शरीर के इन हिस्सों में हो रहा तेज दर्द तो समझ जाएं बढ़ गया कोलेस्ट्रॉल, 99 पर्सेंट लोग कर देते हैं इग्नोर

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कंप्यूटर से भी तेज चाहते हैं बच्चों का दिमाग? तो आज से डाइट में देना शुरू कर दें ये ड्राईफ्रूट्स

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बादाम: बादाम बच्चों की मेमोरी और कॉन्सन्ट्रेशन के लिए सबसे पावरफुल ड्राईफ्रूट माना जाता है. इसमें विटामिन E और ओमेगा-3 फैटी एसिड्स होते हैं, जो ब्रेन सेल्स को एक्टिव रखते हैं. रोज़ाना 4–5 भीगे बादाम बच्चों को देने से उनका दिमाग और आंखें दोनों हेल्दी रहते हैं.

अखरोट: अखरोट को ‘ब्रेन फूड’ कहा जाता है क्योंकि इसका शेप भी दिमाग जैसा होता है. इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड्स और DHA भरपूर मात्रा में होता है, जो बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता और प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स को बढ़ाता है.

अखरोट: अखरोट को ‘ब्रेन फूड’ कहा जाता है क्योंकि इसका शेप भी दिमाग जैसा होता है. इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड्स और DHA भरपूर मात्रा में होता है, जो बच्चों की सोचने-समझने की क्षमता और प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल्स को बढ़ाता है.

काजू: काजू सिर्फ स्वाद में ही नहीं बल्कि एनर्जी देने में भी बेस्ट है. इसमें आयरन और मैग्नीशियम होता है, जो बच्चों के मूड को अच्छा करता है और थकान दूर करता है. पढ़ाई के लंबे सेशन के बाद काजू बच्चों की एनर्जी को रीचार्ज करने का आसान तरीका है.

काजू: काजू सिर्फ स्वाद में ही नहीं बल्कि एनर्जी देने में भी बेस्ट है. इसमें आयरन और मैग्नीशियम होता है, जो बच्चों के मूड को अच्छा करता है और थकान दूर करता है. पढ़ाई के लंबे सेशन के बाद काजू बच्चों की एनर्जी को रीचार्ज करने का आसान तरीका है.

पिस्ता: पिस्ता बच्चों की मेमोरी और सीखने की क्षमता को बेहतर बनाता है. इसमें विटामिन B6 और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो नर्वस सिस्टम को मजबूत करते हैं. रोज़ थोड़े-से पिस्ता खाने से बच्चों की कंसन्ट्रेशन पावर बढ़ती है.

पिस्ता: पिस्ता बच्चों की मेमोरी और सीखने की क्षमता को बेहतर बनाता है. इसमें विटामिन B6 और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो नर्वस सिस्टम को मजबूत करते हैं. रोज़ थोड़े-से पिस्ता खाने से बच्चों की कंसन्ट्रेशन पावर बढ़ती है.

किशमिश: किशमिश में ग्लूकोज़ और आयरन होता है, जो बच्चों को तुरंत एनर्जी देता है. ये उनकी फोकस करने की क्षमता को बेहतर बनाता है और याददाश्त मजबूत करता है. साथ ही मीठा खाने की क्रेविंग भी हेल्दी तरीके से पूरी होती है.

किशमिश: किशमिश में ग्लूकोज़ और आयरन होता है, जो बच्चों को तुरंत एनर्जी देता है. ये उनकी फोकस करने की क्षमता को बेहतर बनाता है और याददाश्त मजबूत करता है. साथ ही मीठा खाने की क्रेविंग भी हेल्दी तरीके से पूरी होती है.

मखाना: मखाना बच्चों के लिए परफेक्ट स्नैक है. इसमें प्रोटीन और कैल्शियम होता है, जो न सिर्फ दिमाग बल्कि हड्डियों को भी मजबूत बनाता है. तैलीय स्नैक्स की जगह मखाना देने से बच्चों का ब्रेन और बॉडी दोनों फिट रहते हैं.

मखाना: मखाना बच्चों के लिए परफेक्ट स्नैक है. इसमें प्रोटीन और कैल्शियम होता है, जो न सिर्फ दिमाग बल्कि हड्डियों को भी मजबूत बनाता है. तैलीय स्नैक्स की जगह मखाना देने से बच्चों का ब्रेन और बॉडी दोनों फिट रहते हैं.

Published at : 21 Aug 2025 05:39 PM (IST)


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ये 2 ब्लड टेस्ट करा लिए तो दशकों पहले पता लग जाएंगी दिल की बीमारियां, डॉक्टर भी देते हैं सलाह

ये 2 ब्लड टेस्ट करा लिए तो दशकों पहले पता लग जाएंगी दिल की बीमारियां, डॉक्टर भी देते हैं सलाह


अमेरिका में दिल की बीमारी आज भी सबसे खतरनाक बीमारी बनी हुई है. हर साल लाखों लोग इसकी वजह से अपनी जान गंवाते हैं. साल 2022 में करीब 10 लाख अमेरिकियों की मौत दिल की बीमारी से हुई, यानी हर 34 सेकंड में एक व्यक्ति की जान गई. ये आंकड़ा वाकई डराने वाला है. और भी चिंता की बात ये है कि आधे से ज्यादा अमेरिकी वयस्क किसी न किसी तरह की दिल की बीमारी से जूझ रहे हैं, भले ही उन्हें इसका पता हो या न हो. इसके पीछे कई कारण हैं – हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह, धूम्रपान और आनुवंशिक कारण. खास तौर पर हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक 18 करोड़ से ज्यादा अमेरिकी हाई ब्लड प्रेशर और मोटापे से प्रभावित होंगे, और मधुमेह के मामले भी बढ़ेंगे. हाल ही में अमेरिकी कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. एलो ने इंस्टाग्राम पर दो ब्लड टेस्ट के बारे में बताया, जिनसे दशकों पहले ही दिल की बीमारी के खतरे का पता लगाया जा सकता है. आइए, जानते हैं कि ये टेस्ट क्या हैं और इनका महत्व क्या है?

कोलेस्ट्रॉल टेस्ट

जब आप कोलेस्ट्रॉल टेस्ट करवाते हैं, तो डॉक्टर आपके खून में कुल कोलेस्ट्रॉल, LDL (खराब कोलेस्ट्रॉल), HDL (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) और ट्राइग्लिसराइड्स की जांच करते हैं.

खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL)

लंबे समय से माना जाता रहा है कि LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल दिल और दिमाग की नसों को बंद करके हार्ट अटैक और स्ट्रोक का कारण बनता है. डॉ. एलो के अनुसार, अगर LDL 60 मिलीग्राम/डीएल से ज्यादा हो, तो खतरा बढ़ने लगता है. जितना ज्यादा LDL, उतनी जल्दी समस्या गंभीर हो सकती है. आमतौर पर स्वस्थ लोगों को LDL 100 से कम और पहले से दिल की बीमारी वाले लोगों को 70 से कम रखने की सलाह दी जाती है. जेएएमए कार्डियोलॉजी जर्नल में छपी एक रिसर्च के मुताबिक, LDL को 70 से भी कम करना दिल के लिए और फायदेमंद है. हर 39 मिलीग्राम/डीएल LDL कम होने पर हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अन्य दिल की बीमारियों का खतरा करीब 20% घट जाता है. मिसाल के तौर पर, अगर किसी का LDL 70 से घटकर 31 हो जाए, तो हार्ट प्रॉब्लम का खतरा 20% कम हो सकता है.

खास बात ये है कि LDL को कम करने का तरीका चाहे दवाइयों (जैसे स्टैटिन, इजेटिमाइब या PCSK9 इंजेक्शन) से हो या लाइफस्टाइल बदलकर, फायदा एक जैसा मिलता है. सबसे अच्छी बात ये है कि LDL को बहुत कम, जैसे 20 मिलीग्राम/डीएल तक लाने पर भी कोई नया खतरा नहीं होता – न मधुमेह, न लिवर की समस्या, न कैंसर, न स्ट्रोक. इसलिए कहा जाता है, LDL जितना कम, उतना बेहतर.

अच्छा कोलेस्ट्रॉल (HDL)

HDL यानी अच्छा कोलेस्ट्रॉल हमेशा दिल के लिए फायदेमंद माना गया है, लेकिन रिसर्च बताती है कि ये हर किसी के लिए एक जैसा फायदा नहीं देता. अलग-अलग नस्लों और समुदायों में HDL का असर अलग हो सकता है. यानी ज्यादा HDL होना हर बार दिल की सेहत की गारंटी नहीं देता. इसलिए सिर्फ कोलेस्ट्रॉल टेस्ट पूरी तस्वीर नहीं दिखाता.

एपोबी (ApoB) टेस्ट

यहां एपोलिपोप्रोटीन बी (ApoB) टेस्ट अहम हो जाता है. हमारे खून में मौजूद हर खराब कोलेस्ट्रॉल कण (जैसे LDL, VLDL, IDL) में ApoB का एक अणु होता है. ApoB टेस्ट सीधे बता देता है कि आपके खून में कितने खतरनाक कण हैं, जो नसों को बंद कर सकते हैं. कई बार सामान्य कोलेस्ट्रॉल टेस्ट में LDL सामान्य दिखता है, लेकिन ApoB टेस्ट से पता चलता है कि असल में खतरा ज्यादा है. अमेरिकी विशेषज्ञों की हालिया रिसर्च के मुताबिक, ApoB टेस्ट दिल की बीमारी के खतरे को समझने का सबसे सटीक तरीका है, जो LDL से भी बेहतर है.

समय रहते खतरे को क्यों पकड़ना जरूरी है?

डॉ. एलो कहते हैं कि हार्ट अटैक के लक्षण अक्सर बहुत देर से दिखते हैं, कभी-कभी दशकों बाद. लेकिन अगर आप 20, 30 या 40 की उम्र में ही खतरे को पहचान लें, तो हार्ट अटैक या गंभीर बीमारी से बच सकते हैं. जल्दी पता चलने से आप अपनी डाइट सुधार सकते हैं, लाइफस्टाइल बदल सकते हैं या जरूरत पड़ने पर दवाइयों की मदद ले सकते हैं. इससे आप अपने दिल को लंबे समय तक स्वस्थ रख सकते हैं.

ये भी पढ़ें: ब्लड शुगर टेस्ट करते वक्त ये आम गलतियां करते हैं लोग, कहीं आप भी इनमें से तो नहीं?

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एम्स में कैसे करवा सकते हैं कैंसर का इलाज, जान लीजिए ओपीडी से लेकर कीमो तक पूरा खर्चा

एम्स में कैसे करवा सकते हैं कैंसर का इलाज, जान लीजिए ओपीडी से लेकर कीमो तक पूरा खर्चा


AIIMS Cancer Treatment Cost: अगर कैंसर की बीमारी हो जाए तो सबसे पहले ख्याल आता है कि, इसका खर्चा कितना आएगा, क्योंकि हम सभी जानते हैं कि, प्राइवेट अस्पतालों में हर इंसान तो इलाज नहीं करवा सकता है. इसलिए ज्यादातर लोग देश के सबसे बड़े सरकारी संस्थान एम्स में कैंसर का इलाज करवाने का सोचते हैं. लेकिन कुछ लोगों को यहां के खर्च के बारे में जानकारी नहीं होती, आज हम आपको इसी पर पूरी जानकारी देंगे.

डॉ. विनीत गोविंदा गुप्ता का कहना है कि, यहाकैंसर का बेहतरीन तरीके से किया जाता है. कीमो और सर्जरी तक सभी सुविधाए एक ही छत के नीचे उपलब्ध कराई जाती हैं. साथ ही उन्होंने खर्चा कितना आएगा, इसके बारे में भी जानकारी दी है.

ये भी पढ़े- क्या सिर्फ पतले लोग ही होते हैं हेल्दी? क्या कहते हैं एक्सपर्ट

ओपीडी में कितना खर्च आता है

  • अगर किसी मरीज को कैंसर की आशंका है या पहले से कैंसर डायग्नोस हो चुका है, तो सबसे पहले उसे एम्स की ऑन्कोलॉजी ओपीडी में दिखाना होता है.
  • ओपीडी की रजिस्ट्रेशन फीस मात्र 10 से 50 रुपये होती है.
  • यहा विशेषज्ञ डॉक्टर मरीज की जांच करते हैं और जरुरत पड़ने पर आगे के टेस्ट्स (जैसे बायोप्सी, ब्लड टेस्ट, इमेजिंग स्कैन आदि) लिखते हैं.
  • ये सभी जांचें प्राइवेट अस्पतालों की तुलना में बहुत कम खर्च पर हो जाती हैं.

टेस्ट और डायग्नोसिस

  • कैंसर का सही इलाज तभी संभव है जब उसकी स्टेज और प्रकार का पता चल सके.
  • एम्स में ब्लड टेस्ट्स, CT स्कैन, MRI, PET स्कैन जैसी एडवांस सुविधाएँ उपलब्ध हैं.
  • यहा ये जांचें प्राइवेट अस्पतालों की तुलना में लगभग 7080 प्रतिशत तक सस्ती होती हैं.
  • आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए अस्पताल की सोशल वेलफेयर स्कीम भी मददगार होती है.

कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी का खर्च

  • कैंसर मरीजों के लिए कीमोथेरेपी सबसे महत्वपूर्ण ट्रीटमेंट्स में से एक है.
  • एम्स में एक कीमो सेशन का खर्च औसतन 10,000 से 30,000 रुपये तक होता है, जबकि डियोथेरेपी में 3,000 से शुरू होती है
  • कई जेनेरिक दवाइया एम्स की फार्मेसी से कम दाम पर उपलब्ध कराई जाती हैं.
  • जरूरत पड़ने पर मरीज सरकारी योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत योजना या राज्य सरकार की हेल्थ स्कीम से भी फायदा उठा सकते हैं.

सर्जरी और रेडिएशन

  • कुछ कैंसर मरीजों को सर्जरी या रेडिएशन थेरेपी की जरुरत होती है.
  • एम्स में कैंसर सर्जरी की फीस कुछ हजार रुपये तक ही रहती है.
  • रेडिएशन थेरेपी के भी चार्जेस न्यूनतम होते हैं, जो सामान्य परिवार वहन कर सकते हैं.
  • यहाअत्याधुनिक लिनियर एक्सीलरेटर मशीन और रेडियोथेरेपी के आधुनिक उपकरण उपलब्ध हैं.
  • एम्स में कई ऐसे फंड्स और स्कीमें मौजूद हैं, जिनकी मदद से गरीब मरीजों का इलाज लगभग मुफ्त या बेहद कम खर्च में हो जाता है.
  • प्रधानमंत्री राहत कोष, राज्य सरकार राहत कोष, और AIIMS सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट से आर्थिक मदद मिल सकती है.

इसे भी पढ़ें- विटामिन B12 की कमी से हो सकती है यह खतरनाक बीमारी, रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा

Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या सिर्फ पतले लोग ही होते हैं हेल्दी? क्या कहते हैं एक्सपर्ट

क्या सिर्फ पतले लोग ही होते हैं हेल्दी? क्या कहते हैं एक्सपर्ट


Fitness Myths: अक्सर लोग सोचते हैं कि, अगर कोई इंसान पतला है तो वह जरूर हेल्दी होगा. वहीं, अगर कोई थोड़ा मोटा दिखता है तो लोग तुरंत मान लेते हैं कि उसकी सेहत खराब होगी. लेकिन क्या वाकई ऐसा है? हेल्थ और फिटनेस एक्सपर्ट्स का कहना है कि शरीर का आकार या वजन हेल्थ का पूरा पैमाना नहीं है. सेहत असल में हमारी लाइफस्टाइल, खानपान, और एक्टिविटी लेवल से तय होती है.

फिटनेस एक्सपर्ट नितेश सोनी का कहना है कि, कई बार लोग पतले तो दिखते हैं, लेकिन उनकी मसल स्ट्रेंथ, इम्युनिटी और एनर्जी लेवल बहुत कम होते हैं. यह स्थिति “स्किनी फैट” कहलाती है, जिसमें बाहर से इंसान पतला लगता है लेकिन अंदर से शरीर में फैट जमा रहता है और मेटाबॉलिक हेल्थ खराब होती है.

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हेल्दी होने की पहचान क्या है

  • ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल नॉर्मल होना
  • एनर्जी लेवल दिनभर एक्टिव रहने लायक होना
  • इम्युनिटी स्ट्रॉन्ग होना ताकि बार-बार बीमार न पड़ें
  • मेंटल हेल्थ संतुलित रहना, तनाव और चिंता पर नियंत्रण होना
  • संतुलित खानपान जिसमें प्रोटीन, विटामिन और मिनरल्स शामिल हों
  • अगर ये सभी चीजें सही हैं तो भले ही आपका वजन थोड़ा ज्यादा हो, फिर भी आप हेल्दी माने जाएंगे

कब जरूरी है सतर्क रहना

इसका मतलब यह नहीं है कि वजन बढ़ना पूरी तरह सुरक्षित है. बहुत ज्यादा फैट खासकर पेट के आसपास जमा होना दिल की बीमारियों, डायबिटीज़ और हाई बीपी का खतरा बढ़ाता है. इसलिए जरूरी है कि आप अपने बॉडी मास इंडेक्स (BMI) और कमर-हिप अनुपात पर ध्यान दें.

संतुलन है सबसे जरूरी

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि असली हेल्थ का मतलब है, संतुलित शरीर, अच्छा खानपान और एक्टिव लाइफस्टाइल. न तो जरूरत से ज्यादा पतलापन अच्छा है और न ही अनियंत्रित मोटापा. सही एक्सरसाइज, नींद और हेल्दी डाइट के साथ कोई भी व्यक्ति फिट और हेल्दी रह सकता है, चाहे उसका वजन थोड़ा ज्यादा ही क्यों न हो.

सेहत का मतलब सिर्फ “पतले” होने से नहीं है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना एक्टिव हैं, आपका खानपान कैसा है और आपका शरीर अंदर से कितना मजबूत है. इसलिए अगली बार जब आप किसी को देखकर “पतला है तो हेल्दी है” कहें, तो जरा सोचें, असल हेल्थ आंखों से नहीं बल्कि जीवनशैली से तय होती है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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