खाने के बाद इलायची खाने से पेट पर क्या पड़ता है असर, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर?

खाने के बाद इलायची खाने से पेट पर क्या पड़ता है असर, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर?


Benefits Of Chewing Cardamom After Meals: इलायची अपनी खुशबू और स्वाद की वजह से मसालों की दुनिया में खास जगह रखती है. मीठे से लेकर नमकीन व्यंजनों तक, इलायची हर जगह इस्तेमाल होती है. भारत में खाने के बाद इलायची चबाने की आदत भी काफी आम है. यह छोटी-सी आदत न सिर्फ पाचन में मदद कर सकती है, बल्कि मुंह की सफाई और सांसों की ताजगी बनाए रखने में भी असरदार मानी जाती है. रिसर्च जर्नल ऑफ फार्मेसी एंड टेक्नोलॉजी के अनुसार, इलायची में मौजूद नेचुरल एंटीमाइक्रोबियल गुण मुंह की बदबू को कम करने में मदद करते हैं.

खाने के बाद इलायची चबाने के फायदे

डॉ. मंजूषा अग्रवाल ने HT को बताया कि इलायची में सिनेओल, लिमोनीन, टरपिनीन और फ्लेवोनॉयड्स जैसे सक्रिय तत्व पाए जाते हैं. ये तत्व सूजन को कम करने, पाचन सुधारने, सांसों को ताजा रखने और दिल व मेटाबॉलिक हेल्थ को सपोर्ट करने में सहायक होते हैं. PubMed में प्रकाशित स्टडी के मुताबिक, खाने के बाद इलायची चबाने से पैंक्रियाटिक एंजाइम्स जैसे लाइपेज, एमाइलेज और प्रोटीएज सक्रिय होते हैं. कुछ मामलों में आंतों की परत से जुड़े एंजाइम्स भी उत्तेजित होते हैं, जिससे भोजन को तोड़ने और पचाने की प्रक्रिया बेहतर होती है.

गैस, ब्लोटिंग और अपच से राहत

Science Gate के अनुसार, इलायची कार्मिनेटिव और एंटी-फ्लैटुलेंस गुणों से भरपूर होती है। इसका मतलब है कि यह पेट में गैस, सूजन और असहजता को कम करने में मदद करती है. इलायची में 1,8-सिनेओल, अल्फा-पाइनीन, सैबिनीन, लिमोनीन और टरपिनियोल जैसे तत्व पाए जाते हैं, जिनमें सूजन-रोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। PMC और SAGE Journal के अनुसार, ये तत्व पेट की अंदरूनी परत की सूजन को शांत करने में मदद कर सकते हैं, जिससे एसिड रिफ्लक्स या हार्टबर्न की समस्या कम हो सकती है।

सांसों की बदबू कैसे दूर करती है इलायची?

इलायची में मौजूद बायोएक्टिव कंपाउंड्स इसे खास खुशबू देते हैं. इसके बीज चबाने से मुंह की दुर्गंध कम होती है. PubMed Central के मुताबिक, इलायची चबाने से लार का बहना बढ़ता है, जिससे ड्राई माउथ की समस्या कम होती है और दांतों की प्राकृतिक सफाई भी होती है.

इलायची कैसे और कितनी चबाएं?

खाने के बाद हरी इलायची लें, क्योंकि यह ज्यादा सुगंधित और औषधीय होती हैयच दांतों से हल्का-सा दबाकर फली तोड़ें और अंदर के बीज चबाएं. छिलका निगलना जरूरी नहीं है. इसके अलावा आमतौर पर 1 इलायची काफी होती है,ज्यादा मात्रा में लेने से मुंह में खुजली, खांसी या पेट में परेशानी हो सकती है. डॉ. के अनुसार, पित्त की पथरी वाले लोगों, गर्भवती या ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिलाओं और कुछ दवाएं लेने वालों को सावधानी बरतनी चाहिए। विशेषज्ञ रोजाना नहीं, बल्कि 15 से 20 दिन में एक बार इलायची चबाने की सलाह देते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या धड़कते-धड़कते अचानक रुक आता है आपका भी दिल, जानें किस बीमारी में होता है ऐसा?

