कम उम्र में आंखों के सामने दिख रहे काले धब्बे, जानें Eye Floaters कब बन सकते हैं खतरे की घंटी?

कम उम्र में आंखों के सामने दिख रहे काले धब्बे, जानें Eye Floaters कब बन सकते हैं खतरे की घंटी?



Eye Floaters Warning Signs: कम उम्र में आंखों के सामने दिख रहे काले धब्बे, जानें Eye Floaters कब बन सकते हैं खतरे की घंटी?



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दिल की सेहत के लिए नया फॉर्मूला! चुकंदर और च्यूइंग गम के कॉम्बिनेशन से घटेगा BP, स्टडी में दावा

दिल की सेहत के लिए नया फॉर्मूला! चुकंदर और च्यूइंग गम के कॉम्बिनेशन से घटेगा BP, स्टडी में दावा


Beetroot Chewing Gum : हाई ब्लड प्रेशर आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है. ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखने के लिए लोग दवाओं के साथ-साथ खानपान और लाइफस्टाइल में भी बदलाव करते हैं. इसी बीच एक नई स्टडी में वैज्ञानिकों का एक अनोखा कॉम्बिनेशन सामने आया है. इस नई स्टडी में शोधकर्ताओं का दावा है कि चुकंदर जैसी नाइट्रेट से भरपूर चीजें खाने के बाद शुगर वाली च्यूइंग गम चबाने से कुछ समय के लिए ब्लड प्रेशर कम करने का असर बढ़ सकता है.

इस शोध में पहली बार यह पता लगाने की कोशिश की गई है कि मुंह के अंदर बनने वाला माहौल शरीर में नाइट्रेट के इस्तेमाल को किस तरह प्रभावित करता है. अध्ययन में पाया गया कि चुकंदर का जूस पीने के बाद शुगर वाली च्यूइंग गम चबाने से शरीर में नाइट्राइट का लेवल बढ़ा और ब्लड प्रेशर में मामूली लेकिन जरूरी कमी दर्ज की गई. 

नाइट्रेट और ब्लड प्रेशर का क्या है संबंध?

चुकंदर, पालक और केल जैसी सब्जियों में नेचुरल रूप से नाइट्रेट पाया जाता है. हालांकि शरीर सीधे तौर पर नाइट्रेट का यूज नहीं कर सकता है इसके लिए सबसे पहले मुंह में मौजूद बैक्टीरिया नाइट्रेट को नाइट्राइट में बदलते हैं. नाइट्राइट बनने के बाद यह शरीर में कई जरूरी काम करता है. यह ब्लड वेसल्स को आराम पहुंचाने और उन्हें चौड़ा करने में मदद करता है, जिससे ब्लड का फ्लो बेहतर होता है और ब्लड प्रेशर कम होने में मदद मिलती है. 

चुकंदर और च्यूइंग गम के कॉम्बिनेशन से घटेगा BP

किंग्स कॉलेज लंदन के स्कूल ऑफ कार्डियोवैस्कुलर एंड मेटाबॉलिक मेडिसिन एंड साइंसेज के क्लीनिकल सीनियर लेक्चरर डॉ. एंड्रयू वेब के अनुसार, यह समझना जरूरी है कि लार में एसिड की मात्रा नाइट्रेट को ज्यादा एक्टिव नाइट्राइट में बदलने की प्रक्रिया को कैसे प्रभावित करती है. ऐसे में उन्होंने बताया कि पहले की एक स्टडी में उनकी टीम ने पाया था कि चुकंदर के जूस के साथ ग्रेपफ्रूट जूस लेने से लार में एसिड की मात्रा कम हो गई थी और नाइट्रेट से नाइट्राइट बनने की प्रक्रिया धीमी पड़ गई थी. इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने यह जांचने का फैसला किया कि अगर लार में एसिड की मात्रा बढ़ाई जाए तो क्या इसका उल्टा असर देखने को मिलेगा. 

