बार-बार मुंह में हो रहे हैं छाले तो न करें नजरअंदाज, हो सकती है यह लाइलाज बीमारी

बार-बार मुंह में हो रहे हैं छाले तो न करें नजरअंदाज, हो सकती है यह लाइलाज बीमारी


मुंह में छाले होना एक आम समस्या है जो बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक किसी को भी हो सकती है. अक्सर लोग इसे हल्के में लेते हैं और मान लेते हैं कि कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाएगा. लेकिन अगर मुंह में छाले बार-बार हो रहे हैं तो यह किसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है. वहीं ज्यादातर मामलों में छाले 7 से 14 दिनों में ठीक हो जाते हैं, लेकिन बार-बार छाले होना इस बात इशारा है कि शरीर के अंदर कुछ गड़बड़ चल रही है, जिसे नजरअंदाज करना नुकसानदायक हो सकता है. 

मुंह में छाले होने के आम कारण 

डॉक्टरों के अनुसार मुंह में छाले होने के पीछे कई वजह हो सकती है. सबसे आम कारण शरीर में विटामिन बी-12, आयरन या फोलिक एसिड की कमी है. इसके अलावा पेट की गड़बड़ी एसिडिटी, कब्ज और ज्यादा मसालेदार या ऑयली खाना खाने से भी छाले हो सकते हैं. महिलाओं में हार्मोनल बदलाव खासकर पीरियड्स के दौरान भी मुंह में छाले की समस्या देखी जाती है. वहीं खराब लाइफस्टाइल और कमजोर इम्यून सिस्टम भी इसका कारण बन सकते हैं. 

कब बन सकता है यह गंभीर बीमारी का संकेत?

डॉक्टरों के अनुसार अगर किसी व्यक्ति को हर महीने बार-बार मुंह में छाले हो रहे हैं और इसके साथ हल्का खून आ रहा है या बिना वजह वजन घट रहा है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. इसके अलावा अगर मुंह में कोई एक छाला महीनों तक ठीक नहीं हो रहा है, तो यह ओरल कैंसर का संकेत भी हो सकता है. ऐसे मामलों में तुरंत डॉक्टर से जांच कराना जरूरी होता है. वहीं बार-बार मुंह में छाले होना केवल पोषक तत्वों की कमी नहीं बल्कि आंतों की बीमारी, थायराइड, डायबिटीज या कमजोर इम्यून सिस्टम से भी जुड़ा हो सकता है. कुछ मामलों में एचआईवी जैसी खतरनाक बीमारी में भी ऐसे लक्षण दिख सकते हैं, हालांकि हर केस में ऐसा होना जरूरी नहीं है. 

इन लोगों को ज्यादा खतरा

कुछ लोगों में मुंह के छाले का खतरा ज्यादा होता है. जैसे तंबाकू या धूम्रपान करने वाले, डायबिटीज के मरीज, विटामिन बी-12 की कमी वाले लोग और जिनको पेट की समस्या रहती है उनमें इसका खतरा ज्यादा रहता है. इसके अलावा जो ज्यादा मसालेदार खाना खाते हैं उनको भी इसकी समस्या रहती है. 

मुंह में छाले होने पर क्या सावधानी रखें?

मुंह में छाले होने पर मिर्च-मसाले, अचार, तली-भुनी चीजें और खट्टे फलों से परहेज करना चाहिए. गर्म चाय-कॉफी भी छालों में जलन बढ़ा सकती है. इसके अलावा ओरल हाइजीन का ध्यान रखना और हल्का सादा खाना खाना भी फायदेमंद होता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बिना बीमारी बच्चों की कट जाएगी सर्दी, अगर बच्चों को पिला दी हर किचन में मिलने वाली ये 3 चीजें

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मेडिकल साइंस भी फेल? 50 साल से नहीं सोया यह रिटायर्ड अफसर, क्या ऐसा सच में पॉसिबल?

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Can A Human Survive Without Sleep For 50 Years: कुछ चीजें न सिर्फ इंसान को हैरान कर देती हैं, बल्कि साइंस भी इससे चकित हो जाता है. अगर आप भारत में हैं, तो आप इस तरह के दावों और सच्चाई से हर कुछ न कुछ दिन में रूबरू होते रहते होंगे. ऐसा ही मानव के साथ-साथ मेडिकल साइंस को चकित कर देने वाला दावा मध्य प्रदेश में किया गया है. एमपी के रीवा के रहने वाले 75 साल के रिटायर्ड ज्वाइंट कलेक्टर मोहन लाल द्विवेदी ने बताया कि उनको पिछले 50 सालों से नींद नहीं आई है. सबसे हैरानी की बात यह है कि जहां मेडिकल एक्सपर्ट और रिसर्च यह बताते रहते हैं कि इंसान के लिए नींद कितनी जरूरी है, और अगर प्रॉपर नींद न मिले तो तमाम तरह की बीमारियां और दिक्कतें होने लगती हैं, वहीं मोहन लाल बिना सोए एक सामान्य, सक्रिय और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर कैसे यह संभव है.

मोहन लाल का क्या है दावा?

एबीपी न्यूज से बात करते हुए एमपी के रीवा जिले की चाणक्यपुरी कॉलोनी में रहने वाले मोहनलाल द्विवेदी का कहना है कि उनके साथ यह समस्या साल 1973 के आसपास शुरू हुई थी. तभी से उन्हें नींद नहीं आती. दूसरी तरफ मेडिकल साइंस में बड़े-बड़े और मोटे-मोटे शब्दों में लिखा जाता है कि “Sleep is the Best Medicine”. एक हेल्दी और फिट इंसान को रोजाना 6 से 8 घंटे की नींद जरूरी होती है. अगर वह लंबे समय तक नींद न ले, तो उसके शरीर में इसका असर दिखना शुरू हो जाता है. उनके दावे के अनुसार, उन्हें न तो नींद महसूस होती है और न ही चोट लगने पर सामान्य लोगों जैसी पीड़ा होती है. रातभर जागने के बावजूद उन्हें आंखों में जलन, थकान या काम करने की क्षमता में कोई कमी महसूस नहीं होती.

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1973 में लेक्चरर के तौर पर की थी. 1974 में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर डिप्टी तहसीलदार बने और 2001 में संयुक्त कलेक्टर के पद से रिटायर हुए. मोहन लाल बताते हैं कि वे अपना ज्यादा समय किताबें पढ़ने में बिताते हैं और अक्सर रात में छत पर टहलते हुए नजर आते हैं. इसमें एक हैरानी वाली बात यह है कि उनकी पत्नी भी 3 से 4 घंटे की नींद लेती हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

आजमगढ़ जिला चिकित्सालय के वरीय फिजिशियन डॉ. आरेश सिंह का साफ कहना है कि “मेडिकल साइंस के हिसाब से यह संभव नहीं माना जाता कि कोई इंसान 50 साल तक बिल्कुल भी न सोया हो.” वे बताते हैं कि इंसान का दिमाग बिना नींद के कुछ ही दिनों में गंभीर रूप से प्रभावित होने लगता है. इसके अलावा लंबे समय तक नींद न मिलने से याददाश्त, सोचने की क्षमता, हार्मोन, दिल और इम्युनिटी पर असर पड़ता है.

नींद न लेने से शरीर पर क्या असर पड़ता है?

