हार्ट की यह मशहूर दवा आपको बना सकती है ‘किडनी’ का मरीज, 9 लाख लोगों पर हुई रिसर्च में खुलासा

हार्ट की यह मशहूर दवा आपको बना सकती है ‘किडनी’ का मरीज, 9 लाख लोगों पर हुई रिसर्च में खुलासा


Does Rosuvastatin Cause Kidney Problems: दुनियाभर में कोलेस्ट्रॉल कम करने और हार्ट को सुरक्षित रखने के लिए स्टैटिन दवाओं का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है. इन्हीं में से एक है रोसुवास्टेटिन, जिसे काफी प्रभावी माना जाता है. लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस दवा को लेकर एक अहम चिंता सामने रखी है, जो किडनी से जुड़ी है. चलिए आपको बताते हैं कि यह चिंता क्या है और इससे आपकी किडनी पर कितना असर देखने को मिलेगा. 

क्या होती है इससे दिक्कत?

अमेरिका के जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के रिसर्चर द्वारा की गई इस स्टडी में रोसुवास्टेटिन के किडनी पर असर को विस्तार से समझने की कोशिश की गई. दरअसल, जब इस दवा को पहली बार यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने मंजूरी दी थी, तब शुरुआती टेस्ट में कुछ मरीजों में किडनी से जुड़े संकेत दिखे थे, जैसे यूरिन में खून और यूरिन में प्रोटीन.  इन संकेतों का मतलब यह होता है कि किडनी सही तरीके से काम नहीं कर रही है. हालांकि, दवा के इस्तेमाल के बाद लंबे समय तक बड़े स्तर पर इस पर ज्यादा रिसर्च नहीं हुई थी. ऐसे में इस नई स्टडी ने इस कमी को पूरा करने की कोशिश की. 

क्या निकला रिजल्ट?

इस शोध में करीब 9 लाख से ज्यादा लोगों के हेल्थ रिकॉर्ड का एनालिसिस किया गया. इनमें से लगभग 1.5 लाख लोग रोसुवास्टेटिन ले रहे थे, जबकि करीब 8 लाख लोग दूसरी स्टैटिन दवा एटोरवास्टेटिन का इस्तेमाल कर रहे थे. तीन साल तक इन सभी मरीजों की किडनी हेल्थ पर नजर रखी गई. स्टडी के नतीजे चौंकाने वाले रहे। रोसुवास्टेटिन लेने वाले करीब 2.9 प्रतिशत लोगों के पेशाब में खून पाया गया, जबकि 1 प्रतिशत लोगों में पेशाब के जरिए प्रोटीन निकलने की समस्या सामने आई. जब इसकी तुलना एटोरवास्टेटिन लेने वालों से की गई, तो रोसुवास्टेटिन लेने वालों में यह खतरा ज्यादा पाया गया.

इसे भी पढ़ें  –  Side Effects Of Birth Control Pills: क्या प्रेग्नेंसी रोकने वाली दवाइयों से हो जाता है कैंसर, जानें कितनी सच है यह बात?

किन चीजों का खतरा?

रिसर्च के मुताबिक, रोसुवास्टेटिन लेने वालों में हेमेट्यूरिया का खतरा 8 प्रतिशत और प्रोटीन्यूरिया का खतरा 17 प्रतिशत ज्यादा था. इतना ही नहीं, गंभीर किडनी फेल्योर का जोखिम भी करीब 15 प्रतिशत ज्यादा देखा गया, जिसमें डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है. सबसे ज्यादा चिंता की बात यह रही कि जैसे-जैसे दवा की डोज बढ़ाई गई, जोखिम भी बढ़ता गया. यानी ज्यादा मात्रा में रोसुवास्टेटिन लेने वाले मरीजों में किडनी से जुड़ी समस्याएं ज्यादा देखी गईं. 

इतना ही नहीं, स्टडी में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों की किडनी पहले से कमजोर थी, उन्हें भी कई बार इस दवा की ज्यादा डोज दी जा रही थी, जो कि यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की सिफारिशों के खिलाफ है. दिलचस्प बात यह है कि दिल की सुरक्षा के मामले में रोसुवास्टेटिन और एटोरवास्टेटिन दोनों ही समान रूप से प्रभावी पाए गए. यानी दोनों दवाएं हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को कम करने में बराबर काम करती हैं.

