गुड और बैड कोलेस्ट्रॉल का खेल, क्या आप जानते हैं असली जोखिम कहां है?

गुड और बैड कोलेस्ट्रॉल का खेल, क्या आप जानते हैं असली जोखिम कहां है?


Good vs Bad Cholestrol: खाने के शौकीन लोगों में अक्सर कोलेस्ट्रॉल की शिकायत देखी जाती है, जो उनकी अनहेल्दी फूड और अनियमित डाइट का नतीजा होती है. इन सब के बीच लोगों ने एक आसान सा निष्कर्ष निकाल लिया है, जिसमे कोलेस्ट्रॉल को दो हिस्सों में बांट दिया गया है- गुड और बैड. इसमें LDL को बैड और HDL को गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है. अपनी रिपोर्ट में HDL का नंबर देखकर लोग खुश हो जाते हैं, लेकिन क्या यह धारणा सच है या इसके पीछे की सच्चाई कुछ और है? आइए जानते हैं.

कोलेस्ट्रॉल क्या है?

कोलेस्ट्रॉल एक वैक्स जैसा फैट होता है, जो हमारे शरीर में सेल, विटामिन D और हार्मोन बनाने में मदद करता है. हमारा लिवर शरीर की जरूरत के अनुसार कोलेस्ट्रॉल बनाता है, लेकिन हम खाने-पीने की चीजों के द्वारा भी इसे काफी मात्रा में लेते हैं. वैसे तो यह जरूरी होता है, लेकिन जब इसका स्तर बढ़ जाता है तो यह धमनियों (आर्टरी) की दीवारों में प्लाक जमा कर देता है, जिससे दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है.

क्या LDL वाकई बैड कोलेस्ट्रॉल है?

LDL को अक्सर दिल की बीमारियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन हर LDL एक जैसा नहीं होता, कुछ LDL कण बड़े और हल्के होते हैं, जबकि कुछ छोटे और घने होते हैं. छोटे और घने कण ही धमनियों में जाकर प्लाक बनने में ज्यादा भूमिका निभाते हैं. एशियन हॉस्पिटल के डॉ. दिवाकर कुमार के अनुसार, “हर LDL नुकसानदायक नहीं होता, सिर्फ LDL का एक नंबर पूरी तस्वीर नहीं बताता. दो लोगों में LDL का स्तर समान होकर भी उसका असर अलग-अलग हो सकता है.”

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क्या HDL सच में गुड कोलेस्ट्रॉल है?

HDL को आमतौर पर गुड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है क्योंकि यह खून से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को हटाने में मदद करता है, लेकिन इसका ज्यादा होना हमेशा सुरक्षित होने की गारंटी नहीं देता. डॉ. कुमार के अनुसार, “अगर HDL का स्तर बहुत ज्यादा है तो यह भी चिंता का कारण हो सकता है, खासकर जब लाइफस्टाइल सही न हो. डॉ. नेहा शाह के अनुसार, “यह सही है कि HDL शरीर की रक्षा करता है और LDL जोखिम बढ़ाता है, लेकिन सिर्फ इन नंबरों से पूरी सच्चाई नहीं पता चलती. जैसे- 44 HDL वाले दो लोगों में फर्क हो सकता है अगर उनके ट्राइग्लिसराइड्स अलग हों, एक में 90 और दूसरे में 210, नंबर वही है, लेकिन शरीर की स्थिति पे इसका प्रभाव अलग होता है. LDL में भी यही बात लागू होती है. रिपोर्ट में सिर्फ नंबर दिखता है, लेकिन असली फर्क इसके छोटे और घने कणों से पड़ता है, जो नसों को नुकसान पहुंचाते हैं.

कैसे बचें कोलेस्ट्रॉल के खतरे से?

कोलेस्ट्रॉल आपकी रोजमर्रा की आदतों से प्रभावित होता है. कम नींद, ज्यादा तनाव, स्मोकिंग और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आपको कोलेस्ट्रॉल के खतरे के करीब ला सकते हैं. इससे बचने के लिए नियमित एक्सरसाइज करना फायदेमंद होता है. इसके अलावा रोजाना संतुलित भोजन और हेल्दी डाइट लेना जरूरी है और तनाव कम करने के लिए योग या मेडिटेशन करना भी मददगार हो सकता है.

