2040 तक मौत का 5वां बड़ा कारण बनेगी किडनी की बीमारी, लैंसेट की रिपोर्ट में डरावना खुलासा

2040 तक मौत का 5वां बड़ा कारण बनेगी किडनी की बीमारी, लैंसेट की रिपोर्ट में डरावना खुलासा


Early Warning Signs Of Chronic Kidney Disease: हमारे शरीर में किडनी दिन-रात बिना रुके काम करती है. यह खून से वेस्ट पदार्थों को फिल्टर करने, शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने, ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने और हड्डियों व ब्लड वेसल्स को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. लेकिन चिंता की बात यह है कि जब किडनी की काम करने की क्षमता कम होने लगती है, तब शरीर अक्सर शुरुआती दौर में कोई स्पष्ट संकेत नहीं देता. यही कारण है कि क्रॉनिक किडनी डिजीज को एक साइलेंट.बीमारी माना जाता है. 

क्यों बढ़ रही है दुनियाभर में किडनी की बीमारी?

हाल ही में मेडिकल जर्नल द लैंसेटमें पब्लिश तीन रिसर्च पत्रों की तरफ से एक  चेतावनी दी गई है कि क्रॉनिक किडनी डिजीज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हेल्थ चुनौतियों में से एक बनती जा रही है. रिपोर्ट के अनुसार, दुनियाभर में करीब 788 से 844 मिलियन एडल्ट इस बीमारी से प्रभावित हैं और वर्ष 2040 तक यह वैश्विक स्तर पर मृत्यु के प्रमुख कारणों में पांचवें स्थान पर पहुंच सकती है.

इसे भी पढ़ें – Summer Fatigue: गर्मियों में बार-बार महसूस हो रही थकान, जान लें यह किस बीमारी का संकेत?

एक्सपर्ट का कहना है कि किडनी रोग के मामलों में बढ़ोतरी के पीछे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, हृदय रोग और बढ़ती उम्र जैसे कारण जिम्मेदार हैं. इसके अलावा आजकल की अनियमित लाइफस्टाइल और खराब खानपान भी किडनी पर अतिरिक्त दबाव डाल रहे वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन भी मानता है कि किडनी रोग अक्सर शुरुआती चरण में बिना लक्षणों के बढ़ता है, इसलिए समय पर जांच बेहद जरूरी है. 

किडनी की बीमारी का जल्दी पता लगाना क्यों जरूरी?

द लैंसेट की पहली स्टडी में बताया गया कि अब किडनी रोग की पहचान के लिए नई तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है. अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट टेस्ट, एल्ब्यूमिन्यूरिया जांच, एडवांस इमेजिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अन्य आधुनिक तकनीकें बीमारी को शुरुआती अवस्था में पकड़ने में मदद कर रही हैं. रिसर्चर का मानना है कि जितनी जल्दी बीमारी का पता चलेगा, किडनी को उतना ही बेहतर तरीके से बचाया जा सकेगा.

महिलाओं और पुरुषों के किडनी डिजीज में क्या अंतर?

दूसरी स्टडी में एक दिलचस्प तथ्य सामने आया. रिसर्चर ने पाया कि पुरुषों और महिलाओं में किडनी रोग का असर एक जैसा नहीं होता. दोनों के शरीर में किडनी की बनावट, बीमारी की प्रगति और इलाज के प्रति प्रतिक्रिया अलग हो सकती है. इसलिए भविष्य में किडनी रोग के इलाज को अधिक व्यक्तिगत और जरूरत के अनुसार तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है.

उम्मीद की किरण जग रही

तीसरी स्टडी उम्मीद जगाने वाली है। इसमें बताया गया कि नई दवाओं जैसे एसजीएलटी2 इनहिबिटर्स , ग्लूकागॉन-लाइक पेप्टाइड-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट और अन्य आधुनिक उपचारों ने किडनी रोग की प्रगति को धीमा करने में अच्छे परिणाम दिखाए हैं. इसके  साथ ही ये दवाएं हृदय स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि मरीजों में अक्सर डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोग जैसी कई समस्याएं एक साथ होती हैं, इसलिए समग्र उपचार की आवश्यकता होती है.

