भारत में जल्द आ सकती है डेंगू की वैक्सीन Qdenga, जानिए कैसे करती है काम?

भारत में जल्द आ सकती है डेंगू की वैक्सीन Qdenga, जानिए कैसे करती है काम?


How Effective Is Dengue Vaccine Qdenga: दुनियाभर में डेंगू के बढ़ते मामलों के बीच Qdenga नाम की डेंगू वैक्सीन को लेकर उम्मीदें तेज हो गई हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह वैक्सीन 2026 तक भारत में लॉन्च हो सकती है, हालांकि इसके लिए सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन की मंजूरी और क्लिनिकल ट्रायल्स की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है. यह वैक्सीन जापान की कंपनी टाकेडा फार्मास्युटिकल कंपनी लिमिटेड  ने विकसित की है, जिसे भारत में ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत हैदराबाद स्थित बायोलॉजिकल ई के साथ मिलकर तैयार किया जा सकता है एक्सपर्ट मानते हैं कि देश में तेजी से बढ़ते डेंगू मामलों को देखते हुए यह एक अहम कदम साबित हो सकता है.

भारत में बढ़ रहे हैं मामले

दरअसल, भारत में डेंगू के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है. बायोइन्फॉर्मेटिक्स जर्नल में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच डेंगू के मामलों में करीब 39.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इसके क्लस्टर आउटब्रेक भी सामने आए हैं.  एगिलस डायग्नोस्टिक्स से जुड़ी डॉ. रश्मि खाडपकर ने NDTV को बताया कि भारत में डेंगू हाइपरएंडेमिक हो चुका है, यानी इसके सभी चार वायरस प्रकार एक साथ फैल रहे हैं. यही वजह है कि ऐसी वैक्सीन की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी. 

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क्या है यह वैक्सीन?

Qdenga एक लाइव एटेन्यूएटेड टेट्रावैलेंट वैक्सीन है, जिसका मतलब है कि यह डेंगू वायरस के चारों प्रमुख प्रकार- DEN1, DEN2, DEN3 और DEN4 के खिलाफ सुरक्षा देने के लिए तैयार की गई है. यशोदा हॉस्पिटल के डॉक्टर हरि किशन बूरुगु के मुताबिक, यह वैक्सीन पहले की वैक्सीन डेंगवैक्सिया से अलग है, जिसे केवल उन्हीं लोगों के लिए सुझाया जाता था जिन्हें पहले डेंगू हो चुका हो. 

इन देशों में मिल चुकी है मंजूरी

इस वैक्सीन को अब तक 40 से ज्यादा देशों में मंजूरी मिल चुकी है, जिनमें यूरोप, ब्रिटेन, इंडोनेशिया और ब्राजील शामिल हैं. इसके साथ ही, इसे वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन से प्रीक्वालिफिकेशन भी मिला है, जो इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता पर वैश्विक भरोसे को दर्शाता है. क्लिनिकल ट्रायल्स की बात करें तो इस वैक्सीन का परीक्षण दुनिया भर में 60,000 से ज्यादा लोगों पर किया जा चुका है. वहीं, भारत में 4 से 60 वर्ष की उम्र के करीब 480 लोगों पर फेज-3 ट्रायल किया गया, जिसमें इसकी सुरक्षा और इम्यून रिस्पॉन्स का आकलन किया गया.

कितनी खतरनाक है डेंगू की बीमारी?

डेंगू एक मच्छरजनित बीमारी है, जो मुख्य रूप से एडीस एजिप्टी मच्छर के जरिए फैलती है. इसके लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, मांसपेशियों में दर्द और त्वचा पर रैश शामिल हैं. गंभीर मामलों में यह डेंगू हेमरेजिक फीवर में बदल सकता है, जो जानलेवा भी हो सकता है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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इस छोटे-से अंग की वजह से लंबी होती है आपकी उम्र, यह खुलासा उड़ा देगा आपके होश

इस छोटे-से अंग की वजह से लंबी होती है आपकी उम्र, यह खुलासा उड़ा देगा आपके होश


How Thymus Health Affects Lifespan: क्या आपके सीने का एक छोटा सा अंग आपकी लंबी उम्र और गंभीर बीमारियों के खतरे का संकेत दे सकता है? हाल ही में सामने आई एक नई स्टडी ने इसी ओर इशारा किया है. साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक, थाइमस  नाम का अंग हमारे इम्यून सिस्टम और लंबे समय तक स्वस्थ रहने में अहम भूमिका निभाता है. रिसर्च में बताया गया है कि थाइमस की सेहत सीधे तौर पर हार्ट डिजीज और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के खतरे से जुड़ी हो सकती है. साइंटिस्ट का कहना है कि यह अंग अब सिर्फ एक सामान्य ग्लैंड्स नहीं, बल्कि उम्र बढ़ने और बीमारियों की संभावना को कंट्रोल करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभर रहा है.

