अंडा Vs सोयाबीन, प्रोटीन के मामले में ज्यादा ताकतवर कौन? बंगाल में मिड-डे मील का बदल गया मेन्यू

अंडा Vs सोयाबीन, प्रोटीन के मामले में ज्यादा ताकतवर कौन? बंगाल में मिड-डे मील का बदल गया मेन्यू


Eggs vs Soybeans : पश्चिम बंगाल में सरकार के एक फैसले के बाद मिड-डे मील को लेकर बड़ी बहस शुरू हो गई है. सरकार ने इस योजना के संचालन की जिम्मेदारी इस्कॉन से जुड़ी अन्नामित्र फाउंडेशन को सौंपने का फैसला किया है. इसके बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठने लगा कि अगर बच्चों की थाली से अंडे हटा दिए जाएं और उनकी जगह सोया से बने फूड आइटम्स दिए जाएं, तो क्या बच्चों को उतना ही पोषण मिल पाएगा.

इस विवाद के पीछे बच्चों के पोषण, उनकी बढ़ती उम्र की जरूरतें, सरकारी योजनाओं और खाने की क्वालिटी जैसे कई अहम मुद्दे जुड़े हुए हैं. पश्चिम बंगाल में सरकारी स्कूलों के मिड-डे मील में फिलहाल बच्चों को हफ्ते में एक दिन अंडा दिया जाता है. अंडा लंबे समय से इस योजना का अहम हिस्सा रहा है. यह कम कीमत में अच्छी क्वालिटी वाला प्रोटीन उपलब्ध कराता है. ऐसे में जब इसकी जगह सोया, पनीर या राजमा जैसे ऑप्शनों की बात सामने आई तो बहस तेज हो गई कि आखिर बच्चों के लिए बेहतर ऑप्शन कौन-सा है. तो आइए जानते हैं कि अंडा या सोयाबीन प्रोटीन के मामले में ज्यादा ताकतवर कौन है.

सोयाबीन को क्यों माना जाता है अच्छा प्रोटीन सोर्स?

सोयाबीन को पौधों से मिलने वाले सबसे अच्छे प्रोटीन सोर्स में गिना जाता है. ज्यादातर वेजीटेरियन प्रोटीन फूड्स के मुकाबले, सोयाबीन में शरीर के लिए जरूरी सभी 9 जरूरी अमीनो एसिड मौजूद होते हैं. इसी वजह से इसे कंप्लीट प्रोटीन कहा जाता है. इस मामले में यह अंडे, दूध और मांस जैसी कैटेगरी में शामिल होता है. सोया चंक्स, टोफू और सोया ग्रेन्यूल्स प्रोटीन से भरपूर होते हैं. इन्हें कम लागत में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचाया जा सकता है. यही वजह है कि बड़े पोषण कार्यक्रमों में इन्हें एक बेस्ट ऑप्शन माना जाता है. 

सोयाबीन में कितना होता है प्रोटीन?

100 ग्राम सूखे सोया चंक्स में लगभग 52 ग्राम प्रोटीन होता है. इसमें शरीर के लिए जरूरी सभी 9 अमीनो एसिड मौजूद होते हैं. साथ ही 100 ग्राम में करीब 13 ग्राम डाइटरी फाइबर पाया जाता है. इसमें फैट बहुत कम होती है. इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है. इसके अलावा वजन कंट्रोल रखने और हार्ट हेल्थ के लिए इसे अच्छा माना जाता है. 

स्कूलों के मिड-डे मील में अंडा क्यों शामिल किया गया?

पिछले कई सालों में देश के कई राज्यों ने मिड-डे मील में अंडा शामिल किया गया है. यह सस्ता, आसानी से उपलब्ध और पोषक तत्वों से भरपूर होता है. एक अंडा बच्चों को सिर्फ प्रोटीन ही नहीं देता, बल्कि कई जरूरी पोषक तत्व भी उपलब्ध कराता है, जिनमें प्रोटीन, विटामिन B12, विटामिन D, कोलीन, हेल्दी फैट शामिल है. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के खाने में इन पोषक तत्वों की अक्सर कमी देखी जाती है. इसलिए अंडा उनके लिए काफी उपयोगी माना जाता है. अंडे में मौजूद लगभग पूरा प्रोटीन शरीर आसानी से अवशोषित कर लेता है. यही कारण है कि पोषण विशेषज्ञ इसे सबसे प्रभावी प्रोटीन स्रोतों में गिनते हैं.