ब्रेन पर असर

  • याददाश्त कमजोर होने लगती है
  • ध्यान लगाने और फैसले लेने में दिक्कत
  • चिड़चिड़ापन, तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा
  • लंबे समय में भ्रम और सोचने की क्षमता कम हो सकती है

हार्ट और ब्लड प्रेशर

  • हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है
  • हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम
  • हार्ट पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है

इम्युनिटी कमजोर

  • शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत घटती है
  • बार-बार सर्दी, खांसी और इंफेक्शन
  • घाव भरने में ज्यादा समय लगता है

वजन और हार्मोन

  • भूख बढ़ाने वाले हार्मोन एक्टिव हो जाते हैं
  • मोटापा और डायबिटीज का खतरा
  • हार्मोनल बैलेंस बिगड़ सकता है

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिर्फ वजन उठाने से नहीं बनती है बॉडी, मसल्स के लिए जरूरी है ये 7 पावरफुल फूड्स

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चिकन को ब्रेस्ट मसल्स बनाने के लिए सबसे अच्छा फूड माना जाता है. इसमें फैट कम और प्रोटीन ज्यादा होता है. वहीं सिर्फ 3 औंस चिकन में 26 से 31 ग्राम तक प्रोटीन होता है. इसे ग्रिल, बेक या स्टिर फ्राई करके वर्कआउट से पहले या बाद में खाया जा सकता है. चिकन को ब्राउन राइस या शकरकंद के साथ लेने से एनर्जी और रिकवरी भी सही होती है.

ग्रीक योगर्ट में व्हे और कैसीन दोनों तरह का प्रोटीन होता है, जिससे मसल्स को लंबे समय तक अमीनो एसिड मिलते रहते हैं. इसमें सामान्य दही की तुलना में लगभग दोगुना प्रोटीन होता है. वहीं वर्कआउट के बाद या सोने से पहले इसे खाना ज्यादा फायदेमंद होता है. स्वाद के लिए इसमें फल, नट्स या फिर थोड़ा शहद मिला सकते हैं.

ग्रीक योगर्ट में व्हे और कैसीन दोनों तरह का प्रोटीन होता है, जिससे मसल्स को लंबे समय तक अमीनो एसिड मिलते रहते हैं. इसमें सामान्य दही की तुलना में लगभग दोगुना प्रोटीन होता है. वहीं वर्कआउट के बाद या सोने से पहले इसे खाना ज्यादा फायदेमंद होता है. स्वाद के लिए इसमें फल, नट्स या फिर थोड़ा शहद मिला सकते हैं.

Published at : 20 Jan 2026 06:54 AM (IST)

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सफेद-पीले के अलावा अंडे का यह हिस्सा भी होता है ताकतवर, हड्डियों को देता है भरपूर ताकत

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Eggshell Powder Calcium Benefits: अंडा हमारी सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है, इसी कारण लोग इसको खूब खाते हैं और छिलका उतार कर फेंक देते हैं. लेकिन अंडे का छिलका कैल्शियम का सबसे सस्ता और असरदार प्राकृतिक स्रोत माना जाता है. जहां ज्यादातर लोग इसे कचरे में फेंक देते हैं, वहीं सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह हड्डियों की सेहत के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है. बाजार में रेडीमेड एगशेल पाउडर भी मिलता है, वहीं इसे घर पर भी तैयार किया जा सकता है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.

अंडे का छिलका आखिर होता क्या है?

अंडे का छिलका दरअसल अंडे की बाहरी सख्त परत होती है, जो ज्यादातर कैल्शियम कार्बोनेट से बनी होती है. इसके अलावा इसमें थोड़ी मात्रा में प्रोटीन और अन्य मिनरल्स भी पाए जाते हैं. कैल्शियम वही मिनरल है जो हड्डियों और दांतों की मजबूती के लिए सबसे जरूरी माना जाता है. रिसर्च के मुताबिक, मुर्गी के अंडे का छिलका करीब 40 फीसदी कैल्शियम से बना होता यानी सिर्फ एक ग्राम अंडे के छिलके से अच्छी खासी मात्रा में कैल्शियम मिल सकता है.

कैल्शियम सप्लीमेंट के तौर पर कितना असरदार?