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सावधान! नॉर्मल नहीं होता सुबह आंखों में जमने वाला मैल, पीला या हरा रंग इस बीमारी का संकेत

सावधान! नॉर्मल नहीं होता सुबह आंखों में जमने वाला मैल, पीला या हरा रंग इस बीमारी का संकेत


Why Do I Wake Up With Crusty Eyes: सुबह उठते ही अगर आंखों के कोनों में चिपचिपा या सूखा जमा हुआ पदार्थ नजर आए, तो इसे आमतौर पर आई क्रस्ट या आंखों की मैल कहा जाता है. यह कई बार सामान्य होता है, लेकिन कुछ मामलों में यह किसी समस्या का संकेत भी हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि कब आपको सावधान होने की जरूरत होती है और कब यह नॉर्मल होता है. 

क्यों निकलता है यह?

 हेल्थ जानकारी देने वाली वेबसाइट MedlinePlus के अनुसार, आंखों में बनने वाला यह क्रस्ट असल में डिस्चार्ज होता है, जो सूखकर सख्त या चिपचिपा रूप ले लेता है. कुछ लोगों में यह पीले रंग का और कठोर होता है, जबकि कुछ में यह साफ, पतला या पानी जैसा भी हो सकता है. इसकी एक सामान्य वजह नींद भी होती है। जब हम सोते हैं, तो आंखें बंद रहती हैं और पलकें झपकती नहीं हैं. ऐसे में आंखों का प्राकृतिक डिस्चार्ज कोनों में जमा हो जाता है, जो सुबह उठने पर क्रस्ट के रूप में दिखाई देता है.

इसके अलावा, आंसू की नली में ब्लॉकेज भी इसका कारण बन सकता है. इस स्थिति को नासोलैक्रिमल डक्ट ऑब्स्ट्रक्शन कहा जाता है, जिसमें आंसू सही तरीके से निकल नहीं पाते. इससे आंखों में पानी आना, लालिमा और पीले-हरे रंग का चिपचिपा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है.

एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी वजह

एलर्जिक कंजंक्टिवाइटिस भी एक बड़ी वजह है.  धूल, पालतू जानवरों के बाल या फफूंद जैसे एलर्जन के संपर्क में आने से आंखों में खुजली, पानी आना और सूजन हो सकती है. कई मामलों में इसके साथ हल्का क्रस्ट भी बनता है. ड्राई आई की समस्या में भी आंखों के आसपास म्यूकस जैसा जमा दिखाई दे सकता है. इसमें आंखों में जलन, चुभन, लालिमा और धुंधला दिखाई देना जैसे लक्षण शामिल होते हैं.

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वहीं, बैक्टीरियल कंजंक्टिवाइटिस में आंखों से ज्यादा मात्रा में डिस्चार्ज निकलता है, जो गाढ़ा और पीले या हरे रंग का हो सकता है. इसके साथ दर्द, खुजली और रोशनी से परेशानी भी हो सकती है. एक और स्थिति ब्लेफराइटिस है, जिसमें पलकों के किनारों पर सूजन और जलन होती है। इससे पलकें चिपचिपी हो जाती हैं और उन पर पपड़ी जमने लगती है. 

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?

कुछ कम मामलों में केराटाइटिस या आंख की कॉर्निया से जुड़ी समस्या और स्टाई (फुंसी) भी इसकी वजह हो सकती है. इन स्थितियों में दर्द, सूजन और पस जैसा डिस्चार्ज देखने को मिल सकता है. डॉक्टर से कब मिलें, यह समझना जरूरी है. अगर आंखों में दर्द, ज्यादा सूजन, धुंधली नजर, रोशनी से परेशानी या गाढ़ा पीला-हरा डिस्चार्ज हो, तो आंखों के एक्सपर्ट से जांच करानी चाहिए. इलाज के तौर पर हल्के मामलों में घर पर ही देखभाल की जा सकती है, जैसे गुनगुने पानी से आंखों की सफाई करना या साफ कपड़े से पपड़ी हटाना, लेकिन अगर समस्या एलर्जी या इंफेक्शन से जुड़ी हो, तो डॉक्टर दवा या आई ड्रॉप्स भी दे सकते हैं. 