इसे भी पढ़ें- Vitamin Side Effects: सावधान! बिना डॉक्टरी सलाह के यह विटामिन लेना पड़ सकता है भारी, जा सकती है आंखों की रोशनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

आपके लिवर को भी ‘पत्थर’ बना रही डायबिटीज, हर 4 में से एक मरीज को है फाइब्रोसिस का खतरा

आपके लिवर को भी ‘पत्थर’ बना रही डायबिटीज, हर 4 में से एक मरीज को है फाइब्रोसिस का खतरा


One In Four Diabetics Have Liver Fibrosis Study: भारत में डायबिटीज को अब सिर्फ ब्लड शुगर तक सीमित बीमारी मानना गलत साबित हो रहा है. 2026 की एक मल्टीसेंटर स्टडी, DiaFib-Liver Study ने इस धारणा को चुनौती दी है. स्टडी में सामने आया कि देश में टाइप-2 डायबिटीज से जूझ रहे हर चार में से एक एडल्ट में लीवर फाइब्रोसिस यानी लीवर पर गंभीर स्कारिंग मौजूद है. इतना ही नहीं, हर 20 में से एक मरीज में सिरोसिस का खतरा भी पाया गया है.

क्या निकला स्टडी में?

यह स्टडी बताती है कि डायबिटीज अब सिर्फ आंख, किडनी और नसों तक सीमित नहीं रही, बल्कि लीवर की बीमारी को भी इसकी चौथी बड़ी दिक्कत के रूप में देखा जाना चाहिए. रिसर्च में खासतौर पर मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज पर फोकस किया गया है, जिसे पहले फैटी लिवर के नाम से जाना जाता था. MASLD की समस्या तब शुरू होती है जब शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है और अतिरिक्त फैट लीवर में जमा होने लगता है. धीरे-धीरे यही फैट सूजन पैदा करता है और आगे चलकर फाइब्रोसिस का रूप ले लेता है, जिसमें लीवर के स्वस्थ टिश्यू की जगह स्कार टिश्यू बनने लगता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. कपिल शर्मा ने TOI को बताया कि टाइप-2 डायबिटीज में शरीर में फैट और ग्लूकोज का असंतुलन लीवर को भी प्रभावित करता है. आंकड़ों के अनुसार, करीब 70 प्रतिशत डायबिटीज मरीजों के लीवर में फैट जमा हो जाता है, जो समय के साथ सूजन और फाइब्रोसिस में बदल सकता है. डॉक्टर बताते हैं कि इस बीमारी के कई रिस्क फैक्टर हैं, जैसे मोटापा, खराब शुगर कंट्रोल, हाई ट्राइग्लिसराइड्स और मेटाबोलिक सिंड्रोम. खास बात यह है कि कई मामलों में लीवर की बीमारी बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ती रहती है, जिससे खतरा और बढ़ जाता है.

इसे भी पढ़ें- BA.3.2 Covid Variant: कैसे हैं Cicada कोविड स्ट्रेन के लक्षण, जिसकी वजह से तेजी से बढ़ रहे कोरोना के केस?

सिर्फ फैट जमा होना उतना खतरनाक नहीं

रिसर्च में यह भी जोर दिया गया है कि सिर्फ फैट जमा होना उतना खतरनाक नहीं होता, जितना कि फाइब्रोसिस. क्योंकि फाइब्रोसिस यह संकेत देता है कि बीमारी गंभीर स्तर पर पहुंच चुकी है और आगे चलकर सिरोसिस, लीवर फेलियर और यहां तक कि मौत का जोखिम भी बढ़ सकता है. इसीलिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि डायबिटीज मरीजों में सिर्फ फैटी लिवर की जांच ही नहीं, बल्कि फाइब्रोसिस की पहचान पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए. इसके लिए नियमित जांच जैसे लिवर एंजाइम टेस्ट और फाइब्रोस्कैन कराना जरूरी है, ताकि बीमारी को शुरुआती चरण में ही पकड़ा जा सके.

क्या है बचाव का तरीका?

बचाव के लिए डॉक्टर वजन नियंत्रित रखने, संतुलित आहार लेने, नियमित एक्सरसाइज करने और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट व शराब से दूरी बनाने की सलाह देते हैं. इसके साथ ही, ब्लड शुगर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल में रखना भी जरूरी है.

इसे भी पढ़ें- Heart Blockage Symptoms: धमनियों में जमा प्लाक बढ़ा सकता है मुसीबत, कार्डियोलॉजिस्ट से जानें हार्ट ब्लॉकेज की वॉर्निंग

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

पानी नहीं, ये है मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह; गाइनेकोलॉजिस्ट से जानें आसान उपाय

पानी नहीं, ये है मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह; गाइनेकोलॉजिस्ट से जानें आसान उपाय


Menopause bloating causes : मेनोपॉज के दौरान कई महिलाओं को शरीर में सूजन, फूला हुआ महसूस होना और भारीपन जैसी समस्याएं होने लगती हैं. अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि यह बहुत पानी पीने की वजह से हो रहा है, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो यह गलत है. असल में मेनोपॉज के समय शरीर में पानी रोकने की समस्या हार्मोनल और मिनरल बदलावों की वजह से होती है, पानी ज्यादा पीने की वजह से नहीं, डाइटिशियन के अनुसार, मेनोपॉज में पानी रोकना बहुत पानी पीने की समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के संतुलन का मामला है. तो आइए जानते हैं कि मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह क्या है और इसे कम करने के आसान उपाय क्या है. 

मेनोपॉज में ब्लोटिंग की असली वजह क्या है?

मेनोपॉज में ब्लोटिंग मुख्य रूप से हार्मोन और मिनरल संतुलन में बदलाव की वजह से होती है. जैसे-जैसे ईस्ट्रोजन घटता है, यह किडनी और रीनिन-एंजियोटेंसिन सिस्टम को प्रभावित करता है, जिससे शरीर अस्थायी रूप से पानी रोक सकता है. वहीं, प्रोजेस्टेरोन, जिसका हल्का डाइयूरेटिक प्रभाव होता है, कम होने पर सूजन और भारीपन बढ़ा सकता है. इसके अलावा, सोडियम की अधिकता शरीर को पानी रोकने के लिए मजबूर करती है, जबकि पोटैशियम और मैग्नीशियम का सही संतुलन कोशिकाओं में पानी बनाए रखने, किडनी को मदद देने और मांसपेशियों को आराम देने में सहायक होता है. मेनोपॉज के दौरान डाइट, तनाव और मेटाबॉलिक बदलाव इन मिनरल्स के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं, जिससे ब्लोटिंग और फूलेपन की समस्या और बढ़ जाती है. 

इसे भी पढ़ें- Old Antibiotics : दोबारा काम करने लायक कैसे बनती हैं पुरानी एंटीबायोटिक्स, क्या है इसका तरीका?

ब्लोटिंग कम करने के आसान  उपाय 

1. हाइड्रेशन – पर्याप्त पानी पीना शरीर को बताता है कि इसे पानी रोकने की जरूरत नहीं है. दिनभर नियमित रूप से पानी पीना, कम पानी पीने से बेहतर है. 

2. पोटैशियम से भरपूर डाइट – केले, नारियल पानी, पालक, और दालें खाने से सोडियम के कारण पानी रोकने की समस्या कम होती है. 

3. मैग्नीशियम से भरपूर डाइट – नट्स, बीज, साबुत अनाज और हरी पत्तेदार सब्जियां मांसपेशियों को आराम देती हैं, सूजन घटाती हैं और इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखती हैं. 

4. सोडियम कम करना, पूरी तरह नहीं – घर में बना हुआ खाना पूरी तरह बिना नमक का करना जरूरी नहीं है. प्रोसेस्ड और पैक्ड फूड्स जो सोडियम से भरपूर होते हैं, उन्हें कम करना ज्यादा असरदार होता है. 

5. फिजिकल एक्टिविटी – नियमित वॉकिंग और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग से ब्लोटिंग कम होती है और शरीर में सर्कुलेशन बेहतर होता है. 

6. स्ट्रेस और नींद – अच्छी नींद और तनाव प्रबंधन भी पानी रोकने की समस्या को कम करने में मदद करता है.

कब लेनी चाहिए डॉक्टर की सलाह?

 माइल्ड ब्लोटिंग या हल्की सूजन आम है, लेकिन अगर यह लगातार बनी रहे या बढ़ जाए, तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है. जैसे अचानक या दर्द वाली सूजन, सिर्फ एक अंग में सूजन या सांस लेने में दिक्कत, तेज वजन बढ़ना या थकान  ऐसी स्थिति में पानी रोकना किसी अन्य समस्या जैसे थायरॉइड, किडनी, दिल की बीमारी या दवा के साइड इफेक्ट का संकेत हो सकता है. अगर सूजन लगातार बनी रहे या अन्य लक्षणों के साथ हो, तो ब्लड टेस्ट और हार्ट या किडनी की जांच जरूर कराएं. 