क्या है थाइमस?

थाइमस एक छोटी, दो भागों वाली ग्रंथि होती है, जो फेफड़ों के बीच ऊपरी छाती में स्थित होती है. इसका मुख्य काम टी-लिम्फोसाइट्स नामक व्हाइट ब्लड सेल्स का निर्माण करना है, जो शरीर को इंफेक्शन और बीमारियों से बचाती हैं. इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से 27,000 से ज्यादा मरीजों के स्कैन और मेडिकल रिकॉर्ड का एनालिसिस किया. इसके जरिए उन्होंने थाइमस की सेहत और मरीजों की बीमारी के जोखिम के बीच संबंध को समझने की कोशिश की.

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क्या निकला नतीजा?

नतीजों में पाया गया कि जिन लोगों का थाइमस हेल्दी था, उनमें मृत्यु दर करीब 13.4 प्रतिशत रही, जबकि जिनका थाइमस कमजोर था, उनमें यह आंकड़ा 25.5 प्रतिशत तक पहुंच गया. इसके अलावा, कमजोर थाइमस वाले लोगों में 5.3 प्रतिशत को फेफड़ों का कैंसर और 16.7 प्रतिशत को हार्ट संबंधी बीमारियां होने का खतरा ज्यादा पाया गया. रिसर्च यह भी बताता है कि उम्र बढ़ने के साथ थाइमस धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है और उसकी जगह फैटी टिश्यू ले लेते हैं. यही बदलाव शरीर की रोग इम्यून क्षमता को कमजोर कर सकता है.

रिसर्च के लिए इसका यूज

साइंटिस्ट ने आगे इस शोध को और मजबूत करने के लिए दो बड़े अध्ययन फ्रेमिंगहैम हार्ट स्टडी और नेशनल लंग स्क्रीनिंग ट्रायल के डेटा का भी उपयोग किया. इसमें AI आधारित डीप लर्निंग सिस्टम के जरिए थाइमस की स्थिति का ज्यादा सटीक आकलन किया गया. रिसर्चर का कहना है कि पारंपरिक तरीके से थाइमस की जांच उतनी सटीक नहीं होती, इसलिए AI तकनीक ने इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाई है. इस मॉडल ने अलग-अलग डेटा सेट पर भी लगातार सटीक परिणाम दिए. रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि लाइफस्टाइल में बदलाव, जैसे नियमित एक्सरसाइज, अच्छी नींद और संतुलित आहार थाइमस की सेहत पर पॉजिटिव असर डाल सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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हेल्दी किड्स को शिकार बना रहा कोविड का नया वैरिएंट सिकाडा, कितने सेफ हैं भारत के बच्चे?

हेल्दी किड्स को शिकार बना रहा कोविड का नया वैरिएंट सिकाडा, कितने सेफ हैं भारत के बच्चे?


Is BA.3.2 Dangerous For Children: क्या कोविड का नया वैरिएंट बच्चों के लिए ज्यादा खतरा बन रहा है? अमेरिका में तेजी से फैल रहे “सिकाडा” नाम के कोविड वैरिएंट ने स्वास्थ्य एक्सपर्ट की चिंता बढ़ा दी है. शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह वैरिएंट खासतौर पर बच्चों को ज्यादा प्रभावित कर रहा है, हालांकि फिलहाल इसके लक्षण पहले जैसे ही बताए जा रहे हैं. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं.

तेजी से फैल रहा नया वैरिएंट

यह नया वैरिएंट BA.3.2 के नाम से जाना जाता है, जिसे सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने कई राज्यों में ट्रैक किया है. रिपोर्ट्स के अनुसार, यह वैरिएंट अमेरिका के 25 राज्यों और 23 देशों में फैल चुका है. लेकिन अच्छी बात यह है कि अस्पताल में भर्ती होने के मामले फिलहाल कम हो रहे हैं. साइंटिस्ट का मानना है कि यह वैरिएंट ओमिक्रॉन के BA.3 सब-वैरिएंट से जुड़ा हुआ है, जो पहले 2022 में सामने आया था. माना जा रहा है कि यह वायरस लंबे समय तक किसी कमजोर इम्यून सिस्टम वाले व्यक्ति के शरीर में मौजूद रहा और धीरे-धीरे म्यूटेशन के जरिए एक नए रूप में सामने आया. 

अंडर मॉनिटरिंग की कैटेगरी

इस वैरिएंट को वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने वैरिएंट अंडर मॉनिटरिंग की कैटेगरी में रखा है, यानी अभी इस पर नजर रखी जा रही है लेकिन इसे बेहद खतरनाक घोषित नहीं किया गया है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि BA.3.2 बच्चों को ज्यादा इंफेक्टेड करता दिख रहा है. न्यूयॉर्क के डेटा के अनुसार, 3 से 15 साल के बच्चे इस वैरिएंट से लगभग पांच गुना ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. हालांकि, कुल मामलों में इसकी हिस्सेदारी अभी भी सीमित है. 

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क्या हैं लक्षण?

लक्षणों की बात करें तो इसमें कोई नया बदलाव नहीं देखा गया है. बुखार, खांसी, गले में खराश, नाक बहना, थकान और सांस लेने में दिक्कत जैसे सामान्य कोविड लक्षण ही सामने आ रहे हैं। स्वाद और गंध का जाना अब कम मामलों में देखा जा रहा है.  एक्सपर्ट का कहना है कि मौजूदा वैक्सीन इस वैरिएंट पर पूरी तरह असरदार नहीं हो सकती, लेकिन यह गंभीर बीमारी से बचाने में अब भी मदद करती है. इसके अलावा, मौजूदा एंटीवायरल दवाएं भी प्रभावी मानी जा रही है. 

भारत के बच्चों पर असर

अब सवाल उठता है कि क्या भारत के बच्चे सुरक्षित हैं? फिलहाल भारत में इस वैरिएंट के बड़े पैमाने पर फैलने की कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ग्लोबल ट्रेंड को देखते हुए सतर्क रहना जरूरी है. डॉक्टर्स सलाह देते हैं कि बच्चों की इम्यूनिटी मजबूत रखने, साफ-सफाई का ध्यान रखने और भीड़भाड़ वाली जगहों से बचाव जैसे उपाय अपनाए जाएं. इसके साथ ही, जरूरत पड़ने पर बूस्टर डोज को लेकर डॉक्टर से सलाह लेना भी जरूरी है. 

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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चीज़ के नाम पर सिर्फ मैदा और तेल! वायरल वीडियो में देखें चीज़लिंग्स के अंदर का असली सच

चीज़ के नाम पर सिर्फ मैदा और तेल! वायरल वीडियो में देखें चीज़लिंग्स के अंदर का असली सच


How Much Cheese Is In Cheeslings: क्या आप भी चाय के साथ या बच्चों के टिफिन में मोनाको च़ीजलिंग्स देना पसंद करते हैं? अगर हां, तो यह खबर आपको चौंका सकती है. सालों से भारतीय घरों में पसंद किए जाने वाले इस स्नैक को लेकर एक वायरल वीडियो ने बड़ा खुलासा किया है. फूडफार्म के नाम से मशहूर हेल्थ इंफ्लुएंसर रेवंत हिमात्सिंगका ने इस प्रोडक्ट के अंदर की सच्चाई सामने रखी है. चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं. 

वीडियो में उठाए सवाल

वीडियो में सबसे बड़ा सवाल इस स्नैक के नाम को लेकर उठाया गया है. च़ीजलिंग्स नाम सुनकर लगता है कि इसमें चीज की अच्छी मात्रा होगी, लेकिन पैकेट पर दिए गए इंग्रीडिएंट्स कुछ और ही कहानी बताते हैं. लेबल के मुताबिक, इसमें चीज की मात्रा सिर्फ 1.9 प्रतिशत है. यानी जिस स्वाद के लिए लोग इसे खरीदते हैं, वही इसमें बेहद कम मात्रा में मौजूद है.  इस बात को समझाने के लिए वीडियो में एक दिलचस्प तरीका अपनाया गया. एक ट्रांसपेरेंट जार में सभी सामग्री को उनके अनुपात के हिसाब से दिखाया गया, जिसमें मैदा और तेल लगभग पूरा जार भरते नजर आए, जबकि चीज की मात्रा इतनी कम थी कि वह मुश्किल से नजर आ रही थी.

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क्या होता है इसमें?

अगर इसमें चीज इतनी कम है, तो सवाल उठता है कि आखिर इसमें बाकी क्या है?. वीडियो में रेवंत हिमात्सिंगका बताते हैं कि असल में इस स्नैक का बड़ा हिस्सा रिफाइंड व्हीट फ्लोर यानी मैदा से बना है. chriskresser  की रिपोर्ट के अनुसार, मैदा में फाइबर और जरूरी पोषक तत्व नहीं होते, जिससे यह शरीर में तेजी से शुगर लेवल बढ़ा सकता है और वजन बढ़ने का कारण बन सकता है. इसके अलावा, इसमें पाम ऑयल का इस्तेमाल किया जाता है, जो सैचुरेटेड फैट से भरपूर होता है. लंबे समय तक इसका ज्यादा सेवन दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है. इतना ही नहीं, इस स्नैक में इनवर्ट शुगर सिरप और ज्यादा मात्रा में नमक भी होता है. यह कॉम्बिनेशन इसे स्वादिष्ट और एडिक्टिव बनाता है, जिससे एक बार खाने के बाद बार-बार खाने की इच्छा होती है. 

 

इन चीजों का भी होता है इस्तेमाल

वीडियो में इसमें शुगर और हल्दी का क्लेम किया गया है. स्वाद और टेक्सचर को बनाए रखने के लिए इसमें कई तरह के केमिकल्स भी मिलाए जाते हैं. वीडियो में इस प्रोडक्ट को TruthIn रेटिंग में 5 में से सिर्फ 1.8 अंक दिए गए हैं, जो इसे “अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड” की कैटेगरी में रखता है. य  खासकर बच्चों के लिए यह चिंता की बात है, क्योंकि इस तरह के प्रोसेस्ड स्नैक्स का ज्यादा सेवन उनकी सेहत पर असर डाल सकता है. 

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भारत जैसे गरीब देशों में कैंसर से जान गंवा रहे 10 में से 9 बच्चे, डरा देगी लैंसेट की रिपोर्ट

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Why Childhood Cancer Deaths Are Higher In Poor Countries: दुनिया भर में बच्चों में कैंसर एक गंभीर और बढ़ती हुई चिंता बनता जा रहा है, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इसके ज्यादातर मामले और मौतें गरीब और मध्यम आय वाले देशों में हो रही हैं.  द लैंसेट में पब्लिश ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2023 स्टडी ने इस असमानता को लेकर कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं.  रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में दुनिया भर में बच्चों में कैंसर के लगभग 3.77 लाख नए मामले सामने आए, जबकि करीब 1.44 लाख बच्चों की मौत हो गई, यह बीमारी बच्चों में मौत के प्रमुख कारणों में शामिल हो चुकी है और खसरा, टीबी और HIV/AIDS जैसी बीमारियों से भी ज्यादा जान ले रही है. 

लो और मिडिल इनकम वाले देशों में ज्यादा मौतें

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन मौतों में से करीब 94 प्रतिशत मामले लो और मिडिल इनकम देशों में दर्ज किए गए. यानी जहां संसाधन कम हैं, वहीं बच्चों के लिए यह बीमारी सबसे ज्यादा घातक साबित हो रही है. भारत की बात करें तो यहां 2023 में करीब 17,000 बच्चों की मौत कैंसर के कारण हुई, जिससे यह बच्चों में मौत का दसवां सबसे बड़ा कारण बन गया. कैंसर केयर अस्पताल, दरभंगा के कर्क रोग एक्सपर्ट डॉक्टर स्वरूप मित्रा के अनुसार,, इसके बावजूद भारत के राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम में बचपन के कैंसर को अभी तक प्राथमिकता नहीं दी गई है.  इसके लिए जरूरी है कि बचपन के कैंसर को राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजनाओं में तुरंत शामिल किया जाए.

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दक्षिण एशिया की स्थिति

दक्षिण एशिया इस संकट का बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहां दुनिया के कुल चाइल्डहुड कैंसर से होने वाली मौतों का लगभग 20.5 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया. इसके अलावा, 1990 से 2023 के बीच इन मौतों में करीब 16.9 प्रतिशत  की बढ़ोतरी भी देखी गई है. हालांकि एक पॉजिटिव पहलू यह भी है कि वैश्विक स्तर पर मौतों में कुछ कमी आई है, लेकिन इसका लाभ सभी देशों तक समान रूप से नहीं पहुंच पाया है. उच्च आय वाले देशों में इलाज बेहतर होने से बच्चों के बचने की संभावना ज्यादा है, जबकि गरीब देशों में समय पर जांच और इलाज की कमी बड़ी बाधा बन रही है. 

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इस स्टडी की प्रमुख लेखक लिसा फोर्स कहती हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता के कारण ही यह अंतर पैदा हो रहा है. देर से डायग्नोसिस, जरूरी इलाज की कमी और स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरियां बच्चों की जान जोखिम में डाल रही हैं. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चाइल्डहुड कैंसर के 85 प्रतिशत नए मामले और 94 प्रतिशत मौतें इन्हीं लो और मिडिल इनकम देशों में होती हैं. इसके अलावा, DALYs यानी “डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर्स” का भी 94 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं देशों में दर्ज किया गया, जो यह दिखाता है कि बीमारी का असर सिर्फ मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की जिंदगी की क्वालिटी पर भी पड़ता है. 

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क्या आपके हाथ में भी होती है झुनझुनी और सुन्नपन, जानें किस वजह से होता है ऐसा?

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Why Do My Hands Tingle Frequently: क्या आपके हाथों में बार-बार झुनझुनी या सुन्नपन महसूस होता है? कई लोग इसे मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह शरीर का एक संकेत भी हो सकता है, जिसे समझना जरूरी है.  अक्सर यह समस्या तब महसूस होती है जब हम गलत पोजीशन में सो जाते हैं या लंबे समय तक एक ही स्थिति में हाथ रखते हैं. ऐसे में नसों पर दबाव पड़ता है या खून का प्रवाह कुछ समय के लिए कम हो जाता है, जिससे झुनझुनी होने लगती है.

कब होती है दिक्कत?

लेकिन अगर यह परेशानी बार-बार होने लगे या लंबे समय तक बनी रहे, तो इसके पीछे कोई खास कारण भी हो सकता है. theheartysoul की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे आम वजहों में से एक है कार्पल टनल सिंड्रोम, जिसमें कलाई की नस दब जाती है और अंगूठे, उंगलियों में झुनझुनी या दर्द होने लगता है. कभी-कभी समस्या कलाई में नहीं, बल्कि कोहनी या गर्दन से भी जुड़ी हो सकती है. नसों में कहीं भी दबाव आने से हाथ तक इसका असर पहुंच सकता है, जिससे झुनझुनी और कमजोरी महसूस होती है.

ब्लड सर्कुलेशन और डायबिटीड भी कारण

खराब ब्लड सर्कुलेशन भी इसका एक कारण हो सकता है.  ठंड में या अचानक तापमान बदलने पर उंगलियां सुन्न पड़ सकती हैं और रंग भी बदल सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसके अलावा, डायबिटीज जैसी बीमारियां भी नसों को प्रभावित कर सकती हैं. जब नसें कमजोर होने लगती हैं, तो हाथ-पैरों में झुनझुनी, जलन या सुन्नपन महसूस होने लगता है.

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विटामिन B12 की कमी 

विटामिन B12 की कमी भी एक अहम कारण है, जो धीरे-धीरे नसों को नुकसान पहुंचा सकती है. कई बार लोग थकान या कमजोरी को नजरअंदाज करते रहते हैं, लेकिन यह संकेत हो सकता है कि शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी है. कुछ मामलों में थायरॉयड की समस्या भी हाथों में झुनझुनी का कारण बन सकती है. शरीर का मेटाबॉलिज्म बिगड़ने से नसों पर असर पड़ता है और यह समस्या बढ़ सकती है. 

ये भी होता है कारण

कंधे और गर्दन के बीच नसों या ब्लड वेसल्स पर दबाव पड़ने से भी हाथों में झुनझुनी हो सकती है. खासतौर पर जब हाथ लंबे समय तक ऊपर रखा जाए या भारी वजन उठाया जाए.  अगर झुनझुनी के साथ कमजोरी, चीजें गिरना, या दर्द बढ़ने लगे, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह संकेत हो सकता है कि नसों पर लगातार दबाव पड़ रहा है या कोई गंभीर समस्या विकसित हो रही है. अचानक एक तरफ हाथ सुन्न हो जाना, बोलने में दिक्कत या चक्कर आना जैसी स्थिति स्ट्रोक का संकेत भी हो सकती है. ऐसे में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है.

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