सफेद-पीले के अलावा अंडे का यह हिस्सा भी होता है ताकतवर, हड्डियों को देता है भरपूर ताकत

सफेद-पीले के अलावा अंडे का यह हिस्सा भी होता है ताकतवर, हड्डियों को देता है भरपूर ताकत


Eggshell Powder Calcium Benefits: अंडा हमारी सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है, इसी कारण लोग इसको खूब खाते हैं और छिलका उतार कर फेंक देते हैं. लेकिन अंडे का छिलका कैल्शियम का सबसे सस्ता और असरदार प्राकृतिक स्रोत माना जाता है. जहां ज्यादातर लोग इसे कचरे में फेंक देते हैं, वहीं सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह हड्डियों की सेहत के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है. बाजार में रेडीमेड एगशेल पाउडर भी मिलता है, वहीं इसे घर पर भी तैयार किया जा सकता है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.

अंडे का छिलका आखिर होता क्या है?

अंडे का छिलका दरअसल अंडे की बाहरी सख्त परत होती है, जो ज्यादातर कैल्शियम कार्बोनेट से बनी होती है. इसके अलावा इसमें थोड़ी मात्रा में प्रोटीन और अन्य मिनरल्स भी पाए जाते हैं. कैल्शियम वही मिनरल है जो हड्डियों और दांतों की मजबूती के लिए सबसे जरूरी माना जाता है. रिसर्च के मुताबिक, मुर्गी के अंडे का छिलका करीब 40 फीसदी कैल्शियम से बना होता यानी सिर्फ एक ग्राम अंडे के छिलके से अच्छी खासी मात्रा में कैल्शियम मिल सकता है.

कैल्शियम सप्लीमेंट के तौर पर कितना असरदार?

PubMed indexed studies में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक,अंडे के छिलके में मौजूद कैल्शियम कार्बोनेट वही फॉर्म है, जो ज्यादातर कैल्शियम सप्लीमेंट में इस्तेमाल होता है. स्टडीज में पाया गया है कि एगशेल पाउडर शरीर में उतनी ही अच्छी तरह एब्ज़ॉर्ब होता है, जितना सामान्य कैल्शियम सप्लीमेंट. कुछ रिसर्च तो यह भी बताती हैं कि अंडे के छिलके से मिलने वाला कैल्शियम, शुद्ध कैल्शियम कार्बोनेट सप्लीमेंट की तुलना में बेहतर तरीके से शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है, इसकी वजह छिलके में मौजूद कुछ प्राकृतिक प्रोटीन और कंपाउंड माने जाते हैं. कैल्शियम के अलावा अंडे के छिलके में मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, स्ट्रॉन्शियम और सेलेनियम जैसे मिनरल्स भी होते हैं, जो हड्डियों की मजबूती में सहायक भूमिका निभाते हैं

ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा भी कर सकता है कम

healthline के अनुसार यह ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे को कम कर सकता है. ऑस्टियोपोरोसिस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है, बढ़ती उम्र इसके सबसे बड़े कारणों में से एक है, लेकिन लंबे समय तक कैल्शियम की कमी भी इसे बढ़ावा दे सकती है. कुछ स्टडी में पाया गया है कि पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं में अंडे के छिलके से बना कैल्शियम, विटामिन D और मैग्नीशियम के साथ लेने पर बोन मिनरल डेंसिटी बेहतर हुई. वहीं कुछ मामलों में यह सामान्य कैल्शियम सप्लीमेंट से ज्यादा असरदार साबित हुआ.

 क्या सावधानी जरूरी है?

अगर अंडे के छिलके को सही तरीके से तैयार किया जाए, तो इसे सुरक्षित माना जाता है. लेकिन बड़े टुकड़े निगलना खतरनाक हो सकता है, इसलिए इसे हमेशा बारीक पाउडर में ही इस्तेमाल करना चाहिए. इसके अलावा अंडे के छिलके पर बैक्टीरिया, जैसे साल्मोनेला, हो सकता है. इसलिए छिलके का इस्तेमाल करने से पहले अंडे को अच्छे से उबालना जरूरी है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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IVF से 10 गुना सस्ता होता है प्रेग्नेंसी का यह प्रोसेस, लेकिन ये 5 गलतियां कर देती हैं फेल

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Can IUI Help You Get Pregnant: अगर आप और आपका पार्टनर लंबे समय से प्रेग्नेंसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो आपने IUI और IVF के बारे में जरूर सुना होगा. ये दोनों ही फर्टिलिटी ट्रीटमेंट हैं, लेकिन प्रोसेस, खर्च और सक्सेस रेट के मामले में दोनों में बड़ा फर्क होता है. सही फैसला लेने के लिए इन दोनों को समझना जरूरी है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर किन कारणों के चलते IUI फेल हो जाता है. 

IUI क्या है?

IUI यानी इंट्रायूटेराइन इनसेमिनेशन को आम भाषा में आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन कहा जाता है. यह IVF की तुलना में ज्यादा आसान और कम इनवेसिव ट्रीटमेंट माना जाता है, इस प्रोसेस में ओव्यूलेशन के समय प्रोसेस किए गए स्पर्म को सीधे गर्भाशय में डाला जाता है, ताकि स्पर्म और एग के मिलने की संभावना बढ़ सके. महिला के मेंस्ट्रुअल साइकिल की शुरुआत से ही अंडों की ग्रोथ पर नजर रखी जाती है. ओव्यूलेशन के करीब पहुंचते ही IUI किया जाता है. स्पर्म सैंपल को लैब में वॉश कर सबसे हेल्दी और एक्टिव स्पर्म को चुना जाता है और एक पतली कैथेटर की मदद से गर्भाशय में डाला जाता है. इसके बाद फर्टिलाइजेशन प्राकृतिक रूप से फैलोपियन ट्यूब में होता है.

किन लोगों के लिए IUI की सलाह दी जाती है?

IUI को आमतौर पर फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का पहला स्टेप माना जाता है. यह उन महिलाओं के लिए उपयुक्त हो सकता है, जिन्हें PCOS जैसे ओव्यूलेशन डिसऑर्डर हों. जिन मामलों में मेल फैक्टर इंफर्टिलिटी हल्की हो, सर्वाइकल म्यूकस से जुड़ी समस्या हो, अनएक्सप्लेंड इंफर्टिलिटी हो या फिर सिंगल वुमन जो डोनर स्पर्म का इस्तेमाल कर रहे हों. आमतौर पर डॉक्टर 3 से 4 IUI साइकल ट्राई करने के बाद IVF की सलाह देते हैं.

भारत में IUI और IVF का खर्च

भारत में IUI का खर्च IVF की तुलना में काफी कम होता है. asianinfertility की रिपोर्ट के अनुसार, एक IUI साइकल की औसत लागत करीब 5,000 से 10,000 रुपये के बीच होती है. इसमें दवाइयां, मॉनिटरिंग, स्पर्म प्रोसेसिंग और प्रोसीजर शामिल होते हैं. वहीं IVF की बात करें तो इसकी प्रक्रिया ज्यादा मुश्किल होती है, इसलिए खर्च भी ज्यादा होता है. भारत में एक IVF साइकल का खर्च आमतौर पर 80,000 से 1.5 लाख रुपये तक हो सकता है. इसमें एग निकालना, लैब में फर्टिलाइजेशन, एम्ब्रियो ट्रांसफर और अन्य जांच शामिल होती हैं.

IUI और IVF की सक्सेस रेट

IVF की तुलना में IUI की सक्सेस रेट कम होती है, लेकिन हल्की फर्टिलिटी समस्याओं में IUI बेहतर विकल्प माना जाता है. IUI की सफलता उम्र, दवाइयों और मेडिकल कंडीशन पर निर्भर करती है. IUI की सक्सेस रेट प्रति साइकल करीब 10 से 20 प्रतिशत होती है. वहीं 3 से 4 साइकल के बाद युवतियों में कुल सफलता 40 से 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. IVF की सक्सेस रेट महिलाओं की उम्र 35 साल से कम होने पर 40 प्रतिशत तक हो सकती है. उम्र बढ़ने के साथ यह दर घटती जाती है, लेकिन कई साइकल और एम्ब्रियो सिलेक्शन के साथ सफलता की संभावना ज्यादा हो जाती है.

IUI फेल होने की 5 बड़ी वजहें

Novaivffertility के अनुसार IUI सस्ता और आसान जरूर है, लेकिन कुछ गलतियां इसकी सफलता को प्रभावित कर सकती हैं, इसमें

  • खराब क्वालिटी के अंडे – ऐसे अंडों में क्रोमोसोमल दिक्कतें हो सकती हैं, जिससे फर्टिलाइजेशन या एम्ब्रियो डेवलपमेंट प्रभावित होता है.
  • उम्र का बढ़ना – 35 साल से कम उम्र में IUI की सफलता ज्यादा होती है, इसके बाद संभावना तेजी से घटती है. 40 साल के बाद IUI प्रभावी नहीं माना जाता.
  • स्पर्म क्वालिटी कमजोर होना – कमजोर या कम एक्टिव स्पर्म फैलोपियन ट्यूब तक नहीं पहुंच पाते.
  • गलत टाइमिंग – अगर ओव्यूलेशन के 12–24 घंटे के भीतर स्पर्म मौजूद न हो, तो एग नष्ट हो सकता है.
  • एंडोमेट्रियल लाइनिंग की समस्या – अगर गर्भाशय की परत सही न हो, तो फर्टिलाइज्ड एग इम्प्लांट नहीं हो पाता.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भारत के 38% लोग ‘फैटी लिवर’ की गिरफ्त में! घर बैठे इन 5 संकेतों से करें पहचान

भारत के 38% लोग ‘फैटी लिवर’ की गिरफ्त में! घर बैठे इन 5 संकेतों से करें पहचान


Signs Of Non Alcoholic Fatty Liver Disease: भारत में बदलती लाइफस्टाइल के चलते कई बीमारियां तेजी से फैल रही हैं, उनमें से एक बीमारी है फैटी लिवर. अनुमान है कि देश के करीब 38 प्रतिशत एडल्ट नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज से प्रभावित हो सकते हैं. चिंता की बात यह है कि यह बीमारी अक्सर बिना किसी साफ लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ती रहती है. गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट डॉ. सौरभ सेठी (MD, MPH) के मुताबिक, फैटी लिवर की पक्की जांच अल्ट्रासाउंड या लिवर फंक्शन टेस्ट से ही होती है, लेकिन कुछ शुरुआती संकेत ऐसे होते हैं जिन्हें लोग घर पर भी महसूस कर सकते हैं.

हर वक्त बनी रहने वाली थकान

फैटी लिवर से जुड़ी थकान सामान्य कमजोरी जैसी नहीं होती. इसमें भरपूर आराम के बाद भी शरीर में ऊर्जा की कमी बनी रहती है. लिवर शरीर में पोषक तत्वों को ऊर्जा में बदलने का काम करता है, लेकिन जब उसमें चर्बी जमा होने लगती है, तो यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है. नतीजतन दिनभर भारीपन, सुस्ती और थकावट महसूस हो सकती है. अक्सर लोग इसे तनाव या ज्यादा काम का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन जब यह रोज़मर्रा की बात बन जाए, तो सतर्क होना जरूरी है.

पेट के आसपास बढ़ती चर्बी

फैटी लिवर का एक अहम संकेत है कमर और पेट के आसपास चर्बी का बढ़ना. कई बार व्यक्ति बाहर से दुबला-पतला दिखता है, लेकिन कमर का साइज धीरे-धीरे बढ़ने लगता है. डॉ. सेठी बताते हैं कि लिवर और अंदरूनी अंगों के आसपास जमा चर्बी, त्वचा के नीचे जमा फैट से कहीं ज्यादा खतरनाक होती है. यह इंसुलिन रेजिस्टेंस और खराब मेटाबॉलिक हेल्थ से जुड़ी होती है, जो फैटी लिवर की शुरुआती चेतावनी मानी जाती है.

दाईं पसलियों के नीचे भारीपन या हल्का दर्द

पेट के दाहिने हिस्से में, पसलियों के नीचे कभी-कभार होने वाला भारीपन या हल्का दर्द भी संकेत हो सकता है. यह दर्द अक्सर तेज नहीं होता, बल्कि दबाव, जकड़न या भरे-भरेपन जैसा महसूस होता है. चूंकि लिवर शरीर के दाहिने हिस्से में होता है, इसलिए ऐसी परेशानी अगर थकान और वजन बढ़ने के साथ दिखे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए.

इंसुलिन रेजिस्टेंस के हल्के संकेत

फैटी लिवर का सीधा संबंध इंसुलिन रेजिस्टेंस से होता है, जिसमें शरीर की सेल्स इंसुलिन पर ठीक से रियक्शन नहीं करतीं. इसके संकेत रोजमर्रा की जिंदगी में नजर आ सकते हैं, जैसे खाने के थोड़ी देर बाद फिर भूख लगना, अचानक एनर्जी गिर जाना, या गर्दन और बगल के आसपास त्वचा का काला पड़ना. ये लक्षण अक्सर डायबिटीज से पहले ही दिखाई देने लगते हैं.

बार-बार मितली और भूख कम लगना

जब लिवर चर्बी और टॉक्सिन्स को ठीक से प्रोसेस नहीं कर पाता, तो पाचन से जुड़ी दिक्कतें शुरू हो सकती हैं. हल्की मितली, थोड़ा-सा खाने पर पेट भरा-भरा लगना या खाने में मन न लगना इसके संकेत हो सकते हैं. डॉ. सेठी के अनुसार, ऐसा लिवर की कमजोर होती कार्यक्षमता के कारण होता है. समय के साथ पाचन तंत्र का संतुलन बिगड़ने लगता है, जो भले ही तुरंत गंभीर न लगे, लेकिन किसी गहरी समस्या की ओर इशारा करता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सूर्य ग्रहण देखने से आंखें ही नहीं, ये अंग भी हो जाते हैं खराब, ऐसे समझें खतरा

सूर्य ग्रहण देखने से आंखें ही नहीं, ये अंग भी हो जाते हैं खराब, ऐसे समझें खतरा


How Solar Eclipse Affects Human Health: इस साल का पहला सूर्यग्रहण 17 फरवरी 2026, मंगलवार को फाल्गुन अमावस्या के दिन होगा. हालांकि, भारत में आप इसको आसमान से नहीं देख पाएंगे. यह दक्षिण अफ्रीका, दक्षिणी अर्जेंटीना और अंटार्कटिका के कुछ हिस्सों से दिखाई देगा. चलिए आपको बताते हैं कि इससे आपकी सेहत पर क्या असर पड़ता है. 

विज्ञान सूर्य ग्रहण और सेहत को कैसे देखता है?

साइंटफिक नजरिए से सूर्य ग्रहण अपने आप में कोई नुकसान नहीं पहुंचाता. असली खतरा तब होता है, जब लोग बिना सुरक्षा के सूर्य को सीधे देखने की कोशिश करते हैं. ग्रहण के दौरान भी सूरज की किरणें आंखों की रेटिना को नुकसान पहुंचा सकती हैं, जिससे सोलर रेटिनोपैथी नाम की समस्या हो सकती है और नजर हमेशा के लिए कमजोर पड़ सकती है इसलिए एक्सपर्ट हमेशा इक्लिप्स ग्लास या सुरक्षित तरीकों से ही देखने की सलाह देते हैं. कुछ रिसर्च यह भी बताते हैं कि इस तरह की खगोलीय घटनाएं कुछ लोगों की नींद और बॉडी क्लॉक पर हल्का असर डाल सकती हैं. अचानक रोशनी कम होने से शरीर की जैविक घड़ी थोड़ी देर के लिए भ्रमित हो सकती है, जिससे कुछ लोगों को थकान या बेचैनी महसूस होती है.

मूड और एनर्जी में बदलाव

साइकलॉजिस्ट मानते हैं कि सूर्य ग्रहण जैसे रेयर मौके इमोशनल रूप से लोगों को प्रभावित कर सकते हैं. भले ही विज्ञान सीधे तौर पर मूड स्विंग्स को ग्रहण से न जोड़ता हो, लेकिन अचानक छाया और माहौल में बदलाव कुछ लोगों को असहज या उदास महसूस करा सकता है. कई बार यह समय आत्ममंथन और शांति का अहसास भी कराता है.
एक्सपर्ट का कहना है कि जो लोग पहले से तनाव या एंग्जायटी से जूझ रहे होते हैं, उनमें इस दौरान स्ट्रेस हार्मोन बढ़ सकता है.

परंपराएं और खाने से जुड़े नियम

भारतीय परंपराओं में सूर्य ग्रहण को खास महत्व दिया गया है. पुराने समय में ग्रहण के दौरान खाना बनाने या खाने से बचने की सलाह दी जाती थी. मान्यता है कि इस दौरान हानिकारक किरणें भोजन को खराब कर देती हैं. वैज्ञानिक रूप से इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है, लेकिन कुछ माइक्रोबायोलॉजिस्ट मानते हैं कि पुराने जमाने में ग्रहण के वक्त खाना लंबे समय तक खुले में पड़ा रहता था, जिससे उसके खराब होने की आशंका रहती थी. संभव है कि यहीं से यह परंपरा शुरू हुई हो. आज भी कई घरों में ग्रहण के बाद बना हुआ खाना फेंककर नया भोजन तैयार किया जाता है.

गर्भावस्था से जुड़ी दिक्कतें

गर्भवती महिलाओं को सूर्य ग्रहण के दौरान घर के अंदर रहने की सलाह दी जाती है. मान्यता है कि इससे गर्भस्थ शिशु पर असर पड़ सकता है. हालांकि विज्ञान ऐसी किसी बात की पुष्टि नहीं करता. लेकिन यह जरूर सच है कि गर्भावस्था में तनाव और थकान से बचना जरूरी होता है. चूंकि ग्रहण को लेकर कई जगहों पर डर और चिंता का माहौल बन जाता है, इसलिए बुजुर्गों ने शायद यह नियम महिलाओं की सुरक्षा और मानसिक शांति के लिए बनाए हों.

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घर की ये 8 जगहें हैं टॉयलेट सीट से भी ज्यादा गंदी, रोज सफाई जरूरी, वरना बीमार पड़ना तय!

घर की ये 8 जगहें हैं टॉयलेट सीट से भी ज्यादा गंदी, रोज सफाई जरूरी, वरना बीमार पड़ना तय!


Places Dirtier Than A Toilet At Home: जिस तरह आप खुद को बीमारी से बचाने के लिए डेली अपने शरीर की साफ-सफाई करते हैं, उसी तरह घर की सफाई करने की जरूरत होती है. यह सिर्फ देखने में अच्छा लगने के लिए नहीं होती, बल्कि यह आपकी सेहत और आराम से भी सीधा जुड़ी होती है. अक्सर लोग रोज झाड़ू-पोछा करते हैं, फिर भी घर की कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहां बैक्टीरिया, धूल और गंदगी तेजी से जमा हो जाती है. इसकी वजह यह नहीं कि आप सफाई ठीक से नहीं करते, चलिए आपको बताते हैं इन जगहों के बारे में. 

किचन सिंक और नल के हैंडल

किचन सिंक को लोग अक्सर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है,उन्हें लगता है कि यहां पानी रहता है इसलिए यह साफ भी रहता होगा, लेकिन हकीकत इसके उलट है. कई स्टडीज़ के मुताबिक किचन सिंक और नल के हैंडल पर टॉयलेट सीट से भी ज़्यादा बैक्टीरिया पाए जाते हैं. रोज सिंक और नल को साफ करने से इंफेक्शन का खतरा कम होता है और बदबू भी नहीं आती. आप इसो हल्के डिसइंफेक्टेंट और गर्म पानी से इसे साफ़ करना काफी है.

चॉपिंग बोर्ड

चाहे लकड़ी का हो या प्लास्टिक का, चॉपिंग बोर्ड पर रोज़ सब्जी, फल और मांस काटे जाते हैं. इसमें बारीक दरारों के बीच बैक्टीरिया छिप जाते हैं, जो नजर नहीं आते. अगर इन्हें रोज साफ न किया जाए, तो फूड पॉइजनिंग का खतरा बढ़ सकता है.  इस्तेमाल करने के बाद गर्म पानी और साबुन से धोना और कभी-कभी नींबू या सिरके के पानी से साफ करना फायदेमंद होता है।

मोबाइल फोन और रिमोट

मोबाइल फोन, टीवी या एसी का रिमोट दिन में कई बार हाथ में आते हैं, वो भी बिना हाथ धोए. रिसर्च बताती है कि मोबाइल फोन पर टॉयलेट सीट से ज्यादा बैक्टीरिया हो सकते हैं. रोज इन्हें साफ करने से हाथों से फैलने वाले कीटाणु कम होते हैं. माइक्रोफाइबर कपड़े और हल्के अल्कोहल से इन्हें पोंछना सुरक्षित तरीका है.

किचन स्पंज और डिश क्लॉथ

बर्तन साफ करने वाला स्पंज और कपड़ा खुद ही बैक्टीरिया का घर बन जाते हैं, क्योंकि इनमें नमी और खाने के कण फंसे रहते हैं. अगर इन्हें रोज़ साफ न किया जाए, तो बदबू और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं. इन्हें गर्म पानी में धोना, समय-समय पर उबालना और नियमित रूप से बदलते रहना जरूरी है.

बाथरूम के नल और हैंडल

बाथरूम में नमी हमेशा बनी रहती है, जो बैक्टीरिया और फंगस के लिए सही माहौल बनाती है. नल, दरवाज़ों के हैंडल और साबुन रखने की जगहें रोज छुई जाती हैं. इन्हें रोजाना हल्के डिसइंफेक्टेंट से पोंछने से कीटाणुओं का फैलाव रुकता है और फंगस भी नहीं जमता.

टॉयलेट फ्लश हैंडल

यह शायद घर की सबसे गंदी जगहों में से एक है, क्योंकि हर बार फ्लश करने के दौरान इसे छुआ जाता है. अगर इसे रोज़ साफ न किया जाए, तो इंफेक्टेड फैलने का खतरा बढ़ जाता है. रोजाना डिसइंफेक्टेंट स्प्रे या वाइप से इसे साफ करना आदत में शामिल करना चाहिए.

लाइट स्विच और डोर हैंडल

लाइट स्विच और दरवाजों के हैंडल ऐसी जगहें हैं, जिन्हें हर कोई बार-बार छूता है, लेकिन साफ करना भूल जाता है. ये बैक्टीरिया को एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुंचाने का जरिया बन जाते हैं.

पालतू जानवरों के बर्तन

अगर आपके पास पालतू जानवर हैं, तो आप उनको जिस बर्तन में खाना खिलाते हैं, उसको साफ रखा कीजिए. जब जानवर इनमें खाना खाते हैं, तो उनके लार इसमें जमा हो जाती है, जिसके चलते इसमें बैक्टीरिया पनपने लगते हैं. अगर इसकी साफ-सफाई न की जाए, तो यह बाद में बीमारी का घर बन जाता है. 

भले ही आप हफ्ते में एक बार डीप क्लीनिंग करें, लेकिन रोज की हल्की सफाई को नजरअंदाज न करें. थोड़ी-सी आदत और कुछ मिनट की मेहनत से घर साफ भी रहेगा और आप सेहतमंद भी रहेंगे.

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