किडनी को किन चीजों से होती है दिक्कत?

अमन पुरी, फाउंडर, स्टेडफास्ट न्यूट्रिशन के अनुसार खानपान की गलत आदतें भी किडनी पर बुरा असर डाल सकती हैं. उनका कहना है कि हाई-प्रोटीन डाइट, जरूरत से ज्यादा नमक, चीनी और अस्वस्थ वसा का सेवन किडनी पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है. उन्होंने चेतावनी दी कि हाथों, पैरों या आंखों के आसपास लगातार सूजन, यूरिन में बदलाव, झागदार यूरिन, लगातार थकान, भूख कम लगना, मुंह में धातु जैसा स्वाद और रात में मांसपेशियों में ऐंठन जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

इसे भी पढ़ें- Single Malt Whisky: कैसे पीनी चाहिए सिंगल मॉल्ट व्हिस्की, जानें क्या है इसे पीने का सबसे सही तरीका?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

इरेक्टाइल डिस्फंक्शन हो सकता है दिल की बीमारी का संकेत, कभी नजरअंदाज न करें ये साइन

इरेक्टाइल डिस्फंक्शन हो सकता है दिल की बीमारी का संकेत, कभी नजरअंदाज न करें ये साइन


Can Erectile Dysfunction Be A Sign Of Heart Disease: उम्र बढ़ने के साथ शरीर कई तरह के संकेत देने लगता है. अक्सर पुरुष थकान, खराब नींद, खर्राटे या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों को सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि ये समस्याएं सिर्फ रोजमर्रा की दिक्कतें नहीं हैं, बल्कि कई बार हार्ट और ब्लड वेसल्स से जुड़ी गंभीर बीमारियों की शुरुआती चेतावनी भी हो सकती हैं. 

25 वर्षों का अनुभव रखने वाले कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. जेरेमी लंदन ने हाल ही में एक इंस्टाग्राम वीडियो में ऐसे चार संकेतों के बारे में बताया, जिन्हें पुरुष अक्सर हल्के में लेते हैं. उनके मुताबिक, ये लक्षण भविष्य में होने वाली हार्ट संबंधी समस्याओं का संकेत हो सकते हैं. 

इरेक्टाइल डिस्फंक्शन को क्यों नहीं लेना चाहिए हल्के में?

सबसे महत्वपूर्ण संकेतों में से एक है इरेक्टाइल डिस्फंक्शन . डॉ. लंदन के अनुसार, इसे केवल यौन हेल्थ की समस्या समझना बड़ी गलती हो सकती है. दरअसल, इरेक्शन से जुड़ी आर्टरीज शरीर की सबसे पतली ब्लड वेसल्स में शामिल होती हैं. जब इनमें ब्लॉकेज या ब्लड फ्लो में कमी आने लगती है, तो इसका असर सबसे पहले यौन स्वास्थ्य पर दिखाई दे सकता है. यही वजह है कि कई बार इरेक्टाइल डिस्फंक्शन, सीने में दर्द या हार्ट अटैक जैसे लक्षण आने से कई साल पहले ही दिल की बीमारी का संकेत दे देता है. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि यदि अचानक इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या शुरू हो जाए तो केवल दवा लेने के बजाय हार्ट की जांच भी करानी चाहिए. 

इसे भी पढ़ेंः Best Time To Drink Tea: सुबह की चाय या शाम की चाय? जानिए आपकी सेहत के लिए कौन-सा समय है सबसे बेहतर

लो टेस्टोस्टेरोन भी एक वजह

डॉ. लंदन ने दूसरा महत्वपूर्ण संकेत लो टेस्टोस्टेरोन बताया. बहुत से पुरुष इसे बढ़ती उम्र का सामान्य असर मान लेते हैं, लेकिन उनके अनुसार इसके पीछे पेट के आसपास बढ़ती चर्बी, खराब नींद और फिजिकल एक्टिविटी की कमी जैसी वजहें हो सकती हैं. यदि इन कारणों को समय रहते नियंत्रित कर लिया जाए तो हार्मोनल स्वास्थ्य में सुधार संभव है. इसलिए किसी भी दवा या सप्लीमेंट की ओर बढ़ने से पहले लाइफस्टाइल में बदलाव करना जरूरी है.

कब शुरू करना चाहिए हार्ट का ध्यान रखना?

तीसरा संकेत है दिल की बीमारी का पुरुषों में जल्दी दिखाई देना. डॉ. लंदन बताते हैं कि महिलाओं को मेनोपॉज तक एस्ट्रोजन हार्मोन से हार्ट सुरक्षा मिलती रहती है, जबकि पुरुषों में यह सुरक्षा नहीं होती. यही कारण है कि पुरुषों में हार्ट रोग महिलाओं की तुलना में लगभग एक दशक पहले विकसित हो सकता है. इसलिए हार्ट की सेहत का ध्यान 60 साल की उम्र में नहीं, बल्कि 30 और 40 की उम्र से ही शुरू कर देना चाहिए. 

तेज खर्राटे भी एक तरह के सिग्नल

चौथा संकेत है स्लीप एपनिया. अगर किसी व्यक्ति को तेज खर्राटे आते हैं, रात में बार-बार नींद टूटती है या पर्याप्त नींद लेने के बाद भी थकान महसूस होती है, तो यह स्लीप एपनिया का संकेत हो सकता है. डॉ. लंदन चेतावनी देते हैं कि यह स्थिति हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट रिद्म की गड़बड़ी और हार्ट पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा सकती है. चिंता की बात यह है कि बड़ी संख्या में पुरुष इस समस्या से पीड़ित होते हैं, लेकिन उन्हें इसका पता ही नहीं होता. 

इसे भी पढ़ेंः Late Night Eating Heart Health Side Effects: रात 9 बजे के बाद खाते हैं खाना, दिल को हो सकता है बड़ा नुकसान

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator





Source link

कोई चोट नहीं लगी फिर भी शरीर पर दिख रहे नीले निशान, क्या ये किसी बीमारी का संकेत?

कोई चोट नहीं लगी फिर भी शरीर पर दिख रहे नीले निशान, क्या ये किसी बीमारी का संकेत?


Causes Of Random Bruises On The Body: कई बार ऐसा होता है कि शरीर पर अचानक नीले या बैंगनी रंग के निशान दिखाई देने लगते हैं और व्यक्ति को याद भी नहीं रहता कि उसे कहीं चोट लगी हो. अक्सर लोग इसे सामान्य बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन कुछ मामलों में यह शरीर की किसी अंदरूनी समस्या का संकेत भी हो सकता है. इसलिए बार-बार बिना कारण पड़ने वाले निशानों को हल्के में लेना सही नहीं है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं. 

क्यों पड़ते हैं निशान?

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline की रिपोर्ट के अनुसार,  एक्सपर्ट के अनुसार, कभी-कभी बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत या भारी एक्सरसाइज करने से भी त्वचा के नीचे मौजूद छोटी- छोटी ब्लड वेसल्स प्रभावित हो सकती हैं. मसल्स पर अधिक दबाव पड़ने से ये नसें फट जाती हैं और त्वचा के नीचे खून जमा होने लगता है, जिससे नीले निशान बन जाते हैं. ऐसे मामलों में व्यक्ति को चोट का एहसास नहीं होता, लेकिन निशान दिखाई दे सकते हैं. 

दवा भी हो सकता है कारण

कुछ दवाएं भी इसकी वजह बन सकती हैं. खासतौर पर ब्लड थिनर, एस्पिरिन, इबुप्रोफेन और नेप्रोक्सेन जैसी दवाएं खून को जमने में अधिक समय लगाती हैं. जब खून सामान्य गति से नहीं जमता तो त्वचा के नीचे उसका रिसाव बढ़ जाता है और आसानी से नीले निशान बनने लगते हैं. अगर किसी नई दवा के बाद यह समस्या शुरू हुई है तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. 