साफ- सफाई के दौरान क्या ध्यान रखना जरूरी?

साफ-सफाई का ध्यान रखना सबसे जरूरी है. नियमित रूप से हाथ धोना, आंखों को साफ रखना और जरूरत पड़ने पर लुब्रिकेटिंग आई ड्रॉप्स का इस्तेमाल करना इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हार्ट फेल्योर को पहले ही डिटेक्ट कर लेगी यह तकनीक, जानें मेडिकल फील्ड में कैसे आ रही क्रांति?

हार्ट फेल्योर को पहले ही डिटेक्ट कर लेगी यह तकनीक, जानें मेडिकल फील्ड में कैसे आ रही क्रांति?


Can AI Detect Heart Failure Early: हार्ट फेल्योर एक गंभीर बीमारी है, जो दुनिया भर में लाखों लोगों को प्रभावित करती है. यह तब होती है, जब दिल शरीर में खून को ठीक से पंप नहीं कर पाता. बीमारी के बढ़े हुए चरण में यह जानलेवा भी बन सकती है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसे समय रहते पहचान पाना आसान नहीं होता. डॉक्टरों के सामने यही सबसे बड़ी समस्या है कि कई मरीजों में एडवांस्ड हार्ट फेल्योर का पता देर से चलता है, जिससे उन्हें सही समय पर इलाज नहीं मिल पाता.  अब एक नई रिसर्च से उम्मीद जगी है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI इस स्थिति को बदल सकता है. 

अभी किस तकनीक का यूज होता है

यह स्टडी वील कॉर्नेल मेडिसिन, कॉर्नेल टेक,कोलंबिया विश्वविद्यालय और न्यूयॉर्क-प्रेस्बिटेरियन के साइंटिस्ट ने किया गया है, जो जर्नल एनपीजे डिजिटल मेडिसिन में प्रकाशित हुआ. फिलहाल एडवांस्ड हार्ट फेल्योर की पहचान के लिए डॉक्टर एक खास टेस्ट कार्डियोपल्मोनरी एक्सरसाइज टेस्टिंग का सहारा लेते हैं. यह टेस्ट दिल और फेफड़ों की काम करने की क्षमता को मापता है, लेकिन इसके लिए विशेष उपकरण और ट्रेंड स्टाफ की जरूरत होती है, जो केवल बड़े अस्पतालों में ही उपलब्ध होता है. इसी वजह से कई मरीज इस जांच से वंचित रह जाते हैं.

रिसर्च में क्या निकला

नई रिसर्च में साइंटिस्ट ने एक ऐसा एआई सिस्टम तैयार किया है, जो दिल की अल्ट्रासाउंड जांच इकोकार्डियोग्राफी और मरीज के सामान्य मेडिकल रिकॉर्ड का एनालिसिस करके बीमारी की गंभीरता का अंदाजा लगा सकता है. खास बात यह है कि यह तकनीक पीक VO2 जैसे महत्वपूर्ण पैरामीटर का अनुमान लगा सकती है, जो आमतौर पर केवल CPET के जरिए ही मापा जाता है.

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1,000 हार्ट फेल्योर मरीजों के डेटा का इस्तेमाल 

इस सिस्टम को तैयार करने के लिए करीब 1,000 हार्ट फेल्योर मरीजों के डेटा का इस्तेमाल किया गया, जिसमें अल्ट्रासाउंड वीडियो, ब्लड फ्लो और हार्ट वॉल्व की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी शामिल थी. इसके बाद 127 नए मरीजों पर इसका परीक्षण किया गया, जहां इस एआई मॉडल ने करीब 85 प्रतिशत सटीकता के साथ हाई-रिस्क मरीजों की पहचान की. रिसर्चर का कहना है कि यह तकनीक रोजमर्रा की मेडिकल जरूरतों में आसानी से इस्तेमाल की जा सकती है, क्योंकि इसमें वही डेटा उपयोग होता है जो पहले से उपलब्ध होता है. इससे उन मरीजों की पहचान संभव हो सकेगी, जो अभी तक नजरअंदाज हो रहे थे.

हालांकि, साइंटिस्ट ने यह भी माना है कि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले और बड़े स्तर पर टेस्ट जरूरी है. एआई सिस्टम की विश्वसनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही अहम है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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यूरिक एसिड vs क्रिएटिनिन…किडनी की हेल्थ के दो अहम संकेत, जिन्हें समझना है जरूरी 

यूरिक एसिड vs क्रिएटिनिन…किडनी की हेल्थ के दो अहम संकेत, जिन्हें समझना है जरूरी 


Kidney Health: आजकल लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो गए हैं. वे समय-समय पर कई तरह के टेस्ट भी करवाते हैं, जिससे उन्हें अपनी हेल्थ को लेकर अपडेट मिलता है रहे और बीमारियों का सही समय पर इलाज हो सके. हालांकि, जब बॉडी चेकअप की रिपोर्ट हाथ में आती है तो कई भारी-भरकम शब्दों को समझना आसान नहीं होता. खासकर यूरिक एसिड और क्रिएटिनिन जैसे नाम लोगों को कंफ्यूज कर देते हैं. कई लोग सोचते हैं कि ये दोनों एक ही चीज बताते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि ये दोनों शरीर की अलग-अलग स्थितियों के बारे में जानकारी देते हैं.

डॉक्टर्स के अनुसार, जब हम किसी व्यक्ति की लैब रिपोर्ट देखते हैं तो यूरिक एसिड और क्रिएटिनिन जैसे नाम अक्सर साथ में दिखाई देते हैं. दो शब्द किडनी से जुड़े होते हैं, लेकिन ये आपकी सेहत के बारे में दो बिल्कुल अलग कहानियां बताते हैं. ऐसे में इनकी सही जानकारी होना काफी आवश्यक हो जाता है. 

क्रिएटिनिनः किडनी के काम करने की जांच 

क्रिएटिनिन एक वेस्ट प्रोडक्ट होता है, जो तब बनता है जब हमारी मांसपेशियों ऊर्जा का प्रयोग करती हैं. शरीर इसे हर दिन लगभग एक समान मात्रा में बनाता है. स्वस्थ किडनी इसे खून से फिल्टर करके पेशाब के जरिए बाहर निकाल देती है. यही वजह है कि डॉक्टर क्रिएटिनिन के स्तर को किडनी की कार्यक्षमता मापने का एक भरोसेमंद संकेत मानते हैं. इसे आसान शब्दों में बताएं तो क्रिएटिनिन को किडनी का ‘स्पीडोमीटर’ समझें. यह मांसपेशियों के टूटने से बनने वाला वेस्ट प्रोडक्ट है, जिसे स्वस्थ किडनी एक स्थिर दर से बाहर निकालती है. वहीं, अगर क्रिएटिनिन का स्तर बढ़ जाता है तो यह अक्सर संकेत देता है कि किडनी ठीक से काम नहीं कर रही है, जिससे डिहाइड्रेशन या किडनी से जुड़ी बीमारी के कारण हो सकते है. 

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यूरिक एसिडः मेटाबॉलिज्म को समझने का एक तरीका 

वहीं दूसरी ओर, यूरिक एसिड शरीर में प्यूरीन नामक तत्व के टूटने से बनता है. प्यूरीन हमें कई खाद्य पदार्थों से मिलता है, जैसे- रेड मीट, सी-फूड, शराब और यहां तक कि कुछ हेल्दी फूड्स जैसे दालों में. यूरिक एसिड का स्तर डाइट, लाइफस्टाइल और मेटाबॉलिज्म के अनुसार बदलता रहता है. डॉ. अंकुर सिंघल बताते हैं कि यूरिक एसिड एक “मेटाबॉलिक मैसेंजर” की तरह काम करता है. यह तब बनता है जब आपका शरीर कुछ खास खाने-पीने की चीजों में मौजूद प्यूरीन को तोड़ता है. अगर यूरिक एसिड का स्तर ज्यादा हो जाए तो हमेशा किडनी की समस्या नहीं होती, बल्कि यह अक्सर आपकी लाइफस्टाइल की आदतों की ओर इशारा करता है. जैसे कम पानी पीना, ज्यादा शुगर लेना या मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याएं इसका कारण बन सकती हैं. 

तो अक्सर लोग कन्फ्यूज क्यों हो जाते हैं?

अगर दोनों की तुलना करें तो क्रिएटिनिन एक आसान सवाल का जवाब देता है कि क्या किडनी खून को सही तरीके से फिल्टर कर रही है? वहीं यूरिक एसिड एक थोड़ा बड़ा सवाल पूछता है कि शरीर मेटाबॉलिज्म और खाने-पीने से बनने वाले वेस्ट को कैसे संभाल रहा है? यानी क्रिएटिनिन से किडनी की स्थिति का पता चलता है और यूरिक एसिड से हमारी आदतों का. डॉक्टरों का कहना है कि इन दोनों रिपोर्ट्स को हमेशा साथ में समझना चाहिए, सिर्फ एक को देखकर निष्कर्ष निकालना सही नहीं होता. कई बार दोनों का स्तर एक साथ बढ़ जाता है जो किडनी से जुड़ी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है.

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इस देश में खसरे से 100 से ज्यादा बच्चों की मौत, जानें कैसे फैलती है यह बीमारी?

इस देश में खसरे से 100 से ज्यादा बच्चों की मौत, जानें कैसे फैलती है यह बीमारी?


Why Measles Is Dangerous For Children: बांग्लादेश में खसरे के खतरनाक प्रकोप ने गंभीर रूप ले लिया है, जहां एक महीने से भी कम समय में 100 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है. हालात को देखते हुए सरकार ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन अभियान शुरू किया है, ताकि इस तेजी से फैल रही बीमारी पर काबू पाया जा सके. चलिए आपको बताते हैं कि इसको रोकने के लिए क्या किया जा रहा है. 

टीकाकरण अभियान लॉन्च 

5 अप्रैल को बांग्लादेश सरकार ने यूनिसेफ,वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और गावी, द वैक्सीन एलायंस के साथ मिलकर एक इमरजेंसी खसरा-रूबेला टीकाकरण अभियान लॉन्च किया. इस अभियान का लक्ष्य उन 12 लाख से ज्यादा बच्चों को सुरक्षा देना है, जिन्हें अब तक टीका नहीं लग पाया है और जो इंफेक्शन के उच्च जोखिम में हैं. बांग्लादेश के स्वास्थ्य मंत्री सरदार मोहम्मद सखावत हुसैन ने बताया कि मौजूदा हालात को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने तेजी से कदम उठाए हैं और स्थिति पर नजर रखी जा रही है.

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कैसे फैलती है यह बीमारी?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, खसरा एक बेहद इंफेक्शन वायरस से होने वाली बीमारी है, जो हवा के जरिए फैलती है और गंभीर दिक्कतों के साथ मौत का कारण भी बन सकती है. मार्च से अब तक 900 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं, जिससे हेल्थ सिस्टम पर दबाव बढ़ गया है. फिलहाल यह अभियान छह महीने से लेकर पांच साल तक के बच्चों पर केंद्रित है, खासकर उन जिलों में जहां संक्रमण का खतरा ज्यादा है। बाद में इसे पूरे देश में विस्तार देने की योजना है. 

बांग्लादेश में यूनिसेफ की प्रतिनिधि ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा के लिए टीकाकरण बेहद जरूरी है. उन्होंने बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए कहा कि सबसे ज्यादा खतरा छोटे और कमजोर बच्चों को है. उन्होंने यह भी बताया कि कई बच्चे ऐसे हैं जिन्हें अब तक कोई वैक्सीन नहीं मिली या अधूरी टीकाकरण हुआ है. वहीं, नौ महीने से कम उम्र के शिशु, जो अभी नियमित टीकाकरण के योग्य नहीं होते, उनमें इंफेक्शन का खतरा और ज्यादा है.

साबित हो सकता है जानलेवा

एक्सपर्ट ने इस स्थिति को लेकर चेतावनी दी है कि अगर समय रहते टीकाकरण नहीं हुआ, तो खसरा तेजी से जानलेवा बन सकता है. राजधानी ढाका के संक्रामक रोग अस्पताल की उप-निदेशक ने अभिभावकों से अपील की है कि बच्चों में तेज बुखार या खसरे के लक्षण दिखते ही तुरंत अस्पताल ले जाएं और बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न लें. फिलहाल सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियां मिलकर इस प्रकोप को कंट्रोल करने की कोशिश कर रही हैं.

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लंग कैंसर और मांसपेशियों की कमजोरी का एक साथ होगा इलाज, वैज्ञानिकों ने खोजी नई तकनीक

लंग कैंसर और मांसपेशियों की कमजोरी का एक साथ होगा इलाज, वैज्ञानिकों ने खोजी नई तकनीक


Can mRNA Therapy Treat Lung Cancer And Muscle Loss: अमेरिका केओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के साइंटिस्ट ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो लंग्स के कैंसर और उससे जुड़ी एक गंभीर मांसपेशी क्षय बीमारी कैशेक्सिया का एक साथ इलाज करने की क्षमता रखती है.  यह रिसर्च प्रतिष्ठित जर्नल जर्नल ऑफ कंट्रोल्ड रिलीज में प्रकाशित हुआ है और इसमें लिपिड नैनोपार्टिकल्स के जरिए जेनेटिक मैटेरियल को सीधे ट्यूमर तक पहुंचाने की नई रणनीति अपनाई गई है.

कैसे इसको तैयार किया गया?

इस तकनीक में वैज्ञानिकों ने खास तरह के नैनोकैरियर तैयार किए हैं, जिनमें फोलिस्टैटिन मैसेंजर RNA (mRNA) भरा गया है. जब ये नैनोपार्टिकल्स शरीर में पहुंचते हैं, तो यह mRNA सेल्स को फोलिस्टैटिन प्रोटीन बनाने के लिए प्रेरित करता है. यह प्रोटीन एक तरफ ट्यूमर की वृद्धि को रोकने में मदद करता है, वहीं दूसरी ओर मांसपेशियों के विकास को भी बढ़ावा देता है.  रिसर्च टीम ने पाया कि ये लिपिड नैनोपार्टिकल्स खून में मौजूद विट्रोनेक्टिन नामक प्रोटीन से जुड़ जाते हैं. यही प्रोटीन इन्हें सीधे लंग्स के कैंसर वाले ट्यूमर तक पहुंचाने में मदद करता है. ट्यूमर की सतह पर मौजूद इंटीग्रिन रिसेप्टर्स के साथ इंटरैक्शन के जरिए ये नैनोपार्टिकल्स सही जगह पर जमा हो जाते हैं.

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क्या कहते हैं साइंटिस्ट?

वैज्ञानिकों के अनुसार, शरीर में mRNA आधारित दवाओं को सीधे फेफड़ों के ट्यूमर तक पहुंचाना अब तक एक बड़ी चुनौती रहा है. लेकिन इस नई तकनीक ने इस समस्या का संभावित समाधान पेश किया है. पारंपरिक नैनोपार्टिकल्स अक्सर शरीर में जाकर लिवर में जमा हो जाते हैं, जबकि इस नई विधि से ट्यूमर के आकार में करीब 2.5 गुना ज्यादा कमी देखी गई. लंग्स का कैंसर दुनिया भर में सबसे घातक कैंसरों में से एक माना जाता है. इसके साथ अक्सर कैशेक्सिया नाम की स्थिति भी जुड़ी होती है, जिसमें मरीज का वजन तेजी से घटता है और मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, चाहे वह पर्याप्त भोजन ही क्यों न ले रहा हो. यह स्थिति कैंसर मरीजों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है.

क्या कोई साइड इफेक्ट भी है?

इस नई थेरेपी की खास बात यह है कि यह एक साथ दो समस्याओं, कैंसर और मांसपेशी क्षय पर असर डालती है और शुरुआती परीक्षणों में इसके कोई गंभीर साइड इफेक्ट्स सामने नहीं आए हैं. हालांकि, साइंटिस्ट का कहना है कि अभी इस तकनीक पर और प्री-क्लिनिकल रिसर्च की जरूरत है, लेकिन शुरुआती नतीजे काफी उत्साहजनक हैं. उन्हें उम्मीद है कि भविष्य में इस थेरेपी का मानवों पर परीक्षण किया जा सकेगा और यह कैंसर के इलाज में एक बड़ा बदलाव ला सकती है.

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