ठंड में बढ़ने लगते हैं निमोनिया के मामले, ऐसे रखें खुद का ध्यान

ठंड में बढ़ने लगते हैं निमोनिया के मामले, ऐसे रखें खुद का ध्यान



सर्दियों का मौसम शुरू होते ही खांसी, जुकाम, बुखार जैसी समस्याएं लगभग हर घर में देखने को मिलती हैं. ठंडी हवा, तापमान में गिरावट और शरीर के इम्यून सिस्टम कमजोर होने के कारण कई लोग जल्दी बीमार पड़ जाते हैं. शुरुआत में साधारण सर्दी-जुकाम लगता है, लेकिन कई बार यही हल्की बीमारी धीरे-धीरे बढ़कर निमोनिया जैसे गंभीर संक्रमण का रूप ले सकती है. खासकर बच्चे, बुजुर्ग, प्रेग्नेंट महिलाएं और पहले से बीमार लोग इस मौसम में ज्यादा प्रभावित होते हैं. 

सर्दी में शरीर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है, जिससे वायरस और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं. हमारी नाक और गले की नमी सूखने लगती है, जिससे संक्रमण आसानी से फेफड़ों तक पहुंच सकता है. यही वजह है कि ठंड का मौसम निमोनिया के मामलों को काफी बढ़ा देता है. तो आइए जानते हैं ठंड में निमोनिया क्यों बढ़ता है और ऐसे समय में खुद को कैसे सुरक्षित रखें. 

निमोनिया के मामले ठंड में क्यों बढ़ने लगते हैं?

1. ठंडी हवा फेफड़ों को कमजोर करती है – सर्दियों में सांस लेते समय बहुत ठंडी हवा फेफड़ों तक पहुंचती है. यह हवा फेफड़ों के ऊतकों को प्रभावित करती है, जिससे उनमें संक्रमण जल्दी लग जाता है. 

2. बंद कमरे और कम वेंटिलेशन – ठंड के कारण लोग खिड़कियां-दरवाजे बंद रखते हैं. ताजी हवा का आने-जाने का रास्ता बंद हो जाता है, जिससे वायरस जल्दी फैलते हैं और एक-दूसरे को संक्रमण देना आसान हो जाता है. 

3. इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाना – सर्दी में शरीर का तापमान गिरने के कारण इम्यूनिटी थोड़ी धीमी हो जाती है. ऐसे में शरीर संक्रमण से लड़ नहीं पाता और निमोनिया का खतरा बढ़ जाता है. 

4. सूखी हवा का प्रभाव – ठंडी और सूखी हवा से हमारी नाक और गले की नमी कम हो जाती है. इससे वायरस और बैक्टीरिया आसानी से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. 

5. पहले से मौजूद बीमारियां तेज होना – अस्थमा, हार्ट हेल्थ, डायबिटीज या सीओपीडी वाले लोगों में सर्दी के दौरान फेफड़ों पर तनाव ज्यादा बढ़ता है. इसलिए उन लोगों को निमोनिया होने की संभावना बाकी लोगों से ज्यादा रहती है. 

ऐसे समय में खुद को कैसे सुरक्षित रखें?

1. गर्म कपड़े पहनें और ठंडी हवा से बचें – ठंडी हवा सीधे नाक और फेफड़ों तक पहुंचती है, इसलिए बाहर निकलते समय मफलर या मास्क जरूर पहनें. 

2. हाथों की साफ-सफाई बनाए रखें – वायरस तेजी से फैलते हैं, इसलिए हाथ बार-बार धोएं या सैनिटाइजर का यूज करें. 

3. घर में ताजी हवा आने दें – खिड़कियां थोड़ी देर के लिए खोलें ताकि कमरे में हवा का  अंदर- बहार जा सकें

4. भरपूर पानी पिएं –  ठंड में लोग पानी कम पीते हैं, जिससे शरीर डिहाइड्रेट हो जाता है. पानी, सूप, काढ़ा या गर्म तरल पदार्थ लें. 

5. इम्यूनिटी बढ़ाने वाला खाना खाएं – फलों, सब्जियों, दालों, सूखे मेवों और विटामिन-सी से भरपूर चीजों का सेवन करें. 

6. धूम्रपान से दूर रहें – सिगरेट फेफड़ों को कमजोर करती है और निमोनिया का खतरा कई गुना बढ़ाती है. 

7. फ्लू और निमोनिया के टीके लगवाए – विशेषकर बच्चे, बुजुर्ग और पहले से बीमार लोग फ्लू और निमोनिया के टीके लगवाए. टीके उन्हें गंभीर संक्रमण से बचाते हैं. 

8. बीमार लोगों से दूरी रखें – सर्दियों में संक्रमण बहुत तेजी से फैलता है, इसलिए बीमार व्यक्ति से थोड़ी दूरी बनाए रखें. 

यह भी पढ़ें: प्रेग्नेंसी में अचानक क्यों बढ़ जाती है शुगर, भारती सिंह को यही हुई दिक्कत

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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टीबी की कितनी स्टेज होती हैं, किस स्टेज में इंसान का बचना होता है मुश्किल?

टीबी की कितनी स्टेज होती हैं, किस स्टेज में इंसान का बचना होता है मुश्किल?



TB Symptoms: लगभग तीन साल तक COVID-19 दुनिया में किसी भी एक इंफेक्शन बीमारी से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण बना रहा. 2020 से 2023 के बीच इस वायरस ने करीब 70 लाख लोगों की जान ले ली. लेकिन 2023 में यह भयावह रिकॉर्ड फिर से टीबी के पास लौट आया. WHO के अनुसार, आज भी हर दिन करीब 3,400 लोग टीबी से अपनी जान गंवाते हैं, और लगभग 30,000 नए लोग इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं, जबकि टीबी एक ऐसी बीमारी है जिसे समय पर पहचान और इलाज से रोका भी जा सकता है और पूरी तरह ठीक भी किया जा सकता है.

टीबी अब भी दुनिया भर में एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है, खासकर उन देशों में जहां गरीबी, कुपोषण और खराब रहन-सहन जैसी सामाजिक चुनौतियां गंभीर हैं. टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक बैक्टीरिया की वजह से होती है. यह बीमारी उतनी आसानी से नहीं फैलती, टीबी के बैक्टीरिया से संक्रमित हर 100 लोगों में से सिर्फ 5 से 10 लोगों में लक्षण दिखाई देते हैं या बीमारी विकसित होती है. इसके बावजूद अनुमान है कि दुनिया की लगभग एक चौथाई आबादी कभी न कभी टीबी बैक्टीरिया के संपर्क में आ चुकी है.

Assist360 के अनुसार, टीबी की सबसे बड़ी दिक्कत इसका कई लेवल स्वभाव है. इसके लक्षण कई अन्य इंफेक्शन जैसे लगते हैं, जिससे पहचान में समय लग जाता है; इलाज लंबा चलता है, जिसमें 6 से 9 महीने तक एंटीबायोटिक्स लेनी पड़ती हैं. इसके कीटाणु बंद, हवा रहित जगहों में लंबे समय तक मौजूद रह सकते हैं.

टीबी की कितनी स्टेज?

अगर बात करें कि इसकी कितनी स्टेज होती हैं तो आपको बता दें कि इस खतरनाक बीमारी की 3 स्टेज होती हैं.

एक्सपोजर

यह शुरुआती स्टेज है, जब टीबी के कीटाणु शरीर में प्रवेश करते हैं. इम्यून सिस्टम उनमें से ज़्यादातर को रोक लेता है, लेकिन कुछ सूक्ष्म बैक्टीरिया बच जाते हैं और बाद में छिपे हुए संक्रमण (लेटेंट टीबी) में बदल सकते हैं.

लेटेंट टीबी

इस स्टेज में टीबी शरीर में मौजूद तो रहती है लेकिन सक्रिय नहीं होती. लक्षण नज़र नहीं आते, पर बैक्टीरिया भविष्य में सक्रिय हो सकते हैं. यानी बीमारी बनने की आशंका बनी रहती है.

एक्टिव टीबी

इस स्टेज में टीबी के कीटाणु शरीर में बढ़ने लगते हैं और लक्षण दिखना शुरू होते हैं. यह चरण संक्रामक होता है, खांसने या छींकने से हवा में फैले छोटे-छोटे कणों के जरिए दूसरों तक पहुंचता है. अगर इलाज न मिले तो यह गंभीर दिक्कत और मौत तक ले जा सकता है.

टीबी के आम लक्षण

  • लगातार खांसी
  • सीने में दर्द
  • कमजोरी
  • थकान
  • वजन घट जाना
  • बुखार
  • रात में पसीना

लक्षण इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि टीबी शरीर के किस हिस्से को प्रभावित कर रही है. फेफड़ों में टीबी सबसे आम है, लेकिन ये लिवर, दिमाग, रीढ़ और त्वचा को भी प्रभावित कर सकती है.

टीबी का इलाज

टीबी का मानक इलाज 6 महीने तक चलने वाला एंटीबायोटिक्स का कोर्स है. बिना इलाज टीबी से मौत का खतरा लगभग 50 प्रतिशत तक होता है, लेकिन सही और पूरा इलाज लेने पर लगभग 85 प्रतिशत मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं. अगर बैक्टीरिया दवाइयों पर प्रतिक्रिया नहीं देते, तो यह ड्रग-रेजिस्टेंट टीबी कहलाता है. इसका इलाज कठिन, लंबा और ज्यादा दवाओं वाला होता है. MDR-TB (मल्टी-ड्रग रेज़िस्टेंट टीबी) लगभग 11 से 12 प्रतिशत मामलों में देखा जाता है, और इसकी सफलता दर सामान्य टीबी से काफी कम होती है. MDR-TB अक्सर तब फैलती है जब मरीज इलाज बीच में छोड़ देते हैं या गलत तरीके से दवा लेते हैं. भीड़भाड़ वाले स्थानों में यह दूसरों तक भी पहुंच सकती है.

इसे भी पढ़ें- UPF Health Risks: एक बाइट भी पड़ती है भारी! अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से शरीर का हर अंग हो रहा बीमार, पढ़ें चौंकाने वाली रिपोर्ट

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पॉल्यूशन से जुकाम होने पर कहीं आप भी तो नहीं लेते भाप, जानें कितना कर रहे नुकसान?

पॉल्यूशन से जुकाम होने पर कहीं आप भी तो नहीं लेते भाप, जानें कितना कर रहे नुकसान?



Steam Inhalation Risks: देश की राजधानी दिल्ली अभी प्रदूषण की मार से जूझ रही है. ऐसे में लोगों को तरह-तरह की बीमारी भी हो रही है. कई लोग ऐसे हैं जिनको प्रदूषण में जुकाम की समस्या हो रही है. इसके लिए वे भाप ले रहे हैं ताकि इससे बचा जा सके. ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भाप लेना यानी पानी की गर्म वाष्प को सांस के साथ अंदर लेना. इसका असर यह होता है कि सांस की नलियां थोड़ी खुलती हैं और जमा हुआ बलगम ढीला पड़ने लगता है.

प्रदूषण और ठंड के माहौल में हवा इतनी सूखी हो जाती है कि हमारी सांस की नलियों की झिल्लियां भी सूखने लगती हैं, जिससे ब्लड फ्लो कम हो सकता है और जकड़न बढ़ जाती है. भाप की गर्माहट हवा में नमी जोड़ती है, जिससे सांस लेना आसान महसूस होता है और फेफड़ों व एयरवे में जमा बलगम नरम होकर बाहर निकलने में मदद मिलती है. चलिए आपको बताते हैं कि यह आपके लिए कितना खतरनाक है.

क्या इससे पूरी तरह ठीक हो जाता है जुकाम?

भाप लेना उन घरेलू नुस्खों में से एक है जिसे लोग सबसे ज्यादा अपनाते हैं. नाक बंद होने पर, सर्दी–जुकाम में या साइनस की परेशानी में अक्सर यही इलाज पहले सुझाया जाता है. कई जगहों पर तो यह भी दावा किया जाता है कि भाप लेने से इन आम दिक्कतों से आगे भी कई फायदे मिलते हैं. लेकिन डॉक्टर साफ कहते हैं कि भाप किसी भी इंफेक्शन जैसे सर्दी या फ्लू को ठीक नहीं करती.

फोर्टिस हॉस्पिटल, वसंत कुंज के सीनियर कंसल्टेंट (इंटरनल मेडिसिन) डॉ. मनोज शर्मा ने फाइनेंशियल एक्सप्रेस से बातचीत में कहा कि “भाप कुछ स्थितियों में जरूर राहत देती है, खासकर उन लोगों को जिन्हें कंजेशन, साइनसाइटिस या हल्की सर्दी की शिकायत हो. गर्म, नम हवा सूजन को शांत करती है और नाक के रास्ते को आराम देती है.”

वे आगे कहते हैं कि भाप लेने से थोड़ी राहत तो मिल सकती है, लेकिन इसे जरूरत से ज्यादा नहीं करना चाहिए क्योंकि यह किसी बीमारी का असली इलाज नहीं है. अगर कोई गंभीर समस्या हो, लगातार दिक्कत रहे या लक्षण बढ़ रहे हों, तो बिना देरी डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए.

इसके क्या होता है नुकसान?

भाप लेना कई मायनों में हमारे लिए फायदेमंद साबित होता है, लेकिन कभी-कभी यह नुकसानदायक भी हो सकता है. भाप लेने से हवा बहुत गर्म और नम हो जाती है, जो कई बार फेफड़ों की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचा सकती है. इसके अलावा अस्थमा, एलर्जी या सांस की बीमारी वाले मरीजों में भाप लेने से हालत और खराब हो सकती है क्योंकि गर्म भाप एयरवे को अचानक ट्रिगर कर देती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आपके किचन में बिल्कुल नहीं होनी चाहिए ये 5 चीजें, तुरंत निकालकर करें बाहर

आपके किचन में बिल्कुल नहीं होनी चाहिए ये 5 चीजें, तुरंत निकालकर करें बाहर


किचन में प्लास्टिक के बर्तन और चॉपिंग बोर्ड रखना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है. इनसे माइक्रोप्लास्टिक निकलकर खाने में मिल सकता है, जो धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर और पेट की समस्याओं का कारण बन सकता है. प्लास्टिक के बर्तनों की जगह आप स्टील, कांच या मिट्टी के बर्तन यूज करें.

अक्सर खाना पैक करने या ओवन में सेंकने के लिए एल्युमिनिकियम फॉयल का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन लंबे समय तक इसका यूज दिमाग और किडनी की समस्याओं का कारण बन सकता है. इसलिए एल्युमिनियम फॉयल की जगह पेपर फॉयल या सिलिकॉन बेकिंग मेट का यूज करें.

अक्सर खाना पैक करने या ओवन में सेंकने के लिए एल्युमिनिकियम फॉयल का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन लंबे समय तक इसका यूज दिमाग और किडनी की समस्याओं का कारण बन सकता है. इसलिए एल्युमिनियम फॉयल की जगह पेपर फॉयल या सिलिकॉन बेकिंग मेट का यूज करें.

नॉन-स्टिक पैन में लगी टेफ्लॉन कोटिंग खाना पकाने के दौरान हानिकारक केमिकल छोड़ सकती है. अगर पैन की कोटिंग झड़ चुकी हो या फटी हुई हो तो यह लिवर, फेफड़े और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है. स्टील या कास्ट-आयरन के पैन का यूज करें, ये लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं.

नॉन-स्टिक पैन में लगी टेफ्लॉन कोटिंग खाना पकाने के दौरान हानिकारक केमिकल छोड़ सकती है. अगर पैन की कोटिंग झड़ चुकी हो या फटी हुई हो तो यह लिवर, फेफड़े और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है. स्टील या कास्ट-आयरन के पैन का यूज करें, ये लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं.

किचन में टूटे-फूटे बर्तन, फटी हुई थाली या चटकी हुई हांडी रखना सेहत के लिए ठीक नहीं है. ये न सिर्फ खाने की शुद्धता को प्रभावित करते हैं, बल्कि नेगेटिव एनर्जी को भी अट्रैक्ट करते हैं. जले हुए तवे या पुराने बर्तन आपकी हेल्थ पर निगेटिव असर डालते हैं. ऐसे में पुराने और टूटे बर्तनों को तुरंत हटा दें और उनके स्थान पर मजबूत, साफ-सुथरे बर्तनों का यूज करें.

किचन में टूटे-फूटे बर्तन, फटी हुई थाली या चटकी हुई हांडी रखना सेहत के लिए ठीक नहीं है. ये न सिर्फ खाने की शुद्धता को प्रभावित करते हैं, बल्कि नेगेटिव एनर्जी को भी अट्रैक्ट करते हैं. जले हुए तवे या पुराने बर्तन आपकी हेल्थ पर निगेटिव असर डालते हैं. ऐसे में पुराने और टूटे बर्तनों को तुरंत हटा दें और उनके स्थान पर मजबूत, साफ-सुथरे बर्तनों का यूज करें.

किचन में यूज किए गए पुराने तेल, एक्सपायर्ड मसाले या सड़ी दालें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं. यह ना सिर्फ बीमारियों को बढ़ावा देती हैं, बल्कि घर में गंदगी और नेगेटिव एनर्जी भी फैलाती हैं. पुराने तेल, मसाले और दालें तुरंत फेंक दें. किचन हमेशा साफ और व्यवस्थित रखें.

किचन में यूज किए गए पुराने तेल, एक्सपायर्ड मसाले या सड़ी दालें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं. यह ना सिर्फ बीमारियों को बढ़ावा देती हैं, बल्कि घर में गंदगी और नेगेटिव एनर्जी भी फैलाती हैं. पुराने तेल, मसाले और दालें तुरंत फेंक दें. किचन हमेशा साफ और व्यवस्थित रखें.

Published at : 19 Nov 2025 06:05 PM (IST)

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प्रेग्नेंसी में अचानक क्यों बढ़ जाती है शुगर, भारती सिंह को यही हुई दिक्कत

प्रेग्नेंसी में अचानक क्यों बढ़ जाती है शुगर, भारती सिंह को यही हुई दिक्कत



मां बनना हर महिला के लिए एक खूबसूरत एहसास होता है. हालाकि, इसके साथ कई बार कुछ डर, चिंता और उलझने भी होती हैं. ऐसा ही कुछ हुआ मशहूर कॉमेडियन और होस्ट भारती सिंह के साथ, सबको हंसाने वाली भारती जब दूसरी बार मां बनने की तैयारी कर रही हैं, तभी अचानक उनकी हेल्थ से जुड़ी एक परेशानी सामने आई.

हाल ही में अपने ब्लॉग में भारती सिंह ने बताया कि सुबह खाली पेट उनकी शुगर बहुत ज्यादा थी, जबकि वह ना मीठा खाती हैं और ना ही अपनी डाइट में कोई लापरवाही करती हैं. डॉक्टर ने चेकअप के लिए बुलाया है. अचानक शुगर बढ़ना काफी महिलाओं में देखा जाता है, खासकर प्रेग्नेंसी के दौरान. प्रेग्नेंसी की शुगर सिर्फ मां नहीं, बल्कि बच्चे की सेहत को भी प्रभावित कर सकती है. ऐसे में सवाल उठता है कि अचानक शुगर बढ़ती क्यों है, इसका कारण क्या है, इसे क्या बीमारी कहते हैं और इसका असर क्या होता है. तो आइए जानते हैं कि प्रेग्नेंसी में शुगर अचानक क्यों बढ़ जाती है. 

प्रेग्नेंसी में शुगर अचानक क्यों बढ़ जाती है?

प्रेग्नेंसी के समय शरीर में कई तरह के हार्मोन बदलते हैं. ये बदलाव कभी-कभी इंसुलिन नाम के हार्मोन पर असर डालते हैं. इंसुलिन का काम खून में मौजूद शुगर को कंट्रोल में रखना है, लेकिन जब यह ठीक से काम नहीं करता या शरीर उसकी जरूरत से कम इंसुलिन बनाता है तो शुगर लेवल बढ़ने लगता है. इसी वजह से कुछ महिलाओं में प्रेग्नेंसी के दौरान अचानक ब्लड शुगर बढ़ जाती है, चाहे वे मीठा न खाएं या डाइट पर कितना भी ध्यान दें. इस कंडीशन को जेस्टेशनल डायबिटीज, GDM कहा जाता है यानी वह डायबिटीज जो सिर्फ प्रेग्नेंसी के दौरान होती है. 

GDM क्या है?

प्रेग्नेंसी में शरीर को सामान्य दिनों से ज्यादा इंसुलिन चाहिए होता है. लेकिन अगर शरीर उतना इंसुलिन नहीं बना पाता जितनी जरूरत है, तो खून में शुगर जमा होने लगती है. इसी को जेस्टेशनल डायबिटीज कहा जाता है. ये बीमारी अक्सर प्रेग्नेंसी खत्म होते ही अपने आप ठीक भी हो सकती है, लेकिन जब तक रहती है तब तक थोड़ा ज्यादा ध्यान जरूरी होता है. 

किन महिलाओं में GDM का खतरा ज्यादा होता है?

कुछ महिलाओं में यह समस्या होने की संभावना ज्यादा होती है, जैसे जिनका वजन ज्यादा हो या BMI 30 से ऊपर हो, जिन्हें पहली प्रेग्नेंसी में शुगर हो चुका हो, जिनके परिवार में डायबिटीज हो, जिनका पहले भी बच्चा हुआ होया जो पहले से बॉर्डरलाइन डायबिटीज की शिकार रही हों. वहीं भारती सिंह पहले से बॉर्डरलाइन डायबिटीज में थीं, इसलिए उन्हें GDM होने का खतरा ज्यादा था. ऐसे में डाइट फॉलो करने के बाद भी शुगर अनकंट्रोल हो सकती है. 

प्रेग्नेंसी में GDM का पता कैसे चलता है?

डॉक्टर्स प्रेग्नेंसी के दौरान 12 से 16 हफ्ते, फिर 24 से 28 हफ्ते और 32 से 34 हफ्ते पर शुगर टेस्ट करवाते हैं. जिसमें सबसे जरूरी टेस्ट OGTT (Oral Glucose Tolerance Test) होता है. इसमें आपको मीठा ग्लूकोज वाला घोल पिलाया जाता है और कुछ समय बाद ब्लड सैंपल लेकर देखा जाता है कि शरीर उस मीठे को कितनी जल्दी संभालता है.यही टेस्ट बताता है कि GDM है या नहीं. 

यह भी पढ़ें TB Surveillance System: AI ने ढूंढा टीबी को रोकने का नया तरीका, घटेंगे मौत के आंकड़े! जानें कैसे काम करती है यह तकनीक?

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एक बाइट भी पड़ती है भारी! अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से शरीर का हर अंग हो रहा बीमार, पढ़ें रिपोर्ट

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Fast Food Side Effects: आजकल इंसान की लाइफस्टाइल काफी बदल गई है, लोग खाना-बनाने की जगह बाहर से फास्ट-फूड खाने पर ज्यादा निर्भर हो रहे हैं. लेकिन क्या आपको लगता है कि कभी-कभार फ्रेंच फ्राइज, चिप्स या बाजार से खरीदा गया मीठा ड्रिंक कोई नुकसान नहीं करेगा?. अगर आपको भी लगता है कि इससे कुछ नहीं होगा, तो सावधान हो जाइए. ताजा लैंसेट रिपोर्ट इसको लेकर कुछ और ही बताती है. नई सीरीज में सामने आया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड शरीर के लगभग हर बड़े अंग पर नुकसान पहुंचाते हैं और कई लंबे समय की बीमारियों तथा समय से पहले मौत का कारण बन सकते हैं. दुनिया भर में बड़े पैमाने पर खाए जाने वाले ये पैकेज्ड फूड अब इतनी गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम पैदा कर रहे हैं कि एक्सपर्ट तुरंत कड़े नियम, लेबलिंग और पॉलिसी बदलाव की मांग कर रहे हैं.

एक-दो बाइट कम नुकसानदायक लग सकती है, लेकिन रिसर्च कहता है कि यही शुरुआत आगे चलकर शरीर को गहराई तक प्रभावित करती है. द लैंसेट में प्रकाशित तीन बड़े पेपर्स की इस सीरीज को UPFs पर अब तक की सबसे व्यापक समीक्षा माना जा रहा है, और यह स्पष्ट करती है कि ये फूड हर प्रमुख अंग को नुकसान पहुंचा सकते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि इससे क्या-क्या खतरा है.

कैंसर सहित कई बीमारियों से जुड़ा UPF

UPFs आज हर जगह मौजूद हैं. BMJ की एक स्टडी के अनुसार, अमेरिका में लोगों की रोज की खपत में आधे से भी ज्यादा कैलोरी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से आती है. सुबह के सीरियल से लेकर बर्गर, चिप्स, पैकेज्ड स्नैक्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स, फ्रोजन मील, बिस्किट, केक मिक्स, इंस्टेंट नूडल्स, नगेट्स, सॉसेज. इनकी लिस्ट खत्म ही नहीं होती. दुनियाभर के 43 एक्सपर्ट ने रिसर्च करके जो निष्कर्ष निकाला, वह डराने वाला है. इनमे से 92 स्टडीज ने पाया कि UPFs क्रॉनिक बीमारियों का जोखिम बढ़ाते हैं. फिर चाहे वह दिल की बीमारी हो, डायबिटीज, मोटापा या डिप्रेशन. कई स्टडीज ने समय से पहले मौत के मामलों से भी इनका संबंध बताया.

 न्यूट्रिशन एक्सपर्ट कार्लोस मोंटेरो बताते हैं कि “सबूत साफ है कि इंसानी शरीर इन खाने की इन चीजों के लिए जैविक रूप से तैयार नहीं है. UPFs हर बड़े ऑर्गन सिस्टम को नुकसान पहुंचाते हैं.” रिसर्चर ने भोजन की प्रोसेसिंग के स्तर के अनुसार NOVA सिस्टम विकसित किया, जिसमें UPF सबसे उच्च (लेवल 4) श्रेणी में आते हैं. यानी वे खाने की चीजें जो इंडस्ट्रियल रूप से बनाए जाते हैं और जिनमें फ्लेवर, कलर, इमल्सीफायर जैसी आर्टिफिशियल चीजें मिलाई जाती हैं.

स्पष्ट लेबलिंग और कड़े नियम की मांग

रिसर्चर ने सिफारिश की है कि UPFs को पैक के फ्रंट पर साफ और बड़े अक्षरों में लिखा जाए, साथ ही चीनी, नमक और फैट की चेतावनियों के साथ. उनका कहना है कि लोग अक्सर “हेल्दी” दिखने वाले पैक के बहकावे में आ जाते हैं, जबकि उनमें UPFs की मात्रा बहुत ज्यादा होती है. रिसर्चर चेतावनी दे रहे हैं कि वैश्विक कंपनियां भारी मुनाफे के लिए इन उत्पादों को तेजी से बढ़ावा दे रही हैं. मार्केटिंग और राजनीतिक लॉबिंग के कारण सही पब्लिक-हेल्थ नीतियां आगे नहीं बढ़ पा रहीं.

इसे भी पढ़ें- Self Medication: खुद से दवा लेने की आदत पड़ सकती है सेहत पर भारी, जानें क्यों बेअसर हो रहीं दवाएं?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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