक-लहसुन के प्राकृतिक फायदे जैसे पाचन में मदद, सूजन कम करना और संक्रमण से लड़ने की क्षमता कम हो जाते हैं.

इनका भी होती है मिलावट

जुलाई 2025 में भी इस तरह का एक मामला आया था, जिसमें फूड सेफ्टी अधिकारियों के अनुसार, कुछ मामलों में टाइटेनियम डाइऑक्साइड और मोनो साइट्रेट जैसे हानिकारक एडिटिव्स का इस्तेमाल किया जा रहा था. फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया के दिशा-निर्देशों के तहत ऐसे तत्वों का उपयोग खाद्य उत्पादन में प्रतिबंधित है. जांच के दौरान टाइटेनियम डाइऑक्साइड, मोनो साइट्रेट और रंग बढ़ाने के लिए हल्दी पाउडर की बड़ी मात्रा जब्त की गई थी. 

घर पर कैसे कर सकते हैं जांच?

घर पर शुद्धता की जांच के लिए कुछ बातों का ध्यान रखें. पेस्ट का रंग हल्का आइवरी होना चाहिए, न कि गहरा या बदरंग. उसमें फफूंदी, चिपचिपापन या खराब गंध नहीं होनी चाहिए. बनावट स्मूद और एकसार हो, और खुशबू ताजा अदरक-लहसुन जैसी तीखी हो. स्वाद कड़वा या बासी नहीं लगना चाहिए. पैक्ड उत्पाद खरीदते समय सामग्री सूची जरूर पढ़ें, शुद्ध पेस्ट में मुख्य रूप से अदरक और लहसुन ही होने चाहिए, अतिरिक्त आर्टिफिसियल रंग या प्रिजर्वेटिव न्यूनतम हों. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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रात में बिस्तर पर जाते ही आने लगती है खांसी, जानें क्यों हो रही यह समस्या?

रात में बिस्तर पर जाते ही आने लगती है खांसी, जानें क्यों हो रही यह समस्या?


Why Do I Start Coughing When I Lie Down: खांसी कभी भी आ सकती है, लेकिन कुछ लोगों को खासतौर पर रात में बिस्तर पर जाते ही खांसी के दौरे पड़ने लगते हैं. दिनभर सब सामान्य रहता है, पर जैसे ही लेटते हैं, गला साफ करने की जरूरत महसूस होती है या लगातार खांसी शुरू हो जाती है. यही समस्या नाइट कफ कहलाती है. इसकी वजह से नींद पूरी नहीं हो पाती और सुबह थकान, चिड़चिड़ापन और कमजोरी महसूस हो सकती है. चलिए आपको बताते हैं यह किस कारण होता है और इसको रोकने के लिए क्या कर सकते हैं. 

क्या होता है कारण?

Medanta की डॉ. आकांक्षा रस्तोगी की रिपोर्ट के अनुसार, रात में खांसी बढ़ने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, इसमें सोने का तरीका, कमरे का वातावरण, कुछ दवाइयां या शरीर से जुड़ी अंदरूनी समस्याएं शामिल होती हैं.  अक्सर एसिड रिफ्लक्स या जीईआरडी इसका बड़ा कारण होता है. लेटने पर पेट का एसिड गले की तरफ आ सकता है, जिससे सूखी खांसी शुरू हो जाती हैय इसी तरह एलर्जी, अस्थमा, निमोनिया, काली खांसी या सीओपीडी जैसी फेफड़ों की बीमारियां भी रात में खांसी को बढ़ा सकती हैं. 

अस्थमा में धूल या हवा में मौजूद एलर्जन खांसी का कारण बनते हैं, जबकि सीओपीडी में जमा बलगम समस्या पैदा करता है. सर्दी या फ्लू के दौरान नाक का म्यूकस लेटते ही गले के पीछे बहने लगता है, जिसे पोस्टनैजल ड्रिप कहा जाता है और यही खांसी को ट्रिगर करता है इसके अलावा, कमरे की सूखी हवा गले में खुजली और जलन पैदा कर सकती है. कुछ दवाएं, जैसे बीटा-ब्लॉकर्स, एनएसएआईडी या एसीई इनहिबिटर्स, भी खांसी को बढ़ा सकती हैं. पीठ के बल सीधा लेटने से भी एयरवे साफ नहीं हो पाता और खांसी तेज हो सकती है.

कैसे इससे बचा जा सकता है?

