अगर बार बार हो रहा व्हाइट वॉटर डिस्चार्ज तो संभल जाएं, इस गंभीर बीमारी का हो सकता है खतरा

अगर बार बार हो रहा व्हाइट वॉटर डिस्चार्ज तो संभल जाएं, इस गंभीर बीमारी का हो सकता है खतरा


White Water Discharge: महिलाओं के शरीर में समय-समय पर कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते रहते हैं. उम्र बढ़ने, पीरियड्स, प्रेग्नेंसी या तनाव जैसी स्थितियों का असर सीधे उनकी सेहत पर पड़ता है. इन बदलावों के कारण शरीर में कई तरह के परिवर्तन देखने को मिलते हैं, जिनमें व्हाइट वॉटर डिस्चार्ज यानी सफेद पानी आना भी शामिल है. आमतौर पर यह एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन अगर यह बार-बार होने लगे या इसके साथ बदबू, खुजली और जलन जैसी समस्याएं भी दिखाई दें, तो यह किसी स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है. ऐसे में इसे नजरअंदाज करने के बजाय इसके कारणों और लक्षणों को समझना बेहद जरूरी है. 

इन लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज

सामान्य सफेद पानी आमतौर पर बिना बदबू का और हल्के सफेद रंग का होता है. लेकिन अगर डिस्चार्ज का रंग पीला, हरा या भूरा होने लगे, उसमें तेज बदबू आने लगे या प्राइवेट पार्ट में खुजली और जलन महसूस हो, तो यह संक्रमण का संकेत हो सकता है.  वहीं कुछ मामलों में पेशाब करते समय दर्द या जलन भी महसूस हो सकती है.  डॉक्टरों के अनुसार ऐसे लक्षण बैक्टीरियल वेजिनोसिस, यीस्ट इंफेक्शन या पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज (PID) जैसी समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं.  अगर समस्या लगातार बनी रहे तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए. 

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बार-बार डिस्चार्ज होने के पीछे क्या हैं कारण?

बार-बार व्हाइट डिस्चार्ज होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं. हार्मोन में बदलाव, तनाव, थकान, खराब साफ-सफाई और संक्रमण इसके मुख्य कारण माने जाते हैं. वहीं  पीरियड्स, प्रेग्नेंसी या हार्मोनल बदलाव के दौरान भी इसकी मात्रा बढ़ सकती है.  वहीं गंदे या बहुत टाइट कपड़े पहनना, लंबे समय तक नमी बने रहना और प्राइवेट हाइजीन का ध्यान न रखना संक्रमण का खतरा बढ़ा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सफेद पानी के साथ दर्द, खुजली या दुर्गंध हो तो यह केवल सामान्य बदलाव नहीं बल्कि किसी बीमारी का संकेत भी हो सकता है. 

बचाव और इलाज के लिए अपनाएं ये आसान उपाय

इस समस्या से बचने के लिए रोजाना साफ-सफाई का ध्यान रखना जरूरी है. हमेशा सूती अंडरवियर पहनें और उन्हें नियमित रूप से बदलें. ज्यादा केमिकल वाले साबुन और खुशबूदार प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कम करें. खाने में दही, छाछ और विटामिन-सी से भरपूर फलों को शामिल करें क्योंकि ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं. इसके अलावा पर्याप्त पानी पिएं और तनाव कम करने की कोशिश करें. अगर घरेलू उपाय अपनाने के बाद भी 5 से 7 दिनों तक समस्या में सुधार न हो या लक्षण बढ़ते जाएं, तो तुरंत गायनाकोलॉजिस्ट से सलाह लेना चाहिए. सही समय पर इलाज करवाने से बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है. 

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वजन तो घटेगा, लेकिन मांसपेशियां हो सकती हैं कमजोर! Ozempic लेने वालों के लिए चेतावनी

वजन तो घटेगा, लेकिन मांसपेशियां हो सकती हैं कमजोर! Ozempic लेने वालों के लिए चेतावनी


Weight Loss Drug: आजकल वजन कम करने के लिए लोग कई तरह के तरीके अपना रहे हैं. जिसमें Ozempic नाम की दवा काफी चर्चा में चल रही है. वहीं दुनिया भर में लाखों लोग इस दवा का इस्तेमाल डायबिटीज कंट्रोल करने और वजन घटाने के लिए कर रहे हैं. इस दवा में मौजूद Semaglutide भूख को कम करने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति कम खाना खाता है और उसका वजन तेजी से घटने लगता है. लेकिन अब विशेषज्ञों ने एक ऐसी बात बताई है, जिस पर ध्यान देना बहुत जरूरी है. इससे वजन घटाने के दौरान सिर्फ चर्बी ही नहीं, बल्कि शरीर की मांसपेशियां भी कमजोर हो सकती हैं. यही वजह है कि डॉक्टर अब लोगों को सिर्फ दवा पर भरोसा करने के बजाय व्यायाम को भी अपनी दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दे रहे हैं. 

सिर्फ वजन कम होना ही काफी नहीं

जब कोई व्यक्ति वजन कम करना चाहता है, तो उसका मकसद शरीर की अतिरिक्त चर्बी घटाना होता है. लेकिन कई बार वजन कम होने के साथ-साथ मांसपेशियों का भी नुकसान होने लगता है जो की शरीर के लिए अच्छी बात नहीं मानी जाती है, क्योंकि मांसपेशियां हमारे शरीर को ताकत देती हैं, चलने-फिरने में मदद करती हैं और शरीर की ऊर्जा को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं. वहीं अगर मांसपेशियां ज्यादा कमजोर हो जाएं, तो व्यक्ति जल्दी थक सकता है और लंबे समय तक अपना वजन कंट्रोल रखना भी मुश्किल हो सकता है.  खासकर बढ़ती उम्र के लोगों के लिए यह समस्या और ज्यादा चिंता की बात बन सकती है. 

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रिसर्च में क्या सामने आया?

यूरोपियन एथेरोस्क्लेरोसिस सोसायटी (EAS) कांग्रेस 2026 में पेश की गई एक नई स्टडी में इस मुद्दे पर खास ध्यान दिया गया.  शोधकर्ताओं ने मोटापे और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त चूहों पर अध्ययन किया. कुछ चूहों को केवल Semaglutide दिया गया, कुछ को सिर्फ एक्सरसाइज कराई गई और कुछ को दोनों चीजें साथ में दी गईं. 14 हफ्तों बाद जो नतीजे सामने आए, वे काफी दिलचस्प थे.  सिर्फ Semaglutide लेने वाले समूह में शरीर की चर्बी 31 प्रतिशत तक कम हुई, लेकिन उनकी लीन मास यानी मांसपेशियों में 11 प्रतिशत की कमी भी देखी गई.  वहीं जिन चूहों को दवा के साथ नियमित व्यायाम भी कराया गया, उनमें चर्बी 45 प्रतिशत तक घटी और मांसपेशियों का नुकसान केवल 8 प्रतिशत तक सीमित रहा. 

एक्सरसाइज ने दिया बड़ा फायदा

शोध में यह भी देखा गया कि दवा और एक्सरसाइज का मेल सिर्फ वजन कम करने तक सीमित नहीं रहा. इससे इंसुलिन की कार्यक्षमता बेहतर हुई, खून में फैट का स्तर सुधरा और शरीर में सूजन भी कम हुई है. इतना ही नहीं, लिवर में जमा अतिरिक्त चर्बी भी कम देखने को मिला है. सबसे खास बात यह रही कि जिन चूहों ने दवा के साथ एक्सरसाइज की, उनकी मांसपेशियों की ताकत और पकड़ने की क्षमता में भी सुधार हुआ. यानी शरीर सिर्फ पतला नहीं हुआ, बल्कि ज्यादा मजबूत भी बना.

हालांकि यह अध्ययन अभी जानवरों पर किया गया है और इंसानों पर और रिसर्च की जरूरत है, लेकिन इसके नतीजे एक साफ संदेश देते हैं कि अगर आप Ozempic जैसी दवाओं से वजन कम कर रहे हैं, तो नियमित एक्सरसाइज को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.  सही मायनों में स्वस्थ वजन घटाने का रास्ता दवा और व्यायाम, दोनों के संतुलित मेल से होकर गुजरता है. 

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किडनी खराब होने से पहले शरीर नहीं देता बड़ा संकेत, डॉक्टर की चेतावनी- देर होने का न करें इंतजार

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Kidney Health Tips: हम में से ज्यादातर लोग मानते हैं कि कोई भी गंभीर बीमारी आने से पहले शरीर कुछ न कुछ संकेत जरूर देता है. लेकिन किडनी की बीमारी के मामले में अक्सर ऐसा नहीं होता. यही वजह है कि डॉक्टर इसे “साइलेंट डिजीज” यानी चुपचाप बढ़ने वाली बीमारी कहते हैं. वहीं किडनी हमारे शरीर के सबसे जरूरी अंगों में से एक है. यह खून को साफ करती है, शरीर से गंदगी बाहर निकालती है, पानी का संतुलन बनाए रखती है और तो ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में भी मदद करती है. लेकिन किडनी की सबसे बड़ी खासियत ही कई बार सबसे बड़ा खतरा बन जाती है.

 डॉक्टरों के मुताबिक किडनी इतनी मजबूत होती है कि नुकसान होने के बाद भी लंबे समय तक अपना काम करती रहती है. इसी कारण कई लोगों को तब तक पता नहीं चलता कि उनकी किडनी खराब हो रही है, जब तक बीमारी काफी आगे नहीं बढ़ जाती. 

किडनी की बीमारी को क्यों कहा जाता है ‘साइलेंट किलर’?

विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी की बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और शुरुआती दौर में कोई साफ लक्षण नहीं दिखते. वहीं कई लोग पूरी तरह सामान्य जीवन जीते रहते हैं और उन्हें लगता है कि वे पूरी तरह स्वस्थ हैं.  लेकिन अंदर ही अंदर किडनी लगातार कमजोर होती रहती है.  डॉक्टर के अनुसार, जब लोगों को पहली बार बीमारी का पता चलता है, तब तक कई मामलों में किडनी अपनी 85 से 90 प्रतिशत तक क्षमता खो चुकी होती है. यही वजह है कि केवल लक्षणों का इंतजार करना खतरनाक हो सकता है. वहीं कई मरीजों को बीमारी का पता तब चलता है जब किसी सामान्य हेल्थ चेकअप में रिपोर्ट खराब आती है या फिर अचानक ऐसी स्थिति बन जाती है कि डायलिसिस की जरूरत पड़ने लगती है. इसलिए डॉक्टर बार-बार लोगों को नियमित जांच कराने की सलाह देते हैं. 

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देर से पता चलने पर मरीज और परिवार दोनों पर पड़ता है असर

किडनी की बीमारी का देर से पता चलना सिर्फ शरीर के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी बड़ा झटका साबित हो सकता है. डॉक्टर बताते हैं कि कई मामलों में ऐसा होता है कि मरीज अस्पताल पहुंचते समय खुद को पूरी तरह स्वस्थ मानते हैं, लेकिन जांच के बाद उन्हें पता चलता है कि उनकी किडनी गंभीर रूप से खराब हो चुकी होती है. ऐसे में मरीज और उनके परिवार दोनों के लिए इस सच्चाई को स्वीकार करना आसान नहीं होता. वहीं अचानक डायलिसिस, लंबे इलाज और भविष्य की चिंता लोगों को परेशान कर देती है.  इलाज का खर्च, जीवनशैली में बदलाव और आगे की योजना जैसी कई बातें एक साथ सामने आ जाती हैं. यही कारण है कि डॉक्टर कहते हैं कि बीमारी को शुरुआती दौर में पकड़ लेना सबसे बेहतर रास्ता है. 

किन लोगों को ज्यादा खतरा और कैसे बचाएं अपनी किडनी?

डॉक्टरों के अनुसार कुछ लोगों में किडनी की बीमारी का खतरा ज्यादा होता है. इनमें डायबिटीज के मरीज, हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोग, किडनी की बीमारी का पारिवारिक इतिहास रखने वाले लोग, मोटापे से जूझ रहे व्यक्ति, धूम्रपान करने वाले, दिल के मरीज और 60 साल से अधिक उम्र के लोग शामिल होते हैं.   इसलिए ऐसे लोगों को नियमित रूप से किडनी की जांच कराने कि सलाह दी जाती है. 

वहीं अच्छी बात यह है कि किडनी को सुरक्षित रखने के लिए बहुत मुश्किल कदम उठाने की जरूरत नहीं होती. इसके लिए ब्लड प्रेशर और शुगर को नियंत्रण में रखना, पर्याप्त पानी पीना, कम नमक वाला संतुलित भोजन खाना, नियमित व्यायाम करना, धूम्रपान और ज्यादा शराब से बचना तथा बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द की दवाओं का अधिक इस्तेमाल न करना किडनी को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है. डॉक्टरों का साफ कहना है कि किडनी की बीमारी का इंतजार लक्षणों से नहीं, बल्कि समय पर जांच से करना चाहिए. क्योंकि सही समय पर पता चल जाए तो किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. 

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क्या आपका शरीर Detox मांग रहा है? पहचानें संकेत और जानें उपाय

क्या आपका शरीर Detox मांग रहा है? पहचानें संकेत और जानें उपाय


Detox Your Body Tips: क्या आपका शरीर टॉक्सिन्स से भर गया है? हमारा शरीर खुद को साफ करता है, लेकिन खराब खानपान और प्रदूषण के कारण कभी-कभी इसे बाहर से भी मदद की जरूरत होती है. आइए जानते हैं वे संकेत जो बताते हैं कि आपके शरीर को डिटॉक्स की जरूरत है.

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

सुबह उठते ही थकावट महसूस करना

क्या आप 8 घंटे की नींद के बाद भी थका हुआ महसूस करते हैं? बिना काम किए कमजोरी लगना शरीर में जमी गंदगी का बड़ा संकेत है. जब लिवर और पेट पर टॉक्सिन्स का दबाव बढ़ता है, तो शरीर की एनर्जी खत्म होने लगती है.

पेट का फूलना और लगातार गैस बनना

अगर आपका पेट हमेशा भारी रहता है, गैस बनती है या कब्ज की समस्या है, तो समझ लें कि आपका पाचन तंत्र खराब हो रहा है. लिवर में गंदगी जमा होने से खाना ठीक से नहीं पचता.

चेहरे पर अचानक दाने होना

महंगे फेस वॉश लगाने के बाद भी पिंपल्स, मुंहासे या डल स्किन की समस्या अगर दूर नहीं हो रही है तो यह संकेत है कि आपका  लिवर खून को साफ नहीं कर पा रहा है, और शरीर त्वचा के रास्ते गंदगी बाहर निकाल रहा है. चमकदार त्वचा के लिए पेट की सफाई जरूरी है.

डाइटिंग के बाद भी अगर वजन नहीं घट रहा

अगर आप कम खा रहे हैं और वर्कआउट भी कर रहे हैं, फिर भी वजन कम नहीं हो रहा, तो इसका कारण टॉक्सिन्स हो सकते हैं. ये शरीर के मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देते हैं, जिससे फैट बर्न होना बंद हो जाता है.

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ये आसान घरेलू उपाय जो कर देंगे शरीर को साफ

शरीर को डिटॉक्स करना बहुत आसान है:

  • रोज सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का रस और शहद मिलाकर पिएं. यह लिवर को तुरंत साफ करता है.
  • खीरा, पुदीना, धनिया और पालक का जूस हफ्ते में तीन बार पिएं. यह खून को साफ करता है.
  • कुछ दिनों के लिए पैकेट बंद खाना, ज्यादा मीठा और तली-भुनी चीजों से पूरी तरह दूरी बना लें.
  • दिन में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पिएं ताकि गंदगी यूरिन के रास्ते बाहर निकल जाए.

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20 से 40 की उम्र में थकान-झनझनाहट दे अलर्ट तो समझें गंभीर बीमारी का संकेत, एक्सपर्ट की चेतावनी

20 से 40 की उम्र में थकान-झनझनाहट दे अलर्ट तो समझें गंभीर बीमारी का संकेत, एक्सपर्ट की चेतावनी


Early Symptoms Of Multiple Sclerosis In Young Adults: कई बीमारियां ऐसी होती हैं जो अचानक तेज लक्षणों के साथ सामने आती हैं, इसलिए लोग उन्हें जल्दी पहचान लेते हैं. लेकिन कुछ बीमारियां चुपचाप शरीर में अपनी जगह बना लेती हैं और उनके शुरुआती संकेत इतने सामान्य लगते हैं कि लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं. मल्टीपल स्क्लेरोसिस यानी एमएस ऐसी ही एक बीमारी है. भारत में आज भी इसके कई मामले समय पर पकड़ में नहीं आते, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षणों को अक्सर तनाव, कमजोरी, थकान या पोषण की कमी समझ लिया जाता है. यही वजह है कि कई मरीज सही बीमारी का पता चलने से पहले वर्षों तक भटकते रहते हैं.

क्या होते हैं मल्टीपल स्क्लेरोसिस के लक्षण?

हाथ या पैरों में झनझनाहट होना, कुछ दिनों तक धुंधला दिखाई देना, अचानक चक्कर आना या लगातार थकान महसूस होना ऐसे संकेत हैं जिन्हें लोग आम समस्या मान लेते हैं. कई बार ये लक्षण कुछ समय बाद अपने आप ठीक भी हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति को लगता है कि अब सब सामान्य है. लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि यही सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है. शरीर में दिखाई देने वाला यह छोटा बदलाव दिमाग और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकता है. 

क्यों इसके मामले देर से पता चलते हैं?

डॉ अंशु रस्तोगी बताती हैं कि भारत में मल्टीपल स्क्लेरोसिस के कई मामले इसलिए सामने नहीं आ पाते क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण बहुत हल्के और अस्थायी होते हैं. मरीजों को हाथ-पैरों में झनझनाहट, मांसपेशियों में जकड़न, सुन्नपन, कुछ समय के लिए धुंधला दिखना, चक्कर आना या बिना वजह थकान महसूस हो सकती है. कई बार ये समस्याएं कुछ दिनों या हफ्तों में कम हो जाती हैं, इसलिए लोग मान लेते हैं कि बीमारी खत्म हो गई. जबकि हकीकत में यह नसों को नुकसान पहुंचाने वाली प्रक्रिया का संकेत हो सकता है.

मल्टीपल स्क्लेरोसिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की इम्यून क्षमता गलती से नसों की सुरक्षा करने वाली परत पर हमला करने लगती है. इससे ब्रेन और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. समस्या यह है कि हर मरीज में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं. किसी को नजर से जुड़ी परेशानी हो सकती है, किसी को संतुलन बनाने में दिक्कत हो सकती है, जबकि कुछ लोगों में शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो सकती है. यही कारण है कि बीमारी की पहचान करना कई बार मुश्किल हो जाता है.

किस उम्र के लोगों को होती है सबसे ज्यादा दिक्कत?

एक्सपर्ट के अनुसार 20 से 40 साल की उम्र के लोगों में यह बीमारी ज्यादा देखी जाती है और महिलाओं में इसके मामले पुरुषों की तुलना में अधिक पाए जाते हैं. लेकिन इस आयु वर्ग के लोगों में थकान, चक्कर, कमजोरी या मनोदशा में बदलाव जैसी समस्याओं को अक्सर काम के दबाव, चिंता या शरीर में पोषक तत्वों की कमी से जोड़ दिया जाता है. डॉ.  का कहना है कि कई मरीज कई बार बीमारी के दौर से गुजरने के बाद ही एक्सपर्ट चिकित्सक तक पहुंच पाते हैं. तब तक बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है. 

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भारत में क्या है इस बीमारी की स्थिति?

भारत में लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि मल्टीपल स्क्लेरोसिस बहुत कम लोगों को होने वाली बीमारी है। इसी सोच के कारण इसके प्रति जागरूकता भी सीमित रही. हालांकि अब जांच सुविधाओं और दिमाग से जुड़ी बीमारियों के उपचार में बढ़ोतरी के बाद पहले की तुलना में ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं. फिर भी छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में विशेषज्ञ चिकित्सकों और अच्छी जांच सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को सही इलाज तक पहुंचने में काफी समय लग जाता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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मास्टरशेफ विनर पंकज भदौरिया को ब्रेस्ट कैंसर, 50 के पार महिलाओं में क्यों बढ़ जाता है खतरा?

मास्टरशेफ विनर पंकज भदौरिया को ब्रेस्ट कैंसर, 50 के पार महिलाओं में क्यों बढ़ जाता है खतरा?


MasterChef Winner Pankaj Bhadouria Breast Cancer: मास्टरशेफ इंडिया सीजन 1 की विजेता और मशहूर सेलिब्रिटी शेफ पंकज भदौरिया ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक इमोशनल पोस्ट शेयर कर बताया कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर का पता चला है. इस पोस्ट के सामने आने के बाद उनके फैंस में चिंता बढ़ गई है. पंकज भदौरिया ने लोगों से अपनी सेहत के लिए स्पोर्ट की अपील भी की है. 

ब्रेस्ट कैंसर दुनिया भर में महिलाओं में पाए जाने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है. हर साल लाखों महिलाएं इस बीमारी की चपेट में आती हैं, हालांकि यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन 50 साल की उम्र के बाद इसका खतरा काफी बढ़ जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ शरीर में होने वाले हार्मोनल और जैविक बदलाव इसकी बड़ी वजह बनते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर ब्रेस्ट कैंसर क्या है, 50 साल के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है और इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं. 

क्या होता है ब्रेस्ट कैंसर?

ब्रेस्ट कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसमें ब्रेस्ट की कुछ कोशिकाएं असामान्य तरीके से बढ़ने लगती हैं. समय के साथ ये कोशिकाएं एक गांठ या ट्यूमर का रूप ले सकती हैं. अगर समय रहते इसका इलाज न कराया जाए तो कैंसर कोशिकाएं शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकती हैं. यही वजह है कि डॉक्टर शुरुआती पहचान और समय पर इलाज को बेहद जरूरी मानते हैं. 

50  के बाद महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा क्यों हो जाता है?

1. विशेषज्ञों के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम भी बढ़ता जाता है. खासतौर पर 50 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं के शरीर में कई ऐसे बदलाव होते हैं जो कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं. 

2.महिलाओं में एक उम्र के बाद पीरियड्स बंद हो जाते हैं, जिसे मेनोपॉज कहा जाता है. इस दौरान शरीर में हार्मोन का संतुलन बदलने लगता है. हार्मोन में होने वाले अंतर ब्रेस्ट के टिशू को प्रभावित कर सकते हैं और असामान्य कोशिकाओं के विकसित होने का खतरा बढ़ा सकते हैं. यही कारण है कि मेनोपॉज के बाद ब्रेस्ट कैंसर के मामले ज्यादा देखने को मिलते हैं.

3. हमारे शरीर की कोशिकाएं लगातार काम करती रहती हैं.बढ़ती उम्र के साथ डीएनए में छोटी-छोटी परेशानियां जमा होने लगती हैं.सामान्य परिस्थितियों में शरीर इनकी मरम्मत कर लेता है, लेकिन उम्र बढ़ने पर यह क्षमता कमजोर होने लगती है. इससे खराब कोशिकाओं के तेजी से बढ़ने और कैंसर में बदलने का खतरा बढ़ जाता है. 

4. 50 वर्ष के बाद महिलाओं में वजन बढ़ने की समस्या आम हो जाती है.विशेषज्ञों के अनुसार शरीर में अतिरिक्त चर्बी एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर को बढ़ा सकती है. जब शरीर में फैट ज्यादा होता है तो सूजन की स्थिति भी बनी रहती है, जो कैंसर कोशिकाओं के बढ़ने के लिए तैयार कर सकती है. 

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किन महिलाओं को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है?

कुछ महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा सामान्य से ज्यादा हो सकता है. जैसे परिवार में किसी को पहले ब्रेस्ट कैंसर रहा हो,  ज्यादा वजन या मोटापे की समस्या, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, देर से मेनोपॉज होना, अस्वस्थ खानपान और लाइफस्टाइल, धूम्रपान और शराब का सेवन इन स्थितियों में नियमित जांच कराना और स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना जरूरी हो जाता है. 

ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती लक्षण क्या हैं?

ब्रेस्ट कैंसर के शुरुआती चरण में अक्सर दर्द नहीं होता, इसलिए कई महिलाएं इसके संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं. हालांकि कुछ लक्षण ऐसे हैं जिन्हें बिल्कुल भी हल्के में नहीं लेना चाहिए.  जैसे स्तन या बगल में गांठ, स्तन के आकार में बदलाव, स्किन में बदलाव, निप्पल में बदलाव, निप्पल से असामान्य डिसचार्ज. डॉक्टरों का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर का जितना जल्दी पता चल जाता है, उसका इलाज उतना ही आसान और सफल होता है. शुरुआती अवस्था में कैंसर आमतौर पर ब्रेस्ट तक ही सीमित रहता है. ऐसे में सर्जरी, दवाओं और अन्य ट्रीटमेंट से बचाव किया जा सकता है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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