हर गांठ नहीं होती कैंसर, गूगल के भरोसे न करें अपना दिमाग खराब

हर गांठ नहीं होती कैंसर, गूगल के भरोसे न करें अपना दिमाग खराब


Cancer Myths: छोटी-सी परेशानी पर लोग सबसे पहले डॉक्टर के पास नहीं, बल्कि गूगल पर जाते हैं. पेट में दर्द हुआ तो गूगल, सिर दर्द हुआ तो गूगल और अगर शरीर में कोई गांठ महसूस हो गई तो तो बस “कहीं ये कैंसर तो नहीं?” जैसी सैकड़ों चिंताएं एक ही मिनट में दिमाग पर हावी हो जाती हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि, शरीर में हर गांठ कैंसर नहीं होती. 

गांठ बनने के क्या कारण होते हैं

डॉ. पाल के अनुसार, शरीर में गांठ बनने के कई कारण हो सकते हैं और उनमें से ज्यादातर का कैंसर से कोई लेना-देना नहीं होता.

  • सिस्ट (Cyst): यह एक थैलीनुमा संरचना होती है जिसमें पानी, पस या अन्य तरल पदार्थ भरे होते हैं. यह अक्सर हानिरहित होती है.
  • लिपोमा (Lipoma): यह वसा की गांठ होती है, जो मुलायम और दर्दरहित होती है.
  • संक्रमण (Infection): किसी बैक्टीरिया या वायरस से हुई सूजन भी गांठ का कारण हो सकती है.
  • हॉर्मोनल बदलाव: खासकर महिलाओं में मासिक चक्र के दौरान ब्रेस्ट में गांठ बन सकती है, जो सामान्य होती है और अपने आप ठीक हो जाती है.

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कब सतर्क होना जरूरी है?

  • हर गांठ कैंसर नहीं होती, लेकिन कुछ लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए
  • गांठ तेजी से बढ़ रही हो
  • गांठ में लगातार दर्द या सूजन हो
  • गांठ के ऊपर की त्वचा लाल, गर्म या सख्त हो गई हो
  • बुखार, वजन कम होना या थकान महसूस होना
  • गूगल से ज्यादा भरोसा डॉक्टर पर करें

गूगल पर हेल्थ से जुड़ी जानकारी पढ़ना आसान है, लेकिन समस्या यह है कि वहां लक्षण पढ़कर अक्सर लोग सबसे खराब नतीजे सोचने लगते हैं. डॉ. पाल कहते हैं कि, इस तरह की “सेल्फ-डायग्नोसिस” से मानसिक तनाव बढ़ जाता है और कई बार लोग सही समय पर असली बीमारी की जांच नहीं कराते. 

हर गांठ को देखकर घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसे नज़रअंदाज़ करना भी सही नहीं. गूगल पर घंटों सर्च करने से बेहतर है कि समय पर डॉक्टर से जांच करवाएं. सही जानकारी और सही समय पर कदम उठाकर आप न केवल अपनी सेहत बचा सकते हैं, बल्कि मानसिक शांति भी पा सकते हैं.

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Disclaimer: खबर में दी गई कुछ जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है. आप किसी भी सुझाव को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या शंख बजाने से कम हो जाते हैं स्लीप एपनिया के लक्षण? स्टडी में सामने आया सच

क्या शंख बजाने से कम हो जाते हैं स्लीप एपनिया के लक्षण? स्टडी में सामने आया सच


आज की बिजी और तेजी से भागती-दौड़ती लाइफस्टाइल के कारण लोगों को कई बीमारियां हो रही हैं. इन्हीं में से है नींद से जुड़ी एक बीमारी स्लीप एपनिया. यह एक ऐसा गंभीर स्लीपिंग डिसऑर्डर है, जिसमें व्यक्ति की नींद के दौरान बार-बार सांस रुक जाती है या ब्लॉक्ड एयरवेज हो जाता है. इस दौरान मरीज को ताजी हवा के लिए जागना पड़ता है, जिससे ना सिर्फ नींद खराब होती है बल्कि दिन में थकान, चिड़चिड़ापन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ जाती हैं.

अब तक इसका इलाज मुख्य रूप से CPAP मशीन से किया जाता रहा है, जो सोते वक्त मरीज को नाक-मुंह पर मास्क लगाकर दबाव वाली हवा पहुंचाती है. हालांकि, यह तरीका हर किसी के लिए अफोर्डेबल नहीं होता है. इसी के चलते वैज्ञानिक और डॉक्टर नए-नए इलाज पर काम कर रहे हैं. इसी बीच अब एक नई स्टडी में सामने आया है कि शंख बजाना जो भारतीय परंपरा में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक माना जाता है वह्र स्लीप एपनिया के लक्षणों को कम करने में मददगार हो सकता है. तो आइए, जानते हैं कि क्या शंख बजाने से सच में स्लीप एपनिया के लक्षण कम हो जाते हैं.

क्या है स्लीप एपनिया

स्लीप एपनिया एक ऐसी स्थिति है, जिसमें गले की मांसपेशियां नींद के दौरान बहुत ज्यादा ढीली हो जाती हैं, इससे जीभ, पैलेट और टॉन्सिल जैसे टिशू पीछे की तरफ गिरते हैं और सांस की नली को पूरी तरह से बंद कर देते हैं. इस रुकावट की वजह से व्यक्ति को बार-बार सांस लेने में दिक्कत होती है और उसे बार-बार नींद से जागना पड़ता है. जिसके कारण दिन में थकान, चिड़चिड़ापन और कई तरह की बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाती हैं. 

क्या शंख बजाने से स्लीप एपनिया के लक्षण कम हो जाते हैं?

स्टडी के अनुसार, शंख बजाना फेफड़ों और गले की मांसपेशियों को एक्टिव करता है और स्लीप एपनिया के लक्षणों को कम कर सकता है. इस स्टडी में 30 मरीजों पर रिसर्च की गई, जिसमें पता चला कि शंख बजाने वाले लोगों में नींद की क्वालिटी में 34 प्रतिशत तक सुधार हुआ, वहीं दिन में नींद आना कम हो गया, ऑक्सीजन लेवल बेहतर हुआ, हाइपोक्सिया इंडेक्स  में 4.4 प्रतिशत की गिरावट देखी गई. शंख बजाते समय व्यक्ति को गहराई से सांस लेनी होती है, जिससे फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है. शंख बजाने में ज्यादा दबाव लगता है, जिससे गले और जीभ की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और नींद में एयरवेज को ब्लॉक नहीं करतीं हैं. इसके अलावा शंख से जनरेट होने वाली वाइब्रेशन मांसपेशियों को एक्टिव करती है और सांस लेने के प्रोसेस को बेहतर बनाती है. 

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हर सप्ताह में खा लेंगे ये चार स्नैक्स तो कभी नहीं होंगे फैटी लिवर का शिकार, हार्वर्ड के एक्सपर्

हर सप्ताह में खा लेंगे ये चार स्नैक्स तो कभी नहीं होंगे फैटी लिवर का शिकार, हार्वर्ड के एक्सपर्


Snacks for Fatty Liver: आजकल फैटी लिवर सिर्फ एक मेडिकल टर्म नहीं, बल्कि घर-घर की चिंता बनता जा रहा है. वजह भी साफ है, घंटों बैठे रहना, कम शारीरिक गतिविधि और प्रोसेस्ड खाने का ज्यादा सेवन. लेकिन अच्छी खबर ये है कि लिवर को नुकसान पहुंचाने वाला खाना ही उसकी देखभाल में मदद भी कर सकता है. हार्वर्ड के लिवर और गट स्पेशलिस्ट डॉ. सौरभ सेठी ने 4 ऐसे स्नैक कॉम्बिनेशन बताए हैं, जो सही लाइफस्टाइल के साथ मिलकर फैटी लिवर को रिवर्स करने में मददगार हो सकते हैं.

खजूर और अखरोट

अक्सर लोग मानते हैं कि, खजूर बहुत मीठा होता है और हेल्थ के लिए अच्छा नहीं, लेकिन सच ये है कि खजूर में भरपूर घुलनशील फाइबर होता है, जो पाचन को धीमा करके और शुगर को नियंत्रित करके लिवर में फैट जमा होने से रोकने में मदद करता है. जब इसे अखरोट के साथ खाया जाए तो इसका असर और भी बढ़ जाता है. अखरोट ओमेगा-3 फैटी एसिड का बेहतरीन प्लांट-बेस्ड सोर्स है, जो लिवर की सूजन कम करने और एंजाइम लेवल सुधारने में मदद करता है. रिसर्च में पाया गया है कि अखरोट का सेवन NAFLD (नॉन-एल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज़) के कम जोखिम से जुड़ा है. हफ्ते में दो बार, सिर्फ 2 खजूर और एक छोटी मुट्ठी अखरोट खाना, लिवर के लिए बेहतर हो सकता है.

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डार्क चॉकलेट और ड्राई फ्रूट्स

डार्क चॉकलेट लिवर के लिए? सुनने में अजीब लगता है, लेकिन इसका राज छुपा है इसमें मौजूद पॉलीफेनॉल्स में। 70% या उससे ज्यादा कोको वाली डार्क चॉकलेट में भरपूर एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो लिवर की कोशिकाओं पर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कम करते हैं. अगर इसमें बादाम या पिस्ता जैसे ड्राई फ्रूट्स जोड़ दें, तो फायदा और भी बढ़ जाता है. ये नट्स विटामिन E और हेल्दी फैट्स का सोर्स हैं, जो लिवर सेल्स की सुरक्षा करते हैं. हफ्ते में एक-दो बार, एक छोटा टुकड़ा डार्क चॉकलेट और थोड़े से ड्राई फ्रूट्स खाना, बिना गिल्ट के मीठा खाने का तरीका है, जो मूड और सेहत दोनों को खुश रखता है.

शहद और दालचीनी के साथ सेब

सेब के टुकड़ों पर कच्चे शहद की हल्की सी बूंद और ऊपर से दालचीनी का छिड़काव, ये स्नैक जितना स्वादिष्ट है, उतना ही हेल्दी भी। सेब में पेक्टिन नामक घुलनशील फाइबर होता है, जो अच्छे बैक्टीरिया को पोषण देता है और शरीर से फैट को बाहर निकालने में मदद करता है. शहद, सीमित मात्रा में गट हेल्थ को सपोर्ट करता है और लिवर मेटाबॉलिज़्म को बेहतर बनाता है. इसे ठंडा या हल्का गर्म दोनों तरह से खाया जा सकता है, और ये हर मौसम में एक आरामदायक स्नैक है.

दही और बेरीज

प्रोबायोटिक्स आजकल हेल्थ के बड़े हीरो माने जाते हैं, लेकिन हर दही उतना फायदेमंद नहीं होता. प्लेन ग्रीक योगर्ट प्रोटीन में भरपूर, कम शुगर वाला और लाइव कल्चर्स से भरपूर होता है, जो गट हेल्थ को बहाल करता है और ये लिवर फैट लेवल को मैनेज करने में अहम भूमिका निभाता है.इसमें ब्लूबेरी या स्ट्रॉबेरी जैसी बेरीज़ डालने से इसमें पॉलीफेनॉल और विटामिन C जुड़ जाते हैं, जो लिवर की सूजन कम करने में मदद करते हैं। हफ्ते में कुछ बार, एक छोटा बाउल ग्रीक योगर्ट और बेरीज़ का सेवन, लंबे समय तक लिवर हेल्थ बनाए रखने की एक आसान आदत हो सकती है.

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कैंसर से मौत का खतरा हो जाएगा एकदम कम, इस विटामिन की डोज करती है मदद

कैंसर से मौत का खतरा हो जाएगा एकदम कम, इस विटामिन की डोज करती है मदद


पहले कैंसर का खतरा बड़े लोगों को होते थे, लेकिन आज सभी इसकी चपेट में हैं. हम सभी जानते हैं कि शरीर के लिए विटामिन जरूरी होते हैं, लेकिन हाल में आई एक बड़ी रिसर्च ने साफ किया है कि एक खास विटामिन की डोज से कैंसर से मौत का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है. यहां बात हो रही है विटामिन D की, खासकर इसके दो रूप – विटामिन D2 और विटामिन D3 की.

विटामिन D2 और D3 में क्या अंतर है?

विटामिन D2 ज्यादातर इंसान द्वारा बनाया जाता है और खाने में मिलाया जाता है. वहीं, विटामिन D3 हमारी त्वचा में सूरज की रोशनी से बनता है और मछली, अंडा जैसे पशु-आधारित खाने से भी मिलता है. रिसर्च में बार-बार साबित हुआ है कि विटामिन D3, शरीर में विटामिन D का स्तर बढ़ाने में D2 से ज्यादा असरदार है.

रिसर्च में क्या पाया गया?

KSR में छपी रिपोर्ट के अनुसार, हाल में किए गए बड़े अध्ययन में यह देखा गया कि क्या विटामिन D सप्लीमेंट लेने से वयस्कों में मौत का खतरा कम होता है. इसके लिए 52 पुराने अध्ययनों की समीक्षा की गई, जिनमें 75,000 से ज्यादा लोग शामिल थे.

सभी मौतों के खतरे पर असर नहीं

नतीजों में पाया गया कि विटामिन D सप्लीमेंट लेने से सभी कारणों से होने वाली मौत (all-cause death) का खतरा खास तौर पर नहीं घटता. दिल की बीमारी से मौत, दिल के अलावा किसी और बीमारी से मौत या कैंसर के अलावा मौत के मामलों में भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा.

कैंसर से मौत का खतरा 16 प्रतिशत तक कम

लेकिन, कैंसर से होने वाली मौत का खतरा काफी कम हुआ. रिसर्च के अनुसार, विटामिन D सप्लीमेंट लेने से कैंसर से मौत का खतरा लगभग 16 प्रतिशत तक घट गया. सबसे खास बात यह रही कि विटामिन D3 लेने वालों में सभी कारणों से मौत का खतरा, D2 लेने वालों की तुलना में काफी कम पाया गया.

वैज्ञानिकों की राय

शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सिर्फ विटामिन D3 लेने से कुल मौत का खतरा घट जाएगा. लेकिन इतना साफ है कि यह कैंसर से मौत के खतरे को कम करता है. इसी वजह से वैज्ञानिक बड़े स्तर पर और स्टडी करने की सलाह दे रहे हैं.

क्यों जरूरी है विटामिन D?

विटामिन D न सिर्फ हड्डियों और इम्यून सिस्टम के लिए जरूरी है, बल्कि यह कई गंभीर बीमारियों से बचाव में भी मदद कर सकता है. इसकी कमी थकान, मांसपेशियों में दर्द, हड्डियों की कमजोरी और बार-बार बीमार पड़ने का कारण बन सकती है. अगर आप अपनी डाइट या सप्लीमेंट से पर्याप्त विटामिन D, खासकर D3 ले रहे हैं, तो यह लंबी उम्र और बेहतर सेहत का एक अच्छा तरीका हो सकता है. सूरज की धूप इसका प्राकृतिक और आसान स्रोत है, तो रोज थोड़ी धूप जरूर लें.

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बाल बता देते हैं बॉडी में इन दिक्कतों का पता, परेशानी बढ़ने से पहले जान लें सच

बाल बता देते हैं बॉडी में इन दिक्कतों का पता, परेशानी बढ़ने से पहले जान लें सच


क्या आप जानते हैं कि आपके बाल सिर्फ सुंदरता का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह आपकी सेहत का आईना भी होते हैं? बालों में आने वाले बदलाव अक्सर शरीर के अंदर चल रही गड़बड़ियों का संकेत होते हैं. रिसर्च के अनुसार, बालों का झड़ना, पतले होना या उनका रंग बदलना कई हेल्थ प्रॉब्लम्स का शुरुआती संकेत हो सकता है. आइए जानते हैं कौन-सी समस्याएं बालों से जुड़ी होती हैं और उनसे बचाव कैसे करें.

बालों का झड़ना: पोषण की कमी या हार्मोनल असंतुलन का संकेत

अगर आपके बाल ज्यादा झड़ रहे हैं, तो यह आयरन, जिंक या प्रोटीन की कमी का परिणाम हो सकता है. महिलाओं में यह समस्या अक्सर थायरॉयड असंतुलन, पीसीओडी और हार्मोनल बदलाव के कारण भी होती है. रिसर्च बताती है कि हर दिन 50-100 बाल झड़ना सामान्य है, लेकिन अगर यह संख्या बढ़ रही है तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें.

क्या करें?

  • डाइट में हरी सब्जियां, अंडे, दालें और नट्स शामिल करें.
  • जरूरत होने पर डॉक्टर की सलाह से आयरन और बायोटिन सप्लीमेंट लें.

समय से पहले सफेद बाल: विटामिन B12 या तनाव की वजह

आजकल युवाओं में भी समय से पहले सफेद बाल होना आम हो गया है. रिसर्च के अनुसार, विटामिन B12 की कमी और लंबे समय तक तनाव लेने से मेलानिन का स्तर कम हो जाता है, जिससे बाल सफेद होने लगते हैं.

क्या करें?

  • डाइट में दूध, दही, पनीर, मछली और अंडे शामिल करें.
  • योग और मेडिटेशन से तनाव कम करें.

पतले और बेजान बाल: थायरॉयड या हार्मोनल प्रॉब्लम का संकेत

अगर आपके बाल पहले से पतले हो गए हैं या उनकी चमक खत्म हो रही है, तो यह थायरॉयड गड़बड़ी का संकेत हो सकता है. खासकर हाइपोथायरॉयडिज्म में बालों की ग्रोथ धीमी हो जाती है.

क्या करें?

  • ब्लड टेस्ट कराकर थायरॉयड लेवल चेक कराएं.
  • डाइट में आयोडीन और प्रोटीन वाली चीजें जैसे दही, अंडा और फल शामिल करें.

डैंड्रफ और खुजली: स्कैल्प हेल्थ और फंगल इंफेक्शन से जुड़ी समस्या

बालों में ज्यादा डैंड्रफ या खुजली होना फंगल इंफेक्शन या ड्राई स्किन का संकेत हो सकता है. अगर डैंड्रफ लंबे समय तक बनी रहे, तो यह सोरायसिस या डर्मेटाइटिस जैसी बीमारी का संकेत हो सकता है.

क्या करें?

  • एंटी-डैंड्रफ शैम्पू का इस्तेमाल करें.
  • अगर समस्या बनी रहे, तो डर्मेटोलॉजिस्ट से सलाह लें.

बचाव कैसे करें?

  • संतुलित आहार लें और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड से बचें.
  • हेयर केयर रूटीन में ज्यादा केमिकल्स से बचें.
  • तनाव कम करने के लिए योग और मेडिटेशन करें.
  • समय-समय पर हेल्थ चेकअप कराते रहें.

डॉ. आरेश सिंह, मेडिकल ऑफिसर, राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय, आजमगढ़ कहते हैं कि बालों में होने वाले बदलावों को हल्के में न लें. यह कई बार बड़ी हेल्थ प्रॉब्लम का शुरुआती संकेत हो सकता है. समय पर जांच, सही डाइट और डॉक्टर की सलाह से इन दिक्कतों को रोका जा सकता है.

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क्यों होते हैं मस्से और ये कितने खतरनाक? जान लें इलाज का सही तरीका

क्यों होते हैं मस्से और ये कितने खतरनाक? जान लें इलाज का सही तरीका


मस्से यानी वर्टिगो (Warts) स्किन पर उभरने वाले छोटे-छोटे गांठें होती हैं. ये आमतौर पर सौम्य होते हैं, लेकिन कई बार दिखने में कष्टदायक और असुविधाजनक भी बन जाते हैं. मस्से किसी भी उम्र के लोगों को हो सकते हैं. ये अक्सर हाथ, पैर, चेहरे या शरीर के अन्य हिस्सों पर बनते हैं.

मस्से क्यों होते हैं?

मस्से मुख्य रूप से ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) नामक वायरस के कारण होते हैं. यह वायरस त्वचा की सतह में प्रवेश कर वहां की कोशिकाओं को असामान्य रूप से बढ़ने के लिए प्रेरित करता है, जिससे मस्से बन जाते हैं. यह संक्रमण त्वचा के छोटे कट, घाव या खरोंच के जरिए फैलता है.

इसके अलावा, कुछ अन्य कारण भी मस्से होने में मदद करते हैं, जैसे:

  • कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, जिससे शरीर वायरस से लड़ने में असमर्थ होता है.
  • बार-बार त्वचा पर रगड़ या घर्षण.
  • हॉर्मोनल बदलाव, खासकर किशोरावस्था में.
  • संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आना, जैसे कि उनका तौलिया या कपड़े साझा करना.

मस्सों के प्रकार

मस्से कई तरह के होते हैं, जिनमें मुख्य हैं:

  • साधारण मस्सा: छोटे, कठोर और उभरे हुए.
  • फ्लैट मस्सा: स्किन के रंग के और सपाट.
  • पेडीकुलट मस्सा: यह त्वचा से जुड़ा होता है.
  • प्लांटर मस्सा: पैर के तलवे पर बनने वाला मस्सा, जिससे चलने में दर्द देता है.

मस्सों का इलाज

मस्सों का इलाज कई तरह से किया जा सकता है. आमतौर पर डॉक्टर मस्सों को खत्म करने के लिए निम्न उपाय अपनाते हैं:

  • क्रायोथेरेपी (फ्रीजिंग): तरल नाइट्रोजन का उपयोग कर मस्से को जमी हुई जगह बना दिया जाता है, जिससे वह धीरे-धीरे गिर जाता है.
  • लेजर थेरेपी: लेजर किरणों से मस्से को निशाना बनाया जाता है.
  • स्क्रैपिंग: डॉक्टर विशेष उपकरण से मस्से को हटाते हैं.
  • मेडिकल क्रीम: कुछ दवाएं वायरस को रोकने और मस्से को हटाने में मदद करती हैं.
  • घरेलू उपचार: एलोवेरा, टी ट्री ऑयल जैसे प्राकृतिक उपाय मस्सों में आराम दे सकते हैं, लेकिन इनका असर धीमा होता है.

सावधानियां और बचाव

  • मस्सों को खुद से नोचने या फोड़ने से बचें क्योंकि इससे संक्रमण फैल सकता है.
  • साफ-सफाई का ध्यान रखें और संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने से बचें.
  • प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत रखने के लिए स्वस्थ आहार और पर्याप्त नींद लें.
  • बच्चों को बार-बार हाथ धोने की आदत डालें.

मस्से सामान्य त्वचा की समस्या हैं, जिन्हें आसानी से इलाज किया जा सकता है. हालांकि ये सौम्य होते हैं, फिर भी बढ़ने या संक्रमण के खतरे को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. समय पर डॉक्टर से सलाह लेकर सही उपचार कराने से मस्सों की समस्या खत्म हो सकती है और आप स्वस्थ त्वचा का आनंद ले सकते हैं.

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