ये 5 लक्षण दिख रहे हैं तो भूलकर भी न खाएं मखाना, वरना बिगड़ जाएगी सेहत

ये 5 लक्षण दिख रहे हैं तो भूलकर भी न खाएं मखाना, वरना बिगड़ जाएगी सेहत


5 Symptoms That Mean You Should Avoid Makhana: मखाना आज के समय में सबसे लोकप्रिय हेल्दी स्नैक्स में से एक माना जाता है. कम कैलोरी, अच्छी मात्रा में फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण इसे सुपरफूड भी कहा जाता है. वजन घटाने से लेकर दिल की सेहत और ब्लड शुगर कंट्रोल तक, मखाने के कई फायदे गिनाए जाते हैं. लेकिन हर हेल्दी चीज हर व्यक्ति के लिए फायदेमंद हो, यह जरूरी नहीं है. कुछ स्वास्थ्य स्थितियों में मखाने का सेवन परेशानी बढ़ा सकता है. 

पेट की दिक्कत में क्या करना चाहिए?

अगर आपको बार-बार पेट फूलने, गैस बनने या पेट में भारीपन की शिकायत रहती है, तो मखाना सोच-समझकर खाना चाहिए. इसमें फाइबर अच्छी मात्रा में होता है, जो आमतौर पर पाचन के लिए लाभदायक माना जाता है. लेकिन इरिटेबल बाउल सिंड्रोम या इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों में यही फाइबर पेट दर्द, गैस और ब्लोटिंग की समस्या को बढ़ा सकता है.

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 यूरिक एसिड बढ़ने या गाउट की समस्या

जिन लोगों को यूरिक एसिड बढ़ने या गाउट की समस्या है, उन्हें भी सावधानी बरतने की जरूरत है. मखाने में मध्यम मात्रा में प्यूरिन पाए जाते हैं. शरीर में प्यूरिन टूटकर यूरिक एसिड बनाते हैं। ऐसे में पहले से हाई यूरिक एसिड की समस्या वाले लोगों में जोड़ों का दर्द और सूजन बढ़ सकती है.

किडनी की दिक्कत

जर्नल ऑफ यूरोलॉजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर आपको किडनी स्टोन की समस्या रही है या डॉक्टर ने इसके खतरे के प्रति आगाह किया है, तो मखाने का अधिक सेवन नुकसानदायक हो सकता है. एक्सपर्ट के अनुसार इसमें ऑक्सालेट मौजूद होते हैं, जो कुछ लोगों में किडनी स्टोन बनने के जोखिम को बढ़ा सकते हैं. ऐसे लोगों को अपनी डाइट में इसकी मात्रा सीमित रखने की सलाह दी जाती है.

एलर्जी वाले लोगों को बचना चाहिए

कुछ लोगों को मखाने से एलर्जी भी हो सकती है। यदि इसे खाने के बाद त्वचा पर खुजली, लाल चकत्ते, सूजन या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे तुरंत बंद कर देना चाहिए. नट्स और सीड्स से एलर्जी वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. जर्नल ऑफ एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी  में पब्लिश स्टडी के अनुसार, बीजों  में मौजूद प्रोटीन कुछ अन्य एलर्जी पैदा करने वाले खाद्य पदार्थों के साथ क्रॉस-रिएक्शन कर सकते हैं.

इनको भी बचना चाहिए

इसके अलावा यदि आप खून पतला करने वाली दवाएं ले रहे हैं, तो भी मखाना नियमित रूप से खाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है. इसमें मौजूद विटामिन- के ब्लड के थक्के बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, जिससे कुछ दवाओं का असर बदल सकता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि मखाना नुकसानदायक है. कई रिपोर्ट्स में इसे दिल की सेहत, वजन नियंत्रण और ब्लड शुगर मैनेजमेंट के लिए फायदेमंद बताया गया है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शहरी भारत में हर तीसरा व्यक्ति फैटी लिवर का शिकार, नजरअंदाज किया तो हो सकता है कैंसर

शहरी भारत में हर तीसरा व्यक्ति फैटी लिवर का शिकार, नजरअंदाज किया तो हो सकता है कैंसर