इसे भी पढ़ें-  Health Checkup Routine : कितने समय में कराना चाहिए हेल्थ चेक-अप? डॉक्टरों ने उम्र के हिसाब से बताया पूरा प्लान

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

इच्छामृत्यु से पहले हरीश राणा ने दान किए हार्ट वॉल्व और कॉर्निया, इन्हें कैसे किया गया ट्रांसप्

इच्छामृत्यु से पहले हरीश राणा ने दान किए हार्ट वॉल्व और कॉर्निया, इन्हें कैसे किया गया ट्रांसप्


Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

गर्मियां शुरू होते ही नाक से निकलने लगता है खून, जानें कब नॉर्मल और कब खतरनाक

गर्मियां शुरू होते ही नाक से निकलने लगता है खून, जानें कब नॉर्मल और कब खतरनाक


Nose Bleeding: मार्च और अप्रैल का सुहाना समय खत्म होते ही तेज गर्मी कभी भी दस्तक दे सकती है. ऐसे में यह बात अभी से लोगों को परेशान करने लगी है. इस मौसम के आते ही सेहत को कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं. कई लोगों को नाक से खून आने की भी परेशानी होती है. यह समस्या खासकर तब बढ़ जाती है, जब तापमान तेजी से बढ़ने लगता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि नाक से खून आना सिर्फ गर्मी का असर नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है?

इसके पीछे क्या कारण है?

नाक के अंदर की त्वचा बहुत पतली और संवेदनशील (Sensitive) होती है. इसमें छोटे-छोटे रक्त वाहिकाएं (vessels) होती हैं, जो सूखने पर कभी भी फट सकती हैं. इसके सूखने के पीछे गर्म हवाएं और कम नमी को कारण माना जाता है, जो त्वचा को बहुत खुष्क बना देता है. जोर से खांसने या छींकने पर ये नसें फट सकती हैं, जिससे खून आ सकता है. इसके अलावा एलर्जी, साइनस या अंदर लगी चोट भी इसका कारण हो सकती है. कुछ लोगों में हाई ब्लड प्रेशर या बिना डॉक्टर की सलाह के ली गई दवाएं भी नाक से खून आने की वजह बन सकती हैं

यह भी पढ़ें – COVID In Children: हेल्दी किड्स को शिकार बना रहा कोविड का नया वैरिएंट सिकाडा, कितने सेफ हैं भारत के बच्चे?

नाक से खून आने पर क्या करें

  • सिर को थोड़ा ऊपर की ओर रखें, ताकि खून गले में न जाए.
  • नाक को हल्के से दबाकर रखें, इससे खून रुकने में मदद मिलती है.
  • नाक या गर्दन पर ठंडा पानी या कपड़ा रखें, इससे खून धीरे-धीरे रुक सकता है.
  • कमरे की हवा में नमी बनाए रखें, ताकि नाक अंदर से ज्यादा न सूखे.
  • अगर यह समस्या बार-बार हो या ज्यादा खून आए, तो डॉक्टर को जरूर दिखाएं.

नाक से खून आने पर  डॉक्टर को कब दिखाएं

  • अगर खून 30 मिनट से ज्यादा समय तक बंद न हो या बहुत ज्यादा बह रहा हो.
  • अगर खून गले तक आने लगे या निगलने जैसा लगे.
  • अगर नाक या सिर में चोट लगने के बाद खून आ रहा हो.
  • अगर बार-बार नाक से खून आता हो (हफ्ते में दो बार से ज्यादा).
  • अगर आप कोई दवा ले रहे हों या परिवार में पहले भी यह समस्या रही हो.

यह भी पढ़ें – Lung Cancer Early Signs: 3 हफ्ते से ज्यादा रहने वाली खांसी सामान्य नहीं, फेफड़ों के कैंसर के ये संकेत न करें नजरअंदाज

 

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

किस बीमारी से जूझ रही है वरुण धवन की बेटी, जानें इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?

किस बीमारी से जूझ रही है वरुण धवन की बेटी, जानें इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?


Varun Dhawan Daughter DDH Disease: बॉलीवुड के फेमस एक्टर वरुण धवन ने हाल ही में अपनी बेटी की एक स्वास्थ्य समस्या के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि उनकी बेटी को हिप डिस्प्लेसिया यानी डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) है. यह खबर सुनते ही लोगों में इस बीमारी के बारे में जानने की इच्छा बढ़ गई.

