जरूरत से ज्यादा विटामिन D तो नहीं ले रहे आप, जानें इससे किडनी और दिल को कितना खतरा?

जरूरत से ज्यादा विटामिन D तो नहीं ले रहे आप, जानें इससे किडनी और दिल को कितना खतरा?


विटामिन D हमारे शरीर के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है. अगर शरीर में इसकी कमी होती है तो यह हमारे लिए काफी खतरनाक साबित होती है. जैसे कि आप इसकी कमी के चलते बार-बार बीमार पड़ने लगते हैं, हड्डियों में दर्द होने लगता है, इसके साथ ही आप डिप्रेशन और मूड स्विंग्स जैसी दिक्कतों का भी सामना करते हैं. यही कारण है कि इसकी मात्रा को भरपूर बनाए रखने के लिए लोग सप्लीमेंट का इस्तेमाल करने लगते हैं, ताकि शरीर में विटामिन D की मात्रा बनी रहे. हालांकि यह आगे चलकर आपके लिए खतरनाक साबित हो सकता है. चलिए आपको बताते हैं कि ज़रूरत से ज़्यादा विटामिन D का सेवन करना आपके लिए कितना खतरनाक हो सकता है.

ज्यादा विटामिन D क्यों है आपके लिए खतरनाक?

अगर आप बिना डॉक्टर या किसी एक्सपर्ट की सलाह के इसकी मात्रा को बढ़ाने के लिए सप्लीमेंट्स का सेवन करते हैं तो यह टॉक्सिसिटी का कारण बन सकता है. मात्रा ज्यादा होने के चलते बाद में यह आपके किडनी और लिवर को डैमेज कर सकता है. यही कारण है कि विटामिन D टॉक्सिसिटी से बचने के लिए इसका सीमित मात्रा में सेवन करने की सलाह दी जाती है. यह किडनी या लिवर को कैसे डैमेज करेगा, इसके बारे में जानने से पहले चलिए आपको बताते हैं कि विटामिन D टॉक्सिसिटी का मतलब क्या होता है. इसका मतलब होता है कि शरीर में इस विटामिन की मात्रा जरूरत से ज़्यादा हो गई है. यह स्थिति तब होती है, जब लोग खुद से इसका इस्तेमाल करने लगते हैं. कभी-कभी प्रिस्क्राइब की गई डोज से जब आप ज्यादा दवा का सेवन करते हैं, तो भी यह स्थिति बन सकती है. अगर आप इसका सेवन लगातार जारी रखते हैं, तो ब्लड में कैल्शियम जमा होने लगता है, जो आपके लिए आगे चलकर गंभीर हो सकता है.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

शरीर में विटामिन D की मात्रा बढ़ने का पता आपको समय के साथ धीरे-धीरे चलता है और जब तक आपको इसका पता चलता है, तब तक आप समय रहते इसके लक्षणों को नहीं पहचान पाते हैं. यह बाद में चलकर लिवर या किडनी फेल्योर की वजह बन सकता है. अगर इसके लक्षणों की बात करें तो इसके प्रमुख लक्षण कुछ इस तरह हैं:-

  • पाचन संबंधी दिक्कतें: इसमें आपको पेट खराब होने, उल्टी की समस्या, भूख की कमी और पेट दर्द के साथ कब्ज की समस्या होने लगती है.
  • किडनी और लिवर डैमेज: अगर आपको किडनी या लिवर की समस्या होती है तो इसमें आपको बार-बार पेशाब आता है, बार-बार प्यास लगती है और किडनी में स्टोन की समस्या के साथ लिवर डैमेज हो सकता है.
  • हड्डियों और जोड़ों में दर्द: आपको शरीर के जोड़ों में दर्द का अनुभव होने लगता है. ऐसा लगता है कि मानो हड्डियों में बहुत दर्द है.

कब बचाव जरूरी है?

अगर इसके बचाव की बात करें तो आप विटामिन D के किसी सप्लीमेंट का सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह लें. जांच के बाद जैसे वे बताते हैं, उसी अनुसार इसका सेवन करें. सामान्य तौर पर एक एडल्ट के के लिए इसकी सही मात्रा प्रत्येक दिन लगभग 600 IU विटामिन D होती है.

क्या कहते हैं डॉक्टर?

सीनियर न्यूरोसर्जन डॉ. अरुण एल. नाइक ने अपने वीडियो में समझाया कि भारत में लोग बिना जांच और डॉक्टर की सलाह के विटामिन D सप्लीमेंट लेना शुरू कर देते हैं, जिससे शरीर में कैल्शियम का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है. यह आगे चलकर किडनी, हार्ट और हड्डियों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि सही मात्रा और सही समय पर ही विटामिन D लेना सुरक्षित है, और इसे हमेशा ब्लड टेस्ट और डॉक्टर की गाइडेंस के आधार पर ही लेना चाहिए.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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चेहरे पर दिखाई दे ये 6 संकेत समझ जाएं किडनी होने वाली है फेल, तुरंत जाएं अस्पताल

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आंखों के आसपास सूजन: अगर सुबह उठते ही आपकी आंखों के नीचे या आसपास सूजन (पफीनेस) बनी रहती है, तो यह सिर्फ नींद की कमी या एलर्जी नहीं हो सकती. किडनी की खराबी में शरीर में पानी रुकने लगता है, जिससे चेहरे के इस हिस्से में सूजन आ जाती है.

चेहरा पीला या फीका पड़ना: किडनी सही से काम न करने पर खून में रेड ब्लड सेल्स की संख्या कम हो जाती है, जिससे एनीमिया हो सकता है. इसका असर चेहरे पर पीलेपन या फीकेपन के रूप में दिखता है, चाहे आप आराम कर रहे हों या धूप में हों.

चेहरा पीला या फीका पड़ना: किडनी सही से काम न करने पर खून में रेड ब्लड सेल्स की संख्या कम हो जाती है, जिससे एनीमिया हो सकता है. इसका असर चेहरे पर पीलेपन या फीकेपन के रूप में दिखता है, चाहे आप आराम कर रहे हों या धूप में हों.

होंठ और त्वचा का सूखना: किडनी की समस्या में शरीर में नमी की कमी होने लगती है. इसका असर होंठों के फटने, त्वचा के रूखेपन और चेहरे पर चमक कम होने के रूप में दिख सकता है.

होंठ और त्वचा का सूखना: किडनी की समस्या में शरीर में नमी की कमी होने लगती है. इसका असर होंठों के फटने, त्वचा के रूखेपन और चेहरे पर चमक कम होने के रूप में दिख सकता है.

चेहरे पर असामान्य लालिमा या चकत्ते: जब किडनी खराब होती है, तो खून में मौजूद टॉक्सिन बाहर नहीं निकल पाते और स्किन पर असर डालते हैं. चेहरे पर लाल धब्बे, चकत्ते या खुजली इसी वजह से हो सकती है.

चेहरे पर असामान्य लालिमा या चकत्ते: जब किडनी खराब होती है, तो खून में मौजूद टॉक्सिन बाहर नहीं निकल पाते और स्किन पर असर डालते हैं. चेहरे पर लाल धब्बे, चकत्ते या खुजली इसी वजह से हो सकती है.

आंखों के नीचे काले घेरे: किडनी की बीमारी में शरीर थका-थका महसूस करता है और नींद की गुणवत्ता भी कम हो जाती है. इसका सीधा असर आंखों के नीचे डार्क सर्कल्स के रूप में दिखने लगता है.

आंखों के नीचे काले घेरे: किडनी की बीमारी में शरीर थका-थका महसूस करता है और नींद की गुणवत्ता भी कम हो जाती है. इसका सीधा असर आंखों के नीचे डार्क सर्कल्स के रूप में दिखने लगता है.

चेहरा अचानक फूलना: अगर कुछ दिनों में ही आपका चेहरा फूला हुआ लगे या बिना किसी कारण वजन बढ़ जाए, तो यह शरीर में फ्लूइड रिटेंशन का संकेत हो सकता है, जो किडनी के खराब होने का शुरुआती लक्षण है.

चेहरा अचानक फूलना: अगर कुछ दिनों में ही आपका चेहरा फूला हुआ लगे या बिना किसी कारण वजन बढ़ जाए, तो यह शरीर में फ्लूइड रिटेंशन का संकेत हो सकता है, जो किडनी के खराब होने का शुरुआती लक्षण है.

Published at : 13 Aug 2025 02:01 PM (IST)

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बच्चों के लिए सोने का सही वक्त कौन-सा, जानें कब और कितना सोना सबसे सही?

बच्चों के लिए सोने का सही वक्त कौन-सा, जानें कब और कितना सोना सबसे सही?


नींद का बच्चों की लर्निंग, इम्यूनिटी, कॉन्फिडेंस और मेंटल-फिजिकल हेल्थ पर बहुत गहरा असर होता है. डॉ. पवन मांडविया के अनुसार, सही समय पर नींद लेना बहुत जरूरी है.

डॉ. आरेश सिंह कहते हैं कि बच्चों को रात 9 से 10 बजे के बीच सो जाना चाहिए, क्योंकि इस समय ग्रोथ हार्मोन सबसे ज्यादा बनता है. यह मसल्स और दिमाग के विकास के लिए बहुत जरूरी है.

डॉ. आरेश सिंह कहते हैं कि बच्चों को रात 9 से 10 बजे के बीच सो जाना चाहिए, क्योंकि इस समय ग्रोथ हार्मोन सबसे ज्यादा बनता है. यह मसल्स और दिमाग के विकास के लिए बहुत जरूरी है.

अगर बच्चा देर से सोता है और नींद पूरी नहीं करता तो उसकी ग्रोथ और मानसिक विकास पर बुरा असर पड़ता है. ऐसी स्थिति में बच्चे की पढ़ाई और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी कमजोर हो जाती है.

अगर बच्चा देर से सोता है और नींद पूरी नहीं करता तो उसकी ग्रोथ और मानसिक विकास पर बुरा असर पड़ता है. ऐसी स्थिति में बच्चे की पढ़ाई और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता भी कमजोर हो जाती है.

बच्चा अगर देर से सोएगा तो दिनभर चिड़चिड़ा रहेगा और उसके व्यवहार में बदलाव आ सकते हैं. नींद की कमी से उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और मेंटल हेल्थ पर भी बुरा असर पड़ता है.

बच्चा अगर देर से सोएगा तो दिनभर चिड़चिड़ा रहेगा और उसके व्यवहार में बदलाव आ सकते हैं. नींद की कमी से उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है और मेंटल हेल्थ पर भी बुरा असर पड़ता है.

नींद की कमी से बच्चे को एंजाइटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक परेशानियां भी हो सकती हैं, इसलिए बच्चे का समय पर सोना और पूरी नींद लेना बहुत जरूरी है.

नींद की कमी से बच्चे को एंजाइटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक परेशानियां भी हो सकती हैं, इसलिए बच्चे का समय पर सोना और पूरी नींद लेना बहुत जरूरी है.

0 से 6 महीने के बच्चे को रात 8 बजे सोना चाहिए, 6 से 12 महीने के बच्चे को शाम साढ़े छह से साढ़े सात बजे के बीच, 1 से 2 साल के बच्चे को शाम 7 बजे सोना चाहिए.

0 से 6 महीने के बच्चे को रात 8 बजे सोना चाहिए, 6 से 12 महीने के बच्चे को शाम साढ़े छह से साढ़े सात बजे के बीच, 1 से 2 साल के बच्चे को शाम 7 बजे सोना चाहिए.

3 से 5 साल के बच्चे को रात 8 बजे सोना चाहिए, 6 से 13 साल के बच्चों को रात 9 बजे सोना चाहिए और 14 से 17 साल के किशोरों को रात 10 बजे तक सो जाना चाहिए. अगर बच्चे ने 9 से 10 बजे के बीच सोया तो सुबह 7 बजे उठना चाहिए.

3 से 5 साल के बच्चे को रात 8 बजे सोना चाहिए, 6 से 13 साल के बच्चों को रात 9 बजे सोना चाहिए और 14 से 17 साल के किशोरों को रात 10 बजे तक सो जाना चाहिए. अगर बच्चे ने 9 से 10 बजे के बीच सोया तो सुबह 7 बजे उठना चाहिए.

Published at : 13 Aug 2025 01:28 PM (IST)

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टॉयलेट सीट से भी ज्यादा गंदा होता है आपका तकिया, जानें कितने कीटाणुओं का होता है घर

टॉयलेट सीट से भी ज्यादा गंदा होता है आपका तकिया, जानें कितने कीटाणुओं का होता है घर


Pillow Hygiene Tips: हम दिन का एक बड़ा हिस्सा सोने में बिताते हैं और इस दौरान हमारा चेहरा और बाल तकिए के बेहद करीब होते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि, जिस तकिए पर आप चैन की नींद लेते हैं, वह वास्तव में कितना साफ है? हैरानी की बात यह है कि, आपका तकिया टॉयलेट सीट से भी ज्यादा गंदा हो सकता है. 

डॉ. एच. एस. चंद्रिका के अनुसार, तकिए में समय के साथ धूल, पसीना, त्वचा की मृत कोशिकाएं, तेल और नमी जमा होकर बैक्टीरिया और फंगस घर बना देती हैं. 

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तकिए की मुलायम परतों में कई तरह के गंदे जीव पनपते हैं

  • बैक्टीरिया: तकिए में स्टेफिलोकोकस और ई.कोलाई जैसे बैक्टीरिया पाए जा सकते हैं, जो त्वचा संक्रमण और एलर्जी का कारण बनते हैं
  • फंगस: नमी और पसीने के कारण तकिए में फंगस का विकास होता है, जो सांस संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकता है
  • डस्ट: ये छोटे कीड़े त्वचा की मृत कोशिकाओं पर जीवित रहते हैं और एलर्जी, छींक या अस्थमा को ट्रिगर कर सकते हैं

क्यों तकिया बन जाता है टॉयलेट सीट से ज्यादा गंदा

टॉयलेट सीट को लोग नियमित रूप से साफ करते हैं, लेकिन तकिए की सफाई अक्सर महीनों तक नहीं होती. लगातार इस्तेमाल से उसमें जमा पसीना, तेल और धूल की परतें एक ऐसा वातावरण तैयार करती हैं, जहां बैक्टीरिया और फंगस तेजी से पनपते हैं.

  • गंदे तकिए के स्वास्थ्य पर प्रभाव
  • त्वचा संबंधी समस्याएं– मुंहासे, रैशेज और खुजली का कारण
  • सांस की दिक्कतें– धूल और फंगस अस्थमा व एलर्जी को बढ़ा सकते हैं
  • सिरदर्द और थकान– गंदे तकिए पर सोने से नींद की गुणवत्ता कम हो जाती है, जिससे थकान महसूस होती है

तकिए को साफ रखने के आसान तरीके

  • तकिए का कवर हर हफ्ते बदलें
  • तकिए का कवर बैक्टीरिया और धूल के पहले संपर्क में आता है, इसलिए इसे नियमित रूप से धोना जरूरी है
  • तकिए को धूप में सुखाएं
  • धूप बैक्टीरिया और फंगस को मारने में मदद करती है। महीने में कम से कम एक बार तकिए को धूप में रखें
  • वॉशेबल तकिया इस्तेमाल करें
  • ऐसे तकिए चुनें जिन्हें मशीन में धोया जा सके, ताकि अंदर जमा गंदगी भी साफ हो सके

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तीन साल में एम्स से 429 डॉक्टरों ने दिया इस्तीफा, जानिए इसके पीछे की बड़ी वजह

तीन साल में एम्स से 429 डॉक्टरों ने दिया इस्तीफा, जानिए इसके पीछे की बड़ी वजह


AIIMS Doctors Resignation: देश में एम्स को इलाज और मेडिकल शिक्षा का सर्वोच्च संस्थान माना जाता है. यहां काम करना किसी भी डॉक्टर के लिए गर्व की बात होती है. लेकिन बीते तीन सालों में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चिंता बढ़ाने वाले हैं. 2022 से 2024 के बीच देशभर के 20 एम्स संस्थानों से कुल 429 डॉक्टरों ने इस्तीफा दे दिया है. सवाल यह है कि आखिर क्यों डॉक्टर इस प्रतिष्ठित संस्थान को छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं?

कहां से कितने डॉक्टर छोड़ रहे एम्स? 

सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा इस्तीफे दिल्ली एम्स से हुए, जहां 52 डॉक्टरों ने नौकरी छोड़ी. इसके अलावा ऋषिकेश में 38, रायपुर में 35 और बिलासपुर में 32 डॉक्टरों ने इस्तीफा दिया है. बाकी 20 संस्थानों में भी यह सिलसिला जारी है. अब यह मरीजों की सुविधा पर भी असर डाल सकता है. 

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प्राइवेट सेक्टर में चार से दस गुना ज्यादा सैलरी

रिपोर्ट के अनुसार, एम्स छोड़ने का सबसे बड़ा कारण वेतन का अंतर है. प्राइवेट अस्पतालों में डॉक्टरों को एम्स की तुलना में चार से दस गुना अधिक पैसा मिलता है. ऐसे में कई डॉक्टर बेहतर आर्थिक अवसरों के लिए प्राइवेट सेक्टर की ओर रुख कर रहे हैं. 

वर्कलोड और लंबी ड्यूटी

एम्स जैसे सरकारी संस्थानों में मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा होती है, जिससे डॉक्टरों पर भारी वर्कलोड आ जाता है. लंबे घंटों की ड्यूटी और सीमित संसाधन उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से थका देते हैं. इसके मुकाबले प्राइवेट अस्पतालों में कार्य आरामदायक और बेहतर सुविधाओं के साथ चलता है. 

करियर ग्रोथ और रिसर्च के मौके

कई डॉक्टर मानते हैं कि प्राइवेट सेक्टर में रिसर्च प्रोजेक्ट्स, नई तकनीक के साथ काम करने और इंटरनेशनल लेवल पर जुड़ने के ज्यादा मौके मिलते हैं. वहीं, सरकारी संस्थानों में नौकरशाही प्रक्रियाएं और धीमी प्रणाली कई बार करियर ग्रोथ को धीमा कर देती हैं. 

लंबी कतारें और सेवाओं की कमी

डॉक्टरों के इस्तीफे का सीधा असर मरीजों पर पड़ता है. कम स्टाफ होने से एम्स में अपॉइंटमेंट्स के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है. सर्जरी और अन्य जरूरी इलाज में देरी हो सकती है, जिससे गंभीर मरीजों की मुश्किलें बढ़ेंगी. 

कैसे रोक सकते हैं इस्तीफे 

एक्सपर्ट्स का मानना है कि डॉक्टरों को एम्स में बनाए रखने के लिए वेतन में सुधार, वर्क-लाइफ बैलेंस, रिसर्च के अवसर और बेहतर सुविधाएं जरूरी हैं. अगर सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाती है, तो डॉक्टरों का पलायन कम हो सकता है. 

एम्स से डॉक्टरों का इस्तीफा केवल संस्थान की समस्या नहीं, बल्कि पूरे हेल्थ सेक्टर के लिए चेतावनी है. अगर यह सिलसिला यूं ही चलता रहा, तो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ेगा और आम लोगों की पहुंच अच्छे इलाज तक और कठिन हो जाएगी. समय रहते समाधान ढूंढना ही इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता है. 

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IBS और कोलन कैंसर में क्या होता है अंतर? एक जैसे लक्षण कर देते हैं कंफ्यूज

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आईबीएस (इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम) और कोलन कैंसर दोनों ही पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियां हैं और इन दोनों में पेट दर्द, गैस बनना, और पाखाने की आदतों में बदलाव जैसे लक्षण समान हो सकते हैं. लेकिन ये दोनों पूरी तरह अलग बीमारी हैं. आईबीएस एक लंबी बीमारी होती है जो आपके आंत के काम करने के तरीके को प्रभावित करती है, लेकिन यह जानलेवा नहीं होती. वहीं, कोलन कैंसर एक गंभीर बीमारी है, जिसमें कोलन या रेक्टम की कोशिकाओं में असामान्य और अनियंत्रित वृद्धि होने लगती है. दोनों को एक जैसे समझना सही इलाज में देरी कर सकता है, इसलिए इनके बीच फर्क समझना जरूरी है.

कोलन कैंसर और आईबीएस के कारण

आईबीएस को एक फंक्शनल गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल डिसऑर्डर माना जाता है, जिसका मतलब है कि इससे कोलन को कोई दिखने वाला नुकसान नहीं होता, लेकिन आंत की मांसपेशियों और नसों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है. इसके कारण तनाव, चिंता, कुछ खाने से एलर्जी, संक्रमण या हार्मोनल बदलाव हो सकते हैं. इसके असली कारण अभी पूरी तरह नहीं समझे गए हैं, लेकिन माना जाता है कि दिमाग और आंत के बीच संचार में गड़बड़ी होती है.

वहीं कोलन कैंसर अनुवांशिक म्यूटेशन की वजह से होता है, जिससे कोशिकाओं का अनियंत्रित विकास शुरू हो जाता है. यह आमतौर पर कोलन की परत में छोटे और गैर-कैंसरयुक्त पॉलीप्स के रूप में शुरू होता है, जो समय के साथ कैंसर में बदल सकते हैं. इसके जोखिम बढ़ाने वाले कारणों में उम्र (खासकर 45 साल से ऊपर), रेड मीट और प्रोसेस्ड मीट ज्यादा खाने की आदत, निष्क्रिय जीवनशैली, धूम्रपान, शराब का सेवन, परिवार में कोलन कैंसर का इतिहास, और कुछ सूजन वाली आंत की बीमारियां शामिल हैं.

कोलन कैंसर के लक्षण

कोलन कैंसर के शुरुआती लक्षण हल्के और धीरे-धीरे बढ़ने वाले होते हैं. इसमें पाचन तंत्र की आदतों में लगातार बदलाव, जैसे दस्त या कब्ज, मल का आकार पतला होना, मल में खून आना, बिना वजह वजन कम होना, और लगातार थकान महसूस होना शामिल है. ये लक्षण समय के साथ बिगड़ते हैं और तनाव या खाने से जुड़े नहीं होते.

पेट दर्द में फर्क

आईबीएस में पेट का दर्द ऐंठन जैसा होता है और आमतौर पर निचले पेट में महसूस होता है. यह दर्द गैस या पाखाना करने से कम हो जाता है. दर्द दिनभर घटता-बढ़ता रहता है और कई बार तुरंत टॉयलेट जाने की जल्दी भी होती है.

कोलन कैंसर में दर्द तब होता है जब कैंसर बढ़ चुका हो. यह लगातार और दबाव जैसा महसूस होता है, जो पाखाना करने से कम नहीं होता. कभी-कभी पेट या मलाशय में भरा हुआ महसूस होता है, खासकर जब ट्यूमर आंत के रास्ते को बंद कर रहा हो.

थकान और वजन कम होना, क्यों खतरे की बात है?

आईबीएस में वजन आमतौर पर स्थिर रहता है, जब तक कि व्यक्ति बहुत सारे खाने से परहेज न करे या कम न खाए. थकान तनाव या नींद की कमी से हो सकती है, लेकिन यह सीधे आईबीएस का लक्षण नहीं है. वहीं, बिना वजह वजन कम होना और लगातार थकान कोलन कैंसर के प्रमुख संकेत होते हैं. कैंसर की कोशिकाएं शरीर की ऊर्जा खपाती हैं, जिससे कमजोरी और थकान होती है. इसलिए अगर वजन घट रहा है और आप बहुत थका हुआ महसूस कर रहे हैं, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.

कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?

अगर आपकी उम्र 45 से ऊपर है या आईबीएस के लक्षण अचानक बदल जाएं जैसे लगातार कब्ज या दस्त, मल में खून, बिना वजह वजन कम होना, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें. कॉलोनोस्कोपी या अन्य टेस्ट से कोलन कैंसर की पुष्टि या खारिज़ की जा सकती है. समय पर जांच से कैंसर का इलाज सफल हो सकता है.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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