क्या कान में लगाने वाले ब्लूटूथ से भी हो जाता है कैंसर, जानें कितना रहता है रिस्क?

क्या कान में लगाने वाले ब्लूटूथ से भी हो जाता है कैंसर, जानें कितना रहता है रिस्क?


Can Bluetooth Earphones Increase Cancer Risk: आज के समय में वायरलेस ईयरफोन लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. ऑफिस कॉल से लेकर म्यूज़िक और सोशल मीडिया तक, घंटों कान में लगे रहने वाले इन डिवाइस को लेकर एक सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या ब्लूटूथ ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन सेहत के लिए खतरनाक है और क्या इससे कैंसर का खतरा हो सकता है? इंटरनेट पर वायरल दावों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि इन्हें पहनना सिर के पास माइक्रोवेव रखने जैसा है. चलिए आपको बताते हैं कि इन दावों में कितनी सच्चाई है और कितनी मिथक. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इसी भ्रम को दूर करने के लिए अमेरिका के मिशिगन न्यूरोसर्जरी इंस्टीट्यूट में न्यूरोसर्जन डॉ. जय जगन्नाथन ने हाल ही में एक वीडियो के जरिए वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की. 13 अक्टूबर2025 को इंस्टाग्राम पर साझा किए गए इस वीडियो में उन्होंने वायरल क्लिप का जवाब दिया, जिसमें एयरपॉड्स पहनने को माइक्रोवेव के संपर्क में आने जैसा बताया गया था.

 

डॉ. जगन्नाथन के अनुसार, यह तुलना पूरी तरह भ्रामक है. उन्होंने बताया कि वायरलेस ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन “नॉन-आयोनाइजिंग” होता है, जो डीएनए को नुकसान पहुंचाने में सक्षम नहीं माना जाता. यही वजह है कि इसे कैंसर से सीधे तौर पर जोड़ने के पुख्ता सबूत अब तक नहीं मिले हैं.

रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में बेहद कम

उनका कहना है कि ब्लूटूथ ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में बेहद कम होता है. आंकड़ों के मुताबिक, एयरपॉड्स जैसे डिवाइस से मिलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन से करीब 10 से 400 गुना तक कम हो सकता है. ऐसे में अगर मोबाइल फोन के इस्तेमाल से कैंसर का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है, तो ईयरफोन के मामले में जोखिम और भी कम माना जाता है.

किस चीज का दिया जाता है उदाहरण?

कैंसर से जुड़े दावों को लेकर अक्सर जिस रिसर्च का हवाला दिया जाता है, वह नेशनल टॉक्सिकोलॉजी प्रोग्राम (NTP) की स्टडी है. इस अध्ययन में चूहों को लंबे समय तक रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन के संपर्क में रखा गया था. इसमें नर चूहों में कुछ खास तरह के हृदय कैंसर के मामलों में हल्की बढ़ोतरी देखी गई थी, जबकि मादा चूहों में ऐसा कोई स्पष्ट असर नहीं दिखा.

डॉ. जगन्नाथन बताते हैं कि इस स्टडी की बाद में अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने समीक्षा की थी. एफडीए ने साफ कहा कि इस रिसर्च के आधार पर इंसानों में कैंसर और रेडिएशन के बीच सीधा संबंध साबित नहीं किया जा सकत. इसके साथ ही यह भी अहम है कि स्टडी में चूहों को दी गई रेडिएशन की मात्रा वास्तविक जीवन में मोबाइल या ईयरफोन से मिलने वाले रेडिएशन से अलग परिस्थितियों में थी. एक्सपर्ट के मुताबिक, मौजूदा साइंटफिक प्रमाणों के आधार पर यह कहना गलत होगा कि वायरलेस ईयरफोन कैंसर का कारण बनते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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स्टेंट डलवाने के बाद भी क्यों ब्लॉक हो जाती हैं दिल की नसें? डॉक्टर से समझें

स्टेंट डलवाने के बाद भी क्यों ब्लॉक हो जाती हैं दिल की नसें? डॉक्टर से समझें


Causes Of Recurrent Heart Attack After Stenting: आज के दौर में इंटरनेट पर हार्ट की बीमारी और उसके इलाज को लेकर इतनी जानकारी मौजूद है कि मरीज और उनके परिवार अक्सर भ्रम में पड़ जाते हैं. खासतौर पर कार्डियक स्टेंट को लेकर लोगों के मन में यह सवाल बार-बार उठता है कि अगर स्टेंट लग चुका है तो क्या फिर भी हार्ट अटैक आ सकता है. डॉक्टरों का साफ कहना है कि स्टेंट लगने के बाद भी दिल का दौरा पड़ने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती.

कब लगाया जाता है स्टेंट?

स्टेंट तब लगाया जाता है जब दिल तक खून पहुंचाने वाली आर्टरीज में कोलेस्ट्रॉल जमा होकर रास्ता संकरा कर देता है. यह एक धातु की जाली होती है, जिसे ब्लॉकेज वाली नस में डालकर खून के बहाव को सामान्य किया जाता है. आमतौर पर हार्ट अटैक के बाद या गंभीर ब्लॉकेज की स्थिति में स्टेंट डाला जाता है ताकि नस खुली रहे और दिल तक पर्याप्त खून पहुंचता रहे.

हालांकि स्टेंट उस खास नस को खोल देता है, लेकिन यह दिल की सभी धमनियों को सुरक्षित नहीं करता. अगर मरीज स्टेंट लगने के बाद भी अस्वस्थ लाइफस्टाइल अपनाता है, तला-भुना और ज्यादा फैट वाला खाना खाता है, धूम्रपान करता है या शारीरिक गतिविधि से दूर रहता है, तो दिल की दूसरी नसों में ब्लॉकेज बन सकता है. यही वजह है कि स्टेंट लगने के बावजूद दोबारा हार्ट अटैक हो सकता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. संतोष कुमार, हृदय रोग एक्सपर्ट, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल, नई दिल्ली बताते हैं कि “स्टेंट किसी प्राकृतिक नस का विकल्प नहीं है. यह सिर्फ एक अस्थायी सहारा है, जो उस समय जान बचाने में मदद करता है. शरीर में बार-बार स्टेंट डालना न तो सुरक्षित माना जाता है और न ही यह स्थायी समाधान है. अगर दोबारा हार्ट अटैक होता है, तो मरीज की हालत पहले से ज्यादा गंभीर हो सकती है और इलाज भी मुश्किल हो जाता है.”

स्टेंट लगाने के बाद क्या होता है?

स्टेंट लगने के बाद मरीज पहले से ज्यादा संवेदनशील हो जाता है दोबारा दिल का दौरा पड़ने पर जान का खतरा भी बढ़ जाता है और कई मामलों में फिर से एंजियोप्लास्टी या स्टेंट डालने की जरूरत पड़ सकती है. कुछ मामलों में अगर शरीर स्टेंट को स्वीकार नहीं करता या प्रक्रिया में दिक्कत आती है, तो स्थिति जानलेवा भी हो सकती है. इसीलिए डॉक्टर बार-बार सलाह देते हैं कि स्टेंट लगने के बाद लापरवाह नहीं होना चाहिए. संतुलित डाइट, नियमित एक्सरसाइज, डॉक्टर द्वारा दी गई दवाओं का सही समय पर सेवन, धूम्रपान से दूरी और तनाव नियंत्रण ही स्टेंट के बाद दिल को सुरक्षित रखने का सबसे कारगर तरीका है. स्टेंट इलाज का एक हिस्सा है, पूरा इलाज नहीं, असल इलाज लाइफस्टाइल में सुधार से ही होता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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लोगों पर नहीं हो रहा एंटीबायोटिक दवाओं का असर, स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली वजह?

लोगों पर नहीं हो रहा एंटीबायोटिक दवाओं का असर, स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली वजह?


स्टडी में इन इंफेक्शन के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली 15 एंटीबायोटिक दवाओं की जांच की गई. चौंकाने वाली बात यह रही कि इनमें से 13 दवाओं पर बैक्टीरिया ने 40 प्रतिशत से ज्यादा रेजिस्टेंस दिखाया. एक दवा पर तो यह आंकड़ा 78 प्रतिशत तक पहुंच गया.

एसएमएस अस्पताल में इंफेक्शन रोगों के नोडल अधिकारी डॉ. सुनील माहावर ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया. उनके मुताबिक, एसिनेटोबैक्टर इंफेक्शन आमतौर पर गंभीर बीमारियों से जुड़ा होता है.

एसएमएस अस्पताल में इंफेक्शन रोगों के नोडल अधिकारी डॉ. सुनील माहावर ने इस स्थिति को बेहद चिंताजनक बताया. उनके मुताबिक, एसिनेटोबैक्टर इंफेक्शन आमतौर पर गंभीर बीमारियों से जुड़ा होता है.

Published at : 16 Jan 2026 08:24 PM (IST)

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ठंड में क्यों सूज जाती हैं अंगुलियां, क्या है इनका सटीक इलाज?

ठंड में क्यों सूज जाती हैं अंगुलियां, क्या है इनका सटीक इलाज?


जब ठंडी और नम हवा त्वचा पर असर करती है, तो हाथ-पैर की सतह के पास मौजूद छोटी ब्लड वेसल्स सिकुड़ जाती हैं. शरीर गर्मी बचाने के लिए खून को अंदरूनी अंगों की ओर भेज देता है, जिससे बाहरी हिस्सों में दिक्कत शुरू हो जाती है.

समस्या तब बढ़ती है जब ठंड से अचानक गर्म माहौल में आते हैं. तेज गर्मी या गरम पानी के संपर्क में आते ही ब्लड वेसल्स तेजी से फैलती हैं, जिससे तरल पदार्थ आसपास के टिश्यू में जमा होकर सूजन, जलन और खुजली पैदा करता है.

समस्या तब बढ़ती है जब ठंड से अचानक गर्म माहौल में आते हैं. तेज गर्मी या गरम पानी के संपर्क में आते ही ब्लड वेसल्स तेजी से फैलती हैं, जिससे तरल पदार्थ आसपास के टिश्यू में जमा होकर सूजन, जलन और खुजली पैदा करता है.

Published at : 16 Jan 2026 07:13 PM (IST)

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दिल्ली में प्रदूषण छीन रहा सांसें, तीन साल में हुईं मौतों का आंकड़ा देख बैठ जाएगा आपका दिल!

दिल्ली में प्रदूषण छीन रहा सांसें, तीन साल में हुईं मौतों का आंकड़ा देख बैठ जाएगा आपका दिल!


दिल्ली की हवा में घुलते जहर का असर अब आंकड़ों में साफ-साफ नजर आने लगा है. साल-दर-साल सांस की बीमारियों से मरने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.  ये कोई अफवाह नहीं, बल्कि दिल्ली सरकार के आधिकारिक दस्तावेज से निकला कड़वा सच है. अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय की दिल्ली सांख्यिकीय हैंडबुक 2025 में दर्ज वाइटल स्टैटिस्टिक्स के चैप्टर IV में यह डेटा बिल्कुल साफ दिया है कि मेडिकली सर्टिफाइड मौत के ब्रेकडाउन में रेस्पिरेटरी डिजीजेज को अलग कैटेगरी में रखा गया है और पिछले चार साल का ट्रेंड देखकर किसी का भी दिल सहम सकता है.

जानें कब कितनी हुईं मौतें?

2024 में सांस की बीमारियों जैसे अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस, निमोनिया या फेफड़ों से जुड़ी अन्य समस्याएं से 9,211 मौतें दर्ज हुईं. ये 2023 के 8,801 से करीब 4.7% ज्यादा है, और 2022 के 7,432 से तो 24% ऊपर है. वहीं, सबसे चौंकाने वाला फिगर 2021 का है, उस साल कोविड-19 की दूसरी लहर ने देश में कोहराम मचा दिया था और रेस्पिरेटरी डेथ्स 14,442 तक पहुंच गई थीं. हालांकि, महामारी के बाद थोड़ी राहत जरूर मिली, लेकिन अब यह आंकड़ा दोबारा बढ़ रहा है, जो साफ बताता है कि दिल्ली की एयर क्वालिटी और हेल्थ सिस्टम में अब भी बड़ी कमियां हैं.

क्या बता रहा सरकारी आंकड़ा?

office of the Chief Registrar (Births & Deaths) की ओर से जारी डेटा MCD, NDMC और अन्य बॉडीज से कलेक्ट किए गए रजिस्ट्रेशन पर आधारित है. कुल मेडिकली सर्टिफाइड डेथ्स में रेस्पिरेटरी का शेयर देखें तो 2024 में ये कुल 90,883 certified deaths का करीब 10% है, जबकि 2021 में ये 14.6% था. हालांकि, कुल मौतों (certified + non-certified) की बात करें तो 2024 में दिल्ली में कुल 1,39,480 मौतें दर्ज हुईं, जिनमें से 85,391 पुरुष, 54,051 महिलाएं और 38 अन्य थे.

इस वजह से होती हैं सबसे ज्यादा मौतें

अब जरा दूसरे कारणों से तुलना करें तो तस्वीर और साफ हो जाती है. सर्कुलेटरी डिजीज (जैसे हार्ट अटैक, स्ट्रोक) अब भी सबसे बड़ी किलर हैं. 2024 में 21,262 मौतें सर्कुलेटरी डिजीज से हुईं, जो 2023 के 15714 से 35 पर्सेंट ज्यादा थीं. वहीं इंफेक्शन और पैरासाइटिक डिजीज में गिरावट आई है. 2024 में 16,060 मौतों की वजह यही बीमारियां थीं, जबकि 2023 में 20,781 लोगों ने इन बीमारियों के कारण जान गंवाई थी. कैंसर जैसी neoplasms बीमारियों की वजह से 5,960 लोगों की मौत हुई तो डाइजेस्टिव डिजीज के कारण 5,200 और अन्य कारणों से 33,190 लोगों की मौत हुई. कुल मिलाकर, सर्टिफाइड डेथ्स 2024 में 90,883 पहुंच गईं, जो 2023 के 88,628 से ज्यादा हैं. यह ट्रेंड बताता है कि जहां इंफेक्शंस डिजीज पर काबू पाया जा रहा है. वहीं, रेस्पिरेटरी और सर्कुलेटरी प्रॉब्लम्स बढ़ रहे हैं और इसके पीछे पॉल्यूशन, लाइफस्टाइल और एजिंग पॉपुलेशन जैसे फैक्टर भी हो सकते हैं.

दिल्ली में कैसे हैं हालात?

दिल्ली में हर साल नवंबर-दिसंबर के दौरान AQI 400-500 पार कर जाता है और PM2.5 जैसे पार्टिकल्स फेफड़ों को चीरते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स काफी समय से इस बारे में चेता रहे हैं कि दिल्ली में क्रॉनिक रेस्पिरेटरी समस्या बढ़ रही हैं, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में. रेस्पिरेटरी मौत पर ये आंकड़े पॉलिसी मेकर्स के लिए wake-up call हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार, सरकार को चाहिए कि प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड को और मजबूत करें, ग्रीन कॉरिडोर्स बढ़ाए और अस्पताल में रेस्पिरेटरी यूनिट्स को भी अपग्रेड करें. वरना, ये संख्या और ऊपर चढ़ती रहेगी और दिल्लीवासियों की सांसें और छोटी होती जाएंगी.

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प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में कितना फर्क, कौन-सा आपकी सेहत के लिए ज्यादा खतरनाक?

प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड में कितना फर्क, कौन-सा आपकी सेहत के लिए ज्यादा खतरनाक?


Is Ultra-Processed Food Bad for Health: अक्सर लोग प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को एक ही मान लेते हैं, लेकिन सेहत के लिहाज से दोनों में बड़ा अंतर है. सच यह है कि कुछ प्रोसेस्ड फूड नुकसानदेह नहीं होते, जबकि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि दोनों में क्या अंतर होता है और आप इसको कैसे पता कर सकत हैं. 

प्रोसेस्ड फूड क्या होता है?

यूएस डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के मुताबिक, किसी प्राकृतिक खाने वाली चीजों में थोड़ा-बहुत बदलाव, जैसे कि पकाना, फ्रीज करना, काटना या जूस निकालना,उसे प्रोसेस्ड बना देता है. इस कैटेगरी में कई हेल्दी चीजें भी आती हैं, जैसे कटे हुए बेबी कैरट, फ्रोजन सब्ज़ियां या फ्लोरेट्स में कटी ब्रोकली. यानी हर प्रोसेस्ड फूड खराब नहीं होता.

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड क्या है?

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड एक कदम आगे होता है. इसमें ऐसे प्रोडक्ट शामिल हैं जो ज्यादातर फूड से निकले तत्वों या रसायनों से बनाए जाते हैं और जिनमें असली, साबुत भोजन बहुत कम या न के बराबर होता है. उदाहरण के तौर पर पैकेट वाले चिप्स, सॉफ्ट ड्रिंक्स, कैंडी, इंस्टेंट नूडल्स, रेडी-टू-ईट राइस या पास्ता. इन्हें बस गरम करना या पानी डालना होता है काम लगभग खत्म.

ये क्यों हो सकते हैं खतरनाक?

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड सस्ते, स्वादिष्ट और सुविधाजनक ज़रूर होते हैं, लेकिन इनमें अक्सर-

  • रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट
  • ज्यादा नमक
  • सैचुरेटेड फैट
  •  बहुत ज्यादा कैलोरी

ऐसी चीजें जल्दी पेट नहीं भरतीं, जिससे इंसान जरूरत से ज्यादा खा लेता है, जो बाद में सेहत को नुकसान करती है. 

फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक फूड में इस्तेमाल होने वाले एडिटिव्स सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन कई एक्सपर्ट का कहना है कि इनके लंबे समय के असर अभी पूरी तरह समझे नहीं गए हैं. ज्यादा प्रोसेसिंग से फाइबर भी निकल जाता है, जिससे पाचन और आंतों के अच्छे बैक्टीरिया पर असर पड़ सकता है।

रिसर्च में क्या निकला

रिसर्च बताते हैं कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, कैंसर और समय से पहले मौत के खतरे से जुड़े हो सकते हैं. एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि जो लोग अल्ट्रा-प्रोसेस्ड डाइट लेते हैं, वे ज्यादा खाते हैं और तेजी से वजन बढ़ाते हैं.

क्या हर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बुरा है?

अमेरिकन हार्ट एसोसिएसन से जुड़े एक्सपर्ट मानते हैं कि आज के दौर में प्रोसेस्ड और कुछ हद तक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से पूरी तरह बचना मुश्किल है. समस्या यह है कि ज्यादातर ऐसे प्रोडक्ट सेहत को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि स्वाद, कीमत और शेल्फ-लाइफ को प्राथमिकता देकर बनाए जाते हैं.एक्सपर्ट का कहना है कि जरूरत इस बात की है कि कंपनियां ज्यादा हेल्दी प्रोसेस्ड फूड बनाएं, और लोग समझदारी से चुनाव करें. एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि पूरी तरह प्रोसेस्ड या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड छोड़ना हर किसी के लिए आसान नहीं है, लेकिन जानकारी और समझदारी से चुनाव करके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

ये भी पढ़ें: पेट का भारीपन या मामूली थकान? नजरअंदाज न करें, जानिए फैटी लिवर की शुरुआती चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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