खाने की थाली बन रही मौत की वजह! खराब फूड से हर साल 15 लाख बच्चों की मौत, WHO ने जारी की रिपोर्ट

खाने की थाली बन रही मौत की वजह! खराब फूड से हर साल 15 लाख बच्चों की मौत, WHO ने जारी की रिपोर्ट


Food Safety : विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक नई रिपोर्ट ने फूड सेफ्टी को लेकर चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, गंदे और खराब खाने की वजह से हर साल लाखों लोग बीमार पड़ रहे हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोगों की जान भी जा रही है. वहीं सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि छोटे बच्चे इस खतरे का सबसे बड़ा शिकार बन रहे हैं. पांच साल से कम उम्र के बच्चों में खराब खाने से होने वाली बीमारियों का खतरा बड़े बच्चों और एडल्ट्स की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा है. दुनिया की कुल आबादी में इन बच्चों की हिस्सेदारी केवल 9 प्रतिशत है, लेकिन फूड बोर्न डिजीज के करीब एक-तिहाई मामले इन्हीं से जुड़े हैं. 

छोटे बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा क्यों है?

WHO की रिपोर्ट के अनुसार, छोटे बच्चों का इम्यून सिस्टम पूरी तरह ग्रो नहीं होता है. यही वजह है कि खराब खाने में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं. खराब खाने की वजह से होने वाली कई बीमारियां डायरिया से जुड़ी होती हैं. छोटे बच्चों के लिए डायरिया जानलेवा साबित हो सकता है, क्योंकि इससे शरीर में पानी और जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो जाती है. 

2021 में करोड़ों लोग हुए बीमार

रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ साल 2021 में खराब खाने की वजह से दुनिया भर में करीब 86.6 करोड़ लोग बीमार पड़े. वहीं लगभग 15 लाख लोगों की मौत हो गई. विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से बड़ी संख्या में मौतों और बीमारियों को रोका जा सकता था. अगर साफ पानी उपलब्ध हो, खाने को सही तरीके से तैयार और स्टोर किया जाए, साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए और समय पर इलाज मिल जाए तो इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. 

खाने में मौजूद केमिकल हैं इतने खतरनाक 

अक्सर लोग सोचते हैं कि खराब खाने का मतलब सिर्फ बैक्टीरिया या वायरस से संक्रमण है, लेकिन WHO ने चेतावनी दी है कि खाने में मौजूद कुछ केमिकल भी बेहद खतरनाक हो सकते हैं, सीसा (Lead) और मिथाइलमरकरी जैसे केमिकल बच्चों के ग्रो हो रहे दिमाग को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इससे बच्चों के मानसिक विकास, सीखने की क्षमता और तंत्रिका तंत्र पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि केमिकल प्रदूषण को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि इसके प्रभाव कई बार लाइफटाइम बने रह सकते हैं. 

फूड बोर्न डिजीज हुई मौतों में केमिकल सबसे बड़ा कारण कैसे है?

रिपोर्ट में बताया गया है कि खाने से जुड़ी बीमारियों के ज्यादातर मामले बैक्टीरिया, वायरस और परजीवियों की वजह से होते हैं, लेकिन मौतों के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार केमिकल प्रदूषण है. 2021 में खराब खाने से जुड़ी कुल मौतों में लगभग 73 प्रतिशत हिस्सेदारी केमिकल खतरों की रही. इनमें अकार्बनिक आर्सेनिक (Inorganic Arsenic) और सीसा सबसे बड़े कारण रहे. ये दोनों तत्व हार्ट डिजीज स्ट्रोक और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं. WHO के अनुसार, फूड बोर्न डिजीज हुई मौतों में करीब 42 प्रतिशत मामलों का संबंध अकार्बनिक आर्सेनिक से था, जबकि 31 प्रतिशत मौतें सीसे के संपर्क से जुड़ी थीं. 

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WHO ने क्या कहा?

WHO  ने कहा कि फूड सेफ्टी कोई सामान्य मुद्दा नहीं है. यह हर फैमिली और हर दिन के खाने से जुड़ा हुआ विषय है. उन्होंने कहा कि खराब खाना लंबे समय से पब्लिक हेल्थ के लिए बड़ी चुनौती रहा है, लेकिन अब सामने आए नए आंकड़े यह दिखाते हैं कि इसका इंसानों और अर्थव्यवस्था पर कितना बड़ा असर पड़ रहा है. रिपोर्ट में दुनिया के कई क्षेत्रों के बीच बड़ी असमानता भी सामने आई है, हालांकि साल 2000 के बाद से फूड बोर्न डिजीज का कुल बोझ कुछ कम हुआ है, लेकिन अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया आज भी सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं. दुनिया भर में होने वाली लगभग 75 प्रतिशत फूड बोर्न डिजीज और करीब 60 प्रतिशत मौतें इन्हीं क्षेत्रों में दर्ज की गई हैं. खराब खाने असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. WHO के अनुसार, 2021 में खराब खाने की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ. बीमारी के कारण लोगों के काम न कर पाने से दुनिया को लगभग 310 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रोडक्टिवीटी का नुकसान हुआ. 

आगे और बढ़ सकती है चुनौती

WHO का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण प्रदूषण और एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ता Antimicrobial Resistance आगे फूड सेफ्टी की चुनौती को और मुश्किल बना सकता है. रिपोर्ट में 2000 से 2021 के बीच 194 देशों में 42 प्रमुख फूड खतरों का अध्ययन किया गया. इसमें बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी और रासायनिक प्रदूषकों को शामिल किया गया था. विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर आंकड़ों और निगरानी व्यवस्था की मदद से देश फूड सेफ्टी से जुड़े सबसे बड़े खतरों की पहचान कर सकते हैं और समय रहते जरूरी कदम उठा सकते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कैंसर मरीजों के लिए बढ़ी चिंता, जरूरी कीमो दवाओं की कमी से इलाज पर मंडराया संकट

कैंसर मरीजों के लिए बढ़ी चिंता, जरूरी कीमो दवाओं की कमी से इलाज पर मंडराया संकट


Cancer Drug Shortage:  कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों और उनके परिवारों के लिए इन दिनों एक नई चिंता सामने आ गई है. देश के कई अस्पतालों में कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली कुछ जरूरी दवाओं की कमी की खबरें सामने आ रही हैं. डॉक्टरों का कहना है कि Cisplatin और Carboplatin जैसी दवाएं कई तरह के कैंसर के इलाज में अहम भूमिका निभाती हैं. इस कमी के कारण देश भर में कैंसर के मरीजों के इलाज में रुकावटें आ रही हैं. बता दें कि ये दोनों दवाएं फेफड़े, Cervix, Ovary, और सिर-गर्दन  के कैंसर के इलाज के लिए बहुत जरूरी मानी जाती हैं.  कई जगह मरीज और उनके परिजन दवा की तलाश में एक मेडिकल स्टोर से दूसरे मेडिकल स्टोर तक भटक रहे हैं.  डॉक्टरों की चिंता यह है कि अगर समय पर दवा नहीं मिली मरीजों के कीमोथेरेपी सेशन को टालना पड़ रहा है या फिर इलाज का कोई दूसरा तरीका ढूंढना पड़ रहा है. 

आखिर क्यों खास हैं ये दवाएं?

Cisplatin और Carboplatin जैसी प्लैटिनम आधारित दवाएं कैंसर के इलाज में रीढ़ की हड्डी मानी जाती हैं.  इनका इस्तेमाल फेफड़ों, स्तन, सर्वाइकल, ओवेरियन, मुंह और कई अन्य प्रकार के कैंसर के इलाज में किया जाता है. कई मामलों में ये दवाएं मरीज के इलाज का मुख्य हिस्सा होती हैं. लेकिन इस समय देश में इनकी भारी कमी हो गई है. माना जा रहा है कि इस संकट की मुख्य वजह कच्चे माल (API) की कमी, कंपनियों की बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग लागत और दुनिया भर में सप्लाई चेन का प्रभावित होना है. साथ ही जानकारों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और प्लैटिनम की कीमतों में आई भारी तेजी ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है. शुरुआत में अस्पतालों ने अपने पुराने स्टॉक से काम चलाया, लेकिन अब वह भी खत्म हो चुका है. डॉक्टरों को मजबूरी में मरीजों के कीमोथेरेपी शेड्यूल और इलाज के तरीकों में बदलाव करना पड़ रहा है, जो मरीजों के ठीक होने की संभावनाओं के लिहाज से बेहद चिंताजनक है. 

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डॉक्टरों और विशेषज्ञों के बयानों पर केंद्रित पैराग्राफ फॉर्मेट

दवाओं की इस कमी से देश के बड़े अस्पतालों में स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है. दिल्ली के एम्स (AIIMS) के सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. एमडी रे ने बताया कि इन जरूरी दवाओं के न मिलने से कैंसर रोगियों का पूरा ट्रीटमेंट प्लान बिगड़ सकता है, जिससे मरीजों का सर्वाइवल रेट पर बुरा असर पड़ सकता है और बीमारी दोबारा लौटने का खतरा बढ़ जाता है.  वहीं, सर गंगा राम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. श्याम गर्ग ने चेतावनी देते हुए कहा है कि स्थिति इतनी गंभीर है कि अस्पताल में मुश्किल से केवल एक या दो दिन का ही स्टॉक बचा है.  

मरीजों और परिवारों के लिए सबसे जरूरी बात

डॉक्टरों का कहना है कि मरीजों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है.  यदि किसी मरीज का इलाज इन दवाओं से चल रहा है तो उसे अपने डॉक्टर के संपर्क में रहना चाहिए और दवा की उपलब्धता को लेकर समय-समय पर जानकारी लेते रहना चाहिए. किसी भी स्थिति में बिना डॉक्टर की सलाह के इलाज में बदलाव नहीं करना चाहिए. 

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दिनभर धूप में करते हैं काम तो जा सकती है जान, इन स्मार्ट तरीकों से खुद का रखें ख्याल

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Summer Health Tips: गर्मियों का मौसम आते ही सूरज की तपिश लोगों की मुश्किलें बढ़ाने लगती है. जून के महीने में सूरज का रौद्र रूप देखने को मिल रहा है. तापमान हर दिन अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रहा है हर दिन 42 सो 45 पार तापमान में लोगों का हाल बेहाल हो गया है. साथ ही लू और चिलचिलाती धूप की वजह लोग कई सारी समस्याओं के शिकार हो रहे हैं. ऐसे में जरूरी है कि लोग अपना ख्याल रखें. खासकर उन लोगों के लिए जो दिनभर बाहर काम करते हैं, जैसे मजदूर, डिलीवरी बॉय, ट्रैफिक पुलिसकर्मी, या किसान, उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है.

कई बार लोग काम में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने शरीर की जरूरतों को नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन लगातार तेज धूप में रहने से शरीर में पानी की कमी, चक्कर आना, थकान और हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. कुछ मामलों में यह स्थिति जानलेवा भी बन सकती है. इसलिए गर्मी के मौसम में काम के साथ-साथ अपनी सेहत का ख्याल रखना भी उतना ही जरूरी है.

शरीर को ठंडा रखना है सबसे जरूरी

अगर आपको लंबे समय तक धूप में रहना पड़ता है तो सबसे पहले अपने शरीर को हाइड्रेट रखना जरूरी है. ध्यान रखें घर से निकलने से पहले पर्याप्त पानी पिएं और अपने साथ पानी की बोतल जरूर रखें. सिर्फ प्यास लगने पर ही पानी न पिएं, बल्कि थोड़ी-थोड़ी देर में पानी लेते रहें. इसके अलावा नींबू पानी, नारियल पानी, छाछ और घर में बने शरबत भी शरीर को ठंडक पहुंचाने में मदद करते हैं. जब भी बाहर से घर लौटें तो तुरंत बहुत ठंडा पानी पीने के बजाय सामान्य तापमान वाला पानी लें. इससे शरीर को अचानक तापमान बदलने का झटका नहीं लगता. साथ ही हल्के रंग के ढीले कपड़े पहनने चाहिए, ताकि शरीर में हवा आसानी से पहुंच सके और गर्मी कम महसूस हो. 

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घर लौटने के बाद कभी न करें ये गलती 

कई लोग धूप से आते ही सीधे पंखे या एसी के सामने बैठ जाते हैं, जो शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है.  बाहर से आने के बाद कुछ मिनट आराम करें और शरीर का तापमान सामान्य होने दें. इसके बाद ही चेहरा, हाथ और पैरो को ठंडे पानी से धोएं. यदि संभव हो तो स्नान भी कर सकते हैं. इससे शरीर को राहत मिलती है और थकान कम हो जाती है. गर्मी में काम करने के बाद ताजे फल खाना भी काफी फायदेमंद माना जाता है. जैसे  तरबूज, खरबूजा, खीरा और संतरा जैसे फलों में पानी की मात्रा ज्यादा होती है, जो शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में मदद करते हैं. साथ ही ये शरीर को ऊर्जा भी देते हैं. 

छोटी-छोटी सावधानियां बचा सकती हैं बड़ी परेशानी से

गर्मी के मौसम में अपनी सेहत को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. यदि काम के दौरान सिर दर्द, ज्यादा पसीना, चक्कर आना, कमजोरी या उलझन महसूस हो तो इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज न करें. डॉक्टर के अनुसार  ये हीट स्ट्रोक के शुरुआती संकेत हो सकते हैं. ऐसे में तुरंत छांव वाली जगह पर जाएं, पानी पिएं और आराम करें.  थोड़ी सी सावधानी और सही आदतें अपनाकर आप गर्मियों में खुद को सुरक्षित रख सकते हैं और कई गंभीर समस्याओं से बच सकते हैं. 

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फैटी लिवर में बड़े काम की हैं ये पांच ड्रिंक, पीते ही जिगर को मिलेगी जोरदार ठंडक

फैटी लिवर में बड़े काम की हैं ये पांच ड्रिंक, पीते ही जिगर को मिलेगी जोरदार ठंडक


Best Drinks for Liver Health: आजकल खराब लाइफस्टाइल, जंक फूड और आलस की वजह से बहुत से लोगों में फैटी लिवर की समस्या आम हो गई है. इसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा फैट जमा हो जाता है, जिसके कारण यह कमजोर हो जाता है और अच्छी तरह काम नहीं कर पाता. शुरुआती दौर में इसके लक्षण आसानी से दिखाई नहीं देते, लेकिन यही आगे चलकर गंभीर बीमारी का रूप ले सकते हैं.

हालांकि, आप आप महंगी दवाइयों के बजाय सही खानपान और हेल्दी ड्रिंक्स की मदद से इसे समय रहते कंट्रोल कर सकते हैं. आइए आपको बताते हैं कुछ ऐसी ड्रिंक्स के बारे में, जो लिवर में जमा अतिरिक्त फैट को कम करने में मदद कर सकती हैं. 

ग्रीन टी और नींबू पानी से मिल सकता है फायदा

यह तो हम सभी जानते हैं कि ग्रीन टी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होती है. इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो हमारे शरीर से हानिकारक तत्वों को बाहर निकालने में मदद करते हैं. ग्रीन टी में कैटेचिन्स नाम का एंटीऑक्सीडेंट होता है, जो लिवर की सूजन और तनाव को कम करता है. इसके अलावा यह लिवर की कार्यक्षमता को भी बेहतर बनाता है. अगर कोई व्यक्ति रोजाना 2 से 3 कप ग्रीन टी पीता है तो उसके लिवर एंजाइम्स का स्तर संतुलित रहता है और वजन भी कंट्रोल में रहता है. वहीं सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू मिलाकर पीना भी काफी लाभदायक माना जाता है. बता दें कि नींबू में विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं. ये लिवर के ग्लूटाथियोन जैसे जरूरी एंजाइम को बढ़ाते हैं, जो लिवर को जहरीले तत्वों यानी डिटॉक्स प्रक्रिया में मदद करता है. साथ ही यह शरीर में पित्त के निर्माण को बढ़ाता है, जिससे खाना आसानी से पचता है और पेट साफ रहता है. 

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चुकंदर का जूस और ब्लैक कॉफी भी है असरदार

चुकंदर का जूस पोषक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें बेटालेंस और बीटेन नामक तत्व होते हैं, जो लिवर को बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं. यह शरीर से हानिकारक तत्वों और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में सहायक होता है. साथ ही यह लिवर को नुकसान पहुंचने से रोकता है और इसकी खराब हो चुकी कोशिकाओं को दोबारा ठीक करने में भी मदद करता है. बता दें कि हफ्ते में 2 से 3 बार चुकंदर का रस पीने से लिवर एंजाइम्स का स्तर सुधरता है और लिवर में चर्बी जमा नहीं होती. दूसरी ओर ब्लैक कॉफी भी फैटी लिवर से जूझ रहे लोगों के लिए फायदेमंद मानी जाती है. लिवर की सेहत के लिए ब्लैक कॉफी पर दुनिया भर में सबसे ज्यादा रिसर्च की गई है. इसमें क्लोरोजेनिक एसिड और कैफीन होता है, जो लिवर की सूजन को कम करते हैं और कोशिकाओं में चर्बी जमा होने से रोकते हैं. हालांकि इसमें चीनी मिलाने से बचना चाहिए, तभी इसका पूरा लाभ मिल पाता है. 

एप्पल साइडर विनेगर के साथ अपनाएं हेल्दी लाइफस्टाइल

फैटी लिवर की समस्या में एप्पल साइडर विनेगर भी काफी चर्चा में रहता है. माना जाता है कि एप्पल साइडर विनेगर में एसिटिक एसिड होता है, जो मेटाबॉलिज्म यानी भोजन से ऊर्जा बनाने की प्रक्रिया को तेज करता है. साथ ही यह शरीर की अतिरिक्त चर्बी को तोड़कर लिवर में जमा फैट को कम करने में मदद करता है. हालांकि इसे हमेशा पानी में मिलाकर ही पीना चाहिए. ध्यान रखें कि केवल ड्रिंक्स के भरोसे फैटी लिवर को ठीक नहीं किया जा सकता. संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और वजन को नियंत्रित रखना भी बेहद जरूरी है. अगर आप इन बातों का ध्यान रखते हैं, तो लिवर को लंबे समय तक स्वस्थ बनाए रखा जा सकता है. 

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इन तीन घरेलू नुस्खों से एक बार में निकल जाएगा फेफड़ों में जमा कफ, यहां जानिए

इन तीन घरेलू नुस्खों से एक बार में निकल जाएगा फेफड़ों में जमा कफ, यहां जानिए


देशभर में लगभग 2.5% आबादी क्रॉनिक कफ यानी लगातार रहने वाली खांसी से परेशान है. ऐसे में अगर इसका सही इलाज नहीं किया जाए तो फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारी होने का खतरा भी बढ़ जाता है. कई मामलों में तो जिन लोगों को दमा नहीं होता, उन्हें भी दमा हो जाता है.

विशेषज्ञों के अनुसार, फेफड़ों में कफ जमा होना एक बड़ी समस्या हो सकती है, खासकर उनके लिए जिन्हें अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या COPD जैसी बीमारी है.  डॉक्टरों के अनुसार, कफ शरीर को प्राकृतिक रूप से सुरक्षित करता है. यह धूल और बैक्टीरिया जैसी चीजों को फेफड़ों तक जाने से रोकता है, लेकिन जब यह कफ जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है तो यह एक परेशानी का रूप ले लेती है.  ऐसे में बहुत से लोग दवाइयों के साइड इफेक्ट्स से बचने के लिए प्राकृतिक और घरेलू तरीकों को अपनाना पसंद करते हैं.  वहीं ये घरेलू उपाय न सिर्फ छाती में जमे बलगम को ढीला करके बाहर निकालते हैं, बल्कि हमारे रेस्पिरेटरी सिस्टम को भी मजबूत बनाते हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार, फेफड़ों में कफ जमा होना एक बड़ी समस्या हो सकती है, खासकर उनके लिए जिन्हें अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या COPD जैसी बीमारी है. डॉक्टरों के अनुसार, कफ शरीर को प्राकृतिक रूप से सुरक्षित करता है. यह धूल और बैक्टीरिया जैसी चीजों को फेफड़ों तक जाने से रोकता है, लेकिन जब यह कफ जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है तो यह एक परेशानी का रूप ले लेती है. ऐसे में बहुत से लोग दवाइयों के साइड इफेक्ट्स से बचने के लिए प्राकृतिक और घरेलू तरीकों को अपनाना पसंद करते हैं. वहीं ये घरेलू उपाय न सिर्फ छाती में जमे बलगम को ढीला करके बाहर निकालते हैं, बल्कि हमारे रेस्पिरेटरी सिस्टम को भी मजबूत बनाते हैं.

Published at : 06 Jun 2026 12:05 PM (IST)

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पीरियड्स पेन और PMOS से पीड़ित हैं लाखों महिलाएं, एक्सपर्ट की चेतावनी- यह कोई सामान्य बात नहीं

पीरियड्स पेन और PMOS से पीड़ित हैं लाखों महिलाएं, एक्सपर्ट की चेतावनी- यह कोई सामान्य बात नहीं


Why Period Pain Should Not Be Ignored: पीरियड्स का दर्द, पीएमओएस और बार-बार होने वाले यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन महिलाओं की उन हेल्थ समस्याओं में शामिल हैं, जिन्हें अक्सर सामान्य मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. पीढ़ियों से महिलाओं को यह समझाया जाता रहा है कि पीरियड्स में दर्द होना, पीरियड्स का अनियमित होना या यूरिन के दौरान जलन महसूस होना आम बात है. धीरे-धीरे कई महिलाएं इन परेशानियों के साथ जीना सीख लेती हैं और अपनी रूटीन तक इन्हीं लक्षणों के हिसाब से तय करने लगती हैं. लेकिन किसी समस्या का आम होना यह साबित नहीं करता कि वह सामान्य भी है. 

कई वर्षों तक पता नहीं चलता 

पिंकी प्रॉमिस की सीईओ और को- फाउंडर दिव्या बालाजी कामेरकर के अनुसार, महिलाओं की हेल्थ संबंधी परेशानियों को सामान्य मान लेने की यही सोच समय पर इलाज में सबसे बड़ी बाधा बन जाती है. उनका कहना है कि कई महिलाओं को वर्षों तक यह एहसास ही नहीं होता कि उनके शरीर में कुछ गड़बड़ है, क्योंकि आसपास के लोग भी उन्हें यही बताते रहते हैं कि ऐसा तो हर महिला के साथ होता है.

भारत में लाखों महिलाएं इससे पीड़ित

भारत में लाखों महिलाएं पीरियड्स से जुड़ी समस्याओं, पीएमओएस और यूटीआई से प्रभावित हैं. जामा नेटवर्क में प्रकाशित रिसर्च ने भारतीय महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवेरियन डिजीज के बढ़ते बोझ को रेखांकित किया है. कई नेशनल स्टडी में भी सामने आया है कि यह समस्या तेजी से बढ़ रही है और बड़ी संख्या में महिलाएं लंबे समय तक इसका इलाज नहीं करा पातीं. इसके बावजूद इन विषयों पर खुलकर बातचीत कम ही होती है. महिलाएं अक्सर दोस्तों से सलाह लेती हैं, इंटरनेट पर घरेलू उपाय खोजती हैं या फिर खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेती हैं.

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हर साल पांच में से एक महिला होती है शिकार

दिव्या बालाजी कामेरकर बताती हैं कि अनुमान के मुताबिक लगभग हर पांच में से एक महिला पीएमओएस से प्रभावित हो सकती है. वहीं यूटीआई महिलाओं के अस्पताल या क्लिनिक पहुंचने की सबसे आम वजहों में से एक है. पीरियड्स से जुड़ी समस्याएं भी लगभग हर महिला किसी न किसी स्तर पर अनुभव करती है. यही वजह है कि इन लक्षणों को अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता.

कब पीरियड्स पेन को नहीं मानना चाहिए सामान्य?

एक्सपर्ट का कहना है कि अगर पीरियड्स का दर्द इतना अधिक हो कि रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित होने लगें, तो इसे सामान्य नहीं माना जाना चाहिए. अत्यधिक ब्लीडिंग, चक्कर आना, लगातार थकान, मतली या असहनीय ऐंठन जैसी समस्याएं एंडोमेट्रियोसिस, एडेनोमायोसिस, फाइब्रॉइड्स, थायरॉयड विकार या पीएमओएस जैसी स्थितियों का संकेत हो सकती हैं. इसी तरह बार-बार होने वाला यूटीआई भी केवल एक अस्थायी परेशानी नहीं है, बल्कि यह शरीर की किसी गहरी समस्या की ओर इशारा कर सकता है. हालांकि अब टेली-कंसल्टेशन, डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन कम्युनिटी जैसी सुविधाओं ने मदद लेना पहले से आसान बना दिया है. फिर भी सबसे बड़ा बदलाव सोच में आने की जरूरत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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