डॉ. आकांक्षा के अनुसार,  रात की खांसी से राहत पाने के लिए कुछ आसान उपाय मददगार हो सकते हैं. गीली खांसी में बलगम पतला करने वाली दवा, जैसे एक्सपेक्टोरेंट, काम आ सकती है. सूखी खांसी में सीमित मात्रा में कफ ड्रॉप्स ली जा सकती हैं. कमरे में 40 से 50 प्रतिशत नमी बनाए रखने के लिए ह्यूमिडिफायर उपयोगी रहता है. ओवर-द-काउंटर कफ सप्रेसेंट भी राहत दे सकते हैं, लेकिन हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग डीकंजेस्टेंट लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लें.

 सोने से पहले गुनगुने नमक पानी से गरारे करना, दिनभर पर्याप्त पानी पीना और बिस्तर पर सिर को थोड़ा ऊंचा रखकर सोना भी मदद करता है. एक चम्मच शहद या गुनगुने पानी में नींबू मिलाकर पीना गले को आराम देता है. सोने से पहले गर्म पानी से नहाना भाप के कारण जकड़न कम कर सकता है. यदि आप स्मोकिंग करते हैं, तो इसे छोड़ना सबसे बड़ा कदम हो सकता है और अक्सर एक हफ्ते में ही फर्क दिखने लगता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किडनी का ‘साइलेंट किलर’, सिर्फ शुगर-बीपी नहीं, ये छिपी हुई आदतें भी कर रहीं किडनी को डैमेज

किडनी का ‘साइलेंट किलर’, सिर्फ शुगर-बीपी नहीं, ये छिपी हुई आदतें भी कर रहीं किडनी को डैमेज


How Does Obesity Affect Kidney Function: किडनी की बीमारी अब दुनिया की करीब 10  प्रतिशत आबादी को प्रभावित कर रही है. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से जोड़कर देखते हैं, जबकि हकीकत इससे कहीं बड़ी है. मोटापा, स्मोकिं, एनवायरमेंट कारण, बिना सलाह के दर्दनाशक दवाओं का सेवन और यहां तक कि कुछ सप्लीमेंट्स भी चुपचाप किडनी को नुकसान पहुंचा सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि इसके कारण क्या होते हैं.

क्या होते हैं कारण?

किडनी की बीमारी अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ती है. दर्द या तेज संकेत नहीं मिलते, लेकिन अंदर ही अंदर किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम होती जाती है. डॉ. मोहम्मद एस खान ने TOI को बताया कि, क्रॉनिक किडनी डिजीज केवल बिग टू यानी डायबिटीज और ब्लड प्रेशर तक सीमित नहीं है. अब लाइफस्टाइल, एनवायरमेंट और जेनेटिक कारण भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. मोटापा सिर्फ डायबिटीज का खतरा नहीं बढ़ाता, बल्कि सीधे किडनी पर दबाव डालता है. शरीर का वजन बढ़ने पर किडनी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे समय के सा टिश्यू में स्कारिंग हो सकती है. आजकल कम उम्र के लोगों में भी मोटापे से जुड़ा किडनी स्ट्रेस देखने को मिल रहा है. रेगुलर एक्सरसाइज, संतुलित आहार और वजन कंट्रोल रखना बेहद जरूरी है.

स्मोकिंग एक बड़ा फैक्टर

धूम्रपान भी किडनी के लिए खामोश खतरा है. सिगरेट में मौजूद निकोटिन और विषैले तत्व किडनी की ब्लड़ वेस्ल को नुकसान पहुंचाते हैं. जिन लोगों को पहले से किडनी की समस्या है, उनमें स्मोकिंग बीमारी की रफ्तार और तेज कर देती है. एक और चिंता का विषय है क्रॉनिक किडनी डिजीज ऑफ अननोन एटियोलॉजी की. यह बीमारी बिना डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर के भी देखी जा रही है, खासकर ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले किसानों और मजदूरों में इसकी दिक्कत बार-बार देखने को मिलती है. बार-बार डिहाइड्रेशन, गर्मी में काम, रसायनों का संपर्क और पानी में भारी धातुओं की मौजूदगी इसके संभावित कारण माने जा रहे हैं. ऐसे क्षेत्रों में नियमित जांच बेहद जरूरी है.

किन चीजों को रखना चाहिए ध्यान?

