अल्ट्रासाउंड से हो सकता है ओरल कैंसर सेल्स का खात्मा, इस स्टडी ने जगाई उम्मीद

अल्ट्रासाउंड से हो सकता है ओरल कैंसर सेल्स का खात्मा, इस स्टडी ने जगाई उम्मीद


Can Ultrasound Kill Oral Cancer Cells: भारत में ओरल कैंसर सबसे तेजी से बढ़ने वाले कैंसरों में से एक है. इसकी सबसे बड़ी वजह तंबाकू और सुपारी का अधिक सेवन माना जाता है. अब तक इस बीमारी के इलाज के लिए सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी का सहारा लिया जाता है, लेकिन इन तरीकों में कैंसर सेल्स के साथ-साथ स्वस्थ सेल्स को भी नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है. ऐसे में मरीजों को कई तरह के दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है. हालांकि अब एक नई रिसर्च ने इलाज को लेकर उम्मीद की नई किरण दिखाई है.

साइंटिस्ट ने क्या नया खोजा?

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के साइंटिस्ट ने अपनी नई स्टडी में पाया है कि लो-फ्रीक्वेंसी वाले अल्ट्रासाउंड की मदद से ओरल कैंसर की सेल्स को निशाना बनाया जा सकता है. सबसे खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में आसपास की हेल्दी सेल्स पर बहुत कम असर पड़ता है. अगर आगे के शोध में भी ऐसे ही नतीजे सामने आते हैं, तो भविष्य में यह तकनीक ओरल कैंसर के इलाज का सुरक्षित और कम नुकसान पहुंचाने वाला विकल्प बन सकती है.

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ओरल ट्यूमर के नमूनों पर परीक्षण किया गया

इस शोध के दौरान साइंटिस्ट ने एमएस रामैया मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के डॉक्टरों के साथ मिलकर मरीजों से प्राप्त ओरल ट्यूमर के नमूनों पर परीक्षण किया. लैब में तैयार कैंसर सेल्स की बजाय सीधे मरीजों से लिए गए सैंपल का इस्तेमाल करने से रिसर्चर को वास्तविक परिस्थितियों के ज्यादा सटीक परिणाम मिले. 

हल्के मैकेनिकल दबाव को सहन नहीं कर पातीं

स्टडी में सामने आया कि ओरल कैंसर की सेल्स अल्ट्रासाउंड से पैदा होने वाले हल्के मैकेनिकल दबाव को सहन नहीं कर पातीं. इसकी एक वजह ट्रोपोमायोसिन 2.1 नामक प्रोटीन का कम स्तर माना गया है. यह प्रोटीन सामान्य सेल्स को बाहरी दबाव महसूस करने और उससे बचाव करने में मदद करता है. जब कैंसर सेल्स पर अल्ट्रासाउंड का प्रभाव डाला गया तो वे नष्ट होने लगीं, जबकि स्वस्थ सेल्स पर इसका असर बेहद सीमित रहा.

अल्ट्रासाउंड कैसे फायदेमंद?

रिसर्चर ने यह भी पाया कि अल्ट्रासाउंड न सिर्फ कैंसर सेल्स को खत्म करने में मदद करता है, बल्कि उनके फैलने की क्षमता को भी काफी हद तक कम कर देता है. यह तकनीक ट्यूमर के चारों ओर बनी उस सुरक्षात्मक परत को भी कमजोर करती है, जो कई बार दवाओं और शरीर की इम्यून सेल्स को कैंसर तक पहुंचने से रोकती है. इससे भविष्य में दवाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है.

भविष्य के लिए खोल सकता है रास्ता

साइंटिस्ट का कहना है कि अल्ट्रासाउंड पहले से ही चिकित्सा क्षेत्र में सुरक्षित और नॉन ऑफेंसिव तकनीक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए यदि आगे के प्रीक्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षणों में भी इसके पॉजिटिव परिणाम मिलते हैं, तो यह ओरल कैंसर के साथ-साथ ब्रेस्ट और स्किन कैंसर जैसे अन्य कैंसरों के इलाज में भी नई संभावनाएं खोल सकता है. हालांकि फिलहाल यह रिसर्च शुरुआती चरण में है और इसे रेगुलर इलाज के रूप में अपनाने से पहले कई और परीक्षण किए जाएंगे.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सेहत के लिए सच में खतरनाक है अजीनो मोटो? कितने सेवन से शरीर को होता है नुकसान

क्या सेहत के लिए सच में खतरनाक है अजीनो मोटो? कितने सेवन से शरीर को होता है नुकसान


आजकल लोग जंक फूड खाना काफी पसंद करते हैं, वहीं चाइनीज फूड, पैकेज्ड स्नेक्स और कई प्रोसेस्ड फूड में अजीनो मोटो का इस्तेमाल होता है. इसी अजीनो मोटो को लेकर कई बार यह भी दावा किया जाता है कि इससे हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, मोटापा या दिमाग से जुड़ी कई गंभीर समस्याएं हो सकती है. वहीं दूसरी और एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सीमित मात्रा में इसका सेवन ज्यादातर लोगों के लिए सुरक्षित है, लेकिन कई बार यह हमारी सेहत के लिए खतरनाक भी हो सकता है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि क्या सच में अजीनो मोटो सेहत के लिए खतरनाक होता है और इसके सेवन से शरीर को कितना नुकसान होता है. 

क्या है अजीनो मोटो?

अजीनो मोटो दरअसल मोनोसोडियम ग्लूटामेट का एक ब्रांड नाम है. इसका उपयोग खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है. यह खाने में उमामी स्वाद जोड़ता है, जिसे मीठा, खट्टा, नमकीन और कड़वे के बाद पांचवा स्वाद माना जाता है. एमएसजी को गन्ना, चुकंदर, मक्का या कसावा जैसे पौधों से फर्मेंटेशन प्रक्रिया के जरिए तैयार किया जाता है. इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल नूडल्स, फ्राइड राइस, सूप, मंचूरियन, प्रोसेस्ड फूड, स्नैक्स, सॉस और कई फास्ट फूड आइटम में किया जाता है. वहीं कई लोग यह भी मान लेते हैं कि एमएसजी और अजीनो मोटो अलग है. लेकिन एमएसजी प्रोडक्ट का नाम है, जबकि अजीनो मोटो जापान की वह कंपनी है, जिसने इसका उत्पादन शुरू किया. समय के साथ यह ब्रांड इतना लोकप्रिय हो गया कि लोग एमएसजी को ही अजीनो मोटो कहने लगे. 

क्या अजीनो मोटो सच में पहुंचाता है नुकसान? 

एक्सपर्ट्स के अनुसार सीमित मात्रा में एमएसजी का सेवन ज्यादातर हेल्दी लोगों के लिए सुरक्षित माना जाता है. यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन भी इसे जनरली रिकॉग्नाइज्ड एज सेफ यानी सुरक्षित खाद्य सामग्री की कैटेगरी में रखता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि इसका ज्यादा मात्रा में सेवन पूरी तरह सुरक्षित है. किसी भी खाद्य पदार्थ की तरह इसका जरूरत से ज्यादा उपयोग हेल्थ पर असर डाल सकता है. 

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ज्यादा सेवन से बढ़ सकती है दिक्कत 