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अंडा, पनीर और सोया में कितना प्रोटीन?

पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, एक अंडे में लगभग 6 ग्राम प्रोटीन होता है. वहीं लगभग 50 ग्राम पनीर में करीब 9 से 10 ग्राम प्रोटीन मिलता है. इसके अलावा 25 ग्राम सूखे सोया चंक्स में लगभग 13 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है. अगर केवल प्रोटीन की मात्रा देखी जाए तो सोया सबसे आगे है. इसके बाद पनीर और फिर अंडा आता है. पोषण विशेषज्ञों के मुताबिक प्रोटीन की क्वालिटी इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें सभी जरूरी अमीनो एसिड मौजूद हैं या नहीं, शरीर उसे कितनी आसानी से पचा और यूज कर सकता है. इसी आधार पर अंडा लंबे समय से सबसे बेहतरीन प्रोटीन स्रोतों में गिना जाता है. अंडे में सभी जरूरी अमीनो एसिड लगभग पाए जाते हैं. साथ ही इसका प्रोटीन शरीर बहुत आसानी से पचा और अवशोषित कर लेता है. यही कारण है कि पोषण विज्ञान में अंडे के प्रोटीन को अक्सर मानक माना जाता है. 

अंडा या सोयाबीन प्रोटीन के मामले में ज्यादा ताकतवर कौन है?

अगर सिर्फ प्रोटीन की मात्रा की बात करें तो सोया चंक्स अंडे से ज्यादा प्रोटीन देते हैं, लेकिन अगर प्रोटीन की क्वालिटी, पाचन क्षमता और ऑवर ऑल हेल्थ के लिए अंडा अब भी सबसे बेहतर माना जाता है. पनीर भी इस मामले में मजबूत ऑप्शन है, जबकि सोया उसके बाद आता है. सोया प्रोटीन का अच्छा स्रोत है, लेकिन अंडे में मौजूद कुछ पोषक तत्व पौधों से मिलने वाले खाने में या तो नहीं होते या बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं. इनमें मुख्य रूप से विटामिन B12 और कोलीन शामिल हैं. ऐसे में अगर अंडे की जगह केवल सोया दिया जाता है तो इन पोषक तत्वों की कमी पूरी करने के लिए खाने में दूसरे फूड आइटम्स शामिल करने होंगे. 

यह भी पढ़ें – Heart Health Tips : जिम या फिर योगा…दिल की सेहत के लिए क्या है बेहतर? एक्सपर्ट से जानें

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जिम या फिर योगा…दिल की सेहत के लिए क्या है बेहतर? एक्सपर्ट से जानें

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Gym vs Yoga: आजकल दिल से जुड़ी बीमारियां दुनियाभर में तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसे में डॉक्टर नियमित रूप से एक्सरसाइज करने की सलाह देते हैं. लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि दिल को हेल्दी रखने के लिए जिम बेहतर है या योगा. कुछ लोग जिम में वर्कआउट करना पसंद करते हैं तो कुछ योग को सबसे अच्छा तरीका मानते हैं.

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इन दोनों की तुलना करना सही नहीं है, क्योंकि दोनों ही अलग-अलग तरीके से दिल की सेहत को फायदा पहुंचाते हैं. अगर दोनों को सही तरीके से अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा बनाया जाए तो इसका फायदा और भी ज्यादा मिलता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि एक्सपर्ट के मुताबिक दिल की सेहत के लिए जिम और योगा में क्या बेहतर है. 

जिम और योगा में क्या बेहतर है?

एक्सपर्ट के अनुसार, जिम और योगा दोनों ही दिल को हेल्दी रखने के लिए जरूरी माने जाते हैं. हालांकि, दोनों का काम करने का तरीका अलग है. एक्सपर्ट का कहना है कि किसी एक को चुनने की जगह बेहतर है कि दोनों को अपनी फिटनेस रूटीन में शामिल किया जाए.

जिम करने से दिल को कैसे मिलता है फायदा?

जिम में की जाने वाली एक्सरसाइज जैसे तेज चलना, जॉगिंग, साइक्लिंग, रोइंग और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग दिल की फिटनेस को बेहतर बनाने में मदद करती हैं. नियमित रूप से इस तरह की एक्सरसाइज करने से दिल मजबूत होता है और पूरे शरीर में खून पहुंचाने का काम बेहतर तरीके से कर पाता है. जिम वर्कआउट से दिल की कार्यक्षमता बेहतर होती है. ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखने में मदद मिलती है. साथ ही कोलेस्ट्रॉल को बैलेंस रखने में सही होता है. इसके अलावा वजन को कंट्रोल रखने में मदद मिलती है. हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का खतरा कम हो सकता है. इसके साथ ही शरीर की स्टैमिना और सहनशक्ति बढ़ती है. एक्सपर्ट के अनुसार, नियमित कार्डियो एक्सरसाइज करने से दिल मजबूत होता है और उसे शरीर के सभी हिस्सों तक ऑक्सीजन वाला खून पहुंचाने के लिए कम मेहनत करनी पड़ती है. 

योगा क्यों है दिल के लिए जरूरी?

योगा का फोकस शरीर को फ्लेक्सिबिल बनाने, सही तरीके से सांस लेने, संतुलन बनाए रखने और मानसिक शांति पर होता है. हालांकि योगा से कार्डियो एक्सरसाइज जितनी एरोबिक फिटनेस नहीं मिलती, लेकिन यह दिल की सेहत के लिए कई दूसरे तरीकों से फायदेमंद माना जाता है. योगा तनाव और चिंता कम करने में मदद करता है.स्ट्रेस हार्मोन को कम करने में सहायक होता है.साथ ही शरीर की फ्लेक्सिबिलिटी और पोस्चर बेहतर बनाता है और सांस लेने की क्षमता में सुधार करता है. इसके अलावा अच्छी नींद लेने में मदद करता है. विशेषज्ञों के अनुसार, तनाव भी दिल की बीमारियों का एक बड़ा कारण माना जाता है. योगा मन और नर्वस सिस्टम को शांत रखकर इस जोखिम को कम करने में मदद करता है.

क्या सिर्फ योगा करने से दिल हेल्दी रह सकता है?

एक्सपर्ट का कहना है कि योगा के कई शारीरिक और मानसिक फायदे जरूर हैं, लेकिन केवल योगा करने से शरीर को उतनी एरोबिक एक्टिविटी नहीं मिलती, जिससे दिल की सहनशक्ति में बड़ा सुधार हो सके. विशेषज्ञों के मुताबिक, हेल्दी लोगों को हर हफ्ते कम से कम 150 मिनट तक मीडियम स्पीड वाली एक्सरसाइज, जैसे तेज चलना, जॉगिंग या साइकिल चलाना, करनी चाहिए. साथ ही बेहतर फिटनेस और दिल की अच्छी सेहत के लिए योग के साथ दूसरी फिजिकल एक्टिविटी भी करना जरूरी माना जाता है. 

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दिल को हेल्दी रखने के लिए कैसी होनी चाहिए एक्सरसाइज रूटीन?

कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि जिम और योगा में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं है. बेहतर होगा कि दोनों को अपनी फिटनेस रूटीन का हिस्सा बनाया जाए. जिसमें एक बैलेंस फिटनेस प्लान में तेज चलना, जॉगिंग, साइक्लिंग या स्विमिंग जैसी एरोबिक एक्सरसाइज, हफ्ते में कम से कम दो दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, साथ ही शरीर की रिकवरी और तनाव कम करने के लिए योगा. इसके अलावा रोजाना स्ट्रेचिंग और ब्रीदिंग एक्सरसाइज शामिल होना चाहिए. इस तरह की रूटीन दिल के साथ-साथ मांसपेशियों, शरीर की फ्लेक्सिबिलिटी और मेंटल हेल्थ को भी बेहतर बनाए रखने में मदद करती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बाजार में सिर्फ 2 महीने के लिए आता है यह फल, बीपी से लेकर शुगर और लीवर तक रहेगा एकदम फिट

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Health Tips: गर्मियों और बरसात के मौसम में बाजार में कई तरह के मौसमी फल मिलते हैं. इस मौसम से आम और लीची तो लगभग हर किसी को पसंद होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी मौसम में एक ऐसा फल भी मिलता है, जो टेस्ट के साथ-साथ सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद माना जाता है. यह फल पूरे साल नहीं मिलता, बल्कि सिर्फ करीब दो महीने तक ही बाजार में उपलब्ध रहता है. यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसके सीजन में इसे खाने की सलाह देते हैं. 

इस फल में कई जरूरी पोषक तत्व, एंटीऑक्सीडेंट और प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचा सकते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, अगर इसके मौसम में इसे सीमित मात्रा में नियमित रूप से खाया जाए, तो यह शरीर को जरूरी पोषण देने में मदद करता है. मेडिकल रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह फल ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने, पाचन को बेहतर बनाने, लीवर को स्वस्थ रखने और शरीर की सूजन कम करने में सहायक माना जाता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर वह कौन-सा फल है, जो सिर्फ दो महीने के लिए बाजार में आता है और जिसे खाने से बीपी, शुगर और लीवर की सेहत को फायदा मिल सकता है.

वह कौन-सा फल है, जो सिर्फ दो महीने के लिए बाजार में आता है?

जामुन एक ऐसा मौसमी फल है, जो साल भर नहीं मिलता, यह सिर्फ करीब दो महीने तक ही बाजार में ताजा मिलता है. इसलिए डॉक्टर और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसके मौसम में इसे खाने की सलाह देते हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, जामुन में विटामिन-सी, फाइबर, पोटैशियम, आयरन और एंथोसायनिन जैसे कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं. यह शरीर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद कर सकते हैं. इसके अलावा जामुन में मौजूद प्राकृतिक तत्व ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने, पाचन तंत्र को बेहतर बनाने और शरीर की सूजन कम करने में भी सहायक माने जाते हैं. जामुन में फाइबर अच्छी मात्रा में होता है, इसलिए यह पाचन को बेहतर रखने और पेट साफ रखने में भी मदद कर सकता है. यही वजह है कि कई पोषण विशेषज्ञ मानसून के मौसम में सीमित मात्रा में जामुन खाने की सलाह देते हैं.

क्यों माना जाता है जामुन का रंग खास?

जामुन का गहरा बैंगनी रंग एंथोसायनिन नामक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट की वजह से होता है. यही तत्व जामुन को कई स्वास्थ्य फायदे देने में जरूरी भूमिका निभाता है. मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, एंथोसायनिन इंसुलिन सेंसिटिविटी को बेहतर बनाने और ब्लड शुगर बढ़ने की प्रक्रिया को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है. साथ ही यह शरीर में बनने वाले फ्री रेडिकल्स को कम करके कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में भी सहायक माना जाता है. 

डायबिटीज और पाचन कैसे फायदेमंद है?

कई शोधों के अनुसार, जामुन के फल और इसके बीजों में मौजूद प्राकृतिक यौगिक ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं. इसी वजह से जामुन को डायबिटीज के मरीजों के लिए फायदेमंद माना जाता है. हालांकि, इसे किसी भी स्थिति में दवा का ऑप्शन नहीं माना जाना चाहिए. जामुन में मौजूद फाइबर आंतों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाए रखने और नियमित पेट साफ में भी मदद कर सकता है. यह समस्या अक्सर डायबिटीज के मरीजों में देखने को मिलती है. 

यह भी पढ़ें – Adult Autism Diagnosis: बड़े होने पर क्यों सामने आ रहा है ऑटिज्म का सच? डॉक्टर से जानें इसके लक्षण

बीपी, लीवर और इम्यूनिटी के लिए कितना अच्छा है जामुन?

जामुन का सेवन शरीर को कई अन्य फायदे भी दे सकता है. इसमें मौजूद विटामिन-सी और अन्य पोषक तत्व शरीर की इम्यूनिटी के सामान्य कामकाज में मदद करते हैं. इसके अलावा जामुन में मौजूद पोटेशियम और एंटीऑक्सीडेंट ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखने और ब्लड सेल्स को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक माने जाते हैं. मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, जामुन का सेवन लीवर की कार्यप्रणाली को भी सपोर्ट कर सकता है. 

वजन घटाने वालों के लिए भी अच्छा ऑप्शन कैसे है?

जामुन में कैलोरी कम और फाइबर ज्यादा मात्रा में होता है. ऐसे में इसे खाने के बाद लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है. यही वजह है कि वजन कम करने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए भी इसे एक अच्छा मौसमी फल माना जाता है, सीमित मात्रा में इसका सेवन बैलेंस डाइट का हिस्सा बन सकता है. 

यह भी पढ़ें – Women Bone Health After 35: 35 के बाद महिलाओं की हड्डियां क्यों होने लगती हैं खोखली? जानें इसके लक्षण

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बड़े होने पर क्यों सामने आ रहा है ऑटिज्म का सच? डॉक्टर से जानें इसके लक्षण

बड़े होने पर क्यों सामने आ रहा है ऑटिज्म का सच? डॉक्टर से जानें इसके लक्षण


Why Autism Is Diagnosed Late In Adults: आज पहले के मुकाबले ज्यादा वयस्कों में ऑटिज्म की पहचान हो रही है. लंबे समय तक कई लोग एक सवाल के साथ जीते रहे क्यों जिंदगी हमेशा थोड़ी अलग, थोड़ी असामान्य महसूस होती है? अब जाकर बहुतों को इसका जवाब मिल रहा है. जिसे कभी सिर्फ बचपन की स्थिति माना जाता था, वह अब बड़े लोगों में भी तेजी से पहचाना जा रहा है. यह अचानक बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि समझ और जागरूकता में आए बदलाव का असर है. डॉ. सोनाली चतुर्वेदी, कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट, अरीते हॉस्पिटल्स बताती हैं कि “पिछले कुछ सालों में वयस्कों में ऑटिज्म की पहचान तेजी से बढ़ी है, क्योंकि अब लोग इसे बेहतर समझने लगे हैं.”

पहले ऑटिज्म की अलग पहचान थी

पहले ऑटिज्म की एक तय छवि थी कि एक छोटा बच्चा जिसे बोलने या सामाजिक व्यवहार में दिक्कत हो. जो लोग इस दायरे में फिट नहीं बैठते थे, वे अक्सर नजरअंदाज हो जाते थे. शांत स्वभाव, ज्यादा सोचने की आदत या अकेले रहना, इन्हें सामान्य व्यवहार मान लिया जाता था, जबकि ये संकेत हो सकते थे.  कई लोग बचपन से ही खुद को ढालना सीख लेते हैं. दूसरों को देखकर व्यवहार अपनाना, बातचीत के तरीके याद करना. इसे मास्किंग कहा जाता है. यह बाहर से सब सामान्य दिखाता है, लेकिन अंदर से थकान और बेचैनी बढ़ती रहती है.  डॉ. चतुर्वेदी ने TOI को बताया कि “मास्किंग के कारण पहचान में देर हो जाती है, यहां तक कि खुद व्यक्ति को भी समझ नहीं आता.” 

इलाज के दौरान क्या रखें ध्यान?

अक्सर सही पहचान से पहले लोग दूसरी समस्याओं के लिए इलाज कराते रहते हैं कि जैसे चिंता, अवसाद या व्यक्तित्व से जुड़ी दिक्कतें.  कुछ राहत मिलती है, लेकिन पूरी तस्वीर साफ नहीं होती. डॉ. चतुर्वेदी के अनुसार कि कई लोग बार-बार इलाज लेते हैं, फिर भी उन्हें लगता है कि कुछ अधूरा है, जब तक असली कारण सामने नहीं आता.”  एक अहम पहलू यह भी है कि महिलाओं में यह पहचान और भी देर से होती है. पहले ज्यादातर रिसर्च पुरुषों पर आधारित थी, इसलिए महिलाओं में दिखने वाले संकेत नजरअंदाज हो गए. उन्हें अक्सर ज्यादा भावुक या ज्यादा सोचने वाला कहकर टाल दिया गया.

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बातचीत ने समझ बढ़ाई

अब हालात बदल रहे हैं. सोशल मीडिया, लोगों के अनुभव और खुली बातचीत ने समझ बढ़ाई है. कई बार किसी और की कहानी सुनकर लोग खुद को पहचान पाते हैं. डॉ. चतुर्वेदी कहती हैं कि “कई वयस्कों के लिए यह पल तब आता है, जब वे किसी और के अनुभव में खुद को देखते हैं.” जिन्हें बाद में पहचान मिलती है, उनके लिए यह बदलाव डर नहीं बल्कि राहत लेकर आता है. यह उनकी पहचान नहीं बदलता, बल्कि यह समझ देता है कि वे हमेशा ऐसे ही थे. बचपन की यादें, रिश्ते और कामकाजी जीवन, सब कुछ एक नई नजर से समझ आने लगता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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35 के बाद महिलाओं की हड्डियां क्यों होने लगती हैं खोखली? जानें इसके लक्षण

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Why Bone Density Decreases After 35 In Women: महिलाओं के शरीर में एक बदलाव ऐसा भी आता है जो न तो बाहर से दिखता है, न तुरंत कोई दर्द देता है और न ही रोजमर्रा की जिंदगी को अचानक प्रभावित करता है. लेकिन यह बदलाव धीरे-धीरे अंदर ही अंदर बढ़ता रहता है.  35 की उम्र के बाद हड्डियों की मजबूती कम होने लगती है.  पहले जो हड्डियां युवावस्था में तेजी से बनती और मजबूत होती थीं, अब उनका बनना धीमा और टूटना थोड़ा तेज हो जाता है.  सबसे चिंता की बात यह है कि यह सब चुपचाप होता रहता है और लंबे समय तक पता ही नहीं चलता. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉक्टर ललित नेमिचंद बाफना, जो मणिपाल अस्पताल द्वारका में हड्डी रोग एक्सपर्ट हैं, उन्होंने TOI को बताया कि 30 के बाद महिलाएं आमतौर पर हड्डियों की सेहत के बारे में ज्यादा नहीं सोचतीं, लेकिन यहीं से असली बदलाव शुरू होता है. उनके अनुसार, 35 के बाद शरीर जितनी तेजी से हड्डियों को बनाता है, उससे ज्यादा तेजी से उन्हें तोड़ने लगता है, जिससे धीरे-धीरे उनकी घनता कम होती जाती है. यह प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि शुरुआती समय में कोई साफ संकेत भी नहीं मिलते. 

क्या होते हैं संकेत?

यही वजह है कि हड्डियों की कमजोरी शुरुआत में महसूस ही नहीं होती.  कई बार महिलाएं पूरी तरह सामान्य महसूस करती हैं.  इसके शुरुआती संकेत बहुत बाद में दिखाई देते हैं, जैसे कद में थोड़ा कम होना, कभी-कभी पीठ में दर्द या हल्की सी गिरावट में हड्डी का टूट जाना. एक स्टडी के अनुसार, भारत में कई महिलाओं में यह समस्या तब तक पकड़ में नहीं आती जब तक कोई फ्रैक्चर न हो जाए, खासकर 40 की उम्र के बाद. 

इस स्थिति को समझना भी जरूरी है. यह सिर्फ हड्डियों का कमजोर होना नहीं है, बल्कि उनकी बनावट में बदलाव होता है. हड्डियां अंदर से खोखली और हल्की होने लगती हैं, जिससे वे दबाव सहने में कमजोर पड़ जाती हैं. 

महिलाओं में क्यों जल्दी होती है यह दिक्कत?

महिलाओं में यह समस्या जल्दी इसलिए भी देखने को मिलती है क्योंकि शरीर में हार्मोन से जुड़े बदलाव होते हैं.  एस्ट्रोजन नाम का हार्मोन हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है, लेकिन समय के साथ इसका स्तर कम होने लगता है. इसके अलावा खानपान में कैल्शियम और विटामिन डी की कमी, लंबे समय तक बैठकर काम करना, प्रेग्नेंसी और ब्रेस्टफीडिंग जैसे कारण भी हड्डियों पर असर डालते हैं. 

