पैकेट पर सेहत का वादा, अंदर धोखा! FSSAI की चेतावनी के बाद भी कस्टमर को धोखा दे रहीं कंपनियां

पैकेट पर सेहत का वादा, अंदर धोखा! FSSAI की चेतावनी के बाद भी कस्टमर को धोखा दे रहीं कंपनियां


बाजार में सामान खरीदते वक्त हम में से ज्यादातर लोग पैकेट के आगे लिखी बातों पर भरोसा कर लेते हैं. 100 परसेंट नेचुरल, नो ऐडेड शुगर, हार्ट हेल्दी, ऑर्गेनिक. इन शब्द देखकर लगता है कि हम सेहत के लिए सही चीज उठा रहे हैं लेकिन इन्हीं प्रोडक्ट के पीछे लिखी सामग्री पढ़िए तो कई बार पूरी कहानी कुछ और निकलती है.

देश के फूड रेगुलेटर FSSAI ने हाल ही में बहुत से फूड ब्रांड्स को नोटिस भेजे हैं. हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यही है कि नियम पहले से हैं चेतावनी भी जारी हो चुकी है फिर भी ऐसी चीजें दुकानों और ऐप्स पर इतनी आसानी से कैसे बिक रही हैं?

पैकेट के आगे का दावा पीछे की सच्चाई

  • जून 2026 में FSSAI ने एक साथ कई कंपनियों को नोटिस थमाए. शिकायत लगभग एक जैसी थी. एक मैंगो जूस पर लिखा था नो ऐडेड शुगर लेकिन सामग्री में निकला 51% मैंगो पल्प और 39% गन्ने का रस यानी मिठास गन्ने के रस से आ रही है. 
  • एक नूडल्स ब्रांड खुद को सौ परसेंट नेचुरल और ऑर्गेनिक आटे से बना बता रहा था पर अंदर निकला सादा मैदा. 
  • एक टोफू प्रोडक्ट पर कैंसर रोधी गुण जैसे दावे थे जो बिना मेडिकल मंजूरी लिखे ही नहीं जा सकते.
  • एक कुकिंग ऑयल पर हार्ट प्रो शब्द और दिल की तस्वीरें इस तरह थीं कि ग्राहक को लगे यह तेल सीधे दिल की सेहत सुधार देगा.

यह है कानूनी चुनौती

फूड कानून में यानी FSS एक्ट और एडवरटाइजिंग एंड क्लेम्स रेगुलेशन में 100 परसेंट शब्द की कोई परिभाषा ही नहीं है. मतलब यह कि जब कंपनी हंड्रेड परसेंट लिखती है तो वो किस चीज का हंड्रेड परसेंट है (शुद्धता का, फल का, नेचुरल होने का) यह कहीं साफ ही नहीं होता और जो बात साफ नहीं उसका दावा आप कर ही नहीं सकते.

बच्चों के चहेते Kinder Joy पर भी उठे सवाल

बच्चों का चहेता Kinder Joy. इसके पैकेट के आगे लिखा है ‘रिच इन मिल्क सॉलिड्स’ यानी दूध से भरपूर. मां-बाप यही पढ़कर सोचते हैं, चलो थोड़ा दूध तो जाएगा बच्चे के पेट में, लेकिन फिर वही पैकेट पलटिए. मिलेगा शुगर और फैट और दूध वाला हिस्सा बहुत नीचे, बहुत कम. इसमें भी लिस्ट का नियम यह है कि जो चीज सबसे ज्यादा हो, वो सबसे पहले लिखी जाती है. FSSAI ने ठीक इसी पर उंगली रखी है और कहा है कि जब दूध मुख्य चीज है ही नहीं, तो उसे भरपूर बता देना ग्राहक को गुमराह करना है.

एक साल पहले ही आ चुकी थी साफ चेतावनी

यह पहली बार नहीं हो रहा. FSSAI 28 मई 2025 को एक आधिकारिक एडवाइजरी जारी कर चुका है जिस पर रेगुलेटरी कंप्लायंस के डायरेक्टर के दस्तखत हैं. इस चिट्ठी में रेगुलेटर ने साफ कहा कि फूड पैकेट और विज्ञापनों पर सौ परसेंट शब्द का चलन तेजी से बढ़ा है और यह शब्द भ्रामक है. FSSAI कहती है कि चाहे अकेले लिखा हो या किसी और शब्द के साथ, सौ परसेंट लिखने से ग्राहक के मन में पूरी शुद्धता और दूसरों से बेहतर होने का गलत भरोसा बनता है. इसी आधार पर सभी कंपनियों को निर्देश दिया गया कि वे लेबल, पैकेजिंग और प्रमोशन से यह शब्द हटा दें.

निर्देश के बाद भी नहीं बदली बाजार की तस्वीर

चेतावनी के एक साल बाद भी हालात ज्यादा नहीं बदले. एक पड़ताल में सामने आया कि रेगुलेटर ने अलग अलग समय पर 160 से ज्यादा भ्रामक दावों को चिह्नित किया, जिनमें सबसे पुराना मामला 2022 का था लेकिन इनमें से करीब 120 प्रोडक्ट आज भी उन्हीं दावों के साथ बिक रहे हैं, जिन्हें गलत बताया जा चुका था यानी आपत्ति दर्ज होने के बाद भी पैकेजिंग वैसी की वैसी बनी रही.  यहां तक कि सरकार के अपने आर्थिक सर्वेक्षण 2026 में भी माना गया कि भ्रामक फूड विज्ञापनों के खिलाफ नियम तो बहुत हैं पर उन पर अमल बहुत कमजोर है. हालांकि कंपनियों का अपना पक्ष भी है. उनका कहना रहा है कि उसके मामले नियमों के पूरे पालन के साथ बंद किए जा चुके हैं. एक कुकिंग ऑयल कंपनी ने भी कहा है कि उसके दावे कानून के मुताबिक और वैज्ञानिक आधार पर सही हैं और वह रेगुलेटर को विस्तार से जवाब दे रही है.

ग्राहक के पास क्या अधिकार है?

FSS एक्ट 2006 के तहत कोई भी कंपनी अपने फायदे के लिए ग्राहक को गुमराह नहीं कर सकती. अगर पैकेट के आगे कुछ और लिखा है और अंदर सामग्री में कुछ और निकलता है तो यह उल्लंघन है और इसकी शिकायत की जा सकती है. उल्लंघन साबित होने पर कंपनी पर भारी जुर्माने और गंभीर मामलों में लाइसेंस रद्द करने तक का प्रावधान है. इसलिए आदत डालिए, पैकेट के आगे के बड़े बड़े दावों के साथ पीछे लिखी सामग्री की सूची जरूर पढ़िए. सौ परसेंट, नेचुरल, प्योर और हेल्दी जैसे शब्दों को आंख मूंदकर सच मत मानिए.

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IVF कराने वालों के लिए बड़ी खबर, स्पर्म बैंक और फर्टिलिटी क्लीनिकों के लिए नए नियम तय

IVF कराने वालों के लिए बड़ी खबर, स्पर्म बैंक और फर्टिलिटी क्लीनिकों के लिए नए नियम तय


आजकल माता-पिता बनने का सपना पूरा करने के लिए बड़ी संख्या में लोग आईवीएफ (IVF) यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन तकनीक का सहारा ले रहे हैं. देश भर में आईवीएफ और फर्टिलिटी सेंटर्स कुकुरमुत्ते की तरह खुल गए हैं. ऐसे में मरीजों की सुरक्षा और इलाज की क्वालिटी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बेहद सख्त और अहम कदम उठाया है.

इस संबंध में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने नया आदेश जारी किया है. इसके मुताबिक, अब केवल उन्हीं फर्टिलिटी क्लीनिकों और स्पर्म बैंकों को आईवीएफ से जुड़ा जरूरी लैब का सामान (कंज्यूमेबल्स) मिलेगा, जो सरकार के बनाए गए नियमों के तहत रजिस्टर्ड हैं.

क्या है CDSCO का नया आदेश?

इस आदेश में साफ कहा गया है कि जो फर्टिलिटी क्लीनिक या स्पर्म बैंक असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) और सरोगेसी कानूनों के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं, वे अब आईवीएफ प्रक्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले जरूरी लैब प्रॉडक्ट्स नहीं खरीद पाएंगे. बता दें कि CDSCO देश की वह संस्था है, जो दवाओं और मेडिकल उपकरणों के मानक तय करती है. संस्था ने उन सभी कंपनियों और सप्लायर्स को सख्त निर्देश दिया है कि वे अपना सामान (आईवीएफ प्रोडक्ट्स) केवल मान्यता प्राप्त और रजिस्टर्ड सेंटरों को ही बेचें.

क्यों लिया गया यह फैसला?

CDSCO के ध्यान में यह बात आई थी कि बाजार में आईवीएफ के लिए जरूरी और संवेदनशील प्रॉडक्ट्स उन क्लीनिकों को भी बेचे जा रहे हैं, जिन्होंने रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है. यह बेहद गंभीर समस्या है.  बिना रजिस्ट्रेशन वाले क्लीनिकों में अक्सर सही मानकों का पालन नहीं होता है. CDSCO ने साफ शब्दों में कहा है कि गैर-पंजीकृत संस्थानों को इस तरह के मेडिकल प्रॉडक्ट्स की सप्लाई करने से मरीजों की सेहत और उनकी सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगता है, जिसे रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है.

किन चीजों की सप्लाई पर लगेगी रोक?

इस नए नियम के तहत आईवीएफ प्रक्रिया में काम आने वाली कई जरूरी चीजों की सप्लाई बिना रजिस्ट्रेशन वाले क्लीनिकों को नहीं की जाएगी. 

  • IVF मीडिया (IVF Media): यह खास तरह का केमिकल या घोल होता है. जब लैब में माता-पिता के अंडाणु (Egg) और शुक्राणु (Sperm) को मिलाकर भ्रूण (Embryo) बनाया जाता है तो उसे इसी घोल में सुरक्षित रखा जाता है और डिवेलप किया जाता है.
  • क्रायोप्रिजर्वेशन मीडिया (Cryopreservation Media): इसका इस्तेमाल भ्रूण या स्पर्म को फ्रीज करके रखने के लिए किया जाता है.
  • रिएजेंट्स (Reagents): लैब में होने वाले विभिन्न टेस्ट और प्रक्रियाओं में काम आने वाले रसायन.
  • अन्य सामग्रियां (Other Consumables): आईवीएफ के दौरान इस्तेमाल होने वाले अन्य सभी जरूरी उपकरण और सामग्री.

क्या कहते हैं कानूनी नियम?

CDSCO ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि आईवीएफ में इस्तेमाल होने वाले इन सभी प्रॉडक्ट्स को मेडिकल डिवाइसेज रूल्स, 2017 (Medical Devices Rules, 2017) के तहत विनियमित किया जाता है. इसका मतलब है कि इन्हें बनाने या विदेश से मंगाने के लिए लाइसेंस होना बेहद जरूरी है. वहीं, देश में सभी आईवीएफ क्लीनिकों और स्पर्म बैंकों को दो मुख्य कानूनों असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट 2021 और सरोगेसी (रेगुलेशन) एक्ट 2021 के तहत अपना रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है.

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सुबह को अमृत और रात को जहर है ये चीज, खाने से होते हैं ये नुकसान- यहां जानिए

सुबह को अमृत और रात को जहर है ये चीज, खाने से होते हैं ये नुकसान- यहां जानिए


दही को सबसे हेल्दी फूड आइटम्स में गिना जाता है. इसमें मौजूद अच्छे बैक्टीरिया पाचन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं. इसके अलावा दही हड्डियों को मजबूत बनाने और इम्यूनिटी बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है. हालांकि रात के समय दही खाना नुकसानदायक हो सकता है. इसकी तासीर ठंडी मानी जाती है, जिसकी वजह से बलगम बनने की समस्या हो सकती है. साथ ही कुछ लोगों को गैस और पेट में भारीपन की शिकायत भी हो सकती है.

फल हेल्थ के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं और लगभग हर व्यक्ति को इन्हें खाने की सलाह दी जाती है. लेकिन इन्हें दिन के समय खाना ज्यादा बेहतर माना जाता है. रात में फल खाने से कुछ लोगों को कई तरह की समस्या हो सकती है. फलों में नेचुरल  शुगर और कार्बोहाइड्रेट मौजूद होते हैं, जो ब्लड शुगर के लेवल को बढ़ा सकते हैं और नींद पर असर डाल सकते हैं. कुछ मामलों में रात में फल खाने से गैस और कब्ज की समस्या भी हो सकती है.

फल हेल्थ के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं और लगभग हर व्यक्ति को इन्हें खाने की सलाह दी जाती है. लेकिन इन्हें दिन के समय खाना ज्यादा बेहतर माना जाता है. रात में फल खाने से कुछ लोगों को कई तरह की समस्या हो सकती है. फलों में नेचुरल शुगर और कार्बोहाइड्रेट मौजूद होते हैं, जो ब्लड शुगर के लेवल को बढ़ा सकते हैं और नींद पर असर डाल सकते हैं. कुछ मामलों में रात में फल खाने से गैस और कब्ज की समस्या भी हो सकती है.

Published at : 26 Jun 2026 04:12 PM (IST)

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कड़ाही में बचा तेल कितने दिन तक इस्तेमाल कर सकते हैं, कब बन जाता है जहर?

कड़ाही में बचा तेल कितने दिन तक इस्तेमाल कर सकते हैं, कब बन जाता है जहर?


How Long Can You Reuse Cooking Oil: घरों में अक्सर ऐसा होता है कि पकौड़े, पूड़ी या दूसरी तली हुई चीजें बनाने के बाद कड़ाही में तेल बच जाता है. कई लोग इस तेल को दोबारा इस्तेमाल कर लेते हैं, ताकि इसे फेंकना न पड़े. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही बचा हुआ तेल अगर बार-बार गर्म किया जाए या लंबे समय तक रखा जाए, तो यह सेहत के लिए नुकसानदायक बन सकता है. फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया के अनुसार, खाना बनाने वाले तेल को तीन बार से ज्यादा दोबारा गर्म नहीं करना चाहिए. बार-बार गर्म करने पर तेल में टोटल पोलर कंपाउंड नाम के हानिकारक तत्व बनने लगते हैं. अगर इनकी मात्रा 25 प्रतिशत से ज्यादा हो जाए, तो ऐसा तेल खाना बनाने के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता.

बार-बार गर्म करने पर तेल में क्या होता है?

जब तेल को बार-बार तेज आंच पर गर्म किया जाता है, तो उसमें ऑक्सीकरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. इस दौरान एल्डिहाइड्स, फ्री रेडिकल्स और ट्रांस फैट जैसे हानिकारक तत्व बनने लगते हैं. ये शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं और लंबे समय तक ऐसे तेल का सेवन करने से हार्ट रोग, कैंसर, लिवर से जुड़ी समस्याएं और सूजन जैसी दिक्कतों का खतरा बढ़ सकता है.

कितने दिन तक बचा हुआ तेल इस्तेमाल कर सकते हैं?

अगर किसी वजह से तेल दोबारा इस्तेमाल करना ही पड़े, तो उसे पहले अच्छी तरह छान लें, ताकि उसमें मौजूद खाने के छोटे-छोटे कण निकल जाएं. इसके बाद तेल को एयरटाइट बर्तन में भरकर ठंडी और सूखी जगह पर रखें. एक्सपर्ट्स की सलाह है कि ऐसे तेल का इस्तेमाल 1 से 2 दिन के भीतर और सिर्फ एक बार ही करना बेहतर माना जाता है. जितना ज्यादा समय तेल रखा जाएगा, उसके खराब होने का खतरा उतना ही बढ़ जाएगा.

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कब तुरंत फेंक देना चाहिए तेल?

अगर तेल से अजीब या बासी गंध आने लगे, उसमें झाग बनने लगे, उसका रंग बहुत गहरा हो जाए या दोबारा गर्म करने पर वह ज्यादा गाढ़ा और धुंधला दिखाई दे, तो उसे बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. ऐसे संकेत बताते हैं कि तेल खराब हो चुका है और उसका सेवन स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है.

तेल दोबारा इस्तेमाल करते समय रखें ये बातें

अगर आप तेल को दोबारा इस्तेमाल कर रहे हैं, तो कम स्मोक पॉइंट वाले तेल, जैसे ऑलिव ऑयल या नारियल तेल को दोबारा गर्म करने से बचें. वहीं, तेल को हमेशा छानकर ही रखें और दोबारा इस्तेमाल करने से पहले उसकी गंध और रंग जरूर जांच लें. अगर जरा भी शक हो कि तेल खराब हो चुका है, तो उसे फेंक देना ही बेहतर विकल्प है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भारत में लॉन्च हुई कैंसर की नई दवा, 14 दिनों के डोज में खत्म होगी बीमारी! जानें कितनी है कीमत?

भारत में लॉन्च हुई कैंसर की नई दवा, 14 दिनों के डोज में खत्म होगी बीमारी! जानें कितनी है कीमत?


New Cancer Drug Launched In India: कैंसर के इलाज को लेकर भारत में एक नई उम्मीद जगी है. दवा बनाने वाली कंपनी एली लिली एंड कंपनी इंडिया ने कैंसर के मरीजों के लिए नई टार्गेटेड थेरेपी टैनस्ट्राइव लॉन्च की है. यह दवा खास तरह के कैंसर मरीजों के लिए तैयार की गई है, जिनमें आरईटी जीन अल्टरेशन पाया जाता है. कंपनी का दावा है कि यह दवा कैंसर बढ़ाने वाले असामान्य सिग्नल्स को रोकने का काम करती है. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 14 दिनों का डोज हर मरीज का कैंसर पूरी तरह खत्म कर देगा, ऐसा दावा नहीं किया गया है. 14 दिन सिर्फ इस दवा के एक बॉक्स का उपचार चक्र है.

किन मरीजों के लिए है यह दवा?

यह दवा उन मरीजों के लिए लाई गई है, जिन्हें लोकली एडवांस्ड या मेटास्टेटिक सॉलिड ट्यूमर है और जिनके कैंसर का संबंध RET जीन अल्टरेशन से है. यानी यह दवा हर तरह के कैंसर के लिए नहीं है. इलाज शुरू करने से पहले डॉक्टर जांच के जरिए यह तय करते हैं कि मरीज में RET जीन बदलाव मौजूद है या नहीं.

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कैसे काम करती है नई दवा?

कंपनी के अनुसार, टैनस्ट्राइव को इस तरह तैयार किया गया है कि यह सीधे आरईटी जीन अल्टरेशन को निशाना बनाती है. यह उन असामान्य सिग्नलिंग पाथवे को ब्लॉक करती है, जिनकी वजह से कैंसर सेल्स तेजी से बढ़ती हैं. यह एक ओरल दवा है, जिसे मरीज को दिन में दो बार लेना होता है. दवा 40 mg, 80 mg, 120 mg और 160 mg की टैबलेट में उपलब्ध है, ताकि डॉक्टर मरीज की जरूरत के हिसाब से डोज तय कर सकें.

14 दिनों की दवा की कितनी है कीमत?

कंपनी ने इस दवा की कीमत 2.15 लाख रुपये प्रति बॉक्स तय की है. एक बॉक्स में 14 दिनों के इलाज के लिए जरूरी दवा होती है. इसके बाद मरीज को आगे कितने समय तक दवा लेनी होगी, यह उसकी बीमारी की स्थिति और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर करेगा.

कंपनी ने क्या कहा?

एली लिली एंड कंपनी इंडिया के प्रेसिडेंट और जनरल मैनेजर विंसलो टकर ने कहा कि प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी कैंसर के इलाज का तरीका तेजी से बदल रही है. उनके मुताबिक, टैनस्ट्राइव भारत में ऐसे मरीजों के लिए टार्गेटेड थेरेपी तक पहुंच बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिनके कैंसर का संबंध आरईटी जीन अल्टरेशन से है. नई दवा को लेकर यह समझना जरूरी है कि इसे हर कैंसर मरीज के लिए इलाज नहीं माना जा सकता. यह सिर्फ उन मरीजों के लिए है, जिनमें RET जीन अल्टरेशन पाया जाता है. इसलिए किसी भी तरह का इलाज शुरू करने से पहले ऑन्कोलॉजिस्ट की सलाह और जरूरी जांच कराना बेहद जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पीठ दर्द से लेकर मामूली चोट तक, पुरुषों की हड्डियों को चुपचाप खोखला बना रही यह खतरनाक बीमारी

पीठ दर्द से लेकर मामूली चोट तक, पुरुषों की हड्डियों को चुपचाप खोखला बना रही यह खतरनाक बीमारी


How Low Testosterone Increases Fracture Risk: ऑस्टियोपोरोसिस को लंबे समय तक महिलाओं, खासकर मेनोपॉजके बाद की महिलाओं की बीमारी माना जाता रहा है. यही वजह है कि ज्यादातर पुरुष इस खतरे को गंभीरता से नहीं लेते. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि कमजोर हड्डियों की समस्या केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है. उम्र बढ़ने के साथ पुरुषों में भी हड्डियों का घनत्व कम हो सकता है, जिससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है. कई बार लोगों को तब तक इसका पता नहीं चलता, जब तक कोई गंभीर चोट या हड्डी टूटने की घटना न हो जाए.

क्या हो सकती है इससे दिक्कत?

आईएसआईसी मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल में जॉइंट रिप्लेसमेंट विभाग के प्रमुख और ऑर्थोपेडिक्स विशेषज्ञ डॉ. विवेक महाजन ने TOI को बताया कि पुरुषों में ऑस्टियोपोरोसिस अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है क्योंकि उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि वे भी इसके जोखिम में हो सकते हैं. ऑस्टियोपोरोसिस ऐसी स्थिति है जिसमें हड्डियां धीरे-धीरे कमजोर और भुरभुरी होने लगती हैं. सामान्य रूप से शरीर पुरानी हड्डियों को हटाकर नई हड्डियां बनाता रहता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ यह संतुलन बिगड़ सकता है और हड्डियों का नुकसान तेजी से होने लगता है. 

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टेस्टोस्टेरोन क्यों है जरूरी?

विशेषज्ञों के अनुसार, टेस्टोस्टेरोन केवल मांसपेशियों, ऊर्जा और यौन हेल्थ के लिए ही जरूरी नहीं है, बल्कि हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में भी इसकी अहम भूमिका होती है. डॉ. विवेक महाजन के मुताबिक, यह हार्मोन जीवनभर हड्डियों के निर्माण और उनके रखरखाव में मदद करता है. लेकिन जैसे-जैसे पुरुषों की उम्र बढ़ती है, टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम होने लगता है. इसका असर हड्डियों पर भी पड़ता है और शरीर नई हड्डियां बनाने की तुलना में अधिक हड्डियां खोने लगता है.

कम टेस्टोस्टेरोन का क्या होता है असर?

कम टेस्टोस्टेरोन का असर सिर्फ हड्डियों तक सीमित नहीं रहता. इससे मांसपेशियों की ताकत और द्रव्यमान भी कम हो सकता है, जिससे गिरने का खतरा बढ़ जाता है. कमजोर हड्डियां और गिरने की अधिक संभावना मिलकर फ्रैक्चर के जोखिम को कई गुना बढ़ा देती हैं. यही कारण है कि बढ़ती उम्र में कूल्हे, रीढ़ और कलाई की हड्डियों के फ्रैक्चर ज्यादा देखने को मिलते हैं.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

ऑस्टियोपोरोसिस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में इसके कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते. इसी वजह से इसे साइलेंट डिजीज भी कहा जाता है. हालांकि लगातार पीठ दर्द, धीरे-धीरे लंबाई कम होना, झुकी हुई मुद्रा, मामूली चोट में हड्डी टूट जाना या लगातार शारीरिक कमजोरी जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. वहीं कम टेस्टोस्टेरोन वाले पुरुषों में थकान, सहनशक्ति में कमी और मांसपेशियों का कमजोर होना भी देखने को मिल सकता है.

कैसे इसको रोका जा सकता है?

अच्छी बात यह है कि समय रहते पहचान होने पर ऑस्टियोपोरोसिस को काफी हद तक रोका और नियंत्रित किया जा सकता है. कैल्शियम और विटामिन डी से भरपूर आहार, नियमित वॉक, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, धूम्रपान से दूरी और संतुलित वजन बनाए रखना हड्डियों को मजबूत रखने में मदद करता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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