कई लोगों को एमएसजी वाला खाना खाने के बाद सिर दर्द, पसीना आना, चेहरे पर गर्माहट महसूस होना, सीने में भारीपन या कमजोरी जैसी शिकायत हो सकती है. इसे पहले चाइनीज रेस्टोरेंट सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता था. हालांकि यह समस्या हर व्यक्ति में नहीं होती. वहीं एक्सपर्ट्स का भी कहना है कि एमएसजी में सोडियम होता है, इसलिए अगर कोई व्यक्ति पहले से हाई ब्लड प्रेशर का मरीज है या उसे हार्ट प्रॉब्लम का खतरा है तो उसे ज्यादा मात्रा में एमएसजी वाले खाने से बचना चाहिए. इसके अलावा इससे ज्यादा टेस्टी खाना बार-बार खाने की आदत भी बढ़ सकती है, जिससे जरूरत से ज्यादा कैलोरीज का सेवन होने लगता है. लंबे समय में यह वजन बढ़ने और मोटापे का कारण बन सकता है.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिर्फ सिगरेट या तंबाकू नहीं, इन वजहों से भी जीरो हो जाता है स्पर्म काउंट; नहीं बन पाएंगे पापा

सिर्फ सिगरेट या तंबाकू नहीं, इन वजहों से भी जीरो हो जाता है स्पर्म काउंट; नहीं बन पाएंगे पापा


Causes Of Low Sperm Count In Men: आजकल पुरुषों में कम स्पर्म काउंट की समस्या तेजी से बढ़ रही है. ज्यादातर लोग मानते हैं कि इसका कारण सिर्फ सिगरेट या तंबाकू है, लेकिन हकीकत इससे कहीं अलग है. कई स्वास्थ्य समस्याएं और रोजमर्रा की कुछ आदतें भी स्पर्म काउंट को बुरी तरह प्रभावित कर सकती हैं. अगर समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो पिता बनने में परेशानी आ सकती है. चलिए आपको इसके पीछे का कारण बताते हैं. 

कब होता है स्पर्म काउंट कम?

जब वीर्य में मौजूद स्पर्म की संख्या सामान्य से कम हो जाती है, तो इसे लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट mayoclinic की रिपोर्ट के अनुसार, यदि एक मिलीलीटर वीर्य में 1.5 करोड़ से कम स्पर्म हों, तो इसे सामान्य से कम माना जाता है. वहीं अगर वीर्य में स्पर्म बिल्कुल न हों, तो इस स्थिति को एजूस्पर्मिया कहा जाता है. ऐसी स्थिति में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना काफी कम हो जाती है.

क्या होते हैं इसके संकेत?

कम स्पर्म काउंट का सबसे बड़ा संकेत यह है कि लंबे समय तक कोशिश करने के बाद भी गर्भधारण नहीं हो पाता. कई मामलों में इसके अलावा कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. हालांकि कुछ पुरुषों में हार्मोन संबंधी गड़बड़ी या दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं की वजह से यौन इच्छा में कमी, इरेक्शन की दिक्कत, टेस्टिकल में दर्द, सूजन या गांठ जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं.

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क्या होते हैं इसके कारण?

सिर्फ धूम्रपान और तंबाकू ही नहीं, बल्कि मोटापा, लगातार तनाव, जरूरत से ज्यादा शराब पीना, नशीले पदार्थों का सेवन और हार्मोन असंतुलन भी स्पर्म काउंट को प्रभावित कर सकते हैं. इसके अलावा कुछ इंफेक्शन, वैरिकोसील जैसी बीमारी, थायरॉयड की समस्या और कुछ दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल भी पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर असर डाल सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि अगर एक साल तक बिना किसी गर्भनिरोधक के नियमित संबंध बनाने के बाद भी गर्भधारण न हो, तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. जिन लोगों को पहले से टेस्टिकल, प्रोस्टेट या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या रही है, उन्हें जांच कराने में देरी नहीं करनी चाहिए. समय पर जांच होने से कारण का पता लगाकर सही इलाज शुरू किया जा सकता है.

क्या इसको ठीक किया जा सकता है?

