बाबा रामदेव बोले- जेनेटिक और लाइफस्टाइल बीमारियों का समाधान है ‘परम औषधि’, दी ये सलाह

बाबा रामदेव बोले- जेनेटिक और लाइफस्टाइल बीमारियों का समाधान है ‘परम औषधि’, दी ये सलाह


Yoga Guru Swami Ramdev: योग गुरु स्वामी रामदेव ने हाल ही में एक फेसबुक लाइव सत्र के माध्यम से आधुनिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए. उन्होंने स्पष्ट किया कि जेनेटिक (आनुवंशिक), पर्यावरणीय और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का समाधान केवल दवाओं में नहीं, बल्कि ‘परम औषधि’ और अनुशासित जीवन पद्धति में निहित है.

जड़ से इलाज की आवश्यकता

स्वामी रामदेव के मुताबिक, आधुनिक चिकित्सा पद्धति का अपना महत्व है, लेकिन वह अक्सर केवल लक्षणों का इलाज करती है. उन्होंने भारतीय पारंपरिक ज्ञान का उल्लेख करते हुए ‘औषधि’ और ‘परम औषधि’ के बीच का अंतर समझाया. उनके मुताबिक, ‘परम औषधि’ वह समग्र दृष्टिकोण है जो रोग के लक्षणों के बजाय उसके मूल कारण (Root Cause) को ठीक करने पर केंद्रित होता है.

जेनेटिक और पर्यावरणीय चुनौतियों पर प्रहार

आज के दौर में बढ़ती बीमारियों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि कई स्वास्थ्य समस्याएं जेनेटिक पूर्वाग्रह, प्रदूषण और तनावपूर्ण जीवनशैली का परिणाम हैं. उन्होंने विशेष रूप से ‘प्रालब्ध दोष’ (भाग्य या कर्म से जुड़े दोष) का जिक्र करते हुए कहा कि जिन्हें अक्सर लाइलाज मान लिया जाता है, उन्हें भी निरंतर योग, प्राणायाम और संतुलित पोषण के माध्यम से काफी हद तक प्रबंधित किया जा सकता है.

सिंथेटिक उत्पादों से दूरी बनाने की सलाह

स्वामी रामदेव ने बढ़ते पर्यावरणीय रोगों के प्रति आगाह किया. उन्होंने कहा कि वायु, जल और भोजन के संदूषण ने मानव स्वास्थ्य को खतरे में डाल दिया है. उन्होंने रसायनों और सिंथेटिक उत्पादों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने का आह्वान किया. उनके मुताबिक, रसायनों का दीर्घकालिक उपयोग न केवल मानव शरीर बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए हानिकारक है.

स्वदेशी और समग्र जीवन शैली का आह्वान

पतंजलि के माध्यम से पारंपरिक प्रणालियों को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए उन्होंने कहा कि मधुमेह, मोटापा और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली की बीमारियों को आत्म-अनुशासन और शारीरिक सक्रियता से रोका जा सकता है. उन्होंने अंत में दर्शकों से अपील की कि वे दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ के लिए आयुर्वेद, योग और नैतिक जीवन को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं.

 

 

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कितना खतरनाक है निपाह वायरस, इसमें कब हो जाता है जान बचाना मुश्किल?

कितना खतरनाक है निपाह वायरस, इसमें कब हो जाता है जान बचाना मुश्किल?


देश में एक बार फिर एक खतरनाक वायरस ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है. निपाह वायरस के संदिग्ध मामलों की खबर सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड में आ गया है. पश्चिम बंगाल में दो नर्सों में इस वायरस के लक्षण मिलने की खबर के बाद आस-पास के राज्यों में भी सतर्कता बढ़ा दी गई है. निपाह वायरस कोई आम बीमारी नहीं है. यह तेजी से फैल सकता है और कई मामलों में जानलेवा भी साबित होता है.

यही वजह है कि जब भी इसके मामले सामने आते हैं, तो डर का माहौल बन जाता है. इस वायरस की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि अभी तक इसका कोई पक्का इलाज या वैक्सीन मौजूद नहीं है.  ऐसे में बचाव ही इसका सबसे बड़ा उपाय माना जाता है. तो आइए जानते हैं कि निपाह वायरल कितना खतरनाक है और इसमें जान बचाना मुश्किल कब हो जाता है. 

निपाह वायरस क्या है?

निपाह वायरस एक जूनोटिक वायरस है, यानी यह बीमारी जानवरों से इंसानों में फैलती है. इस वायरस का मुख्य स्रोत फल खाने वाले चमगादड़ होते हैं, जिन्हें फ्लाइंग फॉक्स भी कहा जाता है. यह वायरस सबसे पहले साल 1999 में मलेशिया में पाया गया था. उस समय यह चमगादड़ों से सूअरों में फैला और फिर सूअरों के संपर्क में आए इंसानों को संक्रमित कर गया.उस प्रकोप में सैकड़ों लोग बीमार हुए और कई लोगों की मौत हो गई थी. इसके बाद भारत और बांग्लादेश में भी समय-समय पर इसके मामले सामने आते रहे हैं. 

निपाह वायरस कितना खतरनाक है?

निपाह वायरस को खतरनाक इसलिए माना जाता है क्योंकि इसकी मृत्यु दर बहुत ज्यादा होती है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार, इस वायरस में 40 से 70 प्रतिशत तक मरीजों की मौत हो सकती है. यह वायरस सीधे दिमाग पर असर डालता है और दिमाग में सूजन (एन्सेफेलाइटिस) पैदा कर सकता है. कई मामलों में मरीज की हालत इतनी जल्दी बिगड़ती है कि डॉक्टरों को संभलने का मौका तक नहीं मिलता है. यही कारण है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने निपाह वायरस को सबसे खतरनाक बीमारियों की लिस्ट में शामिल किया है. 

निपाह वायरस के लक्षण क्या होते हैं?

निपाह वायरस के लक्षण आमतौर पर संक्रमण के 4 से 14 दिन बाद दिखने लगते हैं. कुछ मामलों में लक्षण दिखने में 45 दिन तक भी लग सकते हैं. इसके शुरुआती लक्षण तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, गले में खराश, खांसी, उल्टी, कमजोरी है. वहीं गंभीर लक्षण में चक्कर आना, भ्रम की स्थिति, बहुत ज्यादा सुस्ती, सांस लेने में दिक्कत, बेहोशी शामिल है. गंभीर मामलों में मरीज के दिमाग में सूजन आ जाती है और वह 24 से 48 घंटे के भीतर कोमा में जा सकता है. 

कब हो जाता है जान बचाना मुश्किल?

निपाह वायरस में जान बचाना तब मुश्किल हो जाता है जब मरीज को समय पर इलाज न मिले, संक्रमण दिमाग तक पहुंच जाए, सांस लेने में ज्यादा परेशानी होने लगे, मरीज की इम्यूनिटी कमजोर हो या अस्पताल में संक्रमण फैल जाए. कई मामलों में यह वायरस अस्पतालों के अंदर भी फैल चुका है, जहां मरीजों की देखभाल करने वाले लोग भी इसकी चपेट में आ गए. इससे साफ है कि यह बीमारी इंसान से इंसान में भी फैल सकती है. 

निपाह वायरस से बचाव कैसे करें?

निपाह वायरस का कोई टीका या पक्का इलाज नहीं है, इसलिए सावधानी ही सबसे बड़ा इलाज है. ऐसे में इससे बचाव के लिए हाथों को बार-बार साबुन और पानी से धोएं, चमगादड़ों और सूअरों से दूरी बनाकर रखें, जमीन पर गिरे या आधे कटे फल न खाएं, कच्चा खजूर का रस पीने से बचें, संक्रमित या संदिग्ध मरीज के संपर्क में न आएं, स्वास्थ्य विभाग की सलाह का पालन करें. 
 
यह भी पढ़ें: धूप न मिलने का सीधा असर हड्डियों पर, दिखें ये लक्षण तो रहें सावधान

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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क्या बियर पीने से निकल जाता है किडनी में फंसा स्टोन, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर्स?

क्या बियर पीने से निकल जाता है किडनी में फंसा स्टोन, जानें क्या कहते हैं डॉक्टर्स?


Drinking Beer For Kidney Stones: हमारी बदलती लाइफस्टाइल के चलते हमें जिन बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा रहता है, उनमें से एक है किडनी स्टोन का.  यह एक आम लेकिन बेहद दर्दनाक समस्या है. इसे लेकर लोगों के बीच कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं. इन्हीं में से एक सबसे प्रचलित धारणा यह है कि बियर पीने से किडनी में फंसे स्टोन अपने आप निकल जाते हैं, क्योंकि बियर पेशाब की मात्रा बढ़ाती है. हालांकि सच्चाई यह है कि बियर को इलाज के तौर पर इस्तेमाल करना न तो सुरक्षित है और न ही भरोसेमंद. उल्टा, इससे दर्द बढ़ सकता है. चलिए आपको इशके बारे में विस्तार से बताते हैं. 

बियर पीने से हर तरह का किडनी स्टोन निकल जाता है?

कई लोग मानते हैं कि बियर पीने से स्टोन अपने आप बाहर आ जाते हैं. यह सोच इस वजह से बनी क्योंकि बियर यूरिन आउटपुट बढ़ाती है और माना जाता है कि इससे छोटे स्टोन खिसक सकते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि बियर सिर्फ पेशाब बढ़ाती है, लेकिन इससे बने हुए स्टोन सुरक्षित तरीके से नहीं निकलते. 5 मिमी से छोटे स्टोन कभी-कभी खुद निकल सकते हैं, लेकिन बड़े स्टोन जबरदस्ती खिसकाने पर तेज दर्द और रुकावट पैदा कर सकते हैं. कुछ स्टडी में बियर को स्टोन बनने के जोखिम को कम करने से जोड़ा गया है, लेकिन यह बचाव के लिए है, इलाज के लिए नहीं.

क्या बियर सुरक्षित घरेलू उपाय?

कई लोग दवाओं या सर्जरी की बजाय बियर को आसान और नुकसानरहित उपाय मानते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि बियर में ऑक्सलेट की मात्रा होती है, जो स्टोन बनने का बड़ा कारण है. लंबे समय तक बियर पीने से शरीर डिहाइड्रेट हो सकता है और नए स्टोन बनने का खतरा बढ़ सकता है. इसके अलावा इलेक्ट्रोलाइट बैलेंस बिगड़ना, किडनी पर दबाव और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं.

ज्यादा बियर पीने से स्टोन जल्दी निकल जाएगा?

यह भी आम सोच है कि ज्यादा बियर पीने से स्टोन जल्दी फ्लश हो जाएगा. लेकिन सच्चाई यह है कि अचानक ज्यादा यूरिन बनने से स्टोन निकलना जरूरी नहीं है. अगर यूरिटर में रुकावट है, तो दर्द, मतली और जटिलताएं बढ़ सकती हैं. आजकल ऐसी दवाएं मौजूद हैं जो यूरिटर की मांसपेशियों को रिलैक्स करके स्टोन को सुरक्षित तरीके से निकलने में मदद करती हैं.

बियर मेडिकल इलाज से बेहतर है?

कुछ लोग इलाज को महंगा या झंझट भरा मानकर बियर को विकल्प समझते हैं. हालांकि सच्चाई यह है कि मेडिकल ट्रीटमेंट कहीं ज्यादा सुरक्षित और असरदार है. दवाओं से छोटे स्टोन निकल सकते हैं और जरूरत पड़ने पर आधुनिक, मिनिमली इनवेसिव प्रक्रियाओं से स्टोन आसानी से निकाले जा सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉ. दीपेश कालरा, एम.एस., एम.सी.एच. (यूरोलॉजी), डॉ.एन.बी. (यूरोलॉजी) ने इसको लेकर अपने वीडियो में बताया है कि “अक्सर लोगों को कहते सुना गया है कि पेट में पथरी हो तो बियर पीना शुरू कर दो. यह भी कहा जाता है कि बियर पीने से किडनी स्टोन निकल जाता है और बियर पथरी को काट-काटकर बाहर निकाल देती है. लेकिन स्वास्थ्य एक्सपर्ट के मुताबिक यह सबसे बड़ा मिथक है.” 

इसे भी पढ़ें- Diabetes Treatment Cost: डायबिटीज की दवाओं पर कौन-सा देश सबसे ज्यादा पैसा करता है खर्च, किस पायदान पर भारत?

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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फ्रैक्चर के बाद टूटे हुए पैर में क्यों लटकाते हैं ईंट? 99% लोग नहीं जानते सही जवाब

फ्रैक्चर के बाद टूटे हुए पैर में क्यों लटकाते हैं ईंट? 99% लोग नहीं जानते सही जवाब


Why Doctors Hang Weights After Fracture: स्केलेटल ट्रैक्शन टूटी हुई हड्डियों के इलाज की एक खास तकनीक है. इसमें पिन, पुली और वज़न की मदद से टूटी हड्डियों को सही स्थिति में लाया जाता है, ताकि वे ठीक से जुड़ सकें. आमतौर पर इस पद्धति का इस्तेमाल शरीर के निचले हिस्से, जैसे पैर या कूल्हे की हड्डियों के फ्रैक्चर में किया जाता है. चलिए आपको बताते हैं कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है और इसका इस्तेमाल कब से होता आ रहा है, जिसके बारे में 99 प्रतिशत लोगों को नहीं पता है. 

क्या होता है इस प्रक्रिया में?

इस प्रक्रिया में डॉक्टर हड्डी के अंदर एक पिन डालते हैं. यही पिन पुली सिस्टम का आधार बनता है, जिस पर वज़न लगाया जाता है. धीरे-धीरे खिंचाव देकर टूटी हुई हड्डियों को सीधा किया जाता है, जिससे वे अपनी सही जगह पर आ सकें और भरने की प्रक्रिया बेहतर हो. ट्रैक्शन के दो आम प्रकार होते हैं स्किन ट्रैक्शन और स्केलेटल ट्रैक्शन. स्किन ट्रैक्शन में त्वचा पर पट्टी या स्प्लिंट लगाकर खिंचाव दिया जाता है, जबकि स्केलेटल ट्रैक्शन में पिन सीधे हड्डी में डाला जाता है. दोनों में फर्क इस बात का होता है कि खिंचाव का आधार कहां बनाया गया है.

स्केलेटल ट्रैक्शन का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है, लेकिन आज के समय में इसे ज़्यादातर इमरजेंसी ट्रॉमा केस में अस्थायी इलाज के तौर पर अपनाया जाता है. इसका मकसद सर्जरी से पहले हड्डियों को स्थिर करना होता है. कई बार मरीज की हालत ऐसी होती है कि तुरंत ऑपरेशन संभव नहीं होता, ऐसे में ट्रैक्शन समय देने का काम करता है.
यह तकनीक आमतौर पर फीमर, टिबिया, ह्यूमरस, हिप, पेल्विस और कभी-कभी गर्दन की रीढ़ के फ्रैक्चर में इस्तेमाल की जाती है. कुछ मामलों में उंगली के जोड़ के पास की हड्डी में भी इसका प्रयोग किया जाता है.

डॉक्टर रखते हैं निगरानी 

webmd की रिपोर्ट के अनुसार, इलाज के दौरान ऑर्थोपेडिक सर्जन स्थानीय एनेस्थीसिया देकर हड्डी में पिन डालते हैं. इसके बाद पुली से जुड़ा वज़न लगाया जाता है, जो हड्डी को धीरे-धीरे सही स्थिति में लाता है. अस्पताल में रहते हुए नर्स और डॉक्टर पिन वाली जगह पर इंफेक्शन के लक्षण, जैसे सूजन, लालिमा या दर्द, पर नजर रखते हैं और समय-समय पर एक्स-रे से हड्डी की स्थिति जांचते हैं. 

क्या यह प्रक्रिया दर्दनाक होती है?

कई लोगों को लगता है कि यह प्रक्रिया बहुत दर्दनाक होगी, लेकिन पिन लगाने के समय एनेस्थीसिया दिया जाता है. जब हड्डियां सही स्थिति में आने लगती हैं, तो दर्द अक्सर कम हो जाता है. सर्जरी के बाद पिन को भी एनेस्थीसिया देकर ही निकाला जाता है. हालांकि इसके फायदे हैं जैसे हड्डी को स्थिर करना, मांसपेशियों के खिंचाव को कम करना और दर्द में राहत. लेकिन लंबे समय तक ट्रैक्शन में रहने से कुछ जोखिम भी होते हैं. इनमें पिन वाली जगह पर इंफेक्शन, लंबे समय तक एक ही पोज़िशन में रहने से बेडसोर्स, नसों को नुकसान और मांसपेशियों की कमजोरी शामिल है. इसी वजह से आजकल डॉक्टर स्केलेटल ट्रैक्शन को अस्थायी उपाय के तौर पर ही इस्तेमाल करते हैं और जल्द से जल्द ऐसे इलाज की ओर बढ़ते हैं, जिससे मरीज जल्दी चल-फिर सके और अस्पताल में कम समय बिताना पड़े.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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पलाश के पेड़ से निकलने वाला लाल गोंद कितना मददगार, शरीर को कैसे देता है पोषण?

पलाश के पेड़ से निकलने वाला लाल गोंद कितना मददगार, शरीर को कैसे देता है पोषण?


पलाश के पेड़ से निकलने वाला लाल गोंद को ढाक गोंद या कमरकस भी कहते हैं. ये सिर्फ देखने में ही खूबसूरत लाल नहीं है, बल्कि हमारी सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है, खासकर महिलाओं के लिए ये किसी वरदान से कम नहीं है. आइए आपको इसके फायदों के बारे में बताते हैं.

शरीर के लिए कितना जरूरी यह गोंद?

इस गोंद को खाने से शरीर अंदर से मजबूत बनता है, पीठ और कमर के दर्द में आराम मिलता है और कमजोरी दूर होती है. सर्दियों में कई लोग इसे घी, आटे और थोड़ी चीनी के साथ मिलाकर लड्डू या पंजीरी की तरह बनाकर खाते हैं. यह शरीर को गर्मी और एनर्जी दोनों देता है.

स्किन और बालों के लिए कितना फायदेमंद?

ढाक गोंद सिर्फ ताकत ही नहीं देता, बल्कि त्वचा और बालों के लिए भी फायदेमंद है. इसे खाने से त्वचा चमकदार और जवां रहती है और बाल मजबूत और हेल्दी बनते हैं. इसमें प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में होते हैं, जो शरीर को अंदर से पोषण देते हैं और उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद करते हैं.

पाचन के लिए भी लाभदायक

इसके अलावा यह पाचन के लिए भी अच्छा है और हल्की दस्त या पेट की तकलीफ में आराम दिला सकता है. इसलिए पुरानी पीढ़ी इसे ‘कमरकस’ भी कहती थी. यह न सिर्फ पीठ और कमर की मांसपेशियों को मजबूत करता है बल्कि जोड़ों और घुटनों के दर्द में भी राहत देता है. आजकल लोग इसके लड्डू खाने के साथ-साथ इसे हेल्थ टॉनिक की तरह भी इस्तेमाल करते हैं. इसकी मिठास और पौष्टिकता दोनों मिलकर इसे हर उम्र के लिए उपयुक्त बनाते हैं.

इन दिक्कतों में भी करता है मदद

अगर आप शरीर को अंदर से ताकतवर बनाना चाहते हैं, कमजोरी और थकान दूर करना चाहते हैं और साथ ही त्वचा और बालों की देखभाल भी करना चाहते हैं, तो ढाक गोंद आपके लिए एक बेहतरीन नेचुरल ऑप्शन है. ये सिर्फ एक साधारण गोंद नहीं, बल्कि प्रकृति का दिया हुआ टोटका है, जो कई तरह के फायदे देता है. सर्दियों में इसे अपनी डाइट में शामिल करना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद होता है.

ये भी पढ़ें: पेट का भारीपन या मामूली थकान? नजरअंदाज न करें, जानिए फैटी लिवर की शुरुआती चेतावनी

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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