लॉन्ग वर्किंग आवर्स और देर तक जागने की मजबूरी, जानें दिल के लिए यह कितना खतरनाक?

लॉन्ग वर्किंग आवर्स और देर तक जागने की मजबूरी, जानें दिल के लिए यह कितना खतरनाक?


Can Long Working Hours Cause Heart Attack: आज की हमेशा काम में व्यस्त का कल्चर में देर रात तक जागना और लंबे घंटे काम करना कई लोगों के लिए उपलब्धि का प्रतीक बन गया है. लेकिन इस भागदौड़ के पीछे एक खामोश खतरा पनप रहा है. हालिया रिसर्च बताते हैं कि अनियमित नींद और 55 घंटे या उससे ज्यादा काम करना सिर्फ थकान ही नहीं बढ़ाता, बल्कि हार्ट पर गंभीर दबाव भी डालता है.

अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, लंबे समय तक काम करना, नाइट शिफ्ट और अनरेगुलर शेड्यूल हार्ट रोग के बड़े जोखिम कारणों में से हैं. डब्लूएचओ और आईएलओ के संयुक्त एनालिसिस में पाया गया कि 2016 में लंबे कार्य घंटों से जुड़े कारणों से लाखों लोगों की मौत हार्ट रोग और स्ट्रोक से हुई. जो लोग सप्ताह में 55 घंटे या उससे अधिक काम करते हैं, उनमें 35 से 40 घंटे काम करने वालों की तुलना में जोखिम काफी ज्यादा पाया गया.

एक्सपर्ट बताते हैं कि नींद सिर्फ आराम नहीं, बल्कि वह समय है जब हार्ट और ब्लड वेसल्स खुद को दुरुस्त करती हैं. लगातार कम नींद लेने से सूजन बढ़ती है, आर्टरीज में प्लाक जमने का खतरा बढ़ता है और ब्लड शुगर व मेटाबॉलिज्म गड़बड़ा सकते हैं. इससे मोटापा और डायबिटीज का जोखिम भी बढ़ता है, जो हार्ट की बीमारी के बड़े कारण है.

नाइट शिफ्ट से क्या होती है दिक्कत?

हमारा शरीर 24 घंटे की सर्कैडियन रिद्म, पर चलता है, नाइट शिफ्ट या अनरेगुलर सोने-जागने का समय इस तालमेल को बिगाड़ देता है. नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ के सपोर्ट में हुए रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों की नींद का समय बेहद अनियमित होता है, उनमें हार्ट रोग का खतरा लगभग दोगुना हो सकता है. नींद बिगड़ने पर ब्लड प्रेशर बढ़ता है, कॉर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन बढ़ते हैं, सूजन बढ़ती है और कोलेस्ट्रॉल व शुगर नियंत्रण बिगड़ता है, ये सब हार्ट पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं.

क्या होते हैं लक्षण?

एक्सपर्ट के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति लगातार 6 से 7 घंटे से कम सोता है, तो शरीर तनाव की स्थिति में रहता है. इससे हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर बढ़ते हैं और लंबे समय में दिल का दौरा या स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है. कुछ शुरुआती संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है, जिसमें आराम की स्थिति में भी हाई ब्लड प्रेशर, सीने में असहजता या धड़कन का तेज होना, हल्की मेहनत में सांस फूलना, लगातार थकान या दिनभर सुस्ती. ऐसे लक्षण बार-बार दिखें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.

आापको क्या करना चाहिए?

हार्ट को सुरक्षित रखने के लिए रोज 7 से 9 घंटे की क्वालिटी वाली नींद लेने की कोशिश करें. रेगुलर सोने-जागने का समय रखें, रात में भारी भोजन और स्क्रीन टाइम कम करें. नाइट शिफ्ट हो तो भी भोजन, व्यायाम और आराम का समय तय रखें. दिन में हल्की-फुल्की गतिविधि या टहलना व्लड फ्लो को बेहतर बनाता है. शराब और ज्यादा कैफीन से बचें, योग या ध्यान से तनाव कम करें. साथ ही ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और शुगर की नियमित जांच करवाते रहें.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या वाकई फायदेमंद होती है हाई-प्रोटीन डाइट या ओवरहाइप्ड, जानें क्या है सच?

क्या वाकई फायदेमंद होती है हाई-प्रोटीन डाइट या ओवरहाइप्ड, जानें क्या है सच?


Is High Protein Diet Safe: प्रोटीन अब सिर्फ जिम तक सीमित नहीं रहा, यह रोजमर्रा की रसोई का हिस्सा बन चुका है. सोशल मीडिया खोलिए, सुपरमार्केट जाइए या किसी कैफे का मेन्यू देखिए, आपको हर जगह “हाई-प्रोटीन” लिखा नजर आता है. शेक, स्नैक बार, आटा, सीरियल… सब कुछ अतिरिक्त प्रोटीन का वादा कर रहा है. इसका मैसेज साफ है कि ज्यादा प्रोटीन खाइए, वजन घटाइए, मसल्स बनाइए और लंबे समय तक पेट भरा रखिए. लेकिन न्यूट्रिशन साइंस इतनी आसान लाइन में नहीं सिमटता.

प्रोटीन शरीर के लिए जरूरी है. यह टिश्यू की मरम्मत करता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, हार्मोन और एंजाइम बनाने में मदद करता है और इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करता है. शरीर इसे अमीनो एसिड में तोड़ता है, जो कई अहम प्रक्रियाओं में काम आते हैं. सवाल यह है कि क्या हर थाली में दोगुना प्रोटीन जोड़ना सच में जरूरी है या यह ट्रेंड जरूरत से ज्यादा बड़ा हो गया है?. चलिए जानते हैं कि एक्सपर्ट क्या कहते हैं. 

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

एचओडी कल्पना गुप्ता ने TOI को बताया कि प्रोटीन की जरूरत उम्र, जेंडर, फिजिकल एक्टिविटी और मेटाबॉलिक स्थिति पर निर्भर करती है. ICMR की गाइडलाइन बताती है कि भारतीयों के आहार में प्रोटीन अक्सर कम और अनाज ज्यादा होते हैं, इसलिए संतुलित मात्रा में प्रोटीन बढ़ाना जरूरी है. दूध, दही, पनीर, अंडा, दाल, चिकन जैसे सोर्स अच्छे विकल्प हैं. कुछ रिसर्च बताती हैं कि व्यायाम के साथ ज्यादा प्रोटीन लेने से वजन घटाने और ब्लड शुगर कंट्रोल में मदद मिल सकती है, खासकर टाइप 2 डायबिटीज वाले लोगों में. वहीं दाल, बीन्स और सोया जैसे पौध-आधारित प्रोटीन हार्ट स्वास्थ्य के लिए बेहतर माने गए हैं. हालांकि, अत्यधिक प्रोटीन सेवन से चमत्कारी फायदे होने के ठोस प्रमाण सीमित हैं.

किडनी पर डाल सकता है दबाव

बहुत ज्यादा प्रोटीन किडनी पर दबाव डाल सकता है, खासकर उन लोगों में जिन्हें पहले से किडनी की समस्या हो. ज्यादा प्रोटीन लेने से फाइबर और अन्य पोषक तत्वों की कमी भी हो सकती है, जिससे पाचन संबंधी दिक्कतें बढ़ सकती हैं. बिना सलाह के सप्लीमेंट या प्रोटीन पाउडर लेना भी सही नहीं. ज्यादा प्रोटीन की जरूरत उन लोगों को हो सकती है जो नियमित रूप से तेज गति से व्यायाम करते हैं या उम्रदराज हैं. आम तौर पर 0.8 से 1.2 ग्राम प्रति किलो वजन पर्याप्त माना जाता है. कल्पना गुप्ता का सुझाव है कि हर खाने में एक प्रोटीन सोर्स जोड़ें, जैसे कि नाश्ते में दूध या अंडा, दोपहर या रात के खाने में दाल, दही या चिकन. इसके अलावा बिस्किट की जगह मेवे या भुना चना लें.

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तंबाकू जैसी खतरनाक है चिप्स और कोल्ड ड्रिंक की लत, रिसर्च में खुलासा

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Are Ultra Processed Foods as Addictive as Tobacco: कोल्ड ड्रिंक, चिप्स और कुकीज आज कई लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. लेकिन क्या ये चीजें उतनी ही साधारण हैं, जितनी दिखती हैं? अमेरिका में हुई एक नई स्टडी ने चौंकाने वाली तुलना की है. रिसर्चर का कहना है कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स ताजे फल और सब्जियों से ज्यादा सिगरेट और तंबाकू जैसी इंडस्ट्री से मिलते-जुलते हैं, चाहे बात इनके असर की हो या इन्हें बनाने के तरीके की. उनका दावा है कि इन उत्पादों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि लोग इन्हें ज्यादा से ज्यादा खाएं.

यह स्टडी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन और ड्यूक यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने मिलकर किया है. इसे हेल्थ पॉलिसी पर केंद्रित जर्नल Milbank Quarterly में प्रकाशित किया गया. रिपोर्ट के अनुसार, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड बनाने वाली कंपनियां,जैसे सॉफ्ट ड्रिंक, फ्रोजन पिज्जा और पैकेट वाले सीरियल्स,ऐसी इंजीनियरिंग स्ट्रैटेजी अपनाती हैं, जिनकी जड़ें कभी तंबाकू उद्योग में देखी गई थीं. मकसद साफ है कि उपभोक्ताओं को बार-बार और ज्यादा खाने के लिए प्रेरित करना.

इनमें क्या मिलाया जाता है?

इन फूड प्रोडक्ट्स में चीनी, नमक, फैट और एडिटिव्स की सटीक मात्रा मिलाई जाती है, ताकि दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को सक्रिय किया जा सके. रिसर्चर ने इन्हें सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि जानबूझकर तैयार किए गए, अत्यधिक इंजीनियर और स्वाद के लिहाज से अनुकूलित उत्पाद बताया है. स्वास्थ्य जोखिमों को देखते हुए एक्सपर्ट ने सुझाव दिया है कि इन पर तंबाकू की तरह सख्त नियम लागू किए जाएं, जैसे कि स्पष्ट चेतावनी लेबल, ज्यादा टैक्स, स्कूलों और अस्पतालों में बिक्री पर रोक और बच्चों को लक्षित विज्ञापनों पर नियंत्रण. हालांकि एक बड़ा फर्क यह है कि भोजन जीवन की बुनियादी जरूरत है, इसलिए इसे पूरी तरह टाला नहीं जा सकता. यही वजह है कि रेगुलेशन को और जरूरी माना जा रहा है.

पहले भी आ चुकी है चेतावनी

इस स्टडी के पहले The Lancet में प्रकाशित यूनिसेफ की रिपोर्ट में भी बताया गया था कि सर्वे किए गए 11 देशों में 5 साल से कम उम्र के 10 से 35 प्रतिशत बच्चे नियमित रूप से मीठी सॉफ्ट ड्रिंक पीते हैं. करीब 60 प्रतिशत युवाओं ने माना कि उन्होंने एक दिन पहले कम से कम एक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड प्रोडक्ट खाया था. अमीर देशों में अब ये उत्पाद रोज की कुल कैलोरी का आधे से ज्यादा हिस्सा बन चुके हैं, जबकि कम आय वाले देशों में भी इनकी खपत तेजी से बढ़ रही है. हालांकि साइंटिस्ट के बीच इस बात पर बहस जारी है कि क्या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को सचमुच तंबाकू के बराबर माना जा सकता है. लेकिन बच्चों और किशोरों की डाइट में इनकी बढ़ती हिस्सेदारी ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि आधुनिक फूड इंडस्ट्री की भूमिका और इसके नियमन को नए सिरे से देखने की जरूरत है.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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सिगरेट पीने वालों के वक्त से पहले आ जाता है गंजापन, हो जाइए सावधान

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Does Smoking Cause Hair Loss: बाल झड़ने की समस्या से आज आज बड़ी संख्या में लोग परेशान हैं. कई पुरुष इसे बढ़ती उम्र का एक सामान्य हिस्सा समझकर स्वीकार कर लेते हैं. लेकिन अब सामने आ रही नई जानकारी बताती है कि इंग्लैंड में एक आम लाइफस्टाइल की आदत बालों के झड़ने की रफ्तार तेज कर सकती है और समय से पहले बाल सफेद भी कर सकती है. हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि धूम्रपान सिर्फ लंग्स और दिल के लिए ही नुकसानदायक नहीं है, बल्कि यह बालों की जड़ों को भी नुकसान पहुंचा सकता है.

कैसे स्मोकिंग से बालों को नुकसान होता है?

स्मोकिंग तंबाकू आपके बालों की जड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है और बाल झड़ने का खतरा बढ़ा सकता है. Wiley में पब्लिश साल 2020 में 20 से 35 साल के पुरुषों पर किए गए एक स्टडी में स्मोकर्स और नॉन-स्मोकर्स के बीच कम उम्र में होने वाले एंड्रोजेनेटिक एलोपेशिया यानी मेल पैटर्न गंजेपन की तुलना की गई. इसमें पाया गया कि 500 धूम्रपान करने वालों में से 425 लोगों में किसी न किसी स्तर पर बाल झड़ने की समस्या थी, जबकि 500 नॉन-स्मोकर्स करने वालों में यह संख्या सिर्फ 200 थी. हैमिल्टन-नॉरवुड स्केल के अनुसार ग्रेड 3 में हेयरलाइन काफी पीछे चली जाती है और ग्रेड 4 में सिर के ऊपरी हिस्से पर साफ गंजापन दिखने लगता है. शोध में सामने आया कि 47 प्रतिशत स्मोकर्स ग्रेड 3 और 24 प्रतिशत ग्रेड 4 तक पहुंच चुके थे, जबकि नॉन-स्मोकर्स में केवल 10 प्रतिशत लोग ही इन स्तरों तक पहुंचे. शोधकर्ताओं का मानना है कि निकोटिन और तंबाकू में मौजूद अन्य रसायन बाल झड़ने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं, हालांकि इस पर और अध्ययन की जरूरत है.

ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ावा

धूम्रपान शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ाता है, यानी फ्री रेडिकल्स की मात्रा ज्यादा हो जाती है. ये हानिकारक कण शरीर के सेल्स के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं. तंबाकू का धुआं, प्रदूषण और तेज धूप भी इसी तरह का असर डालते हैं. अगर बालों की जड़ों की सेल्स क्षतिग्रस्त हो जाएं तो बालों की ग्रोथ प्रभावित होती है. इसके साथ ही सिगरेट पीने से ब्लड फ्लो भी कमजोर होता है. ब्लड वेसल्स में प्लाक जमने लगता है, जिससे ऑक्सीजन और पोषक तत्व सिर की त्वचा तक सही मात्रा में नहीं पहुंच पाते. इससे बाल कमजोर होकर टूटने और झड़ने लगते हैं. इसके अलावा धूम्रपान शरीर में सूजन बढ़ाने वाले प्रोटीन को सक्रिय कर सकता है, हार्मोन के संतुलन को प्रभावित कर सकता है और बालों के ग्रोथ साइकल को कंट्रोल करने वाले एंजाइम्स में बदलाव ला सकता है. ये सभी कारण मिलकर समय से पहले बालों के पतले होने और गं जेपन की समस्या को बढ़ा सकते हैं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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आलू खाएं या शकरकंद… ब्लड शुगर में कौन सी चीज है बेहतर?

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Potato or Sweet Potato for Diabetic Patients: भारत में करीब 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज या अनकंट्रोल ब्लड शुगर की समस्या से जूझ रहे हैं. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 20 से 79 साल की उम्र के लोगों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि भारत को दुनिया की ‘डायबिटीज कैपिटल’ कहा जाने लगा है. ऐसे में रोजाना की थाली में क्या रखा जाए और क्या नहीं, यह सवाल बेहद अहम हो जाता है. खासकर आलू और शकरकंद जैसी आम चीजों को लेकर लोगों के मन में अक्सर दुविधा रहती है कि ब्लड शुगर के मरीज के लिए कौन बेहतर है. चलिए आपको बताते हैं कौन सा सही है. 

भारत में कई किस्म के आलू

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि हर आलू एक जैसा नहीं होता. भारत में कई किस्में मिलती हैं और हर किस्म में स्टार्च और पोषक तत्वों की मात्रा अलग हो सकती है. इंडियन जर्नल ऑफ हॉर्टिकल्चर में प्रकाशित एक अध्ययन में सेंट्रल पोटैटो रिसर्च इंस्टीट्यूट, शिमला ने 46 भारतीय किस्मों का स्टडी किया. इसमें पाया गया कि कुछ किस्में जैसे कुफरी आनंद, कुफरी अरुण और कुफरी नीला में ऐसे गुण पाए गए जो कार्बोहाइड्रेट के टूटने की प्रक्रिया को धीमा कर सकते हैं, जिससे ब्लड शुगर तेजी से नहीं बढ़ता. यानी यह मान लेना कि हर आलू डायबिटीज मरीज के लिए नुकसानदायक है, पूरी तरह सही नहीं है.

वहीं शकरकंद को लेकर इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित रिसर्च बताता है कि इसमें कैरोटेनॉइड्स, एंथोसायनिन्स और फेनोलिक एसिड जैसे बायोएक्टिव कंपाउंड होते हैं. ये तत्व इंसुलिन रेजिस्टेंस कम करने और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद कर सकते हैं. पोषण की बात करें तो सामान्य आलू में लगभग 17 ग्राम कार्बोहाइड्रेट प्रति 100 ग्राम होता है और इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स अधिक होता है, खासकर उबले या तले हुए रूप में. उबले आलू का जीआई 78 से 82 तक जा सकता है, जबकि तला हुआ आलू इससे भी ज्यादा असर डाल सकता है. हालांकि उबालकर ठंडा करने पर इसका जीआई थोड़ा कम हो जाता है.

शकरकंद में क्या खास?

दूसरी तरफ शकरकंद में लगभग 20 ग्राम कार्बोहाइड्रेट होता है, लेकिन इसका जीआई आमतौर पर 44 से 61 के बीच रहता है, जो तुलनात्मक कम है. इसमें फाइबर ज्यादा होता है, जो शुगर के अवशोषण को धीमा करता है. साथ ही यह विटामिन ए, सी और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होता है.

कौन-सा होता है फायदेमंद?

आखिरकार सवाल यही है कि थाली में क्या रखें. एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर ब्लड शुगर कंट्रोल प्राथमिकता है तो शकरकंद बेहतर विकल्प हो सकता है. फिर भी आलू पूरी तरह से छोड़ना जरूरी नहीं है. मात्रा सीमित रखें, तले हुए रूप से बचें और दाल-सब्जी के साथ संतुलित आहार का हिस्सा बनाएं. सही मात्रा और सही तरीके से पकाने पर दोनों ही चीजें संतुलित डाइट का हिस्सा बन सकती हैं.

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एसिडिटी में कोल्ड ड्रिंक पीनी चाहिए या नहीं, क्या सच में इससे मिलता है आराम?

एसिडिटी में कोल्ड ड्रिंक पीनी चाहिए या नहीं, क्या सच में इससे मिलता है आराम?


Should You Drink Soda for Acidity: खाना खाने के बाद कई लोगों को एसिडिटी और गैस की समस्या हो जाती है. ऐसे में अक्सर लोग तुरंत राहत पाने के लिए कोल्ड ड्रिंक या सोडा पी लेते हैं. ठंडा और गैस वाला पेय कुछ मिनटों के लिए हल्का महसूस करा सकता है, लेकिन क्या यह सच में एसिडिटी ठीक करता है या यह सिर्फ एक भ्रम है?. चलिए आपको बताते हैं कि इसको लेकर एक्सपर्ट क्या कहते हैं और ये कैसे काम करता है.

नुकसान हो सकता है

एक्सपर्ट बताते हैं कि कोल्ड ड्रिंक्स में बहुत ज्यादा मात्रा में शुगर और कार्बन डाइऑक्साइड होती है. इसके अलावा इनमें एसिड, आर्टिफिशियल फ्लेवर और कई तरह के केमिकल्स मिलाए जाते हैं. ये सभी चीजें पेट और लिवर के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं. लोगों को लगता है कि गैस वाली ड्रिंक पीने से डकार आ जाती है और पेट हल्का हो जाता है, लेकिन यह असली इलाज नहीं है.

डॉक्टरों के मुताबिक कोल्ड ड्रिंक एसिडिटी या गैस को खत्म नहीं करती. उल्टा, इनमें मौजूद ज्यादा चीनी और एसिड पाचन तंत्र को और ज्यादा उत्तेजित कर सकते हैं, जिससे पेट में एसिड का बाहर निकलना बढ़ सकता है. अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक नियमित रूप से ऐसी ड्रिंक पीता है तो पेट की समस्या और बढ़ सकती है. इससे फैटी लिवर का खतरा भी बढ़ता है और डायबिटीज के मरीजों के लिए तो यह और ज्यादा हानिकारक साबित हो सकता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

इसको लेकर Dr.Jaison P Sharma ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया था, जिसमें उन्होंने कहा कि “आजकल एक कॉमन सी चीज देखने को मिलती है कि खाने के बाद एसिडिटी होने पर लोग कोल्ड ड्रिंक पी लेते हैं. उनको लगता है कि इससे एसिडिटी ठीक हो जाएगी. लेकिन इसमें कार्बन डाइऑक्साइड होती है, जब हम इसको पीते हैं, तो एक डकार सी आती है और हमें लगता है कि एसिडिटी ठीक हो गई. उन्होंने आगे कहा कि ऐसा कुछ नहीं होता, कोल्ड ड्रिंक एसिडिटी का इलाज नहीं, बल्कि वजह है. 

 

एसिडिटी से राहत पाने के लिए क्या किया जाए? 

एक्सपर्ट नेचुरल और हल्के विकल्प अपनाने की सलाह देते हैं. नारियल पानी पेट को ठंडक देता है और एसिडिटी कम करने में मदद कर सकता है. छाछ पाचन को बेहतर बनाती है और गैस की समस्या घटाती है. सौंफ या जीरे का पानी भी पारंपरिक रूप से पेट के लिए फायदेमंद माना जाता है. पुदीना या तुलसी की चाय पेट को आराम पहुंचा सकती है. कुछ लोगों को दूध से भी राहत मिलती है, हालांकि यह हर व्यक्ति पर अलग तरह से असर कर सकता है, सिर्फ पेय बदलना ही काफी नहीं है, खानपान की आदतों पर भी ध्यान देना जरूरी है. बहुत ज्यादा मसालेदार और तला-भुना खाना एसिडिटी बढ़ा सकता है. जल्दी-जल्दी खाने के बजाय आराम से और अच्छे से चबाकर खाना पाचन में मदद करता है. छोटे-छोटे अंतराल पर हल्का भोजन करना भी फायदेमंद हो सकता है.

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