अच्छी बात यह है कि हर मामले में लो स्पर्म काउंट का मतलब हमेशा बांझपन नहीं होता. आज कई तरह की दवाएं, लाइफस्टाइल में बदलाव और आधुनिक फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की मदद से गर्भधारण की संभावना बढ़ाई जा सकती है. संतुलित आहार लेना, नियमित व्यायाम करना, वजन नियंत्रित रखना, तनाव कम करना और धूम्रपान व तंबाकू से दूरी बनाना स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या दोनों को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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एनर्जी बढ़ाने का दावा या ग्राहकों से धोखा? FSSAI के निशाने पर Red Bull और Sting जैसे ब्रांड्स

एनर्जी बढ़ाने का दावा या ग्राहकों से धोखा? FSSAI के निशाने पर Red Bull और Sting जैसे ब्रांड्स


बाजार में मिलने वाले कई लोकप्रिय पेय, जिन्हें कंपनियां Energy Drink के नाम से बेच रही हैं, अब उन पर ही सवाल खड़े हो गए हैं. खाद्य सुरक्षा नियामक FSSAI ने Red Bull, Sting, Monster, Campa Energy, Hell Energy, Adrenaline Rush और Gold Boost समेत कई बड़े ब्रांड्स को नोटिस जारी किया है. आरोप है कि कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स की ब्रांडिंग और दावों के जरिए ग्राहकों को गुमराह कर रही हैं. 

आखिर FSSAI को आपत्ति किस बात पर है?

FSSAI का कहना है कि भारत में अब तक Energy Drink नाम की कोई आधिकारिक फूड कैटेगरी या उसका कोई अलग मानक तय नहीं किया गया है. इसका मतलब यह है कि किसी प्रोडक्ट को सिर्फ Energy Drink कहकर बेचना या उसी नाम से प्रचार करना नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता. नियामक का कहना है कि फूड कैटेगरी सिस्टम केवल प्रशासनिक वर्गीकरण के लिए है. इसे प्रोडक्ट का नाम या मार्केटिंग टर्म नहीं बनाया जा सकता.

किन-किन ब्रांड्स को मिला नोटिस?

नोटिस पाने वाले ब्रांड्स में Red Bull, Sting, Monster Energy, Campa Energy, Adrenaline Rush, Hell Energy और Gold Boost शामिल हैं. FSSAI का कहना है कि इन प्रोडक्ट्स की पैकेजिंग पर Energy Drink लिखा गया है. कुछ मामलों में ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर भी इन्हें इसी नाम से प्रमोट किया जा रहा है.

सिर्फ नाम नहीं, दावों पर भी सवाल

FSSAI ने केवल Energy Drink शब्द पर ही आपत्ति नहीं जताई है, बल्कि उन दावों पर भी सवाल उठाए हैं, जिनमें कहा जाता है कि यह ड्रिंक एनर्जी बढ़ाती है. फोकस बेहतर करती है या कमजोरी दूर करती है. नियामक का कहना है कि फूड प्रॉडक्ट्स के लिए इस तरह के फंक्शनल या थेरेप्यूटिक दावे नियमों के तहत स्वीकार्य नहीं हैं, जब तक उनके लिए नियामकीय अनुमति न हो.

इसका मतलब आपके लिए क्या है?

इस नोटिस का मतलब यह नहीं है कि इन प्रोडक्ट्स की बिक्री पर रोक लगा दी गई है. फिलहाल FSSAI ने कंपनियों से जवाब मांगा है और लेबलिंग व मार्केटिंग को नियमों के मुताबिक करने के निर्देश दिए हैं. फिलहाल सवाल इस बात पर है कि कंपनियां अपने प्रॉडक्ट्स को किस नाम और किन दावों के साथ बेच रही हैं न कि इस बात पर कि ये प्रॉडक्ट्स बाजार में बिक नहीं सकते हैं.

अब आगे क्या होगा?

अब सभी की नजर कंपनियों के जवाब पर होगी. अगर FSSAI को कंपनियों का जवाब संतोषजनक नहीं लगता है तो आगे नियामकीय कार्रवाई हो सकती है. फिलहाल इस मामले में कंपनियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

ये भी पढ़ें: माइग्रेन से लेकर गंभीर बीमारियों तक… जानें बचपन की तकलीफें आपको कैसे कर सकती हैं परेशान?

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माइग्रेन से लेकर गंभीर बीमारियों तक… जानें बचपन की तकलीफें आपको कैसे कर सकती हैं परेशान?

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How Childhood Trauma Affects Adult Health: बचपन की तकलीफें हमेशा सिर्फ यादों तक सीमित नहीं रहतीं. कई बार उनका असर इंसान के शरीर और दिमाग पर इतने लंबे समय तक बना रहता है कि सालों बाद भी लोग समझ नहीं पाते कि उनकी परेशानी की शुरुआत आखिर कहां से हुई थी. अब नई रिसर्च यह बताने लगी हैं कि बचपन में झेला गया डर, हिंसा, उपेक्षा या इमोशनल अस्थिरता बड़े होने के बाद शारीरिक और मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डाल सकती है. 

तमाम बीमारियों का जड़ है पुराना अनुभव

कई लोग सालों तक माइग्रेन, पेट की परेशानी, नींद न आना, लगातार थकान, एंग्जायटी या शरीर में दर्द जैसी समस्याओं का इलाज करवाते रहते हैं, लेकिन असली वजह उनके बचपन के अनुभव हो सकते हैं. आधुनिक साइंस  अब यह मानने लगा है कि बचपन का ट्रॉमा सिर्फ इमोशनल समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के नर्वस सिस्टम, हार्मोन, इम्यूनिटी और लंबे समय तक बीमारी के खतरे को भी प्रभावित कर सकता है. 

बचपन में हुई हिंसा के शिकार का क्या होता है असर?

एक्सपर्ट डॉ. प्रितिका सिंह ने TOI को बताया  कि कई मरीज ऐसे होते हैं जिनकी रिपोर्ट सामान्य आती है, लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी कुछ और कहती है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक 40 साल की महिला लगातार पीठ दर्द, पेट की समस्या और एंग्जायटी से जूझ रही थी. कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी उसकी परेशानी की वजह समझ नहीं आई, जबकि उसके बचपन में घरेलू हिंसा और इमोशनल उपेक्षा जैसी घटनाएं जुड़ी थीं. 

हमारे शरीर पर क्या होता है असर?

एक्सपर्ट के मुताबिक, जब कोई बच्चा लंबे समय तक डर या असुरक्षा वाले माहौल में रहता है तो उसका शरीर लगातार फाइट या फ्लाइट मोड में रहने लगता है. इससे स्ट्रेस हार्मोन लंबे समय तक बढ़े रहते हैं, जो धीरे-धीरे शरीर के कई अंगों पर असर डालते हैं. यही वजह है कि कई लोगों में आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, ऑटोइम्यून बीमारियां, डिप्रेशन, मोटापा और नींद से जुड़ी समस्याएं देखने को मिलती हैं. 

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बचपन की हिंसा के शिकार लोगों के हेल्थ पर क्या होता है असर?

इस विषय पर सबसे चर्चित रिसर्च अमेरिका में हुई एसीई मानी जाती है, जिसे सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन और कैसर परमानेंटे ने किया था. इस स्टडी में 17 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था. रिसर्च में सामने आया कि जिन लोगों ने बचपन में हिंसा, उपेक्षा, घरेलू तनाव या नशे जैसी परिस्थितियां झेली थीं, उनमें बड़े होने के बाद गंभीर बीमारियों का खतरा ज्यादा पाया गया.

जेएएमए पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित एक अन्य रिसर्च में भी बचपन के ट्रॉमा और ऑटोइम्यून बीमारियों के बीच संबंध देखा गया. इन स्टडी ने डॉक्टरों के सोचने का तरीका बदल दिया. अब ट्रॉमा को सिर्फ मानसिक याद नहीं बल्कि शरीर पर असर डालने वाली बॉयोलॉजिकल स्थिति माना जा रहा है.

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30 दिन के लिए छोड़ देंगे चीनी तो क्या होगा, जानें कितनी बदल जाएगी आपकी बॉडी?

30 दिन के लिए छोड़ देंगे चीनी तो क्या होगा, जानें कितनी बदल जाएगी आपकी बॉडी?


What Happens If You Quit Sugar For 30 Days: अगर आप 30 दिनों के लिए चीनी खाना छोड़ दें, तो इसका असर सिर्फ वजन पर ही नहीं, बल्कि शरीर के कई हिस्सों पर दिखाई दे सकता है. दरअसल, ज्यादा चीनी खाने की आदत मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, हार्ट रोग और फैटी लिवर जैसी कई गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ा सकती है. यही वजह है कि आजकल कई लोग ‘नो शुगर चैलेंज’ अपनाकर अपनी डाइट से अतिरिक्त चीनी को कुछ समय के लिए पूरी तरह बाहर कर देते हैं.

क्यों इसको अपना रहे हैं लोग?

इस चैलेंज का मतलब प्राकृतिक मिठास वाले फल, सब्जियां या दूध छोड़ना नहीं है. इसमें केवल उन चीजों से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है, जिनमें अतिरिक्त चीनी मिलाई जाती है, जैसे कोल्ड ड्रिंक, मिठाइयां, कैंडी, केक, कुकीज, मीठे पेय, फ्लेवर वाले दही, पैक्ड जूस और कई तरह की सॉस. इसकी जगह ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, अंडे, मछली, चिकन, मेवे और घर का बना संतुलित भोजन खाने की सलाह दी जाती है.

इससे क्या होता है फायदा?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट हेल्थलाइन के अनुसार,  अगर आप लगातार 30 दिनों तक अतिरिक्त चीनी से दूरी बनाए रखते हैं, तो सबसे पहले इसका फायदा ब्लड शुगर पर देखने को मिल सकता है. बार-बार मीठा खाने से शरीर में ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है, जिससे समय के साथ इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है. ऐसे में चीनी कम करने से ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है.

किन लोगों के लिए फायदेमंद?

वजन कम करने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए भी यह बदलाव फायदेमंद साबित हो सकता है. ज्यादा चीनी वाले खाद्य पदार्थों में कैलोरी अधिक होती है, जबकि फाइबर और प्रोटीन कम होते हैं. ऐसे में इन्हें कम करने से शरीर में अतिरिक्त कैलोरी की मात्रा घट सकती है और वजन कंट्रोल रखने में मदद मिल सकती है. दांतों की सेहत पर भी इसका पॉजिटिव असर पड़ सकता है. मुंह में मौजूद बैक्टीरिया चीनी को तोड़कर एसिड बनाते हैं, जो दांतों को नुकसान पहुंचाता है. अगर मीठी चीजों का सेवन कम किया जाए, तो कैविटी और दांतों के सड़ने का खतरा भी कम हो सकता है.

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लिवर और हार्ट के लिए भी फायदेमंद

लिवर और दिल की सेहत के लिए भी अतिरिक्त चीनी कम करना फायदेमंद माना जाता है. खासतौर पर ज्यादा फ्रुक्टोज वाली चीजें फैटी लिवर की समस्या का खतरा बढ़ा सकती हैं. वहीं जरूरत से ज्यादा चीनी का सेवन हाई कोलेस्ट्रॉल, बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं से भी जुड़ा माना जाता है, जो आगे चलकर हार्ट रोग का जोखिम बढ़ा सकती हैं. कुछ रिसर्च यह भी बताती हैं कि चीनी कम करने से शरीर में ऊर्जा का लेवल ज्यादा स्थिर रह सकता है. मीठी चीजें खाने के बाद मिलने वाली तुरंत ऊर्जा कुछ ही समय में खत्म हो जाती है, जिससे थकान महसूस होने लगती है. वहीं साबुत अनाज, फल, सब्जियां और प्रोटीन से भरपूर भोजन शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा देने में मदद करते हैं.

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