उम्र 50 पार और बार-बार रहता है खांसी-जुकाम? जान लें कब है निमोनिया वैक्सीन की जरूरत

उम्र 50 पार और बार-बार रहता है खांसी-जुकाम? जान लें कब है निमोनिया वैक्सीन की जरूरत


Who Should Get The Pneumonia Vaccine: निमोनिया एक गंभीर इंफेक्शन है, जो लंग्स को प्रभावित करता है और कई बार जानलेवा भी साबित हो सकता है. इससे बचाव के लिए डॉक्टर निमोनिया वैक्सीन, जिसे न्यूमोकोकल वैक्सीन भी कहा जाता है, लगवाने की सलाह देते हैं. यह वैक्सीन स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिए नामक बैक्टीरिया से होने वाले इंफेक्शन से सुरक्षा प्रदान करती है. यही बैक्टीरिया निमोनिया के अलावा कान, साइनस और खून से जुड़े गंभीर इंफेक्शन का कारण भी बन सकता है.

दो तरह के वैक्सीन उपलब्ध

वर्तमान में न्यूमोकोकल वैक्सीन के दो प्रमुख प्रकार उपलब्ध हैं. पहला है न्यूमोकोकल कंजुगेट वैक्सीन, जिसमें PCV15, PCV20 और PCV21 शामिल हैं. दूसरा है न्यूमोकोकल पॉलीसैकराइड वैक्सीन. इनका उपयोग व्यक्ति की उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार किया जाता है. हालांकि यह वैक्सीन हर प्रकार के निमोनिया को पूरी तरह नहीं रोक सकती, लेकिन इंफेक्सन का खतरा काफी हद तक कम कर देती है. यदि वैक्सीन लगवाने के बाद भी किसी व्यक्ति को निमोनिया हो जाए, तो बीमारी आमतौर पर कम गंभीर होती है.

किन लोगों को लगवानी चाहिए वैक्सीन?

अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन  की सलाह के अनुसार 50 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों को यह वैक्सीन जरूर लगवानी चाहिए. इसके अलावा 5 साल से कम उम्र के बच्चों, कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों और कुछ पुरानी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को भी इसकी आवश्यकता हो सकती है. 

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किन लोगों को होता है इसका सबसे ज्यादा खतरा?

एक्सपर्ट के मुताबिक, हार्ट रोग, सिकल सेल डिजीज, क्रोनिक लिवर डिजीज, डायबिटीज, अस्थमा, एम्फायसीमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज जैसी बीमारियों से पीड़ित लोगों में निमोनिया का खतरा अधिक होता है. इसी तरह कीमोथेरेपी कराने वाले मरीज, अंग प्रत्यारोपण करा चुके लोग और एचआईवी/एड्स से इंफेक्टेड व्यक्ति भी उच्च जोखिम वाली कैटेगरी में आते हैं. स्मोकिंग करने वालों और अत्यधिक शराब का सेवन करने वालों में भी इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है, क्योंकि इन आदतों का असर शरीर की इम्यून सिस्टम पर असर पर पड़ता है.

क्या हर साल लगती है वैक्सीन?

निमोनिया वैक्सीन की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे फ्लू वैक्सीन की तरह हर साल नहीं लगवाना पड़ता. अधिकांश लोगों के लिए एक बार लगवाई गई वैक्सीन लंबे समय तक सुरक्षा प्रदान करती है. हालांकि 65 वर्ष से अधिक उम्र के कुछ लोगों और विशेष स्वास्थ्य स्थितियों वाले मरीजों को अतिरिक्त डोज की जरूरत पड़ सकती है. इस बारे में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. बच्चों के लिए यह वैक्सीन चार डोज में दी जाती है. आमतौर पर 2, 4, 6 और 12 से 15 महीने की उम्र में इसके डोज लगाए जाते हैं. यदि किसी बच्चे का टीकाकरण समय पर पूरा नहीं हुआ है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार बाद में भी इसे पूरा किया जा सकता है.

क्या होते हैं इसके साइड इफेक्ट्स?

जहां तक साइड इफेक्ट्स की बात है, वे आमतौर पर हल्के होते हैं. इंजेक्शन वाली जगह पर दर्द, सूजन या लालिमा, हल्का बुखार, भूख कम लगना और मांसपेशियों में दर्द जैसी शिकायतें हो सकती हैं. गंभीर एलर्जी की प्रतिक्रिया बहुत रेयर होती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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खाल पर घास की तरह बाल और आंखों में कांच वाला हीरा, चमत्कार से कम नहीं इंसानी शरीर

खाल पर घास की तरह बाल और आंखों में कांच वाला हीरा, चमत्कार से कम नहीं इंसानी शरीर


Human Body Facts: हम रोज आईने में अपना चेहरा देखते हैं, वहीं एक इंसान रोज अपने हर एक अंग का उपयोग करके कोई न कोई काम करता है. लेकिन क्या कभी किसी ने गौर किया है कि हमारा शरीर अपने आप में किसी चमत्कार से कम नहीं है. जिस शरीर को हम नॉर्मल मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, उसके अंदर ऐसी अनगिनत प्रक्रियाएं चलती रहती है, जिन्हें समझना किसी अजूबे से कम नहीं है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं की खाल पर घास की तरह बाल और आंखों में कांच वाला हीरा इंसानी शरीर कैसे किसी चमत्कार से कम नहीं है. 

एक कोशिका से बन जाता है पूरा इंसान 

मानव शरीर लगभग 100 ट्रिलियन कोशिकाओं से मिलकर बना है, हैरानी की बात यह है कि इन सभी कोशिकाओं की शुरुआत केवल एक ही कोशिका से होती है. शरीर में हर मिनट करीब 300 करोड़ कोशिकाएं नष्ट होती है, लेकिन उसी के साथ नई कोशिकाओं का निर्माण भी लगातार जारी रहता है. वैज्ञानिकों के अनुसार शरीर रोजाना लगभग 300 अरब नई कोशिकाएं बनता है, जिससे शरीर खुद को लगातार मरम्मत और पुननिर्मित करता रहता है. 

बिना बिजली के दिन रात धड़कता है दिल 

इंसानी शरीर के चमत्कार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हमारा दिल बिना बिजली के भी दिनरात धड़कता  रहता है. दिल को शरीर की सबसे मेहनती मशीन कहा जाता है. यह बिना रुके दिन-रात काम करता रहता है. एक नॉर्मल व्यक्ति का दिल दिन भर में करीब एक लाख बार धड़कता सकता है. वहीं शरीर का पूरा ब्लड बार-बार पूरे शरीर का चक्कर लगाता रहता है और यह प्रक्रिया बिना किसी बाहरी ऊर्जा सोर्स के चलती रहती है, जो किसी चमत्कार से कम नहीं है. 

किडनी रोज करती है खून की सफाई 

शरीर की किडनी भी किसी आधुनिक फिल्टर प्लांट से कम नहीं है. यह लगातार खून को साफ करने, शरीर के अंदर से गंदगी को अलग करने और शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने का काम करती है. जिस काम के लिए गंभीर बीमारियों में डायलिसिस की जरूरत पड़ती है, वहीं काम हेल्दी किडनी हर दिन लगातार करती रहती है. 

आंखों के अंदर मौजूद है नेचुरल लेंस 

मानव आंख में मौजूद प्राकृतिक लेंस को क्रिस्टलाइन का लेंस कहा जाता है. यह एक पारदर्शी और दोनों तरफ से उभरी हुई संरचना होती है, जो मुख्य रूप से पानी और प्रोटीन से बनी होती है. यही लेंस आंख में आने वाली रोशनी को मोड़कर रेटिना पर केंद्रित करता है, जिससे हमें साफ दिखाई देता है. एक नॉर्मल व्यक्ति की आंख का यह लेंस लगभग 10 मिलीमीटर चौड़ा होता है. वहीं एक व्यक्ति की आंखों से देखना भी इंसानी शरीर के किसी चमत्कार से कम नहीं है. 

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खाल पर उगते हैं, हजारों बाल 

हर व्यक्ति रोजाना औसत 60 से 100 बाल खो देता है. इसके बावजूद सिर पर मौजूद बालों की संख्या इतनी ज्यादा होती है कि नॉर्मल रूप से इसका असर दिखाई नहीं देता. बालों की संरचना भी बहुत मजबूत मानी जाती है और वह बहुत धीरे-धीरे नष्ट होते हैं. 

दिमाग किसी कंप्यूटर से कम नहीं 

इंसानी दिमाग को दुनिया का सबसे जटिल जैविक कंप्यूटर माना जाता है. यह लगभग 80 प्रतिशत पानी से बना होता है, लेकिन इसके बावजूद अरबों सूचनाओं को संसाधित करने की क्षमता रखता है. दिमाग में संदेश पहुंचाने वाले तांत्रिक संकेत सैकड़ों किलोमीटर प्रति घंटे की गति से यात्रा कर सकते हैं.

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जानें सेहत के लिए कैसे नुकसानदेह है फ्रोजन डेजर्ट, न्यूट्रिशनिस्ट ने दी बड़ी चेतावनी

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Why Frozen Desserts Are Harmful To Health: गर्मी के मौसम में आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट की मांग तेजी से बढ़ जाती है. लेकिन हाल ही में क्वालिटी वॉल्स ने अपने उत्पादों में पाम ऑयल की जगह डेयरी आधारित सामग्री इस्तेमाल करने की घोषणा ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि आखिर फ्रोजन डेजर्ट और असली आइसक्रीम में क्या अंतर है और क्या फ्रोजन डेजर्ट वास्तव में सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं.

क्या है मामला?

क्वालिटी वॉल्स ने घोषणा की है कि वह 2027 तक अपने पूरे पोर्टफोलियो को पाम ऑयल आधारित फॉर्मूले से हटाकर दूध आधारित उत्पादों में बदलने की योजना बना रही है. कंपनी का यह कदम ऐसे समय में आया है जब उपभोक्ताओं के बीच खाद्य उत्पादों की क्वालिटी और सामग्री को लेकर जागरूकता बढ़ रही है. एक्सपर्ट का मानना है कि इस फैसले से पूरे फ्रोजन डेजर्ट उद्योग पर असर पड़ सकता है.

क्यों यह हमारे लिए नुकसानदायक?

एक रिपोर्ट के अनुसार, न्यूट्रिशनिस्ट मैक सिंह के अनुसार, आज की पीढ़ी पारंपरिक कुल्फी और घर में बनने वाली ठंडी मिठाइयों से दूर होकर फ्रोजन डेजर्ट की ओर बढ़ रही है. हालांकि, उनके मुताबिक इन उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली कई सामग्रियां स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बन सकती हैं. रिपोर्ट के अनुसार, मैक सिंह बताते हैं कि फ्रोजन डेजर्ट में अक्सर पाम ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें सैचुरेटेड फैट की मात्रा अधिक होती है. ज्यादा मात्रा में इसका सेवन हृदय स्वास्थ्य पर निगेटिव प्रभाव डाल सकता है और खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ा सकता है. इससे धमनियों में रुकावट का खतरा भी बढ़ सकता है.

मैक सिंह यह भी बताते हैं कि कई फ्रोजन डेजर्ट में असली दूध की जगह मिल्क सॉलिड्स या होल मिल्क पाउडर का उपयोग किया जाता है. उनका कहना है कि इनमें ऑक्सीडाइज्ड कोलेस्ट्रॉल मौजूद हो सकता है, जो ब्लड बेसल्स को नुकसान पहुंचाने और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाने से जुड़ा माना जाता है. यही वजह है कि ऐसे उत्पादों का नियमित सेवन स्वास्थ्य एक्सपर्ट की तरफ से उचित नहीं माना जाता. 

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फ्रोजन डेजर्ट में लिक्विड ग्लूकोज का भी इस्तेमाल

इसके अलावा फ्रोजन डेजर्ट में लिक्विड ग्लूकोज का भी इस्तेमाल किया जाता है, जो चीनी का एक प्रोसेस्ड रूप है. स्वाद और रंग को आकर्षक बनाने के लिए इनमें सिंथेटिक फ्लेवर और आर्टिफिशियल रंग भी मिलाए जाते हैं. कई उत्पादों में वेजिटेबल सोया प्रोटीन, स्टेबलाइजर्स, इमल्सीफायर्स और अन्य एडिटिव्स भी शामिल होते हैं. यही कारण है कि इन्हें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की श्रेणी में रखा जाता है.

कई शो में यह भी सामने आया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन मोटापा, डायबिटीज, हार्ट रोग और खराब आंत हेल्थ जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है.  एक्सपर्ट का कहना है कि जब लोग ऐसे उत्पादों पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, तो वे पोषक तत्वों से भरपूर नेचुरल खाद्य पदार्थों का सेवन कम कर देते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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ज्यादा एक्सरसाइज से महिला-पुरुषों में घट सकती है फर्टिलिटी, डॉक्टर ने दी बड़ी चेतावनी

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Can Excessive Exercise Affect Fertility: आजकल फिटनेस सिर्फ सेहत तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह एक लाइफस्टाइल और सोशल मीडिया ट्रेंड बन चुकी है. सिक्स-पैक एब्स, तेजी से वजन घटाने की चुनौतियां, मैराथन ट्रेनिंग और सख्त डाइट प्लान्स लोगों को आकर्षित कर रहे हैं. हालांकि रेगुलर एक्सरसाइज शरीर के लिए बेहद फायदेमंद है, लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि जब फिटनेस जुनून में बदल जाती है, तब इसका असर शरीर के कई महत्वपूर्ण कार्यों पर पड़ सकता है, जिसमें रिप्रोडक्टिवन क्षमता भी शामिल है. 

रिप्रोडक्टिव सिस्टम पर क्यों पड़ता है असर?

एक्सपर्ट के मुताबिक हमारा शरीर बेहद समझदार तरीके से काम करता है. जब उसे लगता है कि शरीर पर जरूरत से ज्यादा शारीरिक दबाव पड़ रहा है या ऊर्जा की कमी हो रही है, तो वह सबसे पहले उन प्रक्रियाओं को धीमा करना शुरू कर देता है जो जीवित रहने के लिए तुरंत जरूरी नहीं हैं. ऐसे में रिप्रोडक्टिव सिस्टम सबसे पहले प्रभावित होने वाले हिस्सों में से एक हो सकती है.

सही तरीके से किए गए एक्सरसाइज के क्या होते हैं फायदे?

डॉ. क्षितिज मुर्दिया ने TOI को बताया कि कि नियमित और संतुलित एक्सरसाइज कई तरह से फायदेमंद होता है. इससे मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है, हार्मोन संतुलित रहते हैं और संपूर्ण स्वास्थ्य में सुधार आता है. खासकर मोटापा, डायबिटीज और अन्य लाइफस्टाइल समस्याओं से जूझ रहे लोगों में मध्यम स्तर का व्यायाम प्रजनन क्षमता को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है.

कब होने लगती है लोगों को दिक्कत?

समस्या तब शुरू होती है जब लोग ज्यादा एक्सरसाइज, सख्त डाइटिंग और फिटनेस लक्ष्यों का पीछा करने लगते हैं. डॉ. क्षितिज मुर्दिया के अनुसार, जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज और पर्याप्त आराम की कमी शरीर को लगातार तनाव की स्थिति में रखती है. लंबे समय तक ऐसा होने पर हार्मोनल संतुलन बिगड़ सकता है और प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है.

महिलाओं में क्या होता है असर?

अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ  से जुड़े रिसर्च भी बताते हैं कि अत्यधिक व्यायाम और कम ऊर्जा उपलब्धता  रिप्रोडक्टिव में प्रजनन हार्मोन और पीरियड्स को प्रभावित कर सकती है. जब शरीर को पर्याप्त कैलोरी नहीं मिलती, तो ब्रेन यह संकेत मान लेता है कि संसाधनों की कमी है। इसके बाद वह  रिप्रोडक्टिव से जुड़े हार्मोनों का उत्पादन कम कर सकता है.

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महिलाओं में इसका सबसे पहला संकेत अनियमित पीरियड्स या पीरियड्स का पूरी तरह बंद हो जाना हो सकता है. कई महिलाएं इसे फिटनेस की उपलब्धि समझ लेती हैं, जबकि यह शरीर के लिए चेतावनी का संकेत हो सकता है. डॉ. क्षितिज मुर्दिया बताते हैं कि ऐसी स्थिति में शरीर गर्भधारण के लिए खुद को तैयार नहीं मानता और ओव्यूलेशन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. 

पुरुषों में क्या होती है दिक्कत?

यह समस्या केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है. पुरुषों में भी जरूरत से ज्यादा व्यायाम टेस्टोस्टेरोन के स्तर को कम कर सकता है. इसके अलावा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन बढ़ने से स्पर्म की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है, जिससे प्रजनन क्षमता कमजोर हो सकती है. एक्सपर्ट का मानना है कि फिटनेस और फर्टिलिटी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. जरूरी है कि एक्सरसाइज संतुलित हो, पर्याप्त पोषण लिया जाए, नींद पूरी हो और शरीर को रिकवरी का समय मिले.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या बाहर से दुबला-पतला दिख रहा शख्स अंदर से हो सकता है मोटा? जानें इसका कारण

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Can A Slim Person Be Fat From Inside: कई लोग ऐसे होते हैं जो बाहर से बिल्कुल दुबले-पतले और फिट दिखाई देते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके शरीर में फैट नहीं है, हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कुछ लोगों के शरीर में अंदरूनी अंगों के आसपास खतरनाक फैट जमा हो जाता है, जिसे विसरल फैट कहा जाता है. ऐसे लोगों को मेडिकल भाषा में थिन आउटसाइड, फैट इंसाइड भी कहा जाता है. 

क्या होता है विसरल फैट?

यानी कोई व्यक्ति देखने में स्लिम हो सकता है, उसका बीएमआई भी सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर उसकी लाइफस्टाइल खराब है, खानपान अनहेल्दी है, फिजिकल एक्टिविटी कम है या वह ज्यादा शराब और स्मोकिंग करता है, तो शरीर के अंदर चुपचाप फैट जमा होने लगता है. यही छिपा हुआ फैट बाद में कई गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है. डाइटिशियन एलिसन क्लार्क के मुताबिक, कमर के आसपास जमा होने वाला फैट अक्सर विसरल फैट होता है. यही वजह है कि कई बार पतले दिखने वाले लोगों में भी बीयर बेली जैसी समस्या दिखाई देने लगती है. 

क्या हमारे लिए यह नुकसानदायक है?

इम्यूनोलॉजिस्ट डॉ. जेन्ना मैकिओची अपनी किताबयोर ब्लूप्रिंट फॉर स्ट्रॉन्ग इम्युनिटी में बताती हैं कि शरीर के हाथ, पैर और त्वचा के नीचे जमा फैट को सबक्यूटेनियस फैट कहा जाता है, जो अपेक्षाकृत कम खतरनाक माना जाता है. लेकिन विसरल फैट सीधे अंदरूनी अंगों के आसपास जमा होता है और शरीर के लिए ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकता है. 

हिडन फैट से क्या होती है दिक्कत?

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि यह हिडन फैट सिर्फ वजन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहता. यह शरीर में हार्मोनल बदलाव और इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ा सकता है, जिससे टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और फैटी लिवर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है.  अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की 2021 की रिसर्च के अनुसार, विसरल फैट फैटी लिवर डिजीज का भी संकेत हो सकता है. 

कैसे इसका पता लगा सकते हैं?

डॉक्टर्स के मुताबिक, सिर्फ वजन देखकर हेल्थ का अंदाजा लगाना सही नहीं है. अगर किसी व्यक्ति की कमर का आकार ज्यादा बढ़ रहा हो, पेट बाहर निकल रहा हो या लंबे समय तक बैठकर काम करने की आदत हो, तो यह अंदरूनी फैट का संकेत हो सकता है. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि कमर की माप नियमित रूप से चेक करनी चाहिए, क्योंकि यह विसरल फैट का पता लगाने का आसान तरीका माना जाता है.

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इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए?

हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस छिपे हुए फैट को कम करने के लिए सख्त डाइटिंग से ज्यादा जरूरी है. सही लाइफस्टाइल अपनाना. मेडिटेरेनियन डाइट, पर्याप्त नींद, नियमित वॉक और एक्सरसाइज काफी मददगार मानी जाती है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि रोजाना हल्की फिजिकल एक्टिविटी और मसल्स मजबूत करने वाली एक्सरसाइज शरीर के मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाती हैं और अंदर जमा खतरनाक फैट को कम करने में मदद कर सकती हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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