सुबह की चाय या शाम की चाय? जानिए आपकी सेहत के लिए कौन-सा समय है सबसे बेहतर

सुबह की चाय या शाम की चाय? जानिए आपकी सेहत के लिए कौन-सा समय है सबसे बेहतर


Best Time To Drink Tea: कई लोगों का दिन चाय के बिना शुरू ही नहीं होता. सुबह आंख खुलते ही सबसे पहले चाय की याद आती है, तो कुछ लोग शाम की थकान दूर करने के लिए चाय का सहारा लेते हैं. भारत में चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा माना जाता है. घर की बातचीत हो, ऑफिस का ब्रेक हो या दोस्तों की मुलाकात, चाय हर मौके पर साथ नजर आती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चाय पीने का सही समय कौन-सा है? सुबह की चाय ज्यादा फायदेमंद होती है या शाम की? बता दें कि इस सवाल का जवाब आपकी जरूरत और शरीर की स्थिति पर निर्भर करता है. 

सुबह की चाय देती है एनर्जी

विशेषज्ञों के मुताबिक सुबह की चाय शरीर को जगाने और दिमाग को सक्रिय करने में मदद करती है. चाय में मौजूद कैफीन आपको तरोताजा महसूस करा सकती है और काम पर ध्यान लगाने में मदद कर सकती है. वहीं ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर के लिए फायदेमंद माने जाते हैं और यह मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने में भी मदद कर सकते हैं. साथ ही काली चाय और मसाला चाय भी सुबह ऊर्जा देने का काम करती हैं. 

लेकिन सिर्फ चाय पीना ही नहीं, उसे सही तरीके से पीना भी जरूरी है. डाइटिशियन के अनुसार, सुबह खाली पेट बहुत कड़क या तेज चाय नहीं पीनी चाहिए. ऐसा करने से कुछ लोगों को पेट में जलन, गैस या बेचैनी महसूस हो सकती है. इसलिए चाय को नाश्ते या किसी हल्के स्नैक के साथ लेना ही बेहतर माना जाता है. सुबह के समय अदरक वाली चाय, नींबू वाली चाय या दूसरी हर्बल चाय भी अच्छी मानी जाती हैं. ये शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ-साथ पाचन को भी बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं. इस तरह अगर चाय सही समय और सही तरीके से पी जाए तो यह दिन की अच्छी शुरुआत का हिस्सा बन सकती है. 

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शाम की चाय सुकून देती है

दिनभर की भागदौड़ के बाद शाम की चाय कई लोगों के लिए आराम का जरिया होती है. लेकिन विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शाम के समय ज्यादा कैफीन वाली चाय पीने से बचना चाहिए. साथ ही देर शाम कड़क चाय पीने से नींद पर असर पड़ सकता है और कुछ लोगों को बेचैनी भी महसूस हो सकती है.  ऐसे में हर्बल चाय बेहतर विकल्प मानी जाती है. वहीं कैमोमाइल टी, पेपरमिंट टी, लैवेंडर टी और तुलसी की चाय शाम के समय पी जा सकती है. इसके अलावा कैमोमाइल टी शरीर को आराम देने और अच्छी नींद में मदद कर सकती है. साथ ही पेपरमिंट टी पाचन को बेहतर बनाने और पेट फूलने जैसी समस्या को कम करने में मददगार मानी जाती है. तुलसी की चाय तनाव कम करने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में सहायक हो सकती है. 

आखिर चाय पीने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?

विशेषज्ञों का कहना है कि इसका कोई एक जवाब नहीं है. अगर आपको सुबह काम के लिए ऊर्जा और फोकस चाहिए तो सुबह की चाय आपके लिए बेहतर हो सकती है. वहीं अगर आप दिनभर की थकान के बाद आराम चाहते हैं तो शाम की हर्बल चाय अच्छा विकल्प हो सकती है.  बस सबसे जरूरी बात यह है कि चाय को सीमित मात्रा में ही पी जाए. बहुत ज्यादा चाय पीने से शरीर में पानी की कमी, एसिडिटी और नींद की परेशानी हो सकती है. इसलिए सही समय और सही मात्रा में पी गई चाय न सिर्फ स्वाद देती है, बल्कि आपकी दिनचर्या को भी बेहतर बना सकती है. 

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रात 9 बजे के बाद खाते हैं खाना, दिल को हो सकता है बड़ा नुकसान

रात 9 बजे के बाद खाते हैं खाना, दिल को हो सकता है बड़ा नुकसान


Late Night Eating Heart Health Side Effects : आज की बिजी और खराब लाइफस्टाइल में देर रात खाना खाना आम बात बन गई है. ऑफिस का काम, ट्रैफिक, मोबाइल और टीवी के बढ़ते यूज के कारण कई लोग रात 9 बजे के बाद ही डिनर कर पाते हैं. कुछ लोगों के लिए तो 10 से 11 बजे खाना खाना रोजमर्रा की आदत बन चुकी है.

यह आदत मामूली लग सकती है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात खाना खाने का असर सिर्फ पाचन तंत्र पर ही नहीं बल्कि दिल की सेहत पर भी पड़ सकता है. ऐसे में बहुत देर से खाना खाने पर शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिससे लंबे समय में कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आइए जानते हैं कि रात 9 बजे के बाद खाना खाने से दिल को क्या नुकसान हो सकता है. 

शरीर की बॉडी क्लॉक कैसे करती है काम?

हमारे शरीर में एक नेचुरल 24 घंटे की बॉडी क्लॉक होती है, जिसे सर्कैडियन रिदम कहा जाता है. यही क्लॉक यह तय करती है कि शरीर कब जागेगा, कब सोएगा, कब हार्मोन रिलीज होंगे और भोजन को कैसे पचाया जाएगा. रात होने पर शरीर की एक्टिविटी धीरे-धीरे कम होने लगती हैं. ब्लड प्रेशर नीचे आने लगता है और शरीर खुद को अगले दिन के लिए तैयार करता है, लेकिन अगर इस दौरान भारी खाना खा कर लिया जाए तो शरीर को आराम मिलने के बजाय अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है. 
 
देर रात खाना खाने से दिल को क्या नुकसान हो सकता है?
 
विशेषज्ञों का कहना है कि देर रात खाना खाने से पाचन तंत्र उस समय भी एक्टिव रहता है जब शरीर आराम की तैयारी कर रहा होता है. इससे शरीर का सामान्य संतुलन बिगड़ सकता है. रात में देर से खाना खाने से ब्लड प्रेशर लंबे समय तक ऊंचा रह सकता है. इसके अलावा शरीर में शुगर को कंट्रोल करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है. समय के साथ यह आदत हाई ब्लड प्रेशर, टाइप-2 डायबिटीज और हार्ट की बीमारियों के खतरे को बढ़ा सकती है. 
 
देर रात खाने और स्ट्रोक का क्या है संबंध?

कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि जो लोग रोजाना देर रात खाना खाते हैं, उनमें स्ट्रोक का खतरा ज्यादा हो सकता है. इसका एक कारण यह माना जाता है कि देर रात खाने से शरीर की बॉडी क्लॉक के काम करने में रुकावट आ सकती है और हार्ट से जुड़ी कई प्रक्रियाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, हालांकि सिर्फ एक-दो बार देर से खाना खाने से कोई बड़ा नुकसान नहीं होता है, लेकिन अगर यह रोज की आदत बन जाए तो जोखिम बढ़ सकता है. 

नींद की क्वालिटी भी हो सकती है खराब

देर रात खाना खाने का असर नींद पर भी पड़ता है. खाना खाने के तुरंत बाद सोने से एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स की समस्या हो सकती है. इसमें पेट का एसिड खाने की नली की तरफ आने लगता है, जिससे सीने में जलन और बेचैनी महसूस होती है, जब नींद बार-बार टूटती है या अच्छी नींद नहीं आती तो इसका सीधा असर दिल की सेहत पर पड़ सकता है. खराब नींद शरीर में सूजन बढ़ा सकती है और तनाव वाले हार्मोन्स का स्तर भी बढ़ा सकती है. 

रात में शरीर को क्यों चाहिए आराम?

दिनभर काम करने के बाद रात का समय शरीर की मरम्मत और रिकवरी के लिए बेहद जरूरी होता है. इसी दौरान शरीर के कई जरूरी अंग खुद को रिचार्ज करते हैं. सोते समय ब्लड प्रेशर सामान्य रूप से कम हो जाता है, तनाव हार्मोन घटने लगते हैं और शरीर को आराम मिलता है, लेकिन अगर रात में भारी खाना खाया जाए तो शरीर को खाना पचाने के लिए अतिरिक्त एनर्जी लगानी पड़ती है, जिससे रिकवरी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. 

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किन लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?

कुछ लोगों के लिए देर रात खाना खाना ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकता है.  इनमें हाई ब्लड प्रेशर के मरीज, डायबिटीज से पीड़ित लोग. मोटापे से जूझ रहे लोग, हार्ट हेल्थ के जोखिम वाले व्यक्ति और कोलेस्ट्रॉल की समस्या वाले लोग शामिल हैं. इन लोगों को अपने डिनर के समय और खाने की मात्रा पर विशेष ध्यान देना चाहिए. 

रात का खाना किस समय खाना सबसे बेहतर माना जाता है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह है कि रात का खाना शाम 7 से 8 बजे के बीच कर लेना चाहिए. इसके अलावा डिनर और सोने के समय के बीच कम से कम 2 से 3 घंटे का अंतर होना चाहिए. इससे खाने को पचने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और नींद भी बेहतर आती है. रात का खाना हल्का और संतुलित रखना बेहतर माना जाता है. डिनर में ज्यादा तला-भुना, ज्यादा तेल वाला या बहुत ज्यादा मीठा खाना खाने से बचना चाहिए.रात के खाने में दाल और सब्जियां, सलाद, मल्टीग्रेन रोटी, हल्की खिचड़ी, सूप और दही शामिल कर सकते हैं. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कम खाने से नहीं घटता वजन, मोटापे से जुड़े इन बड़े मिथकों का एक्सपर्ट ने बताया पूरा सच

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Common Obesity Myths Explained By Experts: मोटापा दुनिया की सबसे गलत समझी जाने वाली हेल्थ समस्याओं में से एक है. इसकी वजह यह नहीं है कि साइंस के पास जवाब नहीं हैं, बल्कि समस्या यह है कि वर्षों से चली आ रही गलत धारणाओं, भ्रामक डाइट सलाह और सामाजिक पूर्वाग्रहों ने सही जानकारी को पीछे धकेल दिया है. वॉय इंडिया (पूर्व में अर्लीफिट) की सह-संस्थापक और सीओओ सलोनी पालीवाल के अनुसार, मोटापे को लेकर कई ऐसे मिथक हैं जो न केवल गलत हैं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं.

क्या लाइफस्टाइल की वजह से ऐसा होता है?

सबसे बड़ा भ्रम यह है कि मोटापा केवल व्यक्ति की लाइफस्टाइल का परिणाम होता है. जबकि रिसर्च बताते हैं कि इसके पीछे जैनेटिक, हार्मोन, नींद, तनाव, आंतों के माइक्रोबायोम और पर्यावरण जैसे कई कारक मिलकर काम करते हैं.  यही कारण है कि एक जैसी डाइट और समान शारीरिक गतिविधि के बावजूद दो लोगों का वजन अलग-अलग हो सकता है. 

क्या कम खाने से यह ठीक हो जाता है?

दूसरा आम मिथक है कि “कम खाओ और ज्यादा चलो-फिरो” ही इसका समाधान है. सलोनी पालीवाल बताती हैं कि यह सलाह पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन मोटापे जैसी जटिल और लंबे समय तक चलने वाली बीमारी के इलाज के लिए पर्याप्त भी नहीं है. भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन और शरीर की मेटाबॉलिज्म इस प्रक्रिया को कहीं अधिक मुश्किल बनाते हैं.

क्या वजन कम न होना आपकी जिम्मेदारी है?

इसी तरह कई लोग मानते हैं कि वजन कम न कर पाने के पीछे इच्छाशक्ति की कमी जिम्मेदार होती है. जबकि घ्रेलिन, लेप्टिन, इंसुलिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन भूख और खाने की इच्छा को प्रभावित करते हैं. ऐसे में केवल और मेहनत करो कहना समस्या का समाधान नहीं है. एक्सपर्ट का कहना है कि हर मोटापा बाहर से दिखाई नहीं देताच कई लोगों में शरीर के अंदर अंगों के आसपास चर्बी जमा होती है, जिसे विसरल ओबेसिटी कहा जाता है. दक्षिण एशियाई आबादी में यह जोखिम विशेष रूप से अधिक देखा जाता है. इसलिए केवल वजन या बीएमआई के आधार पर स्वास्थ्य का आकलन करना पर्याप्त नहीं माना जाता. 

