क्या मछली खाने के बाद दूध पीने से सच में हो जाते हैं सफेद दाग? एक्सपर्ट से जानें

क्या मछली खाने के बाद दूध पीने से सच में हो जाते हैं सफेद दाग? एक्सपर्ट से जानें


Fish & Milk Myth: क्या मछली खाने के बाद आपके घर में भी दूध पीने से मना किया जाता है? अगर हां तो आप इकलौते नहीं है. ज्यादातर भारतीय घरों में मछली के बाद दूध पीने से मना किया जाता है. पुराने समय से ही इस फूड कॉम्बिनेशन को सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक बताया गया है. ऐसा माना जाता है कि मछली और दूध एक साथ खाने से स्किन पर सफेद दाग हो जाते हैं, तो कोई इस फूड कॉम्बिनेशन को गैस और अपच जैसी समस्याओं से जोड़ता है. इस मान्यता में कितनी सच्चाई है या यह महज एक अंधविश्वास है. आइए जानते हैं….

सफेद दाग क्या होता है?

विटिलिगो (Vitiligo) एक त्वचा संबंधी बीमारी है, जिसमें त्वचा के कुछ हिस्सों का रंग धीरे-धीरे सफेद पड़ने लगता है. यह समस्या तब उत्पन्न होती है जब त्वचा में मेलानिन बनाने वाली कोशिकाएं जिन्हें मेलानोसाइट्स कहते हैं किसी कारण से नष्ट हो जाती हैं या सही ढंग से काम करना बंद कर देती हैं. यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है और शरीर के किसी भी हिस्से पर दिख सकती है. यह बीमारी कवक संक्रमण या मेलानोसाइट्स नामक वर्णक बनाने वाली कोशिकाओं के नष्ट होने का परिणाम होती है, केवल मछली और दूध के संयोजन से यह स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकती.

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 मछली और दूध को लेकर फैली मान्यता 

आयुर्वेद और लोक परंपराओं में मछली और दूध को “विरुद्ध आहार” माना गया है. यानी ऐसा भोजन जिनका एक साथ सेवन शरीर के लिए हानिकारक बताया गया है. इसी आधार पर पीढ़ियों से यह धारणा चली आ रही है कि दोनों को साथ खाने से त्वचा रोग विशेषकर सफेद दाग हो सकते हैं. यह मान्यता इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी है कि लोग बिना किसी प्रमाण के इसे सच मान लेते हैं.  

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

त्वचा रोग विशेषज्ञों के अनुसार, मछली और दूध का एक साथ सेवन करने से सफेद दाग होने का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण आज तक सामने नहीं आया है. विशेषज्ञों के अनुसार, विटिलिगो का मुख्य कारण ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है,  जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता गलती से अपनी ही मेलानोसाइट कोशिकाओं पर हमला करने लगती है. इसके अलावा आनुवंशिक कारक और पर्यावरणीय तत्व भी इस बीमारी में भूमिका निभाते हैं. अब तक हुई किसी भी प्रमाणिक रिसर्च में मछली-दूध के संयुक्त सेवन और सफेद दाग के बीच कोई सीधा संबंध सिद्ध नहीं हुआ है.

आयुर्वेद क्या कहता है? 

आयुर्वेद के अनुसार, दूध की तासीर ठंडी होती है जो शरीर को ठंडक प्रदान करता है. जबकि मछली की तासीर गर्म होती है और यह शरीर में गर्माहट बनाए रखता है. ऐसे में अगर मछली और दूध को एक साथ लिया जाता है तो पाचन से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. मछली और दूध को एक साथ लेने से पाचन-तंत्र गड़बड़ा सकता है.

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मैटरनल मोर्टलिटी घटी, पर 57% महिलाओं में एनीमिया अब भी बड़ा खतरा, एक्सपर्ट ने किया अलर्ट

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Safe Motherhood And Maternal Health Care: भारत में मैटरनल हेल्थ के क्षेत्र में पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है. ‘द लैंसेट ऑब्स्टेट्रिक्स, गायनाकोलॉजी एंड वीमेन हेल्थ’ में पब्लिश एक स्टडी के अनुसार, देश की मैटरनल हेल्थ दर वर्ष 2000 में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 384 मौतों से घटकर 2023 में 88 रह गई है. यह गिरावट दुनिया में सबसे तेज सुधारों में से एक मानी जा रही है. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि इस उपलब्धि को आगे भी बनाए रखने के लिए एनीमिया जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या पर विशेष ध्यान देना होगा. 

मैटरनल हेल्थ में सुधार के क्या हैं रीजन?

देश में महिलाओं की मैटरनल यात्रा अलग-अलग परिस्थितियों से गुजरती है. शहरी क्षेत्रों में कई महिलाएं शिक्षा, करियर और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए देर से परिवार बढ़ाने का निर्णय ले रही हैं. वहीं ग्रामीण इलाकों में महिलाएं कम उम्र में गर्भधारण तो कर लेती हैं, लेकिन उन्हें गर्भावस्था से पहले और बाद की नियमित हेल्थ सेवाएं पर्याप्त रूप से नहीं मिल पातीं. ऐसे में सुरक्षित मैटरनल हेल्थ सुनिश्चित करने के लिए व्यापक और निरंतर स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है.

57 प्रतिशत महिलाएं इस दिक्कत से जूझ रहीं हैं

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) के आंकड़ों के मुताबिक, 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं. पिछली सर्वे रिपोर्ट में यह आंकड़ा 53 प्रतिशत था. एक्सपर्ट के अनुसार एनीमिया गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग, इंफेक्शन और समय से पहले प्रसव जैसी दिक्कतों का खतरा बढ़ा देता है. यही वजह है कि इसे ब्लीडिंग से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों में गिना जाता है.

आयरन की कमी के क्या हैं कारण?

हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि आयरन की कमी एक दिन में नहीं होता. भोजन में पोषक तत्वों की कमी, पर्याप्त आहार विविधता का अभाव और पीरियड्स के दौरान अधिक ब्लीडिंग के कारण शरीर में आयरन का स्तर धीरे-धीरे कम होता जाता है। .इसी वजह से महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए जीवन-चक्र आधारित दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है. राष्ट्रीय कार्यक्रमों के तहत उपलब्ध आयरन और फोलिक एसिड सप्लीमेंट्स को समय रहते महिलाओं तक पहुंचाना जरूरी बताया गया है. 

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एनीमिया की दिक्कत से बचने के उपाय?

हल्के और मध्यम एनीमिया के मामलों में आयरन की गोलियां उपचार का पहला विकल्प मानी जाती हैं क्योंकि वे सस्ती, सुलभ और प्रभावी हैं. हालांकि कई बार महिलाओं के लिए इन्हें नियमित रूप से लेना आसान नहीं होता या शरीर में इनका एब्जॉर्व पर्याप्त नहीं हो पाता. ऐसे मामलों में फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज आईवी-एफसीएम जैसी नसों के माध्यम से दी जाने वाली आयरन थेरेपी महत्वपूर्ण विकल्प साबित हो सकती है, विशेषकर उन गर्भवती महिलाओं के लिए जिन्हें गर्भावस्था के अंतिम महीनों में गंभीर एनीमिया का पता चलता है. 

किस स्टेज में सबसे ज्यादा होते हैं मैटरनल मोर्टलिटी?

भारत में प्रसव के बाद होने वाला अत्यधिक ब्लीडिंग यानी पोस्टपार्टम हेमरेज आज भी मैटरनल मोर्टलिटी के प्रमुख कारणों में शामिल है. इससे निपटने के लिए ई-मोटिव बंडल जैसे उपाय प्रभावी साबित हुए हैं. सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में दो लाख से अधिक प्रसवों पर किए गए परीक्षणों में इस मॉडल ने गंभीर ब्लीडिंग से जुड़ी दिक्कतों को 60 प्रतिशत तक कम किया.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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यूपी में शुगर का कहर, हर 5वां पुरुष और 6ठी महिला चपेट में, सर्वे में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

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Obesity And Diabetes Rising Across India: भारत इस समय एक ऐसे हेल्थ संकट का सामना कर रहा है, जहां एक तरफ मोटापा और डायबिटीड तेजी से बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर कुपोषण अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- एनएफएचएस-6, 2023-24 के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश में पोषण से जुड़ी दो विपरीत समस्याएं एक साथ मौजूद हैं. कई राज्यों में लोग अधिक वजन और मोटापे से जूझ रहे हैं, जबकि उसी आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी कुपोषण का शिकार है.

मोटापा के मामले में बढोतरी

सर्वे के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की 30.7 प्रतिशत महिलाएं और 27.3 प्रतिशत पुरुष अब अधिक वजन या मोटापे की कैटेगरी में आते हैं. एनएफएचएस-5 की तुलना में यह वृद्धि काफी तेज है. खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में स्थिति ज्यादा गंभीर दिखाई दे रही है, जहां लगभग 43 प्रतिशत महिलाएं और 36.3 प्रतिशत पुरुष मोटापे या अधिक वजन से प्रभावित हैं. 

मैलोन्यूट्रिशन की समस्या भी बढ़ी

दूसरी तरफ, कुपोषण की समस्या खत्म होने के बजाय और बढ़ती दिखाई दे रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, देश में लगभग हर पांचवां एडल्ट अब भी कम वजन की श्रेणी में आता है. पुरुषों में कम वजन की दर 16.2 प्रतिशत से बढ़कर 19.7 प्रतिशत हो गई है, जबकि महिलाओं में यह 18.7 प्रतिशत से बढ़कर 19.7 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यह स्थिति बताती है कि पोषण संबंधी असमानताएं अभी भी बरकरार हैं. 

डायबिटीज के मामले भी बढ़े

एनएफएचएस-6 ने डायबिटीज को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है. 15 वर्ष से अधिक उम्र की 17.8 प्रतिशत महिलाओं में ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से अधिक पाया गया या वे डायबिटीज की दवा ले रही थीं. पुरुषों में यह आंकड़ा 20.9 प्रतिशत दर्ज किया गया, यानी हर पांचवां पुरुष डायबिटीज या उससे जुड़ी दवाओं पर निर्भर है. यह संख्या पिछले सर्वेक्षण की तुलना में काफी बढ़ी है. रिपोर्ट में कई राज्यों में स्थिति और अधिक चिंताजनक दिखाई दी. पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु में मोटापे के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. वहीं बिहार, झारखंड, राजस्थान, असम, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कुपोषण की समस्या बढ़ती हुई दिखाई दी. उत्तर प्रदेश में भी मोटापा, कुपोषण और डायबिटीज तीनों के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. 

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उत्तर प्रदेश की क्या स्थिति

राज्य में डायबिटीज की रफ्तार राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. हालात ऐसे हैं कि अब प्रदेश का लगभग हर पांचवां पुरुष और हर छठी महिला डायबिटीज से प्रभावित है. सर्वे के मुताबिक, पूरे देश में महिलाओं के बीच मधुमेह बढ़ने की दर 4.3 प्रतिशत दर्ज की गई है, लेकिन उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 5.5 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. पुरुषों में भी स्थिति चिंताजनक है. जहां राष्ट्रीय स्तर पर वृद्धि दर 5.3 प्रतिशत है, वहीं उत्तर प्रदेश में यह करीब 8 प्रतिशत दर्ज की गई है. 

हाई बीपी के मामलों में गिरावट

बीपी के मामलों में कुछ राहत जरूर देखने को मिली है. महिलाओं और पुरुषों दोनों में हाई बीपी की समस्या की दर में हल्की गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद देश का लगभग हर पांचवा एडल्ट अब भी हाई ब्लड प्रेशर से प्रभावित है. एक्सपर्ट के अनुसार यह हार्ट रोग, स्ट्रोक और किडनी से जुड़ी गंभीर बीमारियों का बड़ा जोखिम कारक बना हुआ है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किस उम्र के लोगों को कितनी पीनी चाहिए चाय? बीमार होने से पहले जानें हिसाब-किताब

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How Much Tea Should Different Age Groups Drink: भारत में सुबह की शुरुआत अक्सर चाय के बिना अधूरी मानी जाती है. किसी को बेड टी पसंद होती है, तो कोई दिनभर में कई कप चाय पी जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी उम्र के हिसाब से कितनी चाय पीना सही है? क्योंकि जरूरत से ज्यादा चाय पीने की आदत धीरे-धीरे शरीर पर बुरा असर डाल सकती है.

चाय में हेल्दी विकल्प

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के अनुसार, चाय में मौजूद कैफीन और दूसरे कंपाउंड्स शरीर को एनर्जी देने के साथ-साथ नुकसान भी पहुंचा सकते हैं, खासकर तब जब इसकी मात्रा जरूरत से ज्यादा हो जाए. हाल के वर्षों में ग्रीन टी को हेल्दी ड्रिंक के तौर पर काफी लोकप्रियता मिली है, क्योंकि इसमें कैटेचिन नाम के एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं. रिसर्च में इन्हें हार्ट डिजीज, टाइप-2 डायबिटीज और कुछ तरह के कैंसर के खतरे को कम करने से जोड़ा गया है. 

स्टडीज के मुताबिक, ग्रीन टी मेटाबॉलिज्म बढ़ाने और फैट बर्निंग में भी मदद कर सकती है. रिसर्च में पाया गया कि नियमित रूप से ग्रीन टी पीने वाले लोगों में वजन कंट्रोल और ओवरऑल हेल्थ बेहतर देखी गई. 

एक दिन में कितना चाय पीना चाहिए?

लेकिन सवाल यह है कि कितनी चाय सही मानी जाती है? एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह उम्र, हेल्थ कंडीशन और लाइफस्टाइल पर निर्भर करता है. आमतौर पर किशोरों और युवाओं को दिनभर में 1 से 2 कप से ज्यादा कैफीन वाली चाय नहीं पीनी चाहिए. वहीं स्वस्थ वयस्कों के लिए 3 से 5 कप ग्रीन टी तक फायदेमंद मानी गई है. कई स्टडीज में यह मात्रा हेल्थ बेनिफिट्स के लिए बेहतर बताई गई है.

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हमें क्या हो सकता है नुकसान?

हालांकि डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि जरूरत से ज्यादा चाय पीना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है. बहुत अधिक कैफीन लेने से बेचैनी, नींद की कमी, सिरदर्द, पेट में गड़बड़ी और एंग्जायटी जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं.  प्रेग्नेंट महिलाओं को खासतौर पर कैफीन की मात्रा पर ध्यान देने की सलाह दी जाती है. रिसर्च के मुताबिक, जरूरत से ज्यादा कैफीन गर्भावस्था के दौरान जोखिम बढ़ा सकती है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि पूरे दिन में 300 मिलीग्राम से ज्यादा कैफीन नहीं लेना चाहिए. 

किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?

हेल्थ एक्सपर्ट्स यह भी कहते हैं कि चाय पीने का समय भी मायने रखता है. खाली पेट ज्यादा चाय पीने से एसिडिटी और डइजेशन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. वहीं खाने के तुरंत बाद चाय पीने से शरीर में आयरन का अब्जार्व कम हो सकता है. डॉक्टर्स के मुताबिक, चाय पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है, लेकिन इसकी मात्रा और समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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किन लोगों को नहीं खाना चाहिए अंडे की जर्दी, जानें इससे क्या हो सकता है नुकसान?

किन लोगों को नहीं खाना चाहिए अंडे की जर्दी, जानें इससे क्या हो सकता है नुकसान?


Egg Yolk Good Or Bad: अंडा हम सभी को बहुत पसंद होता है. सुबह के नाश्ते में अंडा खाना सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है. अंडे के दो भाग होते हैं. बाहर का हिस्सा सफेद होता है और अंदर का हिस्सा पीला होता है. इस पीले हिस्से को ‘अंडे की जर्दी’ कहते हैं. अंडे का सफेद हिस्सा सबको फायदा करता है. लेकिन पीले हिस्से में फैट और कोलेस्ट्रॉल ज्यादा होता है. इसलिए यह पीला हिस्सा कुछ लोगों को नुकसान पहुंचा सकता है. आइए समझते हैं कि किन लोगों को इसे नहीं खाना चाहिए.

जिन लोगों का कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हो

हमारे शरीर में एक तरह का फैट होता है जिसे कोलेस्ट्रॉल कहते हैं. अंडे के पीले हिस्से में यह कोलेस्ट्रॉल बहुत ज्यादा होता है. जिन लोगों के शरीर में पहले से ही कोलेस्ट्रॉल ज्यादा है, उन्हें यह पीला हिस्सा नहीं खाना चाहिए. इसे खाने से खून की नसें बंद हो सकती हैं.

दिल की बीमारी वाले लोग

जिन लोगों को दिल की बीमारी होती है, उन्हें डॉक्टर कम फैट वाला खाना खाने को कहते हैं. अंडे की जर्दी में फैट बहुत ज्यादा होता है. इसे खाने से दिल पर दबाव बढ़ता है. इसलिए दिल के मरीजों को सिर्फ सफेद हिस्सा ही खाना चाहिए.

शुगर या डायबिटीज के मरीज

शुगर की बीमारी वाले लोगों को मीठे के साथ-साथ फैट वाले खाने से भी बचना चाहिए. ज्यादा जर्दी खाने से शुगर के मरीजों को दिल की बीमारी होने का डर रहता है. डॉक्टर हमेशा शुगर के मरीजों को सोच-समझकर अंडा खाने की सलाह देते हैं.

सेहत और वजन का ध्यान रखने वाले लोग

अंडे का पीला हिस्सा ऊर्जा से भरपूर होता है. जो लोग अपनी सेहत का बहुत ज्यादा ध्यान रखते हैं, वे अक्सर इसे कम मात्रा में खाते हैं क्योंकि इसमें कैलोरी ज्यादा होती है. वजन को सही रखने के लिए सफेद और पीला हिस्सा सही तालमेल में खाना चाहिए.

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पेट और पाचन की बात

कुछ लोगों का पेट बहुत नाजुक होता है और उन्हें भारी खाना पचाने में थोड़ी मुश्किल होती है. अंडे का पीला हिस्सा सफेद हिस्से के मुकाबले थोड़ा भारी होता है. इसलिए, जिन बच्चों या बड़ों का पेट जल्दी खराब हो जाता है, उन्हें इसे कम मात्रा में लेना चाहिए.

एएक स्वस्थ बच्चे या बड़े इंसान के लिए रोज एक पूरा अंडा खाना आमतौर पर अच्छा होता है क्योंकि इसमें बहुत सारे विटामिन होते हैं. लेकिन अगर किसी को कोई बीमारी है, तो उन्हें अपनी डाइट में कोई भी बड़ा बदलाव करने से पहले हमेशा डॉक्टर से जरूर पूछना चाहिए.

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कुछ लोगों को ज्यादा गुस्सा क्यों आता है, जानें उनके शरीर में क्या होता है?

कुछ लोगों को ज्यादा गुस्सा क्यों आता है, जानें उनके शरीर में क्या होता है?


Anger Harmone Inside Body: हमने देखा है कि कुछ लोग बहुत शांत रहते हैं, जबकि कुछ लोगों को बात-बात पर बहुत तेज गुस्सा आ जाता है. क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? गुस्सा सिर्फ एक भावना नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध हमारे दिमाग और शरीर से है. जब किसी को गुस्सा आता है, तो उसके शरीर के अंदर एक पूरा उथल पूथल मच जाता है.

आइए जानते हैं कि ज्यादा गुस्सा आने के पीछे का वैज्ञानिक सच क्या है.

दिमाग का यह छोटा सा हिस्सा ही है कारण

हमारे दिमाग में एमिग्डाला नाम का एक छोटा सा हिस्सा होता है. इसे हमारे शरीर का खतरे का अलार्म भी कह सकते हैं. जब भी हमें कोई बात बुरी लगती है, तो यह अलार्म तुरंत बज जाता है. ज्यादा गुस्सा करने वाले लोगों में यह हिस्सा बहुत ज्यादा एक्टिव होता है. यह दिमाग के सोचने-समझने वाले हिस्से को ब्लॉक कर देता है, जिससे इंसान बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल या कर देता है.

गुस्सा आते ही शरीर में होने लगता है यह बदलाव

जैसे ही एमिग्डाला एक्टिव होता है, वह शरीर में एड्रेनालिन और कोर्टिसोल नाम के स्ट्रेस हार्मोन रिलीज कर देता है. इन हार्मोन के निकलते ही शरीर में ये बड़े बदलाव होते हैं:

  • दिल की धड़कन बहुत तेज हो जाती है.
  • ब्लड प्रेशर अचानक बढ़ जाता है.
  • मांसपेशियां एकदम खिंच जाती हैं.
  • सांसें बहुत तेज और उथली होने लगती हैं.
  • चेहरे और हाथों में खून का बहाव बढ़ जाता है, जिससे चेहरा लाल हो जाता है.

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क्या ज्यादा गुस्सा आना किसी बड़ी बीमारी का संकेत है?

बार-बार और बहुत ज्यादा गुस्सा आना सेहत के लिए बेहद खतरनाक है. लगातार गुस्सा करने से शरीर हर वक्त तनाव में रहता है. इससे दिल का दौरा, ब्रेन स्ट्रोक और अनिद्रा  जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं. कुछ लोगों में मानसिक तनाव, डिप्रेशन या नींद की कमी के कारण भी गुस्सा ज्यादा आता है.

इस गुस्से के तूफान को शांत कैसे करें?

गुस्से को काबू करना नामुमकिन नहीं है. जब भी गुस्सा आए, तो तुरंत लंबी और गहरी सांसें लें. 1 से 10 तक उल्टी गिनती गिनें. उस जगह से थोड़ी देर के लिए हट जाएं और ठंडा पानी पिएं. रोजाना योग और ध्यान करने से दिमाग शांत रहता है और एमिग्डाला कंट्रोल में रहता है.

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