यह समस्या बहुत आम नहीं मानी जाती, लेकिन यह बच्चों में होने वाली हिप जॉइंट (hip joint) की एक गंभीर समस्या है. अगर समय पर इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह बच्चे की चलने-फिरने की क्षमता पर असर डाल सकती है और भविष्य में दर्द, चलने में परेशानी या जल्दी गठिया (arthritis) जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि DDH क्या है, इसके लक्षण, कारण और इलाज कैसे किया जाता है. यह कितनी खतरनाक है. 

DDH क्या है?

डिवेलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ द हिप (DDH) एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे की हिप जॉइंट सही तरीके से विकसित नहीं होती है. सामान्य स्थिति में, जांघ की हड्डी का ऊपर वाला हिस्सा हिप सॉकेट में मजबूती से फिट होता है. DDH में यह फिटिंग ढीली, अस्थिर या कभी-कभी पूरी तरह से डिस्लोकेट (dislocated) हो जाती है. यह समस्या जन्म के समय हमेशा दिखती नहीं है, इसलिए बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो बच्चे नॉर्मल लाइफ जी सकते हैं और चलने-फिरने में कोई दिक्कत नहीं होती है. 

यह बीमारी कितनी आम है?

दुनियाभर में करीब 0.5 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत बच्चों को यह समस्या होती है. कुछ मामलों में हल्की अस्थिरता अपने आप ठीक हो जाती है, जबकि कुछ बच्चों को इलाज की जरूरत पड़ती है. भारत में हर 1000 बच्चों में 0 से 2.6 मामलों की संभावना होती है. यह आंकड़ा सही से पता नहीं होता, क्योंकि हल्के मामलों में यह अनदेखी हो जाती है. इस बीमारी से लड़कियां, पहली बार जन्मे बच्चे, ब्रीच पोजीशन में जन्मे बच्चे या परिवार में किसी को DDH का इतिहास वाले लोग ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं. भारत में ज्यादातर बच्चे 1 या 2 साल की उम्र में ही डायग्नोस होते हैं, जो सही उम्र से काफी लेट है. इसलिए न्यू बोर्न बेबी की समय पर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है ताकि समस्या का सही समय पर पता चल सके और इलाज शुरू हो सके. 

यह भी पढ़ें – Health Checkup Routine : कितने समय में कराना चाहिए हेल्थ चेक-अप? डॉक्टरों ने उम्र के हिसाब से बताया पूरा प्लान

इसके लक्षण और यह कितनी खतरनाक?

न्यू बोर्न बेबी में अक्सर नियमित चेकअप के दौरान डॉक्टर इस समस्या को पहचान लेते हैं. बच्चे के पेरेंट्स अक्सर शुरू में कोई संकेत नहीं देखते है. थोड़े बड़े बच्चों में पैरों की लंबाई असमान होना, एक पैर का सीमित हिलना या घुटनों के मुड़ने में दिक्कत और जांघ के झुर्री (thigh folds) में असमानता दिखाई दे सकते हैं. देर से पता चलने वाले मामलों में बच्चे देर से चलना शुरू करते हैं, लंपिंग करते हैं, असामान्य चाल रखते हैं या एक पैर छोटा दिख सकता है. 

DDH का इलाज

DDH का इलाज संभव है और यह अक्सर पूरी तरह ठीक हो जाता है, खासकर अगर समय पर पहचान हो. न्यू बोर्न बेबी का इलाज सॉफ्ट ब्रेस का यूज करके हिप को सही जगह पर रखा जाता है ताकि हिप सामान्य रूप से विकसित हो. वहीं 6 महीने से 2 साल के बच्चे का इलाज क्लोज्ड रिडक्शन (closed reduction) से किया जाता है, यानी बिना ऑपरेशन के हिप को सही जगह पर लाया जाता है. इसके बाद कास्ट में रखा जाता है. 2 साल से बड़े बच्चों में सर्जरी की जरूरत हो सकती है, जिसमें हिप को सही स्थिति में लाया जाता है. अगर समय पर इलाज किया जाए तो ज्यादातर बच्चों को सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है. 

यह भी पढ़ें – Gut Health Tips: पेट की परेशानी को कहें अलविदा, रात में अपनाएं ये 10 आदतें, गट हेल्थ होगी बेहतर

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp