युवाओं में तेजी से बढ़ रहा ओरल कैंसर का खतरा, तंबाकू-वेपिंग बन रहे जानलेवा, जानें लक्षण

युवाओं में तेजी से बढ़ रहा ओरल कैंसर का खतरा, तंबाकू-वेपिंग बन रहे जानलेवा, जानें लक्षण


Early Warning Signs Of Oral Cancer: तंबाकू का सेवन दुनिया भर में हर साल लाखों लोगों की जान ले रहा है. इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग धूम्रपान और तंबाकू से जुड़े उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं. चिंता की बात यह है कि तंबाकू से होने वाले नुकसान केवल लंग्स या हार्ट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह ओरल कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का कारण भी बन सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि मुंह में दिखने वाले कुछ सामान्य से लगने वाले संकेत कई बार कैंसर की शुरुआती चेतावनी साबित हो सकते हैं, लेकिन लोग अक्सर उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. 

क्यों बढ़ रहे हैं ओरल कैंसर के मामले?

डॉ. अमित चक्रवर्ती ने TOI को बताया कि देश में ओरल कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके प्रति जागरूकता अभी भी काफी कम है. कई लोग मुंह के छालों, मसूड़ों से खून आने या मुंह के भीतर होने वाली अन्य समस्याओं को सामान्य समझकर टाल देते हैं. जबकि अगर कोई छाला दो सप्ताह से अधिक समय तक ठीक नहीं होता है, तो उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. ऐसे लक्षण ओरल कैंसर से जुड़े हो सकते हैं और समय पर जांच न होने पर स्थिति गंभीर हो सकती है. 

क्या होते हैं इसके लक्षण?

एक्सपर्ट बताते हैं कि केवल छाले ही नहीं, बल्कि मुंह के अंदर सफेद या लाल धब्बे दिखना, चबाने में दर्द होना, किसी तरह की गांठ या सूजन महसूस होना, दांतों का ढीला पड़ना, बोलने या निगलने में परेशानी होना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं. इसके अलावा लगातार मुंह से दुर्गंध आना या मुंह के किसी हिस्से में सुन्नपन महसूस होना भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. खासतौर पर तंबाकू का सेवन करने वालों में ऐसे लक्षण अधिक देखने को मिल सकते हैं.

क्या हर मुंह के छाले कैंसर होते हैं?

डॉ. अमित चक्रवर्ती का कहना है कि हर मुंह का छाला कैंसर नहीं होता. सामान्य छाले आमतौर पर तीन से चार दिनों में ठीक हो जाते हैं और उनमें ज्यादा परेशानी नहीं होती. लेकिन यदि छाला लगातार बढ़ रहा हो, दर्द दे रहा हो, आसानी से खून निकल रहा हो या खाने-पीने और बोलने में दिक्कत पैदा कर रहा हो, तो तुरंत एक्सपर्ट से संपर्क करना चाहिए. यदि उसके साथ सफेद या लाल धब्बे भी दिखाई दें तो जांच में देरी नहीं करनी चाहिए.

इसे भी पढ़ें – Summer Fatigue: गर्मियों में बार-बार महसूस हो रही थकान, जान लें यह किस बीमारी का संकेत?

कम उम्र के लोगों को ले रहा अपनी चपेट में

पहले ओरल कैंसर मुख्य रूप से 50 से 75 वर्ष की उम्र के लोगों में देखा जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर तेजी से बदली है. अब 25 से 45 वर्ष की उम्र के युवा धूम्रपान करने वालों और वेपिंग करने वालों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि धूम्रपान, तंबाकू चबाना, वेपिंग, शराब का सेवन और खराब ओरल हेल्थ इस खतरे को बढ़ा रहे हैं. 

कैसे इसको ठीक कर सकते हैं?

अगर इसके इलाज की बात करें, तो ओरल कैंसर की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए तो इलाज के परिणाम काफी बेहतर हो सकते हैं. डॉ. अमित चक्रवर्ती के अनुसार शुरुआती अवस्था में इलाज कराने वाले मरीजों के बचने की संभावना 80 से 90 प्रतिशत तक हो सकती है.

इसे भी पढ़ें  – जहां बन रहा खाना वहीं पनप रही बीमारी, क्या आपके बच्चों को भी बीमार कर रही किचन की सिंक?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

क्या आपके पैर भी रहते हैं ठंडे और सुन्न? कहीं ये बड़ी बीमारी का संकेत तो नहीं!

क्या आपके पैर भी रहते हैं ठंडे और सुन्न? कहीं ये बड़ी बीमारी का संकेत तो नहीं!


Early Signs Of Health Problems In Feet: आप रोज अपने पैरों पर चलते हैं, लेकिन अक्सर उनकी तरफ ध्यान तब जाता है जब दर्द शुरू हो जाए. सच यह है कि पैरों में दिखने वाले छोटे-छोटे बदलाव शरीर के अंदर चल रही बड़ी समस्याओं का संकेत हो सकते हैं. हर पैर में 26 हड्डियां और 100 से ज्यादा मांसपेशियां, टेंडन और लिगामेंट होते हैं, जो हमें संतुलन और चलने-फिरने में मदद करते हैं. इसलिए यहां होने वाले बदलाव को हल्के में नहीं लेना चाहिए. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. अनुज चावला, सीनियर डायरेक्टर, फुट एंड एंकल सर्जरी, फोर्टिस गुरुग्राम ने TOI को बताया कि “पैर शरीर का पूरा वजन संभालते हैं और हमारी रोजमर्रा की गतिविधियों को संभव बनाते हैं, लेकिन फिर भी इन्हें सबसे ज्यादा नजरअंदाज किया जाता है.”

क्या होते हैं संकेत?

पैर कई बार शरीर के शुरुआती संकेत देने का काम करते हैं. ठंडे पैर या सुन्नपन ब्लड के सही फ्लो में कमी या नसों की समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं. एड़ियों का फटना या त्वचा का ज्यादा सूखा होना डिहाइड्रेशन या थायरॉयड गड़बड़ी से जुड़ा हो सकता है. टखनों में सूजन दिल, किडनी या लीवर पर दबाव का संकेत हो सकती है. वहीं नाखूनों का रंग या मोटाई बदलना फंगल इंफेक्शन या किसी अंदरूनी बीमारी का संकेत देता है. 

डायबिटीज के मरीजों के लिए संकेत

डायबिटीज के मरीजों में ये संकेत और ज्यादा गंभीर हो जाते हैं. डॉ. चावला के अनुसार डायबिटीज में नसों को नुकसान, खून की सप्लाई कम होना और पैर की बनावट में बदलाव के कारण चोट का पता नहीं चलता, जिससे इंफेक्शन और घाव बढ़ जाते हैं. अगर समय पर ध्यान न दिया जाए तो गैंग्रीन तक की स्थिति बन सकती है और पैर काटने तक की नौबत आ सकती है. इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में छपी स्टडी भी बताती है कि भारत में डायबिटीज से जुड़ी दिक्कतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिनमें पैर की समस्या अस्पताल में भर्ती होने का बड़ा कारण बन रही है.

इसे भी पढ़ें-Explained: मुंबई में तरबूज तो झारखंड में गोलगप्पे खाने से मौत! किन खानों से होती फूड पॉइजनिंग, आखिर खाएं क्या?

लाइफस्टाइल भी जिम्मेदार

आजकल पैरों की समस्याएं सिर्फ उम्र से जुड़ी नहीं हैं, बल्कि हमारी लाइफस्टाइल भी इसका बड़ा कारण है. लंबे समय तक बैठना खून के प्रवाह को कम करता है, गलत जूते पहनने से मांसपेशियों और जोड़ों पर दबाव पड़ता है, बढ़ता वजन पैरों पर अतिरिक्त बोझ डालता है और फिजिकल एक्टिविटी से पैर कमजोर हो जाते हैं. फ्लैट फुट या हाई आर्च जैसी समस्याएं भी आम हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों को इसका पता ही नहीं चलता.

क्या होते हैं शुरुआती संकेत?

शुरुआत अक्सर छोटी होती है जैसे कि हल्का दर्द, सूजन या छाला. लेकिन नजरअंदाज करने पर यही समस्या गंभीर रूप ले सकती है. छोटा घाव इंफेक्शन में बदल सकता है, जोड़ों की जकड़न चलने-फिरने में दिक्कत पैदा कर सकती है और नसों की समस्या से संवेदनशीलता खत्म हो सकती है. डॉ. चावला कहते हैं कि समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है, ताकि लंबे समय तक चलने-फिरने की क्षमता बनी रहे. अच्छी बात यह है कि अब इलाज के तरीके बेहतर हो चुके हैं और कम कट वाली सर्जरी से दर्द और रिकवरी का समय कम हो गया है.

हालांकि सबसे जरूरी है रोजमर्रा की देखभाल. रोज पैरों की जांच करें, सही फिटिंग वाले जूते पहनें, साफ-सफाई रखें, हल्की एक्सरसाइज करें और वजन व शुगर को कंट्रोल में रखें. छोटे-छोटे कदम ही लंबे समय तक चलने की आजादी देते हैं.

इसे भी पढ़ें-Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

बारिश के मौसम में अपने छोटे बच्चे को भूलकर भी न दें ये चीजें, जरा-सी लापरवाही पड़ सकती है भारी

बारिश के मौसम में अपने छोटे बच्चे को भूलकर भी न दें ये चीजें, जरा-सी लापरवाही पड़ सकती है भारी


Kids Diet in Monsoon: बारिश का मौसम शुरू हो रहा है. वहीं बारिश का मौसम गर्मी से राहत देता है, लेकिन यही मौसम बच्चों के लिए कई तरह की हेल्थ से जुड़ी बीमारियां भी लेकर आता है. इस दौरान वातावरण में नमी बढ़ने, इंफेक्शन फैलाने वाले बैक्टीरिया और वायरस के एक्टिव होने के कारण छोटे बच्चों के बीमार पड़ने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में माता-पिता को बच्चों की डाइट से लेकर उनकी साफ-सफाई और रोजाना की देखभाल तक हर छोटी बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए. तो चलिए आज हम आपको बताते हैं की बारिश के मौसम में अपने छोटे बच्चों को भूलकर भी कौन सी चीज नहीं देनी चाहिए, क्योंकि जरा सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है. 

बच्चों को बाहर का खाना देने से बचें 

बरसात के मौसम में सड़क किनारे मिलने वाली चाट, गोलगप्पे, पकौड़ी, समोसे और दूसरे स्ट्रीट फूड बच्चों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं. इन खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाला पानी और तेल कई बार दूषित हो सकता है, जिससे पेट संबंधी इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है. एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि इस मौसम में बच्चों को केवल घर का ताजा और साफ खाना ही देना चाहिए. 

कटे हुए फल और बासी खाने से रखें दूरी 

खुले में रखे हुए कटे हुए फल बारिश के मौसम में जल्दी संक्रमित हो सकते हैं. इनमें धूल, गंदगी और बैक्टीरिया आसानी से जमा हो जाते हैं. इस तरह बासी भोजन में भी फंगस और बैक्टीरिया तेजी से विकसित हो सकते हैं, इसलिए बच्चों को हमेशा ताजा भोजन और ताजे फल ही खिलौने चाहिए. 

कोल्ड ड्रिंक और सॉफ्ट ड्रिंक से परहेज करें 

डाइट एक्सपर्ट के अनुसार बारिश के मौसम में बच्चों को कोल्ड ड्रिंक, सॉफ्ट ड्रिंक और ज्यादा ठंडी चीज देने से बचना चाहिए. इससे गले में इंफेक्शन, सर्दी-जुकाम और पाचन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती है. इसके बजाय बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पानी और नारियल पानी जैसी चीजें पिलानी चाहिए. 

ये भी पढ़ें-Pushups Benefits: रोज 100 पुशअप्स मारने पर कितने दिन में बन जाएगी बॉडी, क्या कहते हैं जिम एक्सपर्ट?

ज्यादा तला-भुना और मसालेदार खाना न खिलाएं 

बारिश के मौसम में पाचन तंत्र कमजोर हो सकता है. ऐसे में ज्यादा तला-भुना, मसालेदार और भारी भोजन बच्चों के पेट पर एक्स्ट्रा दबाव डाल सकता है. इससे गैस, एसिडिटी और अपच जैसी समस्या हो सकती है, इसलिए हल्का भोजन बच्चों के लिए ज्यादा सही माना जाता है. 

पत्तेदार सब्जियां भी सोच-समझकर  खिलाएं 

इस मौसम में पत्तेदार सब्जियों में मिट्टी और कीटाणुओं की मात्रा बढ़ सकती है. अगर इन्हें अच्छी तरह साफ किए बिना इस्तेमाल किया जाए तो संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए पालक और मेथी जैसी सब्जियों का उपयोग करने से पहले अच्छी तरह धोना जरूरी है.

ये भी पढ़ें-Air In Injection Side Effects: क्या सच में इंजेक्शन में एयर बाकी रह जाने से हो जाती है मौत, क्या है इसके पीछे का सच?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

इन 5 फूड हैबिट्स से बच्चों को जल्दी घेर लेता है मोटापा, जानिए कैसे छुड़ाएं इससे पीछा?

इन 5 फूड हैबिट्स से बच्चों को जल्दी घेर लेता है मोटापा, जानिए कैसे छुड़ाएं इससे पीछा?


Food Habits That Cause Obesity In Children: बदलती लाइफस्टाइल का असर सिर्फ बड़े और बुजुर्गों पर ही नहीं हो रहा है, बल्कि बच्चे भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. आजकल के बच्चों में मोटापा एक बड़ी दिक्कत बनता जा रहा है. और इसकी सबसे बड़ी वजह सिर्फ बाहर का खाना या जंक फूड नहीं है, बल्कि घर के भीतर बनी कुछ ऐसी फूड हैबिट्स भी हैं, जो धीरे-धीरे बच्चों का वजन बढ़ाने लगती हैं. कई बार मां-बाप को लगता है कि वे बच्चे की हर जरूरत पूरी कर रहे हैं, लेकिन अनजाने में वही आदतें आगे चलकर मोटापे की वजह बन जाती हैं. अगर समय रहते इन पर ध्यान न दिया जाए, तो बच्चा कम उम्र में ही मोटापे की चपेट में आ सकता है.

बच्चों को तुरंत खाना क्यों नहीं देना चाहिए?

सबसे पहली आदत है, बच्चे के हर बार भूख लगने की बात पर तुरंत कुछ खाने को दे देना. कई बार बच्चे सच में भूखे नहीं होते, बल्कि बोरियत, आदत या किसी चीज की क्रेविंग की वजह से खाने की मांग करते हैं. ऐसे में अगर हर बार उन्हें कुछ न कुछ दे दिया जाए, तो ओवरईटिंग की आदत बन सकती है. इससे बचने के लिए बच्चों का फिक्स मील टाइम और स्नैक टाइम तय करना जरूरी है.

बात-बात पर स्नैक्स पकड़ाने की आदत

दूसरी आदत है, हर समय साथ में स्नैक्स लेकर चलना और मौका मिलते ही बच्चे को पकड़ा देना. आजकल कार, स्कूल बैग या बाहर जाते समय बच्चों के लिए स्नैक्स रखना आम बात हो गई है. लेकिन बार-बार स्नैकिंग से बच्चा यह समझ ही नहीं पाता कि असली भूख क्या होती है. ऐसे में जरूरत से ज्यादा कैलोरी शरीर में जाने लगती है. बेहतर होगा कि बच्चे को हर बार चिप्स, कुकीज या मीठी चीजें देने के बजाय फल, सब्जियां या हल्के हेल्दी स्नैक्स दिए जाएं.

बच्चों के लिए अलग से खाना बनाना

तीसरी आदत है, बच्चों के लिए अलग से उनकी पसंद का खाना बनाना. कई घरों में ऐसा होता है कि अगर बच्चा घर का सामान्य खाना नहीं खा रहा, तो उसके लिए अलग से मैगी, फ्रेंच फ्राइज, नगेट्स या दूसरी पसंदीदा चीजें बना दी जाती हैं. इससे बच्चा हेल्दी खाने से दूर होने लगता है और उसे लगता है कि हर बार उसकी पसंद का ही खाना मिलेगा. इससे बचने के लिए जरूरी है कि बच्चे को धीरे-धीरे वही संतुलित खाना खाने की आदत डाली जाए, जो घर में बाकी लोग खा रहे हैं.

इन चीजों से भी करना चाहिए परहेज

चौथी आदत है, पानी और दूध की जगह मीठे ड्रिंक्स देना. सॉफ्ट ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, फ्लेवर्ड ड्रिंक या मीठे शरबत बच्चों के शरीर में बहुत तेजी से अतिरिक्त शुगर पहुंचाते हैं. यही शुगर आगे चलकर वजन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है. इसलिए बच्चों को पानी पीने की आदत डालना और मीठे पेय से दूरी बनाना जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- प्राइवेट पार्ट के बाल हटाना जरूरी है या नहीं? जान लें अपने काम की बात

बच्चों के वजन को लेकर ये गलतियां न करें

पांचवीं और सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चों के वजन को लेकर या तो बहुत निगेटिव रवैया अपनाया जाता है या फिर इस पर बिल्कुल बात ही नहीं की जाती. दोनों ही तरीके गलत हैं. बच्चे को शर्मिंदा करने के बजाय परिवार में हेल्दी खाने और एक्टिव रहने की आदत पर जोर देना चाहिए. अगर शुरुआत से ये पांच फूड हैबिट्स सुधर जाएं, तो बच्चों को मोटापे से काफी हद तक बचाया जा सकता है.

इसे भी पढ़ें- क्या सच में कोई काला शख्स गोरा हो सकता है? कई साल से दवा कंपनियां परोस रहीं आपको ये झूठ

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

सभी वैक्सीन और कैंसर की दवाओं पर भी अब QR कोड जरूरी, सरकार ने बदले नियम

सभी वैक्सीन और कैंसर की दवाओं पर भी अब QR कोड जरूरी, सरकार ने बदले नियम


QR Codes Mandatory for Vaccines: केंद्र सरकार ने दवाओं को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है. अब वैक्सीन, एंटीबायोटिक दवाएं, कैंसर की दवाएं और नशीली दवाओं पर भी QR कोड लगाना जरूरी होगा. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने इसके लिए ड्रग्स रूल्स 1945 में बदलाव किया है. अभी तक यह नियम सिर्फ देश की टॉप 300 दवा ब्रांड्स पर लागू था. अब इसका दायरा बढ़ाकर इसमें सभी वैक्सीन, एंटीबायोटिक दवाएं, NDPS एक्ट के तहत आने वाली नशीली और साइकोट्रॉपिक दवाएं और कैंसर की सभी दवाएं भी शामिल कर दी गई हैं.

प्रोडक्ट की पैकेजिंग पर जरूरी होगा QR कोड

नए नियम के मुताबिक दवा बनाने वाली कंपनियों को अपने प्रोडक्ट की पैकेजिंग पर बार कोड या QR कोड लगाना होगा. अगर पैकेजिंग पर जगह कम होगी तो यह कोड सेकेंडरी पैकेजिंग पर लगाया जा सकेगा. इस कोड को स्कैन करने पर लोग दवा की पूरी जानकारी देख सकेंगे. QR कोड में दवा का यूनिक कोड, उसका जेनेरिक और ब्रांड नाम, कंपनी का नाम और पता, बैच नंबर, बनने और एक्सपायरी की तारीख, मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस नंबर और जरूरत पड़ने पर दवा में मिले तत्वों की जानकारी होगी.

यह भी पढ़ें: आखिर किन गलतियों से वक्त से पहले सफेद हो जाते हैं बाल, इन उपायों को अपना कर बच सकते हैं आप

नकली और घटिया दवाओं की आसान होगी पहचान

सरकार का कहना है कि इस फैसले से नकली और घटिया दवाओं पर रोक लगाने में मदद मिलेगी. सप्लाई चेन में दवा की हर स्टेज पर पहचान और जांच आसान हो जाएगी. इससे एंटीबायोटिक दवाओं के गलत असर से जुड़ी समस्या यानी एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस से लड़ने में भी मदद मिलेगी क्योंकि नकली और कमजोर एंटीबायोटिक दवाओं की पहचान करना आसान होगा.

1 जुलाई 2027 से लागू हो जाएगा नियम 

कंपनियों को नए नियम लागू करने के लिए पूरा समय दिया गया है. वैक्सीन, नशीली दवाओं और कैंसर की दवाओं पर यह नियम 1 जुलाई 2027 से लागू होगा. वहीं एंटीबायोटिक दवाओं पर यह नियम 1 जुलाई 2028 से लागू किया जाएगा.

यह भी पढ़ें: Early pregnancy में क्यों नहीं खाना चाहिए पपीता-पाइनएप्पल, कैसे बनते हैं अनचाहे गर्भपात की वजह?

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

Early pregnancy में क्यों नहीं खाना चाहिए पपीता-पाइनएप्पल, कैसे बनते हैं अनचाहे गर्भपात की वजह?

Early pregnancy में क्यों नहीं खाना चाहिए पपीता-पाइनएप्पल, कैसे बनते हैं अनचाहे गर्भपात की वजह?


Foods To Avoid In Early Pregnancy: प्रेग्नेंसी की शुरुआत होते ही महिलाओं को खानपान को लेकर तमाम तरह की सलाह दी जाती है. इनमें सबसे ज्यादा जिस बात को लेकर सावधानी बरतने को कहा जाता है, वह है पपीता और पाइनएप्पल. अक्सर घर के बड़े-बुजुर्ग से लेकर कई डॉक्टर तक शुरुआती गर्भावस्था में इन दोनों फलों से दूरी बनाने की सलाह देते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है और क्या सच में ये फल अनचाहे गर्भपात की वजह बन सकते हैं.

किन पपीते को नहीं खाना चाहिए?

सबसे पहले बात पपीते की करें, तो इसे लेकर सबसे ज्यादा चिंता कच्चे या अधपके पपीते को लेकर होती है. दरअसल, कच्चे पपीते में लेटेक्स और पपेन जैसे तत्व ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं. इन्हें गर्भावस्था में जोखिम भरा माना जाता है, क्योंकि कुछ रिसर्च और लैब स्टडी में इन तत्वों का असर गर्भाशय को उत्तेजित करने वाला पाया गया है. माना जाता है कि ये गर्भाशय में कंस्ट्रक्शन बढ़ा सकते हैं और इसी वजह से शुरुआती प्रेग्नेंसी में कच्चे पपीते से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है. यही कारण है कि अधपका या हरा पपीता गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता.

इसे भी पढ़ें- किन लोगों को होती है अलका याज्ञनिक वाली बीमारी? जानें इसके लक्षण और बचाव के तरीके

क्या पका पपीता खा सकते हैं?

 हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली वेबसाइट healthline के अनुसार, पूरी तरह पका हुआ पपीता इससे अलग होता है. पके पपीते में लेटेक्स की मात्रा काफी कम हो जाती है और इसमें विटामिन C, फोलेट, फाइबर और दूसरे पोषक तत्व भी होते हैं. इसलिए कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि कम मात्रा में पका पपीता हर गर्भवती महिला के लिए खतरनाक नहीं होता. फिर भी, क्योंकि इस पर इंसानों में बहुत ठोस रिसर्च मौजूद नहीं है, इसलिए ज्यादातर मामलों में डॉक्टर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं.

 पाइनएप्पल कितना नुकसानदायक?

अब बात पाइनएप्पल की करें, तो इसे लेकर भी गर्भपात का डर अक्सर सुनने को मिलता है. इसकी वजह ब्रोमेलिन नाम का एंजाइम है, जो पाइनएप्पल में पाया जाता है. माना जाता है कि यह सर्विक्स को नरम करने और गर्भाशय पर असर डालने का काम कर सकता है. हालांकि, सामान्य मात्रा में पाइनएप्पल खाने से गर्भपात हो जाएगा, ऐसा कोई मजबूत वैज्ञानिक सबूत नहीं है. दिक्कत तब मानी जाती है, जब इसे बहुत ज्यादा मात्रा में लिया जाए या शरीर किसी वजह से पहले से संवेदनशील स्थिति में हो.

यही वजह है कि शुरुआती प्रेग्नेंसी में पपीता और पाइनएप्पल को लेकर पूरी तरह लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए. खासकर अगर महिला की प्रेग्नेंसी हाई रिस्क है, पहले गर्भपात हो चुका है, ब्लीडिंग की दिक्कत है या डॉक्टर ने खानपान में खास सावधानी बरतने को कहा है, तो इन फलों को खाने से पहले सलाह जरूर लेनी चाहिए. 

इसे भी पढ़ें – Onion in Pocket Heat Stroke Myth: क्या जेब में प्याज रखने से लू नहीं लगती, जानें कितना असरदार है बुजुर्गों का यह तरीका?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp