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गहरी सांस लें: गहरी सांस लेने से मस्तिष्क में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे मन शांत होता है और तनाव कम होता है. रोज सुबह और रात को 5-10 मिनट तक गहरी सांस लेने का अभ्यास करें.

मेडिटेशन और योग: योग और ध्यान न केवल शरीर को लचीला बनाते हैं, बल्कि मन को भी स्थिर करते हैं. दिन की शुरुआत 15 मिनट मेडिटेशन से करें और कम से कम 3-4 आसन जरूर अपनाएं.

रोजाना टहलना: खुली हवा में 20-30 मिनट टहलना आपके मूड को बेहतर बनाता है और एंडोर्फिन हार्मोन रिलीज करता है, जो स्ट्रेस को कम करता है. खासकर सुबह की वॉक बेहद फायदेमंद है.

हंसने की थेरेपी: हंसना तनाव को दूर करने का सबसे आसान तरीका है. कॉमेडी शो देखें, मजेदार वीडियो देखें या दोस्तों के साथ हंसें, हसी आपके दिमाग को तुरंत हल्का कर देती है.

पर्याप्त नींद लें: नींद की कमी तनाव को बढ़ाती है और मानसिक थकान लाती है. रोजाना 7-8 घंटे की गहरी नींद लेना मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है. सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करें और रिलैक्सिंग माहौल बनाएं.

अपने शौक पूरे करें: पेंटिंग, म्यूजिक, डांस, गार्डनिंग या कोई भी हॉबी जो आपको खुशी दे, उसे समय दें। यह मन को ताजगी देता है और स्ट्रेस लेवल को घटाता है.
Published at : 11 Aug 2025 06:31 PM (IST)
आज की बिजी लाइफ में ज्यादातर लोग इंस्टेंट बनने वाला खाना पसंद करने लगे हैं. सुबह ऑफिस जल्दी पहुंचना हो या बच्चों को टिफिन देना हो, ऐसे में मार्केट में मिलने वाले रेडी-टू-ईट पैकेट्स, इंस्टेंट नूडल्स, बिस्किट्स, चिप्स, केक, डिब्बाबंद जूस और फ्रोजन फूड्स जैसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स हमारी डेली लाइफ के खाने का हिस्सा बन गए हैं, ये दिखने में जितने टेस्टी होते हैं, असल में उतने ही खतरनाक भी साबित हो सकते हैं. इन चीजों को खाने से हमें तुरंत भूख मिटाने में तो राहत मिलती है, लेकिन धीरे-धीरे ये शरीर में बीमारियों का जहर भरते जाते हैं. कई बार तो हमें पता भी नहीं चलता कि ये आदत हमें धीरे-धीरे गंभीर बीमारियों और समय से पहले मौत की ओर ले जा रही है. ऐसे में आइए जानते हैं कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड से हो कितनी सारी बीमारियां हो सकती हैं और इससे कितना मौत का खतरा बढ़ जाता है.
क्या होते हैं अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स?
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स वे खाने की चीजें होती हैं जिन्हें बहुत ज्यादा प्रोसेस किया गया हो, जिसमें आर्टिशयल फलेवर्स, कलर्स, प्रिजर्वेटिव्स, और केमिकल्स डाले गए हों. इन फूड्स को तैयार करने में नेचुरल तत्वों का यूज बहुत कम और मशीनों व फैक्ट्रियों में बनने वाले केमिकल्स का यूज ज्यादा होता है. जैसे पैकेट वाले स्नैक्स, इंस्टेंट नूडल्स, बिस्किट, केक, पेस्ट्री, डिब्बाबंद जूस और कोल्ड ड्रिंक, फ्रोजन पिज्जा रेडी-टू-ईट खाना.
अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड से हो कितनी सारी बीमारियां हो सकती हैं?
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन और दुनिया के कई हेल्थ एक्सपर्ट्स ने इस बात को बताया है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स सेहत के लिए बहुत ही नुकसानदायक हैं. इनके लगातार सेवन से शरीर में हार्मोनल असंतुलन, सूजन, वजन बढ़ना, और इम्यूनिटी कमजोर होने लगती है. एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि ज्यादा प्रोसेस्ड फूड खाने से कई बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है.
1. हार्ट अटैक और स्ट्रोक – अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स में मौजूद ट्रांस फैट, नमक और केमिकल्स खून की नलियों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे दिल की बीमारियों और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.
2. मोटापा – इन फूड्स में कैलोरी ज्यादा और पोषण कम होता है, जिससे शरीर में चर्बी जमा होती है और वजन तेजी से बढ़ता है. इससे मोटापा होने की संभावना 55 प्रतिशत तक बढ़ जाती है.
3. नींद की समस्या – प्रोसेस्ड फूड्स में चीनी और कैफीन जैसे तत्व होते हैं, जो शरीर में नींद के नेचुरल प्रोसेस को बिगाड़ते हैं. इससे नींद न आने की समस्या 41 प्रतिशत तक बढ़ सकती है.
4. टाइप-2 डायबिटीज – इन फूड्स में छिपी हुई शुगर और रिफाइंड कार्ब्स ब्लड शुगर को इंबैलेंस करते हैं. इससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा 40 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.
5. डिप्रेशन – अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स दिमाग में मौजूद रसायनों जैसे सेरोटोनिन को प्रभावित करते हैं, जिससे मूड बिगड़ता है और डिप्रेशन की संभावना 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है.
कितना बढ़ जाता है मौत का खतरा?
ज्यादातर जो लोग रोजाना ज्यादा अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाते हैं, उनमें समय से पहले मौत का खतरा लगभग 30 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. क्योंकि ये फूड्स शरीर में सूजन और हाई ब्लड प्रेशर पैदा करते हैं, जो दिल और दिमाग को नुकसान पहुंचाते हैं. इन फूड्स में जरूरी पोषक तत्व नहीं होते, जिससे इम्यून सिस्टम कमजोर होता है. मोटापा, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं मौत का खतरा बढ़ाती हैं. इनसे लीवर, किडनी और दिमाग पर लंबे समय में बुरा असर पड़ता है.
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शरीर में सूजन: जब किडनी सही से फिल्टर नहीं कर पाती, तो शरीर में अतिरिक्त फ्लूइड जमा होने लगता है. इससे पैरों, टखनों, हाथों और चेहरे पर सूजन दिखने लगती है. अगर यह सूजन सुबह-सुबह ज्यादा हो, तो यह किडनी की चेतावनी हो सकती है.

पेशाब के रंग और मात्रा में बदलाव: किडनी की समस्या के शुरुआती संकेतों में पेशाब का रंग बदलना शामिल है, बहुत गाढ़ा, बहुत हल्का, झागदार या खून मिश्रित पेशाब किडनी फेल होने की ओर इशारा कर सकता है.

लगातार थकान महसूस होना: किडनी सही से काम न करने पर शरीर में टॉक्सिन और अशुद्धियां जमा हो जाती हैं, जिससे थकान, कमजोरी और ध्यान केंद्रित करने में मुश्किल होती है.

भूख कम लगना: किडनी फेल होने की स्थिति में शरीर में वेस्ट मटेरियल का स्तर बढ़ जाता है, जिससे भूख कम लगती है, मुंह में कड़वाहट आती है और बार-बार उल्टी या मिचली हो सकती है.

सांस फूलना: किडनी की खराबी से शरीर में फ्लूइड फेफड़ों में जमा हो सकता है, जिससे सांस लेने में कठिनाई और सीने में भारीपन महसूस हो सकता है. साथ ही, एनीमिया की वजह से ऑक्सीजन की कमी भी सांस फूलने का कारण बनती है.

त्वचा में खुजली और रूखापन: किडनी खून से वेस्ट और अतिरिक्त मिनरल्स को निकालने का काम करती है. जब यह प्रक्रिया बिगड़ती है, तो शरीर में मिनरल्स का असंतुलन और टॉक्सिन जमा होने लगते हैं, जिससे त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है.
Published at : 11 Aug 2025 05:31 PM (IST)
शरीर में सूजन: जब किडनी सही से फिल्टर नहीं कर पाती, तो शरीर में अतिरिक्त फ्लूइड जमा होने लगता है. इससे पैरों, टखनों, हाथों और चेहरे पर सूजन दिखने लगती है. अगर यह सूजन सुबह-सुबह ज्यादा हो, तो यह किडनी की चेतावनी हो सकती है.

पेशाब के रंग और मात्रा में बदलाव: किडनी की समस्या के शुरुआती संकेतों में पेशाब का रंग बदलना शामिल है, बहुत गाढ़ा, बहुत हल्का, झागदार या खून मिश्रित पेशाब किडनी फेल होने की ओर इशारा कर सकता है.

लगातार थकान महसूस होना: किडनी सही से काम न करने पर शरीर में टॉक्सिन और अशुद्धियां जमा हो जाती हैं, जिससे थकान, कमजोरी और ध्यान केंद्रित करने में मुश्किल होती है.

भूख कम लगना: किडनी फेल होने की स्थिति में शरीर में वेस्ट मटेरियल का स्तर बढ़ जाता है, जिससे भूख कम लगती है, मुंह में कड़वाहट आती है और बार-बार उल्टी या मिचली हो सकती है.

सांस फूलना: किडनी की खराबी से शरीर में फ्लूइड फेफड़ों में जमा हो सकता है, जिससे सांस लेने में कठिनाई और सीने में भारीपन महसूस हो सकता है. साथ ही, एनीमिया की वजह से ऑक्सीजन की कमी भी सांस फूलने का कारण बनती है.

त्वचा में खुजली और रूखापन: किडनी खून से वेस्ट और अतिरिक्त मिनरल्स को निकालने का काम करती है. जब यह प्रक्रिया बिगड़ती है, तो शरीर में मिनरल्स का असंतुलन और टॉक्सिन जमा होने लगते हैं, जिससे त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है.
Published at : 11 Aug 2025 05:31 PM (IST)