‘हेल्दी’ समझकर खाई जाने वाली ये 6 चीजें बढ़ा सकती हैं दिल का खतरा; कार्डियोलॉजिस्ट ने दी चेतावनी

‘हेल्दी’ समझकर खाई जाने वाली ये 6 चीजें बढ़ा सकती हैं दिल का खतरा; कार्डियोलॉजिस्ट ने दी चेतावनी


Healthy Foods That Harm The Heart: आज के समय में हेल्दी खाना चुनना भी किसी बड़े लक्ष्य को अचीव कर लेने से कम नहीं लगता. पैकेट पर लिखे नेचुरल, हार्ट-फ्रेंडली या होलसम जैसे दावे धीरे-धीरे हमारी आदतें बना देते हैं और हमें भरोसा दिलाते हैं कि हम सही खा रहे हैं. लेकिन चमकदार लेबल और न्यूट्रिशन के बड़े शब्दों के पीछे कुछ ऐसे फूड्स भी हैं, जिन्हें आमतौर पर सेहतमंद माना जाता है, पर वे चुपचाप दिल को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

हार्ट फेल्योर और हार्ट ट्रांसप्लांट में विशेषज्ञ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. दिमित्री यारानोव ने 22 नवंबर को इंस्टाग्राम पोस्ट में ऐसे ही 6 “हेल्दी” माने जाने वाले फूड्स के बारे में बताया, जो कुछ लोगों के लिए दिल के लिए जोखिम भरे हो सकते हैं. डॉ. यारानोव ने अपने कैप्शन में लिखा कि “जिन चीजों को लोग हेल्दी मानते हैं, वही आपके दिल को नुकसान पहुंचा सकती हैं. बात यह नहीं कि ये फूड्स बुरे हैं, बल्कि यह कि आपका दिल, किडनी और दवाइयां यह तय करती हैं कि शरीर नमक, पोटैशियम और मेटाबॉलिज्म को कैसे संभालेगा.”

 

केला
केला पोटैशियम से भरपूर होता है. लेकिन अगर आपकी किडनी ठीक से काम नहीं कर रही या आप स्पिरोनोलैक्टोन या एआरएनआई जैसी दवाएं ले रहे हैं, तो शरीर में पोटैशियम खतरनाक स्तर तक बढ़ सकता है, जो दिल की धड़कन पर असर डाल सकता है.

ग्रेपफ्रूट
ग्रेपफ्रूट कुछ दवाओं को तोड़ने के लिवर के प्रोसेस में दखल देता है. ट्रांसप्लांट मरीजों या खास दवाएं लेने वालों में इससे दवाओं का स्तर सुरक्षित सीमा से बहुत ऊपर जा सकता है.

 पालक
पालक भी पोटैशियम से भरपूर होता है और यह वॉरफरिन जैसी ब्लड थिनर दवा के असर को प्रभावित कर सकता है. डॉ. यारानोव कहते हैं, पालक हेल्दी है, लेकिन यहां ‘ज्यादा खाना” नहीं, बल्कि नियमित और संतुलित मात्रा मायने रखती है.

सोया सॉस
सोया सॉस में सोडियम बहुत ज्यादा होता है. इससे शरीर में पानी रुक सकता है. डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि “सिर्फ एक सुशी नाइट के बाद अगला दिन सांस फूलने और वजन बढ़ने के साथ शुरू हो सकता है.”

 लिकोरिस 
असली काली लिकोरिस ब्लड प्रेशर बढ़ा सकती है और पोटैशियम कम कर सकती है. यह अक्सर चाय, सप्लीमेंट या फ्लेवर वाले प्रोडक्ट्स में छुपी रहती है, बिना लोगों को पता चले.

शराब
शराब सीधे तौर पर दिल के लिए ज़हर की तरह काम करती है. कई मरीजों में दिल की सेहत बिगड़ने की एक बड़ी वजह शराब भी रही है.

डॉ. यारानोव बताते हैं कि खाना सिर्फ “अच्छा” या “बुरा” नहीं होता. वह आपकी दवाओं, टेस्ट रिपोर्ट और हार्ट की हालत के साथ मिलकर असर करता है. इसलिए जरूरी है कि पने शरीर को समझें, अपने नंबर जानें और अपनी सेहत से एक कदम आगे रहें.

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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बजट का बड़ा हिस्सा हेल्थ सेक्टर पर नहीं हो रहा खर्च, सरकार की स्वास्थ्य नीतियों पर उठे सवाल

बजट का बड़ा हिस्सा हेल्थ सेक्टर पर नहीं हो रहा खर्च, सरकार की स्वास्थ्य नीतियों पर उठे सवाल


स्वास्थ्य हर देश की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक होता है. एक मजबूत और स्वस्थ समाज के बिना देश की प्रगति संभव नहीं है.  भारत में पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों की स्थिति सुधारने के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं, लेकिन सरकारी बजट की असल तस्वीर कुछ और ही कहती है. भारत सरकार ने 2018 में स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए एक विशेष सेस (कर) लागू किया था. इसे स्वास्थ्य खर्च बढ़ाने और देश की जनता, खासकर बीपीएल (गरीब) और ग्रामीण परिवारों की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए पेश किया गया. आम धारणा यह थी कि इस सेस से स्वास्थ्य क्षेत्र में खर्च बढ़ेगा और सरकार की मौजूदा स्वास्थ्य बजट का समर्थन होगा. लेकिन आंकड़े और बजट के विवरण बताते हैं कि असलियत इसके बिल्कुल उलट है. 

स्वास्थ्य पर खर्च घटा, जबकि सेस वसूला जा रहा

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए सरकार का कुल बजट खर्च अब पहले की तुलना में कम है. 2017-18 में, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर खर्च कुल सरकारी खर्च का 2.4 प्रतिशत था. लेकिन 2026-27 के बजट अनुमान में यह घटकर सिर्फ 1.9 प्रतिशत रह गया है. अगर इसे जीडीपी के अनुपात में देखें, तो यह 0.28 प्रतिशत से गिरकर 0.26 प्रतिशत हो गया है.  ध्यान देने वाली बात यह है कि 2026-27 में स्वास्थ्य सेस से जो पैसा इकट्ठा  किया गया है,

वह स्वास्थ्य बजट के कुल खर्च का लगभग 30 प्रतिशत है यानी अगर इस सेस को निकाल दें, तो स्वास्थ्य पर खर्च कुल बजट का सिर्फ 1.3 प्रतिशत होगा, जो 2017-18 की तुलना में आधा भी नहीं है. इसका मतलब यह है कि सेस सिर्फ खर्च बढ़ाने का दिखावा कर रहा है, लेकिन असल में स्वास्थ्य पर खर्च घट रहा है. अगर सेस नहीं होता, तो स्वास्थ्य क्षेत्र का बजट जीडीपी का सिर्फ 0.18 प्रतिशत होता है. 

बजट के आंकड़े क्या बताते हैं?
 
आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि भारत सरकार का स्वास्थ्य पर वास्तविक खर्च लगातार घट रहा है, भले ही बजट में सेस के कारण थोड़ी बढ़ोतरी दिखती हो. कुल सरकारी खर्च में स्वास्थ्य का हिस्सा 2017-18 में 2.4 प्रतिशत था, जो 2026-27 में घटकर 1.9 प्रतिशत रह गया है. अगर सेस को हटाकर देखा जाए, तो यह हिस्सा और भी कम, सिर्फ 1.3 प्रतिशत है. जीडीपी के अनुपात में भी यही गिरावट नजर आती है. 0.28 प्रतिशत से घट कर 0.26 प्रतिशत हो गया है, और सेस को हटाने पर यह केवल 0.18 प्रतिशत रह जाता है. इसका मतलब है कि सेस के बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र को मिलने वाला वास्तविक बजट लगातार कम हो रहा है और यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्यों से बहुत पीछे है. 
 
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार, 2025 तक स्वास्थ्य पर खर्च को जीडीपी का 2.5 प्रतिशत करना था. इसमें केंद्रीय सरकार का हिस्सा लगभग 0.9 प्रतिशत जीडीपी होना चाहिए था. लेकिन वर्तमान में स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का सिर्फ 0.26 प्रतिशत है, यानी लक्ष्य से लगभग तीन गुना कम, अगर 2017 के समान कुल बजट का 2.4 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता, तो 2026-27 में बिना सेस के बजट लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए था. लेकिन वास्तविक खर्च सेस सहित भी केवल 1 लाख करोड़ रुपये है. 

सेस का असली मकसद और कमी

विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा सेस सिर्फ खर्च बढ़ाने का भ्रम पैदा करता है. सेस का पैसा मुख्य बजट के बाहर एक रिजर्व फंड में जाता है और इस पर कोई पारदर्शिता या परिणाम मापने की जरूरत नहीं होती है. 2018-19 और 2019-20 में स्वास्थ्य के लिए जो सेस वसूला गया, वह सामान्य राजस्व में चला गया. लगभग 20,600 करोड़ रुपये जो स्वास्थ्य के लिए इकट्ठा किए गए थे, उनका कोई खास इस्तेमाल नहीं हुआ. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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खड़े होकर पानी पीना कितना खतरनाक, क्या इससे सेहत को वाकई होता है नुकसान?

खड़े होकर पानी पीना कितना खतरनाक, क्या इससे सेहत को वाकई होता है नुकसान?


आयुर्वेद के अनुसार, खड़े होकर पानी पीने से शरीर में पानी का संतुलन बिगड़ सकता है. इससे पानी सही जगह यूज होने के बजाय जोड़ों और घुटनों के आसपास जमा होने लगता है, जिससे कम उम्र में ही घुटनों का दर्द, अकड़न और जोड़ों की परेशानी शुरू हो सकती है.



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मुंह के छोटे घाव बन सकते हैं कैंसर की चेतावनी, 2 हफ्ते में न भरें तो न करें नजरअंदाज

मुंह के छोटे घाव बन सकते हैं कैंसर की चेतावनी, 2 हफ्ते में न भरें तो न करें नजरअंदाज


मुंह में होने वाले छोटे-छोटे छाले, सफेद या लाल पैच और हल्के दर्द को अक्सर लोग मामूली समझ कर टाल देते हैं. ज्यादातर मामलों में इन्हें तनाव, दांत की परेशानी या नॉर्मल इंफेक्शन मान लिया जाता है. लेकिन डॉक्टरों के अनुसार अगर ऐसे घाव या पैच दो हफ्ते में ठीक न हों, तो यह ओरल कैंसर की शुरुआती चेतावनी भी हो सकते हैं. वहीं जागरूकता की कमी और आदतों से जुड़ी चीजें इस बीमारी को अक्सर नजरों से छिपाए रखती है, जिससे इलाज में देरी हो जाती है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि मुंह के छोटे घाव कैंसर की चेतावनी कैसे बन सकते हैं. 

क्यों नजरअंदाज हो जाता है ओरल कैंसर?

ओरल कैंसर की शुरुआती अवस्था में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं. दरअसल मुंह का ऐसा छाला जो ठीक न हो, सफेद या लाल धब्बे, हल्का दर्द या जलन जैसे लक्षणों को लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं. वहीं तंबाकू चबाना, धूम्रपान और शराब जैसी आदतें इससे जुड़ी होने के कारण कई लोग डॉक्टर से खुलकर बात भी नहीं करते हैं. यही वजह है कि बीमारी अक्सर आगे बढ़ने के बाद सामने आती है.

किन लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत?

डॉक्टरों के अनुसार हमारे देश में ओरल हेल्थ को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है. तंबाकू चबाने वालों, धूम्रपान और शराब का सेवन करने वालों, टूटे दांत होने वालों और जिनकी ओरल हाइजीन खराब है, उन्हें खास तौर पर सतर्क रहना चाहिए. वहीं अगर मुंह में कोई घाव या पैच दो हफ्ते में ठीक न हो या बढ़ने लगे तो तुरंत जांच करानी चाहिए. इसके अलावा डॉक्टरों के अनुसार मुंह में पैच और घाव कई तरह के हो सकते हैं. इसमें छोट, दर्दनाक छाले जो आमतौर पर 1 से 2 हफ्ते ठीक हो जाते हैं. वहीं मुंह, मसूड़ों या जीभ पर सफेद पैच जो रगड़ने से हटते नहीं है. सफेद जालीदार पैच या घाव, जिनमें जलन हो सकती है. लाल रंग के पैच, जिनसे खून भी आ सकता है और इन्हें ज्यादा खतरनाक माना जाता है. 

कब हो सकता है खतरा?

ज्यादातर मुंह के छाले चोट, तनाव, विटामिन की कमी या इंफेक्शन से होते हैं और नॉर्मल इलाज से ठीक हो जाते हैं. लेकिन कुछ मामलों में ये गंभीर बीमारियों का संकेत भी हो सकते हैं. दो हफ्ते से ज्यादा समय तक न भरने वाले छाले ओरल कैंसर का संकेत हो सकते हैं. इसके अलावा ल्यूकोप्लाकिया और एरिथ्रोप्लाकिया को कई मामलों में प्री कैंसर माना जाता है. वहीं कुछ घाव डायबिटीज, एचआईवी या ऑटोइम्यून बीमारियों से भी जुड़े हो सकते हैं.

डॉक्टर से कब करें संपर्क?

अगर मुंह के छाले या पैच बार-बार हो रहे हो,छाले  दर्दनाक हो या लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.वहीं  खासकर तब, जब घाव दो हफ्ते से ज्यादा समय तक ठीक न हो, मुंह में गांठ, खून या लगातार दर्द हो, निगलने, चबाने या बोलने में दिक्कत हो और गर्दन की लिम्फ नोड्स में सूजन आ जाए तो डॉक्टर को दिखाना चाहिए. 

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महिलाओं से 10 साल पहले पुरुषों को हो जाती है हार्ट डिजीज, स्टडी में हुआ डराने वाला खुलासा

महिलाओं से 10 साल पहले पुरुषों को हो जाती है हार्ट डिजीज, स्टडी में हुआ डराने वाला खुलासा


अक्सर हम यह मान लेते हैं कि दिल की बीमारी उम्र बढ़ने के साथ ही होती है. ज्यादातर लोग सोचते हैं कि हार्ट अटैक या दिल से जुड़ी परेशानियां सिर्फ 60–70 साल की उम्र के बाद ही आती हैं. लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. आज की भागदौड़ भरी लाइफ, गलत खानपान, तनाव, कम नींद और फिजिकल एक्टिविटी की कमी ने दिल की बीमारियों को चुपचाप युवाओं तक पहुंचा दिया है सबसे खतरनाक बात यह है कि दिल की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है.  शुरुआत में न तो तेज दर्द होता है और न ही कोई साफ चेतावनी मिलती है. इसी वजह से लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं और जब तक समझ आता है, तब तक नुकसान काफी बढ़ चुका होता है. अब एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने दिल की बीमारी को लेकर एक और अहम बात सामने रखी है, जो खासतौर पर पुरुषों के लिए चिंता बढ़ाने वाली है. 
 
क्या कहती है नई स्टडी? 
 
अमेरिका में 18 से 30 साल की उम्र के 5,000 से ज्यादा युवाओं पर लंबे समय तक किए गए एक बड़े अध्ययन से पता चला है कि पुरुषों में महिलाओं की तुलना में कोरोनरी हार्ट डिजीज (CHD) लगभग 10 साल पहले विकसित हो जाती है. यह अध्ययन CARDIA (Coronary Artery Risk Development in Young Adults) नाम से जाना जाता है और इसके नतीजे जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (JAHA) में प्रकाशित हुए हैं. शोधकर्ताओं के अनुसार 20 से 29 साल की उम्र तक पुरुष और महिलाओं में दिल की बीमारी का खतरा लगभग समान रहता है, लेकिन 35 साल की उम्र के आसपास पुरुषों में यह खतरा तेजी से बढ़ने लगता है. यह अंतर मध्य आयु तक बना रहता है. हैरानी की बात यह है कि ब्लड प्रेशर, धूम्रपान और कोलेस्ट्रॉल जैसे कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी यह अंतर खत्म नहीं होता है. 
 
पुरुषों में दिल की बीमारी पहले क्यों होती है?

रीजेन्सी हॉस्पिटल, लखनऊ के वरिष्ठ इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. हर्षित गुप्ता बताते हैं कि इसके पीछे कई कारण हैं. जैसे पुरुषों में हार्मोनल सुरक्षा महिलाओं की तुलना में कम होती है, महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन कुछ समय तक दिल को सुरक्षा देता है, पुरुषों में कम उम्र से ही धूम्रपान, शराब, तनाव और अनियमित जीवनशैली अधिक देखने को मिलती है, जैविक (Biological) अंतर भी इस जोखिम को बढ़ाते हैं, हालांकि डॉक्टर यह भी स्पष्ट करते हैं कि महिलाओं को मिलने वाली हार्मोनल सुरक्षा स्थायी नहीं होती है. उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं में भी दिल की बीमारी का खतरा तेजी से बढ़ता है. 

दुनिया में मौत का सबसे बड़ा कारण

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में होने वाली कुल मौतों में से 32 प्रतिशत मौतें हार्ट डिजीज के कारण होती हैं. साल 2022 में करीब 19.8 मिलियन लोगों की मौत दिल की बीमारियों से हुई. ये आंकड़े साफ बताते हैं कि दिल की बीमारी कोई छोटी समस्या नहीं है. 

समाधान क्या है?

शोधकर्ताओं का मानना है कि दिल की बीमारी से बचाव की शुरुआत युवावस्था से ही होनी चाहिए.  20–30 साल की उम्र में ही दिल की सेहत की जांच और सही लाइफस्टाइल अपनाना बेहद जरूरी है. बैलेंस डाइट, नियमित एक्सरसाइज, तनाव से दूरी, धूम्रपान से बचाव और समय-समय पर हेल्थ चेकअप, यही दिल को लंबे समय तक स्वस्थ रखते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गेहूं, बाजरा या रागी? जानिए किस मौसम में कौन-सी रोटी खाना है सेहत के लिए बेहतर

गेहूं, बाजरा या रागी? जानिए किस मौसम में कौन-सी रोटी खाना है सेहत के लिए बेहतर


हमारे देश में रोटी सिर्फ खाना नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. सुबह का नाश्ता हो या रात का खाना, थाली में रोटी होना लगभग तय माना जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हम साल भर एक ही तरह की रोटी क्यों खाते हैं, क्या शरीर को हर मौसम में एक जैसा खाना चाहिए. पहले के जमाने में ऐसा नहीं था. हमारे दादा-दादी मौसम बदलते ही अनाज भी बदल देते थे. सर्दियों में मोटा अनाज, गर्मियों में हल्का भोजन और बरसात में आसानी से पचने वाली चीजें खाई जाती थीं. इसका सीधा कारण शरीर और पाचन शक्ति का मौसम के साथ बदलना था. 

आज सुविधा और आदत की वजह से गेहूं की रोटी पूरे साल खाई जाती है. लेकिन पोषण विशेषज्ञ और आयुर्वेद मानते हैं कि हर अनाज की अपनी तासीर होती है और वह किसी खास मौसम में शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है. अगर हम मौसम के अनुसार रोटी चुनें, तो पाचन बेहतर रहता है, पेट की दिक्कतें कम होती हैं और शरीर खुद को हल्का और एनर्जेटिक महसूस करता है. तो आइए जानते हैं कि गेहूं, बाजरा या रागी, किस मौसम में कौन-सी रोटी खाना सेहत के लिए बेहतर है. 
 
मौसम के साथ खाना क्यों बदलना चाहिए?
 
हमारा शरीर मौसम के हिसाब से काम करता है. सर्दियों में पाचन शक्ति तेज होती है, इसलिए भारी और देर से पचने वाला खाना भी आसानी से हजम हो जाता है. गर्मियों में पाचन धीमा पड़ जाता है और शरीर को ठंडक देने वाले, हल्के खाने वाली चीजें पसंद आती हैं.मानसून में पाचन सबसे ज्यादा कमजोर होता है, इसलिए साधा और हल्का खाना बेहतर रहता है. इसी वजह से पुराने समय में लोग हर मौसम में अलग-अलग अनाज की रोटी खाते थे. 
 
गेहूं की रोटी हर मौसम के लिए कैसी है?
 
गेहूं की रोटी आज सबसे ज्यादा खाई जाती है. यह आसानी से मिल जाती है, बनाना भी आसान है और ज्यादातर लोगों को सूट करती है. गेहूं की रोटी वसंत ऋतु और हल्की सर्दी में सबसे अच्छी मानी जाती है. इस समय पाचन न बहुत तेज होता है, न बहुत कमजोर. गेहूं शरीर को अच्छी एनर्जी देता है और पेट को भरा-भरा रखता है, लेकिन बहुत ज्यादा गर्मी या कड़ाके की ठंड में सिर्फ गेहूं की रोटी खाते रहना हर किसी के लिए सही नहीं होता है. गर्मियों में यह कुछ लोगों को भारी लग सकती है और सर्दियों में शरीर को ज्यादा गर्माहट देने के लिए यह पर्याप्त नहीं होती हैं
 
बाजरे की रोटी में कितनी ताकत होती है?

बाजरे की रोटी खासतौर पर सर्दियों के लिए मानी जाती है. बाजरा गर्म तासीर का अनाज है, यानी यह शरीर में गर्मी पैदा करता है. ठंड के मौसम में जब शरीर को ज्यादा एनर्जी और ताकत की जरूरत होती है, तब बाजरे की रोटी बहुत फायदेमंद होती है. यह गेहूं से भारी होती है और देर से पचती है, लेकिन सर्दियों में यही बात इसे खास बनाती है. बाजरे की रोटी अक्सर घी, मक्खन या गुड़ के साथ खाई जाती है ताकि इसकी सूखी प्रकृति संतुलित हो जाए और पाचन आसान रहे. 
 
रागी की रोटी कितनी हेल्दी है?

रागी की रोटी गर्मियों के लिए बेहतर मानी जाती है. यह शरीर को ठंडक देती है और पेट पर भारी नहीं पड़ती है. गर्मी के मौसम में जब भूख कम लगती है और पाचन कमजोर रहता है, तब रागी पेट को शांत रखने में मदद करती है. यही कारण है कि दक्षिण भारत में रागी को गर्मियों में ज्यादा खाया जाता है. हालांकि, सर्दियों में बहुत ज्यादा रागी खाने से कुछ लोगों को शरीर में जकड़न या ठंड महसूस हो सकती है, इसलिए ठंड के मौसम में इसका सीमित सेवन ही अच्छा रहता है.

ज्वार और मक्का की रोटी

ज्वार और मक्का की रोटियां पेट को देर तक भरा रखती हैं, लेकिन ये स्वभाव से सूखी होती हैं. इन्हें पचाने के लिए अच्छी पाचन शक्ति की जरूरत होती है. इसी वजह से ये रोटियां ज्यादातर उन लोगों को सूट करती हैं जो शारीरिक मेहनत ज्यादा करते हैं, जैसे किसान या मजदूर. अगर आप इन्हें खाते हैं, तो साथ में सब्जी, दाल या थोड़ा घी जरूर लें, ताकि पेट पर जोर न पड़े.

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