Can Weight Loss Reverse Fatty Liver Disease: फैटी लिवर को लंबे समय तक एक मामूली समस्या माना जाता रहा. कई लोगों को अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में इसका जिक्र मिलता था, लेकिन क्योंकि कोई खास लक्षण नहीं दिखते थे, इसलिए इसे नजरअंदाज कर दिया जाता था.  हालांकि अब डॉक्टरों का कहना है कि यह गलती भविष्य में गंभीर परेशानी का कारण बन सकती है. भारत में फैटी लिवर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, अनहेल्दी खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, खराब नींद और तनावपूर्ण लाइफस्टाइल इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं. सबसे चिंता की बात यह है कि यह बीमारी कई सालों तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में बढ़ती रहती है. 

क्यों जल्दी पहचान करना जरूरी?

 डॉ. शलीन अग्रवाल ने TOI को बताया कि  फैटी लिवर उन गिनी-चुनी लिवर बीमारियों में शामिल है जिन्हें शुरुआती चरण में काफी हद तक ठीक किया जा सकता है. लेकिन इसके लिए समय रहते कदम उठाना बेहद जरूरी है. दरअसल, जब लिवर की सेल्स में जरूरत से ज्यादा फैट जमा होने लगता है, तो लिवर के सामान्य कामकाज पर असर पड़ना शुरू हो जाता है. लिवर शरीर में पोषक तत्वों को प्रोसेस करने, विषैले पदार्थों को बाहर निकालने और मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने जैसे कई महत्वपूर्ण काम करता है. इसलिए इसकी सेहत बिगड़ने का असर पूरे शरीर पर पड़ सकता है.

भारत में क्या है स्थिति?

जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल हेपेटोलॉजी में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, शहरी भारत में हर तीन में से एक व्यक्ति किसी न किसी स्तर के फैटी लिवर से प्रभावित हो सकता है. एक्सपर्ट का मानना है कि मोटापा और डायबिटीज बढ़ने के साथ यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है. 

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क्या आप इसको घर पर ठीक कर सकते हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वजन घटाकर फैटी लिवर को ठीक किया जा सकता है? इस पर डॉ. शलीन अग्रवाल कहते हैं कि शुरुआती अवस्था में इसका जवाब हां है. उनका कहना है कि लिवर में खुद को रिपेयर करने की अद्भुत क्षमता होती है, बशर्ते नुकसान स्थायी न हुआ हो. नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के नेतृत्व में हुए कई स्टडी में पाया गया है कि शरीर के कुल वजन का केवल 5 प्रतिशत कम करने से लिवर में जमा फैट घट सकता है. वहीं 7 से 10 प्रतिशत वजन कम करने पर लिवर की सूजन में भी सुधार देखा गया है. कुछ मामलों में शुरुआती फाइब्रोसिस यानी लिवर पर बनने वाले निशानों को भी कम किया जा सकता है. 

किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?

एक्सपर्ट क्रैश डाइट या तेजी से वजन घटाने की सलाह नहीं देते. उनका कहना है कि संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, ब्लड शुगर कंट्रोल और लंबे समय तक स्वस्थ आदतें अपनाना ही सबसे प्रभावी उपाय है. डॉ. शलीन अग्रवाल चेतावनी देते हैं कि अगर फैटी लिवर को नजरअंदाज किया जाए तो यह आगे चलकर लिवर में सूजन, फाइब्रोसिस, सिरोसिस, लिवर फेलियर और यहां तक कि लिवर कैंसर का कारण भी बन सकता है.  कई बार मरीज तब अस्पताल पहुंचते हैं जब स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी होती है कि लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भारत में ज्यादा चीनी, विदेश में बिना शुगर, बेबी फूड को लेकर नेस्ले की रिपोर्ट पर फिर बहस तेज

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कलाई पर रखें उंगली और 10 सेकंड में जानें दिल का हाल, एक्सपर्ट ने बताया बीमारी पकड़ने का तरीका

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How To Check Your Pulse For Heart Problems: आज के दौर में लोग अपनी सेहत को लेकर पहले से कहीं ज्यादा जागरूक हो गए हैं. कोई स्मार्टवॉच से कदम गिन रहा है तो कोई ब्लड प्रेशर और नींद पर नजर रख रहा है. लेकिन दिल की सेहत से जुड़ा एक बेहद आसान और पुराना तरीका आज भी ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं कि अपनी नाड़ी यानी पल्स चेक करना. चलिए आपको बताते हैं कि क्यों यह आपके लिए जरूरी है. 

पल्स जांचकर हार्ट के बारे में पता करना

एक्सपर्ट का कहना है कि केवल 10 सेकंड में अपनी पल्स जांचकर दिल की एक ऐसी समस्या का शुरुआती संकेत पाया जा सकता है, जो लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के शरीर में मौजूद रह सकती है. यह जानकारी खास तौर पर वर्ल्ड हार्ट रिदम वीक के दौरान महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य लोगों को दिल की धड़कन से जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूक करना है. 

कैसे काम करता है यह?

हार्ट की सबसे आम रिदम संबंधी समस्याओं में से एक है एट्रियल फिब्रिलेशन .  इस स्थिति में दिल के ऊपरी चैम्बर अनियमित तरीके से धड़कने लगते हैं और दिल की सामान्य लय बिगड़ जाती है. समस्या यह है कि कई लोगों को इसके कोई स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते. कुछ मरीजों को धड़कन तेज महसूस होना, सांस फूलना, चक्कर आना या थकान हो सकती है, लेकिन कई लोग पूरी तरह सामान्य महसूस करते हैं. 

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कई बार बिना किसी लक्षण के मौजूद

अमेरिका के नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार, एट्रियल फिब्रिलेशन कई बार बिना किसी लक्षण के मौजूद रह सकता है और इसका पता केवल नियमित जांच के दौरान चलता है.  यदि इसका समय पर इलाज न किया जाए तो स्ट्रोक और अन्य हार्ट संबंधी दिक्कतों का खतरा बढ़ सकता है. डॉ. प्रदीप जैन ने TOI को बताया कि एक साधारण पल्स चेक कई बार दिल की अनियमित धड़कन का शुरुआती संकेत दे सकता है. 

10 सेकंड में कैसे पता कर सकते हैं?

उनके अनुसार, अपनी तर्जनी और मध्यमा उंगली को अंगूठे के नीचे कलाई के अंदरूनी हिस्से पर रखें और करीब 10 सेकंड तक धड़कन महसूस करें. यदि धड़कन नियमित और समान अंतराल पर महसूस हो रही है तो आमतौर पर चिंता की बात नहीं होती. लेकिन अगर धड़कन कभी तेज, कभी धीमी या अनियमित महसूस हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो सकता है. हालांकि एक्सपर्ट यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल पल्स चेक करके एट्रियल फिब्रिलेशन या किसी अन्य बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती. यह सिर्फ एक शुरुआती चेतावनी संकेत की तरह काम करता है, जिससे समय रहते मेडिकल जांच कराई जा सके. डॉ. प्रदीप जैन के मुताबिक, बढ़ती उम्र, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, हार्ट रोग और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसी स्थितियां अनियमित दिल की धड़कन का जोखिम बढ़ा सकती हैं. भारत में इन समस्याओं के तेजी से बढ़ते मामलों को देखते हुए लोगों को अपने दिल की लय पर ध्यान देना चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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नाम भूलना सामान्य पर चेहरा भूलना बड़ी बीमारी का संकेत, एक्सपर्ट ने दी बड़ी चेतावनी

नाम भूलना सामान्य पर चेहरा भूलना बड़ी बीमारी का संकेत, एक्सपर्ट ने दी बड़ी चेतावनी


Difference Between Forgetting Names And Forgetting Faces: क्या किसी का नाम भूल जाना और उसका चेहरा भूल जाना एक ही बात है? पहली नजर में यह दोनों सामान्य भूलने की आदत लग सकती हैं, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि हमारे दिमाग में इन दोनों के लिए अलग-अलग सिस्टम काम करते हैं. यही वजह है कि किसी परिचित व्यक्ति का चेहरा पहचान लेने के बावजूद उसका नाम याद न आना आम बात है, जबकि किसी करीबी का चेहरा ही न पहचान पाना कहीं अधिक गंभीर संकेत माना जाता है. 

क्यों भूल जाता है इंसान?

कल्पना कीजिए कि आप किसी समारोह में पहुंचे और सामने खड़े व्यक्ति को देखते ही पहचान गए, लेकिन उसका नाम याद नहीं आया. ऐसा अक्सर कई लोगों के साथ होता है. दरअसल, नाम याद रखना और उसे सही समय पर दिमाग से निकाल पाना भाषा और याद से जुड़े नेटवर्क पर निर्भर करता है. वहीं चेहरों की पहचान करने का काम दिमाग के स्पेशल विजुअल रिकग्निशन नेटवर्क की तरफ किया जाता है. एपोक एल्डर केयर की मुख्य कार्यकारी अधिकारी और को- फाउंडर, डिमेंशिया विशेषज्ञ एवं क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट नेहा सिन्हा के अनुसार “किसी का नाम भूलना और किसी का चेहरा भूलना देखने में समान लग सकता है, लेकिन इनके पीछे काम करने वाले ब्रेन मार्ग पूरी तरह अलग होते हैं. यह पहचान और स्मरण के बीच का अंतर है.”

क्या नाम भूल जाना सामान्य होता है?

एक्सपर्ट का कहना है कि नाम केवल एक शब्द या पहचान का लेबल होता है, जिसका अक्सर किसी सीन छवि से सीधा संबंध नहीं होता. इसलिए तनाव, थकान, व्यस्तता या एक साथ कई लोगों से मिलने जैसी परिस्थितियों में नाम भूल जाना सामान्य माना जाता है. नेहा सिन्हा बताती हैं कि तेज रफ्तार सामाजिक माहौल में किसी का नाम भूल जाना पूरी तरह सामान्य बात है और अधिकांश स्वस्थ वयस्कों के साथ ऐसा कभी न कभी होता है.

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क्या इससे कोई दिक्कत होती है?

हालांकि, चेहरों को पहचानने की क्षमता ह्यूमन इवोल्यूशन का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. इंसान हजारों वर्षों से अपने परिवार, दोस्तों और संभावित खतरों की पहचान चेहरे के आधार पर करता आया है. यही कारण है कि ब्रेन में चेहरे पहचानने के लिए विशेष नेटवर्क मौजूद होते हैं. रिसर्च बताते हैं कि इन नेटवर्क्स में किसी प्रकार की गड़बड़ी या गिरावट होने पर प्रोसोपैग्नोसिया यानी फेस ब्लाइंडनेस जैसी स्थिति विकसित हो सकती है. कुछ मामलों में इसका संबंध अल्जाइमर रोग, फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से भी देखा गया है. बार-बार होने वाली स्मृति संबंधी समस्याएं न्यूरोकॉग्निटिव गिरावट का शुरुआती संकेत हो सकती हैं. खासकर अल्जाइमर और फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया जैसी स्थितियों में कई बार चेहरे पहचानने की क्षमता प्रभावित होना अन्य लक्षणों से पहले भी दिखाई दे सकता है. इसलिए यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार के सदस्य, जीवनसाथी या बेहद करीबी लोगों को पहचानने में कठिनाई महसूस करने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कब एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी?

असल अंतर यही है कि कभी-कभार किसी का नाम भूल जाना उम्र बढ़ने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन परिचित चेहरों को पहचानने में लगातार कठिनाई होना गंभीर चेतावनी संकेत साबित हो सकता है. इसलिए हर छोटी भूल पर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन यदि स्मृति संबंधी बदलाव बार-बार होने लगें, बढ़ते जाएं या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें, तो एक्सपर्ट से सलाह लेना जरूरी है.

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सावधान! वायु प्रदूषण से कमजोर होती है याददाश्त, दिमाग को भी पहुंच रहा भारी नुकसान

सावधान! वायु प्रदूषण से कमजोर होती है याददाश्त, दिमाग को भी पहुंच रहा भारी नुकसान


How Air Pollution Affects Memory And Brain Function: हम रोज जिस हवा में सांस लेते हैं, उसका असर सिर्फ लंग्स और हार्ट तक सीमित नहीं है. नई रिसर्च बताती है कि वायु प्रदूषण हमारे ब्रेन और याददाश्त को भी नुकसान पहुंचा सकता है. खासतौर पर ट्रैफिक, इंडस्ट्री और जंगलों में लगने वाली आग से निकलने वाले सूक्ष्म प्रदूषक कणों का संबंध कमजोर होती कॉग्निटिव फंक्शन से पाया गया है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे प्रदूषण आपके ब्रेन को प्रभावित कर रहा है. 

क्या सच में ब्रेन पर पड़ता है असर?

यह स्टडी कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के रिसर्चर की तरफ से किया गया है और 13 मई 2026 को जर्नल स्ट्रोक में ऑनलाइन पब्लिश हुआ. रिसर्च में पाया गया कि जिन इलाकों में वायु प्रदूषण का स्तर अधिक था, वहां रहने वाले लोगों का प्रदर्शन याददाश्त, समझने की क्षमता और मानसिक गति से जुड़े परीक्षणों में अपेक्षाकृत कमजोर रहा. दिलचस्प बात यह है कि यह असर उन क्षेत्रों में भी देखा गया जहां वायु प्रदूषण का स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से कम माना जाता है.

किस प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर होता है?

रिसर्च के दौरान यह भी सामने आया कि ट्रैफिक से पैदा होने वाले प्रदूषण के अधिक संपर्क में रहने वाले लोगों के दिमाग में एमआरआई स्कैन के जरिए कुछ सूक्ष्म क्षति के संकेत दिखाई दिए. महिलाओं में यह प्रभाव और अधिक स्पष्ट पाया गया. रिसर्चर ने हाईबीपी, डायबिटीज और शरीर में अतिरिक्त चर्बी जैसे हार्ट रोग संबंधी जोखिम कारकों को भी ध्यान में रखा, लेकिन इसके बावजूद वायु प्रदूषण और दिमागी बदलावों के बीच संबंध बना रहा. 

धीरे- धीरे प्रभावित करते हैं

मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च मेथड्स, एविडेंस एंड इम्पैक्ट के एसोसिएट प्रोफेसर रसेल डी सूजा कहते हैं कि डिमेंशिया अचानक नहीं होता. यह कई दशकों में धीरे-धीरे विकसित होता है. ऐसे कारकों की पहचान करना जो शुरुआती चरण में दिमाग को नुकसान पहुंचा सकते हैं और जिन्हें रोका जा सकता है, भविष्य में ब्रेन हेल्थ  की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है.  हालांकि यह स्टडी सीधे तौर पर यह साबित नहीं करता कि वायु प्रदूषण डिमेंशिया का कारण बनता है, लेकिन यह उन बढ़ते साइंटफिक प्रमाणों में एक और महत्वपूर्ण कड़ी जोड़ता है जो बताते हैं कि हवा की गुणवत्ता उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है.

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इस अध्ययन की प्रमुख लेखक और मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन की असिस्टेंट प्रोफेसर सैंडी अज़ाब कहती हैं कि कनाडा की हवा को अक्सर साफ माना जाता है, लेकिन हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि कम स्तर का वायु प्रदूषण भी ब्रेन हेल्थ पर असर डाल सकता है. ये बदलाव कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के वर्षों पहले शुरू हो जाते हैं. 

लोगों की सोचने-समझने की क्षमता पर स्टडी

शोधकर्ताओं ने करीब 7,000 मध्यम आयु वर्ग के लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया. उन्होंने पीएम2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषकों के लंबे समय तक संपर्क और लोगों की सोचने-समझने की क्षमता के बीच संबंध का स्टडी किया. एक्सपर्ट का मानना है कि भविष्य में और लंबे समय तक किए जाने वाले स्टडी यह समझने में मदद करेंगे कि स्वच्छ हवा किस तरह दिमाग और याददाश्त को सुरक्षित रखने में भूमिका निभा सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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