कहीं आप भी तो गलत समय पर नहीं खा रहे तरबूज? पेट की बीमारियों का बढ़ सकता है खतरा!

कहीं आप भी तो गलत समय पर नहीं खा रहे तरबूज? पेट की बीमारियों का बढ़ सकता है खतरा!


What Is The Best Time To Eat Watermelon For Digestion: गर्मी और तरबूज का रिश्ता ऐसा है जैसे धूप और पसीना, एक-दूसरे के बिना अधूरा.  बाजार में कटा हुआ, रस टपकाता तरबूज देखते ही मन ललचा जाता है. लेकिन एक बात ज्यादातर लोग नजरअंदाज कर देते हैं कि इसे खाने का सही समय. यह सिर्फ स्वाद की बात नहीं है, बल्कि इस बात से भी जुड़ा है कि आपका शरीर इसे कैसे पचाता है. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

मेदांता अस्पताल की निधि सहाई ने TOI को बताया कि तरबूज खाने का सबसे सही समय सुबह के नाश्ते और दोपहर के खाने के बीच का होता है. इस दौरान डाइजेशन सिस्टम सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है. यह कोई यूं ही दी गई सलाह नहीं है, बल्कि शरीर की अपनी लय होती है, जिसके अनुसार अलग-अलग समय पर पाचन क्षमता बदलती रहती है. तरबूज में लगभग 90 प्रतिशत पानी होता है और इसमें प्राकृतिक शर्करा भी होती है. ऐसे में शरीर को इसे सही तरीके से पचाने के लिए तैयार रहना जरूरी होता है. सुबह नाश्ते के बाद जब डाइजेशन सिस्टम सक्रिय हो चुका होता है, तब इसे खाना सबसे फायदेमंद रहता है. 

क्या होती है इससे दिक्कत?

निधि सहाई के अनुसार, हल्के भरे पेट में तरबूज खाने से पेट फूलने की समस्या कम होती है और पाचन भी बेहतर रहता है. कई लोग सोचते हैं कि खाली पेट फल खाना ठीक होता है, लेकिन तरबूज के मामले में पेट का थोड़ा सक्रिय होना जरूरी है. यही कारण है कि सुबह का मध्य समय सबसे सही माना जाता है. एक दिलचस्प बात यह भी है कि तरबूज व्यायाम से पहले ऊर्जा देने वाला अच्छा विकल्प हो सकता है. कसरत से लगभग आधा घंटा पहले इसे खाने से शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है और पानी की कमी भी नहीं होती। यही वजह है कि कई खिलाड़ी इसे अपनी दिनचर्या में शामिल करते हैं.

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कब नहीं खाना चाहिए?

लेकिन रात में तरबूज खाना ठीक नहीं माना जाता. उस समय शरीर आराम की स्थिति में जाने लगता है और पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है. ऐसे में तरबूज की शर्करा और पानी शरीर को असहज कर सकते हैं, जिससे गैस या भारीपन महसूस हो सकता है. हर व्यक्ति के लिए यह सलाह एक जैसी नहीं होती. जिन लोगों का डाइजेशन सिस्टम सेंसिटिव होता है या जिन्हें आंत से जुड़ी समस्या रहती है, उन्हें खास सावधानी बरतनी चाहिए. ऐसे लोगों को तरबूज खाने के बाद पेट दर्द या सूजन जैसी दिक्कत हो सकती है.

मात्रा का ध्यान रखना भी जरूरी

मात्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना समय. अक्सर लोग इसे हल्का समझकर ज्यादा खा लेते हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा तरबूज खाने से पेट पर दबाव पड़ता है. निधि सहाई सलाह देती हैं कि एक से दो कटोरी मात्रा पर्याप्त होती है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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वर्कआउट में पुलिस अफसर की अचानक मौत, जिम जाने वाले नोट कर लें ये बात, वरना हो सकती है दिक्कत

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Why Healthy People Die During Exercise: जिम में वर्कआउट के दौरान उत्तराखंड पुलिस के 38 वर्षीय स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप अधिकारी गिरीश भट्ट की अचानक मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिर्फ फिट दिखना ही स्वस्थ होने की गारंटी है? एक्सपर्ट का कहना है कि रेगुलर एक्सरसाइज करने वाला व्यक्ति भी कई बार ऐसी छिपी हुई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा होता है, जिनका पता समय रहते नहीं चल पाता.

दरअसल, चंपावत जिले में तैनात गिरीश भट्ट जिम में अभ्यास कर रहे थे, तभी उनकी तबीयत बिगड़ गई और वे अचानक गिर पड़े. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. उनकी मौत की वास्तविक वजह की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है. परिवार और सहकर्मियों के लिए यह घटना गहरे सदमे की तरह है।. गिरीश भट्ट अपने पीछे पत्नी और दो बेटों को छोड़ गए हैं.

हेल्दी दिखने वाले लोगों में क्यों हो रही है दिक्कत?

इस घटना के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर स्वस्थ दिखने वाले लोग भी अचानक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी का शिकार कैसे हो जाते हैं.डॉ. रचित गुलाटी ने TOI को बताया कि कि फिटनेस और स्वास्थ्य को एक जैसा मान लेना बड़ी भूल है. कई बार व्यक्ति बाहर से पूरी तरह फिट नजर आता है, लेकिन उसके शरीर में हाई ब्लड प्रेशर, अनियमित हार्ट रिद्म, आर्टरीज में रुकावट या जेनेटिक हार्ट रोग जैसी समस्याएं चुपचाप मौजूद रहती हैं. 

क्या शरीर पहले से देता है संकेत?

डॉ. रचित गुलाटी के अनुसार, शरीर अक्सर किसी बड़ी समस्या से पहले संकेत देता है, लेकिन लोग उन्हें सामान्य थकान या मेहनत का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. वर्कआउट के दौरान या बाद में असामान्य सांस फूलना, सीने में भारीपन, चक्कर आना, दिल की धड़कन तेज महसूस होना या जरूरत से ज्यादा थकान जैसे लक्षण गंभीर चेतावनी हो सकते हैं.

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क्या है इसके पीछे कारण?

एक्सपर्ट का मानना है कि लंबे अंतराल के बाद अचानक भारी व्यायाम शुरू करना, दूसरों से प्रतिस्पर्धा में जरूरत से ज्यादा मेहनत करना या बिना स्वास्थ्य जांच के हाई-इंटेंसिटी वर्कआउट करना जोखिम बढ़ा सकता है. खासतौर पर 35 वर्ष से अधिक उम्र के लोग, जिनके परिवार में हार्ट रोग का इतिहास रहा हो या जो डायबिटीज, मोटापा, धूम्रपान और हाई बीपी जैसी समस्याओं से जुड़े हों, उन्हें नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए.

किन चीजों का रखना चाहिए ध्यान?

डॉ. रचित गुलाटी यह भी बताते हैं कि सुरक्षित फिटनेस के लिए सिर्फ व्यायाम ही नहीं, बल्कि पर्याप्त नींद, सही मात्रा में पानी पीना, वॉर्म-अप, कूल-डाउन और वर्कआउट के बीच उचित रिकवरी भी उतनी ही जरूरी है. सोशल मीडिया पर दिखने वाली अत्यधिक मेहनत वाली फिटनेस संस्कृति हर किसी के लिए सही नहीं होती.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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प्रेग्नेंसी में कमर दर्द और खराब नींद से मिलेगा छुटकारा, बस रोज करें ये एक काम

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Benefits Of Prenatal Yoga During Pregnancy: गर्भावस्था के दौरान अच्छी नींद लेना कई महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. बढ़ता वजन, शरीर में दर्द, बार-बार करवट बदलना और हार्मोनल बदलाव अक्सर रात की नींद खराब कर देते हैं. ऐसे में कई एक्सपर्ट प्रीनेटल योग को एक असरदार विकल्प मानते हैं. नियमित रूप से किए जाने वाले हल्के योग अभ्यास न केवल शरीर को आराम पहुंचाते हैं, बल्कि मानसिक तनाव को कम करने में भी मदद कर सकते हैं. 

योग से कैसे होता है फायदा?

डॉ. नेहा शुक्ला ने TOI को बताया कि प्रेग्नेंसी में एक्टिव लाइफस्टाइल बनाए रखना बेहद जरूरी है. उनके अनुसार, प्रीनेटल योग महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रखने का एक सुरक्षित तरीका हो सकता है. इसमें नियंत्रित श्वास, हल्की स्ट्रेचिंग और रिलैक्सेशन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है. गर्भावस्था के दौरान सिर्फ शरीर ही नहीं, मन भी कई बदलावों से गुजरता है. प्रसव को लेकर चिंता, भविष्य की जिम्मेदारियां और हार्मोनल उतार-चढ़ाव कई महिलाओं में तनाव और बेचैनी बढ़ा सकते हैं. ऐसे समय में योग और ध्यान मन को शांत करने का काम करते हैं. डॉ. नेहा शुक्ला के मुताबिक, नियमित योग अभ्यास से महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ सकता है और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है. 

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कैसे होता है यह फायदेमंद?

प्रीनेटल योग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा प्राणायाम भी है. गहरी और नियंत्रित सांस लेने की तकनीकें शरीर में ऑक्सीजन के प्रवाह को बेहतर बनाती हैं. यही तकनीकें प्रसव के समय भी महिलाओं के लिए फायदेमंद साबित हो सकती हैं. एक्सपर्ट का मानना है कि सही तरीके से की गई ब्रीदिंग एक्सरसाइज महिलाओं को प्रसव के दौरान अधिक शांत और केंद्रित रहने में मदद कर सकती है.

आम परेशानियों को भी कम करने में भी मददगार

मेंटल हेल्थ के अलावा प्रीनेटल योग शरीर की कई आम परेशानियों को भी कम करने में मदद कर सकता है. प्रेग्नेंसी बढ़ने के साथ पीठ, कमर और कूल्हों पर दबाव बढ़ने लगता है. कुछ विशेष योगासन मांसपेशियों को मजबूत बनाने, शरीर की लचक बढ़ाने और सही पोस्चर बनाए रखने में मदद करते हैं. इससे कमर दर्द, जकड़न और सूजन जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है. बेहतर ब्लड फ्लो भी इसका एक अहम लाभ माना जाता है. 

इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए

एक्सपर्ट के अनुसार प्रेग्नेंसी में हर योगासन सुरक्षित नहीं होता. डॉ. नेहा शुक्ला के अनुसार, गहरे ट्विस्ट, कठिन बैकबेंड और ज्यादा तीव्र व्यायाम से बचना चाहिए. जिन महिलाओं को सर्वाइकल इनसफिशिएंसी, अनियंत्रित हाई बीपी, गंभीर एनीमिया, प्लेसेंटा प्रिविया या समय से पहले प्रसव का खतरा हो, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. यही कारण है कि प्रीनेटल योग शुरू करने से पहले डॉक्टर और प्रशिक्षित योग एक्सपर्ट की सलाह लेना जरूरी माना जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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भूलने की आदत होगी दूर, योग से याददाश्त रहेगी एकदम लोहे जैसी मजबूत, एम्स स्टडी में खुलासा

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Yoga Benefits For Brain Health: हर साल 21 जून को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाती है. संयुक्त राष्ट्र ने भारत के प्रस्ताव पर दिसंबर 2014 में इसे आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मान्यता दी थी. इस वर्ष योग दिवस की थीम स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए योग रखी गई है. दिलचस्प बात यह है कि इस बार यह थीम सिर्फ एक संदेश नहीं, बल्कि साइंटफिक रिसर्च के जरिए भी मजबूती पाती नजर आ रही है.

किन बीमारियों में फायदेमंद है योग?

दिल्ली स्थित एम्स के रिसर्चर ने हाल ही में एक स्टडी में पाया है कि नियमित योग अभ्यास अल्जाइमर रोग के शुरुआती चरण के मरीजों के लिए फायदेमंद हो सकता है. अल्जाइमर रोग जर्नल में प्रकाशित इस रिसर्च को एम्स के शरीर रचना साइंस और न्यूरोलॉजी विभाग ने मिलकर किया है. अध्ययन में हल्के अल्जाइमर से पीड़ित मरीजों को शामिल किया गया. इन प्रतिभागियों ने 12 सप्ताह तक रोजाना 60 मिनट की निगरानी में योग सत्र किए. रिसर्च के शुरुआत और अंत में उनकी मानसिक क्षमता, डिप्रेशन के लक्षणों और आंतों में मौजूद बैक्टीरिया की संरचना का इवोल्यूशन किया गया. 

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क्या हुआ योग करने से बदलाव?

परिणामों में तीनों स्तरों पर पॉजिटिव बदलाव देखने को मिले. मॉन्ट्रियल कॉग्निटिव असेसमेंट के आधार पर मरीजों की कॉग्निटिव क्षमता में सुधार दर्ज किया गया. वहीं पीएचक्यू-9  स्केल से मापे गए डिप्रेशन के लक्षणों में भी उल्लेखनीय कमी आई. सबसे दिलचस्प बदलाव आंतों के माइक्रोबायोम में देखने को मिला. योग कार्यक्रम के बाद फैसालिबैक्टेरियम प्राउसनिट्जी, रोज़बुरिया इंटेस्टिनालिस, बिफिडोबैक्टीरियम और अक्करमैन्सिया जैसे लाभकारी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ी. ये बैक्टीरिया शॉर्ट-चेन फैटी एसिड बनाते हैं, जिन्हें सूजन कम करने और ब्रेन व आंतों के बेहतर स्वास्थ्य से जोड़ा जाता है. दूसरी ओर कॉलिन्सेला एरोफैसिएन्स और क्लेब्सिएला जैसे सूजन बढ़ाने वाले माइक्रोबायोम में कमी दर्ज की गई.

इसके पीछे किसका है रोल?

एक्सपर्ट का मानना है कि इसके पीछे गट-ब्रेन एक्सिस महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. पिछले कुछ वर्षों में हुए कई स्टडी में यह सामने आया है कि आंतों में मौजूद बैक्टीरिया न केवल प्रतिरक्षा प्रणाली और सूजन को प्रभावित करते हैं, बल्कि ब्रेन के कामकाज पर भी असर डाल सकते हैं. एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ एनाटॉमी की प्रोफेसर और स्टडी की प्रमुख रिसर्चर डॉ. रीमा दादा का कहना है कि यह अध्ययन शुरुआती संकेत देता है कि योग जैसी लाइफस्टाइल आधारित गतिविधियां आंतों में स्वस्थ माइक्रोबायोम वातावरण बनाने में मदद कर सकती हैं. उनके अनुसार लाभकारी बैक्टीरिया में वृद्धि और हानिकारक माइक्रोबायोम में कमी ब्रेन हेल्थ को बेहतर बनाने वाली जैविक प्रक्रियाओं से जुड़ी हो सकती है.

क्या योग अल्जाइमर का इलाज है?

वहीं एम्स दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि योग को अल्जाइमर का इलाज नहीं माना जा सकता. हालांकि शुरुआती चरण के मरीजों और हल्की कॉग्निटिव कमजोरी वाले लोगों के लिए यह एक सहायक चिकित्सा पद्धति के रूप में उपयोगी साबित हो सकती है. उन्होंने कहा कि अध्ययन में मानसिक क्षमता, मनोदशा और आंतों के माइक्रोबियल कम्युनिटी  में पॉजिटिव बदलाव दर्ज किए गए हैं. हालांकि रिसर्चर ने यह भी स्वीकार किया है कि अध्ययन का नमूना छोटा था और इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हार्ट पेशेंट्स को सुबह के नाश्ते में क्या खाना चाहिए, यहां देख लें पूरे हफ्ते की लिस्ट

हार्ट पेशेंट्स को सुबह के नाश्ते में क्या खाना चाहिए, यहां देख लें पूरे हफ्ते की लिस्ट


Healthy Heart Diet Tips : आजकल की बिजी लाइफस्टाइल में हार्ट को हेल्दी रखना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है. इसके लिए सिर्फ दवाइयों या एक्सरसाइज पर ध्यान देना ही काफी नहीं है, बल्कि रोज सुबह क्या खाया जा रहा है, इसका भी सीधा असर हार्ट हेल्थ पर पड़ता है. रातभर के लंबे समय के बाद सुबह का नाश्ता शरीर को एनर्जी देने के साथ-साथ मेटाबॉलिज्म को एक्टिव करने और दिनभर की सेहत को बैलेंस रखने का काम करता है. विशेषज्ञों के अनुसार, अगर नाश्ते में ज्यादा तेल, घी, मक्खन, तली-भुनी चीजें या ज्यादा चीनी वाले फूड आइटम्स शामिल किए जाएं, तो समय के साथ कोलेस्ट्रॉल, ब्लड प्रेशर और वजन बढ़ने का खतरा बढ़ सकता है. यही कारण है कि हार्ट पेशेंट्स के लिए ऐसा नाश्ता चुनना जरूरी माना जाता है, जो टेस्टी होने के साथ-साथ दिल की सेहत के लिए भी फायदेमंद हो. ऐसे में आइए जानते हैं कि हार्ट पेशेंट्स को सुबह के नाश्ते में पूरे हफ्ते क्या खाना चाहिए. 

हार्ट हेल्थ के लिए नाश्ता क्यों जरूरी माना जाता है?

सुबह का हेल्दी नाश्ता शरीर को जरूरी पोषण देने के साथ कई तरह से फायदा पहुंचा सकता है. यह ब्लड शुगर को बैलेंस रखने में मदद करता है, दिनभर की एनर्जी बनाए रखता है और बार-बार भूख लगने की समस्या को कम कर सकता है. इसके अलावा यह हेल्दी कोलेस्ट्रॉल लेवल बनाए रखने और मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाने में भी सहायक माना जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, एक बैलेंस नाश्ते में साबुत अनाज, पौधों से मिलने वाला प्रोटीन, सही मात्रा में सब्जियां और सीमित मात्रा में हेल्दी फैट शामिल होना चाहिए. वहीं तले हुए फूड आइटम्स, मैदा, ज्यादा चीनी और ज्यादा तेल वाले फूड आइटम्स से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है. 

हार्ट पेशेंट्स को सुबह के नाश्ते में पूरे हफ्ते क्या खाना चाहिए?

1. सोमवार – हफ्ते की शुरुआत ओट्स उपमा से की जा सकती है. यह फाइबर से भरपूर और हल्का नाश्ता माना जाता है. ओट्स में मौजूद बीटा-ग्लूकन फाइबर शरीर से एक्स्ट्रा कोलेस्ट्रॉल को बाहर निकालने में मदद कर सकता है. वहीं गाजर, बीन्स और मटर जैसी सब्जियां पोटैशियम और एंटीऑक्सीडेंट उपलब्ध कराती हैं, जो ब्लड प्रेशर को बैलेंस रखने में सहायक हो सकते हैं. 

2. मंगलवार – बेसन चिल्ला प्रोटीन और फाइबर से भरपूर नाश्ता माना जाता है. बेसन का ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, इसलिए यह ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ने नहीं देता है. इसमें मौजूद पौधों से मिलने वाला प्रोटीन वजन और कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल रखने में मदद कर सकता है. इसे पालक, गाजर, लौकी, टमाटर और प्याज जैसी सब्जियों के साथ तैयार किया जा सकता है. 

3. बुधवार – अगर आप हल्का नाश्ता पसंद करते हैं तो अंकुरित मूंग का सलाद एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है. अंकुरित अनाज में फैट कम और प्रोटीन, फाइबर साथ ही एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं. यह पाचन को बेहतर बनाने के साथ कोलेस्ट्रॉल को बैलेंस रखने में मदद कर सकता है. इसे खीरा, टमाटर, धनिया और नींबू के रस के साथ तैयार किया जा सकता है.

4. गुरुवार – दलिया लंबे समय तक पेट भरा रखने वाला और बैलेंस एनर्जी देने वाला नाश्ता माना जाता है. इसमें मौजूद जटिल कार्बोहाइड्रेट धीरे-धीरे पचते हैं, जिससे ब्लड शुगर में अचानक उतार-चढ़ाव नहीं होता है. दलिया में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को हेल्दी रखने में मदद करता है. इसे गाजर, मटर, लौकी और बीन्स जैसी मौसमी सब्जियों के साथ बनाया जा सकता है.

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5. शुक्रवार – रागी डोसा दिल की सेहत के लिए फायदेमंद ऑप्शन में गिना जाता है. रागी फाइबर से भरपूर होती है और वजन तथा कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल रखने में मदद कर सकती है. इसमें पाए जाने वाले पॉलीफेनॉल शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने में सहायक माने जाते हैं. रागी में कैल्शियम और आयरन भी अच्छी मात्रा में मौजूद होते हैं. इसे सब्जियों के साथ तैयार कर सांभर और चटनी के साथ खाया जा सकता है. 

6. शनिवार – बिजी रूटीन वाले लोगों के लिए मल्टीग्रेन वेजिटेबल सैंडविच एक आसान और हेल्दी ऑप्शन हो सकता है. मल्टीग्रेन या साबुत गेहूं की ब्रेड में मौजूद फाइबर एक्सट्रा कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद कर सकता है. इसमें खीरा, टमाटर, प्याज, पालक जैसी सब्जियां और मक्खन की जगह दही या हम्मस का यूज किया जा सकता है. 

7. रविवार – हफ्ते के आखिरी दिन हल्का लेकिन हेल्दी नाश्ता करने के लिए फलों, ओट्स, बादाम, चिया सीड्स और टोंड दूध से बनी स्मूदी का ऑप्शन चुना जा सकता है. चिया सीड्स में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाए जाते हैं, जो ब्लड वेसल्स में सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं. बादाम अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बेहतर बनाने में सहायक माने जाते हैं, जबकि ओट्स फाइबर की मात्रा बढ़ाते हैं. 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मानसून में बढ़ जाते हैं आई फ्लू के मामले, आंखों को सुरक्षित रखने के लिए अपनाएं ये जरूरी उपाय

मानसून में बढ़ जाते हैं आई फ्लू के मामले, आंखों को सुरक्षित रखने के लिए अपनाएं ये जरूरी उपाय


एक्सपर्ट्स के अनुसार, मानसून में बढ़ी हुई नमी, वायरल, बैक्टीरियल इन्फेक्शन, गंदा पानी और लोगों के बीच नजदीकी आई  कॉन्टेक्ट आई फ्लू के तेजी से फैलने की प्रमुख वजह बन जाते हैं. यह इन्फेक्शन घर, स्कूल, ऑफिस और पब्लिक प्लेस पर आसानी से फैलता है. ऐसे में आंखों की सुरक्षा और समय पर सावधानी बरतना बहुत जरूरी होता है.

कंजंक्टिवाइटिस आंख की उस पतली झिल्ली में सूजन आने की स्थिति है, जो आंख के सफेद हिस्से और पलकों के अंदरूनी भाग को ढकती है. यह संक्रमण वायरस, बैक्टीरिया या एलर्जी की वजह से हो सकता है. इस बीमारी में आंखें लाल हो जाती है, आंखों में पानी आने लगता है और कई बार आंखों में चिपचिपा पदार्थ भी जमा होने लगता है. बच्चों में यह समस्या ज्यादा तेजी से फैलती है, क्योंकि वह बार-बार आंखों को छूते हैं.

कंजंक्टिवाइटिस आंख की उस पतली झिल्ली में सूजन आने की स्थिति है, जो आंख के सफेद हिस्से और पलकों के अंदरूनी भाग को ढकती है. यह संक्रमण वायरस, बैक्टीरिया या एलर्जी की वजह से हो सकता है. इस बीमारी में आंखें लाल हो जाती है, आंखों में पानी आने लगता है और कई बार आंखों में चिपचिपा पदार्थ भी जमा होने लगता है. बच्चों में यह समस्या ज्यादा तेजी से फैलती है, क्योंकि वह बार-बार आंखों को छूते हैं.

Published at : 20 Jun 2026 04:59 PM (IST)

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