कैसे किया गया अध्ययन?

इस स्टडी में कुछ हेल्दी लोगों को शामिल किया गया. जिसमें सबसे पहले सभी को चुकंदर के जूस का एक शॉट पिलाया गया. इसके बाद उन्हें दो अलग-अलग ग्रुप में बांट दिया गया. एक ग्रुप को शुगर वाली च्यूइंग गम (Hubba Bubba Bubble Gum) दी गई, जबकि दूसरे समूह को शुगर-फ्री च्यूइंग गम (Wrigleys Extra) चबाने के लिए दी गई. सभी लोगों ने 3 से 6 घंटे तक च्यूइंग गम चबाई. इस दौरान शोधकर्ताओं ने उनके खून और लार की जांच की और समय-समय पर उनका ब्लड प्रेशर भी चेक किया. जिसमें करीब एक हफ्ते बाद सभी को फिर से स्टडी में शामिल किया गया. इस बार जिन्होंने पहले शुगर वाली गम चबाई थी, उन्हें शुगर-फ्री गम दी गई और जिन्होंने पहले शुगर-फ्री गम चबाई थी, उन्हें शुगर वाली गम दी गई. 

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स्टडी में क्या सामने आया?

अध्ययन में सामने आया कि शुगर वाली च्यूइंग गम चबाने वाले लोगों की लार में एसिडिटी बढ़ गई. उनकी लार का pH स्तर शुगर-फ्री गम चबाने वालों की तुलना में 1.4 अंक तक कम हो गया. इसके अलावा, उनके मुंह में नाइट्राइट की मात्रा 45 प्रतिशत ज्यादा पाई गई. वहीं शरीर में भी नाइट्राइट का स्तर 25 प्रतिशत ज्यादा दर्ज किया गया. शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि शुगर वाली च्यूइंग गम चबाने वाले लोगों का ब्लड प्रेशर कुछ हद तक कम हुआ. उनके सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर में करीब 3 mmHg और डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर में लगभग 2 mmHg की कमी दर्ज की गई. 

क्या हाई ब्लड प्रेशर का इलाज है यह तरीका?

शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इन निष्कर्षों का यह मतलब नहीं है कि लोग हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए नियमित रूप से शुगर वाली च्यूइंग गम चबाना शुरू कर दें. अध्ययन में देखा गया प्रभाव केवल कुछ घंटों तक ही बना रहा. इसके अलावा लंबे समय तक शुगर वाली चीजों को खाने से दांतों की सेहत और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है.
 
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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‘हेल्दी’ का लेबल लगाकर नहीं चलेगा खेल! FSSAI ने कंपनियों को भेजा नोटिस

‘हेल्दी’ का लेबल लगाकर नहीं चलेगा खेल! FSSAI ने कंपनियों को भेजा नोटिस


FSSAI की कार्रवाई में इस बार फोकस सिर्फ कंपनियों पर नहीं बल्कि उन दावों पर है जो रोज़मर्रा के खाने-पीने के प्रोडक्ट्स पर लिखे जा रहे हैं. जांच में सामने आया कि कई प्रोडक्ट्स में हेल्थ से जुड़े ऐसे बड़े-बड़े दावे किए गए जिनका या तो कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था या फिर उन्हें करने की अनुमति ही नहीं है.

सबसे बड़ा सवाल उन दावों पर उठा जहां खाने-पीने की चीजों को सीधे बीमारियों से जोड़ दिया गया. कहीं डायबिटीज कंट्रोल करने की बात कही गई तो कहीं दिल को हेल्दी रखने और अस्थमा तक में असरदार होने का दावा किया गया. जबकि, नियम साफ कहते हैं कि ऐसे दावे बिना मंजूरी के नहीं किए जा सकते लेकिन पैकेट पर इन्हें खुलेआम लिखा गया.

‘हेल्दी ड्रिंक’ के नाम पर गुमराह करने का खेल

“हेल्दी” और “फंक्शनल” ड्रिंक्स को लेकर सामने आया पानी तक को वजन घटाने बॉडी डिटॉक्स करने और स्किन सुधारने वाला बताया गया. FSSAI के मुताबिक ऐसे जनरल हेल्थ क्लेम्स लोगों को गुमराह करते हैं क्योंकि इनके पीछे ठोस सबूत नहीं होते.

लेबल कुछ और अंदर कुछ और

लेबलिंग में भी गड़बड़ी पकड़ी गई. कई प्रोडक्ट्स ने “नेचुरल शुगर” या “100% नेचुरल” जैसे शब्द इस्तेमाल किए, लेकिन असल में उनमें अतिरिक्त शुगर या प्रोसेस्ड इंग्रीडिएंट मौजूद थे यानी पैकेट कुछ और कहानी बता रहा था और अंदर की सच्चाई कुछ और थी.

सप्लीमेंट्स में ‘साइंस’ के बिना बड़े दावे

हेल्थ सप्लीमेंट्स और प्रोटीन पाउडर में भी यही पैटर्न दिखा. “100% प्योर”, “मसल्स तेजी से बढ़ाएं”, “डाइजेशन बेहतर करें”, “ब्रेन हेल्थ सुधारें” ऐसे दावे किए गए लेकिन इनके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक आधार नहीं दिया गया. FSSAI ने साफ कहा है कि ऐसे हर दावे को प्रमाणित करना जरूरी है.

‘हार्ट हेल्दी’ टैग भी सवालों में

कुछ मामलों में “हार्ट हेल्दी” जैसे शब्द और दिल के सिंबल का इस्तेमाल भी सवालों में है. इससे उपभोक्ता को यह मैसेज जाता है कि प्रोडक्ट सीधे दिल के लिए फायदेमंद है जबकि नियम सिर्फ सीमित न्यूट्रिशन क्लेम्स की ही अनुमति देते हैं.

खाने को दवा बनाकर बेचने की कोशिश

फूड प्रोडक्ट्स में “एंटी-कैंसर” जैसे गंभीर दावे भी सामने आए, जिन्हें पूरी तरह प्रतिबंधित माना गया है यानी खाने की चीजों को दवा की तरह पेश करने की कोशिश की गई.

हाइजीन और क्वालिटी पर भी सवाल

वहीं हाइजीन और क्वालिटी को लेकर भी शिकायतें सामने आईं. कहीं किचन में साफ-सफाई पर सवाल उठे तो कहीं डेयरी प्रोडक्ट्स में खराबी और फंगस की शिकायत मिली. इससे यह साफ होता है कि मामला सिर्फ मार्केटिंग तक सीमित नहीं है बल्कि ग्राउंड लेवल पर भी निगरानी की जरूरत है.

अब हर दावे का देना होगा सबूत

FSSAI का मैसेज सीधा है- अब पैकेट पर लिखा हर शब्द जांच के दायरे में आएगा. “नेचुरल”, “हेल्दी”, “प्रो”, “इम्यूनिटी बूस्टर” जैसे शब्द यूं ही इस्तेमाल नहीं किए जा सकेंगे यानी आने वाले समय में सिर्फ प्रोडक्ट बेचना काफी नहीं होगा जो दावा किया जाएगा उसका सबूत भी देना होगा.

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क्या डायबिटिक नर्व पेन में आराम दिलाती है लाल मिर्च, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

क्या डायबिटिक नर्व पेन में आराम दिलाती है लाल मिर्च, जानें क्या कहते हैं एक्सपर्ट?


Can Red Chilli Relieve Diabetic Nerve Pain: डायबिटीज के मरीजों में नर्व पेन यानी नसों से जुड़ा दर्द एक आम लेकिन बेहद परेशान करने वाली समस्या है. कई लोगों को पैरों और हाथों में जलन, झनझनाहट, सुन्नपन या बिजली के झटके जैसा दर्द महसूस होता है. अब एक नई रिव्यू में सामने आया है कि लाल मिर्च में पाया जाने वाला एक खास तत्व ऐसे दर्द से राहत दिलाने में मदद कर सकता है. चलिए आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं . 

क्या सच में लाल मिर्च फायदेमंद है?

हाल ही में जर्नल ऑफ द एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक रिव्यू में 1,800 से अधिक मरीजों पर किए गए 22 क्लीनिकल अध्ययनों का एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि लाल मिर्च से प्राप्त होने वाला कैप्साइसिननसों से जुड़े दर्द, खासकर डायबिटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी और पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया में राहत पहुंचा सकता है. 

इस रिव्यू का नेतृत्व चेन्नई स्थित डॉ. मोहन डायबिटीज स्पेशियलिटी सेंटर के चेयरमैन और डायबिटीज एक्सपर्ट डॉ. वी. मोहन, मुंबई के शिल्पा मेडिकल रिसर्च सेंटर के डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. मंगेश तिवास्कर, लीलावती अस्पताल के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अभय नेने और चिकित्सा मामलों की एक्सपर्ट डॉ. सोनाली गोखले समेत अन्य एक्सपर्ट ने किया.

कितना असरदार है लाल मिर्च?

एक्सपर्ट के अनुसार, 0.075 प्रतिशत कैप्साइसिन क्रीम सबसे प्रभावी पाई गई. यह एक ऐसी टॉपिकल क्रीम है जिसे त्वचा पर लगाया जाता है. इसमें लाल मिर्च के सक्रिय तत्व की नियंत्रित मात्रा मौजूद होती है, जो दर्द पैदा करने वाली नसों पर काम करती है. डॉ. वी मोहन का कहना है कि कैप्साइसिन को केवल दर्द निवारक बाम का हिस्सा समझना सही नहीं होगा. उनके मुताबिक यह नसों में दर्द के संकेत पहुंचाने वाले तंतुओं पर सीधे असर करता है. यही वजह है कि यह सामान्य दर्द निवारक उपायों से अलग माना जाता है. उन्होंने यह भी बताया कि कम मात्रा वाले उत्पादों की तुलना में 0.075 प्रतिशत कैप्साइसिन फॉर्मूलेशन अधिक असरदार साबित हो सकता है. 

किन दिक्कतों में यह असरदार?

डॉ. मंगेश तिवास्कर के अनुसार, फिलहाल सबसे मजबूत साइंटफिक प्रमाण डायबिटिक पेरिफेरल न्यूरोपैथी और पोस्टहर्पेटिक न्यूराल्जिया के लिए उपलब्ध हैं. हालांकि नसों से जुड़ा दर्द विटामिन बी की कमी, थायरॉइड की समस्या, अत्यधिक शराब के सेवन, कीमोथेरेपी या अन्य न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारण भी हो सकता है. ऐसे मामलों में भी स्थानीय स्तर पर राहत मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. एक्सपर्ट बताते हैं कि न्यूरोपैथिक पेन को अक्सर सामान्य दर्द समझ लिया जाता है, जिससे सही उपचार नहीं मिल पाता. कई लोग साधारण दर्द निवारक दवाओं या बाम का उपयोग करते हैं, जबकि वे नसों से जुड़े दर्द की मूल वजह पर असर नहीं डालते.

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किस बात का हमें रखना चाहिए ध्यान?

डॉ. सोनाली गोखले के अनुसार, यह रिव्यू बताती है कि 0.075 प्रतिशत कैप्साइसिन क्रीम को ऐसे मरीजों के लिए बेहतर विकल्प माना जा सकता है, जिन्हें लंबे समय तक दवाएं लेने में परेशानी होती है या जो स्थानीय स्तर पर उपचार चाहते हैं. हालांकि एक्सपर्ट यह भी सलाह देते हैं कि किसी भी प्रकार के नर्व पेन में खुद से इलाज शुरू करने के बजाय पहले डॉक्टर से सही जांच और सलाह जरूर लेनी चाहिए.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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40 पार पुरुषों के शरीर में एक्टिव होते हैं साइलेंट किलर, जान बचानी है तो जरूर कराएं ये 4 टेस्ट

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Essential Health Tests Every Man: 40 की उम्र को अक्सर लोग सिर्फ एक संख्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक यही वह दौर है जब शरीर धीरे-धीरे बदलावों का संकेत देना शुरू कर देता है. पहले जहां देर रात तक जागना, अनियमित खानपान और तनाव का असर जल्दी नहीं दिखता था, वहीं 40 के बाद शरीर इन आदतों का हिसाब मांगने लगता है. ऐसे में नियमित स्वास्थ्य जांच कई गंभीर बीमारियों को शुरुआती चरण में पकड़ने का सबसे प्रभावी तरीका बन सकती है.

40 के बाद शरीर में कई बदलाव होने लगते हैं

 डॉ. शेली महाजन ने TOI को बताया कि 40 की उम्र के बाद पुरुषों के शरीर में कई जैविक बदलाव शुरू हो जाते हैं. मेटाबॉलिज्म की गति कम होने लगती है, हार्मोनल परिवर्तन होते हैं और वर्षों से चली आ रही लाइफस्टाइल का असर स्वास्थ्य पर दिखने लगता है. भारतीयों में जैनेटिक जोखिम और शहरी जीवन से जुड़ा तनाव इन चुनौतियों को और बढ़ा देता है. 

किन चीजों पर ध्यान देने की जरूरत होती है

डायबिटीज की समस्या 

डायबिटीज भी ऐसी ही एक बीमारी है जो लंबे समय तक बिना लक्षण के शरीर को नुकसान पहुंचाती रहती है. बढ़ता वजन, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और तनाव इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं. डॉ. महाजन बताती हैं कि केवल फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है. एचबीए1सी जांच पिछले दो से तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर स्तर की जानकारी देती है, जिससे प्रीडायबिटीज और डायबिटीज के जोखिम को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है.

हार्ट हेल्थ पर ध्यान देने की जरूरत

हार्ट हेल्थ पर ध्यान देना जरूरी है. कई बार दिल से जुड़ी समस्याएं बिना किसी स्पष्ट लक्षण के वर्षों तक विकसित होती रहती हैं. नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में पब्लिश रिसर्च के अनुसार भारत में हार्ट रोग वयस्कों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हैं. डॉ. शेली महाजन के अनुसार भारतीयों में पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में कम उम्र में हार्ट संबंधी समस्याएं देखने को मिलती हैं. इसलिए लिपिड प्रोफाइल और ब्लड प्रेशर की नियमित जांच भविष्य के जोखिमों का समय रहते पता लगाने में मदद कर सकती है. 

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विटामिन की कमी भी कारण

इसके अलावा विटामिन डी और विटामिन बी12 की कमी भी भारतीय पुरुषों में आम समस्या बन चुकी है. लगातार थकान, मसल्स में कमजोरी और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसे लक्षण अक्सर उम्र या तनाव का असर समझ लिए जाते हैं, जबकि इनके पीछे पोषक तत्वों की कमी भी हो सकती है. डॉ. शेली महाजन के अनुसार विटामिन डी की कमी हड्डियों को कमजोर कर सकती है और कैल्शियम के ऑब्जर्व को प्रभावित करती है.

किन जांचों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए

40 की उम्र के बाद प्रोस्टेट, लिवर और किडनी की नियमित जांच भी नजरअंदाज नहीं करनी चाहिए. प्रोस्टेट से जुड़ी कई समस्याएं शुरुआती चरण में कोई लक्षण नहीं दिखातीं. वहीं नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज और किडनी से जुड़ी बीमारियां भी लंबे समय तक चुपचाप बढ़ती रहती हैं.

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नॉर्थ ईस्ट में बिना लक्षण फैल रही यह खतरनाक बीमारी, हर 3 में से 1 शख्स चपेट में

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One In Three TB Cases In Northeast India Are Asymptomatic: देश के सबसे खूबसूरत हिस्से नार्थ- ईस्ट से डराने वाली तस्वीर निकल कर सामने आई है. पूर्वोत्तर में टीबी को लेकर किए गए एक बड़े स्क्रीनिंग अभियान ने चिंता बढ़ा दी है. जांच में पाया गया कि टीबी से इंफेक्टेड पाए गए लोगों में बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की थी, जिनमें बीमारी के कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे. यानी ये लोग सामान्य रूप से अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे और उन्हें खुद भी इस इंफेक्शन का अंदाजा नहीं था.

34 प्रतिशत बिना लक्षण वाले मामले मिले

स्वास्थ्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, नेशनल ट्यूबरक्लोसिस एलिमिनेशन प्रोग्राम के तहत जनवरी से अक्टूबर 2025 के बीच पूर्वोत्तर राज्यों में कमजोर और जोखिम वाले वर्गों के लोगों की विशेष जांच की गई. इस दौरान कुल 41,727 टीबी मरीजों की पहचान हुई, जिनमें से 14,356 मरीज ऐसे थे जिन्हें कोई लक्षण नहीं था. यह संख्या कुल मामलों का करीब 34 प्रतिशत है.

39 लाख लोगों की जांच की गई

टीबी उन्मूलन अभियान के तहत पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में लगभग 39 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई. इनमें से करीब 6 लाख लोगों का चेस्ट एक्स-रे भी किया गया. स्वास्थ्य एक्सपर्ट का मानना है कि सक्रिय जांच अभियान के कारण ऐसे मरीजों की पहचान संभव हो सकी, जो सामान्य परिस्थितियों में अस्पताल तक नहीं पहुंचते.  आंकड़ों के अनुसार असम में सबसे अधिक 10,362 एसिम्प्टोमैटिक टीबी मरीज मिले. इसके बाद मेघालय में 1,055, नागालैंड में 857 और त्रिपुरा में 510 मामले दर्ज किए गए. अरुणाचल प्रदेश में 479, मणिपुर में 465, सिक्किम में 380 और मिजोरम में 248 ऐसे मरीज पाए गए, जिनमें टीबी के सामान्य लक्षण मौजूद नहीं थे.

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टीबी नियंत्रण अभियान के लिए बड़ी चुनौती

एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसे मरीज टीबी नियंत्रण अभियान के लिए बड़ी चुनौती साबित होते हैं. चूंकि इनमें बीमारी के लक्षण नहीं होते, इसलिए वे लंबे समय तक बिना इलाज के रह सकते हैं. इससे इंफेक्शन के फैलने का खतरा भी बना रहता है. यही वजह है कि अब स्वास्थ्य विभाग केवल अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर निर्भर रहने के बजाय घर-घर और समुदाय स्तर पर जांच अभियान चला रहा है. 

एआई तकनीक का उपयोग

टीबी की जल्द पहचान के लिए कई राज्यों ने आधुनिक तकनीक का भी सहारा लेना शुरू कर दिया है. मेघालय में कफ अगेंस्ट टीबी ऐप और एआई आधारित पोर्टेबल एक्स-रे यूनिट का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके अलावा भी कई राज्यों में इस तरह की सुविधा है. सबसे हैरानी वाली बात यह है कि  रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2025 तक पूर्वोत्तर क्षेत्र में 10.7 लाख से अधिक संभावित टीबी मरीजों की जांच की गई. इस दौरान संभावित टीबी जांच दर में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई. वर्ष 2024 में यह दर प्रति लाख आबादी पर 2,062 थी, जो 2025 में बढ़कर 2,645 हो गई.

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