PubMed indexed studies में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक,अंडे के छिलके में मौजूद कैल्शियम कार्बोनेट वही फॉर्म है, जो ज्यादातर कैल्शियम सप्लीमेंट में इस्तेमाल होता है. स्टडीज में पाया गया है कि एगशेल पाउडर शरीर में उतनी ही अच्छी तरह एब्ज़ॉर्ब होता है, जितना सामान्य कैल्शियम सप्लीमेंट. कुछ रिसर्च तो यह भी बताती हैं कि अंडे के छिलके से मिलने वाला कैल्शियम, शुद्ध कैल्शियम कार्बोनेट सप्लीमेंट की तुलना में बेहतर तरीके से शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है, इसकी वजह छिलके में मौजूद कुछ प्राकृतिक प्रोटीन और कंपाउंड माने जाते हैं. कैल्शियम के अलावा अंडे के छिलके में मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, स्ट्रॉन्शियम और सेलेनियम जैसे मिनरल्स भी होते हैं, जो हड्डियों की मजबूती में सहायक भूमिका निभाते हैं

ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा भी कर सकता है कम

healthline के अनुसार यह ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे को कम कर सकता है. ऑस्टियोपोरोसिस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है, बढ़ती उम्र इसके सबसे बड़े कारणों में से एक है, लेकिन लंबे समय तक कैल्शियम की कमी भी इसे बढ़ावा दे सकती है. कुछ स्टडी में पाया गया है कि पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं में अंडे के छिलके से बना कैल्शियम, विटामिन D और मैग्नीशियम के साथ लेने पर बोन मिनरल डेंसिटी बेहतर हुई. वहीं कुछ मामलों में यह सामान्य कैल्शियम सप्लीमेंट से ज्यादा असरदार साबित हुआ.

 क्या सावधानी जरूरी है?

अगर अंडे के छिलके को सही तरीके से तैयार किया जाए, तो इसे सुरक्षित माना जाता है. लेकिन बड़े टुकड़े निगलना खतरनाक हो सकता है, इसलिए इसे हमेशा बारीक पाउडर में ही इस्तेमाल करना चाहिए. इसके अलावा अंडे के छिलके पर बैक्टीरिया, जैसे साल्मोनेला, हो सकता है. इसलिए छिलके का इस्तेमाल करने से पहले अंडे को अच्छे से उबालना जरूरी है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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IVF से 10 गुना सस्ता होता है प्रेग्नेंसी का यह प्रोसेस, लेकिन ये 5 गलतियां कर देती हैं फेल

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Can IUI Help You Get Pregnant: अगर आप और आपका पार्टनर लंबे समय से प्रेग्नेंसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो आपने IUI और IVF के बारे में जरूर सुना होगा. ये दोनों ही फर्टिलिटी ट्रीटमेंट हैं, लेकिन प्रोसेस, खर्च और सक्सेस रेट के मामले में दोनों में बड़ा फर्क होता है. सही फैसला लेने के लिए इन दोनों को समझना जरूरी है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर किन कारणों के चलते IUI फेल हो जाता है. 

IUI क्या है?

IUI यानी इंट्रायूटेराइन इनसेमिनेशन को आम भाषा में आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन कहा जाता है. यह IVF की तुलना में ज्यादा आसान और कम इनवेसिव ट्रीटमेंट माना जाता है, इस प्रोसेस में ओव्यूलेशन के समय प्रोसेस किए गए स्पर्म को सीधे गर्भाशय में डाला जाता है, ताकि स्पर्म और एग के मिलने की संभावना बढ़ सके. महिला के मेंस्ट्रुअल साइकिल की शुरुआत से ही अंडों की ग्रोथ पर नजर रखी जाती है. ओव्यूलेशन के करीब पहुंचते ही IUI किया जाता है. स्पर्म सैंपल को लैब में वॉश कर सबसे हेल्दी और एक्टिव स्पर्म को चुना जाता है और एक पतली कैथेटर की मदद से गर्भाशय में डाला जाता है. इसके बाद फर्टिलाइजेशन प्राकृतिक रूप से फैलोपियन ट्यूब में होता है.

किन लोगों के लिए IUI की सलाह दी जाती है?

IUI को आमतौर पर फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का पहला स्टेप माना जाता है. यह उन महिलाओं के लिए उपयुक्त हो सकता है, जिन्हें PCOS जैसे ओव्यूलेशन डिसऑर्डर हों. जिन मामलों में मेल फैक्टर इंफर्टिलिटी हल्की हो, सर्वाइकल म्यूकस से जुड़ी समस्या हो, अनएक्सप्लेंड इंफर्टिलिटी हो या फिर सिंगल वुमन जो डोनर स्पर्म का इस्तेमाल कर रहे हों. आमतौर पर डॉक्टर 3 से 4 IUI साइकल ट्राई करने के बाद IVF की सलाह देते हैं.

भारत में IUI और IVF का खर्च

भारत में IUI का खर्च IVF की तुलना में काफी कम होता है. asianinfertility की रिपोर्ट के अनुसार, एक IUI साइकल की औसत लागत करीब 5,000 से 10,000 रुपये के बीच होती है. इसमें दवाइयां, मॉनिटरिंग, स्पर्म प्रोसेसिंग और प्रोसीजर शामिल होते हैं. वहीं IVF की बात करें तो इसकी प्रक्रिया ज्यादा मुश्किल होती है, इसलिए खर्च भी ज्यादा होता है. भारत में एक IVF साइकल का खर्च आमतौर पर 80,000 से 1.5 लाख रुपये तक हो सकता है. इसमें एग निकालना, लैब में फर्टिलाइजेशन, एम्ब्रियो ट्रांसफर और अन्य जांच शामिल होती हैं.

IUI और IVF की सक्सेस रेट

IVF की तुलना में IUI की सक्सेस रेट कम होती है, लेकिन हल्की फर्टिलिटी समस्याओं में IUI बेहतर विकल्प माना जाता है. IUI की सफलता उम्र, दवाइयों और मेडिकल कंडीशन पर निर्भर करती है. IUI की सक्सेस रेट प्रति साइकल करीब 10 से 20 प्रतिशत होती है. वहीं 3 से 4 साइकल के बाद युवतियों में कुल सफलता 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. IVF की सक्सेस रेट महिलाओं की उम्र 35 साल से कम होने पर 40 प्रतिशत तक हो सकती है. उम्र बढ़ने के साथ यह दर घटती जाती है, लेकिन कई साइकल और एम्ब्रियो सिलेक्शन के साथ सफलता की संभावना ज्यादा हो जाती है.

IUI फेल होने की 5 बड़ी वजहें

Novaivffertility के अनुसार IUI सस्ता और आसान जरूर है, लेकिन कुछ गलतियां इसकी सफलता को प्रभावित कर सकती हैं, इसमें

  • खराब क्वालिटी के अंडे – ऐसे अंडों में क्रोमोसोमल दिक्कतें हो सकती हैं, जिससे फर्टिलाइजेशन या एम्ब्रियो डेवलपमेंट प्रभावित होता है.
  • उम्र का बढ़ना – 35 साल से कम उम्र में IUI की सफलता ज्यादा होती है, इसके बाद संभावना तेजी से घटती है. 40 साल के बाद IUI प्रभावी नहीं माना जाता.
  • स्पर्म क्वालिटी कमजोर होना – कमजोर या कम एक्टिव स्पर्म फैलोपियन ट्यूब तक नहीं पहुंच पाते.
  • गलत टाइमिंग – अगर ओव्यूलेशन के 12–24 घंटे के भीतर स्पर्म मौजूद न हो, तो एग नष्ट हो सकता है.
  • एंडोमेट्रियल लाइनिंग की समस्या – अगर गर्भाशय की परत सही न हो, तो फर्टिलाइज्ड एग इम्प्लांट नहीं हो पाता.

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