बिना डॉक्टर की सलाह के दर्दनाशक दवाएं, खासकर NSAIDs, लंबे समय तक लेने से किडनी को स्थायी नुकसान हो सकता है. इसी तरह नेचुरल या पारंपरिक दवाओं के नाम पर बिकने वाले कुछ उत्पादों में भारी धातुएं या असुरक्षित मात्रा में तत्व पाए गए हैं. बॉडीबिल्डिंग या वजन घटाने के लिए लिए जाने वाले सप्लीमेंट्स भी जोखिम बढ़ा सकते हैं, खासकर अगर पहले से किडनी कमजोर हो. इसके अलावा बार-बार होने वाले यूरिन इंफेक्शन, किडनी स्टोन, पारिवारिक इतिहास और ऑटोइम्यून बीमारियां भी CKD के खतरे को बढ़ाती हैं. एक्सपर्ट बताते हैं कि रेगुलर ब्लड और यूरिन टेस्ट करवाए, समय रहते पहचान ही किडनी को गंभीर नुकसान से बचाने का सबसे असरदार तरीका है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या मछली और दही एक साथ खाने से हो जाती है सफेद दाग की समस्या, कितनी सच है ये बात?

क्या मछली और दही एक साथ खाने से हो जाती है सफेद दाग की समस्या, कितनी सच है ये बात?


Can Eating Fish And Curd Together Cause Skin Problems: बचपन से हममें से कई लोगों ने यह बात सुनी है कि मछली खाने के बाद दूध या कोई भी डेयरी उत्पाद नहीं लेना चाहिए, वरना त्वचा पर सफेद दाग हो सकते हैं. घर के बड़े-बुजुर्ग अक्सर इस कॉम्बिनेशन से बचने की सलाह देते रहे हैंय लेकिन क्या सच में इसका कोई वैज्ञानिक आधार है या यह सिर्फ एक पुरानी मान्यता है?. चलिए आपको बताते हैं कि क्या है इसके पीछे की सच्चाई. 

क्या है धारणा?

लोक मान्यता के अनुसार, मछली और दही साथ लेने से त्वचा पर असमान सफेद धब्बे पड़ सकते हैं, जिन्हें विटिलिगो या ल्यूकोडर्मा कहा जाता है. एक और तर्क यह दिया जाता है कि दही की तासीर ठंडी होती है और मछली की गर्म होती है और इन्हें पचाने के लिए अलग-अलग एंजाइम की जरूरत होती है. ऐसे में शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे गैस, ब्लोटिंग या अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं. 

आयुर्वेद में भी इसको वर्जित माना गया है. मछली को तामसिक और दूध को सात्विक आहार की कैटेगरी में रखा जाता है. माना जाता है कि दोनों का एक साथ सेवन शरीर में तामस गुण बढ़ाकर असंतुलन पैदा कर सकता है. हालांकि यह दृष्टिकोण पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

साइंटफिक नजरिए से देखें तो मछली के साथ दही पीना हानिकारक है, ऐसा साबित करने वाला कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है. डॉ. सौरोजीत गुप्ता, बेबी एंड चाइल्ड स्पेशलिस्ट ने अपने वीडियो में बताया कि ऐसा नहीं है.  जहां तक सफेद दाग की बात है, विटिलिगो आमतौर पर त्वचा की रंग बनाने वाली सेल्स मेलानोसाइट्स के नष्ट होने या किसी फंगल इंफेक्शन के कारण होता है. केवल मछली और दही का साथ सेवन इस स्थिति का कारण नहीं बनता.

 

कब होती है दिक्कत?

आम तौर पर थोड़ी मात्रा में दोनों साथ खाना सुरक्षित माना जाता है, मगर कुछ लोगों को दिक्कत हो सकती है. मछली और दही दोनों ही प्रोटीन से भरपूर होते हैं और इन्हें पचाने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है. ऐसे में जिनका डाइजेशन सिस्टम सेंसिटिव  है, उन्हें गैस, पेट फूलना या अपच महसूस हो सकती है. लैक्टोज इनटोलरेंस या दूध प्रोटीन से एलर्जी वाले लोगों में त्वचा पर खुजली, रैशेज या एक्जिमा जैसे लक्षण उभर सकते हैं. कुछ मामलों में मछली में मौजूद हिस्टामिन और डेयरी का लैक्टोज सेंसिटिव लोगों में मुंहासों या स्किन फ्लेयर-अप को बढ़ा सकते हैं. हालांकि, हर व्यक्ति की सहनशक्ति अलग होती है. अगर कोई एलर्जी या डाइजेशन समस्या नहीं है, तो सीमित मात्रा में यह कॉम्बिनेशन आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है.

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