क्या भारतीय थाली सच में बढ़ाती है डायबिटीज, जानें किन लोगों के लिए सही नहीं है दाल-रोटी?

क्या भारतीय थाली सच में बढ़ाती है डायबिटीज, जानें किन लोगों के लिए सही नहीं है दाल-रोटी?


Does Indian Thali Increase Diabetes Risk: भारत में खाने की बात हो और थाली में दाल, रोटी और चावल न हों, ऐसा कम ही देखने को मिलता है. कई घरों में आज भी लोग एक ही भोजन में चावल और रोटी दोनों खाते हैं. यह सिर्फ स्वाद या आदत का मामला नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है. लेकिन अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यही आदत कुछ लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है.

क्यों हो रही है दिक्कत?

भारत पहले से ही दुनिया में सबसे ज्यादा डायबिटीज मरीजों वाले देशों में गिना जाता है. ऐसे में डॉक्टर अब उन खानपान की आदतों पर भी नजर डाल रहे हैं जो ब्लड शुगर बढ़ाने और मोटापे का जोखिम बढ़ाने में भूमिका निभा सकती हैं. सीके बिरला हॉस्पिटल, जयपुर की सीनियर डाइटिशियन दिव्या जैन बताती हैं कि समस्या दाल, रोटी या चावल में नहीं है, बल्कि इन्हें किस मात्रा में और किस तरह खाया जा रहा है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है.

भारतीय थाली किन लोगों को कर रही बीमार?

दरअसल, एक सामान्य भारतीय थाली में अक्सर चावल, रोटी, आलू की सब्जी, दाल, मिठाई और कभी-कभी मीठे पेय भी शामिल होते हैं. इनमें से ज्यादातर चीजें कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होती हैं. जब एक ही भोजन में कई कार्ब स्रोत शामिल हो जाते हैं, तो शरीर पर ग्लूकोज का भार बढ़ जाता है. इसका असर खासतौर पर उन लोगों पर ज्यादा पड़ सकता है जो पहले से प्रीडायबिटीज, डायबिटीज, मोटापे, हाई ब्लड प्रेशर या इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं.

क्या करते हैं हम गलती?

दिव्या जैन कहती हैं कि आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोगों की थाली में कार्बोहाइड्रेट तो भरपूर होता है, लेकिन प्रोटीन और फाइबर की मात्रा कम होती है। कई लोग दो-तीन रोटियों के साथ चावल भी खाते हैं, जबकि पनीर, दही, अंडे, मछली, चिकन या दाल जैसी प्रोटीन वाली चीजें सीमित मात्रा में लेते हैं, वहीं सब्जियों को अक्सर सिर्फ साइड डिश की तरह देखा जाता है.

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हमें किस बात का ध्यान रखना चाहिए?

आधुनिक लाइफस्टाइल ने इस समस्या को और बढ़ाया है। पहले लोग अधिक शारीरिक मेहनत करते थे, जिससे शरीर अतिरिक्त एनर्जी का उपयोग कर लेता था. लेकिन अब लंबे समय तक बैठकर काम करना, कम शारीरिक गतिविधि और प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा रहा है. हालांकि इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको चावल या रोटी खाना बंद कर देना चाहिए. एक्सपर्ट के अनुसार दोनों ही संतुलित आहार का हिस्सा हो सकते हैं. जरूरत इस बात की है कि थाली का संतुलन सही रखा जाए.

कैसी होनी चाहिए हमारी थाली?

स्वस्थ थाली के लिए आधी प्लेट में सब्जियां और सलाद रखें. एक चौथाई हिस्से में दाल, पनीर, अंडा, चिकन, मछली या दही जैसे प्रोटीन स्रोत शामिल करें. बाकी एक चौथाई हिस्से में रोटी या चावल रखें. नियमित रूप से बड़ी मात्रा में चावल और रोटी दोनों एक साथ खाने से बचें. एक्सपर्ट का कहना है कि डायबिटीज का खतरा किसी एक खाद्य पदार्थ से नहीं, बल्कि लंबे समय तक बनी असंतुलित खाने की आदतों से बढ़ता है. इसलिए दाल-रोटी छोड़ने की नहीं, बल्कि थाली को संतुलित बनाने की जरूरत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लंबी उम्र के लिए कार्डियो या स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, जानें कौन सही, समय से पहले मौत का खतरा 58% कम

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Is Strength Training Better Than Cardio For Longevity: फिटनेस की दुनिया में लंबे समय से एक बहस चलती आ रही है कि बेहतर स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए कार्डियो ज्यादा जरूरी है या फिर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग? एक तरफ दौड़ना, साइकिल चलाना और तेज चाल से चलने जैसी गतिविधियों के समर्थक हैं, तो दूसरी ओर वजन उठाने और मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज को सबसे प्रभावी मानने वाले लोग हैं. लेकिन अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर की एक बड़ी स्टडी ने इस बहस को नई दिशा दे दी है.

अलग-अलग एक्सरसाइज से क्या होता है असर?

ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में पब्लिश इस रिसर्च में 1 लाख 47 हजार 374 एडल्ट के स्वास्थ्य और व्यायाम की आदतों का करीब 30 वर्षों तक एनालिसिस किया गया. रिसर्चर ने यह जानने की कोशिश की कि अलग-अलग प्रकार की एक्सरसाइज का मृत्यु दर, हृदय रोग, कैंसर और ब्रेन संबंधी बीमारियों पर क्या असर पड़ता है. रिसर्चर का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष यह रहा कि ज्यादा व्यायाम हमेशा ज्यादा फायदा नहीं देता. खासतौर पर स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के मामले में एक तय सीमा के बाद लाभ बढ़ना लगभग रुक जाता है. रिसर्च के अनुसार, सप्ताह में 90 से 120 मिनट तक मांसपेशियों को मजबूत बनाने वाली एक्सरसाइज करना सबसे फायदेमंद साबित हुआ. 

कितने घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग फायदेमंद?

जो लोग हर सप्ताह लगभग डेढ़ से दो घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करते थे, उनमें किसी भी कारण से मृत्यु का खतरा 13 प्रतिशत कम पाया गया. वहीं हार्ट संबंधी बीमारियों से मौत का जोखिम 19 प्रतिशत और अल्जाइमर जैसी ब्रेन संबंधी बीमारियों से मृत्यु का खतरा 27 प्रतिशत तक कम देखा गया.  रिसर्चर का कहना है कि दो घंटे से अधिक स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने पर अतिरिक्त लाभ बहुत सीमित हो जाते हैं.  हालांकि इस स्टडी का निष्कर्ष यह नहीं है कि स्ट्रेंथ ट्रेनिंग कार्डियो से बेहतर है. असल में सबसे ज्यादा फायदे उन लोगों को मिले जिन्होंने दोनों तरह की एक्सरसाइज को अपनी रूटीन का हिस्सा बनाया. कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का संतुलित कम्बिनेशन समय से पहले मृत्यु के जोखिम को 58 प्रतिशत तक कम करने से जुड़ा पाया गया.

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स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करने से क्या होता है फायदा?

एक्सपर्ट का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर में मांसपेशियां कम होने लगती हैं, जिसे सारकोपेनिया कहा जाता है. इसके कारण कमजोरी, गिरने का खतरा, धीमा मेटाबॉलिज्म और रोजमर्रा के काम करने में परेशानी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग इन दिक्कतों को कम करने में मदद करती है. इसके अलावा यह हड्डियों को मजबूत बनाती है, इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार करती है, ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने में मदद करती है और ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे को भी कम कर सकती है. डंबल, रेजिस्टेंस बैंड, बॉडीवेट एक्सरसाइज, योग, पिलाटीज और यहां तक कि कुछ कठिन बागवानी गतिविधियां भी इसमें शामिल मानी जाती हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, तीव्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण नियमितता है.

किसको चुनना बेहतर?