क्या धड़कते-धड़कते अचानक रुक आता है आपका भी दिल, जानें किस बीमारी में होता है ऐसा?


Emergency Symptoms Of Heart Arrhythmia: आपको बिना किसी वजह दिल तेज धड़कता, फड़फड़ाता या अचानक एक धड़कन छूटती हुई महसूस हुई है? कई बार तनाव, ज्यादा कैफीन या उत्साह के कारण ऐसा हो सकता है, लेकिन अगर यह समस्या बार-बार हो रही है तो इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है.अक्सर लोग दिल की इन गड़बड़ धड़कनों को मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि ये एरिदमिया नाम की हार्ट समस्या के शुरुआती संकेत भी हो सकते हैं.

एरिदमिया ऐसी स्थिति है, जिसमें दिल बहुत तेज, बहुत धीमा या अनियमित तरीके से धड़कने लगता है. इसका असर शरीर में  ब्लड फ्लो, ऑक्सीजन सप्लाई और हार्ट के सेहत पर असर पड़ता है. समय रहते इसके लक्षण पहचान लेने से गंभीर दिक्कतों से बचा जा सकता है और सही इलाज संभव हो पाता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर में डायरेक्टर, कार्डियोलॉजिस्ट और इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिस्ट डॉ. अपर्णा जयसवाल ने इसको लेकर अपने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया है. उनके मुताबिक, दिल की धड़कन 60 से 100 बीट प्रति मिनट होती है. लेकिन जब यह बिना किसी वजह 60 से कम या 100 से ज्यादा हो जाए, या धड़कन अनियमित हो, तो इसे एरिदमिया कहा जाता है. अगर आपको इसके कुछ लक्षण दिखें, तो आपको डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.    

 

एरिदमिया के लक्षण?

 स्वास्थ्य को लेकर ऑनलाइन जानकारी देने वाली वेबसाइट  Mayoclinic के मुताबिक कई बार हार्ट एरिदमिया में कोई साफ लक्षण दिखाई ही नहीं देते और दिल की धड़कन में गड़बड़ी किसी और वजह से कराए गए हेल्थ चेकअप के दौरान पकड़ में आती है. हालांकि कुछ लोगों में इसके संकेत नजर आने लगते हैं, जैसे सीने में फड़फड़ाहट, जोर-जोर से या अचानक तेज धड़कन महसूस होना, दिल का बहुत तेज या बहुत धीमे धड़कना, सीने में दर्द या सांस फूलना. इसके साथ घबराहट, बेहद थकान महसूस होना, चक्कर आना या सिर हल्का लगना, ज्यादा पसीना आना और कभी-कभी बेहोशी या बेहोश होने जैसा एहसास भी हो सकता है. ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होता है.

कब डॉक्टर से मिलना जरूरी?

Mayoclinic के मुताबिक, अगर आपको महसूस हो कि हार्ट बहुत तेज या बहुत धीमे धड़क रहा है, या बार-बार धड़कन छूटने जैसा अनुभव हो रही है, तो बिना देर किए हेल्थ चेकअप के लिए अपॉइंटमेंट लेना चाहिए. ऐसे मामलों में आपको हृदय रोगों के विशेषज्ञ, यानी कार्डियोलॉजिस्ट से मिलने की सलाह दी जा सकती है. वहीं अगर सीने में तेज दर्द हो, अचानक सांस लेने में दिक्कत आए या बेहोशी जैसी स्थिति बन जाए, तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत इमरजेंसी मेडिकल सहायता लें.

इसे भी पढ़ें- Newborn Constipation: न्यूबॉर्न बेबी में भी होती है कब्ज की शिकायत, जानें इन्हें पहचानने के तरीके

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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शरीर के किन अंगों में सबसे पहले होता है कैंसर? होश उड़ा देगी यह रिपोर्ट

शरीर के किन अंगों में सबसे पहले होता है कैंसर? होश उड़ा देगी यह रिपोर्ट


Most Common Cancers In The World: कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर की सेल्स बिना नियंत्रण के बढ़ने लगती हैं. समय के साथ ये सेल्स आसपास के टिश्यू और अंगों को नुकसान पहुंचाती हैं. यह रोग शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है, लेकिन कुछ अंग ऐसे हैं जो दूसरों की तुलना में ज्यादा प्रभावित पाए गए हैं. कौन-सा अंग कैंसर की चपेट में आएगा, यह कई बातों पर निर्भर करता है. जैसे उस अंग में सेल्स के बदलने की गति, पर्यावरणीय कारकों का असर, जेनेटिक गुण और उम्र से जुड़े बदलाव.

दुनिया भर के हेल्थ से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, कुछ खास अंग ऐसे हैं जहां कैंसर के सबसे ज्यादा मामले और मौतें दर्ज होती हैं. जहां जांच, स्क्रीनिंग और इलाज की सुविधाएं बेहतर होती हैं, वहां कैंसर के मामलों और मृत्यु दर में फर्क भी देखा जाता है. पुरुष और महिलाएं अलग-अलग तरह से प्रभावित होते हैं और उम्र भी यह तय करने में अहम भूमिका निभाती है कि कौन-सा टिश्यू ज्यादा संवेदनशील होगा.

आम कैंसर और वे किन अंगों को प्रभावित करते हैं

संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख स्वास्थ्य एजेंसी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के मुताबिक, छह तरह के कैंसर दुनिया भर में सबसे ज्यादा पाए जाते हैं. इनमें लंग्स का कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, कोलोरेक्टल कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर, लिवर कैंसर और पेट का कैंसर शामिल हैं. लंग्स का कैंसर सांस लेने की ट्यूब्यूल्स और छोटी एयरवे की अंदरूनी परत में बनता है. लंबे समय तक धूम्रपान या प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से इसका खतरा बढ़ जाता है. ब्रेस्ट कैंसर, ब्रेस्ट की  ट्यूब्यूल्स और ग्रंथियों में विकसित होता है, जहां हार्मोनल बदलावों का असर पड़ता है.

वहीं, कोलोरेक्टल कैंसर बड़ी आंत और मलाशय की अंदरूनी परत में होता है, जहां कोशिकाओं का नवीनीकरण लगातार चलता रहता है. प्रोस्टेट कैंसर प्रोस्टेट ग्रंथि में बनता है और अधिकतर उम्रदराज पुरुषों में पाया जाता है. लिवर कैंसर आमतौर पर लिवर की सेल्स से शुरू होता है और यह लंबे समय तक लिवर रोग, वायरल इंफेक्शन या रसायनों के संपर्क से जुड़ा हो सकता है. पेट का कैंसर पेट की अंदरूनी परत से पैदा होता है और इसका संबंध खान-पान की आदतों और हेलिकोबैक्टर पाइलोरी संक्रमण से देखा गया है.

 कैंसर होने के कारण

कैंसर तब होता है जब सेल्स के डिवाइड को नियंत्रित करने वाले जीन में नुकसान पहुंचता है. यह नुकसान जन्म से मिल सकता है या समय के साथ हो सकता है. लंबे समय तक संक्रमण, तंबाकू और रसायनों के संपर्क, रेडिएशन, हार्मोनल बदलाव और लगातार सूजन जैसे कारण इसमें भूमिका निभाते हैं.

किन लोगों को ज्यादा खतरा रहता है?

50 साल से अधिक उम्र, किसी भी रूप में तंबाकू का सेवन, असंतुलित आहार, ज्यादा शराब पीना, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी, पारिवारिक हिस्ट्री, प्रदूषण और लंबे समय तक इंफेक्शन, ये सभी कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं.

 बचाव और शुरुआती पहचान

धूम्रपान छोड़ना, जरूरी टीकाकरण, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, शराब सीमित करना और समय-समय पर जांच कराना कैंसर के खतरे को कम कर सकता है. शुरुआती जांच जैसे इमेजिंग टेस्ट, बायोप्सी और स्क्रीनिंग कार्यक्रम बीमारी को समय रहते पकड़ने में मदद करते हैं.

आज के समय में इलाज

कैंसर का इलाज ट्यूमर की स्थिति और मरीज की सेहत पर निर्भर करता है. सर्जरी, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और हार्मोन थेरेपी प्रमुख विकल्प हैं. जब इलाज संभव न हो, तब पेलिएटिव केयर के जरिए दर्द और तकलीफ को कम कर जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने पर ध्यान दिया जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या ज्यादा देर टॉयलेट में बैठने से निकल जाता है मलाशय? इस देश में सामने आ चुका केस

क्या ज्यादा देर टॉयलेट में बैठने से निकल जाता है मलाशय? इस देश में सामने आ चुका केस


Health Risks Of Using Phone On Toilet: मोबाइल फोन लेकर टॉयलेट जाना आज एक आम आदत बन चुकी है. कई लोग सोचते हैं कि थोड़ी देर बैठकर सोशल मीडिया स्क्रॉल कर लिया जाए या गेम खेल लिया जाए, लेकिन एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि टॉयलेट में ज्यादा देर बैठना सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. यह आदत न सिर्फ बवासीर का कारण बनती है, बल्कि गंभीर मामलों में मलाशय बाहर निकलने जैसी स्थिति भी पैदा कर सकती है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

CNN की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर, डलास के कोलोरेक्टल सर्जन डॉ. लाई शुए ने बताया कि जब मरीज पेट या मल त्याग से जुड़ी शिकायत लेकर आते हैं, तो जांच के दौरान टॉयलेट में ज्यादा समय बिताने की आदत एक बड़ा कारण सामने आती है. वहीं स्टोनी ब्रुक मेडिसिन, न्यूयॉर्क की गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. फराह मोंजूर बताती हैं कि आमतौर पर टॉयलेट में बैठने का सुरक्षित समय 5 से 10 मिनट से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

डॉक्टर्स समझाते हैं कि टॉयलेट सीट की बनावट और ग्रेविटी बल के कारण लंबे समय तक बैठने पर शरीर का निचला हिस्सा नीचे की ओर दबाव में रहता है. इससे गुदा और मलाशय के आसपास की नसों में खून भरने लगता है, लेकिन सही तरीके से वापस नहीं जा पाता. नतीजा यह होता है कि नसें सूज जाती हैं और हेमोरॉयड्स का खतरा बढ़ जाता है. लगातार जोर लगाने और देर तक बैठे रहने से पेल्विक फ्लोर मसल्स भी कमजोर हो जाती हैं. ये मांसपेशियां मल त्याग की प्रक्रिया को नियंत्रित करती हैं. इनके कमजोर होने से कब्ज, पेशाब या मल रोकने में दिक्कत और दर्द जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

चीन में मिल चुका है मामला

 चीन में इसको लेकर एक मामला आ चुका था. जिसमें एक व्यक्ति रोज़ करीब 30 मिनट तक टॉयलेट में बैठकर मोबाइल पर वीडियो गेम खेलता था. एक दिन मल त्याग के दौरान उसका मलाशय लगभग छह इंच तक शरीर से बाहर निकल आया. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने रेक्टल प्रोलैप्स की पुष्टि की. डॉक्टरों के अनुसार, लंबे समय तक टॉयलेट में बैठने की आदत और पहले से मौजूद कमजोरी ने इस गंभीर स्थिति को जन्म दिया.

जबरदस्ती जोर लगाने के बजाय उठकर थोड़ी देर टहलें

डॉक्टर्स सलाह देते हैं कि टॉयलेट में मोबाइल, किताब या मैगजीन लेकर न जाएं. अगर 10 मिनट में मल त्याग न हो, तो जबरदस्ती जोर लगाने के बजाय उठकर थोड़ी देर टहलें. साथ ही पर्याप्त पानी पीना और फाइबर युक्त आहार जैसे दालें, ओट्स और सब्जियां लेना जरूरी है. अगर लंबे समय से कब्ज, खून आना या टॉयलेट में असामान्य रूप से ज्यादा समय लग रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें. समय रहते डॉक्टर से सलाह लेना गंभीर समस्याओं से बचा सकता है.

इसे भी पढ़ें: Signs Of Kidney Disease In Eyes: आपकी आंखें भी दे सकती हैं किडनी की बीमारी का संकेत, डॉक्टर से जानें इन 5 लक्षणों का सच

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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न्यूबॉर्न बेबी में भी होती है कब्ज की शिकायत, जानें इन्हें पहचानने के तरीके

न्यूबॉर्न बेबी में भी होती है कब्ज की शिकायत, जानें इन्हें पहचानने के तरीके


How To Identify Constipation In Newborn Babies: न्यूबॉर्न बेबी और छोटे बच्चों में कब्ज की समस्या होना कई माता-पिता के लिए चिंता का कारण बन जाता है. अक्सर यह समझ पाना मुश्किल होता है कि बच्चा सच में कब्ज से परेशान है या यह उसकी उम्र के हिसाब से सामान्य स्थिति है. इसलिए जरूरी है कि पहले इसके संकेतों और कारणों को सही तरीके से समझा जाए. शिशुओं और बच्चों में कब्ज का मतलब होता है कि उनका मल बहुत सख्त हो गया है या उन्हें मल त्याग करने में परेशानी हो रही है. कई बार बच्चे को जोर लगाने पर दर्द होता है या कोशिश के बावजूद मल नहीं निकल पाता. हालांकि हर बच्चे का बॉवेल पैटर्न अलग होता है, इसलिए रोज मल न होना हमेशा कब्ज की निशानी नहीं है.

कैसे पहचानें बच्चों को कब्ज है या नहीं?

हेल्थ को लेकर ऑनलाइन जानकारी देने वाली वेबसाइट  MedlinePlus के मुताबिक, अगर बच्चा बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा रहने लगे, बार-बार उल्टी जैसा महसूस करे, मल बहुत सख्त और सूखा हो, मल त्याग करते समय दर्द हो या पेट फूला हुआ लगे, तो यह कब्ज के संकेत हो सकते हैं. बड़े बच्चों में हफ्ते में तीन बार से कम मल जाना, अंडरवियर में मल के निशान दिखना या मल में खून आना भी चेतावनी के संकेत हैं.

कब बनता है कब्ज?

 MedlinePlus की रिपोर्ट में बताया गया है कि कब्ज तब होती है जब मल लंबे समय तक आंतों में रुका रहता है और वहां से ज्यादा पानी सोख लिया जाता है. इससे मल सख्त हो जाता है. शिशुओं में ठोस आहार की शुरुआत, ब्रेस्ट मिल्क से फॉर्मूला पर शिफ्ट होना, पर्याप्त तरल न मिलना या माहौल में बदलाव भी इसकी वजह बन सकता है. कई बार बच्चे जानबूझकर टॉयलेट जाने की इच्छा को रोकते हैं. इसकी वजह टॉयलेट ट्रेनिंग का डर, पहले दर्दनाक अनुभव या स्कूल और पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल न करना हो सकता है. कुछ मामलों में आंतों से जुड़ी बीमारियां या कुछ दवाएं भी कब्ज का कारण बनती हैं.

घर पर किन बातों का रखा जा सकता है ध्यान?

न्यूबॉर्न और छोटे बच्चों में कब्ज से बचाव के लिए घर पर कुछ बातों का ध्यान रखा जा सकता है. दो महीने से बड़े शिशुओं को डॉक्टर की सलाह से थोड़ा पानी या फलों का जूस दिया जा सकता है. चार महीने के बाद अगर बच्चा ठोस आहार लेने लगे, तो फाइबर से भरपूर बेबी फूड फायदेमंद होते हैं. बड़े बच्चों को पर्याप्त पानी पिलाना, फल-सब्जियां और साबुत अनाज देना मददगार होता है. अगर बच्चा कब्ज के कारण टॉयलेट ट्रेनिंग में परेशानी महसूस करे, तो कुछ समय के लिए उसे रोक देना बेहतर रहता है.

कब डॉक्टर से मिलना होता है जरूरी?

अगर दो महीने से कम उम्र के शिशु को कब्ज हो, तीन दिन तक मल न आए और साथ में उल्टी या ज्यादा चिड़चिड़ापन हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. सही समय पर पहचान और देखभाल से न्यूबॉर्न में कब्ज की समस्या को आसानी से संभाला जा सकता है.

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प्रदूषण बढ़ा रहा डिप्रेशन-एंग्जायटी का खतरा, हवा में मौजूद PM2.5 का मेंटल हेल्थ से सीधा कनेक्शन

प्रदूषण बढ़ा रहा डिप्रेशन-एंग्जायटी का खतरा, हवा में मौजूद PM2.5 का मेंटल हेल्थ से सीधा कनेक्शन


Long Term Exposure To PM2.5 And Mental Health: केंद्र सरकार के बजट में भले ही मानसिक स्वास्थ्य ढांचे को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया गया हो, लेकिन एक नई नेशनल स्टडी ने चिंता बढ़ाने वाली तस्वीर पेश की है. रिसर्च के मुताबिक, लंबे समय तक प्रदूषित हवा में मौजूद बेहद सूक्ष्म कणों (PM2.5) के संपर्क में रहने से डिप्रेशन और एंग्जायटी का खतरा बढ़ रहा है. ससे साफ है कि पर्यावरण से जुड़े जोखिम भारत में मेंटल की समस्या को और गहरा कर रहे हैं.

यह अध्ययन IIT दिल्ली के शोधकर्ताओं ने AIIMS नई दिल्ली, NIMHANS और सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज के साथ मिलकर किया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल iScience में पब्लिश किया गया है. रिसर्च में देश के 12 राज्यों, जिसमें जैसे पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और असम के 34,802 एडल्ट के डेटा का एनालिसिस किया गया.

क्या निकला रिसर्च में?

रिसर्च में पाया गया कि लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क में रहने वालों में डिप्रेशन का खतरा 8 प्रतिशत तक अधिक और एंग्जायटी का जोखिम करीब 2 प्रतिशत ज्यादा था. यह विश्लेषण नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे 2015 से 16 के क्लिनिकली डायग्नोज़्ड मामलों पर आधारित है. चूंकि यह एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी है, इसलिए यह कारण नहीं बल्कि आपसी संबंध को दर्शाती है.

एक्सपर्ट का क्या कहना है?

AIIMS के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग से जुड़े स्टडी के लेखक डॉ. आनंद कृष्णा के मुताबिक, यह फर्क समझना जरूरी है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जब बड़ी आबादी प्रदूषित हवा के संपर्क में हो, तो ऐसे “छोटे दिखने वाले” संबंध भी गंभीर मायने रखते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इसका असर सबसे ज्यादा शहरी महानगरों में रहने वालों, 40 से 49 साल की उम्र के लोगों और कम आय वर्ग में देखा गया. क्षेत्रीय स्तर पर भी फर्क सामने आया. पूर्वी भारत में प्रदूषण से जुड़ा डिप्रेशन ज्यादा क्लियर दिखा, जबकि पश्चिमी भारत में एंग्जायटी के मामले अधिक जुड़े पाए गए.

किन चीजों की हुई जांच?

स्टडी सिर्फ PM2.5 के कुल स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि हवा में मौजूद उसके अलग-अलग केमिकल तत्वों की भी जांच की गई. इसमें सामने आया कि ट्रैफिक, उद्योग और कृषि गतिविधियों से निकलने वाले सल्फेट, नाइट्रेट और अमोनियम जैसे तत्वों का डिप्रेशन से गहरा संबंध है. वहीं एलिमेंटल कार्बन, जो डीजल और फॉसिल फ्यूल के दहन का संकेतक माना जाता है, का संबंध एंग्जायटी से सबसे मजबूत पाया गया.

रिसर्चर का कहना है कि प्रदूषण के इन घटकों की पहचान से यह तय करने में मदद मिलती है कि किन उत्सर्जन सोर्स पर प्राथमिकता से कार्रवाई होनी चाहिए. ऐसे समय में, जब देश के कई हिस्सों में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब होती जा रही है, इस स्टडी में एनालिसिस में गुजरात, मणिपुर, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तमिलनाडु और केरल के प्रतिभागियों को भी शामिल किया गया.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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