कुरकुरे के टुकड़े ने ली युवक की जान! Food Choking कितना खतरनाक, कैसे बचाई जा सकती है जान?

कुरकुरे के टुकड़े ने ली युवक की जान! Food Choking कितना खतरनाक, कैसे बचाई जा सकती है जान?


Food Choking: हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने सभी को झकझोर कर रख दिया है. यहां 28 वर्षीय युवक की मौत सिर्फ इसलिए हो गई, क्योंकि कुरकुरे का एक टुकड़ा उसकी सांस की नली में फंस गया था. इस हादसे के बाद न सिर्फ परिवार बल्कि पूरा गांव सदमे में है. एक्सपर्ट का कहना है कि खाने के दौरान की गई छोटी सी लापरवाही भी कई बार जानलेवा साबित हो सकती है. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं कि फूड चोकिंग कितना खतरनाक है और इससे कैसे जान बचाई जा सकती है. 

कुरकुरा खाते ही बिगड़ी थी तबीयत 

जानकारी के अनुसार, अर्की उपमंडल की घनागुघाट पंचायत के ताल गांव निवासी हेमंत शर्मा कसौली के एक निजी होटल में काम करते थे. परिजनों के अनुसार, वह घर पर कुरकुरे खा रहे थे, तभी उनका एक टुकड़ा गले में फंस गया. कुछ ही देर में उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगी और हालत गंभीर होती चली गई. परिवार के लोग तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए पीजीआई चंडीगढ़ रेफर कर दिया. पीजीआई में डॉक्टरों ने इलाज किया लेकिन तमाम कोशिशें के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी. युवक की मौत की खबर मिलते ही गांव और आसपास के इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई. 

क्या होता है फूड चोकिंग? 

एक्सपर्ट्स के अनुसार, जब कोई खाने का पदार्थ सांस की नली में फंस जाता है और फेफड़ों तक हवा पहुंचने का रास्ता बाधित कर देता है तो इस स्थिति को फूड चोकिंग कहा जाता है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी हो सकती है, क्योंकि शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलने पर कुछ ही मिनट में गंभीर नुकसान हो सकता है. 

ये भी पढ़ें-Postmortem: पोस्टमॉर्टम से कैसे पता लगती है मौत की वजह, जानिए क्या संकेत देते हैं शरीर के ऑर्गन?

गले में क्यों फंस जाता है खाना? 

डॉक्टर बताते हैं कि हमारे गले में एपिग्लॉटिस नाम का एक हिस्सा होता है, जो खाने और सांस की नली के बीच संतुलन बनाए रखना है. जब कोई व्यक्ति खाना खाते समय बात करता है, हंसता है या बहुत तेजी से निगलता है तो खाने का टुकड़ा गलत रास्ते में जाकर श्वास नली में फंस सकता है. ऐसी स्थिति में सांस लेने में कठिनाई शुरू हो जाती है. 

किसी के गले में खाना फंस जाए तो क्या करें?

एक्सपर्ट के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति के गले में खाना फंस जाए और वह खांस पा रहा है तो उसे लगातार खांसने के लिए कहना चाहिए. क्योंकि कई बार इससे फंसी हुई वस्तु बाहर निकल आ जाती है. अगर स्थिति गंभीर हो तो व्यक्ति को आगे की ओर झुकाकर पीठ के ऊपरी हिस्से पर जोरदार थपकी दी जा सकती है. इसके अलावा एक्सपर्ट व्यक्ति हेमलिच मैनूवर का इस्तेमाल भी कर सकता है. इस प्रक्रिया में पीड़ित के पीछे खड़े होकर पेट के ऊपरी हिस्से पर दबाव डाला जाता है, जिससे फेफड़ों में मौजूद हवा के दबाव से फंसी हुई वस्तु बाहर निकल सकती है.

ये भी पढ़ें-Oral Health: बार-बार सूज रहे मसूड़े या खराब रहती है ओरल हेल्थ तो न करें नजरअंदाज, हो सकती हैं बांझपन की शिकार

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

वजन घटाने के लिए छोड़ रहे हैं शुगर, मीठे की जरूरत के लिए ये हैं हेल्दी ऑप्शन

वजन घटाने के लिए छोड़ रहे हैं शुगर, मीठे की जरूरत के लिए ये हैं हेल्दी ऑप्शन


Best Sugar Options: आजकल की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में गलत खान-पान के कारण बढ़ता वजन एक गंभीर समस्या बन चुका है. ऐसे में वजन घटाने के क्रम में सबसे पहला और जरूरी कदम सफेद चीनी को अपनी डाइट से पूरी तरह बाहर करना होता है. इस शुगर को एम्प्टी कैलोरी कहा जाता है, क्योंकि इसमें कोई पोषक तत्व नहीं होते और यह शरीर में सीधे फैट के रूप में जमा होती है. 

जब हम अचानक चीनी छोड़ देते हैं तो शरीर में शुगर क्रेविंग्स यानी मीठा खाने की तीव्र इच्छा होने लगती है. इस स्थिति में खुद को रोकना बेहद मुश्किल हो जाता है और कई लोग अपनी वेट लॉस जर्नी बीच में ही छोड़ देते हैं. यहां ये बात ध्यान देने वाली है कि वजन घटाने का मतलब मीठे से हमेशा के लिए नाता तोड़ना नहीं है, बल्कि समझदारी से सही और सेहतमंद ऑप्शन चुनना है. आइए जानते हैं ऐसे ही कुछ नेचुरल और हेल्दी ऑप्शन्स के बारे में, जो बिना वजन बढ़ाए आपके इस स्वीट लव को पूरा करते हैं.

यह भी पढ़ें: Pimples Before Periods: पीरियड्स से पहले चेहरे पर आने लगते हैं पिंपल्स, समझिए शरीर का ये खास इशारा

1. स्टीविया- स्टीविया एक नेचरल प्लांट है, जिसकी पत्तियों से मीठा पाउडर या ड्रॉप्स तैयार की जाती हैं. यह चीनी से लगभग 200 गुना अधिक मीठा होता है, लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट बिल्कुल नहीं होते हैं. वहीं, यह ब्लड शुगर और इंसुलिन के लेवल को भी प्रभावित नहीं करता है. वजन घटाने वाले लोगों और डायबिटीज के मरीजों के लिए यह चीनी का सबसे सुरक्षित और बेहतरीन ऑप्शन है. इसे आप अपनी सुबह की चाय, कॉफी या नींबू पानी में आसानी से मिलाकर यूज कर सकते हैं. 

2. ताजे और मौसमी फल- जब भी दोपहर या शाम को मीठा खाने की तेज इच्छा हो, तो पेस्ट्री, चॉकलेट या बिस्कुट खाने के बजाय एक कटोरी ताजे फल खाएं. सेब, स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, संतरा, अमरूद और पपीता जैसे फलों में नेचुरल स्वीट्नेस (फ्रुक्टोज) होती है. इसके साथ ही इनमें प्रचुर मात्रा में फाइबर, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं. फाइबर के कारण ये फल धीरे-धीरे पचते हैं, जिससे ब्लड शुगर अचानक नहीं बढ़ता और पेट लंबे समय तक भरा रहता है. 

3. खजूर- ये बात तो आप जानते ही होंगे कि खजूर को प्रकृति का अनमोल उपहार माना जाता है. यह न केवल मीठा होता है बल्कि फाइबर, पोटेशियम, मैग्नीशियम और आयरन का एक बेहतरीन सोर्स भी है. वजन घटाने के दौरान अगर आपको मीठे की तेज क्रेविंग हो, तो आप 1 या 2 खजूर खा सकते हैं. इसके अलावा, घर पर वजन घटाने वाली स्मूदी, ओट्स या हेल्दी शेक बनाते समय चीनी की जगह खजूर के पेस्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है.  क्योंकि इसमें नेचुरल कैलोरी होती है, इसलिए इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करना ठीक रहता है. 

4. कच्चा शहद- सीमित मात्रा में लिया गया शुद्ध या जैविक शहद चीनी का एक बहुत अच्छा ऑप्शन है. सफेद चीनी के उलट, शहद में कई प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो शरीर को पाचन क्षमता को दुरुस्त करते हैं.  सुबह गुनगुने पानी में आधा चम्मच शहद और नींबू का रस मिलाकर पीने से शरीर के फैट को बर्न करने में मदद मिलती है. हालांकि, शहद में कैलोरी होती है, इसलिए इसका उपयोग केवल स्वाद बदलने के लिए कम मात्रा में ही करना चाहिए.

5. गुड़- सफेद चीनी के मुकाबले गुड़ एक बिना केमिकल प्रोसेस के तैयार किया गया बेहतर ऑप्शन है. वहीं, गुड़ में आयरन, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे जरूरी मिनरल्स होते हैं जो पाचन तंत्र को मजबूत करते हैं. भोजन करने के बाद अक्सर लोगों को मीठा खाने की आदत होती है, ऐसे में चीनी की बनी मिठाई की जगह एक छोटा टुकड़ा गुड़ खाने से मीठे की इच्छा भी शांत होती है और खाना भी आसानी से पच जाता है. 

6. मेवे- बादाम, काजू और अखरोट जैसे मेवे प्रोटीन और हेल्दी फैट से भरपूर होते हैं ऐसे में इनका सेवन जरूर करना चाहिए साथ ही मीठे की तलब मिटाने के लिए मुट्ठी भर भुने हुए मेवों के साथ थोड़ी सी किशमिश मिलाकर खाने से काफी फायदा होता है. 

यह भी पढ़ें: Precautions During Swimming: गर्मियों में स्वीमिंग करते वक्त कभी न करना ये गलती, वरना शरीर को हो जाएगा बड़ा नुकसान

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

इबोला का नया स्ट्रेन ग्लोबल इमरजेंसी घोषित, इससे भारत को कितना डरना चाहिए?

इबोला का नया स्ट्रेन ग्लोबल इमरजेंसी घोषित, इससे भारत को कितना डरना चाहिए?


Should India Be Worried About Ebola Virus: दुनिया एक बार फिर इबोला वायरस को लेकर सतर्क हो गई है. डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला के नए प्रकोप की पुष्टि हुई है और शुरुआती जेनेटिक जांच से संकेत मिले हैं कि यह वायरस कई हफ्तों, संभव है कई महीनों से चुपचाप फैल रहा था. सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस नए स्ट्रेन के व्यवहार और इसकी क्षमता को लेकर अभी भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले हैं. ऐसे में दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी यह सवाल उठने लगा है कि क्या इस वायरस से डरने की जरूरत है. 

कैसे फैलता है इबोला वायरस?

एक्सपर्ट  के अनुसार इबोला उन वायरसों में शामिल नहीं है जो हवा के जरिए तेजी से फैलते हैं. यह वायरस शरीर में तभी प्रवेश करता है जब इंफेक्टेड व्यक्ति के खून, लार, मल, यूरिन या अन्य शारीरिक द्रव के सीधे संपर्क में आया जाए. लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के एक्सपर्ट डॉ. डेविड हेमन, जिन्होंने 1976 में पहली बार इबोला पर स्टडी किया था, बताते हैं कि यह वायरस व्यक्ति से व्यक्ति में मुख्य रूप से शारीरिक लिक्यूड के जरिए फैलता है. यही कारण है कि मरीजों की देखभाल करने वाले स्वास्थ्यकर्मी और परिवार के सदस्य सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं. 

इसे भी पढ़ें  – जहां बन रहा खाना वहीं पनप रही बीमारी, क्या आपके बच्चों को भी बीमार कर रही किचन की सिंक?

शरीर में कैसे फैलता है यह?

वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद सीधे इम्यून सिस्टम पर हमला करता है. जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ मेंज के वायरोलॉजी प्रोफेसर डॉ. बोडो प्लाख्टर के अनुसार वायरस पहले लसीका ग्लैंड में अपनी संख्या बढ़ाता है और फिर खून के जरिए शरीर के अलग-अलग अंगों तक पहुंच जाता है.  यह उन सेल्स को निशाना बनाता है जो सामान्य परिस्थितियों में शरीर को इंफेक्शन से बचाती हैं. जब यही इन्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाता है तो वायरस तेजी से पूरे शरीर में फैलने लगता है.

पहचानना क्यों होता है मुश्किल?

इबोला की सबसे बड़ी चुनौती इसके शुरुआती लक्षण हैं. शुरुआत में मरीज को सामान्य बुखार, सर्दी, इंफेक्शन या मलेरिया जैसी परेशानी महसूस हो सकती है. कई बार मरीज को कुछ समय के लिए राहत भी महसूस होती है, लेकिन इसके बाद बीमारी गंभीर रूप ले सकती है. डॉ. डेविड हेमन के अनुसार बाद के चरण में शरीर के विभिन्न हिस्सों से ब्लड निकलने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. यही वह समय होता है जब मरीज सबसे ज्यादा संक्रामक होता है और इंफेक्शन फैलने का खतरा बढ़ जाता है. 

भारत में क्या स्थिति है?

अब सवाल यह है कि भारत को कितना डरना चाहिए. मई 2026 तक भारत में इबोला का कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया है. हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली बेवसाइट clinikk के एक्सपर्ट के आकलन के मुताबिक भारतीय आबादी के लिए फिलहाल सीधा खतरा कम है. देश के प्रमुख हवाई अड्डों पर निगरानी व्यवस्था, स्वास्थ्य जांच, बड़े अस्पतालों में त्वरित जांच सुविधाएं और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की चेतावनी सिस्टम संभावित मामलों की पहचान में मदद कर रही हैं. हालांकि अफ्रीकी देशों के साथ यात्रा और व्यापारिक संबंधों को देखते हुए सतर्कता बनाए रखना जरूरी माना जा रहा है.

इसे भी पढ़ें – Summer Fatigue: गर्मियों में बार-बार महसूस हो रही थकान, जान लें यह किस बीमारी का संकेत?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

यह विटामिन खत्म कर देगा कैंसर होने की टेंशन! इस स्टडी से मिल रही गुड न्यूज

यह विटामिन खत्म कर देगा कैंसर होने की टेंशन! इस स्टडी से मिल रही गुड न्यूज


Vitamin D Benefits: पहले कैंसर का खतरा बड़े लोगों में ही देखने को मिलता था, लेकिन आज के समय में हर कोई चाहे बच्चे हो, जवान हो, सब ही इसके चपेट में आ रहे हैं. वहीं, कीमोथेरेपी कैंसर के लिए एक कॉमन इलाज है, लेकिन इसका परिणाम हर मरीज में एक जैसा नहीं होता है. इसी बीच एक नई स्टडी ने उम्मीद की किरण दिखाई है. रिसर्च में सामने आया है कि एक खास विटामिन की डोज से कैंसर से मौत का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है. खास बात यह है कि यह कीमोथेरेपी जैसे महंगा नहीं है, बल्कि आसानी से मिलने वाला विटामिन D है. वैज्ञानिकों का मानना है कि विटामिन D सही मात्रा में लेने से शरीर में इम्युनिटी मजबूत होती है, जिससे कैंसर जैसी बीमारी के इलाज में बेहतर रिजल्ट मिल सकता है.

ब्राजील की रिसर्च में हुआ बड़ा खुलासा

इसे लेकर ब्राजील की sao paulo state university में एक रिसर्च की गई. इस रिसर्च में ब्लड कैंसर से पीड़ित 45 साल से ज्यादा उम्र की 80 महिलाओं को शामिल किया गया था, जिनकी कीमोथेरेपी होने वाली थी. रिसर्च के लिए महिलाओं को 2 ग्रुप में बांट दिया गया, जिसमें एक ग्रुप को रोजाना विटामिन D की 2,000 IU दी गई थी. वहीं, दूसरी तरफ दूसरे ग्रुप को प्लेसीबो गोली दी गई, यानी बिना असरदार वाली गोलियां. 6 महीने की इस प्रक्रिया के बाद, जो रिजल्ट आया, उसने सभी वैज्ञानिकों को भी हैरान कर दिया.

यह भी पढ़ेंः ऑफिस की चाय-कॉफी और AC की हवा आपको कर रही बीमार, बढ़ रहा किडनी खराब होने का खतरा

विटामिन D लेने वाली महिलाओं में दिखा बेहतर असर

उन्होंने इस स्टडी में पाया कि जिन महिलाओं को विटामिन D की गोली दी गई थी, उनमें से 43 प्रतिशत महिलाओं में कीमोथेरेपी के बाद कैंसर के लक्षण न के बराबर थे. वहीं, दूसरे ग्रुप की महिलाओं का आंकड़ा केवल 24 प्रतिशत ही था. इससे यह पता चला कि विटामिन D कैंसर के उपचार में सहायक भूमिका निभा सकता है.

शरीर में विटामिन D बढ़ने से बेहतर हुए नतीजे

रिसर्च के दौरान यह भी पता चला कि जिन महिलाओं को विटामिन D की गोलियां दी गई थीं, उनके शरीर में पहले से ही विटामिन D की कमी थी. वहीं, उपचार के दौरान जैसे-जैसे उनके शरीर में विटामिन D का स्तर बढ़ा, वैसे उनके नतीजे भी बेहतर होने लगे. ऐसे में ये कहना गलत नहीं हो सकता है कि विटामिन D सिर्फ कैंसर के मरीजों के लिए ही नहीं, बल्कि हर आदमी के लिए जरूरी होता है. साथ ही, सुरक्षा का भी ध्यान रखना जरूरी है. इसको ज्यादा मात्रा में लेना भी नुकसान हो सकता है. इसको ज्यादा मात्रा में लेने से उल्टी, कमजोरी, और गुर्दे की समस्या जैसी परेशानी हो सकती है. ऐसे में बिना डॉक्टर की सलाह लिए इसका अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए.

अभी और रिसर्च की है जरूरत

इस अध्ययन से पता चलता है कि विटामिन D, कीमोथेरेपी को बेहतर तरीके से काम करने में मदद कर सकता है और यह एक सस्ता व आसान तरीका हो सकता है, लेकिन अभी इसे पूरी तरह साबित इलाज नहीं माना गया है. ऐसे में इस पर और रिसर्च की जरूरत है. वैज्ञानिकों का मानना है कि शुरुआती नतीजे अच्छे हैं, लेकिन अभी यह साफ नहीं है कि सिर्फ विटामिन D की वजह से ही फायदा हुआ. इसके पीछे दूसरे कारण भी हो सकते हैं. आगे की रिसर्च में यह समझने की कोशिश की जाएगी कि विटामिन D, कीमोथेरेपी के साथ मिलकर कैसे असर करता है.

यह भी पढ़ेंः एक दिन में कितना मीठा खाना है सही, जानिए कितने ग्राम शक्कर से शरीर को नहीं होता नुकसान?

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

मोबाइल की लत से बच्चे बन रहे डफर, एम्स में की स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

मोबाइल की लत से बच्चे बन रहे डफर, एम्स में की स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा


Can Mobile Addiction Affect Children Brain Development: आज के समय में छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल देना आम बात हो गई है. खाना खिलाना हो, बच्चे को चुप कराना हो या खुद थोड़ा समय निकालना हो, कई माता-पिता बच्चों को मोबाइल पकड़ा देते हैं. लेकिन अब एम्स की एक नई स्टडी ने इसे लेकर बड़ा खतरा बताया है. रिसर्च में सामने आया है कि बहुत कम उम्र से मोबाइल और स्क्रीन के संपर्क में आने वाले बच्चों में सीखने की क्षमता कमजोर हो सकती है और उनमें ऑटिज्म जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एम्स के पेडियाट्रिक न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. शेफाली गुलाटी के अनुसार “एक साल की उम्र में ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में तीन साल की उम्र तक ऑटिज्म के लक्षण ज्यादा देखने को मिले.”  यह असर लड़कों में ज्यादा दिखाई दिया, हालांकि लड़कियों में भी इसके संकेत मिले हैं. 

क्या हैं इसके कारण?

एक्सपर्ट का कहना है कि छोटे बच्चों का दिमाग शुरुआती वर्षों में तेजी से विकसित होता है. इस दौरान उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है माता-पिता के साथ बातचीत, चेहरे के हावभाव समझने और आसपास की चीजों से जुड़ने की. लेकिन जब बच्चा लगातार मोबाइल स्क्रीन में उलझा रहता है, तो उसका सामाजिक और मानसिक विकास प्रभावित होने लगता है. 

डॉ. शेफाली गुलाटी के मुताबिक बच्चों के साथ व्यक्तिगत रूप से समय बिताना बेहद जरूरी है. बच्चा माता-पिता के चेहरे को देखकर, उनकी आवाज सुनकर और उनके व्यवहार को समझकर सीखता है. यही चीजें उसके दिमाग के विकास में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं. 

 

क्या होता है ऑटिज्म?

ऑटिज्म एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चे का दिमाग सामान्य तरीके से सामाजिक व्यवहार और भाषा को समझ नहीं पाता.  ऐसे बच्चों को लोगों से घुलने-मिलने, बातचीत करने और भावनाएं समझने में परेशानी हो सकती है. कुछ बच्चे बार-बार एक जैसी हरकतें करते हैं, कुछ अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं और कई बार उन्हें तेज आवाज या बदलाव से भी परेशानी होने लगती है. 

इसे भी पढ़ें – Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद

किन चीजों को नहीं करना चाहिए नजरअंदाज?

एक्सपर्ट के अनुसार अगर बच्चा नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया नहीं देता, आंखों में कम देखता है, बोलने में देरी हो रही है या दूसरों के साथ खेलने से बचता है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. समय रहते जांच और सही मदद मिलने से स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है. 

18 महीने से कम उम्र के बच्चों पर ध्यान

एम्स के एक्सपर्ट का कहना है कि छोटे बच्चों की स्क्रीन की आदत धीरे-धीरे कम करनी चाहिए. अचानक मोबाइल छीन लेने से बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है. सबसे जरूरी बात यह है कि 18 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से जितना दूर रखा जाए, उतना बेहतर माना जाता है. एक्सपर्ट मानते हैं कि बच्चों के बेहतर मानसिक विकास के लिए मोबाइल नहीं, बल्कि माता-पिता का साथ सबसे ज्यादा जरूरी है, बच्चे को जितना ज्यादा वास्तविक दुनिया और परिवार के साथ समय मिलेगा, उसका मानसिक और सामाजिक विकास उतना ही बेहतर होगा.

इसे भी पढ़ें- Vitamin D Deficiency: क्या बिना बात रहता है बदन दर्द और खराब मूड, कहीं इस विटामिन की कमी से तो नहीं हो रहा ऐसा?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator





Source link

क्या अब कैंसर का इलाज हुआ और आसान? जेनेटिक टेस्ट से महिला को मिला जीवनदान

क्या अब कैंसर का इलाज हुआ और आसान? जेनेटिक टेस्ट से महिला को मिला जीवनदान


How Genetic Testing Helps In Cancer Treatment: बेंगलुरु की करीब पचास वर्ष की एक महिला कई महीनों तक शरीर में हो रहे छोटे-छोटे बदलावों को नजरअंदाज करती रही. पेट जल्दी भर जाना, सूजन महसूस होना और लगातार थकान जैसी समस्याएं धीरे-धीरे बढ़ती गईं. जब हालत ज्यादा बिगड़ी तो जांच में पता चला कि उन्हें ओवरी का कैंसर है और बीमारी शरीर में फैल चुकी है. सर्जरी के जरिए दिखाई देने वाली गांठों को हटा दिया गया, लेकिन असली बदलाव उसके बाद हुई एक खास जांच से आया 

बेंगलुरु के एस्टर अस्पताल के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अश्विन केआर के मुताबिक महिला के ट्यूमर की गहराई से जांच की गई. इस जांच में पता चला कि कैंसर सेल्स शरीर के क्षतिग्रस्त जेनेटिक पदार्थ को ठीक करने में सक्षम नहीं थीं. यही जानकारी आगे के इलाज में सबसे अहम साबित हुई. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

एक्सपर्ट के अनुसार कैंसर तब शुरू होता है जब शरीर की सेल्स के भीतर मौजूद जेनेटिक संरचना में बदलाव होने लगते हैं. लेकिन हर मरीज में यह बदलाव एक जैसे नहीं होते. कुछ बदलाव समय के साथ पैदा होते हैं, जबकि कुछ परिवार से विरासत में मिल सकते हैं. यही वजह है कि हर कैंसर मरीज का इलाज एक जैसा असर नहीं दिखाता. डॉ. अश्विन केआर बताते हैं कि इस तरह की जेनेटिक जांच से यह समझने में मदद मिलती है कि आखिर कैंसर को बढ़ाने वाला मुख्य कारण क्या है. कई बार ऐसी जानकारी मिलने के बाद मरीज को वही दवा दी जाती है, जो उसकी बीमारी पर सबसे ज्यादा असर कर सके. इससे इलाज पर समय और शरीर दोनों की बर्बादी कम होती है. 

इसे भी पढ़ें – Heart Fights Cancer: दिल धड़क रहा है यानी कैंसर से लड़ रहा है, नई स्टडी से जागी उम्मीद

इस केस में क्या देखने को मिला?

महिला के मामले में भी यही हुआ.  जांच में ऐसा संकेत मिला जिससे डॉक्टरों को एक खास प्रकार की टारगेटेड दवा देने का रास्ता मिला. यह दवा उन कैंसर सेल्स पर असर करती है जो खुद को ठीक नहीं कर पातीं. इलाज शुरू होने के बाद ट्यूमर छोटा होने लगा और अब महिला सामान्य जीवन जी रही है, हालांकि उनकी लगातार निगरानी की जा रही है. एक्सपर्ट का कहना है कि पहले कैंसर के इलाज में सामान्य तौर पर सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरपी पर ही निर्भर रहना पड़ता था. लेकिन अब जेनेटिक जांच की मदद से इलाज को मरीज के शरीर और बीमारी के अनुसार तय किया जा रहा है. इससे इलाज ज्यादा सटीक और प्रभावी बनता जा रहा है.

लगातार बढ़ रहे हैं कैंसर के मामले

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के नेशनल कैंसर पंजीकरण कार्यक्रम के अनुसार देश में कैंसर के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है. अनुमान है कि आने वाले वर्षों में मरीजों की संख्या और तेजी से बढ़ सकती है. ऐसे में एक्सपर्ट मानते हैं कि समय पर जांच और सही इलाज के साथ जेनेटिक परीक्षण मरीजों के लिए नई उम्मीद बन सकता है.

इसे भी पढ़ें- Vitamin D Deficiency: क्या बिना बात रहता है बदन दर्द और खराब मूड, कहीं इस विटामिन की कमी से तो नहीं हो रहा ऐसा?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

Check out below Health Tools-
Calculate Your Body Mass Index ( BMI )

Calculate The Age Through Age Calculator



Source link

YouTube
Instagram
WhatsApp