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की इस स्टडी का संदेश साफ है. यदि आप लंबा और स्वस्थ जीवन जीना चाहते हैं तो कार्डियो और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है. सप्ताह में लगभग दो घंटे स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और नियमित कार्डियो एक्सरसाइज का कम्बिनेशन आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और कई गंभीर बीमारियों के दिक्कतों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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नींबू पानी में भूलकर भी ना डालें ये चीज, जहर बन जाएगी फायदा देने वाली ये ड्रिंक

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Why You Should Avoid Adding Sugar To Lemon Water: गर्मी के मौसम में नींबू पानी सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले पेयों में से एक है. शरीर को ठंडक पहुंचाने से लेकर डिहाइड्रेशन से बचाने तक, इसके कई फायदे बताए जाते हैं. लेकिन अक्सर लोग इसका स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें भरपूर मात्रा में चीनी मिला देते हैं. यही आदत इस हेल्दी ड्रिंक के फायदों को कम कर सकती है. अगर आप भी रोजाना नींबू पानी पीते हैं, तो यह जानना जरूरी है कि इसमें जरूरत से ज्यादा चीनी मिलाना आपकी सेहत के लिए सही नहीं माना जाता.

नींबू पानी पीना फायदेमंद

नींबू पानी बिना चीनी के भारतीय घरों में लंबे समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है. पारंपरिक निंबू पानी में अक्सर काला नमक, सेंधा नमक या भुना हुआ जीरा मिलाया जाता है. यह मिश्रण शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ-साथ जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स की पूर्ति करने में मदद करता है. खासकर गर्मी और उमस के दिनों में यह ड्रिंक काफी राहत देती है. आयुर्वेद में भी नींबू को महत्वपूर्ण माना गया है. कई लोग सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू मिलाकर पीते हैं. माना जाता है कि इससे पाचन क्रिया को सक्रिय करने, शरीर को तरोताजा रखने और दिन की शुरुआत बेहतर तरीके से करने में मदद मिल सकती है. नींबू में मौजूद विटामिन-सी शरीर की इम्यून क्षमता को मजबूत बनाने में भी अहम भूमिका निभाता है.

चीनी मिलाने से क्या दिक्कत?

Utopian की रिपोर्ट के अनुसार, जब नींबू पानी में ज्यादा चीनी मिला दी जाती है, तो इसकी कैलोरी बढ़ जाती है. नियमित रूप से अधिक चीनी का सेवन वजन बढ़ने, ब्लड शुगर लेवल प्रभावित होने और अन्य हेल्थ समस्याओं के जोखिम को बढ़ा सकता है. यही वजह है कि आजकल कई हेल्थ एक्सपर्ट और डाइट एक्सपर्ट नींबू पानी को बिना चीनी या कम चीनी के पीने की सलाह देते हैं.

संतरे के जूस में भी नहीं मिलाना चाहिए

सिर्फ नींबू ही नहीं, संतरे का जूस भी बिना चीनी के ज्यादा फायदेमंद माना जाता है. संतरे में प्राकृतिक रूप से मिठास होती है, इसलिए इसमें अतिरिक्त चीनी मिलाने की जरूरत नहीं पड़ती. बिना चीनी वाला ताजा संतरे का जूस विटामिन-सी का अच्छा सोर्स है और शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद कर सकता है. यही कारण है कि फिटनेस और हेल्थ को लेकर जागरूक लोग अब ऐसे पेयों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिनमें अतिरिक्त चीनी न हो.

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स्वाद बढ़ाने के लिए क्या करें?

अगर आपको नींबू पानी का स्वाद बढ़ाना है, तो चीनी की जगह पुदीने की पत्तियां, काला नमक, सेंधा नमक या भुना जीरा इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे स्वाद भी बेहतर होगा और पेय की पौष्टिकता भी बनी रहेगी. वहीं संतरे का जूस हमेशा ताजा और बिना अतिरिक्त चीनी के पीना बेहतर माना जाता है. आज के समय में जब लोग पैकेज्ड और ज्यादा मीठे पेयों से दूरी बना रहे हैं, तब नींबू पानी और संतरे का जूस जैसे प्राकृतिक विकल्प फिर से लोकप्रिय हो रहे हैं. इसलिए अगली बार जब आप नींबू पानी बनाएं, तो उसमें चीनी डालने से पहले एक बार जरूर सोचें. कई बार छोटी-सी आदत ही आपकी हेल्थ पर बड़ा असर डाल सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सर्जरी के बाद रेडिएशन थेरेपी से थमेगा ब्लैडर कैंसर, दोबारा बीमारी लौटने का खतरा हुआ बेहद कम

सर्जरी के बाद रेडिएशन थेरेपी से थमेगा ब्लैडर कैंसर, दोबारा बीमारी लौटने का खतरा हुआ बेहद कम


How Radiation Therapy Helps In Bladder Cancer Treatment: ब्लैडर कैंसर के इलाज में सर्जरी को सबसे प्रभावी तरीकों में से एक माना जाता है, लेकिन कई मरीजों में ऑपरेशन के बाद भी बीमारी दोबारा लौटने का खतरा बना रहता है. खासतौर पर हाई-रिस्क मसल-इनवेसिव ब्लैडर कैंसर के मरीजों में यह चुनौती अधिक देखने को मिलती है. ऐसे में एक नए स्टडी ने संकेत दिया है कि सर्जरी के बाद दी जाने वाली रेडिएशन थेरेपी मरीजों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है और कैंसर की वापसी के जोखिम को कम कर सकती है. 

कैसे काम करती है रेडिएशन थेरेपी?

 जर्नल ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी में पब्लिश रिसर्च निष्कर्ष में  एक फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल से सामने आया है. रिसर्चर ने पाया कि ब्लैडर को सर्जरी के जरिए हटाने और कीमोथेरेपी लेने के बाद रेडिएशन थेरेपी कराने वाले मरीजों में कैंसर के दोबारा उसी क्षेत्र में लौटने की संभावना कम रही. स्टडी के अनुसार, रेडिएशन थेरेपी से बीमारी पर बेहतर नियंत्रण हासिल किया जा सकता है, हालांकि कुल जीवित रहने की दर और बीमारी- मुक्त रहने की अवधि में दिखा सुधार पूरी तरह महत्वपूर्ण नहीं माना गया. 

किन लोगों को रिसर्च में शामिल किया गया?

यह टेस्ट भारत के चार शैक्षणिक चिकित्सा केंद्रों में किया गया, जिसमें नॉन-मेटास्टेटिक मसल-इनवेसिव ब्लैडर कैंसर से पीड़ित 153 मरीज शामिल थे. इनमें से 71 प्रतिशत मरीजों को सर्जरी से पहले कीमोथेरेपी दी गई थी, जबकि करीब 20 प्रतिशत मरीजों ने सर्जरी के बाद कीमोथेरेपी प्राप्त की. इसके बाद कुछ मरीजों को रेडिएशन थेरेपी दी गई, जबकि अन्य मरीजों को केवल निगरानी में रखा गया.

क्या निकला इसका रिजल्ट?

रेडियोथेरेपी सर्जरी या अंतिम कीमोथेरेपी सत्र के आठ सप्ताह के भीतर शुरू की गई. लगभग 47 महीने तक मरीजों की निगरानी के बाद रिसर्चर ने पाया कि दो साल तक कैंसर के स्थानीय या आसपास के हिस्सों में दोबारा न लौटने की दर रेडिएशन समूह में 87.1 प्रतिशत रही, जबकि केवल निगरानी वाले समूह में यह आंकड़ा 76 प्रतिशत था. रिसर्चर ने कहा कि एडजुवेंट पेल्विक इंटेंसिटी-मॉड्यूलेटेड रेडिएशन थेरेपी ने हाई-रिस्क यूरोथेलियल मसल-इनवेसिव ब्लैडर कैंसर मरीजों में लोकल कंट्रोल बेहतर किया और इसके साथ गंभीर बुरे प्रभाव में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं देखी गई. यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे सर्जरी के बाद दिए जाने वाले उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहे हैं.

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डिजीज-फ्री सर्वाइवल 71.6 प्रतिशत 

स्टडी में यह भी देखा गया कि रेडिएशन लेने वाले मरीजों में डिजीज-फ्री सर्वाइवल 71.6 प्रतिशत रही, जबकि दूसरे समूह में यह 58.7 प्रतिशत थी. इसी तरह ब्लैडर कैंसर-विशिष्ट सर्वाइवल और ओवरऑल सर्वाइवल के आंकड़े भी रेडिएशन समूह में बेहतर पाए गए.  हालांकि इन परिणामों को स्टेटिकल फॉर्म से निर्णायक नहीं माना गया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिन मरीजों को पेल्विक रेडिएशन दी गई, उनमें लोकल या क्षेत्रीय स्तर पर कैंसर की पुनरावृत्ति केवल 7.9 प्रतिशत मामलों में हुई. वहीं, निगरानी वाले समूह में यह दर 25.6 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि रेडिएशन थेरेपी कैंसर को उसी क्षेत्र में वापस आने से रोकने में अहम भूमिका निभा सकती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने पर भी आ सकता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट से जानें

क्या कोलेस्ट्रॉल नॉर्मल होने पर भी आ सकता है हार्ट अटैक? एक्सपर्ट से जानें


Hidden Cholesterol Marker: बदलती लाइफस्टाइल के चलते हमें हार्ट से जुड़ी तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में  हार्ट की सेहत की बात होती है तो आमतौर पर लोग एलडीएल, एचडीएल और ट्राइग्लिसराइड जैसे कोलेस्ट्रॉल के आंकड़ों पर ध्यान देते हैं. ज्यादातर लोग मानते हैं कि अगर उनकी कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल है तो उनका दिल पूरी तरह सुरक्षित है. लेकिन हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां लोगों को कम उम्र में हार्ट अटैक आया, जबकि उनकी सामान्य कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं थी. यही वजह है कि अब डॉक्टर केवल LDL, HDL और ट्राइग्लिसराइड्स पर ही ध्यान नहीं दे रहे हैं, बल्कि कुछ ऐसे छिपे हुए जोखिमों की भी जांच करने की सलाह दे रहे हैं जो सामान्य टेस्ट में नजर नहीं आते. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई बार शरीर के अंदर ऐसी समस्याएं मौजूद होती हैं जो रिपोर्ट में नहीं दिखतीं, लेकिन दिल की सेहत पर गंभीर असर डाल सकती हैं. 

क्या है Lp(a), जिसे बताया जा रहा है छिपा हुआ खतरा?

डॉक्टरों के अनुसार Lipoprotein(a) या Lp(a) एक खास तरह का कोलेस्ट्रॉल कण होता है, जो दिखने में LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल जैसा होता है, लेकिन इसमें एक अतिरिक्त प्रोटीन जुड़ा होता है. यही वजह है कि यह रक्त नलिकाओं में चर्बी जमा होने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि सामान्य लिपिड प्रोफाइल टेस्ट में Lp(a) की जांच नहीं की जाती. ऐसे में किसी व्यक्ति की कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट सामान्य आ सकती है, लेकिन फिर भी उसके दिल को खतरा बना रह सकता है. 

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बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले

भारत में डॉक्टरों को एक चिंताजनक ट्रेंड दिखाई दे रहा है. कई लोग जिनकी कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट सामान्य होती है, वे भी 30 से 40 की उम्र में हार्ट अटैक का शिकार हो रहे हैं. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ का मानना है कि इसके पीछे जेनेटिक कारणों से बढ़ा हुआ Lp(a) लेवल एक अहम वजह हो सकता है. यह फैक्टर ज्यादातर जेनेटिक्स से प्रभावित होता है, इसलिए डाइट या एक्सरसाइज का इस पर सीमित असर पड़ता है.

भारत में तेजी से बढ़ रहे हैं मामले

एक्सपर्ट के अनुसार भारत में समय से पहले दिल की बीमारी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. कई रिपोर्टों में बताया गया है कि देश में होने वाली कुल मौतों का बड़ा हिस्सा हार्ट रोगों से जुड़ा है. चिंता की बात यह है कि कई मरीजों में हार्ट अटैक पश्चिमी देशों की तुलना में 10 से 15 साल पहले हो रहा है. जेनेटिक प्रवृत्ति, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, अनएक्टिव लाइफस्टाइल और छिपे हुए लिपिड मार्कर जैसे Lp(a) इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं.

डॉक्टरों का कहना है कि जिन लोगों के परिवार में कम उम्र में हार्ट अटैक, स्ट्रोक या दिल की बीमारी के मामले रहे हों, उन्हें कम से कम एक बार Lp(a) टेस्ट जरूर करवाना चाहिए. इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और खराब लाइफस्टाइल वाले लोगों को भी दिल की जांच को गंभीरता से लेना चाहिए. हालांकि Lp(a) को सीधे कम करना आसान नहीं माना जाता, लेकिन इसकी जानकारी होने पर दूसरे जोखिमों जैसे LDL कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को बेहतर तरीके से कंट्रोल किया जा सकता है. 

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