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जांच करवाना जरूरी

हड्डियों की जांच के लिए एक खास स्कैन किया जाता है, जो आसान और बिना दर्द वाला होता है, लेकिन ज्यादातर महिलाएं इसे देर से करवाती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसकी जरूरत उम्र बढ़ने पर ही होती है. जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि समय रहते जांच और सही देखभाल से आगे चलकर हड्डी टूटने का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है. हालांकि 35 के बाद हड्डियां पहले जितनी तेजी से नहीं बनतीं, लेकिन सही आदतों से इस गिरावट को धीमा जरूर किया जा सकता है. रोजाना टहलना, हल्की कसरत, धूप लेना और संतुलित आहार लेना इसमें मददगार होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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नकली दवाओं का खेल खत्म! अब कैंसर, एंटीबायोटिक और टीकों पर QR कोड अनिवार्य, सरकार का बड़ा फैसला

नकली दवाओं का खेल खत्म! अब कैंसर, एंटीबायोटिक और टीकों पर QR कोड अनिवार्य, सरकार का बड़ा फैसला


बाजार में बिकने वाली नकली और खराब क्वालिटी की दवाइयां हमेशा से लोगों के लिए सिरदर्द रही हैं. कई बार मरीज और उनके घरवाले अनजाने में नकली दवाइयां खरीद लेते हैं, जिससे बीमारी ठीक होने की जगह बढ़ जाती है. इस खतरे से लोगों को बचाने के लिए केंद्र सरकार ने बेहद सख्त फैसला लिया है. 

सरकार के नए नियम के मुताबिक, अब कैंसर की दवाओं, एंटीबायोटिक्स (एंटी-माइक्रोबियल), जीवन रक्षक टीकों (Vaccines) और डिप्रेशन (मानसिक रोग) की दवाओं के पैकेट पर क्यूआर (QR) कोड या बारकोड लगाना जरूरी कर दिया गया है. इस क्यूआर कोड की मदद से कोई भी मरीज, डॉक्टर या मेडिकल स्टोर वाला अपने मोबाइल से स्कैन करके तुरंत पता लगा सकेगा कि दवा असली है या नकली.

सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने औषधि नियमावली, 1945 के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए कई जरूरी दवाओं को खास कैटिगरी (अनुसूची H2) में शामिल किया है. सरकार का मकसद दवा बनने से लेकर मरीज के हाथ में पहुंचने तक की पूरी सप्लाई चेन को साफ-सुथरा और पारदर्शी बनाना है. पहले यह नियम देश के सिर्फ टॉप 300 बड़े ब्रांड्स की दवाओं पर ही लागू था, लेकिन अब सरकार ने इसका दायरा बढ़ा दिया है. इसके बाद सभी गंभीर और संवेदनशील बीमारियों की दवाओं को इसके दायरे में ला दिया गया है.

QR कोड स्कैन करने पर क्या-क्या पता चलेगा?

दवा के पैकेट पर छपे इस खास क्यूआर कोड को जब आप किसी मोबाइल ऐप या सॉफ्टवेयर से स्कैन करेंगे तो स्क्रीन पर दवा से जुड़ी तमाम अहम जानकारियां सामने आ जाएंगी. 

  • दवा का असली ब्रांड नाम और उसका जेनेरिक नाम
  • दवा बनाने वाली कंपनी का नाम और उसका पूरा पता
  • दवा का बैच नंबर (Batch Number)
  • दवा किस दिन बनी (मैन्युफैक्चरिंग डेट) और कब खराब होगी (एक्सपायरी डेट)
  • कंपनी का मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस नंबर
  • दवा का अनोखा कोड (यूनिक प्रोडक्ट आइडेंटिफिकेशन कोड)

इस बात का रखना होगा ध्यान

अगर दवा का पत्ता या शीशी बहुत छोटी है और उस पर क्यूआर कोड छापने की जगह नहीं है तो इसे दवा के बाहरी डिब्बे पर छापना जरूरी होगा. अब बिना क्यूआर कोड की दवाओं को बाजार में बेचना पूरी तरह गैर-कानूनी माना जाएगा.

किस दवा पर कब से लागू होगा यह नियम?

दवा कंपनियों को इस नई तकनीक को अपनाने और तैयारी करने के लिए सरकार ने दो फेज में टाइमिंग तय की है. 

  • 1 जुलाई 2026 से: सभी तरह के टीके (Vaccines), कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं और मानसिक बीमारियों (जैसे डिप्रेशन) से जुड़ी सभी दवाएं बिना क्यूआर कोड के नहीं बिकेंगी.
  • 1 जुलाई 2028 से: सभी तरह की एंटीबायोटिक (सूक्ष्मजीवरोधी) दवाओं पर भी क्यूआर कोड प्रिंट करना अनिवार्य हो जाएगा.

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