जरूरी पोषक तत्वों की कमी की तरफ इशारा

शरीर में कुछ जरूरी पोषक तत्वों की कमी भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. विटामिन C की कमी से त्वचा और ब्लड वेसल्स कमजोर हो सकती हैं, जिससे मामूली दबाव पर भी निशान पड़ जाते हैं. वहीं आयरन की कमी खून की वेसल्स को प्रभावित करती है और विटामिन K की कमी खून के थक्के बनने की प्रक्रिया को धीमा कर सकती है. ऐसे में बिना वजह बार-बार नीले निशान दिखना पोषण संबंधी कमी का संकेत हो सकता है. 

ये भी होते हैं जिम्मेदार

इसके अलावा इम्यून थ्रोम्बोसाइटोपेनिया जैसी रेयर बीमारी में शरीर में प्लेटलेट्स की संख्या कम हो जाती है. प्लेटलेट्स खून को जमाने में अहम भूमिका निभाते हैं. इनकी कमी होने पर त्वचा पर अचानक नीले या बैंगनी निशान उभर सकते हैं. कुछ मामलों में बार-बार पड़ने वाले नीले निशान गंभीर बीमारियों जैसे नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा या अन्य ब्लड संबंधी दिक्कतों का संकेत भी हो सकते हैं. हालांकि ऐसा कम होता है, लेकिन अगर इसके साथ अत्यधिक थकान, वजन घटना या बार-बार खून बहने जैसी समस्याएं भी हों तो जांच कराना जरूरी हो जाता है.

इसे भी पढ़ेंः Best Time To Drink Tea: सुबह की चाय या शाम की चाय? जानिए आपकी सेहत के लिए कौन-सा समय है सबसे बेहतर

कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए?

अगर शरीर पर बिना चोट के बार-बार नीले निशान दिखाई दें, निशान का आकार लगातार बढ़ रहा हो, नाक से बार-बार खून आता हो या खून बहना आसानी से बंद न हो रहा हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. सही समय पर जांच कराने से किसी गंभीर बीमारी का पता शुरुआती चरण में लगाया जा सकता है और समय रहते इलाज शुरू किया जा सकता है.

इसे भी पढ़ेंः Late Night Eating Heart Health Side Effects: रात 9 बजे के बाद खाते हैं खाना, दिल को हो सकता है बड़ा नुकसान

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

बच्चों को बचपन से सिखाएं बचत का ये फॉर्मूला, कभी नहीं करेंगे फालतू फिजूलखर्ची

बच्चों को बचपन से सिखाएं बचत का ये फॉर्मूला, कभी नहीं करेंगे फालतू फिजूलखर्ची


How To Teach Children The Value Of Money: आज के दौर में पैसा खर्च करने के बहाने पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गए हैं. ऑनलाइन शॉपिंग, इंस्टेंट डिलीवरी और एक क्लिक पर मिलने वाली सुविधाओं ने खरीदारी को बेहद आसान बना दिया है. हालांकि यह सुविधा लोगों की जिंदगी को आसान बनाती है, लेकिन इसके कारण इंतजार करने और किसी लक्ष्य के लिए मेहनत करने की आदत भी कम होती जा रही है. बच्चों के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है, क्योंकि वे अक्सर तुरंत मिलने वाली चीजों को ही प्राथमिकता देते हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसी आदतें आगे चलकर आवेग में खरीदारी करने और फाइनेंशियल रूप से कमजोर बनने का कारण बन सकती हैं.

यही वजह है कि माता-पिता के लिए बच्चों को कम उम्र से ही पैसों की समझ देना और लक्ष्य तय करना सिखाना बेहद जरूरी हो जाता है. यह सीख केवल आर्थिक मामलों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भविष्य में रिश्तों, करियर और जीवन के अन्य महत्वपूर्ण निर्णयों में भी मददगार साबित होती है. 

बच्चों को सीखाने का सबसे आसान तरीका

बच्चों को बचत के लिए प्रेरित करने का सबसे आसान तरीका है उन्हें कोई सार्थक लक्ष्य देना. जब बच्चे के मन में कोई खास खिलौना, साइकिल या पसंदीदा वस्तु होती है, तो वह उसे पाने के लिए बचत करने के लिए अधिक प्रेरित होता है. माता-पिता बच्चों को यह समझा सकते हैं कि हर इच्छा तुरंत पूरी नहीं होती और कुछ चीजों के लिए इंतजार करना पड़ता है. इससे बच्चों में धैर्य और जिम्मेदारी की भावना विकसित होती है.

जरूरत और इच्छा के बीच का अंतर

इसके साथ ही बच्चों को जरूरत और इच्छा के बीच का अंतर समझाना भी बेहद जरूरी है. जरूरतें वे चीजें होती हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी के लिए आवश्यक हैं, जबकि इच्छाएं वे होती हैं जो खुशी तो देती हैं लेकिन उनके बिना भी काम चल सकता है. उदाहरण के तौर पर किराने की खरीदारी के दौरान माता-पिता बच्चों से पूछ सकते हैं कि कौन-सी चीज जरूरी है और कौन-सी बाद में भी खरीदी जा सकती है. इससे बच्चों में पैसों की सही कीमत समझने की आदत विकसित होती है. 

इसे भी पढ़ें – Success Tips: क्या एग्जाम में आपका बच्चा भी लेता है स्ट्रेस? जानें कामयाब बच्चों के पैरेंट्स का सीक्रेट

पॉकेट मनी को लेकर क्या करें

पॉकेट मनी भी बच्चों को आर्थिक जिम्मेदारी सिखाने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है. यदि सही तरीके से उपयोग किया जाए तो यह केवल खर्च करने के लिए दिया गया पैसा नहीं, बल्कि एक सीखने का अवसर बन जाता है. पॉकेट मनी के जरिए बच्चे अपने फैसले खुद लेना सीखते हैं और उनके परिणाम भी समझते हैं. माता-पिता उन्हें बचत और खर्च के लिए अलग-अलग राशि रखने की आदत डाल सकते हैं.

 बचत करना सिखाना सबसे महत्वपूर्ण

एक्सपर्ट के अनुसार, बच्चों को खर्च करने से पहले बचत करना सिखाना सबसे महत्वपूर्ण फाइनेंशियल आदतों में से एक है. जब बच्चे उपहार, इनाम या पॉकेट मनी से मिलने वाले पैसों का कुछ हिस्सा बचाने लगते हैं, तो वे धीरे-धीरे समझते हैं कि छोटी-छोटी बचत भविष्य में बड़े फायदे दे सकती है. यही आदत उन्हें लक्ष्य तय करने, धैर्य रखने और समझदारी से आर्थिक निर्णय लेने में मदद करती है.

इसे भी पढ़ें –Parenting Tips: क्या आप भी बच्चों पर थोप रहे हैं नियम? सानिया मिर्जा की यह बात खोल देगी आपकी आंखें!

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

Pancreatic Cancer के इलाज में गेम चेंजर साबित हो सकती है यह गोली, ट्रायल में मिले शानदार नतीजे

Pancreatic Cancer के इलाज में गेम चेंजर साबित हो सकती है यह गोली, ट्रायल में मिले शानदार नतीजे


New Pill For Pancreatic Cancer Treatment: पैंक्रियाटिक कैंसर को दुनिया के सबसे घातक कैंसरों में गिना जाता है. इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अधिकांश मरीजों में बीमारी का पता तब चलता है, जब कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल चुका होता है. ऐसे में इलाज के विकल्प सीमित रह जाते हैं और मरीजों के जीवित रहने की संभावना भी कम हो जाती है. लेकिन अब एक नई गोली ने डॉक्टरों और साइंटिस्ट के बीच उम्मीद की नई किरण जगाई है. हाल ही में सामने आए एक क्लीनिकल ट्रायल के नतीजों ने संकेत दिया है कि यह दवा पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में बड़ा बदलाव ला सकती है. 

कौन सी दवा है कारगर?

दुनिया के सबसे बड़े कैंसर सम्मेलन में पेश किए गए रिसर्च के अनुसार डाराक्सोनरासिब नाम की यह दवा एडवांस स्टेज पैंक्रियाटिक कैंसर के मरीजों में जीवित रहने की अवधि को लगभग दोगुना करने में सफल रही. इस ट्रायल में 500 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया था, जिनका कैंसर शरीर में फैल चुका था. रिसर्चर ने पाया कि यह गोली लेने वाले मरीज औसतन 13.2 महीने तक जीवित रहे, जबकि कीमोथेरेपी लेने वाले मरीजों की औसत जीवन अवधि 6.6 से 6.7 महीने के बीच रही.

इसे भी पढ़ेें: Sleeping Tips: रात को सोते वक्त आपको भी आते हैं जमकर खर्राटें, ये तरीका आएगा काम

यह स्टडी शिकागो में आयोजित अमेरिकन सोसाइटी ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी  की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत किया गया. बोस्टन स्थित विश्व प्रसिद्ध डाना-फार्बर कैंसर इंस्टीट्यूट के रिसर्च ने इस ट्रायल का नेतृत्व किया. रिजल्ट सामने आने के बाद कैंसर विशेषज्ञों ने इसे पिछले कई दशकों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक बताया है.

गेम चेंजर साबित हो सकती है दवा

यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना कैंसर सेंटर में ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख और एएससीओ की गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर एक्सपर्ट डॉ. रचना श्रॉफ ने कहा कि यह नतीजे कैंसर इलाज की तस्वीर बदलने वाले साबित हो सकते हैं. डॉ. रचना श्रॉफ के मुताबिक, उन्होंने 16 वर्षों तक पैंक्रियाटिक कैंसर के मरीजों का इलाज किया है, लेकिन इस स्टडी के नतीजे देखकर वह भावुक हो गईं. उनका कहना है कि इस तरह का जीवित रहने का लाभ पहले कभी नहीं देखा गया. एएससीओ की मुख्य चिकित्सा अधिकारी और कार्यकारी उपाध्यक्ष डॉ. जूली ग्रालो ने भी इस दवा को गेम चेंजर बताया। उनके अनुसार यह केवल एक अच्छी सफलता नहीं, बल्कि कैंसर रिसर्च के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि है.

कैसे बनती है यह दवा?

डाराक्सोनरासिब दवा KRAS नामक प्रोटीन को निशाना बनाती है, जो अधिकांश पैंक्रियाटिक कैंसर मामलों में कैंसर सेल्स के ग्रोथ के लिए जिम्मेदार माना जाता है. रिसर्चर के अनुसार 90 प्रतिशत से अधिक मरीजों में KRAS जीन में बदलाव पाया जाता है. यह दवा उसी प्रक्रिया को रोककर कैंसर की बढ़त को धीमा करने का काम करती है.

मरीजों को मिल सकती है राहत

यूके स्थित पैंक्रियाटिक कैंसर एक्शन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी पाउला हैनफोर्ड और पैंक्रियाटिक कैंसर यूके की रिसर्च एवं इनोवेशन निदेशक अन्ना ज्वेल ने भी इन नतीजों को बेहद उत्साहजनक बताया है. एक्सपर्ट का मानना है कि यदि आगे के परीक्षण भी सफल रहते हैं और यह दवा व्यापक रूप से उपलब्ध हो पाती है, तो पैंक्रियाटिक कैंसर के मरीजों को अपने परिवार के साथ अधिक समय बिताने का अवसर मिल सकता है. यही वजह है कि इस नई गोली को पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में संभावित गेम चेंजर माना जा रहा है.

यह भी पढ़ेें: White Water Discharge: अगर बार बार हो रहा व्हाइट वॉटर डिस्चार्ज तो संभल जाएं, इस गंभीर बीमारी का हो सकता है खतरा

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

भारत में शिशु मृत्यु दर में सुधार, लेकिन अब भी हर 42 में से एक बच्चा नहीं मना पाता पहला जन्मदिन

भारत में शिशु मृत्यु दर में सुधार, लेकिन अब भी हर 42 में से एक बच्चा नहीं मना पाता पहला जन्मदिन


States With Highest Infant Mortality Rate In India: भारत में इन्फेंट फर्टिलिटी रेट में पिछले एक दशक के दौरान उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर शिशु मृत्यु दर घटकर 24 रह गई है. साल 2019 में यह आंकड़ा 30 था. यह सुधार मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और संस्थागत प्रसव में हुई बढ़ोतरी का परिणाम माना जा रहा है. हालांकि नेशनल लेवल पर तस्वीर बेहतर दिखती है, लेकिन राज्यों के बीच अब भी बड़ा अंतर मौजूद है. 

42 में से एक बच्चे नहीं देख पाते पहला जन्मदिन

रिपोर्ट बताती है कि भारत में अब भी हर 42 में से एक शिशु अपना पहला जन्मदिन नहीं देख पाता. ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण है, जहां हर 37 में से एक शिशु की एक साल की उम्र से पहले मौत हो जाती है. शहरी इलाकों में यह अनुपात बेहतर है और वहां हर 59 में से एक शिशु की मृत्यु दर्ज की गई. एक्सपर्ट का मानना है कि संस्थागत प्रसव में वृद्धि ने शिशु मृत्यु दर कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. वर्ष 2019 में जहां 83 प्रतिशत से कम प्रसव अस्पतालों या स्वास्थ्य केंद्रों में हो रहे थे, वहीं 2024 तक यह आंकड़ा 95 प्रतिशत से अधिक पहुंच गया. इसके बावजूद रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि केवल अस्पताल में प्रसव कराने से ही समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि जन्म के बाद नवजात की देखभाल भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. 

किन राज्यों में स्थिति सबसे बेकार

राज्यों की बात करें तो छत्तीसगढ़ सबसे चिंताजनक स्थिति में दिखाई देता है. यहां शिशु मृत्यु दर 36 प्रति 1,000 जीवित जन्म दर्ज की गई, जो देश में सबसे अधिक है. इसके बाद उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का स्थान रहा, जहां यह आंकड़ा 35 रहा।.नवजात मृत्यु दर के मामले में भी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सबसे ऊपर रहे, जबकि उत्तर प्रदेश भी चिंताजनक स्थिति में बना हुआ है. 

इसे भी पढ़ें – Summer Fatigue: गर्मियों में बार-बार महसूस हो रही थकान, जान लें यह किस बीमारी का संकेत?

किन राज्यों में बेहतर है स्थिति

इसके उलट गोवा और सिक्किम देश के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्य बनकर उभरे हैं. दोनों राज्यों में शिशु मृत्यु दर केवल 7 प्रति 1,000 जीवित जन्म दर्ज की गई. केरल 8 के साथ तीसरे स्थान पर रहा. तमिलनाडु और दिल्ली में यह आंकड़ा 11, जबकि त्रिपुरा में 12 दर्ज किया गया. महाराष्ट्र ने 14, कर्नाटक ने 15, पंजाब ने 16, तेलंगाना ने 17 और आंध्र प्रदेश ने 18 की दर दर्ज कर राष्ट्रीय औसत से बेहतर प्रदर्शन किया.

अब भी क्या है सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि सबसे बड़ी चुनौती अब भी नवजात शिशुओं की मौत है.  रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में होने वाली कुल शिशु मौतों में करीब 73 प्रतिशत मौतें जन्म के पहले 28 दिनों के भीतर हुईं. एक्सपर्ट का मानना है कि आने वाले वर्षों में शिशु मृत्यु दर को और कम करने के लिए गर्भावस्था के दौरान बेहतर देखभाल, मातृ पोषण, सुरक्षित प्रसव और जन्म के बाद नवजात की क्वालिटी मेडिकल सेवाओं पर अधिक ध्यान देना होगा. भारत ने इस दिशा में लंबी दूरी तय की है, लेकिन अभी भी कई राज्यों में सुधार की बड़ी गुंजाइश बनी हुई है.

इसे भी पढ़ें  – जहां बन रहा खाना वहीं पनप रही बीमारी, क्या आपके बच्चों को भी बीमार कर रही किचन की सिंक?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp