हार्ट-शुगर और डाइजेशन का ‘ऑल-इन-वन’ इलाज, जानें मोटे अनाज को डाइट में शामिल करने के 5 बड़े कारण

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क्या कभी नहीं बंद हो सकती डायबिटीज की दवा, क्या है सच?

क्या कभी नहीं बंद हो सकती डायबिटीज की दवा, क्या है सच?


What Happens If You Stop Diabetes Medication: डायबिटीज संभालना आसान नहीं है. रोज़ ब्लड शुगर चेक करना, खानपान कंट्रोल रखना, एक्टिव रहना और समय पर दवा लेना, ये सब लगातार अनुशासन मांगते हैं. ऐसे में कई बार लोग अचानक दवा बंद करने का फैसला कर लेते हैं. वजह अलग-अलग हो सकती है, इसमें “शुगर नॉर्मल” दिख रही है, रोज गोली खाने से थकान हो गई है, दवा के साइड इफेक्ट का डर है या किसी ने कह दिया कि हर्बल इलाज ज्यादा बेहतर है शामिल होते हैं.

लेकिन सच यह है कि डायबिटीज की दवा अचानक बंद करना सुरक्षित नहीं है. डायबिटीज एक लंबी अवधि की बीमारी है, जो लगातार कंट्रोल मांगती है. अगर शुगर लेवल ठीक दिख रहा है, तो अक्सर इसका मतलब यह है कि दवा काम कर रही है, बीमारी खत्म नहीं हुई है. 

दवा अचानक बंद करने से क्या होती है दिक्कत?

 हेल्थ मामलों में जानकारी देने वाली फार्मा बेवसाइट healingpharma की रिपोर्ट के अनुसार,  दवा अचानक बंद करते ही ब्लड शुगर कुछ घंटों या दिनों में तेजी से बढ़ सकता है. इसे हाइपरग्लाइसीमिया कहते हैं. इसके लक्षण हो सकते हैं, बहुत ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, धुंधला दिखना, थकान, चक्कर, घाव देर से भरना और हाथ-पैरों में झनझनाहट. अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो यह गंभीर और जानलेवा दिक्कत में बदल सकता है.

किस डायबिटीज में दवा बंद करना कितना खतरनाक?

टाइप 1 डायबिटीज में अचानक इंसुलिन बंद करना और भी खतरनाक है. इससे डायबिटिक कीटोएसिडोसिस हो सकता है, जिसमें शरीर ग्लूकोज की जगह फैट जलाने लगता है और खून में कीटोन नामक एसिड बढ़ जाते हैं. तेज सांस चलना, उल्टी, पेट दर्द, सांस में मीठी गंध, भ्रम या अत्यधिक थकान इसके संकेत हैं. समय पर इलाज न मिले तो कोमा या मौत तक हो सकती है.

लंबे समय तक अनकंट्रोल शुगर किडनी फेल्योर, नसों को नुकसान, आंखों की रोशनी कम होना, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का कारण बन सकती है. कभी-कभी दवा “कभी-कभी” छोड़ना भी नुकसानदेह है, क्योंकि इससे शुगर में खतरनाक उतार-चढ़ाव होता है और डॉक्टर के लिए सही इलाज तय करना मुश्किल हो जाता है. अनरेगुलर से दवा का असर भी कम पड़ सकता है, जिससे आगे चलकर ज्यादा डोज़ की जरूरत पड़ सकती है.

तो क्या दवा कभी कम या बंद नहीं हो सकती? 

 healingpharma की रिपोर्ट बताते है कि  कुछ मामलों में, खासकर टाइप 2 डायबिटीज के शुरुआती चरण में, वजन घटाने, संतुलित भोजन और नियमित व्यायाम से दवा की जरूरत कम हो सकती है. लेकिन यह केवल डॉक्टर की निगरानी में, नियमित मॉनिटरिंग के साथ ही संभव है. अगर  HbA1c लंबे समय तक कंट्रोल में रहता है,तो डॉक्टर इसके बारे में सोचते हैं. इसलिए अगर आप दवा में बदलाव सोच रहे हैं, तो पहले डॉक्टर से बात करें, शुगर की नियमित रिकॉर्डिंग रखें, संतुलित भोजन लें, पर्याप्त पानी पिएं और दवा नियमित रूप से लेते रहें. हमेशा एक चीज याद रखें किडायबिटीज मैनेज की जा सकती है, लेकिन खुद से प्रयोग करना खतरनाक हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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कैसे काम करती है डायलिसिस मशीन, यह कैसे करती है किडनी की मदद?

कैसे काम करती है डायलिसिस मशीन, यह कैसे करती है किडनी की मदद?


How Does a Dialysis Machine Help Kidneys: डायलिसिस कराने वाले मरीज इस प्रक्रिया की रूटीन से अच्छी तरह परिचित होते हैं. क्लिनिक पहुंचना, वजन मापना, तापमान और ब्लड प्रेशर चेक कराना, सुई लगना यदि कैथेटर न हो, फिर ट्यूबों को डायलाइजर से जोड़ना और कुछ घंटों तक कुर्सी पर बैठना,, यह सब उनकी नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है. लेकिन इंतज़ार के उन घंटों में क्या कभी आपने सोचा है कि आखिर यह डायलिसिस मशीन काम कैसे करती है और किडनी की मदद कैसे करती है?. चलिए आपको बताते हैं विस्तार से. 

कैसे काम करती है मशीन

सबसे पहले समझते हैं कि मशीन करती क्या है. किडनी हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली davita के अनुसार, डायलिसिस मशीन एक लिक्विड तरल तैयार करती है जिसे डायलिसेट कहा जाता है. यही तरल आपके खून से गंदगी और अतिरिक्त अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है. यह शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स और मिनरल्स का संतुलन भी बनाए रखने में सहायक होता है. इलाज के दौरान मशीन लगातार आपके शरीर से बाहर बह रहे खून के फ्लो पर नजर रखती है. कभी-कभी जो अलार्म बजता है, वह इसी निगरानी प्रणाली का हिस्सा है,ताकि स्टाफ को पता चल सके कि कुछ जांचने की जरूरत है.

मशीन के पास रखे प्लास्टिक के कनस्तर दरअसल डायलिसेट बनाने के लिए जरूरी घोल रखते हैं. इनमें एक एसिडिक घोल जिसमें इलेक्ट्रोलाइट्स और मिनरल्स होते हैं, बाइकार्बोनेट जो बेकिंग सोडा जैसा होता है और शुद्ध पानी शामिल होते हैं. मशीन इन सभी को मिलाकर सही अनुपात में डायलिसेट तैयार करती है. इलाज के दौरान आपका खून और डायलिसेट डायलाइजर के अंदर एक साथ बहते हैं, लेकिन वे सीधे संपर्क में नहीं आते. खून से गंदगी छनकर डायलिसेट में चली जाती है और बाद में वह तरल नाली में बहा दिया जाता है.

खून शरीर से बाहर और वापस अंदर कैसे जाता है?

 इसके लिए विशेष ब्लड ट्यूबिंग होती है, जो आपके एक्सेस से खून को डायलाइजर तक ले जाती है. यह ट्यूब एक ब्लड पंप से होकर गुजरती है, जो गोल घुमाव में चलता है. यही पंप खून को आगे बढ़ाता है और फिल्टर होने के बाद वापस शरीर में भेज देता है. इलाज के दौरान खून के थक्के न बनें, इसके लिए हेपेरिन नामक दवा दी जाती है. डॉक्टर हर मरीज के लिए इसकी मात्रा तय करते हैं. यह दवा सिरिंज के जरिए मशीन में लगे हेपेरिन पंप से धीरे-धीरे खून की ट्यूब में जाती रहती है, ताकि खून जमने न पाए.

सुरक्षा के लिए होते हैं एयर ट्रैप 

सुरक्षा के लिए मशीन में एयर ट्रैप लगे होते हैं, जो खून की ट्यूब में हवा जाने से रोकते हैं. अगर हवा का बुलबुला अंदर चला भी जाए, तो सेंसर तुरंत पंप बंद कर देता है और अलार्म बज उठता है. तब तक ब्लड फ्लो को रोका जाता है जब तक समस्या दूर न हो जाए. मशीन लगातार ब्लड के दबाव, प्रवाह, तापमान और डायलिसेट के मिश्रण की जांच करती रहती है. किसी भी गड़बड़ी पर अलार्म बजता है और जरूरत पड़ने पर ब्लड या लिक्किड का प्रवाह रोक दिया जाता है. यही वजह है कि इलाज के दौरान कई बार अलग-अलग अलार्म सुनाई देते हैं, ये आपकी सुरक्षा के लिए होते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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यूरिन की समस्या को न करें इग्नोर! किडनी से लेकर हार्ट तक की गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत

यूरिन की समस्या को न करें इग्नोर! किडनी से लेकर हार्ट तक की गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत


Is Frequent Urination a Sign of Diabetes: यूरिन संबंधी सेहत को अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं. बार-बार यूरिन आना, जलन होना या यूरिन की धार कमजोर होना जैसी समस्याओं को कई लोग मामूली मान लेते हैं या उम्र बढ़ने का हिस्सा समझते हैं. लेकिन ये लक्षण शरीर के भीतर चल रही किसी बड़ी समस्या का संकेत भी हो सकते हैं. समय रहते ध्यान न दिया जाए तो छोटी परेशानी गंभीर बीमारी में बदल सकती है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. माधव सान्जगिरी ने मनीकंट्रोल से बात करते हुए कहा कि शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर इलाज बेहद जरूरी है. आज जांच और इलाज के आधुनिक तरीकों की वजह से कई यूरोलॉजिकल बीमारियों को शुरुआती चरण में ही कंट्रोल किया जा सकता है. उदाहरण के लिए, एक साधारण-सी लगने वाली यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन अगर समय पर ठीक न की जाए तो इंफेक्शन यूरिनरी ब्लैडर से किडनी तक फैल सकता है. इससे किडनी में गंभीर इंफेक्शन, यहां तक कि सेप्सिस जैसी जानलेवा स्थिति भी पैदा हो सकती है.

क्या होते हैं इसके लक्षण?

कभी-कभी किडनी की बीमारी लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के बढ़ती रहती है. यूरिन कम आना या यूरिन में खून आना शुरुआती संकेत हो सकते हैं. क्रॉनिक किडनी डिजीज कई बार तब पकड़ में आती है, जब काफी नुकसान हो चुका होता है. पुरुषों में यूरिन शुरू करने में दिक्कत, बूंद-बूंद टपकना या रात में बार-बार यूरिन के लिए उठना प्रोस्टेट से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है. अक्सर इसे सामान्य बढ़ती उम्र का असर समझ लिया जाता है, लेकिन कभी-कभी यह इंफेक्शन या कैंसर का भी संकेत हो सकता है.

महिलाओं में क्या दिखते हैं संकेत?

महिलाओं में पेशाब रोक न पाना या अचानक तेज पेशाब लगना आमतौर पर उम्र से जोड़ा जाता है, लेकिन यह ब्लैडर की काम करने की क्षमता या नसों से जुड़ी समस्या का परिणाम भी हो सकता है. अगर अनदेखा किया जाए तो यह डेली लाइफ, नींद और मेंटल हेल्थ पर असर डाल सकता है. यूरिन में दर्द या खून आने जैसे लक्षण पथरी की ओर इशारा कर सकते हैं. किडनी या ब्लैडर स्टोन बड़े होकर रुकावट, इंफेक्शन और तेज दर्द का कारण बन सकते हैं.

हार्ट की हो सकती है समस्या

रात में बार-बार पेशाब आना डायबिटीज या हार्ट संबंधी समस्या का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. खून में शुगर बढ़ने पर किडनी को ज्यादा काम करना पड़ता है, जिससे यूरिन की मात्रा बढ़ जाती है. एक्सपर्ट का मानना है कि यूरिन संबंधी लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए. समय पर जांच से इलाज आसान, सस्ता और कम दिक्कत हो सकता है. शरीर के संकेतों को समझकर डॉक्टर से सलाह लेना न सिर्फ ब्लैडर की सेहत बल्कि पूरे शरीर की भलाई के लिए जरूरी है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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गुड़-शहद सुरक्षित और जामुन-मेथी से बीमारी छूमंतर? जानें डायबिटीज से जुड़े इन दावों का असली सच

गुड़-शहद सुरक्षित और जामुन-मेथी से बीमारी छूमंतर? जानें डायबिटीज से जुड़े इन दावों का असली सच


Can You Cure Diabetes with Herbs: आज के दौर में सुपरफूड और चमत्कारी डाइट्स सोशल मीडिया पर तेजी से ट्रेंड करती हैं. ऐसे में सच और भ्रम के बीच फर्क समझना बेहद जरूरी हो गया है, खासकर तब जब भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज के साथ जी रहे हैं. कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल की कंसल्टेंट डाइटीशियन ऐश्वर्या ए. कुम्भाकोणी ने HT को  डायबिटीज का इलाज किसी एक मसाले या घरेलू नुस्खे से नहीं होता, बल्कि इसके लिए एक व्यवस्थित और व्यक्तिगत योजना की जरूरत होती है.

भारतीय घरों में अक्सर यह माना जाता है कि मेथी दाना, जामुन या दालचीनी डायबिटीज को “ठीक” कर सकते हैं. ऐश्वर्या साफ कहती हैं कि अब तक किसी एक खाद्य पदार्थ को डायबिटीज का इलाज साबित नहीं किया गया है। कुछ चीजें संतुलित आहार का हिस्सा बन सकती हैं, लेकिन ब्लड शुगर कंट्रोल के लिए दवा, नियमित व्यायाम और लगातार मॉनिटरिंग जरूरी है.

क्या हैं इसको लेकर मिथक?

एक आम मिथक यह है कि ज्यादा चीनी खाने से सीधे डायबिटीज हो जाती है. असल में, रिफाइंड शुगर और हाई-कैलोरी खाद्य पदार्थों का बार-बार सेवन वजन बढ़ाता है, खासकर पेट के आसपास की चर्बी, जिससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है. पैकेज्ड जूस, कोल्ड ड्रिंक और एनर्जी ड्रिंक जैसी मीठी चीजें टाइप 2 डायबिटीज के जोखिम से जुड़ी हैं. वहीं टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून स्थिति है. फल को लेकर भी भ्रम है कि डायबिटीज में इन्हें पूरी तरह छोड़ देना चाहिए. एक्सपर्ट के अनुसार, फल में प्राकृतिक शुगर होती है, लेकिन साथ में फाइबर, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट भी होते हैं. सही मात्रा में और जूस की बजाय साबुत फल लेना बेहतर विकल्प है.

क्या शुगर फ्री सही है?

गुड़ और शहद को चीनी से ज्यादा सुरक्षित मानना भी सही नहीं. तीनों ही साधारण कार्बोहाइड्रेट हैं और ब्लड शुगर तेजी से बढ़ा सकते हैं. इसी तरह, चावल को पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है. मात्रा नियंत्रित रखें और उसे दाल, सब्जी और प्रोटीन के साथ संतुलित करें. “शुगर-फ्री” मिठाइयों को भी खुलकर खाना सुरक्षित नहीं है. इनमें फैट और कैलोरी अधिक हो सकती है. वहीं यह भी सच है कि डायबिटीज सिर्फ मोटे लोगों को नहीं होती. दुबले दिखने वाले लोगों में भी अंदरूनी चर्बी इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ा सकती है. ऐश्वर्या के अनुसार, डायबिटीज का कोई चमत्कारी इलाज नहीं है. मेडिकल न्यूट्रिशन थेरेपी, संतुलित भोजन, फाइबर और प्रोटीन का सही अनुपात, और नियमित लाइफस्टाइल ही लंबी अवधि में बेहतर परिणाम देती है. सही जानकारी के साथ लिया गया पोषण ही सेहत की असली ताकत है.

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रमजान में रोजा कैसे रखें डायबिटीज के मरीज, डॉक्टर से जानें फास्टिंग विंडो मैनेज करने का तरीका

रमजान में रोजा कैसे रखें डायबिटीज के मरीज, डॉक्टर से जानें फास्टिंग विंडो मैनेज करने का तरीका


Can People with Type 2 Diabetes Fast During Ramadan: रमजान का रोजा बेहद अहम होता है, लेकिन डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए इसे सोच-समझकर रखने की जरूरत होती है. सही तैयारी, संतुलित भोजन, पर्याप्त पानी और डॉक्टर की सलाह के साथ कई लोग सुरक्षित तरीके से रोजा रख सकते हैं. बिना प्लानिंग के लंबे समय तक भूखे-प्यासे रहने से ब्लड शुगर अचानक गिर या बढ़ सकती है, डिहाइड्रेशन हो सकता है और मुश्किलें पैदा हो सकती हैं.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

डॉ. अंशुल सिंह ने TOI को बताया कि रोजा शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. ब्लड शुगर की नियमित जांच करना भी उतना ही अहम है और इससे रोजा नहीं टूटता. शुगर लेवल अचानक गिरने या बढ़ने का समय रहते पता चल जाता है. डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. राजीव कोविल के अनुसार सबसे पहले “रिस्क स्ट्रैटिफिकेशन” जरूरी है. जिन लोगों की टाइप 2 डायबिटीज कंट्रोल में है, वे मेडिकल निगरानी में रोजा रख सकते हैं. लेकिन जिन मरीजों को किडनी रोग, हार्ट डिजीज, हार्ट फेल्योर, गर्भावस्था या हालिया इंफेक्शन है, उन्हें रोजा रखने से बचना चाहिए. दवाओं में बदलाव भी जरूरी हो सकता है, खासकर अगर मरीज इंसुलिन या सल्फोनाइलयूरिया ले रहा हो. सुबह की डोज़ कम या शाम में शिफ्ट की जा सकती है ताकि शुगर बहुत नीचे न गिरे.

आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

सहरी का खाना संतुलित होना चाहिए, धीरे पचने वाले कार्बोहाइड्रेट, पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर शामिल हों. जैसे ओट्स उपमा के साथ उबला अंडा, बेसन चीला के साथ दही, ग्रिल्ड चिकन और मिलेट रोटी, या सब्ज़ी ऑमलेट. नमकीन और ज्यादा मीठे भोजन से बचें क्योंकि ये प्यास बढ़ाते हैं और शुगर तेजी से बढ़ा सकते हैं. इफ्तार में रोजा धीरे-धीरे खोलें. खजूर परंपरा का हिस्सा है, लेकिन उसकी मात्रा कार्बोहाइड्रेट गिनती में शामिल करें. एक खजूर और पानी से शुरुआत करें, फिर कुछ देर बाद हल्का सूप लें. प्लेट में आधी मात्रा बिना स्टार्च वाली सब्जियों की, चौथाई भाग प्रोटीन जैसे कि चिकन, मछली, दाल और चौथाई भाग साबुत अनाज रखें. तले हुए पकवान और अत्यधिक मिठाई से बचें, क्योंकि रात में शुगर तेजी से बढ़ सकती है.

ब्लड ग्लूकोज चेक कराना जरूरी

डॉ. डेविड चैंडी बताते हैं कि दिन में कई बार ब्लड ग्लूकोज चेक करना जरूरी है, जिसमें सहरी से पहले, दोपहर में, शाम को और इफ्तार के दो घंटे बाद. यदि शुगर 70 mg/dL से कम या 300 mg/dL से ज्यादा हो जाए या चक्कर, पसीना, कमजोरी या डिहाइड्रेशन के लक्षण हों, तो तुरंत रोजा तोड़ देना चाहिए. हाइड्रेशन भी बेहद जरूरी है. इफ्तार और सहरी के बीच 8 से 10 गिलास तरल लें, जिसमें नींबू पानी, इन्फ्यूज़्ड वाटर, छाछ, सूप या हर्बल चाय बेहतर विकल्प हैं. कैफीन सीमित रखें. एक्सपर्ट का कहना है कि रमजान और डायबिटीज साथ-साथ चल सकते हैं, लेकिन शर्त है कि तैयारी, संतुलन और मेडिकल निगरानी सही से होना चाहिए. 

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