फायदेमंद समझकर ज्यादा अदरक की चाय पीना पड़ न जाए भारी! आज ही जान लें ये जरूरी बातें

फायदेमंद समझकर ज्यादा अदरक की चाय पीना पड़ न जाए भारी! आज ही जान लें ये जरूरी बातें


Who Should Avoid Ginger Tea: तरुणा मिश्रा का एक शेर है कि, ‘आज फिर चाय बनाते हुए वो याद आया, आज फिर चाय में पत्ती नहीं डाली मैंने.’ ये हो गई शायर की पंक्तियां, लेकिन अगर आप चाय में पत्तियों के साथ-साथ अदरक कूट-कूटकर डाल रहे हैं या फिर ठेले पर बन रही अदरक की चाय की सुगंध से खींचे चले जा रहे हैं, तो अब सावधान होने की जरूरत है. दरअसल, अदरक की चाय आपकी तलब को शांत तो कर देती है, लेकिन आपको अस्पताल भी पहुंचा सकती है. चलिए आपको बताते हैं कि कब इससे दिक्कत होने लगती है और किन लोगों को इससे बचकर रहना चाहिए.

क्या अदरक की चाय नुकसानदायक?

कई लोगों का तो दिन ही इसकी एक कप चाय के बिना शुरू नहीं होता. इतना ही नहीं, कुछ लोग इसे सेहत के लिए इतना फायदेमंद मानते हैं कि दिन में कई बार अदरक की चाय पी जाते हैं. Healthline की रिपोर्ट के अनुसार, हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, एक दिन में करीब 4 ग्राम से ज्यादा अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए. सामान्य तौर पर चाय के जरिए इतनी मात्रा तक पहुंचना आसान नहीं होता, लेकिन अगर आप दिनभर अदरक वाली चाय, काढ़ा और अदरक से बनी दूसरी चीजें लेते रहते हैं, तो कुल मात्रा बढ़ सकती है.

क्या होती है इससे दिक्कत?

कुछ लोगों को अदरक की चाय पीने के बाद सीने में जलन, एसिडिटी या पेट में हल्की जलन महसूस हो सकती है. कई बार लोग इसे अदरक से एलर्जी समझ लेते हैं, जबकि यह सिर्फ मसालेदार चीजों की तरह होने वाली सामान्य जलन भी हो सकती है. हालांकि अगर चाय पीने के बाद मुंह या शरीर पर चकत्ते पड़ने लगें, खुजली हो या पेट में तेज परेशानी महसूस हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.

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किन लोगों को होती है इससे दिक्कत?

अगर आपको पहले से पित्त की थैली यानी गॉलब्लैडर से जुड़ी कोई समस्या है, तो अदरक की चाय को नियमित रूप से पीने से पहले डॉक्टर से राय लेना बेहतर माना जाता है. वहीं अदरक ब्लड प्रेशर को थोड़ा कम करने में भी मदद कर सकता है. ऐसे में जिन लोगों का ब्लड प्रेशर पहले से कम रहता है या जो ब्लड प्रेशर की दवा ले रहे हैं, उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए. अदरक में ऐसे प्राकृतिक तत्व भी पाए जाते हैं, जो खून को थोड़ा पतला करने का असर दिखा सकते हैं. इसलिए जिन लोगों को ब्लीडिंग डिसऑर्डर है या जो ब्लड थिनर दवाएं लेते हैं, उन्हें भी बिना डॉक्टर की सलाह के जरूरत से ज्यादा अदरक का सेवन नहीं करना चाहिए.

सिर्फ नुकसानदायक नहीं फायदेमंद भी

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अदरक की चाय नुकसान ही करती है. सही मात्रा में इसका सेवन कई लोगों के लिए फायदेमंद भी हो सकता है. रिसर्च बताती हैं कि यह मतली, उल्टी, अपच और पेट खराब होने जैसी समस्याओं में राहत पहुंचाने में मदद कर सकती है. कुछ लोगों को सर्जरी या कीमोथेरेपी के बाद होने वाली मतली में भी इससे फायदा मिलता है. इसके अलावा अदरक में मौजूद जिंजरोल नाम का तत्व शरीर में सूजन कम करने में मदद कर सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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अब छोटे क्लिनिक और OPD भी होंगे डिजिटल, सरकार लाई Cloud-Based हॉस्पिटल मैनेजमेंट सिस्टम

अब छोटे क्लिनिक और OPD भी होंगे डिजिटल, सरकार लाई Cloud-Based हॉस्पिटल मैनेजमेंट सिस्टम


Cloud-Based Hospital Management System: देश में लाखों छोटे क्लिनिक और डॉक्टर आज भी रजिस्टर और कागज़ी रिकॉर्ड पर निर्भर हैं. इसी को बदलने के लिए सरकार एक ऐसा क्लाउड आधारित सिस्टम लेकर आई है, जिससे ये छोटे क्लिनिक भी आसानी से डिजिटल हो सकेंगे. आज इस सिस्टम से जुड़े एक प्लेटफॉर्म को लॉन्च किया जिसका नाम है eSushrut@Clinic.

यह एक क्लाउड पर चलने वाला Hospital Management Information System यानी HMIS है. इसे खासतौर पर छोटे OPD क्लिनिक की जरूरत को ध्यान में रखकर बनाया गया है. सरकार की योजना इसे सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटर हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर सब-सेंटर और प्राइवेट क्लिनिक सभी के लिए खोलने की है.

कहां आ रही थी दिक्कत? 

अभी तक जो बड़े HMIS सॉफ्टवेयर बाजार में हैं वो छोटे क्लिनिक के लिए महंगे और काफी जटिल साबित होते रहे हैं. यही वजह है कि डिजिटल हेल्थ की दौड़ में छोटे क्लिनिक पीछे रह जाते थे और ज्यादातर अब भी हाथ से लिखे रिकॉर्ड पर ही काम चला रहे थे. काफी समय से एक ऐसे सरकारी और सस्ते HMIS की मांग उठ रही थी जो छोटी जगहों के लिए हो. कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने भी अपनी सरकारी हेल्थ फैसिलिटी के लिए ऐसे हल्के HMIS में दिलचस्पी दिखाई थी.

क्या-क्या कर सकेगा यह सिस्टम?

इस प्लेटफॉर्म से क्लिनिक के रोजमर्रा के काम अपने आप होने लगेंगे. इसमें मरीज का रजिस्ट्रेशन बिलिंग और MIS रिपोर्टिंग जैसी सुविधाएं हैं. साथ ही speech-to-text की सुविधा भी है, यानी डॉक्टर बोलकर भी जानकारी दर्ज करा सकेंगे. इसमें Clinical Decision Support System भी दिया गया है जो इलाज से जुड़े फैसलों में डॉक्टर की मदद करेगा और गलती की गुंजाइश घटाएगा.

खास बात यह है कि इसे चलाने के लिए ज्यादा टेक्निकल जानकारी की जरूरत नहीं पड़ेगी और इसे किसी भी डिवाइस से एक्सेस किया जा सकेगा. इसमें कोई जटिल सेटअप नहीं लगाना पड़ेगा. यह सिस्टम Ayushman Bharat Digital Mission यानी ABDM के नए फीचर्स से भी जुड़ा है जिसमें Find ABHA Scan & Share और CDSS जैसी सुविधाएं शामिल हैं.

कौन इस्तेमाल कर सकेगा?

इस प्लेटफॉर्म से जुड़ने के लिए Health Professional Registry यानी HPR और Health Facility Registry यानी HFR का हिस्सा होना जरूरी है. जो डॉक्टर HPR में रजिस्टर्ड नहीं हैं वो इसका इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. इससे यह पक्का होगा कि सिर्फ असली और प्रमाणित डॉक्टर ही इस सिस्टम को चला सकें.

कितनी होगी कीमत?

यह सॉफ्टवेयर पांच यूजर तक के लिए 499 रुपये प्रति माह की दर पर मिलेगा. NHA के साथ समझौते के तहत इस पर 200 रुपये की छूट मिलेगी, जिसके बाद असल में हर महीने सिर्फ 299 रुपये देने होंगे. शुरुआती तीन महीने के लिए यह सॉफ्टवेयर बिल्कुल मुफ्त रहेगा. अगर कोई क्लिनिक पांच से ज्यादा यूजर जोड़ना चाहे तो हर अतिरिक्त यूजर के लिए 50 रुपये देने होंगे.

NHA और C-DAC का समझौता

डिजिटल हेल्थ और ABDM को बढ़ावा देने के लिए National Health Authority यानी NHA ने C-DAC के साथ एक समझौता किया है. इसके मुताबिक सॉफ्टवेयर की देखरेख और अपडेट का काम C-DAC संभालेगा जबकि NHA सहूलियत और आर्थिक मदद देगा. मरीजों को ABDM से जुड़े SMS भेजने और क्लाउड होस्टिंग का खर्च NHA उठाएगा. ग्राहकों को शुरुआती मदद देने के लिए NHA अपनी कॉल सेंटर सेवा भी देगा जबकि कॉल सेंटर कर्मचारियों की ट्रेनिंग और क्वालिटी ऑडिट C-DAC करेगा.

अब तक कितने क्लिनिक जुड़े

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक 800 से ज्यादा हेल्थ फैसिलिटी eSushrut@Clinic से जुड़ चुकी हैं और इन पर 680 से ज्यादा हेल्थ रिकॉर्ड बन चुके हैं. इसके अलावा C-DAC का पूरा eSushrut सॉफ्टवेयर देश के 15 से ज्यादा AIIMS और कई राज्य सरकार के अस्पतालों में पहले से चल रहा है.

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WhatsApp पर मिलेगा आयुष्मान भारत का पूरा सिस्टम, सरकार ने लॉन्च किया ‘आयुष्मान सारथी’ AI चैटबॉट

WhatsApp पर मिलेगा आयुष्मान भारत का पूरा सिस्टम, सरकार ने लॉन्च किया ‘आयुष्मान सारथी’ AI चैटबॉट


आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना PM-JAY से जुड़ी सेवाओं को और आसान बनाने के लिए केंद्र सरकार ने ‘आयुष्मान सारथी’ नाम से आधिकारिक WhatsApp चैटबॉट लॉन्च किया है. सरकार का कहना है कि अब लाभार्थियों को कई जरूरी सेवाओं के लिए सरकारी दफ्तर या कॉल सेंटर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. वे सीधे WhatsApp के जरिए 24 घंटे सेवाओं का लाभ उठा सकेंगे.

WhatsApp पर मिलेंगी कई जरूरी सेवाएं

आयुष्मान सारथी के जरिए लाभार्थी PM-JAY के तहत अपनी पात्रता जांच सकेंगे. नया आयुष्मान कार्ड बनवाने के लिए आवेदन कर सकेंगे. कार्ड डाउनलोड कर सकेंगे और eKYC दोबारा कर सकेंगे. इसके अलावा आधार लिंक करना, कार्ड लॉक या अनलॉक करना, इलाज का रिकॉर्ड देखना, वॉलेट बैलेंस चेक करना आसान होगा. वहीं, 70 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए आयुष्मान वय वंदना कार्ड से जुड़ी सेवाएं भी इसी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगी.

अस्पताल खोजने से लेकर शिकायत दर्ज करने तक की सुविधा

चैटबॉट सिर्फ जानकारी देने तक सीमित नहीं है. इसके जरिए लाभार्थी अपने नजदीकी पैनल वाले अस्पताल खोज सकते हैं. शिकायत दर्ज कर सकते हैं. शिकायत की स्थिति ट्रैक कर सकते हैं या जरूरत पड़ने पर उसे वापस भी ले सकते हैं. इसके अलावा कॉल बैक की सुविधा और अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद फीडबैक देने का विकल्प भी मिलेगा.

सरकार का दावा- सेवा होगी तेज और पारदर्शी

स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, आयुष्मान सारथी सुरक्षित API आधारित सिस्टम पर काम करता है और सीधे PM-JAY प्लेटफॉर्म से जुड़ा है. इससे लाभार्थियों को रियल-टाइम जानकारी मिलेगी, सेवा वितरण तेज होगा और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की जरूरत कम पड़ेगी. मंत्रालय का मानना है कि इससे शिकायत निवारण और सेवा की निगरानी भी बेहतर होगी.

कैसे करें इस्तेमाल?

आयुष्मान सारथी का इस्तेमाल करना बेहद आसान है. लाभार्थी WhatsApp नंबर +91 72908 23838 पर “HI” भेजकर चैटबॉट शुरू कर सकते हैं या सरकार की ओर से जारी QR कोड स्कैन कर सकते हैं. इसके बाद उन्हें सभी उपलब्ध सेवाओं के विकल्प WhatsApp पर ही मिल जाएंगे.

क्यों है अहम यह पहल?

आयुष्मान भारत दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में से एक है, जिससे करोड़ों लोग जुड़े हैं. ऐसे में WhatsApp जैसे व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले प्लेटफॉर्म पर सेवाएं उपलब्ध होने से लाभार्थियों के लिए योजना का उपयोग पहले से कहीं अधिक आसान, तेज और सुविधाजनक होने की उम्मीद है. खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों और डिजिटल सेवाओं का सीमित अनुभव रखने वाले लोगों को इसका सीधा फायदा मिल सकता है.

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मर्दों के बजाय महिलाओं को ज्यादा क्यों होती है थायराइड की समस्या, जानें इसके पीछे की वजह?

मर्दों के बजाय महिलाओं को ज्यादा क्यों होती है थायराइड की समस्या, जानें इसके पीछे की वजह?


Why Women Get Thyroid Problems: अगर किसी घर में एक ही बीमारी की बात सबसे ज्यादा सुनने को मिलती है, तो वह थायराइड है और हैरानी की बात यह है कि इसके मरीजों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा होती है. कई बार लोग इसे सिर्फ बढ़ते वजन या कमजोरी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन सच यह है कि थायराइड शरीर के कई जरूरी कामों को प्रभावित करता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में थायराइड की समस्या ज्यादा क्यों होती है? इसके पीछे सिर्फ एक नहीं, बल्कि कई जैविक और हार्मोनल कारण जिम्मेदार माने जाते हैं.

महिलाओं में क्यों होती है यह दिक्कत ज्यादा?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली cadabamsdiagnostics के अनुसार, अपने जीवनकाल में हर आठ में से एक महिला को कभी न कभी थायराइड की समस्या हो सकती है. महिलाओं में यह बीमारी होने का खतरा पुरुषों की तुलना में करीब पांच से आठ गुना ज्यादा माना जाता है. उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम भी बढ़ता जाता है और कई मामलों में इसके लक्षण लंबे समय तक पहचान में नहीं आते. दरअसल, थायराइड गर्दन में मौजूद तितली के आकार की एक ग्रंथि होती है, जो शरीर के मेटाबॉलिज्म, ऊर्जा और विकास को नियंत्रित करने वाले हार्मोन बनाती है. जब यह ग्रंथि जरूरत से कम या ज्यादा हार्मोन बनाने लगती है, तब हाइपोथायराइडिज्म या हाइपरथायराइडिज्म जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं.

क्या होते हैं इसके पीछे के कारण?

महिलाओं में थायराइड की समस्या ज्यादा होने की सबसे बड़ी वजह हार्मोनल बदलाव और ऑटोइम्यून बीमारियां मानी जाती हैं. महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन और इम्यून सिस्टम पुरुषों से अलग होती है. यही कारण है कि ऑटोइम्यून बीमारियां महिलाओं में अधिक देखने को मिलती हैं. ऐसी स्थिति में शरीर की इम्यून सिस्टम गलती से थायराइड ग्रंथि पर ही हमला करने लगती है, जिससे हाशिमोटो थायरॉयडाइटिस और ग्रेव्स डिजीज जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

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महिलाओं के लाइफ में किन फेस में होते हैं ये बदलाव?

महिलाओं के जीवन के कुछ खास पड़ाव भी थायराइड के जोखिम को बढ़ा देते हैं. गर्भावस्था, डिलीवरी के बाद का समय और  मेनोपॉज के दौरान शरीर में हार्मोन तेजी से बदलते हैं. इन बदलावों का असर थायराइड ग्रंथि पर भी पड़ सकता है. यही वजह है कि इन चरणों में महिलाओं को नियमित जांच कराने की सलाह दी जाती है. थायराइड का असर सिर्फ वजन या थकान तक सीमित नहीं रहता. यह पीरियड्स को अनियमित कर सकता है, गर्भधारण में दिक्कत पैदा कर सकता है और गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है. वहीं बढ़ती उम्र में इसके लक्षण कई बार मेनोपॉज जैसे लगते हैं, जिससे बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है.

किन लक्षणों को नहीं करना चाहिए इग्नोर?

अगर बिना किसी वजह के लगातार थकान महसूस हो, अचानक वजन बढ़ने या घटने लगे, बाल झड़ने लगें, त्वचा रूखी हो जाए, मूड बार-बार बदलने लगे या गर्दन में सूजन दिखाई दे, तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. ऐसे लक्षण दिखने पर डॉक्टर से सलाह लेकर टीएसएच, टी3 और टी4 जैसे जरूरी ब्लड टेस्ट कराना बेहतर रहता है. समय पर जांच और सही इलाज से थायराइड को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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एनीमिया मुक्त कैसे होगा भारत? सरकार ने बदला पूरा मॉडल, अब डिजिटल ट्रैकिंग से होगा इलाज

एनीमिया मुक्त कैसे होगा भारत? सरकार ने बदला पूरा मॉडल, अब डिजिटल ट्रैकिंग से होगा इलाज


How India Plans to Become Anemia Free: भारत में एनीमिया आज भी सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है. इसका असर सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि गर्भवती महिलाओं, बच्चों और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. यही वजह है कि अब केंद्र सरकार ने देश को एनीमिया मुक्त बनाने के लिए अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. सरकार का मानना है कि सिर्फ आयरन की गोलियां बांटने से इस समस्या पर पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सकता. इसलिए अब जांच, इलाज, सही खानपान और डिजिटल निगरानी को भी अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया है.

नई गाइडलाइन जारी किया गया

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने एनीमिया मुक्त भारत अभियान के संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं. नई गाइडलाइन के तहत अब पुराने 6x6x6 मॉडल की जगह 7x7x7 रणनीति लागू की जाएगी. इसका उद्देश्य एनीमिया की समय रहते पहचान करना, इलाज सुनिश्चित करना और मरीजों की लगातार निगरानी करना है. इस नई रणनीति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पहली बार कम वजन वाले नवजात शिशुओं (0 से 6 महीने) को भी अभियान में शामिल किया गया है. सरकार का मानना है कि अगर जीवन की शुरुआत से ही एनीमिया की रोकथाम पर काम किया जाए, तो आगे चलकर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

इन चीजों को जोड़ा गया

सरकार ने अभियान में ‘ईटिंग राइट’ पहल को भी जोड़ा है. इसके तहत लोगों को आयरन से भरपूर और संतुलित भोजन को अपनी रोजमर्रा की आदत बनाने के लिए जागरूक किया जाएगा. सिर्फ दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय पोषण के जरिए एनीमिया को रोकने पर भी बराबर जोर दिया जाएगा. नई गाइडलाइन में पहले अपनाए जा रहे टी3 मॉडल टेस्ट, ट्रीट और टॉक को अब टी4 मॉडल में बदल दिया गया है. इसमें ‘ट्रैक’ को भी शामिल किया गया है. यानी किसी व्यक्ति में एनीमिया मिलने के बाद सिर्फ इलाज ही नहीं होगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि इलाज का असर हो रहा है या नहीं और जरूरत पड़ने पर आगे की चिकित्सा समय पर मिल रही है या नहीं.

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जिन पर दवाओं का असर नहीं होता उनके लिए क्या?

गर्भवती और स्तनपान कराने वाली उन महिलाओं के लिए, जिन्हें गंभीर एनीमिया है या जिन पर आयरन की गोलियों का असर नहीं होता, अब नस के जरिए आयरन देने की व्यवस्था भी राष्ट्रीय उपचार प्रोटोकॉल का हिस्सा होगी. इसके लिए फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज और आयरन सुक्रोज जैसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाएगा. अभियान को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए डिजिटल सिस्टम भी तैयार किया गया है. गर्भवती महिलाओं की हीमोग्लोबिन जांच का रिकॉर्ड जननी पोर्टल पर दर्ज होगा, जबकि बच्चों की जानकारी राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम औरयू-विन पोर्टल पर अपलोड की जाएगी. बाद में इन सभी प्लेटफॉर्म को एकीकृत एनीमिया मुक्त भारत पोर्टल से जोड़ा जाएगा. इससे सरकार को यह पता लगाने में आसानी होगी कि किस क्षेत्र में एनीमिया की स्थिति कैसी है और किन लोगों तक इलाज या पोषण सेवाएं अभी भी नहीं पहुंच पाई हैं.

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मामूली सिरदर्द कब बन जाता है गंभीर खतरा? डॉक्टर से जानें ब्रेन ट्यूमर के छिपे हुए लक्षण

मामूली सिरदर्द कब बन जाता है गंभीर खतरा? डॉक्टर से जानें ब्रेन ट्यूमर के छिपे हुए लक्षण


Early Warning Signs Of Brain Tumor: सिरदर्द एक ऐसी समस्या है जिससे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी परेशान होता है. ज्यादातर मामलों में इसकी वजह तनाव, नींद की कमी, डिहाइड्रेशन, लंबे समय तक स्क्रीन देखने या थकान जैसी सामान्य स्थितियां होती हैं. थोड़ा आराम, पर्याप्त पानी और जरूरत पड़ने पर दवा लेने से यह ठीक भी हो जाता है. लेकिन जब सिरदर्द बार-बार लौटने लगे, पहले से अलग महसूस हो या इसके साथ कुछ असामान्य लक्षण दिखाई दें, तब इसे नजरअंदाज करना सही नहीं है. 

इस गंभीर बीमारी के हो सकते हैं लक्षण

अक्सर लोग मानते हैं कि ब्रेन ट्यूमर का पहला संकेत असहनीय सिरदर्द होता है, लेकिन हकीकत इससे अलग है. कई बार शुरुआती लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि लोग उन्हें तनाव, बढ़ती उम्र या काम के दबाव का असर समझ लेते हैं. यही वजह है कि बीमारी का पता लगने में देरी हो जाती है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक के अनुसार, ब्रेन ट्यूमर के लक्षण उसके आकार, स्थान और बढ़ने की गति पर निर्भर करते हैं. सिरदर्द के अलावा याददाश्त में बदलाव, नजर कमजोर होना, व्यवहार में परिवर्तन, दौरे पड़ना और संतुलन बिगड़ना भी इसके संकेत हो सकते हैं. 

कैसे होती है ब्रेन ट्यूमर की शुरुआत?

डॉ. उज्ज्वल येओले ने TOI को बताया कि यह एक बड़ा भ्रम है कि ब्रेन ट्यूमर हमेशा सिरदर्द से ही शुरू होता है. कई मरीजों में शुरुआत में याददाश्त कमजोर होने लगती है, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी होती है या व्यवहार में बदलाव दिखाई देता है. कुछ लोगों को बोलने में कठिनाई होने लगती है, जबकि कुछ की नजर धुंधली होने लगती है. चूंकि दिमाग का हर हिस्सा अलग-अलग कार्यों को कंट्रोल करता है, इसलिए ट्यूमर का असर भी उसी के अनुसार दिखाई देता है.

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कब आपको डॉक्टर के पास जाना चाहिए?

डॉ. उज्ज्वल येओले के मुताबिक, हर सिरदर्द चिंता की बात नहीं है, लेकिन अगर दर्द लगातार बढ़ रहा हो, बार-बार हो रहा हो, नींद से जगा दे या पहले के मुकाबले अलग महसूस हो तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. खासतौर पर अगर इसके साथ उल्टी, धुंधला दिखना, कमजोरी, भ्रम या अन्य न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी मौजूद हों तो जांच करवाना जरूरी हो जाता है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक की रिसर्च भी बताती है कि गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जुड़े सिरदर्द समय के साथ बढ़ सकते हैं और उनके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

ब्रेन ट्यूमर के कुछ संकेत ऐसे होते हैं जिन्हें परिवार के लोग मरीज से पहले पहचान लेते हैं. अचानक चिड़चिड़ापन बढ़ना, बात करने के तरीके में बदलाव, सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाना या बार-बार चीजें भूलना ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन्हें अक्सर लोग मानसिक तनाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. इसी तरह धुंधला या डबल दिखना, चलते समय संतुलन बिगड़ना, हाथ-पैरों में कमजोरी महसूस होना या सही शब्द खोजने में परेशानी होना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं. ब्रेन ट्यूमर को पूरी तरह रोकने का कोई निश्चित तरीका फिलहाल मौजूद नहीं है. हालांकि समय रहते लक्षणों को पहचानना और जांच करवाना सबसे अहम कदम है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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