यूरिक एसिड vs क्रिएटिनिन…किडनी की हेल्थ के दो अहम संकेत, जिन्हें समझना है जरूरी 

यूरिक एसिड vs क्रिएटिनिन…किडनी की हेल्थ के दो अहम संकेत, जिन्हें समझना है जरूरी 


Kidney Health: आजकल लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं. वे समय-समय पर कई तरह के टेस्ट भी करवाते हैं, जिससे उन्हें अपनी हेल्थ को लेकर अपडेट मिलता है रहे और बीमारियों का सही समय पर इलाज हो सके. हालांकि, जब बॉडी चेकअप की रिपोर्ट हाथ में आती है तो कई भारी-भरकम शब्दों को समझना आसान नहीं होता. खासकर यूरिक एसिड और क्रिएटिनिन जैसे नाम लोगों को कंफ्यूज कर देते हैं. कई लोग सोचते हैं कि ये दोनों एक ही चीज बताते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि ये दोनों शरीर की अलग-अलग स्थितियों के बारे में जानकारी देते हैं.

डॉक्टर्स के अनुसार, जब हम किसी व्यक्ति की लैब रिपोर्ट देखते हैं तो यूरिक एसिड और क्रिएटिनिन जैसे नाम अक्सर साथ में दिखाई देते हैं. दो शब्द किडनी से जुड़े होते हैं, लेकिन ये आपकी सेहत के बारे में दो बिल्कुल अलग कहानियां बताते हैं. ऐसे में इनकी सही जानकारी होना काफी आवश्यक हो जाता है. 

क्रिएटिनिनः किडनी के काम करने की जांच 

क्रिएटिनिन एक वेस्ट प्रोडक्ट होता है, जो तब बनता है जब हमारी मांसपेशियों ऊर्जा का प्रयोग करती हैं. शरीर इसे हर दिन लगभग एक समान मात्रा में बनाता है. स्वस्थ किडनी इसे खून से फिल्टर करके पेशाब के जरिए बाहर निकाल देती है. यही वजह है कि डॉक्टर क्रिएटिनिन के स्तर को किडनी की कार्यक्षमता मापने का एक भरोसेमंद संकेत मानते हैं. इसे आसान शब्दों में बताएं तो क्रिएटिनिन को किडनी का ‘स्पीडोमीटर’ समझें. यह मांसपेशियों के टूटने से बनने वाला वेस्ट प्रोडक्ट है, जिसे स्वस्थ किडनी एक स्थिर दर से बाहर निकालती है. वहीं, अगर क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ जाता है तो यह अक्सर संकेत देता है कि किडनी ठीक से काम नहीं कर रही है, जिससे डिहाइड्रेशन या किडनी से जुड़ी बीमारी के कारण हो सकते है. 

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यूरिक एसिडः मेटाबॉलिज्म को समझने का एक तरीका 

वहीं दूसरी ओर, यूरिक एसिड शरीर में प्यूरीन नामक तत्व के टूटने से बनता है. प्यूरीन हमें कई खाद्य पदार्थों से मिलता है, जैसे- रेड मीट, सी-फूड, शराब और यहां तक कि कुछ हेल्दी फूड्स जैसे दालों में. यूरिक एसिड का स्तर डाइट, लाइफस्टाइल और मेटाबॉलिज्म के अनुसार बदलता रहता है. डॉ. अंकुर सिंघल बताते हैं कि यूरिक एसिड एक “मेटाबॉलिक मैसेंजर” की तरह काम करता है. यह तब बनता है जब आपका शरीर कुछ खास खाने-पीने की चीजों में मौजूद प्यूरीन को तोड़ता है. अगर यूरिक एसिड का स्तर ज्यादा हो जाए तो हमेशा किडनी की समस्या नहीं होती, बल्कि यह अक्सर आपकी लाइफस्टाइल की आदतों की ओर इशारा करता है. जैसे कम पानी पीना, ज्यादा शुगर लेना या मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याएं इसका कारण बन सकती हैं. 

तो अक्सर लोग कन्फ्यूज क्यों हो जाते हैं?

अगर दोनों की तुलना करें तो क्रिएटिनिन एक आसान सवाल का जवाब देता है कि क्या किडनी खून को सही तरीके से फिल्टर कर रही है? वहीं यूरिक एसिड एक थोड़ा बड़ा सवाल पूछता है कि शरीर मेटाबॉलिज्म और खाने-पीने से बनने वाले वेस्ट को कैसे संभाल रहा है? यानी क्रिएटिनिन से किडनी की स्थिति का पता चलता है और यूरिक एसिड से हमारी आदतों का. डॉक्टरों का कहना है कि इन दोनों रिपोर्ट्स को हमेशा साथ में समझना चाहिए, सिर्फ एक को देखकर निष्कर्ष निकालना सही नहीं होता. कई बार दोनों का स्तर एक साथ बढ़ जाता है जो किडनी से जुड़ी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है.

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इस देश में खसरे से 100 से ज्यादा बच्चों की मौत, जानें कैसे फैलती है यह बीमारी?

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Why Measles Is Dangerous For Children: बांग्लादेश में खसरे के खतरनाक प्रकोप ने गंभीर रूप ले लिया है, जहां एक महीने से भी कम समय में 100 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है. हालात को देखते हुए सरकार ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन अभियान शुरू किया है, ताकि इस तेजी से फैल रही बीमारी पर काबू पाया जा सके. चलिए आपको बताते हैं कि इसको रोकने के लिए क्या किया जा रहा है. 

टीकाकरण अभियान लॉन्च 

5 अप्रैल को बांग्लादेश सरकार ने यूनिसेफ,वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और गावी, द वैक्सीन एलायंस के साथ मिलकर एक इमरजेंसी खसरा-रूबेला टीकाकरण अभियान लॉन्च किया. इस अभियान का लक्ष्य उन 12 लाख से ज्यादा बच्चों को सुरक्षा देना है, जिन्हें अब तक टीका नहीं लग पाया है और जो इंफेक्शन के उच्च जोखिम में हैं. बांग्लादेश के स्वास्थ्य मंत्री सरदार मोहम्मद सखावत हुसैन ने बताया कि मौजूदा हालात को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने तेजी से कदम उठाए हैं और स्थिति पर नजर रखी जा रही है.

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कैसे फैलती है यह बीमारी?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, खसरा एक बेहद इंफेक्शन वायरस से होने वाली बीमारी है, जो हवा के जरिए फैलती है और गंभीर दिक्कतों के साथ मौत का कारण भी बन सकती है. मार्च से अब तक 900 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं, जिससे हेल्थ सिस्टम पर दबाव बढ़ गया है. फिलहाल यह अभियान छह महीने से लेकर पांच साल तक के बच्चों पर केंद्रित है, खासकर उन जिलों में जहां संक्रमण का खतरा ज्यादा है। बाद में इसे पूरे देश में विस्तार देने की योजना है. 

बांग्लादेश में यूनिसेफ की प्रतिनिधि ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा के लिए टीकाकरण बेहद जरूरी है. उन्होंने बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए कहा कि सबसे ज्यादा खतरा छोटे और कमजोर बच्चों को है. उन्होंने यह भी बताया कि कई बच्चे ऐसे हैं जिन्हें अब तक कोई वैक्सीन नहीं मिली या अधूरी टीकाकरण हुआ है. वहीं, नौ महीने से कम उम्र के शिशु, जो अभी नियमित टीकाकरण के योग्य नहीं होते, उनमें इंफेक्शन का खतरा और ज्यादा है.

साबित हो सकता है जानलेवा

एक्सपर्ट ने इस स्थिति को लेकर चेतावनी दी है कि अगर समय रहते टीकाकरण नहीं हुआ, तो खसरा तेजी से जानलेवा बन सकता है. राजधानी ढाका के संक्रामक रोग अस्पताल की उप-निदेशक ने अभिभावकों से अपील की है कि बच्चों में तेज बुखार या खसरे के लक्षण दिखते ही तुरंत अस्पताल ले जाएं और बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न लें. फिलहाल सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियां मिलकर इस प्रकोप को कंट्रोल करने की कोशिश कर रही हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लंग कैंसर और मांसपेशियों की कमजोरी का एक साथ होगा इलाज, वैज्ञानिकों ने खोजी नई तकनीक

लंग कैंसर और मांसपेशियों की कमजोरी का एक साथ होगा इलाज, वैज्ञानिकों ने खोजी नई तकनीक


Can mRNA Therapy Treat Lung Cancer And Muscle Loss: अमेरिका केओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो लंग्स के कैंसर और उससे जुड़ी एक गंभीर मांसपेशी क्षय बीमारी कैशेक्सिया का एक साथ इलाज करने की क्षमता रखती है.  यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल जर्नल ऑफ कंट्रोल्ड रिलीज में प्रकाशित हुआ है और इसमें लिपिड नैनोपार्टिकल्स के जरिए जेनेटिक मैटेरियल को सीधे ट्यूमर तक पहुंचाने की नई रणनीति अपनाई गई है.

कैसे इसको तैयार किया गया?

इस तकनीक में वैज्ञानिकों ने खास तरह के नैनोकैरियर तैयार किए हैं, जिनमें फोलिस्टैटिन मैसेंजर RNA (mRNA) भरा गया है. जब ये नैनोपार्टिकल्स शरीर में पहुंचते हैं, तो यह mRNA सेल्स को फोलिस्टैटिन प्रोटीन बनाने के लिए प्रेरित करता है. यह प्रोटीन एक तरफ ट्यूमर की वृद्धि को रोकने में मदद करता है, वहीं दूसरी ओर मांसपेशियों के विकास को भी बढ़ावा देता है.  रिसर्च टीम ने पाया कि ये लिपिड नैनोपार्टिकल्स खून में मौजूद विट्रोनेक्टिन नामक प्रोटीन से जुड़ जाते हैं. यही प्रोटीन इन्हें सीधे लंग्स के कैंसर वाले ट्यूमर तक पहुंचाने में मदद करता है. ट्यूमर की सतह पर मौजूद इंटीग्रिन रिसेप्टर्स के साथ इंटरैक्शन के जरिए ये नैनोपार्टिकल्स सही जगह पर जमा हो जाते हैं.

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क्या कहते हैं साइंटिस्ट?

वैज्ञानिकों के अनुसार, शरीर में mRNA आधारित दवाओं को सीधे फेफड़ों के ट्यूमर तक पहुंचाना अब तक एक बड़ी चुनौती रहा है. लेकिन इस नई तकनीक ने इस समस्या का संभावित समाधान पेश किया है. पारंपरिक नैनोपार्टिकल्स अक्सर शरीर में जाकर लिवर में जमा हो जाते हैं, जबकि इस नई विधि से ट्यूमर के आकार में करीब 2.5 गुना ज्यादा कमी देखी गई. लंग्स का कैंसर दुनिया भर में सबसे घातक कैंसरों में से एक माना जाता है. इसके साथ अक्सर कैशेक्सिया नाम की स्थिति भी जुड़ी होती है, जिसमें मरीज का वजन तेजी से घटता है और मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, चाहे वह पर्याप्त भोजन ही क्यों न ले रहा हो. यह स्थिति कैंसर मरीजों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है.

क्या कोई साइड इफेक्ट भी है?

इस नई थेरेपी की खास बात यह है कि यह एक साथ दो समस्याओं, कैंसर और मांसपेशी क्षय पर असर डालती है और शुरुआती परीक्षणों में इसके कोई गंभीर साइड इफेक्ट्स सामने नहीं आए हैं. हालांकि, साइंटिस्ट का कहना है कि अभी इस तकनीक पर और प्री-क्लिनिकल रिसर्च की जरूरत है, लेकिन शुरुआती नतीजे काफी उत्साहजनक हैं. उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में इस थेरेपी का मानवों पर परीक्षण किया जा सकेगा और यह कैंसर के इलाज में एक बड़ा बदलाव ला सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लगातार खांसी को न समझें मामूली जुकाम, आपके कमजोर दिल की हो सकती है बड़ी चेतावनी

लगातार खांसी को न समझें मामूली जुकाम, आपके कमजोर दिल की हो सकती है बड़ी चेतावनी


Can A Cough Be A Sign Of Heart Failure: हार्ट की बीमारी की बात आते ही ज्यादातर लोग सीने में दर्द या सांस फूलने जैसे लक्षणों के बारे में सोचते हैं. लेकिन एक लगातार बनी रहने वाली खांसी भी दिल से जुड़ी गंभीर समस्या का संकेत हो सकती है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, खासकर कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर से जूझ रहे मरीजों में खांसी एक अहम लक्षण के रूप में सामने आ सकती है. 

कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर क्या होता है?

हेल्थ और साइंस के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट knowridge की रिपोर्ट के अनुसार, कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर वह स्थिति है, जब दिल शरीर में खून को ठीक से पंप नहीं कर पाता. ऐसे में दिल कमजोर या सख्त हो जाता है और ब्लड फ्लो प्रभावित होने लगता है.  इसका असर यह होता है कि शरीर के अलग-अलग हिस्सों में तरल पदार्थ जमा होने लगता है, खासकर फेफड़ों में.  यही जमा हुआ फ्लूइड खांसी की मुख्य वजह बनता है.

सांस और खांसी की दिक्कत

दरअसल, दिल और फेफड़े एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं.  फेफड़े शरीर को ऑक्सीजन देते हैं और दिल उस ऑक्सीजन युक्त खून को पूरे शरीर में पहुंचाता है. जब दिल ठीक से काम नहीं करता, तो यह संतुलन बिगड़ जाता है. ऐसे में फेफड़ों में तरल भरने लगता है, जिसे पल्मोनरी कंजेशन कहा जाता है. इससे सांस लेने में दिक्कत होती है और खांसी शुरू हो जाती है. इस तरह की खांसी की कुछ खास पहचान भी होती है. शुरुआत में यह सूखी हो सकती है, लेकिन कई बार इसमें बलगम भी आ सकता है. अगर बलगम सफेद या गुलाबी रंग का दिखे, तो यह फेफड़ों में फ्लूइड जमा होने का संकेत हो सकता है और ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी होता है. 

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क्या होती है वजह?

कई मरीज बताते हैं कि यह खांसी रात में या लेटने पर ज्यादा बढ़ जाती है. इसकी वजह ग्रेविटी है. जब व्यक्ति खड़ा या बैठा होता है, तो तरल शरीर के निचले हिस्सों में रहता है, लेकिन लेटने पर यह छाती और फेफड़ों की ओर आ जाता है, जिससे सांस और खांसी की समस्या बढ़ जाती है. अक्सर लोग इस खांसी को सर्दी-खांसी या लंग्स की समस्या समझ लेते हैं, जबकि असल में यह दिल से जुड़ी बीमारी का संकेत हो सकता है. इसलिए अगर खांसी लंबे समय तक बनी रहे या इसके साथ सांस फूलना, थकान, पैरों या टखनों में सूजन जैसे लक्षण भी दिखें, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट का कहना है कि समय रहते पहचान और इलाज से इस बीमारी को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है. इलाज में डाइयुरेटिक्स जैसी दवाएं दी जाती हैं, जो शरीर से अतिरिक्त तरल को बाहर निकालने में मदद करती हैं, जिससे फेफड़ों में जमा पानी कम होता है और खांसी व सांस की समस्या में राहत मिलती है. इसके साथ ही, लाइफस्टाइल में बदलाव भी जरूरी है. नमक का सेवन कम करना, नियमित व्यायाम करना, तनाव को कंट्रोल रखना और वजन संतुलित रखना दिल की सेहत के लिए फायदेमंद होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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छोटे बच्चों की खांसी हो सकती है इस खतरनाक बीमारी का संकेत

छोटे बच्चों की खांसी हो सकती है इस खतरनाक बीमारी का संकेत


Health: अक्सर माता-पिता बच्चों की खांसी को सामान्य सर्दी-जुकाम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं.  और इससे मामूली खांसी समझ कर घरेलु नुख्से अजमाते है. मगर आपको यह जानकर हैरानी होगी की यह खांसी कोई मामूली  खांसी नही बल्कि आपके बच्चे की ज़िन्दगी में आने वाली बड़ी बीमारी का संकेत भी हो सकता है. डॉक्टरों के मुताबिक, छोटे बच्चों में लगातार बनी रहने वाली खांसी कभी-कभी एक गंभीर बीमारी न्यूमोनिया का शुरुआती संकेत हो सकती है. इसलिए इसको नजरंदाज करना आपके बच्चे के लिए बेहद खतरा बन सकता है. 

वहीं अगर बात करें न्यूमोनिया कि तो ये एक ऐसी संक्रमणजनित बीमारी है जो फेफड़ों को प्रभावित करती है और पांच साल से कम उम्र के बच्चों को होती है. खासतौर पर नवजात के लिए ये खतरनाक साबित हो सकती है. एक रिपोर्ट से पता चलता है कि, हर साल लाखों बच्चों की जान इस बीमारी के कारण ही जाती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां समय पर इलाज और जागरूकता की कमी है.

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खांसी कब बनती है खतरे का संकेत?

कुछ विशेषज्ञ का मानना है कि अगर बच्चे को लगातार खांसी आ रही है और उसे तेज बुखार, सांस लेने में तकलीफ, छाती का तेजी से ऊपर-नीचे होना, बच्चे का सुस्त पड़ जाना जैसे लक्षण दिखें, तो इसे नजरअंदाज बिलकुल न करें क्योंकि ये सभी संकेत न्यूमोनिया की ओर इशारा करते है. अक्सर देखा जाता है कि छोटे बच्चों में यह बीमारी तेजी से बढ़ती है, इसलिए शुरुआती में ही इसकी पहचान बेहद जरूरी है. कई बार माता-पिता इसे सामान्य वायरल इंफेक्शन समझकर ध्यान नही देते हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो जाती है

कैसे होता है न्यूमोनिया?

न्यूमोनिया आमतौर पर बैक्टीरिया, वायरस या फंगस के कारण होता है. बच्चों में इम्यूनिटी कमजोर होने के कारण वे इस संक्रमण की चपेट में जल्दी आ जाते हैं.

कैसे करे बचाव?

डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी से बचाव संभव है, अगर कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखा जाए जैसे 
• बच्चों को समय-समय पर टीकाकरण जरूर कराएं
• ठंड और प्रदूषण से बचाव करें
• बच्चे को पौष्टिक आहार दें जैसे हरी सब्जी, फल और मेवे 
• खांसी या बुखार लंबे समय तक रहे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें

अगर न्यूमोनिया का समय रहते पता चल जाए, तो इसका इलाज संभव है. डॉक्टर दवाइयों, एंटीबायोटिक्स और सही देखभाल से बच्चे को पूरी तरह ठीक कर सकते हैं. लेकिन लापरवाही की स्थिति में यह बीमारी खतरनाक और जानलेवा भी बन सकती है. इसलिए समय पर इलाज और डॉक्टर की सलाह ले लेनी चाहिए. 

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क्या मोटे लोगों को जरूरी होता है ज्यादा विटामिन सी? आपके होश उड़ा देगी यह स्टडी

क्या मोटे लोगों को जरूरी होता है ज्यादा विटामिन सी? आपके होश उड़ा देगी यह स्टडी


Do Overweight People Need More Vitamin C: हमारे शरीर के लिए विटामिन सी को लंबे समय से एक जरूरी पोषक तत्व माना जाता है. आमतौर पर लोग इसे सर्दी-जुकाम से बचाव और इम्यूनिटी मजबूत करने से जोड़ते हैं. लेकिन अब नई रिसर्च यह बता रही है कि विटामिन सी का महत्व इससे कहीं ज्यादा हो सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिनका वजन अधिक है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर रिसर्च में क्या निकला. 

क्या निकला रिसर्च में?

न्यूजीलैंड के ओटागो विश्वविद्यालय के रिसर्चर ने अपनी स्टडी जिसे क्रिटिकल रिव्यूज इन फूड साइंस एंड न्यूट्रिशन जर्नल में पब्लिश किया गया है, उसमें पाया कि ज्यादा वजन वाले लोगों को मौजूदा स्वास्थ्य मानकों से अधिक विटामिन सी की जरूरत हो सकती है.  यह रिजल्ट इसलिए भी अहम है क्योंकि दुनिया भर में मोटापे के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और कई लोग अनजाने में इस जरूरी पोषक तत्व की कमी से जूझ रहे हो सकते हैं. विटामिन सी शरीर में कई अहम भूमिकाएं निभाता है. यह टिश्यू की मरम्मत करता है, इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है और एंटीऑक्सीडेंट के रूप में काम करता है, जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाता है. इसके अलावा यह त्वचा, घाव भरने और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है. 

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सही मात्रा में लेने की सलाह

आमतौर पर स्वास्थ्य दिशानिर्देश सभी लोगों के लिए एक तय मात्रा की सलाह देते हैं. उदाहरण के तौर पर, न्यूजीलैंड में रोजाना 45 मिलीग्राम विटामिन सी लेने की सिफारिश की जाती है, जो लगभग 70 किलो वजन वाले स्वस्थ व्यक्ति के आधार पर तय की गई है. हालांकि, इस स्टडी की प्रमुख रिसर्चर Anitra Carr का कहना है कि यह एक जैसा सभी के लिए वाला तरीका सही नहीं हो सकता. जैसे-जैसे शरीर का वजन बढ़ता है, विटामिन सी की जरूरत भी बढ़ सकती है. 

रिसर्च में क्या निकला?

शोध में पाया गया कि हर अतिरिक्त 10 किलो वजन पर शरीर को लगभग 17 से 22 मिलीग्राम अतिरिक्त विटामिन सी की जरूरत पड़ सकती है. यानी जिन लोगों का वजन ज्यादा है, उन्हें अपनी जरूरत के हिसाब से अधिक मात्रा में यह पोषक तत्व लेना चाहिए. इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिकों ने दो बड़े स्टडी के डेटा का एनालिसिस किया, जिनमें हजारों प्रतिभागी शामिल थे. 

नतीजों में यह सामने आया कि मौजूदा सिफारिशों के आधार पर तो अधिकांश लोगों में विटामिन सी पर्याप्त लग रहा था, लेकिन जब वजन को ध्यान में रखा गया, तो केवल एक-तिहाई से आधे लोगों में ही इसकी पर्याप्त मात्रा पाई गई. एक्सपर्ट का मानना है कि मोटापे में शरीर में हल्की सूजन  बनी रहती है, जिससे विटामिन सी तेजी से खर्च होता है. यही वजह है कि ज्यादा वजन वाले लोगों में इसकी कमी जल्दी हो सकती है. 

कैसे कर सकते हैं शरीर में पूर्ति?

अच्छी बात यह है कि विटामिन सी की पूर्ति करना आसान है. संतरा, कीवी, स्ट्रॉबेरी और शिमला मिर्च जैसे फल और सब्जियां इसके अच्छे सोर्स हैं. छोटे-छोटे बदलाव, जैसे रोजाना एक-दो अतिरिक्त फल खाना, इस कमी को पूरा करने में मदद कर सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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