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क्या एक बार वजन घटने के बाद दोबारा बढ़ सकता है?

एक और बड़ी गलतफहमी यह है कि एक बार वजन घट जाने के बाद वह हमेशा कम बना रहता है. रिसर्च बताते हैं कि शरीर अपने पुराने वजन को बनाए रखने की कोशिश करता है, जिससे समय के साथ वजन दोबारा बढ़ने की संभावना रहती है. इसी वजह से मोटापे के लिए लंबे समय तक मेडिकल सहायता की जरूरत पड़ सकती है. जीएलपी-1 दवाओं जैसे सेमाग्लूटाइड और टिरजेपाटाइड को लेकर भी कई मिसकनसेप्शन हैं. हालांकि क्लीनिकल ट्रायल्स में इन दवाओं ने अच्छे परिणाम दिखाए हैं और ये भूख तथा मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करने में मदद करती हैं. एक्सपर्ट के अनुसार, इनका उपयोग आसान रास्ता चुनना नहीं, बल्कि सही तरीके से इलाज करवाना होता है. 

क्या मोटापा कोई बीमारी है?

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन, अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन और दुनिया की प्रमुख एंडोक्राइनोलॉजी संस्थाएं मोटापे को एक क्रॉनिक बीमारी मानती हैं. यह टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग, स्लीप एपनिया और कई प्रकार के कैंसर जैसी 200 से अधिक बीमारियों से जुड़ी हुई है. इसलिए मोटापे को केवल वजन बढ़ने की समस्या मानना सही नहीं है, बल्कि इसे एक गंभीर स्वास्थ्य स्थिति के रूप में समझना और समय रहते उपचार लेना जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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रात को सोते वक्त आपको भी आते हैं जमकर खर्राटें, ये तरीका आएगा काम

रात को सोते वक्त आपको भी आते हैं जमकर खर्राटें, ये तरीका आएगा काम


Sleeping Tips: अक्सर लोग खर्राटों की समस्या से परेशान रहते हैं लेकिन ज्यादातर इसे केवल गहरी और सुकून भरी नींद का संकेत मानकर इग्नोर कर देते हैं. जबकि, असल में ऐसा बिल्कुल नहीं है. रात को सोते समय तेजी से खर्राटे लेना न सिर्फ आपके साथ सोने वाले पार्टनर की नींद में खलल डालता है, बल्कि यह आपके खराब स्वास्थ्य की ओर भी इशारा करता है.

मेडिकल साइंस के अनुसार, जब सोते समय हमारे श्वसन तंत्र के ऊपरी हिस्से में हवा का प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता तो वहां की मांसपेशियां वाइब्रेट करने लगती हैं. इसी वाइब्रेशन से तेज आवाज निकलती है, जिसे हम खर्राटे कहते हैं. ऐसे में आइए अब जान लेते हैं कि खर्राटे आने के असली कारण क्या हैं और इनसे हमेशा के लिए छुटकारा कैसे पाया जा सकता है. 

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गलत पोजीशन में सोना- पीठ के बल लेटने पर जीभ और गले की मांसपेशियां पीछे की ओर झुक जाती हैं, जिससे सांस की नली आंशिक रूप से बंद हो जाती है.

बढ़ता हुआ वजन- गले और गर्दन के आसपास अतिरिक्त चर्बी (फैट) जमा होने से वायु मार्ग छोटा हो जाता है और खर्राटे आने लगते हैं. 

नाक की बनावट में गड़बड़ी- नाक की हड्डी का टेढ़ा होना या नाक के अंदर मांस बढ़ना हवा के रास्ते को रोकता है, जिससे खर्राटे आने की समस्या होने लगती है.

नशीले पदार्थों का सेवन- वहीं, सोने से ठीक पहले शराब पीना गले की मांसपेशियों को जरूरत से ज्यादा लूज कर देता है, जिससे रुकावट पैदा होती है और खर्राटे आने शुरू हो जाते हैं. 

सर्दी (क्रॉनिक साइनसाइटिस)- इसके साथ ही नाक बंद होने, एलर्जी या सर्दी-जुकाम के कारण व्यक्ति को मुंह से सांस लेनी पड़ती है, जो खर्राटे आने का बड़ा कारण बनती है.  

बढ़ती उम्र- वहीं, उम्र बढ़ने के साथ गले के ऊतक (टिशू) ढीले होने लगते हैं, जिससे खर्राटों की आवृत्ति (फ्रीक्वन्सी) बढ़ जाती है.

खर्राटों से ऐसे मिलेगा छुटकारा 

करवट लेकर सोएं- अगर आप चाहते हैं कि आपको खर्राटे न आएं तो कोशिश करें कि हमेशा बाईं या दाईं ओर करवट लेकर सोएं क्योंकि यह पोज सांस की नली को पूरी तरह खुला रखने में सहायक होता है. 

नियमित एक्सरसाइज- साथ ही रोज कम से कम 30 मिनट योग या कार्डियो वर्कआउट करें. जिससे वजन कम होने लगेगा और गले की मांसपेशियों का प्रेशर अपने आप कम हो जाएगा.

सिरहाना ऊंचा रखें- सोते समय एक अतिरिक्त तकिया लगाकर अपने सिर को करीब 4 इंच ऊपर उठाएं. इससे ग्रैविटी के कारण सांस की नली ब्लॉक नहीं होती.

हाइड्रेटेड रहें- इसके साथ ही दिनभर में 8 से 10 गिलास पानी जरूर पिएं. क्योंकि शरीर में पानी की कमी से नाक और गले के अंदर का बलगम चिपचिपा होकर रुकावट पैदा करता है. 

सोने से पहले भाप लें- अगर आपकी नाक बंद रहती है, तो रात को बिस्तर पर जाने से पहले गर्म पानी की भाप (स्टीम) लें.

एंटी-स्नोरिंग गैजेट्स- इसके अलावा डॉक्टर की सलाह पर आप नेजल स्ट्रिप्स या सीपैप मशीन का उपयोग कर सकते हैं, जो वायु मार्ग को साफ रखती हैं

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ये चीजें रोज खाते हैं तो तुरंत छोड़ दीजिए, गिर जाएगा टेस्टोस्टेरोन और कम हो जाएगी कामेच्छा

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Foods That May Lower Testosterone Levels: पुरुषों की सेहत में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. यह न केवल मसल्स की ताकत और एनर्जी को प्रभावित करता है, बल्कि फिजिकल रिलेशन में बहुत अहम रोल प्ले करता है. एक्सपर्ट के अनुसार, शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम होने पर मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, मेटाबॉलिक सिंड्रोम, हार्ट रोग और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. हालांकि उम्र, लाइफस्टाइल और हेल्थ रिलेटेड कई चीजें टेस्टोस्टेरोन को प्रभावित करते हैं, लेकिन कुछ ऐसी खाने-पीने की चीजें भी हैं जिनका अधिक सेवन इस हार्मोन के स्तर को प्रभावित कर सकता है.  चलिए उनके बारे में आपको बताते हैं. 

पुदीना

हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट healthline के एक्सपर्ट के अनुसार, पुदीना यानी मिंट से बनी कुछ चीजें टेस्टोस्टेरोन पर असर डाल सकती हैं. एक 12 सप्ताह के अध्ययन में पाया गया कि नियमित रूप से स्पीयरमिंट हर्बल टी पीने वाले लोगों में टेस्टोस्टेरोन के स्तर में गिरावट देखी गई. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि इस विषय पर और अधिक रिसर्च की आवश्यकता है.

मुलेठी की जड़

इसी तरह मुलेठी की जड़ को लेकर भी कई स्टडी सामने आए हैं. वर्ष 2003 के एक अध्ययन में 25 पुरुषों को प्रतिदिन 7 ग्राम मुलेठी की जड़ दी गई, जिसके बाद केवल एक सप्ताह में टेस्टोस्टेरोन स्तर में लगभग 26 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. 

अलसी के बीज

अलसी के बीज  को आमतौर पर सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है, लेकिन कुछ रिसर्च में यह भी संकेत मिला है कि इनमें मौजूद लिग्नान नामक तत्व टेस्टोस्टेरोन को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया को बढ़ा सकते हैं. प्रोस्टेट कैंसर से जुड़े एक स्टडी में भी इसके प्रभाव देखे गए थे.

प्रोसेस्ड फूड्स

प्रोसेस्ड फूड्स में पाए जाने वाले ट्रांस फैट्स भी चिंता का विषय हैं. 209 पुरुषों पर किए गए एक स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों ने सबसे ज्यादा ट्रांस फैट का सेवन किया, उनके टेस्टोस्टेरोन का स्तर अन्य लोगों की तुलना में करीब 15 प्रतिशत कम था.

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शराब का भी अहम रोल

शराब का अधिक सेवन भी हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ सकता है. 2004 के एक अध्ययन में पाया गया कि लगातार तीन सप्ताह तक रोजाना 30 से 40 ग्राम अल्कोहल लेने वाले पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर 6.8 प्रतिशत तक घट गया.

इनसे भी हो सकती है दिक्कत

इसके अलावा कुछ अध्ययनों में अखरोट और बादाम जैसे कुछ नट्स के टेस्टोस्टेरोन पर प्रभाव की भी चर्चा की गई है. हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि इन निष्कर्षों को अंतिम नहीं माना जा सकता. इसलिए किसी भी खाद्य पदार्थ को पूरी तरह छोड़ने से पहले डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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दस्त के साथ भयंकर कब्ज को न करें इग्नोर, हो सकता है कैंसर का संकेत, जानें लक्षण

दस्त के साथ भयंकर कब्ज को न करें इग्नोर, हो सकता है कैंसर का संकेत, जानें लक्षण


Why Watery Diarrhoea Happens After Constipation: अगर आपको कभी ऐसा महसूस हुआ है कि पहले पानी जैसे दस्त हुए और फिर कई दिनों तक कब्ज बनी रही, तो इसे सामान्य डाइजेशन समस्या समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. यह स्थिति भले ही उलझन पैदा करती हो, लेकिन एक्सपर्ट के अनुसार इसके पीछे एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या छिपी हो सकती है, जिसे समय रहते पहचानना बेहद जरूरी है.

ओवरफ्लो डायरिया की दिक्कत

लेक एरी कॉलेज ऑफ ऑस्टियोपैथिक मेडिसिन से बोर्ड-सर्टिफाइड गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ सालहाब ने हाल ही में इस विषय पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि कई बार व्यक्ति को दस्त जैसा महसूस होता है, जबकि वास्तव में वह गंभीर कब्ज से जूझ रहा होता है. इस स्थिति को मेडिकल भाषा में ओवरफ्लो डायरिया कहा जाता है. 

क्या हो सकती है इससे दिक्कत?

डॉ. जोसेफ सालहाब के अनुसार, ओवरफ्लो डायरिया सुनने में भले ही दस्त जैसी समस्या लगे, लेकिन यह वास्तव में कब्ज का ही एक रूप है. उन्होंने बताया कि जब बड़ी आंत में लंबे समय तक सख्त मल जमा रहता है और वह बाहर नहीं निकल पाता, तब केवल पानी उस मल के आसपास से रास्ता बनाकर बाहर निकलता है. चूंकि इस पानी का कोई ठोस आकार नहीं होता, इसलिए यह दस्त जैसा दिखाई देता है. कई दिनों तक मल त्याग न होने के बाद अचानक पानी जैसे दस्त होना इसी स्थिति का संकेत हो सकता है.

किन लक्षणों को नहीं करना चाहिए इग्नोर?

एक्सपर्ट का कहना है कि इस समस्या के साथ पेट दर्द, पेट फूलना, मतली, मल का रिसाव और बार-बार पतले दस्त जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं. ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. गंभीर मामलों में अस्पताल में जांच की आवश्यकता पड़ सकती है, जिसमें शारीरिक परीक्षण, पेट का एक्स-रे, सीटी स्कैन, ब्लड टेस्ट और अन्य जांच शामिल हो सकती हैं. 

 

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कैंसर की भी हो सकती है दिक्कत

एक्सपर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि कुछ मामलों में कोलन कैंसर भी ओवरफ्लो डायरिया जैसे लक्षणों के रूप में सामने आ सकता है. कोलन में सिकुड़न या रुकावट बनने के कारण कब्ज और दस्त दोनों जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं. यदि इसके साथ वजन तेजी से कम होना, मल में खून आना, एनीमिया, तेज पेट दर्द, उल्टी या लगातार बढ़ती कब्ज जैसे लक्षण दिखें तो इन्हें बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. डॉ. जोसेफ सालहाब का कहना है कि ऐसे लक्षणों का इलाज खुद करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.  अगर समस्या लगातार बनी रहे या गंभीर हो, तो सही जांच और चिकित्सा सलाह लेना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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